International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Save Tiger

DON'T LET WILD TIGERS DISAPPEAR

Lady Rosetta

Potatoes with low sugar content and longer shelf life.

अबूझमाड़ के जंगल

जहां बाघ नही नक्सली राज करते हैं

खवासा का आदमखोर

जहां कांपती थी रूह उस नरभक्षी से

जानवर भी करते हैं योग

योगाचार्य धीरज वशिष्ठ का विशेष लेख

Feb 28, 2016

संपादक की कलम से... गौरैया के लिए



Dudhwa Live International Journal of Environment & Agriculture 
ISSN 3295-5791
Vol.6 no.2 2016 
Lakkhimpur-Kheri
India 

फरवरी 2016 
दुधवा लाइव के इस अंक में हमने हमेशा की तरह पर्यावरण व् वन्यजीवों से सम्बंधित मुद्दों पर आधारित लेखों व् चित्रों को प्रस्तुत किया है, दुधवा लाइव अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका ने हमेशा उन मसलों को आप सभी तक पहुंचाने की कोशिश की है जो मानव सभ्यता में कभी संस्कृति, परम्परा के तौर पर हमारे बीच जिन्दा थे, लेकिन आधुनिकता और अनियोजित विकास में या तो हम उन प्राकृतिक विचारों को भूल चुके हैं या फिर याद नही करना चाहते.

जल जंगल जमीन की लड़ाई दुनिया में बहुत लोग लड़ रहे हैं पर असल मायने में ज्यादातर लोग सिर्फ अपने अधिकारों की बात करते हैं, और यकीन मानिए जहां मानव अधिकार की बात करता हैं तो उसके इस अधिकार के पीछे प्रकृति के विनाश का एक अध्याय और जुड़ जाता है, क्योंकि असल में तो हम प्राकृतिक संसाधनों पर ही जिन्दा है इस ग्रह पर, और हम ही क्यों सभी प्राणियों की निर्भरता प्राकृतिक संसाधनों पर है, और जब हम अपने हकों की आवाज बुलंद करते हैं तो जाहिर है की हम प्रकृति के शरीर की एक और बोटी नोचकर खा जाना चाहते हैं, पर विचारिएगा की अपनी जरूरतों से ज्यादा का हक़ ले लेने पर हम धरती के न जाने कितने जीव जंतुओं को उनके हक़ से वंचित कर देते हैं. 

हमने हमेशा खेत खलिहान, ग्रामीण परम्परा की बात की है इस पत्रिका के माध्यम से, सिकुड़ती नदियों, सूखते तालाबों और कटते बाग़ बगीचों के साथ जमींदोज होती हमारी जैवविविधता, जिसके साथ साथ प्रभावित हो रही है मानव सभ्यता और उसका जीवन, प्रकृति के वास्तविक स्वरूप को हम जिस तरह से बेडौल कर रहे हैं वह कुरूपता कहीं न कहीं अनगिनत लाइलाज बीमारियों के तौर पर मानव समाज में परिलक्षित हो रही हैं, किन्तु हम अपनी कथित विकास की दौड़ की रफ़्तार कतई धीमी नहीं करना चाहते.

गौरतलब बात तो यह है की शिक्षा के नाम पर पर बड़े बड़े विश्वविद्यालय और उनसे प्राप्त होने वाली डिग्रियां तो हम सभी प्राप्त करते जा रहे हैं, और भूलते जा रहे है अपनी बुनियादी तालीम, जो सिखाती है प्रकृति के साथ रहना, जरुरत भर लेना और समिष्टि में सभी जीवों के प्रति आदर रखना, इससे भी एक बड़ी बात है जिस पर कभी कभी सोचता हूँ की सदियों के अनुभव से सीखता आया इंसान इस प्रकृति में खुद को ढालता हुआ, उन हजारों वर्षों के अनुभवों को हम दरकिनार कर रहें है जिन अनुभवों को हमारे पूर्वजों ने पीढी दर पीढी साझा किया, जो अनुभव विचार में तब्दील हुए की किस तरह सहज व् सरल ढंग से वसुंधरा पर हम रहें की वह हमेशा शस्य श्यामला बनी रहे और बना रहे सुखमय हमारा मानव समाज भी.

उपरोक्त सब बातों पर विमर्श और उससे निकले विचारों को हम यथार्थ में लाने की कोशिश में हैं, वैचारिक संवेदनाओं के बजाए परिणति ज्यादा जरुरी है, इस अंक में हमने यमुना की दुर्दशा, बसंत के आगमन, सूखते तालाबों औद्योगीकरण और उसके परिणाम, दुधवा के जंगलों के बाघों, महात्मा गांधी के विचारों से लेकर हमारे घरों की नन्ही गौरैया की बात की है.

