International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Save Tiger

DON'T LET WILD TIGERS DISAPPEAR

Lady Rosetta

Potatoes with low sugar content and longer shelf life.

अबूझमाड़ के जंगल

जहां बाघ नही नक्सली राज करते हैं

खवासा का आदमखोर

जहां कांपती थी रूह उस नरभक्षी से

जानवर भी करते हैं योग

योगाचार्य धीरज वशिष्ठ का विशेष लेख

Mar 31, 2016

गौरैया तुझे जब देखता हूँ अपने आँगन में, तो उसके घर में तेरा वो नशेमन याद आता है...

चलो चले उस चिड़िया को हंसाया जाए...


सम्पादक की कलम से...

कुछ बेतरतीब शेर जो उस चिड़िया से बावस्ता हैं, यह अलाहिदा शेर जो नज़्म न बन सके, विश्व गौरैया दिवस २०१६ के उपलक्ष्य में उस चिड़िया को समर्पित हैं जिसकी चहक मन को मोह लेती है हमेशा, चलिए हम सब अपने घरों के आसपास हरियाली और इस चिड़िया के लिए भोजन और पानी के व्यवस्था के प्रयत्न शुरूं करें ताकि जल्द ही रंग बिरंगी चिड़ियाँ और उनकी सुन्दर आवाज हमारी आँखों और कानों को प्रकृति का रूहानी एहसास कराएं...कृष्ण  


गौरैया तुझे जब देखता हूँ अपने आँगन में
तो उसके घर में तेरा वो नशेमन याद आता है.
*

उसने दिखाया था तेरा वो घोसला जो उसके उस मकान में था
तू मेरे घर को मुस्तकिल नशेमन बना ले तो मुझको तसल्ली हो.
*

गौरैया तुम रेत में घरौंदे क्यों बनाती हों जो बिखरते है हल्की बयार से.
चलो आओ माटी के घर अब भी तुम्हारा इंतज़ार करते है.
*

उस चिड़िया की चहचहाहट सुने हुए मुद्दतें गुज़र गई.
दूर से आती हुई उसकी सिसकियाँ मुझे अब सोने नहीं देती.
*

चलो चले उस चिड़िया को हंसाया जाए
सूने से चमन को गुलिस्तान बनाया जाए.


कृष्ण कुमार मिश्र 
krishna.manhan@gmail.com 


Mar 30, 2016

थर्मल पावर प्लांट्स की वजह से भारत में गंभीर जल संकटः ग्रीनपीस


जल क्षेत्रों में प्रस्तावित 170 गिगावाट कोयला प्लांट्स से बढ़ सकती है किसानों की जल समस्या

नई दिल्ली। 22 मार्च 2016। यदि सैकड़ों कोयला पावर प्लांट्स की योजना को हरी झंडी मिल जाती है तो भारत में पहले से ही घटते जल संसाधनों पर गंभीर संकट उत्पन्न हो जाएगा। इस योजना की वजह से सूखे की स्थिति पैदा हो सकती है और विदर्भ, मराठवाड़ा तथा उत्तरी कर्नाटक में पहले से ही पानी को लेकर कृषि और उद्योग के बीच चल रहे संघर्ष बढ़ने की आंशका है। देश में अभी 10 राज्यों ने सूखा घोषित कर रखा है और महाराष्ट्र व कर्नाटक में पानी की कमी की वजह से कुछ पावर प्लांट्स को बंद भी कर दिया गया है।

ग्रीनपीस इंटरनेशनल द्वारा जारी रिपोर्ट  ‘द ग्रेट वाटर ग्रैवः हाउ द कोल इंडस्ट्री इड डिपेनिंग द ग्लोबल वाटर क्राइसिस’ से पता चलता है कि वैश्विक स्तर पर प्रस्तावित नये कोयला प्लांट्स का एक चौथाई हिस्सा उन क्षेत्रों में स्थापित करने की योजना है जहां पहले से ही पानी का संकट है।(रेड-लिस्ट एरिया) चीन इस लिस्ट में 237 गिगावाट के साथ सबसे उपर है जबकि दूसरे नंबर पर भारत है जहां 52 गिगावाट थर्मल पावर प्लांट्स रेड-लिस्ट क्षेत्र में है और 122 गिगावाट गंभीर जल क्षेत्र में प्रस्तावित है। कुल मिलाकर लगभग 40 प्रतिशत कोयला प्लांट्स गंभीर जल क्षेत्र में लगाए जाने की योजना है। यदि सभी प्रस्तावित कोयला प्लांट्स का निर्माण हो जाता है तो भारत के कोयला उद्योग में पानी की खपत वर्तमान से दोगुनी, लगभग 15.33 दस लाख एम 3 प्रतिवर्ष हो जायेगी, जो चीन सहित दूसरे सभी देशों से सबसे अधिक होगा।

यह पहली रिपोर्ट है जिसमें पहली बार वैश्विक स्तर पर अध्ययन करके बताया गया है कि जिसमें प्रत्येक संयंत्रों का अध्य्यन करके कोयला उद्योग के वर्तमान और भविष्य में पानी की मांग को शामिल किया गया है। इसके अलावा उसमें उन देशों तथा क्षेत्रों को भी चिन्हित किया गया है जो जल संकट से सबसे अधिक प्रभावित होगा। भारत में कर्नाटक, गुजरात, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बड़े हिस्से में पानी की माँग उपलब्ध पानी से 100 प्रतिशत अधिक हो गयी है। इसका मतलब यह हुआ कि भूजल लगातार खत्म हो रहा है या अंतर-बेसिन स्थानान्तरण का सहारा लिया जा रहा है।

इसके अलावा, लगभग सभी प्रमुख राज्यों का बड़ा भूभाग जल संकट से जूझ रहा है। इनमें महाराष्ट्र, तमिलनाडू, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्य भी शामिल हैं। यह क्षेत्र गंभीर रुप से सूखे की चपेट में हैं  फिर भी इन इलाकों में थर्मल पावर प्लांट्स प्रस्तावित किये गए हैं जिसमें भारी मात्रा में पानी की जरुरत होगी, जबकि पहले से चालू पावर प्लांट्स जल संकट का सामना कर रहे हैं। महाराष्ट्र का परली पावर प्लांट को जुलाई 2015 से बंद कर दिया गया है और कर्नाटक में रायचुर पावर प्लांट को भी हाल ही में पानी की वजह से बंद किया गया है। एनटीपीसी सोलापुर बिजली संयंत्र पानी की आपूर्ति के मुद्दों के कारण देरी का सामना कर रहा है।

ग्रीनपीस के सीनियर कैंपेनर हरी लैमी ने कहा, “मानवता के लिए अपने खतरे के संदर्भ में, कोयला एक विनाशकारी हैट्रिक को हासिल कर चुका है। जलते कोयले, न केवल जलवायु और हमारे बच्चों के स्वास्थ्य के लिये खतरा है। बल्कि यह हमारे उस पानी पर भी खतरा है जो हमारे जीवन को बचाये रखने के लिये जरुरी है”।

