International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Save Tiger

DON'T LET WILD TIGERS DISAPPEAR

Lady Rosetta

Potatoes with low sugar content and longer shelf life.

अबूझमाड़ के जंगल

जहां बाघ नही नक्सली राज करते हैं

खवासा का आदमखोर

जहां कांपती थी रूह उस नरभक्षी से

जानवर भी करते हैं योग

योगाचार्य धीरज वशिष्ठ का विशेष लेख

Jul 10, 2019

लखीमपुर खीरी जनपद की सिंचाई नहर में मिला बाघ का शव


लखीमपुर खीरी: नहर में बहकर आये बाघ का शव मिलने से फैली सनसनी, मृत बाघ की सूचना मिलने पर वन विभाग में मचा हड़कम्प, दक्षिण खीरी वन प्रभाग के वन रेंज फरधान के बिझौली पुल के पास की नहर का मामला।

दुधवा राष्ट्रीय उद्यान, किशनपुर वन्य जीव विहार, पीलीभीत टाइगर रिजर्व व उत्तर तथा दक्षिण खीरी वन प्रभाग के शाखू के जंगलों में बाघों की अच्छी तादाद है, नदियों व नहरों के फैले जाल में तराई के यह जंगल पूरी दुनिया में वन्य जीवों के मामले में समृद्ध माने जाते हैं, पूर्व में भी कई बार जनपद खीरी में नहर में मृत बाघ पाए गए, जबकि बाघ दुनिया का सबसे शक्तिशाली तैराक होता है, ऐसे में बाघों के नहरों व नदियों बहकर मर जाने के मसलों पर सवाल खड़ा होता है।

दुधवा लाइव डेस्क

Jul 9, 2019

बिहार के मुंडा आदिवासी मटके से पता लगाते हैं मौसम का मिजाज़

फोटो: उमेश कुमार राय 

मौसम विज्ञान को चुनौती, यह घड़ा बताता है कि बारिश होगी या नहीं

बीहड़ों में रहनेवाले आदिवासी मौसम विज्ञानियों के पूर्वानुमान पर निर्भर नहीं रहते। इनके पास देसी तरकीब है, जिसका इस्तेमाल ये सदियों से करते आए हैं

उमेश कुमार राय 
शहरों और कस्बों में मौसम के मिजाज को पकड़ने के लिए मौसम विज्ञानी रडार से मिलनेवाली जानकारियों का विश्लेषण करते हैं। लेकिन, शहरों के नक्शे से दूर बीहड़ों में रहनेवाले आदिवासी मौसम विज्ञानियों के पूर्वानुमान पर निर्भर नहीं रहते। इनके पास देसी तरकीब है, जिसका इस्तेमाल ये सदियों से करते आए हैं। इनका दावा है कि मौसम विज्ञान विभाग की तरह इनका अनुमान गलत नहीं होता है। 


पिछले दिनों बिहार के गया जिले के फतेहपुर के अलगडीहा गांव एक टोले में जाना हुआ, जहां मुंडा बिरादरी के आदिवासी रहते हैं। इस टोले में 38 परिवार रह रहे हैं और सभी मुंडा समुदाय से आते हैं। ये लोग करीब डेढ़ दशक पहले झारखंड से यहां आकर बस गए। ये यहां मिट्टी और फूस से घर बनाकर रहते हैं। सरकार की तरफ से बिजली और पानी जैसी बुनियादी सहूलियतें भी इन्हें नहीं मिली है।


आदिवासियों से बातचीत हो ही रही थी कि उन्हीं में से कुछ लोगों ने गुजारिश की कि उनके साथ पास के जंगल में चला जाए। मैं भी तैयार हो गया। महज कुछ कदम चलने के बाद वो जगह आ गई। वहां कई पेड़ खड़े थे और उनकी डाल से मिट्टी के घड़े बंधे हुए थे। 


पेड़ से बंधे घड़ों को देखकर मुझे कौतुहल हुआ। मैं उनसे इसका रहस्य पूछना ही चाह रहा था कि उन्होंने खुद ही बताना शुरू कर दिया।


दरअसल, उस घड़े का इस्तेमाल आदिवासियों ने बारिश की संभावनाओं का पता लगाने के लिए किया था और इसके बाद उन्हें यहां पेड़ से टांग दिया था, क्योंकि इन घड़ों को तोड़ने की रवायत आदिवासियों में नहीं है।
आदिवासियों में से एक सिरका मुंडा जो इस टोले के सरदार भी हैं, बताते हैं, ‘अप्रैल के महीने में हमलोग बारिश का पता लगाते हैं। इसके लिए बिल्कुल नये घड़े में पानी डालते हैं और उसमें एक लकड़ी को खड़ा कर डाल देते हैं। उस लकड़ी को सपोर्ट करने के लिए उसकी दोनों तरफ दो लकड़ियां घड़े के ऊपर रखते हैं ताकि लकड़ी पानी में सीधी खड़ी रहे। लकड़ी जहां तक डूबी रहती है, वहां एक निशान लगा दिया जाता है।’
लकड़ी में लगे निशान से आदिवासी अनुमान लगाते हैं कि बारिश होगी कि नहीं और होगी तो कितनी होगी। 
सिरका मुंडा बताते हैं कि अगर घड़े का पानी लकड़ी में लगे निशान से नीचे चला जाता है तो इसका मतलब है कि बारिश कम होगी। वहीं अगर पानी ज्यों का त्यों रहा, तो इससे आदिवासी ये अनुमान लगाते हैं कि बारिश ठीकठाक होगी।


