International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Save Tiger

DON'T LET WILD TIGERS DISAPPEAR

Lady Rosetta

Potatoes with low sugar content and longer shelf life.

अबूझमाड़ के जंगल

जहां बाघ नही नक्सली राज करते हैं

खवासा का आदमखोर

जहां कांपती थी रूह उस नरभक्षी से

जानवर भी करते हैं योग

योगाचार्य धीरज वशिष्ठ का विशेष लेख

Feb 24, 2018

देव भूमि में फूलों की घाटी

                  
प्रकृति की अनुपम देन--फ़ूलों की घाटी    
         
(शकुन्तला यादव )

यॊं तो रंग-बिरंगे पुष्प सर्वत्र पाए जाते हैं, पर नन्दन वन के प्राकृतिक पुष्पोद्दान की छटा ही निराली है. इस उद्दान को लेकर महाभारत में एक प्रसंग आता है. एक बार अर्जुन ने द्रोपदी को कुछ देने की कामना की. कुछ न कुछ लेने के लिए, जब अर्जुन जिद करने लगे, तो द्रोपदी ने कहा-“ यदि आप कुछ लाकर देने की जिद ही कर रहे हैं तो मुझे नन्दन-वन से पारिजात का पुष्प ला दें, जो जल में नहीं, पत्थरों में पैदा होते हैं, जिनकी सुगन्ध कस्तुरी-मृग से भी मादक होती है, जिसका सौंदर्य दिव्य सौंदर्य की अनुभूति करा देता है.” 
अर्जुन चले और नन्दन वन जा पहुंचे. वहां के रक्षक से उन्हें युद्ध लड़ना पड़ा, तब कहीं एक फ़ूल दौपदी के लिए ला सके.
महाभारत की यह कथा संभवतः कल्पना अधिक, तथ्य कम जान पड़ता हो, किन्तु यह कल्पना नहीं, आश्चर्यजनक रहस्य है कि ऎसा नन्दन वन आज भी इसी भारतभूमि में वैसे ही विध्यमान है जैसी महाभारत में कथा आती है. समुद्र सतह से 13,200 फ़ीट ऊँचा यह हिमालय की गोदी में स्थित आज भी “फ़ूलों की घाटी” के नाम से विश्व विख्यात है.
प्रतिवर्ष हजारों देशी-विदेशी पर्यटक यहाँ पहुँचते और जहाँ, वहाँ की मादक छटा को देखकर मुग्ध होते हैं, वहीं यह आश्चर्य भी है कि 10-15 मील क्षेत्र में प्राकृतिक तौर पर उगते आ रहे, इन हजारों प्रकार के चित्र-विचित्र पुष्पों को किसने रौंपा ?. सारे संसार में ऎसा कोई भी स्थान नहीं जहाँ प्राकृतिक तौर पर इतने अधिक, इतने सुन्दर, इतने वर्णॊं के पुष्प खिलते हों.
विशेषज्ञों का अनुमान है कि यह फ़ूल प्रकृति की उतनी देन नहीं है जितना इस बात की सम्भावना कि यह पौधे अतीत काल में सुनियोजित तरीके से विकसित किए गए हों. सम्भव है यह जो राजोद्दान रहा हो. यह भी सम्भव है कि यहाँ कभी किसी महर्षि का तपोवन रहा हो. जो भी हो- महाभारत काल के बाद, यह स्थान उन सैंकड़ों रहस्यों की तरह छुपा ही रहा, जिसके लिए प्रतिवर्ष देश-विदेश के सैकड़ों पर्वतारोही आते और हिमालय के आश्चर्य खोजने का प्रयत्न करते हैं.
जहाँ अनेक धार्मिक व्यक्तियों का यह विश्वास है कि हिमालय में राजाओं द्वारा छिपाए हुए खजाने हैं, यज्ञों के बहुमूल्य पात्र, आभूषण और अस्त्र हैं, वहाँ पर्वतारोहियों का यह कथन है कि हिमालय की प्रत्येक वनस्पति औषधि है. जहाँ धार्मिक अग्नियाँ स्थापित हैं, ऎसे-ऎसे गुप्त आश्रम हैं, जहाँ अर्ध-सहत्र आयु के संत-महात्मा समाधिस्थ हैं, वहाँ पर्वतरोहियों ने हिममानव की कल्पना ही हिमालय में नहीं की, उनके पदचिन्ह भी देखे हैं. आदि साधना भूमि होने के कारण यह विश्वास है कि हिमालय में अध्यात्म-विज्ञान की वह अदृष्य तरंगे, वह ज्ञान अब भी विध्यमान है जिसे प्राप्त कर. इस भौतिक युग की संपूर्ण जड़वादी मान्यताओं, परम्पराओं, सिद्धांतों को बालू की दीवार की तरह बदला जा सकता है. “पुष्प घाटी” ऎसे-ऎसे रहस्यों की ही पुष्टि का एक प्रमाण है.
इस स्थान की खोज सबसे पहले ब्रिटिशकालीन भारतीय सेना के एक कप्तान ने की थी. उसने यहाँ के सैकड़ों प्रकार के फ़ूलों के बीज एकत्र कर इंग्लैण्ड भेजे. एक पुस्तक भी लन्दन में प्रकाशित की गई, जिसमें इस फ़ूलों की घाटी को प्रकृति का अद्भुत चमत्कार कहकर पुकारा गया. तब से अनेक विदेशी खोजी आते रहे और भटक-भटक कर लौटते रहे. पर इंग्लैण्ड की श्रीमती जान लेग को दुबारा यह स्थान फ़िर मिल गया. उन्होंने यहाँ से लगभग 500 फ़ूलों के बीज इकठ्ठे कर लन्दन भेजे. अब तो वहाँ पहुंचने के की तमाम सुविधाएं हो गई हैं इसलिए कोई भी वहाँ जा सकता है, पर अभी हमारे हिमालय में ऎसा बहुत कुछ है जहाँ तक हम जा सकते. वहाँ जा सके होते और उसके अनन्त रहस्यों में से कुछ का भी पता लगा सके होते, तो देखते कि जिन वस्तुओं के लिए हम विदेशों के आश्रित हैं, दूसरों का मुँह ताकते है, वह और उनसे श्रेष्ठ वस्तुएँ हम अपने ही भीतर से निकाल सकते हैं.
तीर्थ-यात्रा और आत्मकल्याण के लिए साधनाओं की दृष्टि से अब हिमालय ही एक पुण्य़ स्थान बचा है. वहाँ चित्ताकर्षक शांति है, अतुलित प्राण और सौंदर्य भरा है. उसमें जो एक बार इस पुष्प घाटी को देख आता है, उसे हिमालय का सौंदर्य भूलता नहीं.
             
