International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Save Tiger

DON'T LET WILD TIGERS DISAPPEAR

Lady Rosetta

Potatoes with low sugar content and longer shelf life.

अबूझमाड़ के जंगल

जहां बाघ नही नक्सली राज करते हैं

खवासा का आदमखोर

जहां कांपती थी रूह उस नरभक्षी से

जानवर भी करते हैं योग

योगाचार्य धीरज वशिष्ठ का विशेष लेख

Jun 28, 2016

दुधवा लाइव अंतर्राष्ट्रीय जर्नल का जल-विशेषांक "आज भी खरे हैं तालाब"


जल-विशेषांक 

दुधवा लाइव पत्रिका का मई-जून २०१६ का प्रकाशित अंक पीडीएफ के रूप में यहाँ से प्राप्त कर सकते हैं.

Dear Friends,
I am pleased to share Dudhwa Live International Magazine Vol.6 Issue 5-6, May-June 2016, please check the link below to download the 44 pages Print edition (PDF)

http://issuu.com/dudhwalive/docs/dudhwa_live_issue_may-june_best_201

Dudhwa Live Magazine has been assigned ISSN number as a continuing resource (ISSN Number - 2395 - 5791) from Jan 2010. This will help in electronic archiving and act as a bibliographical tool so that students, researchers, librarians can use it to give the precise references of a serial publication.
To contribute articles to Dudhwa Live Magazine, mail to editor.dudhwalive@gmail.com
I look forward to your inputs and support in preserving our natural treasure. For other interesting articles and images check –






Please feel free to email, circulate in your network to raise awareness.
Regards,

Krishna Kumar Mishra


Jun 26, 2016

पुनर्जागरण- तालाब चारागाह और नदियों के लिए

तालाब बचाओ जन-अभियान 

"आज भी खरे हैं तालाब" पर्यावरणविद श्री अनुपम मिश्र को समर्पित हमारा ये अभियान प्रदेश के तालाबों, नदियों और कुओं के लिए है, देश व् प्रदेशव्यापी जागरूकता के लिए इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हमारे साथी राम बाबू तिवारी के नेतृत्व में विश्वविद्यालय के तमाम साथी, एक जुलाई से ( बुंदेलखंड से लखनऊ), साइकिल यात्रा द्वारा गाँवों में रात्रिविश्राम और चौपालों में तालाबों की अहम् भूमिका पर विमर्श करेंगे और फिर आठ जुलाई को अन्नदाता की आखत द्वारा आयोजित प्रेसक्लब लखनऊ में जल-सरंक्षण पर कार्यशाला, जिसमे मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव जी को तालाब-चारागाह सरंक्षण के बावत ज्ञापन...आप सभी सादर आमंत्रित है हमारी इस मुहिम में.


रोड मैप - 1 जुलाई से 7 जुलाई तक !


प्रारंभ गोष्ठी के उपरांत अपरान्ह बारह बजे बाँदा के छाबी तालाब मैदान से पदयात्रा नगर भ्रमण के बाद साइकिल और रथ से वाया मटोंध होते हुए गुगौरा ( कबरई ) रात्रि विश्राम ! 2 जुलाई को सुबह महोबा प्रस्थान और बारह बजे तक महोबा तालाब भ्रमण,जिलाधिकारी से भेंट / प्रेसवार्ता के बाद चरखारी प्रस्थान भ्रमण ( रात्रि विश्राम ), 3 जुलाई को सुबह चरखारी से राठ - हमीरपुर प्रस्थान दिन में भ्रमण प्रेस वार्ता ( रात्रि विश्राम ), 4 जुलाई को सुबह हमीरपुर से उरई प्रस्थान दिन में भ्रमण,जिलाधिकारी से भेंट / पत्रकार वार्ता और कालपी प्रस्थान ( रात्रि विश्राम ),5 जुलाई को सुबह कानपुर प्रस्थान भ्रमण जिलाधिकारी से भेंट आदि, 6 जुलाई कानपुर से उन्नाव प्रस्थान ( रात्रि विश्राम ), 7 जुलाई सुबह उन्नाव से लखनऊ प्रस्थान विधानसभा मार्ग होते हुए राज्यपाल भवन मुख्यमंत्री को उनके मंतव्य अनुसार सार्वजनिक कब्जों के लिए श्वेत पत्र जारी करने हेतु समर्थन पानी यात्रा का ज्ञापन मार्च !, 8 जुलाई सुबह दस से ग्यारह के मध्य मुख्यमंत्री आवास में मांगपत्र देना और प्रेस क्लब लखनऊ प्रस्थान ' तालाब एवं भूदान चारागाह मुक्ति अभियान ' एक विमर्श हेतु अतिथि और आप - सबके अभिनन्दन वास्ते !...आपके बूंद - बूंद स्नेह - सहयोग से यह तालाब और चारागाह मुक्त होंगे ! नीर उनमें अठखेलियाँ करेगा ! ....पधारे ह्रदय से प्रतीक्षा रहेगी - सादर

दुधवा लाइव डेस्क 

यहां पाई जाती हैं पृथ्वी और उसके लोगों की कहानियां

         
  

भारत के उत्तर-पूर्व के वनवासी उनकी अपनी पारंपरिक पद्धतियों ‘झूम सभ्यता’ या शिकार के कारण बहुत समय से प्रकृति के कथित विरोधी माने जाते हैं. वन्यजीव-वैज्ञानिक और मीडिया दोनों ने अनजाने ही इस रूढ़िवादिता में अपना भरपूर योगदान दिया है. 
      जैसा हम जानते ही हैं कि सच कहीं इसी के बीच है. उदाहरण स्वरूप, हम जानते हैं ‘झूम’ या खेती को काटने-जलाने की पद्धति हानिकारक नहीं है, परंतु लगातार ज़मीन के एक टुकड़े से दूसरे पर स्थानांतरण या ‘झूम’ का घटता चक्र पारिस्थितिकी के विनाश की ओर ले जाता है. इसी तरह वन्यजीव संरक्षण को कुछ बड़े खतरे उनके प्राकृतिक वास को सड़क और बड़े बांध निर्माण के लिए उजाड़ने से हैं. जबकि शिकार करना उस बड़े विनाश का कुछ ही अंश होगा. और तब भी जैव विविधता संबंधी बड़ी विकास परियोजनाएं जिनकी संरक्षण साहित्य में चर्चाएं होतीं हैं, उनका प्रभाव हम कम ही पाते हैं.
  
      वास्तव में ‘शिकार’ विषय ने हमेशा ही वाद-विवाद खड़ा किया है. उदाहरण बतौर भारतीय वन्यजीव संस्थान के शोधार्थियों द्वारा प्रबंधित 2013 की शोध लीजिए, शीर्षक था: विनाश के संकट तथा शिकार हेतु असामान्य वन्यजीवन जीरो वैली में, अरुणाचल प्रदेश, भारत, जो दावा करता है कि, अपतनी जनजाति द्वारा अधिकृत क्षेत्र में शिकार करना हमेशा से ही प्रधान रहा और यह प्रजाति के जीवन को लंबे समय से प्रभावित कर रहा था. अपतनी प्रजाति के सामुदायिक संगठन ने कई असहमति जताईं  और उनके समुदाय को इस प्रजाति के विनाश के लिए जिम्मेवार ठहराया, इसके लिए. 

      इसी तरह की कई भ्रांतियों और रूढ़ियों को हटाने के लिए असम के तेजपुर में ‘ग्रीन हब’ को प्रतिष्ठित किया गया था, यह अपनी ही तरह का एक संस्थान है, जो उत्तर-पूर्व के लोगों की जाहिर कहानियां सुनाता है. हर साल उत्तर-पूर्व के इन आठ राज्यों में से 20 युवकों को एक निराली अध्येतावृत्ति के लिए ‘ग्रीन हब’ द्वारा चुना जाता है – विडियो प्रलेखीकरण प्रशिक्षण के लिए, जो कि विशेष रूप से वन्यजीवन, पर्यावरण व जैवविविधता पर केंद्रित होता है. 

      इस ग्रीन हब उत्सव की पूरी सोच वन्यजीव फिल्मनिर्माता रीता बनर्जी की है. बनर्जी कहतीं हैं, ”ग्रीन हब का विचार दो प्राथमिक चीजों को दर्शाने के लिए था – पहला, उत्तर-पूर्व के युवाओं को निराशा और हिंसा से दूर करके उनके लिए नया रास्ता खोलने का; और प्रकृति के प्रति उनके प्रेम और आदर को पुनर्जीवित करने का, जो उनके उचित भविष्य का एक प्रबल आश्वासन है. 

      वे आशा करती हैं कि इस केंद्र पर एक साल बिताने के बाद, सभी युवक प्रेरित व ऐसे तकनीकी ज्ञान से सज्जित होकर अपने समुदायों में लौटेंगे, जो उन्हें संरक्षण के प्रति कदम बढ़ाने के लिए प्रबलता से प्रेरित करेगा!!...
      कुछ समय पूर्व बनर्जी ने क्षेत्र की शिकार की पद्धतियों पर फिल्म बनाई थी जिसने उन्हें क्षेत्र में  लंबे समय के अनुबंध के लिए प्रेरित किया. वे कहतीं हैं, उनकी फिल्म “द वाइल्ड मीट ट्रेल” “ने हमें क्षेत्र में व्याप्त जटिलता को समझने में मदद दी, समुदायों और प्राकृतिक संसाधनों से उनके जुड़ाव, खाद्य सुरक्षा की दृष्टि से इसके ऊपर निर्भरता, चाहे कृषि-जैव विविधता हो, जंगली मांस या जंगली पौधे, और विकास के मानक प्रतिमान के साथ देशी तंत्र पर तीव्र गति से होने वाले उसके प्रभाव को. समुदायों के साथ उनके गांवों और जंगल में समय बिताने ने हमें समझने में मदद दी जो ज्ञान उनमें सन्निहित है, और इसके साथ ही यह दिखाया जंगली शिकार का विस्तार इन जंगलों को खामोश करता जा रहा था.” 