क्या घड़े का पानी ये भी बताता है कि आंधी आएगी कि नहीं, इस सवाल पर सिरका मुंडा कहते हैं, ‘बिल्कुल बताता है। अगर आंधी-तूफान आनेवाला होता है, तो घड़े के बाहरी हिस्से में पानी का रिसाव होने लगता है। अगर पूरब की तरफ रिसाव हुआ, तो मतलब है कि पूरब से आंधी आएगी। इसी तरह जिन दिशाओं से रिसाव होगा, उन्हीं दिशाओं से तूफान आने का पूर्वानुमान हमलोग लगाते हैं।’


मौसम का अनुमान लगाने का रिवाज एक पूजा का हिस्सा है, जो अप्रैल में ही की जाती है। इसे मुंडा आदिवासी सरूल कहते हैं। ये मूलतः प्रकृति पूजा होता है। 


आदिवासियों ने बताया कि तीन दिन चलनेवाली पूजा के दूसरे दिन घड़े में पानी भर उसमें लकड़ी सीधा कर रखा जाता है। तीसरे दिन सुबह में आदिवासी उस घड़े के पानी का मुआयना करते हैं। इसी पानी से उसी दिन खिचड़ी भी बनती है। सुरूल पूजा में शामिल होनेवाले सभी लोगों को खिचड़ी का प्रसाद दिया जाता है और घड़े को किसी पेड़ में टांग दिया जाता है। 


सिरका मुंडा से जब हमने पूछा कि क्या कभी उनका अनुमान गलत हुआ है, तो उन्होंने कहा, ‘हमारे पुरखे सदियों से इसी तरकीब से मौसम का पता लगाते आ रहे हैं और हम भी ऐसे ही मौसम का मिजाज जान लेते हैं। हमें कभी धोखा नहीं मिला है। घड़े के पानी को देखकर ही हम ये भी तय करते हैं कि कौन-सी फसल मौसम के अनुकूल रहेगी।’


साभार: डाउन टू अर्थ (Down To Earth)

खुरपका-मुहपका रोग का निवारण- भारतीय वैज्ञानिकों ने पाई सफलता




शुभ्रता मिश्रा 
वास्को डिगामा, गोवा, गुरूवार, 4 जुलाई 2019

वैज्ञानिकों ने की FMD पशु संक्रमण के आनुवांशिक कारणों की खोज 

खुरपका व मुंहपका रोग पशुओं में होने वाला संक्रामक विषाणुजनित रोग है। भारतीय वैज्ञानिकों ने इस रोग विषाणु के फैलने के लिए जिम्मेदार आनुवांशिक और पारिस्थितिकी कारकों का पता लगाने में सफलता पाई है।
नैनीताल-स्थित खुरपका मुंहपका रोग निदेशालय के वैज्ञानिकों के नेतृत्व में किये गए शोध में एक डेयरी फ़ार्म पर मवेशियों और भैंसों में प्राकृतिक रूप से होने वाले लगातार संक्रमण फैलाने वाले एफएमडीवी सीरोटाइप ओ/एमई-एसए/इंड2001डी नामक उप-वंशावली के विषाणु के आनुवंशिक और प्रतिजनी विविधताओं के विश्लेषण किए गए ।
मुंहपका खुरपका रोग विषाणु के सात सीरोटाइप होने के कारण इसके विरुद्ध कोई एक टीका बनाना कठिन है। कई बार पारम्परिक टीकों का असर भी नहीं होता है। इन टीकों में जीवंत विषाणु होते हैं और कई बार टीका लगाने से भी बीमारी फैल जाती है। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह विषाणु पशुओं की लसिका ग्रंथियों और अस्थिमज्जा में भी जीवित रह जाता है, इसलिए इसको जड़ से समाप्त करना मुश्किल होता है।
पीड़ित पशुओं के लक्षणों में उनको तेज बुखार होना, मुंह से लार निकलना, मुंह व खुरों में छाले पड़ना, लंगड़ाकर चलना शामिल हैं। इसके अलावा पशुओं की कार्यक्षमता क्षीण हो जाती है। इस रोग का समय से इलाज न मिलने पर पशुओं की मौत भी हो जाती है।
शोध में यह पाया गया है कि मवेशियों और भैंस में मिले विषाणुओं के आरएनए में कोई अंतर नहीं था। लेकिन मवेशियों में इनकी मात्रा अधिक थी, जबकि भैंस में ये काफी देर तक रहते पाए गए। रोगवाहक पशु के अंदर पाए जाने वाले वाहक विषाणुओं की आनुवांशिक और प्रतिजैनिक संरचनाओं में भी परिवर्तन देखा गया। विषाणु की आनुवांशिक और प्रतिजन संरचनाओं में परिवर्तन का प्रभाव संभावित रूप से संक्रमित मवेशियों और भैंसों के बीमार होने पर पड़ता है।