पुष्प घाटी तक पहुँचने के लिए जोशीमठ पहुँचना होता है. वहाँ से बद्रीनाथ को जाने वाली सड़क पर मध्य में गोविन्द घाट पर उतरना पड़ता है. यहाँ से पैदल चढ़ाई है और आगे घाघरिया तक की सात मील की दूरी को पार करने के लिए पूरा एक दिन लग जाता है.
घाघरिया से कुल एक घंटे में मुख्य घाटी पहुँच जाते हैं. उसकी दाहिनी ओर  “कुबेर भण्डार” पर्वत और आगे “कामेट चोटी” है. बाईं ओर सप्राष्टांग पर्वतों की चोटियाँ हैं. कामेट झरना सामने ही बहता हुआ मिल जाता है. म्यूण्डर ग्राम पर पहुँचते ही यह “पुष्प घाटी” मिल जाती है और अनेक प्रकार के गुलाब, कुमुदिनी, गुलदाऊदी, सिलपाड़ा, जंगली गुलाब, चम्पा, बेला, जुही और कुछ फ़ूल तो ऎसे हैं जिनके नाम वैदिक साहित्य में हैं पर अब उनकी सही जानकारी करना कठिन है. अंग्रेजों ने इनके नाम “बड आफ़ पमडाइज, ग्लाडेओली, हिमालयन, आरकिड हिबिस्टकम आदि रख लिए हैं. कथीड के सफ़ेद व बैंगनी फ़ूलों के गुच्छे बड़े मोहक लगते हैं. बुरांस फ़ूल तो गुलाब के सौंदर्य को भी मात कर देता है. जब यह बुरांस पूरी तरह अपनी ऋतु में फ़ूलता है तो यह वन नन्दन वन या स्वर्ग से भी सुहावना प्रतीत होता है. कितना ही देखो-- न तो आँखें थकती हैं और न ही वहाँ से हटने का ही जी करता है. वर्ष भर इसी तरह किसी न किसी फ़ूल की शोभा बनी ही रहती है. 3000 से अधिक विभिन्न  फ़ूल विभिन्न समय में फ़ूलते रहते है. 