विश्व स्तर पर, 8359 मौजूदा कोयला विद्युत संयंत्र पहले से ही पर्याप्त पानी की खपत कर रहे हैं जिससे 1.2 अरब लोगों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए पानी की कमी हो रही है।

ग्रीनपीस इंटरनेशनल रिपोर्ट की समीक्षा करने वाली संस्था टिकाऊ ऊर्जा परामर्श की संस्था इकोफिस के विशेषज्ञ डॉ जोरिस कूरनीफ ने कहा, “इस रिपोर्ट में उन क्षेत्रों को चिन्हित किया गया है जहां कोयले के उपयोग की वजह से पानी की कमी का सामना करना पड़ सकता है। साथ ही इसमें यह भी बताया गया है कि कैसे ऊर्जा और पानी का मुद्दा जुड़ा हुआ है। खासकर, कोयले की आपूर्ति और उपयोग के लिहाज से”।

कोयला से बिजली पैदा करने में पानी की सबसे अहम भूमिका है। अंतर्राष्ट्रीय  ऊर्जा एजेंसी के अनुसार अगले 20 सालों में कोयला उर्जा के लिये इस्तेमाल की जाने वाली जल की मात्रा का 50 प्रतिशत अकेले खपत करेगा। इस हिसाब से, हजारों नये कोयला प्लांट्स की कल्पना करना भी अविश्वसनीय है। ग्रीनपीस तत्काल उच्च जल क्षेत्र में कोयला विस्तार की योजना को स्थगित करने की मांग करती है। साथ ही, सभी प्रस्तावित नये कोयला प्लांट्स को उपलब्ध पानी का विश्लेषण करने तथा कोयला से इतर सोलर और वायु ऊर्जा की तरफ बढ़ने की मांग करती है जिसमें पानी की जरुरत नहीं है।

ग्रीनपीस कैंपेनर जय कृष्णा कहते हैं, “कोयला प्लांट्स से धीरे-धीरे वापसी करके ही भारत भारी मात्रा में पानी को बचा सकता है। अगर प्रस्तावित 52 गीगावॉट कोयला संयंत्र बनाने की योजना को खत्म कर दिया जाता है तो इससे 1.1 मिलियन एम 3 पानी प्रति साल हम बचा सकते हैं”।

पेरिस जलवायु समझौता 2015 के बाद, जब सभी देश जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने और सौ प्रतिशत अक्षय ऊर्जा का तरफ बढ़ रहे हैं, भारत को यह तय करना होगा कि वह कोयला आधारित बिजली को बढ़ावा देगा या फिर देशवासियों और किसानों की जल संकट को दूर करने का प्रयास करेगा।


[1]‘The Great Water Grab: How the coal industry is deepening the global water crisis’ is available here: http://www.greenpeace.org/international/Global/international/publications/climate/2016/The-Great-Water-Grab.pdf

Avinash Kumar
avinash.kumar@greenpeace.org
Celluar:  8882153664

Mar 27, 2016

हमारी चिड़िया


घर की गौरैया
...................

किसे देखती हो तुम गौरैया
कौन तुम्हें बुलायेगा 
गंगा को भागीरथ लाये 
तुम्हें कौन ले आयेगा
आज दुनिया ऑनलाइन है
किसके पास आज टाइम है
चाँद मंगल पर पानी ढू़ढ़ते
घर की गौरैया गायब है |

किसे ढू़ढ़ती हो तुम गौरैया
कौन दाना तुम्हें चुगायेगा
हाथी को ले आये थे भीम
तुम्हें कौन ले आयेगा
            दुनिया आज स्वार्थी है           
तुमसे वो क्या पायेगा
परग्रही पूर्वजों को ढू़ढ़ते
घर की गौरैया गायब है |

किसे सोचती हो तुम गौरैया
कौन तुम्हें पुकारेगा
कामधेनु को ले आये थे मुनि
आज तुम्हें कौन ले आयेगा
दुनिया आज प्रपंची है पर
कुछ बच्चे माँ धरती के चिंतित है
महामशीन से कण ढू़ढ़ते
घर की गौरैया भी लायक है |




 (आकांक्षा सक्सेना, लेखिका उत्तर प्रदेश के एतिहासिक शहर औरैया से ताल्लुक रखती है, हिन्दी भाषा के प्रसार और मानव अभिव्यक्तियों को अपने ब्लॉग "समाज और हम "के माध्यम से प्रसारित और जाहिर करती है.)     

Mar 22, 2016

गौरैया और बचपन- डॉ शशि प्रभा बाजपेई



बचपन की यादों में गौरैया प्राणसखी को तरह रची-बची है। वैसे तो गौरैया गाँव-शहर घर-वन सब जगह है पर गाँव घर की तो महारानी है। मेरा बचपन गाँव में बीता। शारदा नदी के किनारे प्रकृति की सुरम्य गोद में बसा मेरा प्यारा गाँव और उसमें लकड़ी की धन्नी, बल्ली, थमरिया पर टिके छानी छप्पर वाला माटी का घर अभी भी अपनी पूरी सोंधी गंध के साथ मेरे मानस में बसा है।

अम्मा ने गौरैया से मेरी पहचान उस समय से ही करा दी थी जब मैं बोलना बैठना चलना भी नही जानती थी। बड़े से आॅगन में गौरैया के झुंड के झुंड आते उन्हे ललचाई निगाहों से पकड़ने की ललक में घुटनो चलना और दौड़ना सीखकर मैं दो ढाई साल की हो गयी थी। वैसे तो सभी की माँ प्रथम गुरू होती है पर मेरी माँ मेरी गुरू भी थी, और दुनिया भर की सबसे बड़ी ज्ञाता भी क्योकि पक्षियों के बारे में बचपन में उन्होनें जो बाते बताई आज पढ़-लिखकर वही बातें बड़े-बड़े शास्त्रों के प्रमाण के साक्ष्य के साथ जान रही हूँ। पक्षी विज्ञान तो उनका इतना जबर्दस्त कि क्या कहूँ? गौरैया के बारे में ढेर सी बाते बताई उन्होनें। एक दिन आॅगन में लगे बालू के ढेर पर फुरफुराकर नहाती गौरैया को देख वे खुशी से बोली- ष्अबकी पानी खूब बरसीष्। बडे होकर पढ़ा- कि लोक विश्वास है कि गौरैया का धूल स्नान निकट में वर्षा होने का तथा जल स्नान कम वर्षा या वर्षा न होने का संकेत माना जाता है। घाघ भंडरी की कहावतें अम्मा की जुबान पर प्रमाण में रहती-