डॉ. सर्वानन सुब्रमण्यम
" पीड़ित पशुओं के लक्षणों में उनको तेज बुखार होना, मुंह से लार निकलना, मुंह व खुरों में छाले पड़ना, लंगड़ाकर चलना शामिल हैं। इसके अलावा पशुओं की कार्यक्षमता क्षीण हो जाती है। इस रोग का समय से इलाज न मिलने पर पशुओं की मौत भी हो जाती है।"
पशुओं में यह रोग अलग अलग तरीके से फैल सकता है क्यों कि खुरपका मुंहपका विषाणु इनमे फैलने के लिए अलग-अलग मार्गों का अनुसरण करता है । अध्ययन में अतिसंवेदनशील मवेशियों और भैंसों में इस विषाणु के लगातार संक्रमण फैलाने वाले विषाणवीय और वाहक कारकों की भूमिका आरएनए संरचना में देखे गए बदलावों के माध्यम से स्पष्ट हुई है।
खुरपका मुंहपका रोग निदेशालय के शोधकर्ता डॉ. सर्वानन सुब्रमण्यम ने इंडिया साइंस वायर को बताया कि “इस रोग पर सफलतापूर्वक नियंत्रण के लिए संक्रमित पशु, वैक्सीन लगे पशु और रोगवाहक पशु में भेद करना बड़ी चुनौती है। पशु को जब इसका टीका लगाया जाता है, तो वायरस प्रोटीन तुरंत ही सुरक्षात्मक प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया शुरु कर देते हैं। पहली बार इस अध्ययन में वायरस के आनुवांशिक पदार्थ आरएनए में हुए उत्परिवर्ती और प्रतिजनी बदलावों के आधार पर संक्रमित और संक्रमणवाहक पशुओं में वायरस के पारिस्थितिकीय विकास का अध्ययन किया गया है।”
डॉ सर्वानन ने बताया कि “इस अध्ययन से पता चला है कि पचास प्रतिशत से अधिक संक्रमित पशु स्थायी संक्रमण वाहक बन जाते हैं। अभी तक नए स्वस्थ पशुओं में रोग पैदा करने के लिए संक्रमण वाहकों की भूमिका स्पष्ट रूप से समझ में नहीं आई थी। इस अध्ययन से वाहक अवस्था के दौरान विषाणु में वाहक के अंदर और पशुओं के झुंड के भीतर उसमें होने वाले विकास को समझने में सहायता मिली है।”
शोधकर्ताओं का कहना है कि प्रभावी नियंत्रण रणनीतियों को तैयार करने के लिए खुरपका मुंहपका रोग विषाणु के महामारी विज्ञान को समझना बहुत आवश्यक है। इसलिए इस रोग से प्रभावित स्थानिक क्षेत्रों में खुरपका मुंहपका रोग पारिस्थितिकी की समझ में सुधार बीमारी के नियंत्रण के लिए आधार प्रदान करेगी।
यह अध्ययन शोध पत्रिका प्लाज वन में प्रकाशित किया गया है। शोधकर्ताओं में खुरपका मुंहपका रोग निदेशालय, मुक्तेश्वर, नैनीताल के डॉ जितेंद्र के. बिस्वाल, राजीव रंजन, सर्वानन सुब्रमण्यम, जजाति के. महापात्रा एवं डॉ. ब्रह्मदेव पटनायक के अलावा एबीआईएस डेयरी, राजनांदगांव के संजय पाटीदार और मुकेश के. शर्मा तथा अमेरिका के प्लम आइलेंड एनिमल डिसीज सेंटर, ग्रीनपोर्ट के मिरेंडा आर. बरत्राम, बारबरा ब्रिटो, लुईसएल. रोड्रिज़ और ज़ोनाथन आर्ट्ज़ शामिल थे। 
साभार:
इंडिया साइंस वायर