      उनकी इस परिकल्पना को आगे बढ़ाने में सामाजिक कार्यकर्ता मोनिषा बहल ने मदद की, जो कि उत्तर-पूर्व समूह की सहसंस्थापक हैं, उन्होंने बनर्जी को इस कोर्स के लिए तेजपुर, असम का अपना पैतृक घर प्रस्तुत किया. ग्रीन हब के वार्षिकोत्सव में जिन विद्यार्थियों ने कोर्स पूरा किया उनका अभिनंदन करने, मैं न्य्शी जनजाति की सीतल से मिली, जिसने बेहतरीन फिल्मों में से एक फिल्म बनाई, धनेश पर, अरुणाचल प्रदेश के टेलो अंथोनी और हिस्किया संगमा ने हर शाम अपनी गायकी का शानदार प्रदर्शन इस समूह में किया. जितने विद्यार्थियों से मैं मिली वे सभी विविध पृष्ठभूमियों से थे, पर इकट्ठा थे दृश्य माध्यम और प्राकृतिक संसार के प्रति उनके लगाव की वजह से. 

     मुख्य मीडिया द्वारा क्षेत्र के चित्रण से उत्तर-पूर्वी भारत ने हमेशा ही अपकृत महसूस किया है. आखिरकार क्षेत्र के लोगों को उनकी ही कहानी सुनाकर लहरों का रुख मोड़ने का यह एक प्रयास है. पूरे क्षेत्र में संरक्षण पर बहुत ही अभूतपूर्व काम किया जा रहा है – वन्यजीव बचाव और पुनरुद्धार से पारंपरिक पुनरुत्थान और देशी संस्कृति को पुनर्जीवित करके. शायद ‘ग्रीन हब’ की सबसे बड़ी ताकत है उसका भौगोलिक स्थान. यहां पाई जाती हैं पृथ्वी और उसके लोगों की कहानियां, जो बताई जाना ज़रूरी है. 


- बहार दत्त (‘प्राकृतिक संरक्षण’ जीवविज्ञानी हैं. तेजपुर, असम में आयोजित ‘ग्रीन हब वार्षिकोत्सव’ में विशेष  आमंत्रित).  

अनुवाद: रूपल अजबे (सामाजिक कार्यकर्ता, गांधी विचार से प्रेरित, गांधी शान्ति प्रतिष्ठान नई दिल्ली से सम्बद्ध, इनसे आप rupalajbe@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं )

      
      








नोट- यह लेख मूलरूप से अंग्रेजी भाषा में मिंट  (MINT)अखबार में २७ मई २०१६ को प्रकाशित हुआ है .

Jun 22, 2016

राजस्व तालाबों की कब्जा मुक्ति- सजग हुई उत्तर प्रदेश सरकार तालाबों के लिए



  
जो जमीन राजस्व की है... पंचायती है; जो किसी एक की निजी नही, उस पर अपना हक जमाना एक जमाने से जबरों का जन्मसिद्ध अधिकार रहा है। इन जबरों में सरकारी दफ्तर भी शामिल रहे हैं। उत्तर प्रदेश के मायने में यह बात कुछ ज्यादा ही लागू होती है। इस जन्मसिद्ध अधिकार के चलते शहरों की लाल डिग्गियों पर आज इमारतें खडी हैं। सीताकुण्ड कोई कुण्ड नहीं, मकानों का झुण्ड है। लालबाग की जमीन पर कोठियां हैं। गांवों में चारागाह नाम की कोई जगह नहीं है। जिस जगह पर कभी गांव का खलिहान लगता था, उस पर किसी दबंग का अड्डा चलता है। दो लाठे के चकरोड सिकुडकर दो फुट हो गये हैं। कागज पर दर्ज  60 बीघे रकबे का तालाब मौके पर 6 बीघे भी नहीं है। तालाब की कब्जा हुई जमीन पर बाग है, खेत है, मकान है, लेकिन तालाब नहीं है। ’’अब यह उपयोग में नहीं है’’ - यह कहकर अन्य उपयोग हेतु तालाबों, चारागाहों आदि सार्वजनिक उपयोग की भूमि के पट्टे करने में उत्तर प्रदेश के ग्राम प्रधानों ने खूब उदारता दिखाई है। सरकारी योजनाओं, लेखपालों और चकबंदी विभाग ने भी इसमें खूब भूमिका निभाई है। रिकार्ड खंगाले जायें, तो इतने कस्बे, सरकारी दफ्तर और उद्योग उत्तर प्रदेश के झील-तालाबों के हिस्से की जमीन मारकर बैठे दिखाई देंगे, कि गिनती मुश्किल हो जायेगी। निजी तालाब भी इसी अधिकार के शिकार होते रहे हैं।


ऐसे ही शिकार हुए तालाबों के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश ने रास्ता दिखाया। उस आदेश को आधार बनाकर उत्तर प्रदेश की राजस्व परिषद ने जो शासनादेश जारी किया, वह ऐतिहासिक भी है, और प्रेरक भी।

मामला है -सिविल अपील संख्या- 4787/2001, हिंचलाल तिवारी बनाम कमलादेवी, ग्राम उगापुर, तालुका आसगांव, जिला - संतरविदास नगर, उ. प्र.
इस मामले में तालाबों की सार्वजनिक उपयोग की भूमि के समतलीकरण कर यह करार दिया गया था कि वह अब तालाब के रूप में उपयोग में नहीं है। इसी बिना पर तालाबों की ऐसी भूमि का आवासीय प्रयोजन हेतु आवंटन कर दिया गया था। इस मामले में दिनांक-25.07.2001 को पारित हुए आदेश हुए कोर्ट ने जंगल, तालाब, पोखर, पठार तथा पहाड. आदि को समाज की बहुमूल्य मानते हुए इनके अनुरक्षण को पर्यावरणीय संतुलन हेतु जरूरी बताया है। निर्देश है कि तालाबों को ध्यान देकर तालाब के रूप में ही बनाये रखना चाहिए। उनका विकास एवम् सौन्दर्याीकरण किया जाना चाहिए, जिससे जनता उसका उपयोग कर सके। आदेश है कि तालाबों के समतलीकरण के परिणामस्वरूप किए गए आवासीय पट्टों को निरस्त किए जायें। आवंटी स्वयं निर्मित भवन को 6 माह के भीतर ध्वस्त कर तालाब की भूमि का कब्जा ग्रामसभा को लौटायें। यदि वे स्वयं ऐसा न करें, तो प्रशासन इस आदेश का अनुपालन सुनिश्चित कराये।

यूं तालाब/ पोखर के अनुरक्षण केे संबंध में उत्तर प्रदेश राजस्व परिषद का पूर्व में भी एक आदेश था। किंतु सुप्रीम कोर्ट के उक्त आदेश का संज्ञान लेते हुए  परिषद ने नये सिरे से 08 अक्तूबर को एक महत्वपूर्ण शासनादेश जारी किया। जिसकी याद दिलाते हुए परिषद के अध्यक्ष आदित्य कुमार रस्तोगी ने 24 जनवरी .2002 को पुनः पत्र जारी किया। तद्नुसार आवासीय प्रयोजन के लिए आरक्षित भूमि को छोडकर किसी अन्य सार्वजनिक प्रयोजन की आरक्षित भूमि को आवासीय प्रयोजन हेतु आबादी में परिवर्तित किया जाना अत्यन्त आपत्तिजनक है।

शासनादेश शीतकालीन भ्रमण के दौरान ऐसे मामले की जानकारी खुद करने, उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा सुप्रीम कोर्ट निर्णयानुसार कार्यवाही करने हेतु राजस्व विभाग के अधिकारी यानी लेखपाल, कानूनगो, तहसीलदार व उपजिलाधिकरियों को जिम्मेदारी देता है।ऐसी भूमि की सुरक्षा के लिए परिषद राहत कार्यों तथा पंचायतीराज विभाग की योजनाओं के तहत् सार्वजनिक भूमि पर वृक्षारोपरण, तालाबों की मेडबंदी और उन्हे गहरा करने की जिम्मेदारी भी राजस्व विभाग को देता है।

जिलाधिकारियों व मंडलायुक्तों से स्वयंमेव निगरानी की भूमिका में आने की अपेक्षा करते हुए परिषद कहता है कि राजस्व विभाग के जो अधिकारी ऐसा न करें, भूराजस्व अधिनियम की धारा 218 के तहत् उनके विरुद्ध कार्यवाई की जा सकती है अथवा डी जी सी राजस्व के माध्यम से निगरानी का प्रार्थना की जा सकती है। मंडयायुक्तों की यह जिम्मेदारी है कि वे समय - समय पर इस बाबत् संबंधित जिलाधिकारियों से सूचना एकत्र कर अपनी आख्या के साथ राजस्व परिषद को एफ डी ओ में शामिल कर भेजते रहें। पंचायतीराज संस्थानों, जिला परिषद समितियों, जिला ग्रामीण विकास एजेंसियों, अधिवक्ता संघों आदि सभी पक्षों को सुप्रीम कोर्ट तथा परिषद के संबंधित आदेश से अवगत कराने... प्रचारित करने की अपेक्षा शासनादेश में की गई है।