कलसा पानी गरम है, चिडि़या नहावै धूर।
चीटीं ले झंडा चढ़ै, तो बरखा भरपूर।

हमारी कोठरी में धन्नी और छप्पर के बीच के स्थान को निरापद जान गौरैया के जोड़े ने घोसले बनाना शुरूकर दिया था। तिनके नीचे मसहरी पर गिरते कभी कभी मेरे ऊपर भी तब मुझे बहुत गुस्सा आता, अम्मा से कहती कि घोसला हटवा दें। वे बड़े प्यार से समझाती-गौरैया भाग वालों के घर घोसला बनाती है। घर-परिवार सुखी रहता है। वे यह भी कहती थी-गौरैया (जिसे वे अवधी में गरगरैया कहती थी) जाति की बाॅधन चिरैया होती है। पाक-साफ जगह ही घोसला बनाती है। अस्तु मेरी प्यारी चिर्रो मेरी आँखों के सामने रहे इसलिये घोसला और तिनको से मैनें समझौता कर लिया था। मसहरी किनारे दीवार की ओर खिसका दी गयी थी। चिर्रो फुर्रसे तिनके लेकर आती जाती मैं मंत्र मुग्ध सी उनकी गतिविधियों देखती रहती अम्मा की चाँदी थी। चिर्रो दिखा दिखाकर वे बड़े आराम से मुझे मनचाही चीजे खिला पिला लेती थी। इसी बीच गौरैया ने अण्डे दे दिये थे और बड़े जतन से उनका पोषण कर रही थी। अम्मा रोज बताती देखना कुछ ही दिनों में नन्हे नन्हें बच्चे चहकेंगे, तुम उनसे दोस्ती कर लेना बहुत मजा आयेगा मैं उत्सुकता से बच्चों के जन्म की प्रतीक्षाकर रही थी। अम्मा बड़े प्यार से गौरैया के साथ संवाद कर लेती थी। गौरैया भी जैसे उन्हे अपना अभिभावक मानती थी और जरा सी भी परेशानी हो जैसे अगर कमरे मे बिल्ली आ जाय तो अजीब सी आवाज में उन्हे बुलाती। अम्मा भी घर के किसी भी कोने में होती लेकिन चिडि़यो की आवाज पर दौड़कर आती। एक मोटा डंडा हर समय हमारी मसहरी के पास रखा रहता था।

एक दिन की बात है अम्मा ने शाम को रोज की ही तरह उसी दिन भी लालटेने जलाकर रख दी थी और रात के खाने की तैयारी करने लगी थी। मैं मँझले बाबा के पास लेटी शेख चिल्ली की कहानी सुन रही थी और अम्मा रसोई में खाना बना रही थी। दादी आँगन में चारपाई पर से ही कुछ-कुछ हिदायत भी देती जा रही थी। थोड़ी देर बाद चिडि़या अचानक वैसी ही अजीब आवाज में बोलने लगी थी। जैसी व्यग्रता से सहायता के लिये बुला रही हो। अम्मा तुरन्त चैके से कमरे में गई और टार्च लेकर डंडे से बिल-बिल  करके खड़भड़ाया उन्हे लगा था कि कमरे में बिल्ली आ गयी होगी पर बिल्ली नहीं निकली चिडि़या अब भी अलगनी पर बैठी लगातार बोल रही थी। अम्मा ने उसे समझाया जाओ घोसलें में बैठो कुछ नही है, बेमतलब घबड़वा दिया। पर चिडि़या घोसले में नही गयी। थोड़ी देर चुप हुई, फिर बोलने लगी अम्मा फिर पलटी। वो जान गई चिडि़या चिडि़या ऐसे ही नही बोल रही कोई बात जरूर है। इस बार अम्मा ने टार्च लगाकर कमरेे में चारों ओर गौर से देखा बिल्ली कहीं नही थी, अचानक जब छत की ओर टार्च की रोशनी डाली तो सिर से पाँव तक सिहर उठी। घोसले से थोड़ी दूरी पर घन्नी पर साँप था उसकी पूँछ नीचे लटक रही थी। अम्मा जल्दी आॅगन की ओर भागकर आई बाबा से बताया कि धन्नी पर साँप है। बाबा तुरन्त उठे और बाहर तरवाहे पर से दउवा को बुला लाये उनके साथ दो और आदमी थे जो नुकीले बल्लम लिये थे। साँप मेरे लिये नया जीव था। इसलिये भय का कोई मतलब ही न था। मैं भी फुर्ती से दौड़कर सबसे आगे साँप देखने पहुॅच गई, अम्मा ने बिजली की सी फुर्ती से मुझे झपटकर पीछे, खींचा और गोद में उठाकर आॅगन में चारपाई पर लगभग घसक सा दिया साथ ही चेतावनी दी अगर यहाँ से हिली तो................।

उधर दउवा ने अम्मा की बताई दिशा में देखा तो साॅप लटक रहा था। चिडि़या अलगनी से उड़कर अब ताखे में बैठ गयी थी।  पर अब वे चुप थी। दउवा के साथ आये दो व्यक्तियों में से एक ने मसहरी पर चढ़कर एक ही झटके में बल्लभ से छेदकर साॅप को लटकाकर आॅगन में आये तो टार्च की रोशनी में मैने पहली बार साँप देखा।
अब चिडि़या शान्त हो गयी थी और घोसले में चली गयी थी।

अम्मा बहुत घबड़ा गई थी। उन्होनें मुझे लेकर उस कमरे में लेटने से मना कर दिया था। उस दिन दादी की चारपाई के पास ही चारपाई डालकर मच्छर दानी लगाकर वे मुझे लेकर सोई थी। अगले दिन भी वे उस कमरे में मुझे सुलाने में डर रही थी पर चिडि़या मस्त थी। चिडि़या के बच्चों की उत्सुकता में मैं कहीं और जाना नही चाहती थी, अम्मा ने भी हिम्मत बाॅध ली हम उसी कमरे में रहे तीन दिन बाद चिडि़या के बच्चों की आवाज सुनाई दी रूनझुन रूनझुन नन्हें घुघरूओं सी झनक-मेरा मन बल्लियों उछल रहा था पर धन्नी पर झाॅक पाना मेरे लिये संभव नही था पर मैं बहुत खुश थी पूरे आॅगन में दौड़ दौड़कर सबको बता आयी थी। मेरी गौरैया ने बच्चे दिये है। उत्साह में मैं अपनी हर चीज उनसे बाॅटने को तैयार थी। बच्चों की चोंच में दाना डालते समय कभी कभी बच्चों का सिर व नन्ही नन्ही चोंच वाला खुला मुँह दिख जाता मैं निहाल हो जाती। कुछ दिनों में चिडि़या के बच्चे थोडा थोड़ा उड़ने लगे थे अम्मा के मना करने पर भी मैं चुपके से छू लेती, मखमल जैसी प्यारी गुनगुनी नन्ही गौरैया को छूकर मुझे बहुत अच्छा लगता और एक दिन बच्चे उड़े तो लौटकर नही आये शायद अब वे कहीं दूर मुक्त गगन में गुनगुनाते उड़ रहे होंगे। मैं उदास हो गयी थी पर माॅ ने बताया गौरैया कर घर यहीं है, वो जरूर आयेंगे। मै रोज ढेरों गौरैया उ़डती देखती और सोचती कहाँ होंगे मेरी गौरैया के बच्चे?