विगत 6 वर्षों से दुधवा लाइव द्वारा सिर्फ विचारों का ही प्रवाह नही किया बल्कि दुधवा लाइव बैनर तले कई आन्दोलनों का जन्म हुआ जो हमारे पर्यावरण, जंगल, और पुरातात्विक स्थलों से सम्बंधित हैं, इनमे गौरैया सरंक्षण के लिए किए गए आन्दोलन ने अन्तराष्ट्रीय ख्याति ही नहीं अर्जित की बल्कि लोगों को प्रेरित किया अपनी छतों और दरवाजों पर इस नन्हे परिंदे के लिए दाना-पानी रखने के लिए, नतीजतन लखीमपुर खीरी सहित उत्तर भारत के तराई जनपदों में गौरैया बचाओं जनाभियान ने अपने सफलतम 6 वर्ष पुरे कर लिए. पर्यावरण जागरूकता के लिए दुधवा लाइव को दुनिया के बड़े ब्राडकास्टर्स में से एक डायचे वेले जर्मनी ने सन 2013 में पुरुस्कृत किया और सन 2014 में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा सम्मानित किया गया, हम इस प्रोत्साहन और दुनिया तथा देश प्रदेश के लोगों की अपेक्षाओं पर खरे उतरने की कोशिश में हैं की हमेशा जन सहभागिता से हम बुनियादी मसलों पर अच्छे कार्य कर सकें.

मार्च के अंक में हम गौरैया की बात करेंगे, आगामी 20 मार्च को दुधवा लाइव सामुदायिक संगठन प्रत्येक वर्ष की तरह गौरैया दिवस का आयोजन करेगा, जिसमें आप सभी की भागीदारी प्रार्थनीय है, ताकि हमारे घरों की यह चिड़िया फिर से लौट सके.

दुधवा लाइव की तरफ से गौरैया के घरौंदों का निर्माण कराया गया है, जिसे समाज के विभिन्न वर्गों, और स्कूलों में वितरित किया जाएगा, साथ ही उन लकड़ी के घोसलों को कैसे लगाना है और गौरैया के भोजन व् सुरक्षा के क्या क्या इंतजाम करने हैं, इसकी पूरी जानकारी उपलब्ध कराने के भरसक प्रयास किए जायेंगे.

हम आप को आमंत्रित करते है अपनी गौरैया के लिए, क्योंकि यह सिर्फ चिड़िया नहीं है बल्कि हमारी परम्पराओं का एक संवेदनशील हिस्सा है.

कृपया  दुधवा लाइव के फरवरी 2016  का प्रिंट एडीशन पी डी ऍफ़ फ़ाइल के रूप में प्राप्त करने के लिए यहाँ क्लिक करे.




कृष्ण कुमार मिश्र  
संस्थापक/संपादक 
दुधवा लाइव 
www.dudhwalive.com
editor.dudhwalive@gmail.com



House Sparrows 
Photo Courtesy: Suresh C. Sharma  

Feb 23, 2016

...क्योंकि यहाँ एक चिड़िया ने जन्म लिया था, भगवान ने नहीं- रवींद्र कालिया

Photo courtesy:  http://www.pacificnorthwestbirds.com/

गौरैया

रवींद्र कालिया

जेठ की उजली दुपहरी थी। पत्ता तक नहीं हिल रहा था। लू के थपेड़े, घने पेड़ों के बावजूद, बदन पर आग की लपटों की तरह लपलपा रहे थे। इस खौफनाक मौसम में बस एक ही राहत थी, गौरैया की मधुर आवाज। दोपहर के इस घनघोर सन्नाटे में उसकी आवाज पेड़-पौधों के ऊपर तितली की तरह थिरक रही थी।
इस आवाज के सम्मोहन में ही मैं बाहर बगिया में निकल आया था और पेड़ के नीचे पड़ी खटिया पर पसर गया था। गौरैया चुप हो जाती तो लगता, पूरी कायनात धू-धू जल रही है, अभी सब कुछ जल कर राख हो जायेगा। गौरैया बोलती तो लगता, अभी प्रलय बहुत दूर है। पृथ्वी पर जीवन के चिह्न बाकी हैं।

लगातार एक जिज्ञासा हो रही थी कि क्या कह रही है यह गौरैया? पृथ्वी के अन्य प्राणियों की तरह थोड़ी देर सुस्ता क्यों नहीं लेती? मैं उसकी आवाज को लिपिबद्ध भी करना चाहता था, मगर वर्णमाला में उपयुक्त वर्ण नहीं मिल रहे थे। काफी देर तक इस उधेड़बुन में लगा रहा, जब कोई नतीजा नहीं निकला तो मैंने यह कोशिश छोड़ दी और एक सीधा-सादा सरली करण स्वीकार कर लिया कि गौरैया 'हर हर महादेव' कह रही है, गायत्री मंत्र का पाठ कर रही है! वेद की किसी ऋचा को याद कर रही है। नहीं, यह सरासर बकवास है! यह तुम्हारे भीतर का हिन्दू बोल रहा है। दरअसल गौरैया कह रही है - अल्लाह-ओ-अकबर, नारा-ए-तकबीर...। अल्लाह अल्लाह की रट लगाए हुए है गौरैया। नहीं, चिड़िया कह रही है - वाह गुरूजी का खालसा, वाह गुरूजी की फतेह। खालिस्तान की माँग कर रही हैं यह गौरैया। ये सब गुमराह करने वाली बातें हैं।