स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश राजस्व परिषद का उक्त शासनादेश सार्वजनिक उपयोग की भूमि को कब्जामुक्त कर सिर्फ सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी प्रशासन पर नहीं डालता, उसे उसकेे मूल स्वरूप में लौटाने का दायित्व भी सुनिश्चित करता है। इस आदेश का उपयोग कर प्रतापगढ. जिले के एक जिलाधिकारी ने तालाबों की कब्जामुक्ति का बडी मुहिम छेडी थी। जिलाधिकारी के हटने पर वे फिर कब्जा होने शुरु हो गये। क्यों ? क्योंकि प्रशासन उसे मूल स्वरूप में लौटाने के बजट आधारित कार्य कराने से चूक गया। जनता तालाबों के बचाने से ज्यादा अपने लालच को बचाने में फंसी रही।

उत्तर प्रदेश के जिला बागपत के गांव डौला की तर्ज पर कई स्थानों पर निजी प्रयास के जरिए कब्जा मुक्ति की अच्छी कोशिशें हुई जरूर, किंतु ज्यादातर जगह प्रशासन आज भी अपेक्षा करता है कि कब्जामुक्ति के इस प्रशासनिक दायित्व की याद दिलाने कोई उसके पास न आये। कब्जा मुक्ति के निजी प्रयास करने वालों को सहयोग करना या प्रोत्साहित करना तो दूर, प्रशासन निरुत्साहित ही ज्यादा करता है। अच्छा बस! इतना ही है कि अब तालाबों की सूची तथा रकबा आदि संबंधित जानकारियां कम्पयूटरीकृत की जा चुकी हैं। आर टी आई का माध्यम हमारे पास है। कोशिश करें, तो प्रशासन कार्रवाई को बाध्य होगा ही।

उत्तर प्रदेश के हाईकोर्ट ने भी कई बार प्रशासन को इस बाबत् तलब किया है। रिपोर्ट मांगी है। किंतु कागज पर दी गई जानकारियां जमीनी हकीकत से आज भी मेल नहीं खाती हैं। चूंकि जमीनी जानकारी देने से पहले उस कब्जामुक्त कराने की जिम्मेदारी भी जानकारी देने वाले अधिकारी की है और उसने वह जिम्मेदारी नहीं निभाई है। प्रशासन इस जिम्मेदारी को निभाने को तब तक बाध्य नहीं होगा, जब तक कि समाज अपनी सार्वजनिक भूमि को कब्जामुक्त कराने की जिम्मेदारी निभाने आगे नहीं आयेगा। शासन ने रास्ता दिया है। प्रशासन को कार्रवाई करनी है। समाजसेवकों का काम उसे बाघ्य करना है। समाजसेवक आगे आयें। समाज उनकी ताकत बढ़ाएं। कम से कम जो तालाब और जितना रकबा मौके पर बचा है, उसे तो बचायें। उत्तर प्रदेश ही नहीं, देश को भी पानीदार बनाने का यही रास्ता है।
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विवरण के लिए देखें: उच्चतम न्यायालय मामले-2001 की पुस्तक: 6 एस एस सी, पेज 496 -501.
राजस्व परिषद, उत्तर प्रदेश के शासनादेश के लिए देखें: ( परिषदादेश संख्या -2751/जी-5711 डी/98 दिनांक 13 जून.2001 ) (शासनादेश संख्या - 3135/1-2-2001-रा-2, दिनांक  08 अक्तूबर, 2001) तथा (पत्र संख्या- जी- 865/5-9 आर/2001, दिनांक-24 जनवरी, 2002)
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अरुण तिवारी 
संपर्क: 9868793799/amethiarun@gmail.com

Jun 21, 2016

पानी जिसमें स्वयं नारायण निवास करते हैं




अंजलि भर जल की प्यास
श्रम का सीकर, दु:ख का आँसू
हँसती आँखों में सपने, जल !... 

आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः।
तासू शेते स यस्माच्च तेन नारायणः स्मृतः।। 

अर्थात जल, नर से प्रकट हुआ है, इसलिए इसका नाम ’नार’ है। भगवान इसमें अयन करते हैं यानी सोते हैं, इसलिए उन्हे नारायण कहा गया। भारतीय जलदर्शन कहता है कि पहले जल की रचना हुई; फिर जल से ही सूर्य, ब्रह्म हुए। ब्रह्म द्वारा रचित स्वर्गलोक, भूलोक, आकाश, विद्युत, मेघमण्डल, नदियां, पहाङ और नाना प्रकार की वनस्पतियां.. सभी जल से ही प्रकट हुए| इसलिए ही मंदिर में आरती के बाद, शंख में भर जल के छिडके हुए पवित्र छींटे या आचमन में तुलसी दल के साथ प्रभु का महाप्रसाद मान लिया जाता है| कलश के जल में पान के पत्ते की छिन्टो से हम स्नानम् समर्पयामि कह कर  भगवान को स्नान करवा देते है| अंजलि भर जल भी महान बना देता है, अंजलि भर जल से ही महान संकल्प किये जाते है, राजा बलि ने संकल्प लेकर तीनोलोक दान में दे दिए और  राजा हरिश्चचंद्र ने भी अंजलि भर जल की प्रतिज्ञा से कितने कष्ट उठाये| इस पवित्र जल की आज ये दुर्दशा है की नदियाँ जो बर्ष भर इस जल से आच्छादित रहती थी आज रुष्ट हो गयी है, अपने में ही सिमट गयी है| तालाब और झीले, झरने सब मौन है अब|  बादलो ने भी अपना रुख बदल लिया है.

जल है धरती की धमनी का रक्त

जब वयोवृद्ध सिद्धार्थ नदी के किनारे बैठ कर ध्यानमग्न हो सुनने लगे, तो उन्हें पानी के प्रवाह में “याचितों के विलाप, ज्ञानियों के हास, घृणा के रुदन और मरते हुओं की आह” के स्वर सुनाई दिए। “यह सब स्वर परस्पर बुने हुए, जकड़े हुए थे, सहस्र रूप में एक दूसरे के साथ लिपटे हुए। सारे स्वर, सारे ध्येय, सारी याचनाएँ, सारे क्षोभ, आनन्द, सारा पुण्य, पाप, सब मिल कर जैसे संसार का निर्माण कर रहे थे। ये सब घटनाओं की धारा की तरह, जीवन के संगीत की तरह थे।” जल धरती की धमनियों में बहते रक्त की तरह है, और नदियाँ, झीलें, वायुमंडल, जलस्तर और महासागर इस ग्रह के परिसंचरण तन्त्र की तरह। जल न होता तो जीवन कहाँ होता। न वन होते, न शेर, न इन्द्रधनुष, न घाटियाँ, न सरकारें होतीं न अर्थव्यवस्था। पानी ने ही हमारी भूमि की रूपरेखा खींची है, और उस पर गूढ जीवनजाल के रंग भरे हैं, एक सूक्ष्म सन्तुलन बरकरार रखते हुए। इस ग्रह पर जीवन को वर्तमान रूप में बनाए रखना है तो हमें पानी की बहुत इज़्ज़त करनी चाहिए। कितनी ही प्राचीन संस्कृतियों में पानी को पवित्र वस्तु का दर्जा दिया गया है। उन लोगों ने इस की महत्ता जानी, जिसे हमारा उद्योगीकृत समाज नहीं जानता। हम आए दिन, बिना सोचे समझे, पानी को ऐसे अपवित्र करते हैं, जैसे कि ऐसा करना हमारे व्यवसाय का एक स्वीकृत मूल्य हो। पिछली दो-एक शताब्दियों में, जो कि पृथ्वी के इतिहास में एक क्षण भर था, मानव ने इस ग्रह के जलाशय को इस सीमा तक विषाक्त कर दिया है स्वच्छ जल के अभाव में करोड़ों लोगों का जीवन खतरे में पड़ गया है।

जल एक राष्ट्रीय मुद्दा: समवर्ती सूची या राज्य सूंची

भूजल स्तर में लगातार गिरावट आने, शहरों का विस्तार होने के बावजूद बुनियादी सुविधाओं की कमी, जलवायु परिवर्तन, देश के 20 राज्यों में जल विषाक्तता के बीच जल के समुचित उपयोग एवं संरक्षण को लेकर एक समग्र, व्यापक राष्ट्रीय नीति बनाने की मांग के साथ ही जल को संविधान की समवर्ती सूची में रखने के विचार पर बहस शुरू हो गई है। ? सरकार का पानी पर स्वामित्व है या वह सिर्फ ट्रस्टी है? यदि ट्रस्टी, सौंपी गई सम्पत्ति की ठीक से देखभाल न करे, तो क्या हमें हक है कि हम ट्रस्टी बदल दें? पानी की हकदारी को लेकर उठे सवालों के बीच जल संसाधन सम्बन्धी संसद की एक स्थायी समिति ने अपनी रिपोर्ट में पानी को समवर्ती सूची में शामिल करने की बात को आगे बढ़ाया है। इसके अलावा कई वर्गो का भी मत है कि यदि पानी पर राज्यों के बदले, केन्द्र का अधिकार हो, तो बाढ़-सुखाड़ जैसी स्थितियों से बेहतर ढंग से निपटना सम्भव होगा। हमें जल को समवर्ती सूची के अंतर्गत ले लेना चाहिये ताकि केंद्र के हाथ में कुछ संवैधानिक शक्ति आ जायें। इससे देश में जल से जुड़ी समस्याओं से निपटने में मदद मिलेगी। साथ ही राष्ट्रीय संसाधनों का राष्ट्रीय हित में उपयोग निश्चित ही लाभकारी रहेगा। यह यक्ष प्रश्न है कि बाढ़ और सूखे से निपटने में राज्य क्या वाकई बाधक हैं? पानी के प्रबंधन का विकेन्द्रित होना अच्छा है या केन्द्रीकरण होना? समवर्ती सूची में आने से पानी पर एकाधिकार, तानाशाही बढ़ेगी या घटेगी? बाजार का रास्ता आसान हो जाएगा या कठिन? वर्तमान संवैधानिक स्थिति के अनुसार जमीन के नीचे का पानी उसका है, जिसकी जमीन है। सतही जल के मामले में अलग-अलग राज्यों में थोड़ी भिन्नता जरूर है, किन्तु सामान्य नियम है कि निजी भूमि पर बनी जल संरचना का मालिक, निजी भूमिधर होता है। आज की संवैधानिक स्थिति में पानी, राज्य का विषय है। केन्द्र सरकार, पानी को लेकर राज्यों को मार्गदर्शन निर्देश जारी कर सकती है और पानी को लेकर केन्द्रीय जलनीति व केन्द्रीय जल कानून बना सकती है, लेकिन उसे पूरी तरह मानने के लिये राज्य सरकारों को बाध्य नहीं कर सकती। राज्य अपनी स्थानीय परिस्थितियों और जरूरतों के मुताबिक बदलाव करने के लिये संवैधानिक रूप से स्वतंत्र हैं।