डा0 शशि प्रभा बाजपेई
भगवानदीन आर्य कन्या स्नाकोत्तर महाविद्यालय 
लखीमपुर खीरी 
मो0न0 9454237080
drshashiprabha639@gmail.com 

गौरैया- डॉ निरुपमा अशोक




20 मार्च, गौरैया दिवसपर


गौरैया


गौरैया
तुम मेरी अन्तश्चेतना का
सह अस्तित्व हो
अपने बड़े-बड़े घर बनाने की धुन में
तुम बेघर हो गई हो मेरी गौरैया
ओ मेरी भूली/बिसरी दुनिया
नहीं जान सकी
तुम मेरे होने का अर्थ हो !
खोया हुआ अर्थ हो !!
गौरैया तुम मेरा विस्मृत लोक राग हो
नागर संस्कृति के
आत्मघाती मकड़जाल में
जहाँ घरों के रोशनदानों में
एसी लग गये हैं
मुख्य द्वार पर
कुत्तें से सावधान रहने की लग गई हैं पट्टिकाएँ
तुम्हारे बेधड़क घर आने की सौ-सौ बाधाएँ
किन्तु मानुष्य-मन में बसी हो तुम
अपरिचय की परिचय भरी प्रीति-सी !
जानती हूँ दबे पाँव पर आओगी तुम
दीवार में जब कोई खिड़की खुलेगी............
दाना पानी होगा मुडे़र पर
और ऊब होगी जब शिखर पर
चांहना होगी खुले आकाश की
गौरैया तुम मेरी अगोचर लोक चेतना का
सोया आदिम राग हो
मेरी गुप्त गोदावरी हो
खोई हुई मेरी पहचान हो
और हो अनंत यात्रा का
पहला पड़ाव !
बुलाती हूँ तुम्हें मैं
लौटो घर
घर सदैव का तुम्हारा है: कल भी, आज भी-
और आज के बाद भी ................!

-डाॅ0 निरुपमा अशोक,
प्राचार्या
भगवानदीन आर्यकन्या स्ना0महा0,
लखीमपुर-खीरी, उ0प्र0
20 मार्च, 2013
bakpgcollege@gmail.com

Mar 6, 2016

बुंदेलखंड में गौरेया ननकी और गौरौवा प्यारेलाल का ब्याह हुआ





' हमारा प्रयास - गौरेया प्रवास ' ! 

आओ करे सब एक जतन - ची- ची फुदके घर-आंगन !

चिड़िया- चिरुआ को  नाम दिया ' ननकी संग प्यारेलाल।

"बुंदेलखंड में गौरैया गौरौआ के ब्याह की जो परंपरा आशीष सागर ने विगत वर्ष से शुरू की उसके लिए उन्हें बधाई और इस परम्परा को हम आगे ले जाए जनमानस में ताकि पशु पक्षियों से संवेदनात्मक तौर पर जुड़ सके हमारा मानव समाज जो कथित विकास में अपना प्राकृतिक वजूद खोता जा रहा है, परम्पराएँ हमें जोड़ती है बुनियादी मसलों से और प्रोत्साहित करती हैं सृजन और सरंक्षण को..... कृष्ण " (संपादक की कलम से )


(6 मार्च ,बाँदा / बुंदेलखंड-) बुंदेलखंड के बाँदा जिले की नरैनी तहसील के ग्राम पंचायत खलारी- मोहनपुर में गौरैया का ब्याह हुआ ! वर पक्ष से यशवंत पटेल ( अध्यापक) और प्रधान सुमनलता पटेल, कन्या पक्ष से रामप्रसाद और अनीता ने चिड़िया- चिरुआ को ' ननकी संग प्यारेलाल 'नाम दिया  ! गत वर्ष विश्व गौरया दिवस बीस मार्च को इसी ग्राम में गौरेया ब्याह का उत्सव हुआ था लेकिन अबकी बरस यहाँ बीस मार्च को गौरया चौपाल लगाई जाएगी ! लोक रस्मों के बीच यह अनोखा विवाह एक बार फिर वैसे ही उतसाह से बाँदा प्रभागीय वन अधिकारी प्रमोद गुप्ता, वनरेंजर जेके जयसवाल, उप जिला अधिकारी महेंद्र सिंह, एसो नरैनी, वन दरोगा आफ़ताब खान, सीबी सिंह कार्ययोजना प्रभारी, अन्नदाता की आखत से शैलेन्द्र मोहन श्रीवास्तव नवीन, सामाजिक कार्यकर्ता दिनेशपाल सिंह राघवेन्द्र मिश्र सहित तमाम गाँव वालो की साक्षी बेला में आयोजित किया गया है ! 


गौरतलब है आज ग्रामीण लोगो को ' गौरेया घर' / भी वितरित किये गए है ! वर्षो से प्रकृति की सुन्दरता की सहभागी रही ची- ची जब घर,मुंडेर,छप्पर या बखरी,खेत - खलिहान और पेड़ों में बसर करती थी तब यह किसने सोचा था कि एक दिन इसी के लिए ' विश्व गौरेया दिवस' मनाया जायेगा ? विकास के अंधे कैनवास ने धरती को बदरंग कर दिया है ! तितली,जुगनू,बुन्देली सोन चिरैया और अन्य अब दिवस के लिए ही जाने जायेंगे ! इस अद्भुत ब्याह का मकसद यह था कि जैसे हमने बचपन में गुड्डा- गुडिया के ब्याह, माँ और नाना- नानी की कहानी के साथ रिश्तों को जिया,उसके ताने- बाने को समझा वैसे ही इस ननकी( गौरेया चिड़िया ) के संवेदना जनक पहलु को भी समझे ! 

इसको बचाए इसलिए नही कि यह अब विलुप्त होकर 'लाल सूची ' में जा चुकी है बल्कि इसलिए भी की अगर यह कुदरत के परिंदे, पक्षी नही बचे तो हमारे विकास के उजाले में ही सबकी हत्या करने का दाग लग चूका होगा ! ....क्या धरती में सिर्फ मानव ( जो अब आदमी से बद्दतर है ) वही मात्र रहने का हकदारी है ! ...खेतो में दिन -रात पड़ते कैमिकल खाद ने इस मासूम चिड़िया की सांसे कम करने का काम किया ! 



आपके मोबाइल टावर, बिजली के तार और अन्य से निकली रेडियेशन किरणें आज इसकी कातिल बन गई है ! आपने अपना विकास किया लेकिन औरों का प्रवास जमीदोज कर दिया ! कंकरीट सोपान पर खड़ी आपकी विकसित मर्यादाएं आज देशभक्ति और देशद्रोही का विलाप कर रही है लेकिन यह पक्षी तो आपसे कोई जाति,मजहब, इर्ष्या नही करते न तब आपने इनको आज दिवस में क्यों समेट दिया !