वास्तव में वह अपने प्रेमी को पुकार रही है। थक गयी है, उसे बूटे-बूटे और पत्ते पत्ते पर खोज कर। अब निराश हो कर इसी पेड़ की किसी शाख पर बैठी है और उसे पुकार रही है। मालूम नहीं, कुछ खाया है कि नहीं। कहीं भूखी तो नहीं है यह गौरैया? कहीं आरक्षण के प्रश्न पर अनशन पर तो नहीं बैठ गयी? जानना जरूरी है कि कहीं आत्महत्या का निश्चय तो नहीं कर बैठी? उड़ते उड़ते कहीं से घल्लूघारा का नाम तो नहीं सुन आई? जब इनसानों के दिल में तरह तरह की खुराफातें जन्म ले रही हों तो ये पेड़ पौधे, जीव-जन्तु उससे कैसे निरपेक्ष रह सकते हैं। ये भी तो उसी वातावरण के अंग हैं, जहाँ लू से भी तेज चिलचिला रही है साम्प्रदायिकता, दुकानों-मकानों की छतों पर छोटी छोटी पताकाओं के रूप में फहरा रही है साम्प्रदायिकता, इश्तिहारों की शक्ल में दीवारों पर चस्पां कर दी गयी है साम्प्रदायिकता। इस जहरीले माहौल में यह नन्हीं सी गौरैया कैसे बेदाग रह सकती है। मगर इसकी आवाज सुन कर आभास होता है कि वह अभी इस संक्रमण से मुक्त है।
थोड़ी देर तक गौरैया की आवाज सुनाई नहीं दी। अचानक मेरी नजर खपरैल पर गयी तो मैंने देखा, गौरैया खपरैल के नीचे बल्ली पर बैठी है। न जाने कब से वह एक नन्हा-सा घोंसला बनाने में व्यस्त थी। इस वक्त भी उसकी चोंच में सूखी घास का एक तिनका था।
घास नहीं, यह रामशिला है। यह घोंसला नहीं, राममन्दिर के निर्माण में संलग्न है, सियाराममय सब जग जानी। अचानक मस्जिद से अजान के स्वर उठे तो मेरा ध्यान भंग हुआ। मैं भी जूनून में क्या क्या सोचता चला जा रहा था। मुझे याद आया, इस इमारत के ठीक पीछे मस्जिद है और सामने पीपल के पेड़ के नीचे हनुमानजी का मन्दिर। इस समय जहाँ मैं बैठा था, वहाँ से सामने देखने पर मन्दिर का कलश और पीछे देखने पर मस्जिद का गुम्बद दिखाई देता है। अगर मैं पूरब की तरफ मुँह करके बैठ जाऊँ तो कह सकता हूँ, बायें मन्दिर है और दायें मस्जिद। बीच में मेरा घर है। गौरैया ने भी बहुत समझदारी का परिचय देते हुए ठीक मन्दिर और मस्जिद के बीच अपने नीड़ के लिए स्थान चुना था। वरना कौन रोक सकता था इसे मन्दिर के किसी झरोखे अथवा मस्जिद के किसी वातायन में अपने लिए छह इंच जगह का जुगाड़ करने से। मगर नहीं, गौरैया धर्म के पचड़े में नहीं पड़ना चाहती। मैं देर तक उसे नीड़-निर्माण के कार्य में संलग्न देखता रहा। वह तिनके खोज कर लौटती, कुछ देर सुस्ताती, दो एक बार अपनी कोयल जैसी सुरीली कूक से सन्नाटा तोड़ कर ईंट गारा की तलाश में फिर गायब हो जाती। क्यों बना रही है वह अपने लिए एक सुंदर नीड़? अभी तक कहाँ रह रही थी? अपनी सुहाग की सेज तैयार कर रही है अथवा प्रसूति गृह का निर्माण, अनेक प्रश्न मन में उठ रहे थे।

अगले दिन सुबह देखा, उसका घोंसला बन कर तैयार था। अब वह बाकायदा इस घर की सदस्या हो गयी थी। अब उसका पता भी वही था, जो मेरा पता था। वह बेखटके अपने प्रेमी से पत्राचार कर सकती थी। अपना राशनकार्ड बनवा सकती थी। अपना वोट बनवा सकती थी अथवा पहचान पत्र। कुछ ही दिनों में मेरी उससे अच्छी खासी दोस्ती हो गयी। एक दिन तो रोशनदान पर आ बैठी और मुझे जवाब तलब कर लिया, आज बाहर क्यों नहीं आये। मेरे सामने बैठ कर सिगरेट क्यों नहीं फूँके।

'अच्छा बाबा आता हूँ, तुम राग शुरू करो। मैं आता हूँ।' मैंने कहा।
दरअसल उससे दोस्ती होने के बाद मेरा समय अच्छा बीत रहा था। अपनी एक सप्ताह की मित्रता में ही उसने मुझे राग-भैरवी से ले कर राग जै जैवन्ती तक सुना डाले।

मैंने महसूस किया, इसकी आवारागर्दी कुछ कम हो गयी है। हमेशा अपने नीड़ में नजर आती। एक दिन सुबह तो मैं खुशी से पागल हो गया, जब मैंने देखा, उसके अगल-बगल दो नन्हीं गौरैया और बैठी थीं। घर में उत्सव हो गया। नये सदस्यों का गर्मजोशी से स्वागत हुआ। घर जैसे सोहर गाने लगा : भए प्रगट कृपाला दीन दयाला कौशल्या हितकारी... बारो घी के दिये... सतगुरु नानक परगटिया...