Jul 6, 2019

खतरे में पैंगोलिन


Photo courtesy: Sandip Kumar wikipedia
    
डॉ दीपक कोहली -
भारत में एक ऐसा दुर्लभ स्तनधारी वन्यजीव जो दिखने में अन्य स्तनधारियों से बिल्कुल अलग व विचित्र आकृति का जिसके शरीर का पृष्ठ भाग खजूर के पेड़ के छिलकों की भाँति कैरोटीन से बने कठोर व मजबूत चौड़े शल्कों से ढका रहता है। दूर से देखने पर यह छोटा डायनासोर जैसा प्रतीत होता है। अचानक इसे देखने पर एक बार कोई भी व्यक्ति अचम्भित व डर जाता है। धुन का पक्का व बेखौफ परन्तु शर्मीले स्वभाव का यह वन्य जीव और कोई नहीं बल्कि भारतीय पैंगोलिन है। पैंगोलिन या शल्की चींटी खोर कौतुहल पैदा करने वाला प्राणी है। देश में दो तरह के पैंगोलिन पाये जाते हैं-भारतीय और चीनी। चीनी पैंगोलिन पूर्वोत्तर में पाया जाता है। दुनियाभर में पैंगोलिन की सात प्रजातियां पाई जाती हैं। लेकिन वनों में पाये जाने वाले चीनी पैंगोलिन की संख्या के बारे में कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। दक्षिण एशियाई देशों में उनकी बहुत बड़ी मांग है।
पैंगोलिन का शरीर लंबा होता है जो पूंछ की ओर पतला होता चला जाता है। दिखने में यह जंतु अजीब सा दिखाई देता है। इसके शरीर पर शल्क होते हैं। ये शल्क सुरक्षा कवच का काम करते हैं। लेकिन थूथन, चेहरे, गले और पैरों के आंतरिक हिस्सों में शल्क नहीं होते। शल्क को चित्तीदार कांटे के बजाय बाल के रूप में देखा जा सकता है। हालांकि पुराने पड़ने और झड़ने के साथ ही शल्क के आकार प्रकार घटते बढ़ते रहते हैं। इनका रंग भूरे से लेकर पीला तक होता है। शरीर का शल्कमुक्त भाग सफेद, भूरे और कालापन लिए होता है। पैंगोलिन रात्रिचर प्राणी होते हैं और अक्सर निर्जन स्थानों पर दिखते हैं। हालांकि ये जमीन पर पाये जाने वाले प्राणी हैं लेकिन ये चढ़ने में बड़े माहिर होते हैं। इनके अगले पैर की पेड़ अच्छी पकड़ होती है। पैंगोलिन चींटियों की खोज में दीवारों पर और पेड़ों पर चढ़ते हैं और इसमें पूंछ भी उनका बहुत सहयोग करती है।
दिन के समय ये बिलों में छिपे होते हैं। इन बिलों के मुंह भुरभुरी मिट्टी से ढंके होते हैं इनके बिल करीब छह मीटर तक लंबे होते हैं। ये बिल जहां चट्टानी स्थलों पर डेढ़ से पौने दो मीटर तक लंबे होते हैं, वहीं भुरभुरी मिट्टी वाले स्थानों पर यह छह मीटर तक लंबे होते हैं। पैंगोलिन का पिछला हिस्सा चापाकार होता है और कभी-कभी वे पिछले पैरों पर खड़े हो जाते हैं। पैंगोलिन के दांत नहीं होते। पैंगोलिन अपनी रक्षा के लिए बॉल के आकार में लुढ़कता है। इसकी मांसपेशियां इतनी मजबूत होती हैं कि लिपटे हुए पैंगोलिन को सीधा करना बड़ा कठिन होता है। कोई मजबूत मांसभक्षी ही इनका शिकार कर सकता है। तथाकथित औषधि उद्देश्यों के लिए पैंगोलिन को मार डालने और उसके पर्यावास को नष्ट करने से उसकी संख्या काफी घट गई है।
पैंगोलिन की आंखें छोटी होती हैं और पलकें मोटी होती हैं। पैरों में पांच अंगुलियां होती हैं। पिछला पैर अगले पैर की तुलना में बड़ा और मोटा होता है। जीभ करीब 25 सेंटीमीटर तक होती है और वह आसानी से अपने शिकार को अपनी जीभ पर चिपका लेती है। कपाल वृताकार या शंक्वाकार होता है। मादा पैंगोलिन की छाती में दो स्तन होते हैं।
प्राणी शास्त्र में इसका वैज्ञानिक नाम मैनिस क्रेसिकाउडाटाहै तथा आमजन इसको सल्लू सांपकहते हैं। देश के अलग-अलग प्रान्तों में इसको अलग-अलग नामों से भी पुकारा जाता है। भारत में इसकी चीनी मूल की एक और प्रजाति है जिसका नाम मैनिस पेंटाडेकटाइलाहै जो सिर्फ उतरी-पूर्वी क्षेत्रों में ही बसर करती है। विश्व में इसकी कुल आठ प्रजातियाँ है जिनमें से चार एशियाई व चार अफ्रीकी उपमहाद्वीपों में मिलती है।

नुकीली थूथन व सुन्डाकार शरीर होने से यह अपने बिल में सरलता से आ जा सकता है, वहीं शल्की कवच इसको विषम परिस्थितियों में सुरक्षा देता है। इसने एक अनोखी एवं मजबूत सुरक्षा प्रणाली भी विकसित कर रखी है जिससे यह खतरनाक परभक्षियों से प्रायः सुरक्षित रह जाता है। खतरा होने पर यह अपने शरीर को जलेबीनुमा कुंडलित कर फुटबॉल की भाँति बना लेता है। यदि यह ऊँचे स्थान पर है तब खतरों से बचने के लिए यह फुटबॉल की भाँति लुढ़क कर मैदानी क्षेत्र में आ जाता है। इसकी आँखें व कान अल्प विकसित होते हैं लेकिन इनकी भरपाई यह सूंघने की अद्भुत क्षमता से पूरी कर लेता है। यह सूंघकर पता लगा लेता है कि इसका भोजन कहाँ और कितनी दूरी पर स्थित है। यह दन्त विहीन होता है। शरीर से अधिक लम्बी व आगे से नुकीली इसकी लचीली व चिप-चिपी जीभ मिट्टी के बड़े-बड़े टीलों व मांदों अथवा घोसलों में गहराई में रह रही दीमक व चींटियों तथा इनके अण्डों को पलक झपकते ही सुड़क (slurp up) लेती है। यह अपने तीक्ष्ण पंजों से मजबूत मांदों-टीलों-घोंसलों को मिनटों में चीर कर इन्हें ध्वंस करने की अद्भुत क्षमता रखता है। पक्षियों की भाँति पैंगोलिन भी भोजन पचाने हेतु कंकर-पत्थर निगलते हैं।

दिन में नींद व आराम में खलल न हो इस हेतु यह बिल के मुहाने को मिट्टी से हल्का सा बन्द कर देता है। अपनी गुदा के नजदीक स्थित विशेष ग्रन्थि से गन्ध निकालकर अन्य वन्य प्राणियों की तरह ये भी अपना इलाका बनाते हैं। इनका प्रणय काल जनवरी से मार्च तक का होता है। इस दौरान नर व मादा पैंगोलिन जोड़े में रहते हैं। गर्भवती पैंगोलिन ३-४ महीनों में साल में एक ही शिशु (पैंगोपप्स) को जन्म देती है। इसकी छाती के मध्य स्थित दो स्तनों से अपने बच्चे को दूध पिलाती है। बड़ा होने पर पैंगोपप्स को अपनी पूँछ पर बिठाकर जंगल में विहार कराने के दौरान इसे सुरक्षा तथा भोजन खोजने व खाने का हुनर भी सिखाती है। कुछ महीनों बाद शिशु अपनी माँ से अलग हो जाता है। पैंगोलिन पेड़ों पर चढ़ने व पानी में तैरने में दक्ष होते हैं।