    (ब्रह्मकमल)
ब्रह्म कमल भी यहीं पाया जाता है. कमल जल में ही हो सकता है पर प्रकृति के संसार में क्या बंधन ?. उसने यहाँ पत्थरों में कमल उगाकर दिखा दिया है कि उसकी सत्ता सर्वशक्तिमान है. यह कमल श्वेत रंग का होता है, इसकी सुगन्ध ऎसी जादू भरी होती है कि हल्की-सी महक से ही अनन्त सुख और शांति का आभास होता है. इसलिए इसका नाम ब्रह्म-कमल पड़ा है. इसे पाकर ही द्रोपदी की इच्छा पूर्ण हुई थी.
फ़ूल कहीं भी हो, वह तो प्रकृति का उन्मुक्त सौंदर्य है. जो लोग अपने घरों के आस-पास थोड़े-से भी फ़ूलों के पौधे लगा देते हैं तो वह स्थान इतना अच्छा और आकर्षक लगने लगता है कि बार-बार वहाँ जाने का मन करता है, फ़िर एक ऎसे प्रदेश में पहुँचकर जहाँ 10 इंच से लेकर 28 इंच ऊँचाई के पौधे केवल फ़ूलों से ही आच्छादित हों, उस स्थान के सौंदर्य का वर्णन ही क्या किया जा सकता है. यह स्थान तो ईश्वर या उस दिव्य आत्मा के समान है, जिसके इस सौंदर्य और आनन्द की अनुभूति तो हो सकती है, अभिव्यक्ति नहीं.


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१०३, कावेरी नगर, छिन्दवाड़ा(म.प्र.) ४८०-००१
संपर्क-०९४२४३-५६४००


नमामि गंगे : बंद करो भ्रम और भ्रष्टाचार का कारोबार


नमामि गंगे : बंद करो निर्मलता का नाटक


लेखक: अरुण तिवारी

अब यह एक स्थापित तथ्य है कि यदि गंगाजल में वर्षों रखने के बाद भी खराब न होने का विशेष रासायनिक गुण है, तो इसकी वजह है इसमें पाये जाने वाली एक अनन्य रचना। इस रचना को हम सभी 'बैक्टीरियोफाॅज' के नाम से जानते हैं। बैक्टीरियोफाॅज, हिमालय में जन्मा एक ऐसा विचित्र ढांचा है कि जो न सांस लेता है, न भोजन करता है और न ही अपनी किसी प्रतिकृति का निर्माण करता है। बैक्टीरियोफाॅज, अपने मेजबान में घुसकर क्रिया करता है और उसकी यह नायाब मेजबान है, गंगा की सिल्ट। गंगा मूल की उत्कृष्ट किस्म की सिल्ट में बैक्टीरिया को नाश करने का खास गुण है। गंगा की सिल्ट का यह गुण भी खास है कि इसके कारण, गंगाजल में से काॅपर और क्रोमियम स्त्रावित होकर अलग हो जाते हैं।। 

अब यदि गंगा की सिल्ट और बैक्टीरियोफाॅजेज को बांधों अथवा बैराजों बांधकर में रोक दिया जाये और उम्मीद की जाये कि आगे के प्रवाह में वर्षों में खराब न होने वाला गुण बचा रहे, तो क्या यह संभव है ? मछलियां, नदियों को निर्मल करने वाले प्रकृति प्रदत तंत्र का एक महत्वपूर्ण अंग है। धारा के विपरीत चलकर अंडे देने वाली माहसीर और हिल्सा जैसी खास मछलियों के मार्ग में क्रमशः चीला और फरक्का जैसे बांध-बैराज खडे़ करके हम अपेक्षा करें कि वे नदी निर्मलता के अपने कार्य को जारी रखेंगी; यह कैसे संभव है ? 