केन्द्र सरकार द्वारा जल रोकथाम एवं नियंत्रण कानून-1974 की धारा 58 के तहत केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, केन्द्रीय भूजल बोर्ड और केन्द्रीय जल आयोग का गठन किया गया । इसकी धारा 61 केन्द्र को केन्द्रीय भूजल बोर्ड आदि के पुनर्गठन का अधिकार देती है और धारा 63 जल सम्बन्धी ऐसे केन्द्रीय बोर्डो के लिये नियम-कायदे बनाने का अधिकार केन्द्र के पास सुरक्षित करती है।पानी के समवर्ती सूची में आने से बदलाव यह होगा कि केन्द्र, पानी सम्बन्धी जो भी कानून बनाएगा, उन्हें मानना राज्य सरकारों के लिए जरूरी होगा। केन्द्रीय जलनीति हो या जल कानून, वे पूरे देश में एक समान लागू होंगे। पानी के समवर्ती सूची में आने के बाद केन्द्र द्वारा बनाए जल कानून के समक्ष, राज्यों के सम्बन्धित कानून निष्प्रभावी हो जायेगा। ऐसे में विशेषज्ञों का कहना है कि जल को समवर्ती सूची में रखने से जल बंटवारा विवाद में केन्द्र का निर्णय अन्तिम होगा। नदी जोड़ो परियोजना के सम्बन्ध में अपनी आपत्ति को लेकर अड़ जाने से अधिकार समाप्त हो जाएगा। केन्द्र सरकार, नदी जोड़ो परियोजना को बेरोक-टोक पूरा कर सकेगी। जल संरक्षण के बिना जीवन नहीं है इसलिये हिमालय से निकलने वाली विभिन्न प्राकृतिक जल धाराओं व जलस्रोतों का संरक्षण करना अनिवार्य है।  पानी के सवाल पर सरकार और समाज को एक साथ आना होगा। प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण बाबत वैज्ञानिक शोध एवं अनुसंधान हुए हैं । इन्हें समाहित करते हुए मूल निवासियों की जरूरतों के अनुरूप जल-जंगल-ज़मीन के संरक्षण के लिये कार्ययोजना बननी चाहिए। हिमालयी राज्यों में जल संरक्षण के लोक ज्ञान को समाहित करने की  भी जरूरत है।

जल एक अन्तरराष्ट्रीय मुद्दा : सरकारी या गैर सरकारी

वर्ष 2000 में संपन्न संयुक्त राष्ट्र सहस्त्राब्दि शिखर सम्मेलन तथा 2002 में संपन्न सस्टेनेबल डेवेलपमेंट पर विश्व शिखर सम्मेलन में दुनिया में ऐसे लोगों की आनुपातिक संख्या, जिन तक शुद्ध पेयजल तथा स्वास्थ्य रक्षा की पर्याप्त पहुँच नहीं है, सन् 2015 तक आधी करने का लक्ष्य निर्धारित गया। वर्तमान में लगभग 110 करोड़ लोगों के पास पर्याप्त पीने योग्य पानी और तकरीबन 240 करोड़ लोगों के पास पर्याप्त स्वास्थ्य रक्षा की सुविधा उपलब्ध नहीं है। यह कैसे पूर्ण किया जा सकता है इस बात पर प्रचंड बहस हुई है। दुनिया भर की महापालिकाओं और व्यापार, विकास तथा आर्थिक एजेंसियों की दलील है कि यह करिश्मा कर दिखा पाने के आर्थिक साधन जुटा पाने का माद्दा केवल ग़ैर सरकारी या निजी क्षेत्र के पास ही है। आर्थिक वैश्विकरण की प्रक्रिया में यह सामान्य विषय है और विकास के वाशिंगटन मतैक्य मॉडल (वाशिंगटन कंसेन्सस मॉडल आफ डेव्हलेपमेंट) के नाम से जाना जाता है। शीत युद्ध के उत्तर युग में पूँजी, सामग्री और सेवाओं के मुक्त व्यापार पर इसी ज़ोर ने वह दुनिया गढ़ी है जिस में हम रह रहे हैं। विश्व बैंक की संरचनागत समायोजन (स्ट्रक्चरल एडजस्टमेंट) पद्धति द्वारा लागू, अंतर्राष्ट्रीय मॉनीटरी फंड के विकास ॠणों द्वारा तय तथा विश्व व्यापार संघटन (डबल्यू.टी.ओ) के कानूनी ढांचे तले संरक्षित, व्यापार, निवेश तथा आर्थिक व्यवस्था में सरकार द्बारा दी जा रही नियमों में छूट से एक ऐसी पद्धति की स्थापना हो गई है जिसमें कार्पोरेट के हितों की संरक्षा के लिये मानवीय अधिकारों को कुचल दिया जाता है। जनता द्वारा चुनी राष्ट्रीय सरकारों के पास भी कई दफा व्यापार को नियंत्रित करने के अधिकार नहीं होते और सामान्यतः उन्हें अपने प्राकृतिक संसाधनों तथा समाजिक सेवाओं को नीलाम करने पर विवश होना पड़ता है। यह आम लोगों के लिये नुकसान का सबब ही नहीं जनतंत्र का सरसर अपमान है। निजी क्षेत्र ने पानी में निहित व्यापार की संभावनाओं को बहुत पहले ही भांप लिया था। पानी का व्यवसाय दुनिया भर में सबसे तेजी से बढ़ने वाले व्यवसायों में से एक है जिसका अनुमानतः 100 अरब डॉलर का बाजार है। कई देशों में कार्यशील मुट्ठीभर विशाल कार्पोरेशनों को अब यह यह अधिकार और जिमंमेवारी सोंपी जा रही है कि वे वैश्विक शुद्ध जल संकट का हमारे लिये “हल” निकालें। 90 के दशक के उत्तरार्ध में तीन गैर सरकारी संस्थाओं को बनाया गया ताकी पानी पर बड़ी कंपनियों के अजंडे की सार्वजनिक छवि को नर्मी का मुलम्मा चढ़ा कर पेश किया जा सके, ये थे ग्लोबल वॉटर पार्टनरशिप, वर्ल्ड वॉटर काउंसिल तथा वर्ल्ड कमीशन ओन वॉटर। ये तीन समूह वैश्विक जल नीति निर्धारण के केंद्रबिंदु हैं और उनका विश्व बैंक, अंर्तराष्ट्रीय मॉनेटरी फंड और डबल्यू.टी.ओ से नज़दीकी संबंध है और परदे के पीछे कार्पोरेशनों को अपना असर डालने का अवसर देते हैं। इस अनियंत्रित “जल बाजार” से असीमित मुनाफे हैं। निजी क्षेत्र इस बाजार को किसी भी हालत में अपने शिकंजे से जाने नहीं देगा और पानी को “मानवाधिकार” की बजाय “आर्थिक सामग्री” की जगह बनाये रखने के लिये किसी भी हद तक जा सकता है। अभी तक यह अभियान लगभग पूर्ण रूप से निजीकरण और सामग्रीकरण से लड़ने पर ही केन्द्रित रहा है। इस अभियान का यह कार्य अत्यन्त महत्वपूर्ण है, पर इस के साथ साथ पानी की चौकीदारी पर शिक्षा होनी चाहिए और दीर्घकालीन उपायों के बारे में तकनीकी और व्यावहारिक जानकारी होनी चाहिए जिसे विभिन्न समुदाय प्रयोग कर सकें।

निष्कर्ष

यदि लोग और समुदाय, सही सूचना स्रोतों से सशक्‍त हो कर, अपने आस पास के जल की स्थिति सुधारने का दायित्व अपने ऊपर लें, तो बड़ी कंपनियों, विकास संस्थाओं और केन्द्रीकृत सरकारों की मदद के बिना ही बहुत कुछ हासिल हो सकता है। स्थानीय जल संसाधनों से इस निजी सम्बन्ध के रहते, हम भविष्य में भी उन की चिन्ता करने पर मजबूर होंगे और उन का अपवित्रीकरण नहीं होने देंगे। इस भावी संकट का हम केवल सरकार, निजी क्षेत्र, या गैर सरकारी संगठनों द्वारा मुकाबला नहीं कर सकते। फिर भी, अपने क्षतिग्रस्त जलाशयों पर अपना असर कम करने और उन को सुधारने के सरल और कारगर तरीके मूल स्तर पर लागू कर के और जल की सुरक्षा और संचय की संस्कृति के पुनरुदय को बढ़ावा देने से हम जल की कमी के कसाव को काफी कम कर सकते हैं।