गौरैया के बच्चे पूरे परिवार के सदस्यों के संरक्षण में पलने लगे। उनकी छोटी से छोटी हरकत पर चर्चा होती। एक दिन पता चला, गौरैया सुबह से गायब है और बच्चे अकेले पड़े हैं। दोपहर को बाहर गया तो देखा, गौरैया अभी तक नहीं लौटी थी।

दोनों बच्चे टुकुर-टुकुर मेरी ओर निहार रहे थे, जैसे माँ की शिकायत कर रहे हों। मैं उनकी मदद करना चाहता था, मगर समझ नहीं पा रहा था, इस वक्त इन्हें किस चीज की जरूरत है। शाम हो गयी, गौरैया नहीं लौटी। मैं चिन्तित हो उठा, क्या होगा इन बच्चों का? कौन कराएगा इन्हें भोजन? ये तो अभी उड़ान भी नहीं भर सकते। यह गनीमत थी कि गौरैया ने काफी ऊँचे स्थान पर अपना नीड़ बनाया था, वरना बिल्ली अब तक इन्हें डकार चुकी होती। मैंने कई बार बिल्ली को इन बच्चों की ओर हसरत भरी निगाहों से ताकते देखा था। बिल्ली थोड़ी देर उछल कूद भी मचाती थी, मगर ये बच्चे उसकी पहुँच के बाहर थे, थक हार कर वह लौट जाती।

गौरैया को नहीं आना था, नहीं आई। मैंने रात को भी कई बार टॉर्च जला कर देखा, दोनों बच्चे चुपचाप अकेले बैठे थे। शायद सोच रहे थे, कहाँ रह गयी उनकी माँ, कहीं रास्ता तो नहीं भटक गयी? वे कब तक भूखे प्यासे पड़े रहेंगे?
कल तक जिस गौरैया पर मुझे लाड़ आ रहा था, आज मैं उससे बेहद नाराज था। मैंने उसकी छवि एक ममतामयी माँ के रूप में देखी थी। मेरी कल्पना में भी नहीं था कि वह अपने नन्हें मुन्नों के प्रति इस कदर निर्दयता और क्रूरता दिखाएगी। इस समय मैं इतने क्रोध में था कि वह सामने पड़ जाती तो एक-दो झापड़ रसीद कर देता। ढाढ़स बँधाने के लिए मैंने बच्चों को पुकारा। अँधेरे में पुचकार सुन कर बच्चों ने पंख फड़फड़ाए। मैंने घोंसले में लाई चने के कुछ दाने फेंक दिए और आ कर खिन्न मन से लेट गया।

'अब सो जाओ चुपचाप। एक चिड़िया के पीछे पागल हो रहे हो।' पत्नी ने कहा, 'हो सकता है, वह बीच में किसी समय बच्चों को खिला पिला गयी हो।'
'नहीं, वह आई ही नहीं। बच्चे भूख से निढाल पड़े हैं।' मैंने पत्नी को बताया, 'घोंसले में लाई-चने डाल आया हूँ। शायद चुग लें।'

'जाओ, बोतल से दूध भी पिला आओ।' पत्नी ने व्यंग्य से कहा और करवट बदल ली।
'सब औरतें स्वार्थी होती हैं, गौरैया की तरह।' मैंने जलभुन कर जवाब दिया और आँखें मूँद लीं।
सुबह जब नींद खुली तो मैं आँख मलते हुए घोंसले की तरफ लपका। यह देख कर संतोष हुआ कि गौरैया दोनों बच्चों के बीच एक गर्वीली और समझदार माँ की तरह बैठी थी और बारी-बारी से दोनों बच्चों की चोंच में अपनी चोंच से कुछ खिला रही थी। मैं भी कुर्सी डाल कर बैठ गया और देर तक माँ बच्चों का लाड़-प्यार देखता रहा। बच्चों के प्रति आश्वस्त हो कर मैं भी अपने काम में व्यस्त हो गया। दोपहर होते होते गौरैया ने चहचहाना शुरू कर दिया और उसने पूरी बगिया जैसे सिर पर उठा ली। मगर मुझे मालूम नहीं था, दोपहर बाद मुझे एक और आघार मिलने वाला है।

शाम को जब बाहर निकला तो पाया, घोंसले से न केवल गौरैया गायब थी, बल्कि एक बच्चा भी लापता था। सहमी हुई छोटी गौरैया अकेली बैठी थी। मुझे आशंका हुई, कोई चील तो झपट्टा मार कर बच्चे को उठा कर नहीं ले गयी? मगर यह संभव नहीं लग रहा था। घोंसले के ऊपर खपरैल का रक्षा कवच था। चील की नजर ही नहीं पड़ सकती इस नीड़ पर। फिर कहाँ गयीं दोनों गौरैया? मुझे ज्यादा देर परेशान नहीं रहना पड़ा। छोटी गौरैया रबर प्लांट के नीचे बैठी थी। मैं उसकी ओर बढ़ा तो वह उड़ कर मुँडेर पर जा बैठी। वहाँ से उड़ान भर कर अनार के पेड़ पर उतर आई। वह रह-रह कर छोटी-छोटी उड़ाने भर रही थी। साफ लग रहा था, वह उड़ने का आनंद ले रही है, अपनी क्षमता से खुद ही रोमांचित हो रही है। प्रत्येक उड़ान में वह छोटा-सा सफर तय करती। फिर वह चिड़ियों के झुण्ड में शामिल हो गयी। उनके बीच वह राजकुमारी लग रही थी। चिड़िया चुग रही थीं और उनके बीच वह गर्दन उठाए बड़ी शान से बैठी थी, जैसे प्रत्येक चिड़िया को उसका संरक्षण प्राप्त हो।