कीट कई हेक्टेयर उपजाऊ कृषि भूमि को भी खोखली अथवा पोली कर देते हैं जो खेती के लिए अनुपयुक्त हो जाती है। इससे किसानों को प्रतिवर्ष आर्थिक नुकसान होता है। देश में दीमकों व चीटियों को खत्म करने के लिये अनेक प्रकार के खतरनाक कीटनाशक रसायनों का प्रयोग किया जाता है। इनके अन्धाधुन्ध उपयोग से इंसानों व पशुओं की सेहत पर बुरा असर पड़ता है। ये रसायन पर्यावरण को तो नुकसान पहुँचाते ही हैं लेकिन इनसे पारिस्थितिकी तंत्र में मौजूद विभिन्न प्रकार की भोजन शृंखलाएँ दूषित हो जाने का खतरा ज्यादा चिन्ताजनक है। इन विषम परिस्थितियों में पैंगोलिन जीव हमारे लिये आदर्श मददगार साबित होते हैं। पैंगोलिन न केवल इन विनाशकारी कीड़े-मकोड़ों की आबादी को नियंत्रित करते हैं बल्कि जैव-विविधता के संरक्षण एवं प्राकृतिक सन्तुलन में इनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका भी होती है। लेकिन ग्रामीण व आदिवासी लोग अपनी बेवकूफी व नासमझी के कारण निहायती भोले इन जीवों की बर्बरता पूर्वक हत्या कर देते हैं।
 
एक अनुमान यह भी है कि अन्तरराष्ट्रीय बाजार में इस वन्य जीव की कीमत दस से बारह लाख रुपये तक आंकी गयी है। भारत में लगभग बीस से तीस हजार रुपये में इसे बेचा व खरीदा जाता है। इसका अन्धाधुन्ध आखेट, बड़े पैमाने पर तस्करी, तेजी से बढ़ता शहरीकरण व इनके घटते प्राकृतिक आवासों से भारत में इनकी संख्या में भारी गिरावट आयी है।

अन्तरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (आई.यू.सी.एन.) ने अपनी रेड लिस्ट में भी इसको संकटग्रस्त प्रजातियों में शामिल करा रखा है। भारत में इसे वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची एक में रखा गया है। इसका आखेट करना, इसको सताना, मारना या पीटना, विष देना, तस्करी करना यह सब गैर कानूनी एवं अपराध की श्रेणी में आते हैं। यह प्रजाति सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि अन्य देशों में भी संकटग्रस्त है। यह प्रजाति विलुप्त न हो इस हेतु लोगों में जागरूकता लाने व इसके सरंक्षण के लिये विश्व भर में प्रतिवर्ष फरवरी माह के तीसरे शनिवार को वर्ल्ड पैंगोलिन डे’ (विश्व चींटीखोर दिवस) मनाया जाता है। लेकिन भारत में इसके प्रति लोगों में उत्साह नजर नहीं आता है। विश्वविद्यालयों व महाविद्यालयों के पर्यावरण, प्राणी शास्त्र तथा वन विभाग चाहें तो पहल कर प्रतिवर्ष सक्रिय जागरूकता अभियान चलाकर इस वन्यजीव के संरक्षण में योगदान कर सकते हैं। ग्रामीण छात्र-छत्राओं को ऐसे अभियानों से जोड़ने से इसके संरक्षण में अच्छे परिणाम आ सकते हैं। दूसरी ओर इसकी वंश वृद्धि दर भी कम होने से इसकी संख्या में कोई विशेष इजाफा नहीं होता है। इसलिए समय रहते इनके सरंक्षण, वंश वृद्धि अथवा इनके कुनबों को बढ़ाने हेतु आधुनिक तकनीकों व उपायों को अपनाने की जरूरत है।
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प्रेषक : डॉ. दीपक कोहलीउपसचिव , वन एवं वन्य जीव विभाग,  5 / 104 , विपुल खंडगोमती नगरलखनऊ-  226010 इमेल: deepakkohli64@yahoo.in

देश के सबसे बड़े नाइट्रोजन ऑक्साइड हॉटस्पॉट में सिंगरौली-सोनभद्र भी शामिलः ग्रीनपीस विश्लेषण



दिल्ली-एनसीआर, मुंबई, बंगलुरू, कलकत्ता, चेन्नई और हैदराबाद सबसे बड़े हॉटस्पॉट की सूची में शामिल

नई दिल्ली। 4 जूलाई 2019। आज ग्रीनपीस द्वारा जारी नाइट्रोजन डायआक्सायड (NO2) के सैटलायट डाटा के विश्लेषण में यह सामने आया है कि ज्यादा धनत्व वाले वाहन और औद्योगिक क्षेत्र ही देश के सबसे ख़राब नाइट्रोजन आक्सायड हॉटस्पॉट हैं।