प्यासी सुर्ख धरती को अब रवानी चाहिए, बादलो को अब मचल कर बरसना चाहिए,
समय का बोझ ढोती सिसकती नदी ताल है, इस बर्ष बरखा की इनमे रवानी चाहिए




अंजलि दीक्षित (लेखिका कानपुर शहर के एस बी एस लॉ  कालेज की कार्यवाहक प्राचार्या हैं, इनसे anjalidixitlexamicus@gmail.com पर  संपर्क कर सकते हैं. )





Jun 18, 2016

तराई में खीरी जनपद के तालाबों की व्यथा-कथा



अब तराई में भी पानी का संकट, सूख गए ताल तलैया

साल दर साल नीचे खिसकता जा रहा भूगर्भ जलस्तर

इस साल भूजल स्तर में औसतन ५० सेंटीमीटर गिरावट 

अशोक निगम

लखीमपुर खीरी। हमेशा पानी और परिंदों से भरी रहने वाली नगरिया झील सूख कर पशुओं का चरागाह बन गई है। मैनहन गांव के कबुलहा ताल की सूखी तलहटी में दरारें पड़ गई हैं। रमियाबेहड़ की झील में पानी की जगह कीचड़ दिख रहा है। मनरेगा के तहत खोदे गए आदर्श तालाब सूख कर बच्चों का खेल मैदान बन गए हैं। सरकारी रिकार्ड में भले ही जिले में २२२३ वेटलैंड हों लेकिन इस बार तराई की धरती से तरावट गायब है।   
तराई के खीरी जिले में भी पानी का संकट गहराने लगा है। यह तब है जब इस जिले में १८८ नदी नाले हैं। दो हजार से अधिक छोटे बड़े जलाशय हैं। पिछले साल बरसात और सर्दी के मौसम में बरसात न होने के कारण ऐसी स्थिति आई है। इस बार समय से पहले कड़ी धूप और भीषण गर्मी शुरू होने से अप्रैल माह के अंत तक अधिकांश जलाशय सूख गए हैं। कई ब्लाकों में भूगर्भ जलस्तर काफी नीचे खिसक गया है। 
जिले के तालाब पोखर सूख जाने और नदियों का जलस्तर कम हो जाने से पशु पक्षियों के लिए पानी का संकट पैदा हो गया है। भूगर्भ जलस्तर नीचे चले जाने से हैंडपंपों और ट्यूबवेलों की बोरिंग फेल हो रही हैं। फसलों की सिंचाई के लिए किसानों को गहरा गड्ढा खोदकर उसमें इंजन रखना पड़ रहा है। इसके बावजूद इंजन पानी नहीं दे रहे हैं। कई ब्लाकों में तो खतरनाक स्थिति तक भूजल स्तर घट गया है। जिले में भूजल स्तर तीन से चार मीटर नीचे होना चाहिए जबकि यहां जलस्तर सामान्य से काफी नीचे चला गया है जो खतरे का संकेत है।  
इंसेट......
जिले में वेटलैंड की स्थिति 
जिले में कुल वेटलैंड.........................२२२३
जिले में वेटलैंड का क्षेत्रफल................३८११९ हैक्टेयर
प्राकृतिक वेटलैंड..............................४९३
इनमें नदी नालों की संख्या...................१८८
झीलें..............................................१२
छोटे तालाब.....................................१६७३
सीपेज एरिया....................................४३
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इंसेट.....
ब्लाकवार भूगर्भ जलस्तर की मौजूदा स्थिति और मानसून से पहले और बाद में जलस्तर में गिरावट मीटर में 

ब्लाक     मौजूदा   मई २०१५  प्रीमानसून  पोस्ट मानसून
पलिया,    ४.५-५.०   ४.०-४.५   -०.१५       -०.४८
निघासन... ४.५-५.०   ४.०-४.५   +०.४८       -०.१६  
ईसानगर..  ३.०-४.०   २.५-३.०   +०.५३       -०.१
रमियाबेहड़ ५.०-५.५   ४.०-४.५   +०.८५       +०.१२   
धौरहरा....  ५.०-५.५   ४.०-४.५   +०.६७       +०.५८ 
मोहम्मदी   ५.५-६.०    ५.०-५.५  +०.२६       -०.४     
मितौली,    ५.५-६.०    ५.०-५.५  -०.३८      -०.९ 
पसगवां......५.५-६.०    ५.०-५.५  -०.५६      -०.३३
बेहजम,    ५.०-५.५     ४.५-५.०  -०.६५     -१.०५  
बांकेगंज,   ५.०-५.५     ४.५-५.०   +०.२४    -०.२५
लखीमपुर   ५.०-५.५    ४.५-५.०   -०.७      -०.६४ 
फूलबेहड़   ५.०-५.५    ४.५-५.०    +०.०६     +०.५  
कुंभी        ५.०-५.५    ४.५-५.०    +०.०५    -०.९५
बिजुआ.......५.०-४.५    ४.५-५.०    +०.४४    +०.०१
नकहा........४.५-४.५     ४.०-४.५    +०.४२    -०.१५
(-) जलस्तर में वृद्धि  (+) जलस्तर में कमी
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अप्रैल माह से खीरी जिले के भूजल स्तर में काफी गिरावट दर्ज की है। भूगर्भ जल के अंधाधुंध दोहन और जल सरंक्षण के प्रयास न होने से स्थिति बिगड़ रही है। 
रविकांत सिंह, अधिशासी अभियंता, भूजल
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ग्लोबल वार्मिंग, भूगर्भ जल के दोहन से तराई के इस जिले में भी पानी का संकट शुरू हो गया है। भूगर्भ जलस्तर के लगातार नीचे खिसकने से यह संकट और भी ज्यादा गहरा सकता है। भूजल सरंक्षण के प्रयास से इस संकट को टाला जा सकता है। 
डॉ. अनिल सिंह, पर्यावरणविद्
समन्वयक जिला विज्ञान क्लब लखीमपुर खीरी। 

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अशोक निगम (वरिष्ठ पत्रकार, हिन्दुस्तान लखनऊ एडिशन के जिला खीरी के ब्यूरो प्रमुख रह चुके हैं, इंटैक संस्था के लखीमपुर खीरी के सह-समन्यवक, मौजूदा वक्त में अमर उजाला बरेली से जुड़े हुए हैं. इनसे ashoknigamau@gmail.com संपर्क कर सकते हैं.)

संकट में सुहेली जो सरयू की सहायक नदी है


दुधवा के जंगलों से गुजरती यह नदी जो अब सूख चुकी है 

इस नदी में राष्ट्रीय नदी पशु गैंगेटिक डॉल्फिन का है निवास 

पलियाकलां-दुधवा नेशनल पार्क। जिम्मेदारों के गैर जिम्मेदाराना रवैए के चलते दुधवा नेशनल पार्क की लाइफ लाइन कही जाने वाली सुहेली नदी अब अपना वजूद खो चुकी है। सिल्ट सफाई न होने से सुहेली पुल से पर्वतिया घाट तक करीब दस किलोमीटर में नदी ने रेत का टीला बना दिया है और रुख मोड़ कर नकउवा नाले को चली गई है। इससे नेशनल पार्क के जीवों को करीब 50 प्रतिशत पानी की पूर्ति नहीं हो पा रही है तो वहीं उसके नकउवा की ओर रुख कर लेने से कई गांवों के खेतीहर इलाके बंजर होने की कगार पर आ गए हैं वह यहां भयानक सिल्ट फेंक रही है।सैकड़ों सालों से बह रही सुहेली नदी को दुधवा की लाइफ लाइन कहा जाता है। बात लाजिमी भी है क्यों कि नदी पूरी तरह से इस नेशनल पार्क को छूती हुई गुजरती है और इसका पानी दुधवा जंगल के करीब 50 प्रतिशत जीव पीते थे। लेकिन अब वह हालात नहीं रहे। पलिया दुधवा मार्ग पर बने पुल से करीब पांच किलोमीटर पहले नदी ने मुख्य धारा में सिल्टिंग शुरू कर उसे पाट दिया और एक मोड़ लेकर नकउवा नाले में जा पहुंची। नाले का इतना बड़ा स्वरूप नहीं है कि वह अपने ऊपर से एक नदी को गुजार सके। आलम यह हुआ कि नदी ने अपनी जगह बनाते हुए कई गांवों के खेतीहर इलाके को अपनी बालू से पाटना शुरू कर दिया है। इससे हजारो एकड़ कृषि भूमि बंजर होने के कागार पर आ खड़ी हुई है। जहां किसान इससे भूमि हीन हो रहे हैं वहीं एक नेशनल पार्क के जीवों की प्यास पर भी ग्रहण लग गया है। सुहेली ने यह सब कुछ अचानक नहीं किया है बल्कि सालों से वह यह कर रही थी लेकिन जिम्मेदार खामोश रहे और कुछ भी नहीं किया। बताना लाजिमी होगा कि इसके लिए सालों पहले बजट भी मिला था लेकिन कागजों पर काम कर जिम्मेदारों ने राम राम कर ली। एक नेशलन पार्क जहां न जाने कितने ही दुलर्भ जीवों के संरक्षण को करोड़ो रुपया बहाया जा रहा हो वहां वह प्यास से व्याकुल हों यह देश और प्रदेश की सरकारों के लिए काबिले गौर विषय है।