गंगोत्री की एक बूंद नहीं पहुंचती प्रयागराज

हैदराबाद स्थित 'नीरी' को पर्यावरण इंजीनियरिंग के क्षेत्र में शोध करने वाला सबसे अग्रणी शासकीय संस्थान माना जाता है। 'नीरी' द्वारा जुलाई, 2011 में जारी एक रिपोर्ट स्थापित करती है कि बैक्टीरियोफाॅज की कुल मात्रा का 95 प्रतिशत हिस्सा, टिहरी बांध की झील में  बैठी सिल्ट के साथ ही वहीं बैठ जाता है। मात्र 05 प्रतिशत बैक्टीरियाफाॅज ही टिहरी बांध के आगे जा पाते हैं। सभी को मालूम है कि गंगा में ग्लेशियरों से आने वाले कुल जल की लगभग 90 प्रतिशत मात्रा, बैराज में बंधकर हरिद्वार से आगे नहीं जा पाती है। शेष 10 प्रतिशत को बिजनौर और नरोरा बैराजों से निकलने वाली नहरें पी जाती हैं। इस तरह गंगा मूल से आये जल, बैक्टीरियोफाॅज और सिल्ट की बड़ी मात्रा बांध-बैराजों में फंसकर पीछे ही रह जाती है। प्रख्यात नदी वैज्ञानिक स्वामी सानंद दुखी हैं कि गंगोत्री से आई एक बूंद भी प्रयागराज (इलाहाबाद) तक नहीं पहुंचती। परिणामस्वरूप, प्रयागराज (इलाहाबाद) की गंगा में इसके जल का मौलिक मूल गुण विद्यमान नहीं होता। यही कारण है कि प्रयागराज (इलाहाबाद) का गंगाजल, गर्मियां आते-आते अज़ीब किस्म के कसैलेपन से भर उठता है। निस्संदेह, इस कसैलेपन में हमारे मल, उद्योगों के अवजल, ठोस कचरे तथा कृषि रसायनों में उपस्थित विष का भी योगदान होता है; लेकिन सबसे बड़ी वजह तो गंगाजल को मौलिक गुण प्रदान करने वाले प्रवाह, सिल्ट और बैक्टीरियोफाॅज की अनुपस्थिति ही है।  

अविरलता बिना, निर्मलता असंभव

स्पष्ट है कि यदि गंगाजल के विशेष मौलिक गुण को बचाना है, तो गंगा उद्गम से निकले जल को सागर से गंगा के संगम की स्थली - गंगासागर तक पहुंचाना होगा; गंगा की त्रिआयामी अविरलता सुनिश्चित करनी होगी। त्रिआयामी अविरलता का मतलब है, गंगा प्रवाह और इसकी भूमि को लंबाई, चौड़ाई और गहराई  में अप्राकृतिक छेड़छाड़ से मुक्त रखना। इस त्रिआयामी अविरलता को सुनिश्चित किए बगैर, गंगा को निर्मल करने का हर प्रयास विफल होगा। यह जानते हुए भी बीते साढ़े तीन वर्षों में 'नमामि गंगे' के तहत् इस दिशा में क्या कोई एक ज़मीनी प्रयास हुआ ? उलटे गंगा को इसके मूल में कैद करने की कारगुजारियों को हरी झंडी दी गई। 

नैनीताल स्थित उत्तराखण्ड हाईकोर्ट द्वारा गंगा-यमुना की इंसानी पहचान पर न्यायालयी ठप्पा लगाने से उम्मीद बंधी थी कि कम से कम उत्तराखण्ड में तो गंगा तथा यमुना और अधिक शोषित, प्रदूषित और अतिक्रमण होने से बच जायेगी। हुआ उलटा। इस दिशा में न्यायालय की मंशा और भारतीय सांस्कृतिक आस्था का सम्मान करने की बजाय, उत्तराखण्ड शासन हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया। इस मामले में न तो स्वयं को गंगाभक्त कहने वाले शासकीय कर्णधारों ने स्थागनादेश लाने में कोई शर्म महसूस की और न ही प्रशासन ने गंगा में रेत खनन और पत्थर चुगान खनन माफिया के साथ मिलकर अनैतिक हथकण्डे अपनाने में। गंगा में गैरकानूनी खनन और भ्रष्टाचार के खिलाफ वर्षों से संघर्ष कर रहे मातृ सदन, हरिद्वार के सन्यासियों को चुप कराने पर उतारू स्थानीय प्रशासन की कारगुजारियां इस लेख को लिखे जाने तक भी जारी हैं और गंगा के संत और समाज... दोनो चुप हैं। ऐसे में अविरलता की उम्मीद बचे, तो बचे कैसे ?