ट्रॉपॉस्फेरिक मॉनिटरिंग इंस्ट्रूमेंट ( TROPOMI) के पहले 16 महीने के ( फ़रवरी 18 से मई 19 तक) नाइट्रोजन डायआक्सायड सैटलायट डाटा से पता चलता है कि दिल्ली-एनसीआर, मुंबई, बंगलुरू, कलकत्ता, चेन्नई और हैदराबाद जैसे शहर जहाँ वाहन संख्या अधिक है, सबसे अधिक प्रदूषित हाट्स्पाट हैं। इसी तरह कोयला और औधीगिक क्षेत्र जैसे मध्यप्रदेश-उत्तरप्रदेश का सिंगरौली-सोनभद्र, छत्तीसगढ़ में कोरबा, ओडिशा में तलचर, महाराष्ट्र में चंद्रपुर, गुजरात में मुंद्रा और पश्चिम बंगाल में दुर्गापुर भी नाइट्रोजन आक्सायड उत्सर्जन के मामले में उतने ही प्रदूषित हैं।

ग्रीनपीस इंडिया के सीनियर कैम्पेनर पुज़ारिनी सेन कहती हैं, “पिछले कुछ सालों में कई अध्ययन आ चुके हैं जिनसे साबित होता है कि पीएम2.5, नाइट्रोजन आक्सायड और ओज़ोन का लोगों के स्वास्थ्य पर गम्भीर असर पड़ता है। ये बहुत ख़तरनाक वायु प्रदूषक हैं जिनकी वजह से हृदय और सांस सम्बंधी बिमारियों का ख़तरा बढ़ जाता है और लंबे समय तक संपर्क में रहने की वजह से हृदयाघात और कैंसर जैसी गंभीर बिमारियों का खतरा भी बढ़ता है।”

नाइट्रोजन डायआक्सायड एक ख़तरनाक प्रदूषक है और दो सबसे ख़तरनाक प्रदूषक ओज़ोन तथा पीएम2.5 के बनने में योगदान देता है। एक अनुमान के मुताबिक वायु प्रदूषण (बाहरी पीएम2.5, घरेलू और ओजोन वायु प्रदूषण मिलाकर) से साल 2017 में दुनिया में 34 लाख लोगों की मौत हुई वहीं भारत में यह संख्या 12 लाख था। पीएम 2.5 अकेले भारत में साल 2017 में करीब 6.7 लाख लोगों की मौत की वजह बना।

2015 में आईआईटी कानपुर की रिपोर्ट में कहा गया था कि अगर दिल्ली के 300 किमी क्षेत्र में स्थित पावर प्लांट से 90% नाईट्रोजन ऑक्साइड में कमी की जाती है तो इससे 45% नाइट्रेट को घटाया जा सकता है। इससे दिल्ली में पीएम10 और पीएम2.5 क्रमशः 37 माइक्रोग्राम/घनमीटर और 23 माइक्रोग्राम/घनमीटर तक घटाया जा सकता है। अगर इस घटाव को हासिल किया जाता है तो वायु प्रदूषण से निपटने में महत्वपूर्ण पड़ाव बनेगा क्योंकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार पीएम 2.5 का सलाना औसत 10 माइक्रोग्राम/घनमीटर होना चाहिए और भारतीय मानक के अनुसार यह 40 माइक्रोग्राम/घनमीटर होना चाहिए। 

इस साल के शुरुआत में ग्रीनपीस द्वारा जारी वायु प्रदूषण सिटी रैंकिंग रिपोर्ट में यह सामने आया था कि दुनिया के 20 सबसे प्रदूषित शहरों में 15 भारतीय शहर शामिल हैं। जनवरी 2019 में ग्रीनपीस के एयरोप्किल्पिस 3 में भी यह सामने आया कि देश के 241 शहर राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता मानकों को पूरा नहीं करते हैं।

पुजारिनी ने सरकार और प्रदूषक उद्योगों को तुरंत मजबूत और तत्काल कदम उठाने की मांग करते हुए कहा, “नाइट्रोजन ऑक्साइड के सभी स्रोत जैसे परिवहन, उद्योग, उर्जा उत्पादन आदि पर स्वास्थ्य आपातकाल की तरह निपटना चाहिए। वायु प्रदूषकों के अध्य्यन का इस्तेमाल करके अलग-अलग सेक्टर के लिये लक्ष्य निर्धारित करके, अयोग्य शहरों की सूची को अपडेट करके, तथा शहरों के हिसाब से लक्ष्य निर्धारित करके उसे राष्ट्रीय स्वच्छ हवा कार्य योजना में शामिल करना चाहिए। पावर प्लांट और उद्योगों के लिये उत्सर्जन मानकों को लागू करना चाहिए और उद्योगों और ऊर्जा क्षेत्र को स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों को अपनाने की जरुरत है। यह समझना चाहिए कि जितनी देर हो रही है, हम उतनी जिन्दगियां खो रहे हैँ।”