नदी के समीपवर्ती पार्क के इलाकों से बाहर भाग रहे दुलर्भ जीव सकंट
नदी में जितने इलाके में पानी नहीं है वहां के समीपवर्ती जंगल में रहने वाले जीव पानी की तलाश में बाहर आते हैं और फिर बाहर ही रह जाते हैं। उनका यहां रहना वन्यजीव मानव संघर्ष को बढ़ा रहा है। बाघों के हमले भी हो चुके हैं तो उन पर भी खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। चीतलए पाढ़े आदि तो बाहर आना आम बात हो चुकी है।



शर्मशार कर रहे शासन और प्रशासन को किसानों के हौसले
गुहार लगाते लगाते थके तो करने लगे नदी की सफाई के लिए आपस में चंदा
. सात लाख रुपए किए इक्ठठाए लेकिन इतने में तो नहीं हो पाएगा काम

पलियाकलां। सुहेली नदी को लेकर चुप्पी साधे शासन और प्रशासन को अब किसानों के हौसले शर्मशार कर रहे हैं। नदी की सफाई व उसके रुख को मोड़कर अपने खेतों और नदी को उसके स्वरूप में लाने के लिए गुहारे कर थक चुके किसान अब खुद आपस में चंदा कर रहे हैं। उन्होंने करीब सात लाख रुपए जोड़े भी हैं लेकिन इतनी सी रकम में यह काम होता नहीं दिखाई दे रहा है। फिर भी वह हिम्मत नहीं हार रहे हैं और बरसात से पहले काम शुरू करने की तैयारियों में जुटे हुए हैं। सुहेली नदी के मिटते वजूद को बचाकर उनके खेतों को भी बचाने की गुहारें किसानों ने एक बार नहीं लगाई है बल्कि दर्जनों बार वह कई सालों से यह गुहार लगा रहे हैं लेकिन न तो शासन ही सुन रहा है और न ही प्रशासन। दोनों की तंगदिली को देख अब बेचारों ने खुद ही आपस में चंदा करना शुरू कर दिया है। उन्होंने अब तक करीब सात लाख रुपए जोड़ भी लिए हैं लेकिन इतने में काम पूरा होता नहीं दिखाई दे रहा है। फिर भी वह सब हिम्मत नहीं हार रहे हैं उनकी मानें तो काम शुरू करना जरुरी है और आगे कमी को आगे देखा जाएगा। उनका कहना है कि किसी काम को हिम्मत के साथ शुरूआत दी जाए तो फिर भगवान भी उसे पूरा करा देता है। सलाम है ऐसे किसानो को जो शासन और प्रशासन के बराबार काम करने का हौसला तो कर रहे हैं। वहीं एक ओर यह हौसला शासनए प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के लिए आइना भी है जो वोट की दरकार में आते हैं और फिर नदारद हो जाते हैं।

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नदी की सिल्ट सफाई के लिए करीब चार पांच साल पहले ऐरीगेशन डिपार्टमेंट को एक प्रस्ताव भेजा गया था लेकिन किन्ही कारणों वश यह नहीं हो पाया।स्थानीय लोगों यहां खुद कार्य शुरू करना चाहते हैं तो प्रशांसनीय है और जंगल में कार्य करने की परमीशन प्रक्रिया की जा रही है। दुधवा में जीवों को पानी की कमी न होने इसके लिए बेहतर व्यवस्थाएं की गईं हैं लेकिन नदी तो नदी ही है।

               महावीर कौजलगि

डिप्टी डायरेक्टर दुधवा नेशनल पार्क
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शासन प्रशासन जब सुन ही नहीं रहा और जनप्रतिनिधि भी चुप्पी साधे बैठ गए । तब यह खुद रुपया एकत्र कर उससे कार्य कराने का सभी ने फैसला लिया और करीब सात लाख रुपए जोड़े गए हैं लेकिन यह काफी नहीं है फिर भी हिम्मत नहीं
हारेंगे। मामला किसानों के भूमिहीन होने और जंगल के जीवों की प्यास का है हर कोशिश की जाएगी की कोई किसान बर्बाद न हो और जंगल के जीव प्यासे न रहें। नहीं सरकार तो जनप्रतिनिधि अपनी निधि से यह कार्य करा सकते थे।

   विकास कपूर विक्की

चेयरमैन केन सोसाएटी पलिया





महबूब आलम (पलिया- खीरी से एक सम्मानित पत्र में पत्रकारिता, वन्य जीवन पर विशेष लेखन, इनसे m.alamreporter@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.)

Jun 17, 2016

अकाल अच्छे कामों का भी



चतरसिंह जाम
टेलिविज़न कहां नहीं है ? हमारे यहां भी है। हमारे यहां यानी जैसलमेर से कोई सौ किलोमीटर पश्चिम में पाकिस्तान की सीमा पर भी। यह भी बता दें कि हमारे यहां देश का सबसे कम पानी गिरता है। कभी-कभी तो गिरता ही नहीं। आबादी कम जरूर है, पर पानी तो कम लोगों को भी जरूरत के मुताबिक चाहिए। फिर यहां खेती कम, पशुपालन ज्यादा है। लाखों भेड़, बकरी, गाय और ऊंटों के लिए भी पानी चाहिए।

इस टेलिविज़न के कारण हम पिछले न जाने कितने दिनों से देष के कुछ राज्यों में फैल रहे अकाल की भयानक खबरें देख रहे हैं। अब पिछले दिनों इसमें क्रिकेट का भी नया विवाद जुड़ गया है और आज या कल में विवेकवान न्यायाधीष कोई न कोई अच्छा फैसला भी सुना देंगे।

आपके यहां कितना पानी गिरता है, आप ही जानें। हमारे यहां पिछले दो साल में कुल हुई बरसात की जानकारी हम आप तक पहुंचाना चाहते हैं। सन् 2014 में जुलाई में 4 एम.एम. और फिर अगस्त में 7 एम.एम. यानी कुल 11 एम.एम. पानी गिरा था। तब भी हमारा यह रामगढ़ क्षेत्र अकाल की खबरों में नहीं आया। हमने खबरों में आने की नौबत ही नहीं आने दी। फिर पिछले साल सन् 2015 में 23 जुलाई को 35 एम.एम., 11 अगस्त को 7 एम.एम. और फिर 21 सितंबर को 6 एम.एम. बरसात हुई। इतनी कम बरसात में भी हमने हमारे पांच सौ बरस पुराने विप्रासर नाम के तालाब को भर लिया था।

यह बहुत विशेष तालाब है। लाखों वर्षों पहले प्रकृति में हुई भारी उथल-पुथल के कारण इस तालाब के नीचे खड़िया मिट्टी की, मेट की या जिप्सम की एक तह जम गई थी। इस पट्टी के कारण वर्षा जल रिस कर रेगिस्तान में नीचे बह रहे खारे पानी में मिल नहीं पाता। वह रेत में नमी की तरह सुरक्षित रहता है। इस नमी को हम रेजवानी पानी कहते हैं।

तालाब में ऊपर भरा पानी कुछ माह तो गांव के काम आता है। इसे हम पालर पानी कहते हैं। उस पूरे विज्ञान में अभी नहीं जाएंगे पर तालाब ऊपर से सूख जाने के बाद रेत में समा गई इस नमी को हमारे पुरखे न जाने कब से बेरी, कुंई नाम का एक सुंदर ढांचा बना कर उपयोग में ले आते हैं। अब अप्रेल के तीसरे हफ्ते में भी हमारे तालाब में ऊपर पानी भरा है। जब यह सूखेगा तब रेजवानी पानी इसकी बेरियों में आ जाएगा और हम अगली बरसात तक पानी के मामले में एकदम स्वावलंबी बने रहेंगे।

इस विषेष तालाब विप्रासर की तरह ही हमारे जैसलमेर क्षेत्र में कुछ विषेष खेत भी हैं। यों तो अकाल का ही क्षेत्र है यह सारा। पानी गिरे तो एक फसल हाथ लगती है। पर कहीं-कहीं खड़िया या जिप्सम की पट्टी खेतों में भी मिलती है। समाज ने सदियों से इन विषेष खेतों को निजी या किसी एक परिवार के हाथ में नहीं जाने दिया। इन विशेष खेतों को समाज ने सबका बना दिया। जो बातें आप लोग शायद नारों में सुनते हैं, वे बातें, सिद्धांत हमारे यहां जमीन पर उतार दिए गए हंै हमारे समझदार पुरखों द्वारा। इन विशेष खेतों में आज के इस गलाकाट जमाने में भी सामूहिक खेती होती है। इन विषेष खेतों में अकाल के बीच भी सुंदर फसल पैदा की जाती है।
पिछले साल के कुल गिरे पानी के आंकड़े तो आपने ऊपर देखे ही हैं। अब उनको सामने रख कर इस विषाल देष के किसी भी कृषि विषेषज्ञ से पूछ लें कि दो-चार सेंटीमीटर की बरसात में क्या गेहूं, सरसों, तारामीरा, चना जैसी फसलें पैदा हो सकती हैं। उन सभी विशेषज्ञों का पक्का उत्तर ‘ना’ में होगा। पर अभी आप रामगढ़ आएं तो हमारे यहां के खड़ीनों में ये सब फसलें इतने कम पानी में खूब अच्छे-से पैदा हुई हैं और अब यह फसल सब सदस्यों के खलियानों में रखी जा रही है। तो धुत्त रेगिस्तान में, सबसे कम वर्षा के क्षेत्र में आज भी भरपूर पानी है, अनाज है और पशुओं के लिए खूब मात्रा में चारा है। यह बताते हुए भी बहुत संकोच हो रहा है कि इतने कम पानी के बीच पैदा की गई यह फसल न सिर्फ हमारे काम आ रही है, बल्कि दूर-दूर से इसे काटने के लिए दूसरे लोग भी आ जुटे हैं। इनमें बिहार, पंजाब, मध्यप्रदेश के मालवा से भी लोग पहली बार आए हैं- यानी जहां हमसे बहुत ज्यादा वर्षा होती है, वहां के लोगों को भी यहां काम मिला है।