'तुम भी कुछ चुग लो। तुम्हें क्या चुगना नहीं आता?' मैंने कहा, 'खुद खाओ और अपनी बहन को भी खिलाओ।'
गौरैया ने मेरी बात की ओर ध्यान नहीं दिया और जा कर घोंसले में स्थापित हो गयी। अब दोनों गौरैया सट कर बैठी थीं और एक दूसरे की ओर टकटकी लगा कर देख रही थीं। बड़ी गौरैया जैसे किसी मूक भाषा में अपनी प्रथम उड़ान का अनुभव बयान कर रही थी। अब वह भला घोंसले में क्यों बैठती, थोड़ी ही देर में वह वहाँ से फिर गायब हो गयी। अब माँ बेटी दोनों गायब थी। मैंने बहुत देर तक उनकी प्रतीक्षा की मगर दोनों का कुछ अता पता नहीं था।
'आवारा निकल गयी।' मैंने घोंसले में बैठी गौरैया की तरफ देखते हुए कहा, 'तुम्हारी माँ और बहन दोनों आवारा निकल गयीं। किसी का डर नहीं रहा उन्हें। दोनों आवारागर्दी पर निकली हुई हैं। अब लौट के आएँ तो बात मत करना उनसे। कुट्टी कर लेना। उन्हें देखते ही मुँह फेर लेना।'

देर रात तक दोनों गायब रहीं। मैं कुछ ऐसे परेशान हो रहा था जैसे पत्नी और बेटी घर से गायब हों। गौरैया की आवारागर्दी का तो मुझे एक रोज पहले ही आभास हो चुका था, उस नन्हीं गौरैया के व्यवहार से मैं बहुत क्षुब्ध था, जिसे पैदा हुए अभी जुम्मा-जुम्मा चार दिन भी न हुए थे।

'इसी को कहते हैं, पर निकलना। नये-नये पर निकले हैं न, इसी का गुमान है।' मैंने मन ही मन कहा। बाहर जा कर फिसड्डी गौरैया की भी खबर नहीं ली। गौरैया के पूरे खानदान से मेरी अनबन हो गयी थी।
सुबह तक फिसड्डी गौरैया के भी पंख निकल आये थे। वह अपने अकेलेपन से एकदम अनभिज्ञ थी, बल्कि लग रहा था अपने अकेलेपन से प्रसन्न है। वह बार-बार घोंसले से उतरती और रबर के चौड़े पत्ते पर बैठने की कोशिश करती, मगर ज्योंही पत्ते पर बैठती, पत्ता झुक जाता और वह फिसल जाती। हर बार वह गिरते-गिरते रह जाती। कुछ देर घोंसले में विश्राम करती और दुबारा इसी खेल में लग जाती।

'मूर्खा, पत्ते पर नहीं, डाल पर बैठो।' मैंने उससे कहा। उसने मेरा परामर्श नहीं माना और फिसलने का अपना खेल जारी रखा। दोपहर तक वह गमलों के बीच फुदकने लगी।

'लगता है इसके भी पर निकल आये हैं।' मैंने कहा।
वह जिस प्रकार निश्चिंततापूर्वक नीचे गमलों के बीच चहलकदमी कर रही थी, मुझे लगा, इसे बिल्ली का शिकार बनते देर न लगेगी। मैं देर तक उसकी रखवाली करता रहा। न उसे अपनी चिन्ता थी, न माँ-बहन को उसकी चिन्ता। इन चिड़ियों को मुफ्त का चौकीदार जो मिल गया था। मैं बुदबुदाया। जब तक वह घोंसले में नहीं लौट गयी, मैं बगिया में बैठा रहा। मन ही मन मैंने तय कर लिया था, इन चिड़ियों पर और समय नष्ट नहीं करूँगा। नादानी और बेवफाई इनकी रग रग में भरी है। पहले ये अपनी आवाज से रिझाती हैं, हरकतों से सम्मोहित करती हैं, उसके बाद पर निकलते ही बेवफाई पर आमादा हो जाती है। मैंने तय किया आज दोपहर को बाहर नहीं जाऊँगा।