अविनाश कुमार चंचल ग्रीनपीस भारत 
avinash.kumar@greenpeace.org



Jun 5, 2019

प्रकृति की ओर चलें

Photo by: KK Mishra of Manhan
फिजूलखर्ची घटाओ, पुर्नोपयोग बढ़ाओ, पर्यावरण बचाओ


उपभोग घटेगा तो बचेगा पर्यावरण 



अंग्रेजी का 'एन्वायरन्मेंट' शब्द, फ्रांसीसी शब्द 'एन्वायरन्स' से विकसित हुआ। पारिस्थितिकीय संदर्भों में 'एन्वायरमेन्ट' शब्द का प्रयोग पहली बार 1956 में हुआ। 20वीं सदी के छठे दशक से पूर्व के किसी संस्कृत-हिंदी ग्रंथ अथवा शब्दकोष में 'पर्यावरण' शब्द का उल्लेख नहीं मिलता। संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी विश्व पर्यावरण दिवस हेतु 1972 में पहली बार निर्देशित किया। प्रथम विश्व पर्यावरण दिवस, वर्ष 1974 में मनाया गया। भारत की बात करें तो वर्ष 1985 से पहले भारत में पर्यावरण का अलग कोई मंत्रालय नहीं था; पर्यावरण के नाम पर अलग से कानून नहीं थे। पर्यावरण को एक विषय के रूप  में  पढ़ने की बाध्यता भी सत्र वर्ष 2004-05 से पहले नहीं थी। विरोधाभास देखिए कि पर्यावरण की पढ़ाई बढ़ी; बजट बढ़ा; क़ानून बढ़े; इंतज़ाम बढे़, किंतु पर्यावरण सुरक्षा की गारंटी लगातार घटती जा रही है। क्यों ? क्योंकि शायद हम ऐसा इलाज़ कर रहें; ताकि मर्ज बना रहे, इलाज़ चलता रहे। हम लक्षणों का इलाज कर रहे हैं। पर्यावरणीय क्षरण के मूल कारणों की रोकथाम, हमारी प्राथमिकता बन ही पा रही। 



तापमान में बढोत्तरी का 90 प्रतिशत जिम्मेदार तो अकेले ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को ही माना गया है। हमने वायुमण्डल में कार्बनडाईऑक्साइड की मात्रा इतनी तेजी से बढ़ाई है कि अगले 11 वर्षों के बाद वायुमण्डल भी 'नो रूम' का बोर्ड लटक जाने का अंदेशा पैदा हो गया है। ये नुकसानदेह गैसें, हमारे अतिवादी उपभोग की पूर्ति के लिए की जा रहे उपायों की तो उपज हैं या कुछ और ? हमने धरती से इतना पानी खींच लिया है कि आज भारत के 70 फीसदी भू-गर्भ क्षेत्र पानी की गुणवत्ता अथवा मात्रा के मानक पर संकटग्रस्त श्रेणी में है। हम मिट्टी का इतना दोहन कर चुके हैं कि पिछले कुछ सालों में भारत की 90 लाख, 45 हजार हेक्टेयर खेती योग्य भूमि बंजर हो चुकी है। हमने इतनी हरियाली हड़प कर चुके हैं कि हमारा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, रेगिस्तान में तब्दील हो रहा है। हमने उत्पाद और उपयोग की ऐसी शैली अपना ली है कि भारत में आज हर रोज करीब 1.60 लाख मीट्रिक टन कचरा पैदा करने वाला देश हो गया है। हमने हवा में इतना कचरा फेंक रहे हैं कि भारत के सौ से अधिक शहर वायु गुणवत्ता परीक्षा में फेल हो गए और श्वसन तंत्र की बीमारियों से मरने वालों के औसत में भारत, दुनिया का नबंर वन हो गया है। इन परिस्थितियों के मूल कारण क्या हैं ? 


मूल कारण हैं: अतिवादी उपभोग और कम पुर्नोपयोग। अधिक उपभोग यानी प्रकृति का अधिक दोहन, अधिक क्षरण; कम पुर्नोपयोग यानी प्रकृति में अधिक कचरा, अधिक प्रदूषण, अधिक रासायनिक असंतुलन। हमारी अतिवादिता ने प्रकृति से लेने और देने का संतुलन बिगाड़ कर रख दिया है। विषमता यह है कि प्राकृतिक संसाधनों की कुल सालाना खपत का 40 फीसदी वे देश कर रहे हैं, जो जनसंख्या में कुल का मात्र 15 प्रतिशत हैं। बेसमझी यह है कि हम भारतीय भी अधिक उपभोग करने वाले देशों को ही की जीवन-शैली को अपनाने को विकसित ज़िन्दगी और बढ़ावा देने को असली विकास मान रहे हैं। हम भूल गए हैं कि यदि सारी दुनिया, अमेरिकी लोगों जैसी जीवन शैली जीने लग जाये, तो 3.9 अतिरिक्त पृथ्वी के बगैर हमारा गुजारा चलने वाला नहीं।