शून्य प्रयास का नतीजा सूखती गंगा 

खैर, यह सर्वविदित तथ्य है कि गंगा में प्रवाहित होने वाले जल की कुल मात्रा में ग्लेशियरों का योगदान 35-40 प्रतिशत ही है। शेष 65-60 प्रतिशत मात्रा सहायक नदियों और भूजल प्रवाहों की देन है। क्या सहायक नदियों और भूजल प्रवाहों में जल की मात्रा बढ़ाने का कोई प्रयास इस बीच किया गया ? यदि प्रभावी प्रयास हुआ होता, तो क्या गंगा जलग्रहण क्षेत्र की गंगा, यमुना, गोमती, नर्मदा जैसी नदियों के नाम, भारत की सबसे तेजी से सूखती आठ प्रमुख नदियों की सूची में शुमार होते ? प्रयास होता, तो क्या उत्तराखण्ड की 20 प्रमुख नदियों में जल की उपलब्धता 10 वर्ष पहले 20 करोड़ लीटर की तुलना में घटकर गत् वर्ष मध्य अप्रैल में मात्र 11 करोड़ लीटर रह गई होती ? कदापि नहीं।

गंगा हित से विमुख परियोजनायें

कोई बताये कि घाटों को पक्का करने या उनके सौंदर्यीकरण से क्या गंगा के प्रवाह को कोई लाभ होता है ? उत्तराखण्ड में सड़क को 24 मीटर तक चौड़ी करने की जिद्द के चलते 60,000 पेड़ों को काटे जाने की योजना बनाने से गंगा की प्रवाहधारक क्षमता घटेगी कि बढ़ेगी ? गंगा जल परिवहन मार्ग के नाम पर वाराणसी से हल्दिया तक गंगा की खोद डालने से गंगा को नुकसान होगा या फायदा ? क्या गंगा-यमुना की तह पर बहते हल्के ठोस पाॅली, कागज़ और लकड़ी जैसे कचरे को मशीन लगाकर साफ करने से गंगाजल निर्मल हो जायेगा ? खासकर तब, जब कि मशीनें सतही कचरे को ले जाकर प्रवाह से 50-100 फीट की दूरी पर रख देती हों और उस कचरे को उठाकर अन्यत्र ले जाना मशीन ठेकेदार की कार्य संविदा में शामिल न हो। दूसरी ओर, स्थानीय नगर पालिका 'नमामि गंगे' बजट से पैसा न मिलने की बिना पर उस कचरे को उठाने से इंकार कर दे। जाहिर है कि बारिश आने पर वह कचरा वापस नदी में पहुंचेगा ही। इससे नदी साफ होगी या पैसा ? सूत्रानुसार, दिल्ली की यमुना नदी में पिछले आठ महीने से यही हो रहा है। 

हम एक तरफ तो गंगा में नाले गिराते रहें और दूसरी तरफ सतह पर मशीन घुमाते रहें। एक ओर घर-घर शौचालय बनाकर जलीय प्रदूषण बढ़ाते रहें और दूसरी ओर फूलों की खाद बनाने को प्रदूषण घटाने के एक बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश करते रहें। यह आंखों में धूल झोंकने का काम नहीं तो और क्या है ? 

खतरनाक है 'ओडीएफ इण्डिया' की हड़बड़ी

गौर कीजिए कि भारत की वर्तमान मल शोधन क्षमता, मौजूदा मल भार की तुलना में काफी कम है; बावजूद इस अक्षमता के हमें 'खुले में शौच से मुक्त भारत' का तमगा हासिल करने की इतनी जल्दी है कि हम उन सुदूर गांवों में भी मल का एक नया बोझ जबरन खड़ा करते जा रहे हैं, जहां किसी ने शौचालयों की कोई मांग नहीं की। इसे मल शोधन संयंत्र कंपनियों हेतु भविष्य का बाज़ार सुनिश्चित करने की हड़बड़ी कहें, शासकीय बेसमझी कहें, ऊपरी आमदनी का लालच मानें या स्वच्छता का नाटक ? खासकर तब, जब यह सब कुछ ऐसे निराधार तर्कों के आधार पर हो रहा हो, जिन्हे खुद शासकीय आंकडे़ नकार रहे हैं।

भ्रामक है बंद दरवाजे में शौच की शुचिता 


याद कीजिए कि गुजरात मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए श्रीमती आनंदी बेन का तर्क था कि खुले में शौच के कारण बलात्कार के मामले बढ़ रहे हैं। बलात्कार के मामले 100 फीसदी घरों में शौचालय वाले नगरों में ज्यादा हुए हैं या बिना शौचालय वाले गांवों में ? राष्ट्रीय अपराध रिकाॅर्ड ब्यूरो के आंकडे़ खंगालिए, आनंदी जी के बयान का झूठ खुद-ब-खुद सामने आ जायेगा। 