शाम को हस्बेमामूल जब मैं निकला तो देखा, घोंसला खाली पड़ा था। उसमें चिरई का पूत भी नहीं था। मैंने तमाम पेड़-पौधों पर नजर दौड़ाई, पत्ता, बूटा बूटा छान मारा, गौरैया परिवार का नाम निशान नहीं था। मुझे ज्यादा आघात नहीं लगा, क्योंकि मैं मानसिक रूप से अपने को तैयार कर चुका था कि यह अन्तिम गौरैया भी मुझे धता बता कर गायब होने वाली है। मैंने राहत की साँस ली और फूलों पर मँडराती तितलियों का नृत्य देखने लगा। बीच-बीच में मैं गमलों के बीच भी निगाह दौड़ा लेता कि कहीं कोई गौरैया मुझसे लुकाछिपी न खेल रही हो। थोड़ी देर बाद मेरी दृष्टि मन्दिर के कलश पर पड़ी तो मैं देखता रह गया। गौरैया का पूरा परिवार वहाँ बैठा था - निर्द्वंद्व! निश्चिन्त! प्रसन्न। थोड़ी थोड़ी देर में उनकी चोंच-से-चोंच मिलती और अलग हो जाती। उनकी आजादी से मुझे ईर्ष्या हो रही थी। तीनों अत्यंत मौज मस्ती में वहाँ बैठी पिकनिक मनाती रहीं।
पत्नी पास से गुजरी तो मैंने उसे रोक लिया, 'वह देखो, छोटा परिवार सुखी परिवार। तीनों आजाद पंछी की तरह इत्मीनान से मन्दिर के कलश पर बैठी हैं।'

'कितना अच्छा लग रहा है, तीनों को एक साथ देख कर।'
'जानती हो, मन्दिर के कलश पर क्यों बैठी हैं?'
'क्यों बैठी हैं?'
'क्योंकि इन्होंने एक हिन्दू के घर जन्म लिया है। कुछ संस्कार जन्मजात होते हैं। यह अकारण नहीं है कि विश्राम के लिए इन्होंने मन्दिर को चुना है।'

'फितूर भर लिया है तुम्हारे दिमाग में।' पत्नी बिफर गयी, 'अभी थोड़ी देर पहले मैंने देखा था, तीनों मस्जिद के गुम्बद पर बैठी थीं। अजान के स्वर उठे तो मन्दिर पर जा बैठीं। लाउड-स्पीकर का कमाल है यह।'
मैं निरुत्तर हो गया। मन्दिर में आरती शुरू हुई तो तीनों अलग अलग दिशा में उड़ गयीं। थोड़ी देर बाद तीनों बगिया में उतर आईं। उस दिन से आज दिन तक उन्होंने घोंसले की तरफ मुड़ कर भी न देखा था।
बहरहाल, गौरैया मुझे भूली नहीं। दिन में एक-दो बार बगिया में दिखाई दे जातीं, कभी एक और कभी तीनों। मैं अक्सर सोचता हूँ, क्या जन्मभूमि का आकर्षण खींच लाता है इन्हें यहाँ? जन्मभूमि नाम से ही मुझे दहशत होने लगी। मगर मुझे विश्वास है, यहाँ फसाद की कोई आशंका नहीं हैं, क्योंकि यहाँ एक चिड़िया ने जन्म लिया था, भगवान ने नहीं।


Feb 22, 2016

किसी को सचमुच बाहर निकालना हो, तो उसका घर तोड़ देना चाहिए


दो गौरैया



भीष्म साहनी
घर में हम तीन ही व्यक्ति रहते हैं-माँ, पिताजी और मैं। पर पिताजी कहते हैं कि यह घर सराय बना हुआ है। हम तो जैसे यहाँ मेहमान हैं, घर के मालिक तो कोई दूसरे ही हैं।

आँगन में आम का पेड़ है। तरह-तरह के पक्षी उस पर डेरा डाले रहते हैं। जो भी पक्षी पहाड़ियों-घाटियों पर से उड़ता हुआ दिल्ली पहुँचता है, पिताजी कहते हैं वही सीधा हमारे घर पहुँच जाता है, जैसे हमारे घर का पता लिखवाकर लाया हो। यहाँ कभी तोते पहुँच जाते हैं, तो कभी कौवे और कभी तरह-तरह की गौरैयाँ। वह शोर मचता है कि कानों के पर्दे फट जाएँ, पर लोग कहते हैं कि पक्षी गा रहे हैं!

घर के अंदर भी यही हाल है। बीसियों तो चूहे बसते हैं। रात-भर एक कमरे से दूसरे कमरे में भागते फिरते हैं। वह धमा-चौकड़ी मचती है कि हम लोग ठीक तरह से सो भी नहीं पाते। बर्तन गिरते हैं, डिब्बे खुलते हैं, प्याले टूटते हैं। एक चूहा अँंगीठी के पीछे बैठना पसंद करता है, शायद बूढ़ा है उसे सर्दी बहुत लगती है। एक दूसरा है जिसे बाथरूम की टंकी पर चढ़कर बैठना पसंद है। उसे शायद गर्मी बहुत लगती है। बिल्ली हमारे घर में रहती तो नहीं मगर घर उसे भी पसंद है और वह कभी-कभी झाँक जाती है। मन आया तो अंदर आकर दूध पी गई, न मन आया तो बाहर से ही ‘फिर आऊँगी’ कहकर चली जाती है। शाम पड़ते ही दो-तीन चमगादड़ कमरों के आर-पार पर फैलाए कसरत करने लगते हैं। घर में कबूतर भी हैं। दिन-भर ‘गुटर-गूँ, गुटर-गूँ’ का संगीत सुनाई देता रहता है। इतने पर ही बस नहीं, घर में छिपकलियाँ भी हैं और बर्रे भी हैं और चींटियों की तो जैसे फ़ौज ही छावनी डाले हुए है।