 ...एक पक्षी के प्रवास को छीनते हाइवे पेड़ों की कटान से गवाह है ! उपस्थित अधिकारीयों ने गाँव के बच्चो,महिला- पुरुष को अपने संबोधन से गौरेया को सुरक्षित-सुन्दर घर देने की बात कही और संकल्प लिया कि अपने घर के एक कोने में इसको भी माकूल जगह देंगे ! ...मित्रों अगर ऐसा होता है तो शायद ये प्रकृति आपका,सबका कुछ धन्यवाद करे क्योकि खाली आदमी के रहने से दुनिया में रक्त,जंग,नफरत और उजाड़ ही बचेगा सुन्दरता नही ! ची- ची का फुदकना मानव के लिए हमेशा हितकारी ही रहेगा ! गौरेया के ब्याह में घोड़े भी नाचे,गाँव के बच्चे अपने अंदाज में थिरके और ब्याह में गाये जाने वाली लोकगीत महिला ने इस चिड़िया के लिए बिंदास गाये ! 

- आशीष सागर,प्रवास
ashish.sagar@bundelkhand.in


क्षमा करो गौरैया...

Image Courtesy: Sue Van Coppenhagen 
संस्मरण
गौरैया और मैं -- (3)
....डा0 शशि प्रभा बाजपेयी

बात उस समय की है जब घर के नाम पर मेरे पास सिर्फ एक कमरा था और विद्यार्थी और शिक्षक दोनों ही भूमिकाओं का एक साथ निर्वाह करते हुए मैं अकेली ही रह रही थी। महाविद्यालय में अध्यापन कार्य से बचा हुआ अधिकांश समय मैं पी0एच0डी0 उपाधि हेतु शोध प्रबंध लेखन में समर्पित करती थी। इन दोनों के बीच आवश्यक दिनचर्या भी सम्पन्न होती थी। अपने लिए महरी और महराजिन मैं स्वयं ही थी। उस समय कमरे में ही मेरा चैका, अध्ययनकक्ष, विश्राम कक्ष सब था। बीच-बीच में शोध कार्य के सिलसिले में लखनऊ जाना पड़ता था तथा छुट्टियों में हरदोई- जहाँ मेरा पूरा परिवार था। मेरी माँ कभी-कभी परेशान होने लगती थी यह सोचकर कि मैं अकेले कैसे रह पाती हूँ और सारा कार्य करके कैसे पढ़ पाती हूँ? थकती तो नहीं? ऊबती तो नहीं? पर सच बात तो यह थी, मैं कभी अकेली थी ही नहीं। कभी अकेली रही ही नहीं, अपने कमरे में। मेरी बचपन की साथी गौरैया यहाँ भी मेरे साथ थी। जैसे ही मैंने रहने के लिए कमरे का दरवाजा खोला- वह फुर्र से उड़ी और रोशनदान से बाहर चली गयी थी, फिर थोड़ी ही देर में फिर आई और कमरे का एक चक्कर लगा छत में लगे छल्ले में बैठ गयी। ऐसा कई बार हुआ। मैंने छत के पंखे का डिब्बा ऐसे ही सील बंद रहने दिया और कोने की आलमारी में सबसे ऊपर के खाने में रख दिया। कमरे में गौरैया की उपस्थिति में छत का पंखा चलाना मेरे लिए संभव न था। उत्तर की ओर गली थी छज्जे पर जाने के लिए छोटी फटकिया थी और पूरी दीवार में बड़ी खिड़की थी। आलमारीनुमा मेज जो मेरा पूरा रसोईघर थी, मैंने इसी खिड़की से सटाकर लगा दी और गैस वगैरह सब व्यवस्थित कर दी। गौरैया अब मेरी पार्टनर थी, खिड़की, रोशनदान, दरवाजा- कहीं से भी बेरोकटोक कमरे मंे आ जाती। पूरब की ओर दीवार में आलमारियाँ बनी थीं उनमें अपना सामान और किताबें रखकर मैंने ढकने के लिए परदे डाल दिए थे। परदे वाली राॅड पर बैठना गौरैया को बहुत अच्छा लगता। वह कभी बल्ब पर जा बैठती, कभी खाने वाली मेज पर, कभी भगवान जी वाले टाँड़, पर कभी किताबों पर, बेधड़क-बेझिझक मेरी थाली से चावल खा लेती और मेरे कान के पास से फुर्र से उड़ती तो पंखो की हवा से जैसे मन पुलक उठता। मुझे कभी भी अकेलेपन का एहसास नहीं हुआ।

एक दिन जब कालेज से लौटी तो देखा चैके वाली मेज पर गैस चूल्हे पर कुछ तिनके पड़े थे। मुझे समझते देर नहीं लगी रोशनदान अब आबाद होने वाला है। गौरैया नीड़ निर्माण प्रारंभ कर चुकी है। रोशनदान पर मैंने पहले से ही कुछ दाने बिखेर रखे थे उसके खाने के लिए- पता नहीं उसने खाए कि नहीं। पर पानी का जो जुगाड़ बनाया था उसे उसने अस्वीकार सा कर दिया था और पानी हमेशा मेरी बाल्टी से ही पीती थी। हुआ यों कि मैंने सोचा कि वहीं पानी भी रख दूँ सो मैंने जुगाड़ बनाकर एक छिछला सा प्लास्टिक का डिब्बा खाली कर उसे रोशनदान में डोरी से बाँधकर इस तरह लटकाया था कि वह रोशनदान से बिल्कुल सटा रहे और मैं डोरी ढीली कर उसे नीचे उतार रोज ताजा पानी भर सकूँ। पर ये सारा सरकस बनाकर पहले ही दिन मेरी आशा निराशा में बदल गयी। गौरैया दंपति आए। एक गौरैया उस डिब्बे पर बैठी पर तुरंत ही उड़कर रोशनदान पर बैठ गयी। शायद उल्टा बैठने से उसकी पूंछ पानी से भीग गयी थी। बैठने के लिए वे डिब्बे का प्रयोग कर लेती थी, पानी के बारे में पता नहीं। सुबह मेरे उठने से पहले ही वे फुर्र हो गयी। फिर कई बार तिनके लेकर आईं-गईं। कितनी व्यस्त थीं दोनों ! मनुष्य कितना एहसान जताता है अपनी संतानों पर- ‘‘तिनका-तिनका जोड़कर बनाया है घर, तुम क्या जानों मेहनत क्या होती है’’......... आदि-आदि’ पर ये पंछी ....... तिनका-तिनका जोड़कर कैसे बनता है घर........ यही जानते हैं। अपनी सन्तानों पर कोई एहसान नहीं ......... बस उत्साह ही उत्साह !!! धन्य हो गौरैया! तुम मेरी गुरू हो।