घर-घर शौचालय बनाने को प्रेरित करने वाले विज्ञापनों का दूसरा बड़ा तर्क यह है कि खुले में शौच करने से बीमारी फैलती है। 'खुले में शौच से मुक्त' का दर्जा प्राप्त होने वाले इलाकों में बीमारों की संख्या के लगातार घटने का कोई प्रमाणिक अध्ययन कहीं हो, तो कोई बताये ? अलबत्ता, 'नीरी' के एक ज़िम्मेदार सूत्र के अनुसार, इस निष्कर्ष के प्रमाणिक अध्ययन अवश्य हैं कि जल स्त्रोतों की दूरी का ध्यान रखे बगैर 'घर-घर शौचालय' के गड्ढों को जिस अंदाज़ में अंजाम दिया जा रहा है, उसके कारण भूजल में प्रदूषण बढ़ रहा है। स्पष्ट है कि भूजल की सेहत खराब होगी, तो बंद दीवारों में मौजूद शौच, बीमारों की संख्या घटाने की बजाय, बढ़ायेगा ही। भारत में बीमारियां, खुले में शौच करने के ज्यादा फैलती हैं या सीवेज को ले जाकर नदियों को प्रदूषित करने से ? मेरा मानना है कि ऐसा तुलनात्मक अध्ययन करते ही खुले में शौच को प्रेरित करने वाले विज्ञापनों की पोल स्वतः खुल जायेगी। 

विचारणीय तथ्य यह भी है कि यदि भूजल प्रदूषित होगा, तो क्या तालाब और नदियां प्रदूषित होने से बच जायेंगे ? जो नदी, तालाब जितना करीब होंगे, वे उतनी जल्दी इस भूजल प्रदूषण की चपेट में आयेंगे। तय मानिए कि हर घर में शौचालय की इस अनैतिक जिद्द की अंतिम परिणति एक दिन जलापूर्ति पाइप, सीवेज पाइप, बिल, निजीकरण तथा गांवों के तालाबों व नदियों में प्रदूषण के रूप में ही सामने आयेगी; बावजूद, इसके गंगा किनारे की 1600 लक्ष्य गंगा ग्रामों में ज़ोर सिर्फ और सिर्फ शौचालयों पर है।

नीयत पर सवाल उठाते नये मानक व निष्कर्ष 

बराबर कहा जा चुका है कि उत्तर प्रदेश के गंगा ग्रामों की आबादी, सामाजिक, आर्थिक, औद्योगिक तथा नदी परिस्थिति कालीबेंई व उसके समाज से भिन्न है। अतः पंजाब के संत बलबीर सिंह सींचेवाल कालीबेंई नदी निर्मलीकरण माॅडल के उत्तर प्रदेश में सफल होने की संभावना भी कम ही है। बावजूद इसके 'नमामि गंगे' अन्य विकल्पों पर ध्यान नहीं दे रहा। उलटे, एक प्रतिष्ठित शासकीय शोध संस्थान के निदेशक दावा कर रहे हैं कि गंगा के 5-7 प्रतिशत प्रवाह मार्ग को छोड़कर, शेष प्रवाह मार्ग का पानी अब ठीक-ठाक है। गंगा किनारे के इलाकों में प्रदूषण के बढ़ते दुष्प्रभावों को देखते हुए ऐसे निष्कर्षों की प्रमाणिकता और उसके मकसद की नीयत पर सवाल उठने स्वाभाविक हैं; सो,उठ रहे हैं। 

सवाल, 13 अक्तूबर, 2017 को पर्यावरण, वन एवम् जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अपर सचिव श्री अरुण कुमार मेहता की ओर से जारी शुद्ध मानकों में संशोधन संबंधी एक अधिसूचना (संख्या - 843) को लेकर भी है। अधिसूचना के संदर्भ में सहित एक पत्रिका द्वारा पेश निम्न तुलनात्मक अध्ययन बताता है कि केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, अक्तूबर, 2015 में अपने द्वारा बनाये मानकों के पैमानों को खुद ही गिराने पर लग गया है। कृपया सारणी देखें :

केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा संशोधित मानक
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तत्व                                                                मानक और निर्धारण वर्ष 
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                                                         वर्ष 1986  -  अक्तूबर, 2015  -  अक्तूबर, 2017
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बीओडी (मिग्रा प्रति लीटर)                     -         30        -         10       -        30  (प्रदेशानुसार)
सीओडी (मिग्रा प्रति लीटर)                     -       250        -         50       -        अनन्त
टीएसएस (मिग्रा प्रति लीटर)                    -       100       -          10       - 50 से 100 (प्रदेशानुसार)
नाइट्रोजन (मिग्रा प्रति लीटर)                   -        100      -          10       -        अनन्त
अमोनिकल नाइट्रोजन (मिग्रा प्रति लीटर)   -          50      -          05       -        अनन्त
फासफोरस (मिग्रा प्रति लीटर)                  -       अनन्त    -          01       -        अनन्त
मलीय काॅलीफाॅर्म (एमपीएन प्रति सौ मिली) -       अनन्त    -        100       -        1000 
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ऐसा लगता है कि मानकों में बदलाव की यह कारगुजारी, गंगा नदी को 2018 तक निर्मल करने को लेकर पूर्व में किए गये गंगा मंत्रालयी दावे की असफलता को छिपाने के लिए की गई है; ताकि नये कमज़ोर मानकों के आधार पर संबंधित मंत्रालय यह दावा कर सके कि 'नमामि गंगे' के प्रयासों से गंगा निर्मल हुई है। इस कारगुजारी के कारण, बाजारू भी हो सकते हैं। गौरतलब है कि और अधिक मल शोधन संयंत्र लगाने के लिए अभी जल्द में ही हिंडन, काली, गोमती और रामगंगा नदी को भी 'नमामि गंगे' परियोजना में शामिल किया गया है। 

इसी तरह की एक कारगुजारी, माहसीर मछली को आने-जाने के लिए नदी जल की गहराई मानक को लेकर की गई है। विश्व वन्य जीव कोष से संबद्ध एक सूत्र के मुताबिक, माहसीर के लिए सुविधाजनक गहराई तीन मीटर मानी गई है। पहले वे इसका घटाकर 0.5 मीटर करना चाहते थे। तमाम तर्कों के बावजूद, वे इसे एक मीटर से आगे लाने पर राजी नहीं हुए हैं। यह हाल तब है कि जब हमारे कुकर्मों के कारण 100 किलोग्राम तक वजन वाली माहसीर मछली की पीढ़ियां, अब गंगाजल में पांच किलोग्राम से आगे नहीं बढ़ पा रहीं।

कितनी सदाचारी 'नमामि गंगे' ? 

एक ओर अध्ययन के नाम पर 600 करोड़ रुपये, जनजागरण के नाम पर 128 करोड़ रुपये और टास्क फोर्स की चार बटालियनों के निर्माण के लिए 400 करोड़ रुपये  तथा उत्तर प्रदेश में  प्रस्तावित गंगा सेवा यात्रा हेतु योगी जी द्वारा 400 करोड़ का बजट निर्धारित करना और दूसरी ओर साढ़े तीन साल में चिन्हित 1109 गंभीर प्रदूषण उद्योगों में से मात्र 300 को बंद करा पाने की गति को आप सदाचार की श्रेणी में रखेंगे या भ्रष्टाचार की ? 'नमामि गंगे' के घोषित बजट में केदारनाथ, हरिद्वार, दिल्ली, कानपुर, वाराणसी और पटना के घाटों के लिए 250 करोड़ की धनराशि का प्रावधान था। 15 जनवरी, 2018 की ताज़ा खबर के अनुसार घाट व मंदिरों के डिजायन, सौंदर्यीकरण तथा रख-रखाव का काम अब अगले 15 साल के लिए हरिद्वार-ऋषिकेश में हिंदुजा बंधु को, कानपुर में जहाज कारोबारी रवि मल्होत्रा को, वाराणसी में एचसीएल समूह के शिव नादर को, पटना में वेदांता समूह के अनिल अग्रवाल को और संभवतः दिल्ली में पेट्रो रसायन, उर्वरक तथा धागा आदि बनाने वाले इंडरोमा समूह को सौंप दिया गया है। गंगा जलग्रहण क्षेत्र में वानिकी तथा हरियाली के लिए वन, पर्यावरण तथा जलवायु परिवर्तन मंत्री द्वारा घोषित 2500 करोड़ की ताज़ा परियोजना का हश्र आगे पता चलेगा। 