अब एक दिन दो गौरैया सीधी अंदर घुस आईं और बिना पूछे उड़-उड़कर मकान देखने लगीं। पिताजी कहने लगे कि मकान का निरीक्षण कर रही हैं कि उनके रहने योग्य है या नहीं। कभी वे किसी रोशनदान पर जा बैठतीं, तो कभी खिड़की पर। फिर जैसे आईं थीं वैसे ही उड़ भी गईं। पर दो दिन बाद हमने क्या देखा कि बैठक की छत में लगे पंखे के गोले में उन्होंने अपना बिछावन बिछा लिया है, और सामान भी ले आईं हैं और मजे से दोनों बैठी गाना गा रही हैं। जाहिर है, उन्हें घर पसंद आ गया था।

माँ और पिताजी दोनों सोफे पर बैठे उनकी ओर देखे जा रहे थे। थोड़ी देर बाद माँ सिर हिलाकर बोलीं, "अब तो ये नहीं उड़ेंगी। पहले इन्हें उड़ा देते, तो उड़ जातीं। अब तो इन्होंने यहाँ घोंसला बना लिया है।"

इस पर पिताजी को गुस्सा आ गया। वह उठ खड़े हुए और बोले, "देखता हूँ ये कैसे यहाँ रहती हैं! गौरैयाँ मेरे आगे क्या चीज हैं! मैं अभी निकाल बाहर करता हूँ।"

"छोड़ो जी, चूहों को तो निकाल नहीं पाए, अब चिड़ियों को निकालेंगे!" माँ ने व्यंग्य से कहा।

माँ कोई बात व्यंग्य में कहें, तो पिताजी उबल पड़ते हैं वह समझते हैं कि माँ उनका मजाक उड़ा रही हैं। वह फौरन उठ खड़े हुए और पंखे के नीचे जाकर जोर से ताली बजाई और मुँह से ‘श-----शू’ कहा, बाँहें झुलाईं, फिर खड़े-खड़े कूदने लगे, कभी बाहें झुलाते, कभी ‘श---शू’ करते।

गौरैयों ने घोंसले में से सिर निकालकर नीचे की ओर झाँककर देखा और दोनों एक साथ ‘चीं-चीं करने लगीं। और माँ खिलखिलाकर हँसने लगीं।

पिताजी को गुस्सा आ गया, इसमें हँसने की क्या बात है?

माँ को ऐसे मौकों पर हमेशा मजाक सूझता है। हँसकर बोली, चिड़ियाँ एक दूसरी से पूछ रही हैं कि यह आदमी कौन है और नाच क्यों रहा है?

तब पिताजी को और भी ज्यादा गुस्सा आ गया और वह पहले से भी ज्यादा ऊँचा कूदने लगे। गौरैयाँ घोंसले में से निकलकर दूसरे पंखे के डैने पर जा बैठीं। उन्हें पिताजी का नाचना जैसे बहुत पसंद आ रहा था। माँ फिर हँसने लगीं, "ये निकलेंगी नहीं, जी। अब इन्होंने अंडे दे दिए होंगे।"

"निकलेंगी कैसे नहीं?" पिताजी बोले और बाहर से लाठी उठा लाए। इसी बीच गौरैयाँ फिर घोंसले में जा बैठी थीं। उन्होंने लाठी ऊँची उठाकर पंखे के गोले को ठकोरा। ‘चीं-चीं’ करती गौरैयाँ उड़कर पर्दे के डंडे पर जा बैठीं।

"इतनी तकलीफ़ करने की क्या जरूरत थी। पंखा चला देते तो ये उड़ जातीं।" माँ ने हँसकर कहा।

पिताजी लाठी उठाए पर्दे के डंडे की ओर लपके। एक गौरैया उड़कर किचन के दरवाज़े पर जा बैठी। दूसरी सीढ़ियों वाले दरवाज़े पर।

माँ फिर हँस दी। "तुम तो बड़े समझदार हो जी, सभी दरवाज़े खुले हैं और तुम गौरैयों को बाहर निकाल रहे हो। एक दरवाज़ा खुला छोड़ो, बाकी दरवाज़े बंद कर दो। तभी ये निकलेंगी।"

अब पिताजी ने मुझे झिड़ककर कहा, "तू खड़ा क्या देख रहा है? जा, दोनों दरवाज़े बंद कर दे!"