इसके बीच मराठवाड़ा, लातूर की खबरें टी.वी. पर देख मन बहुत दुखी होता है। कलेक्टर ने धारा 144 लगाई है जल स्रोतों पर। पानी को लेकर झगड़ते हैं लोग। और यहां हमारे गांवों में इतनी कम मात्रा में वर्षा होने के बाद भी पानी को लेकर समाज में परस्पर प्रेम का रिश्ता बना हुआ है। आपने भोजन में मनुहार सुना है, आपके यहां भी मेहमान आ जाए तो उसे विशेष आग्रह से भोजन परोसा जाता है। हमारे यहां तालाब, कुंए और कुंई पर आज भी पानी निकालने को लेकर ‘मनुहार’ चलती है- पहले आप पानी लें, पीछे हम लेंगे। पानी ने सामाजिक संबंध जोड़ कर रखे हैं हमारे यहां। इसलिए जब पानी के कारण सामाजिक संबंध टूटते दिखते हैं देष के अन्य भागों में तो हमें बहुत ही बुरा लगता है।

इसके पीछे एक बड़ा कारण तो है अपनी चादर देख पैर तानना। मराठवाड़ा ने कुदरत से पानी थोड़ा कम पाया पर गन्ने की खेती अपना कर भूजल का बहुत सारा दोहन कर लिया। अब एक ही कुंए में तल पर चिपका पानी और उसमें सैकड़ों बाल्टियां ऊपर से लटकी मिलती हैं। ऐसी आपाधापी में पड़ गया है वह इलाका।
कभी पूरे देश में पानी को लेकर समाज के मन में एक-सा भाव रहा था। आज नई खेती, नई-नई प्यास वाली फसलें, कारखानों, तालाबों को पूर कर बने और बढ़ते जा रहे षहरों में वह संयम का भाव कब का खत्म हो चुका है। तभी हमें या तो चेन्नै जैसी भयानक बाढ़ दिखती है या लातूर जैसा भयानक अकाल। चेन्नै का हवाई अड्डा डूब जाता है बाढ़ में और लातूर में रेल से पानी बहकर आता है।

पानी कहां कितना बरसता है, यह प्रकृति ने हजारों सालों से तय कर रखा है। कोंकण में, चेरापूंजी में खूब ज्यादा तो हमारे गांवों में, जैसलमेर में खूब ही कम। पर जो जहां है, वहां प्रकृति का स्वभाव देख कर उसने यदि समाज चलाने की योजना बनाई है और फिर उसमें उसने सरकारों की बातें सुनी नहीं है, लालच नहीं किया है तो वह समाज पानी कम हो या ज्यादा, रमा रहता है। यह रमना हमने छोड़ा नहीं है। कुछ गांवों में हमारे यहां भी वातावरण बिगड़ा था पर अब पिछले 10-15 वर्षों से फिर सुधरने भी लगा है। इस दौर में हमारे समाज ने कोई 200 नई बेरियां, 100 नए खड़ीन, 5 कुएं पाताली मीठे पानी के, कोई 200-150 तलाई, नाड़ियां, टोपे अपनी हिम्मत से, अपने साधनों से बनाए हैं। इन पर सरकारी या किसी स्वयंसेवी संस्था का नाम, बोर्ड, पटरा टंगा नहीं मिलेगा। ये हम लोगों ने अपने लिए बनाए हैं। इसलिए ये सब पानी से लबालब भरे हैं।

देष में कोई भी इलाका ऐसा नहीं है, जहां जैसलमेर से कम पानी गिरता हो। इसलिए वहां पानी का कष्ट देख हमें बहुत कष्ट होता है। हमारा कष्ट तभी कम होगा जब हम अपना इलाका ठीक कर लेने के साथ-साथ देश के इन इलाकों में भी ऐसी बातें, ऐसे काम पहुंचा सकें।

हमारे एक मित्र कहते हैं कि अकाल अकेले नहीं आता। उससे पहले अच्छे कामों का, अच्छे विचारों का भी अकाल आता है।

लेखक- चतरसिंह जामए पोस्ट रामगढ़, जिला जैसलमेर (राजस्थान) 09672140359
फेसबुक प्रोफ़ाइल- https://www.facebook.com/chatar.jam

अकेले नहीं आता अकाल




अकाल की पदचाप साफ सुनाई दे रही है। सारा देश चिंतित है। यह सच है कि अकाल कोई पहली बार नहीं आ रहा है, लेकिन इस अकाल में ऐसा कुछ होने वाला है, जो पहले कभी नहीं हुआ। देश में सबसे सस्ती कारों का वादा पूरा किया जा चुका है। कार के साथ ऐसे अन्य यंत्रा-उपकरणों के दाम भी घटे हैं, जो 10 साल पहले बहुत सारे लोगों की पहुंच से दूर होते थे। इस दौर में सबसे सस्ती कारों के साथ सबसे महंगी दाल भी मिलने वाली है- यही इस अकाल की सबसे भयावह तस्वीर होगी। यह बात औद्योगिक विकास के विरुद्ध नहीं कही जा रही है। लेकिन इस महादेश के बारे में जो लोग सोच रहे हैं, उन्हें इसकी खेती, इसके पानी, अकाल, बाढ़ सबके बारे में सोचना होगा।

हमारे यहां एक कहावत है, ‘आग लगने पर कुआं खोदना’। कई बार आग लगी होगी और कई बार कुएं खोदे गए होंगे, तब अनुभवों की मथानी से मथकर ही ऐसी कहावतें मक्खन की तरह ऊपर आई होंगी। लेकिन कहावतों को लोग या नेतृत्व जल्दी भूल जाते हैं। मानसून अपने रहे-सहे बादल समेटकर लौट चुका है। यह साफ हो चुका है कि गुजरात जैसे अपवाद को छोड़ दें तो इस बार पूरे देश में औसत से बहुत कम पानी गिरा है।

अकाल की आग लग चुकी है और अब कुआं खोदने की तैयारी चल रही है। लेकिन देश के नेतृत्व का-सत्तारूढ़ और विपक्ष का भी पूरा ध्यान, लगता नहीं कि कुआं खोदने की तरफ है। अपने-अपने घर-परिवार के चार-चार आना कीमत के झगड़ों में शीर्ष नेतृत्व जिस ढंग से उलझा पड़ा है, उसे देख उन सबको बड़ी शर्म आती होगी, जिन्होंने अभी कुछ ही महीने पहले इनके या उनके पक्ष में मत डाला था। केन्द्र की पार्टियों में चार आने के झगड़े हैं, पतंगें कट रही हैं, मांजा लपटा जा रहा है तो उधर राज्यों की पार्टियों में भी दो आने के झगड़े-टंटे चल रहे हैं। अकाल के कारण हो रही आत्महत्याओं की खबरें यहां राजा के बेटे को राजा बना देने की खबरों से ढंक गई हैं। कहीं अकाल के बीच लग रही पत्थर की मूर्तियां हमारे नेतृत्व का पत्थर-दिल बता रही हैं। 

कई बातें बार-बार कहनी पड़ती हैं। इन्हीं में एक बात यह भी है कि अकाल कभी अकेले नहीं आता। उससे बहुत पहले अच्छे विचारों का अकाल पड़ने लगता है। अच्छे विचार का अर्थ है, अच्छी योजनाएं, अच्छे काम। अच्छी योजनाओं का अकाल और बुरी योजनाओं की बाढ़। पिछले दौर में ऐसा ही कुछ हुआ है। देश को स्वर्ग बना देने की तमन्ना में तमाम नेताओं ने स्पेशल इकोनाॅमिक जोन, सिंगूर, नंदीग्राम और ऐसी ही न जाने कितनी बड़ी-बड़ी योजनाओं पर पूरा ध्यान दिया। इस बीच यह भी सुना गया कि इतने सारे लोगों द्वारा खेती करना जरूरी नहीं है। एक जिम्मेदार नेता की तरफ से यह भी बयान आया कि भारत को गांवों का देश कहना जरूरी नहीं है। गांवों में रहने वाले शहरों में आकर रहने लगेंगे, तो हम उन्हें बेहतर चिकित्सा, बेहतर शिक्षा और बेहतर जीवन के लिए तमाम सुविधाएं आसानी से दे सकेंगे। इन्हें लगता होगा कि शहरों में रहने वाले सभी लोगों को ये सभी सुविधाएं मिल ही चुकी हैं। इसका उत्तर तो शहर वाले ही देंगे।

लेकिन इस बात को यहीं छोड़ दीजिए। अब हमारे सामने मुख्य चुनौती है खरीफ की फसल को बचाना और आने वाली रबी की फसल की ठीक-ठीक तैयारी। दुर्भाग्य से इसका कोई बना-बनाया ढांचा सरकार के हाथ फिलहाल नहीं दिखता। देश के बहुत बड़े हिस्से में कुछ साल पहले तक किसानों को इस बात की खूब समझ थी कि मानसून के आसार अच्छे न दिखें तो पानी की कम मांग करने वाली फसलें बो ली जाएं। इस तरह के बीज पीढ़ियों से सुरक्षित रखे गए थे। कम प्यास वाली फसलें अकाल का दौर पार कर जाती थी । 