आरोप कई, जांच ज़रूरी

नदी कार्यकर्ताओं के आरोप हैं कि 'रिवर फ्रंट डेवल्पमेंट' नदी से उसकी ज़मीन छीनने का खेल है। सौंदर्यीकरण तथा रखरखाव के नाम पर घाटों को कंपनियों को सौंपने से तीर्थ पुरोहित और नाविकों के हाथों से तीर्थ पर्यटन तथा मछुआरों के हाथों से उनकी आजीविका छिन जाने का खतरा हमेशा रहने वाला है। व्यापक वृक्षारोपण के नाम पर गंगा किनारे खेती करने वाले गरीब-गुरबा किसानों के हाथों से नदी भूमि छीनकर कंपनियों / संस्थाओं के हाथों को देने का खेल है। 'गंगा ग्राम'  की गढ़मुक्तेश्वर परियोजना की सीबीआई जांच का आदेश देते हुए राष्ट्रीय हरित पंचाट, पहले ही अन्य परियोजनाओं में भी गड़बड़ी की संभावना व्यक्त कर चुका है। 

सूत्र कहते हैं कि भ्रष्टाचार, राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन निदेशालय में नियुक्ति और खरीद-फरोख्त से लेकर परियोजनाओं के ज़मीनी क्रियान्वयन तक में हुआ है। बजट का पूरा उपयोग नहीं करने को 'कैग' भले ही ग़ल़त माने, लेकिन यदि उक्त आरोपों में दम है तो अच्छा ही हुआ; वरना् शेष खर्च हुआ धन भी कम से कम गंगा का हित तो नहीं ही करता। अतः जांच ज़रूरी है; जांच हो। जनता की ओर से 'सूचना के अधिकार' के कार्यकर्ता पहल करें।

अविरलता नहीं दे सकते, तो बंद करो निर्मलता के नाटक

भारत को आज़ाद हुए 70 बरस हो चुके। इस 26 जनवरी, 2018 को एक गणतंत्र राष्ट्र बने भी हमें 68 बरस तो हो ही गए। दुःखद है कि 68 वर्षीय विशाल गणतंत्र होते हुए भी आज हम गंगा जैसी देवतुल्य नदी को बंधते, बिकते और शोषित होते देख रहे हैं। मुझे यह लिखने मेें कतई गुरेज नहीं, हम आज भी एक अक्षम गणतंत्र ही हैं। यह हमारी अक्षमता का नतीजा है कि भारत की जन-जन की आस्था और राष्ट्रीय अस्मिता की प्रतीक बनी गंगा जैसी अद्भुत नदी भी, आज सामाजिक, धार्मिक अथवा शासकीय एजेण्डा न होकर, कारपोरेट सौदेबाजी का एजेण्डा हो गई है और इसका प्रदूषण, महज् एक मुनाफा उत्पाद। 

यह भूलने की बात नहीं कि नदियों के नाम पर भारत, विश्व बैंक से अब तक करीब एक अरब डाॅलर का कर्ज ले चुका है। आज़ादी के बाद से अब तक गंगा सफाई के नाम पर 20 हज़ार करोड़ रुपये खर्च कर चुका है। बावजूद, इसके भारत की नदियों में प्रदूषण का स्तर पिछले एक दशक में घटने की बजाय, दो गुने से अधिक बढ़ गया है। नदियों में मिलने वाले मलीय जल की मात्रा भी 3800 करोड़ लीटर से बढ़कर, 62,000 करोड़ लीटर हो गई है। प्रदूषित नदियों के कई किलोमीटर के खेत बांझ होने की दिशा में अग्रसर हैं और जीव, बीमार होने की दशा में। ऐसा सिर्फ और सिर्फ इसलिए है कि कंपनियों के मुनाफे बढ़ाने तथा नेता, अफसर, इंजीनियर तथा स्थानीय ठेकेदारों की जेबें भरने की फिक्र में हमारे शासकीय कर्णधारों ने नदियों की अविरलता की पूरी तरह उपेक्षा करना तय कर लिया है और भारतीय जनमानस चुप्पी मारे बैठा है। 

ऐसे में भारतीय वैज्ञानिक, संत और समाज.. तीनों से मेरा निवेदन है कि कुछ सार्थक ज़मीनी पहल करना तो दूर, यदि गंगा जैसी देवतुल्य नदी को भी त्रिआयामी अविरलता सुनिश्चित करने के लिए मुंह तक नहीं खोलना चाहते, तो घुटने दो गंगा का गला; बंद करो स्वयं को गंगापुत्र और गंगापुत्री कहना। 'नमामि गंगे' के कर्णधार भी बंद करेे निर्मलता के नाटक। इस कारण यदि मां गंगा अंततः मर भी गई, तो कम से कम भारत को कर्जदार और भ्रष्टाचारी बनाने की वाहक बनकर तो नहीं मरेगी; जनता पर कर लादकर जुटाया बेशकीमती धन बचेगा, सो अलग।

अरुण तिवारी
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