गौर कीजिए कि सरकारी योजनाएं, लोगों की क्रय शक्ति बढ़ाने में लगी हैं; बाजार और तकनीक विशेषज्ञ, लोगों को सुविधाभोगी बनाने में।  ऑफ सीजन मेगासेल 'दो के साथ एक फ्री' का  ऑफर ले आ गए हैं।  ऑनलाइन शाॅपिंग, बिना जरूरत की चीज का खुला आमंत्रण दे रही हैं। बापू बताते रहे कि एक धोती और एक लंगोटी में भी सम्मान संभव है, लेकिन भारत का नया समाज, सम्मान का नया पैमाना ले आ गया। ज्यादा सम्पत्ति, ज्यादा पैसा, ज्यादा सम्मान। हमने भी 'थाली में आधा खाना, आधा छोड़ना' को रईसी का लक्षण समझ लिया है।  गांधी समझाते रहे कि गंगा पास में हो, तो भी उस पर उनका हक सिर्फ और सिर्फ एक लोटे भर का है। वह चेताते रहे कि प्रकृति सभी की जरूरत पूरी कर सकती है, लेकिन लालच एक का भी नहीं; बावजूद इसके शासन अपनी परियोजनाओं में 'अधिकतम संभव दोहन' का शब्दावली ले आया। भूख, पानी, ऊर्जा और रोजगार जैसे संकट के समाधान में भी शासन ने अधिकतम संभव दोहन के ही विकल्प पेश करता रहा है। इस तरह सदुपयोग की जगह अधिकतम उपभोग, हमारा लक्ष्य विचार बन गया है। प्रेमचंद की कहानी 'ईदगाह' में नन्हे हामिद ने खिलौनों से ज्यादा, अम्मी की जरूरत के चिमटे की फिक्र कर बलैंया पाईं। लेकिन हम ऐसे स्वार्थी हो गए हैं कि हमने धरती मां की जरूरतों की चिंता करनी ही बंद कर दी है। हमने भूल गये कि प्राकृतिक संसाधन असीमित हैं। प्राकृतिक संसाधनों पर मानव अकेले का नहीं, हर जीव का हक़ है। उपभोग बढ़ा, तो संसाधनों पर संकट भी बढ़ेगा ही; सो बढ़ रहा है। पर्यावरण नष्ट हो रहा है।



ऐसे में आप प्रश्न उठा सकते हैं, ''तो हम क्या करें ? क्या हम आदिवासियों सा जीवन जीने लग जाएं ??''  जवाब है कि सबसे पहले हम स्वयं से अपने से प्रश्न करें कि यह खोना है कि पाना ? हम, सभी के शुभ के लिए लाभ कमाने की अपनी महाजनी परंपरा को याद करे। हर समस्या में समाधान स्वतः निहित होता है। भारत ने वर्ष 2030 तक 280 मीट्रिक टन कार्बनडाईऑक्साइड  उत्सर्जन की कटौती की घोषणा की है।  कार्बनडाईऑक्साइड  की मात्रा तब घटेगी, जब हम कार्बन उत्पादों की खपत घटायेंगे, कार्बन अवशोषण करने वाली प्रणालियां बढ़ायेंगे। ऐसी प्रणालियां बढ़ाने के लिए कचरा घटाना होगा; हरियाली और नीलिमा बढ़ानी होगी। खपत घटाने के लिए उपभोग कम करना होगा। उत्पाद चाहे खेत में पैदा हो, चाहे फैक्टरी में; बिना पानी, कुछ नहीं बनता। जैसे ही फिजूलखर्ची घटायेंगे; कागज़, बिजली, कपड़ा, भोजन आदि की बर्बादी घटायेंगे; पानी-पर्यावरण दोनो ही बचने लगेंगे। 

एक किलो चावल पैदा करने में 2,000 से 5000 लीटर तक पानी खर्च होता है। हरियाणा सरकार ने पानी की किल्लत से निबटने के लिए किसानों ने धान की खेती छोड़ने का आहृान किया है। उन्हे प्रोत्साहित करने के लिए आर्थिक लाभ और अरहर तथा मक्का के मुफ्त बीज की प्रोत्साहन योजना लाई है। पानी की सर्वाधिक ज़रूरत और खपत, सिंचाई हेतु ही है। यदि पानी कम है, तो वर्षाजल आधारित तथा कम पानी का उत्पादन करें। कम पानी अथवा प्रदूषित पानी होगा, तो औद्योगिक उत्पादन करना भी मुश्किल तथा मंहगा होता जाएगा। लाभ हमारा है, तो हमें खुद पहल करनी चाहिए कि नहीं ? इसके लिए भी हम, सरकार की ओर क्यों ताकें ??


कचरा न्यूनतम उत्पन्न हो, इसके लिए 'यूज एण्ड थ्रो' प्रवृति को हतोत्साहित करने वाले टिकाऊ उत्पाद नियोजित करने चाहिए कि नहीं ? जितनी ज़रूरत उपभोग घटाने की है, उतनी ही प्राथमिकता पुर्नोपयोग बढ़ाने की भी है। गौर कीजिए कि यदि भारत में प्रतिदिन पैदा हो रहे 1.60 लाख मीट्रिक टन कचरे का ठीक से निष्पादन किया जाये, तो इतने कचरे से प्रतिदिन 27 हजार करोङ रुपये की खाद बनाई जा सकती है। 45 लाख एकङ बंजर भूमि उपजाऊ बनाई जा सकती है। 50 लाख टन अतिरिक्त अनाज पैदा किया जा सकता है और दो लाख सिलेंडरों हेतु अतिरिक्त गैस हासिल की जा सकती है; यह करें।


जाहिर है कि जितनी फिजूलखर्ची घटायेंगे, पुर्नोपयोग बढ़ायेंगे; प्राकृतिक संसाधन उतने अधिक बचेंगे। अतः जितनी जरूरत उतना परोसें, उतना खायें, उतना खरीदें। बर्बाद, जरा सा भी न करें। सादगी को सम्मानित करें। कम उपभोग को अपनी शान बनायें और पुर्नोपयोग को अपनी आदत। ये चलन, अंततः पृथ्वी के आवरण के हर उस अंश को बचायेंगे, जिसे हम पर्यावरण कहते हैं। भूले नहीं कि पर्यावरण बचेगा, तो ही बचेगी हमारी समृद्धि, आर्थिकी, रोजगार, सेहत और सांसें ।


अरुण तिवारी 
146, सुन्दर ब्लाॅक, शकरपुर, दिल्ली-11092
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9868793799



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