कुछ दिन बाद मैंने देखा अब एक चिडि़या घोंसले में ही रहती और एक बाहर जाती, शायद अंडों की सुरक्षा की दृष्टि से। इसी बीच होली आ गयी और मैं हरदोई चली गयी। चार-पाँच दिन बाद वापस आई.... तो कमरा खोलते ही नन्हें-नन्हें घुँघरूओं की झनक जैसी मधुर ध्वनि मेरे कानों में पड़ी। मेरा रोम-रोम खिल गया जैसे कोई बहुत बड़ी खुशखबरी मिल गयी हो, मेरी थकान मिट गई। सामान कमरे में रखा और तुरन्त काम में जुट गयी। पहला काम था- गैस चूल्हे वाली मेज का स्थान परिवर्तन। सब्जी छौंकने से उठने वाली कड़वी भभक वाली भाप उड़कर नन्हें-नन्हें गौरैयों को कष्ट पहुँचा सकती थी। मैंने दूसरी ओर मेज लगा ली और सोच लिया कि तेज छौंक वाली कोई चीज नहीं बनानी है कुछ दिन। शाम हो चुकी थी- एकदम सुना घुँघरूओं जैसी मधुर झनक तेज हो गयी। पलक झपकते ही चिडि़या दम्पति बारी-बारी से मुँह में कोमल चुग्गा दबाए घोंसले में आ गए थे। चार नन्हीं चोंचे एक साथ खुली थीं गौरैया ने सबको जैसे गोद में समेट लिया था प्यार से, वे सब धीरे-धीरे चुप हो गए थे। प्यार से थपक कर सुला दिया था गौरैया ने अपने बच्चों को। मैं मुग्धभाव से रोज उनका प्यार से चुग्गा लाना, और चोंच में खिलाना देखती रहती। मैंने एक और काम किया था पर पूरी तरह सफल नहीं हुई। मैंने सोचा यह कोमल-कोमल कीट खिलाती है, ऐसा ही कोमल आहार दे दूँ तो शायद इन्हें इतनी भागदौड़ न करनी पड़े। मैंने दूध में चूरा भिगोकर कभी गले-गले चावल बनाकर रोशनदान पर रख दिए और फिर उत्सुकता से टकटकी लगाए रोशनदान की ओर देखती रही कि चिडि़या उसे खिलाती है या नहीं। मेरे रखे हुए पदार्थ को चिडि़या दम्पति ने स्वयं कई बार खाया पर मैंने अनुभव किया कि अपने बच्चों को वह अपने पुरूषार्थ का वही आहार खिलाते जो स्वयं चोंच में दबाकर लाते थे- कमरे की मकड़ी कीड़े तक पर जैसे मेरी ओर देखकर कृतज्ञ भाव से कहते- धन्यवाद! आपने मेरे विषय में सोचा पर मैं अपने बच्चों का पालन करने में सक्षम हूँ। चिन्ता मत करो।’- और मुस्कराकर फुर्र हो जाती। कितनी खुद्दार थी वह! गौरैया! तुम मेरी प्रेरणा हो।

नवरात्र प्रारम्भ होने वाले थे- प्रतिपदा पर कलश स्थापन व पूजन हेतु मुझे हरदोई जाना पड़ा। दो दिन बाद लौटी तो कमरे में सन्नाटा लगा। मेज पर स्टूल लगाकर रोशनदान में झांका तो बच्चे नहीं दिखाई दिए। मेरा मन बुझ सा गया- दो दिन में ही उड़ भी गए सब? नहीं इनती जल्दी उड़कर नहीं जा सकते। फिर कहाँ गए? मुझे चिन्ता होने लगी। पीछे घूमी तो अचानक मेरी निगाह बिस्तर पर गयी। अनायास ही मैं मुस्करा उठी- एक नन्हा गौरैया तह की हुई रजाई पर बैठा था और टुटुर-टुकुर मुझे ही देख रहा था। ऊपर ही दूसरा आलमारी में किताब पर बैठा था। थोड़ी देर में तीसरा भी नज़र आ गया- वह भगवान जी वाले टाँड़ पर बैठा था और चैथा...? होगा यहीं कहीं पास ही मैं सँभलकर बढ़ रही थी, किताबों की दूसरी आलमारी में वह भी नज़र आ गया। मन कर रहा था उठाकर चूम लूं, ढेर सा प्यार करूं पर मन मसोसकर रह गयी..... सुना था कि बच्चे को छू लेने पर चिडि़या उसे स्वीकारती नहीं, छोड़ देती है। मैं सोचकर ही डर गयी मन मारकर रह गयी- मैंने देख लिया था गौरैया आकर रोशनदान पर बैठ चुकी थी और किसी पुलिस वाले की तरह मुझे ही देख रही थी। चाय बनाने के लिए गैस की ओर रूख किया तो देखा टाँड़ पर बैठा बच्चा फड़फड़ाया और नन्हीं डगमग उड़ान भर मेज पर ही आकर बैठ गया। अब मैं क्या करती? मेरे बिस्तर, मेज, आलमारी- सब पर गौरैया के बच्चों का कब्जा था। अब गौरैया कमरे की मालकिन थी- और मैं किरायेदार। मैंने एक ग्लास पानी पिया और धीरे से जमीन पर ही चटाई बिछाई और हाथ का तकिया बनाकर लेट गई। थकी तो थी ही कुछ ही देर में नींद आ गई। जब आँख खुली तो साँझ हो चली थी। निगाह दौड़ाई तो चिडि़या के बच्चे उन जगहों पर नहीं थे जहाँ पहले बैठे थे। अब कहाँ गए होंगे भला? सोचते-सोचते उठी। आहिस्ते से बिस्तर उठाया, बिछाया। 

आज कुछ भी लिखने-पढ़ने का मन नहीं हो रहा था। कुछ गर्मी सी महसूस हो रही थी। ध्यान आया खिड़की तो खोली ही नहीं थी। मैं उठी और खिड़की खोली- अचानक ची ई ई ई आवाज आई। मेरा कलेजा मुँह को आने लगा... धड़कने बढ़ गयीं- देखा खिड़की पर एक बच्चा बैठा था जो मैं देख नहीं पाई थी, वह दब गया था- उसे चोट लग गयी थी मैंने उसे रूपट्टे से पकड़कर उठाया- देखा तो पंजे के पास माँस वाला भाग बहुत लाल हो गया था- छिल सा गया था। कातर भाव से मैं उसे धीरे-धीरे सहलाती जा रही थी- रोती जा रही थी.... कुछ सोचकर अचानक उठी और उसके चोट वाले स्थान पर बोरोलीन लगा दी और अपने कपोल से सटाकर क्षमा माँगते हुए उसे सहलाती रही। चिडि़या के आने का वक्त हो चला था, मैंने उसे बिस्तर पर बैठा दिया। हाथ जोड़कर पूरे मन से ईश्वर से एक ही प्रार्थना कर रही थी गौरैया के बच्चे को कुछ होना नहीं चाहिए भगवान! उसे ठीक कर दो। उससे भी महत्वपूर्ण यह कि चिडि़या उसे स्वीकार कर ले। बोझिल मन से बिना घंटी बजाए आरती की। मेरी आँखों में बार-बार आँसू आ जाते थे अपनी असहाय स्थिति पर, अपराध बोध मुझे कचोट रहा था। तभी मैं चैंकी.... घायल बच्चे ने पंख फड़फड़ाए। कुछ लुढ़कता सा उड़ा बिस्तर पर ही...... मेरे रोम-रोम में जैसे धड़कन भर गयी थी, मेरी आँखे झर-झर झर रहीं थी....... कातर दृष्टि ईश्वर से गुहार कर रही थी प्रभो! आप सर्वसमर्थ हैं। गौरैया के बच्चे को शक्ति दो! रक्षा करो उसकी।........... अचानक चीं चीं चीं चीं कई आवाजें सुनाई देने लगीं.. मैंने देखा चिडि़या रोशनदान पर आ चुकी थी- कमरे का जायजा ले रही थी। मेरी धड़कने और बढ़ीं इतनी कि मैं उनकी आवाज साफ सुन सकती थी। तभी घायल बच्चा फिर फड़फड़ाया चिडि़या दौड़कर उसके पास आ गयी। मैंने आँखे मींच लीं....... अब क्या होगा? स्वीकारेगी या नहीं। बोरोलीन की महक से तो जान ही जायेगी....... कुछ गड़बड़ है। और भी न जाने क्या-क्या सोच डाला क्षण भर में ही। फिर चीं चीं की आवाज कान में पड़ी व फुर्र से उड़ने की भी.... आँख खोली तो बच्चा वहाँ नहीं था। अपने डैनो का सहारा दे चिडि़या ने उसे टाँड़ पर बिठा दिया था। मैं खुशी के मारे फूट-फूटकर रो पड़ी थी उस समय- धन्यवाद! गौरैया तुमने मुझे अपराध बोध से उबार लिया, बच्चे को स्वीकार लिया। मिथक टूट गया था- विश्वास जीत गया था। 