पिछले दिनों कृषि वैज्ञानिकों
और मंत्रालय से जुड़े
अधिकारियों व नेताओं ने इस
बात पर जोर दिया है कि कृषि
अनुसंधान संस्थाओं में, कृषि
विश्वविद्यालयों में अब कम
पानी की मांग करने वाली
फसलों पर शोध होना चाहिए।
उन्हें इतनी जानकारी तो होनी
चाहिए थी कि ऐसे बीज समाज
के पास बराबर रहे हैं। समाज
ने इस फसलों पर, बीजों पर
बहुत पहले से काम किया था।

 लेकिन आधुनिक विकास के दौर ने, नई नीतियों ने किसान के इस स्वावलंबन को अनजाने में ही सही, पर तोड़ा जरूर है। लगभग हर क्षेत्रा में धान, गेहूं, ज्वार, बाजरा के हर खेत में पानी को देखकर बीज बोने की पूरी
तैयारी रहती थी। अकाल के अलावा बाढ़ तक को देखकर बीजों का चयन किया जाता था। पर 30-40 साल के आधुनिक कृषि विकास ने इस बारीक समझ को आमतौर पर तोड़ डाला है। पीढ़ियों से एक जगह रहकर वहां की मिट्टी, पानी, हवा, बीज, खाद- सब कुछ जानने वाला किसान अब छह-आठ महीनों में ट्रांसफर होकर आने-जाने वाले कृषि अधिकारी की सलाह पर निर्भर बना डाला गया है। किसानों के सामने एक दूसरी मजबूरी उन्हें सिंचाई के अपने साधनों से काट देने की भी है। पहले जितना पानी मुहैया होता था, उसके अनुकूल फसल ली जाती थी। अब नई योजनाओं का आग्रह रहता है कि राजस्थान में भी गेहूं, धान, गन्ना, मूंगफली जैसी फसलें पैदा होनी चाहिए। कम पानी के इलाके में ज्यादा पानी मांगने वाली फसलों को बोने का रिवाज बढ़ता ही जा रहा है। इनमें बहुत पानी लगता है। सरकार को लगता है कि बहुत पानी देने को ही तो हम बैठे हैं। ऐसे इलाकों में अरबों रुपयों की लागत से इंदिरा नहर, नर्मदा नहर जैसी योजनाओं के जरिए सैकड़ों किलोमीटर दूर का पानी सूखे बताए गए इलाके में लाकर पटक दिया गया है। लेकिन यह आपूर्ति लंबे समय तक के लिए निर्बाध नहीं चल पाएगी। इस साल, हर जगह जितना कम पानी बरसा है, उतने में हमारे स्वनामधन्य बांध भी पूरे नहीं भरे हैं। और अब उनसे निकलने वाली नहरों में सब खेतों तक पहुंचाने वाला पानी नहीं बहने वाला है। कृषि मंत्राी ने यह
भी घोषणा की है कि किसानों को भूजल का इस्तेमाल कर फसल बचाने के लिए 10 हजार करोड़ रुपए की डीजल सब्सिडी दी जाएगी। यह योजना एक तो ईमानदारी से लागू नहीं हो पाएगी और अगर ईमानदारी से लागू हो भी गई तो अगले अकाल के समय दोहरी मार पड़ सकती है- मानसून का पानी नहीं मिला है और जमीन के नीचे का पानी भी फसल को बचाने के मोह में खींचकर खत्म कर दिया जाएगा। तब तो अगले बरसों में आने वाले अकाल और भी भयंकर होंगे।

एक जिम्मेदार नेता की
तरफ से यह भी बयान आया
कि ”भारत को गांवों का
देश कहना जरूरी नहीं है।
गांवों में रहने वाले शहरों में
आकर रहने लगेंगे, तो हम उन्हें
बेहतर चिकित्सा, बेहतर शिक्षा
और बेहतर जीवन के लिए
तमाम सुविधाएं आसानी से दे
सकेंगे।“ इन्हें लगता होगा
कि शहरों में रहने वाले सभी
लोगों को ये सभी सुविधाएं
मिल ही चुकी हैं। इसका उत्तर
तो शहर वाले ही देंगे।


इस समय सरकारों को अपने-अपने क्षेत्रों में ऐसे इलाके खोजने चाहिए, जहां कम पानी गिरने के बाद भी अकाल की उतनी काली छाया नहीं दिखती, बाकी क्षेत्रों में जैसा अंदेशा है। पूरे देश के बारे में बताना तो कठिन है पर राजस्थान में अलवर ऐसा इलाका है, जहां साल में 25-26 इंच पानी गिरता है। इस बार तो उसका आधा ही गिरा है। फिर भी वहां के एक बड़े हिस्से में पिछले कुछ साल में हुए काम की बदौलत अकाल की छाया उतनी बुरी नहीं है। कुछ हिस्सों में तो अकाल को सुंदर भर चुके तालाबों की पाल पर बिठा दिया गया है! जयपुर और नागौर में भी ऐसी मिसालें हैं। जयपुर के ग्रामीण इलाकों में भी बड़ी आसानी से ऐसे गांव मिल जाएंगे, जहां कहा जा सकता है कि अकाल की परिस्थितियों के बावजूद फसल और पीने के लिए पानी सुरक्षित रखा गया है। जैसलमेर और रामगढ़ जैसे और भी सूखे इलाकों की ओर चलें, जहां चार इंच से भी कम पानी गिरा होगा और अब आगे गिरने वाला नहीं है। लेकिन वहां भी कुछ गांव लोगों की 10-20 साल की तपस्या के बूते पर आज इतना कह सकते हैं कि हमारे यहां पीने के पानी की कमी नहीं है। उधर महाराष्ट्र के भंडारा में तो उत्तराखंड के पौड़ी जिले में भी कुछ हिस्से ऐसे मिल जाएंगे। हरेक राज्य में ऐसी मिसालें खोजनी चाहिए और उनसे अकाल के लिए सबक लेने चाहिए। सरकारों के पास बुरे कामों को खोजने का एक खुफिया विभाग है ही। नेतृत्व को अकाल के बीच भी इन अच्छे कामों की सुगंध न आए तो वे इनकी खोज में अपने खुफिया विभागों को भी लगा ही सकते हैं!

कृषि मंत्री ने  यह भी
घोषणा की है कि किसानों को
भूजल का इस्तेमाल कर फसल
बचाने के लिए 10 हजार करोड़
रुपए की डीजल सब्सिडी दी
जाएगी। यह योजना एक तो
ईमानदारी से लागू नहीं हो
पाएगी और अगर ईमानदारी से
लागू हो भी गई तो अगले
अकाल के समय दोहरी मार
पड़ सकती है- मानसून का
पानी नहीं मिला है और जमीन
के नीचे का पानी भी फसल
को बचाने के मोह में खींचकर
खत्म कर दिया जाएगा। तब
तो अगले बरसों में आने वाले
अकाल और भी भयंकर होंगे।


पिछले दिनों कृषि वैज्ञानिकों और मंत्रालय से जुड़े अधिकारियों व नेताओं ने इस बात पर जोर दिया है कि कृषि अनुसंधान संस्थाओं में, कृषि विश्वविद्यालयों में अब कम पानी की मांग करने वाली फसलों पर शोध होना चाहिए। उन्हें इतनी जानकारी तो होनी चाहिए थी कि ऐसे बीज समाज के पास बराबर रहे हैं। समाज ने इन फसलों पर, बीजों पर बहुत पहले से काम किया था। उनके लिए आधुनिक सिंचाई की जरूरत ही नहीं है। इन्हें बारानी खेती के इलाके कहा जाता है। 20-30 सालों में बारानी खेती के इलाकों को आधुनिक कृषि की दासी बनाने की कोशिशें हुई हैं। ऐसे क्षेत्रों को पिछड़ा बताया गया, ऐसे बीजों को और उन्हें बोने वालों को पिछड़ा बताया गया। उन्हें पंजाब-हरियाणा जैसी आधुनिक खेती करके दिखाने के लिए कहा जाता रहा है। आज हम बहुत दुख के साथ देख रहे हैं कि अकाल का संकट पंजाब-हरियाणा पर भी छा रहा है। एक समय था जब बारानी इलाके देश का सबसे स्वादिष्ट अन्न पैदा करते थे। दिल्ली-मुंबई के बाजारों में आज भी सबसे महंगा गेहूं मध्यप्रदेश के बारानी खेती वाले इलाकों से आता है। अब तो चेतें। बारानी की इज्जत बढ़ाएं। 

इसलिए, इस बार जब अकाल आया है तो हम सब मिलकर सीखें कि अकाल अकेले नहीं आता है। अगली बार जब अकाल पड़े तो उससे पहले अच्छी योजनाओं का अकाल न आने दें। उन इलाकों, लोगों और परंपराओं से कुछ सीखें जो इस अकाल के बीच में भी सुजलाम्, सुफलाम् बने हुए थे।



अनुपम मिश्र ( प्रख्यात लेखक, पर्यावरणविद, जर्नलिस्ट, जल सरंक्षण के लिए भारतीय पारम्परिक पद्धतियों का  महान अध्ययन व् प्रसार, गांधी शान्ति प्रतिष्ठान नई दिल्ली से जुड़े हुए हैं, इनसे anupam.mishra47@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं। 








नोट- यह लेख सर्वप्रथम गांधीमार्ग 2004 के एक अंक में प्रकाशित हुआ था और आज भी उतना ही प्रासंगिक है।

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