मैं उठी, मुँह धोया, चाय बनाई और चाय का कप लेकर छत पर टहलकर अपने को सामान्य करने की कोशिश की, ठंडी-ठंडी हवा चल रही थी। मैं कमरे में आ गयी और दरवाजा बंदकर बिस्तर पर सीधी लेट गई। वह बच्चा अभी भी टाँड़ पर बैठा था। छत पर निगाहें टिकाए पता नहीं क्या-क्या सोच रही थी मैं कि अचानक लोहे के छल्लों में बैठे तीनों बच्चों पर बारी-बारी से नज़र पड़ी........ मन एकदम हल्का हो गया। परदे की राड पर कोने में गौरैया बैठी थी, दूसरी रोशनदान पर। एक बार मन में आया चोट वाले बच्चे को उठाकर देखूं पर हिम्मत नहीं पड़ी। पता नहीं इसी उधेड़बुन में कब सो गई। सुबह 7 से 10 की मीटिंग में ड्यूटी थी।

इसी तरह दो तीन दिन बीत गए। बच्चे कुछ-कुछ दूरी तक उड़ने लगे थे, चिडि़या उन्हें क्रमशः नए-नए लक्ष्य देती थी और वे उड़कर पूरा करते थे। यदि कभी लड़खड़ाते या गिरने लगते तो गौरैया पंखों का सहारा दे सम्हाल लेती थी और एक दिन........ बच्चे कमरे में वापस नहीं आए......... वे उड़ना सीख चुके थे, खुले आसमान में......... निकल पड़े थे जीवन की यात्रा में दूर कहीं अपना आशियाना बनाने की तलाश में नए नीड़ के तिनकों को चुनने के लिए। 
कमरे के रोशनदान में घोसला अभी भी था- पर उजड़ा हुआ। अब उसमें सिर्फ तिनके थे। मेज पर स्टूल लगाकर मैंने रोशनदान साफ किया। मेज अपनी जगह पर रखी। सब कुछ पहले जैसा हो गया था। पर अभी भी बच्चों की मधुर चीं चीं कभी कभी स्मृति में गूँज उठती थी। हाँ... गौरैया अब भी मेरे कमरे में आती रहती थी। उसने कोई संबंध नहीं तोड़ा था।

धीरे-धीरे उस कमरे में गौरैये के साथ रहते हुए तीन वर्ष बीत चुके थे। मेरा कमरा गौरैया का सुरक्षित मैटरनिटी होम था। वह रोशनदान में घोंसला बनाती अण्डे देती-सेती, बच्चों को पालती-पोसती- उड़ा ले जाती। मेरा कमरा गौरैया और उसके बच्चों की चहक से गुंजायमान था। पास-पड़ोस के बच्चे बड़ी जिज्ञासा व उल्लास के साथ मेरे कमरे में गौरैया के बच्चे देखने आते रहते। इसी बीच गौरैया जैसी ही एक और चिडि़या जो आकार में उससे कुछ बड़ी थी- आना शुरू कर चुकी थी। यदि गौरैये की उपस्थिति में वह आ जाती तो गौरैया असहज हो उठती और अजीब सी आवाज में उसे डांटते हुए भगा आती थी। इस साल गौरैया ने अभी तक घोंसला नहीं बनाया था। शायद काली चिडि़या ही इसका कारण थी। क्या करें काली चिडि़या का? प्रश्न करता झुंझलाया मन- परन्तु कोई उत्तर नहीं था मेरे पास।

कुछ दिनों बाद मुझे एक दिन बाल्टी में कुछ तिनके गिरे मिले। सिर उठाकर ऊपर देखा तो आलमारी में पंखे वाले डिब्बे के ऊपर अपना घोंसला बनाती गौरैया दिखाई दे गयी। शायद काली चिडि़या से सावधान रहते हुए इस बार आलमारी में घोंसला बना रही थी- गौरैया। मुझे खुशी हुई। समय बीतता गया। घोंसला बन गया, गौरैये ने फिर से 4 अण्डे दिए थे। उसकी अनुपस्थिति में मैंने उत्सुकतावश उचककर देख लिया था। अब मैं सजग रहने लगी थी। काली चिडि़या अब भी आती थी और चिन्ता की बात यह थी कि वह घोंसले पर झपट्टा मारने जैसी हरकत करती थी। मुझे पता नहीं क्यों बहुत डर लगने लगा था उन अंडों की सुरक्षा को लेकर। काॅलेज में भी कभी कभी एकदम मन उचट जाता था। वरिष्ठ प्रवक्ताएं कभी कभी चुटकी भी लेती थीं- तुम्हारे कौन से बच्चे रो रहे होते हैं जो तुम्हें घर जाने की इतनी जल्दी रहती है अकेले जी नहीं ऊबता तुम्हारा? कहीं आती-जाती भी नहीं कि जी बहल जाय। मैं उन्हें समझा देती थी कि शोध कार्य में व्यस्त हूँ। सच होते हुए यह पूरा सच नहीं था सच तो यह था कि मैं गौरैया और उसके बच्चों के मोहपाश में जकड़ी हुई थी। कक्षा खत्म होते ही खूँटा तुड़ाकर भागती गैया की तरह, तेज चाल से घर पहुँच जाती और सबसे पहला ध्यान घोंसले पर ही जाता। काफी समय से मैं घर भी नहीं गयी थी।
एक दिन जब काॅलेज से लौटी तो दरवाजा खोलते ही गौरैया का कुछ बदला-बदला स्वर सुनाई दिया वह परदे वाली राड पर बैठी जैसे मुझसे कुछ कह रही थी। मैंने पर्स रखा और कपड़े बदलकर मुँह धोने के लिए बाल्टी से पानी लेना चाहा तो अवाक् रह गयी- बाल्टी में कुछ तिनके व टूटा हुआ एक अण्डा पड़ा था, शायद काली चिडि़या ने घोंसले पर हमला किया था। अब समझ में आया चिडि़या उस बदले स्वर में यह बता रही थी। चिडि़या अब भी राड पर बैठी थी मैंने दृष्टि ही दृष्टि में उसे ढांढस बँधाया। बोझिल मन से धीरे-धीरे अपने काम निबटाते हुए भी मैं उपाय ढूंढ रही थी उस काली चिडि़या को भगाने का पर कुछ सूझा नहीं। गौरैया दंपति भी सजग थे। जैसे ही काली चिडि़या कमरे में घुसती गौरैया भी पीछे तुरंत ही आ जाती और शोर मचाती थी। कभी काली चिडि़या स्वयं भाग जाती कभी मैं भगा देती। इसी द्वन्द्व के बीच कुछ दिनों बाद फिर मेरे कानों में घुँघरूओं के छनकने जैसी मधुर चीं चीं की आवाज गूँजी। ‘दशरथ पुत्र जन्म सुनि काना’- जैसा ही आनंद हुआ मुझे। वही प्यारी दिनचर्या, नन्हीं गौरैया का स्वर- अभिभावक गौरैयों की तत्परता- शत्रु चिडि़या के आक्रमण का डर और बचने की चिन्ता में एक गौरैया हर समय कमरे में रहती।

एक दिन की बात है, 3-6 मीटिंग की ड्यूटी के बाद जब काॅलेज से लौटी तो शाम हो चली थी। मैंने कपड़े बदले, हाथ पैर धोए, आरती की, चाय बनाई और कप लेकर सीधे पढ़ाई वाली मेज के पास पहुँच गयी। चाय पीती जा रही थी और अपने शोध प्रबंध के लिपिबद्ध अध्यायों का क्रम भी ठीक करती जा रही थी। दो दिन का अवकाश था और रात में ही 3 बजे नैनीताल एक्सप्रेस से मुझे लखनऊ जाना था। मैं अपने काम में मशगूल थी। जब काम सिमटा तो ध्यान गया गौरैया बड़े अजीब स्वर में बोल रही थी लगातारः- शायद काफी देर से मुझे सुनाई क्यों नहीं दिया? मैं जल्दी से उठी देखा- परदे वाली राड पर बड़ी बेचैनी से लगातार गौरैया चिल्लाती हुई सी चल रही थी। मेरी भी बेचैनी बढ़ी। दौड़कर आलमारी की ओर बढ़ी तो देखा एक बच्चा नीचे गिरा पड़ा था। अभी तो पंख भी नहीं थे बस पंख जैसे रोंए थे। गनीमत यह थी वह जमीन पर नहीं गिरा था। जिस दिन बाल्टी में अण्डा मिला था उसी दिन से मैंने उस पर ढक्कन लगाकर एक चद्दर उस पर रख दी थी कि अगर गिरे भी तो चोट न लगे। बच्चा जीवित था मैंने उसे रूमाल से पकड़ा और घोंसले में रख दिया। वह कई बार चीं चीं बोला मेरे हटते ही चिडि़या दौड़कर उसके पास पहुँच गयी। वही मिलन जिसके आगे स्वर्ग का सुख भी तुच्छ है। थोड़ी देर में शान्ति छा गयी। शायद अपने बच्चों को कलेजे से लगाकर गौरैया सो गयी थी। मैं भी अपना सामान बैग में रखकर सो गयी अब तक रात्रि के 10 बज चुके थे।

तीसरे दिन सीधे काॅलेज ही पहुँची 11-2 तथा 3-6 दोनों मीटिंग में ड्यूटी थी। शाम को घर पहुँची। कमरे में कोई हलचल नहीं थी। कमरे में कुछ बदबू सी आई, सोचा कहीं चूहा मरा है शायद। खिड़की दरवाजे खोल दिए कि गमस निकल जाय। हाथ-पैर धोकर अगरबत्ती जला दी। इस समय चूहा ढूंढने की हिम्मत नहीं बची थी। सुबह फिर 7-10 ड्यूटी थी जल्दी सो गयी। अगले दिन जब आई तो कमरे में सन्नाटा कुछ अस्वाभाविक लगा। खैर मैं चूहा ढूंढने में लग गई। सारी चीजें हटा-हटाकर देखा कुछ नहीं मिला किताबें भी हटाकर देख लिया। अब कोने वाली आलमारी की ओर बढ़ी तो बदबू और बढ़ गयी। अचानक मेरे हाथ पैरों में बिजली सी फुर्ती आ गयी- कहीं बच्चों को तो कुछ नहीं हुआ? मेरा कलेजा धक् धक् कर रहा था। देखा घोंसले में बच्चे नहीं थे। जल्दी से डिब्बा हटाया- तो लगा गिर ही पड़ूँगी। बदबू यहीं से आ रही थी। तीनों बच्चे डिब्बे के पीछे गिरकर सड़ गए थे।

मैं थोड़ी देर स्तब्ध बैठी रही... मेरी आँखे झर रहीं थी। गौरैया रोशनदान पर बैठी थी खामोश। सब कुछ नष्ट हो चुका था उसका- कुछ नहीं कर पायी मैं। मैं आलमारी से मृत बच्चों को उठा रही थी गौरैया राड पर आकर बैठ गयी थी, पर बिल्कुल खामोश..... न कोई शिकायत.... न उलाहना..... न अपेक्षा- बिल्कुल निर्विकार सी बैठी थी वह। मुझे अपराधबोध कचोट रहा था यदि मैं न जाती शायद कुछ मदद कर पाती समय से। ऐसा तो नहीं मैं सिर्फ एक बच्चे का गिरना जान पाई थी? उसी दिन दोनों तो नहीं गिर गए थे पीछे? नहीं नहीं, ऐसा नहीं हो सकता चिडि़या अवश्य बताती वह चुप हो गयी थी तभी मैं सोयी थी। जरूर यह घटना मेरी अनुपस्थिति में घटी थी। शायद काली चिडि़या ने झपट्टा मारा होगा, बचने के लिए बच्चे पीछे सरके होंगे या झोंके से ही गिर गए होंगे। कुछ भी हो.... अब बच्चे इस दुनिया में नहीं थे। रोते-रोते ही मैं गौरैया से हाथ जोड़कर माफी माँग रही थी- क्षमा करो गौरैया! मैं तुम्हारे विश्वास की रक्षा नहीं कर सकी।
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डा0 शशि प्रभा बाजपेयी
एसो0प्रो0 हिन्दी-विभाग
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