मैंने भागकर दोनों दरवाज़े बंद कर दिए केवल किचन वाला दरवाज़ा खुला रहा।

पिताजी ने फिर लाठी उठाई और गौरैयों पर हमला बोल दिया। एक बार तो झूलती लाठी माँ के सिर पर लगते-लगते बची। चीं-चीं करती चिड़ियाँ कभी एक जगह तो कभी दूसरी जगह जा बैठतीं। आखिर दोनों किचन की ओर खुलने वाले दरवाज़े में से बाहर निकल गईं। माँ तालियाँ बजाने लगीं। पिताजी ने लाठी दीवार के साथ टिकाकर रख दी और छाती फैलाए कुर्सी पर आ बैठे।

"आज दरवाज़े बंद रखो" उन्होंने हुक्म दिया। "एक दिन अंदर नहीं घुस पाएँगी, तो घर छोड़ देंगी।"

तभी पंखे के ऊपर से चीं-चीं की आवाज सुनाई पड़ी। और माँ खिलखिलाकर हँस दीं। मैंने सिर उठाकर ऊपर की ओर देखा, दोनों गौरैया फिर से अपने घोंसले में मौजूद थीं।


"दरवाज़े के नीचे से आ गई हैं," माँ बोलीं।

मैंने दरवाज़े के नीचे देखा। सचमुच दरवाज़ों के नीचे थोड़ी-थोड़ी जगह खाली थी।

पिताजी को फिर गुस्सा आ गया। माँ मदद तो करती नहीं थीं, बैठी हँसे जा रही थीं।

अब तो पिताजी गौरैयों पर पिल पड़े। उन्होंने दरवाज़ों के नीचे कपड़े ठूँस दिए ताकि कहीं कोई छेद बचा नहीं रह जाए। और फिर लाठी झुलाते हुए उन पर टूट पड़े। चिड़ियाँ चीं-चीं करती फिर बाहर निकल गईं। पर थोड़ी ही देर बाद वे फिर कमरे में मौजूद थीं। अबकी बार वे रोशनदान में से आ गई थीं जिसका एक शीशा टूटा हुआ था।

"देखो-जी, चिड़ियों को मत निकालो" माँ ने अबकी बार गंभीरता से कहा, "अब तो इन्होंने
अंडे भी दे दिए होंगे। अब ये यहाँ से नहीं जाएँगी।"

क्या मतलब? मैं कालीन बरबाद करवा लूँ? पिताजी बोले और कुर्सी पर चढ़कर रोशनदान में कपड़ा ठूँस दिया और फिर लाठी झुलाकर एक बार फिर चिड़ियों को खदेड़ दिया। दोनों पिछले आँगन की दीवार पर जा बैठीं।

इतने में रात पड़ गई। हम खाना खाकर ऊपर जाकर सो गए। जाने से पहले मैंने आँगन में झाँककर देखा, चिड़ियाँ वहाँ पर नहीं थीं। मैंने समझ लिया कि उन्हें अक्ल आ गई होगी। अपनी हार मानकर किसी दूसरी जगह चली गई होंगी।

दूसरे दिन इतवार था। जब हम लोग नीचे उतरकर आए तो वे फिर से मौजूद थीं और मजे से बैठी मल्हार गा रही थीं। पिताजी ने फिर लाठी उठा ली। उस दिन उन्हें गौरैयों को बाहर निकालने में बहुत देर नहीं लगी।

अब तो रोज़ यही कुछ होने लगा। दिन में तो वे बाहर निकाल दी जातीं पर रात के वक्त जब हम सो रहे होते, तो न जाने किस रास्ते से वे अंदर घुस आतीं।

पिताजी परेशान हो उठे। आखिर कोई कहाँ तक लाठी झुला सकता है? पिताजी बार-बार कहें, "मैं हार मानने वाला आदमी नहीं हूँ।" पर आखिर वह भी तंग आ गए थे। आखिर जब उनकी सहनशीलता चुक गई तो वह कहने लगे कि वह गौरैयों का घोंसला नोचकर निकाल देंगे।
और वह पफ़ौरन ही बाहर से एक स्टूल उठा लाए।

घोंसला तोड़ना कठिन काम नहीं था। उन्होंने पंखे के नीचे फर्श पर स्टूल रखा और लाठी लेकर स्टूल पर चढ़ गए। "किसी को सचमुच बाहर निकालना हो, तो उसका घर तोड़ देना चाहिए," उन्होंने गुस्से से कहा।

घोंसले में से अनेक तिनके बाहर की ओर लटक रहे थे, गौरैयों ने सजावट के लिए मानो झालर टाँग रखी हो। पिताजी ने लाठी का सिरा सूखी घास के तिनकाें पर जमाया और दाईं ओर को खींचा। दो तिनके घोंसले में से अलग हो गए और फरफराते हुए नीचे उतरने लगे।

"चलो, दो तिनके तो निकल गए," माँ हँसकर बोलीं, "अब बाकी दो हजार भी निकल जाएँगे!"

तभी मैंने बाहर आँगन की ओर देखा और मुझे दोनों गौरैयाँ नजर आईं। दोनों चुपचाप दीवार पर बैठी थीं। इस बीच दोनों कुछ-कुछ दुबला गई थीं, कुछ-कुछ काली पड़ गई थीं। अब वे चहक भी नहीं रही थीं।

अब पिताजी लाठी का सिरा घास के तिनकों के ऊपर रखकर वहीं रखे-रखे घुमाने लगे। इससे घोंसले के लंबे-लंबे तिनके लाठी के सिरे के साथ लिपटने लगे। वे लिपटते गए, लिपटते गए, और घोंसला लाठी के इर्द-गिर्द खिंचता चला आने लगा। फिर वह खींच-खींचकर लाठी के सिरे के इर्द-गिर्द लपेटा जाने लगा। सूखी घास और रूई के फाहे, और धागे और थिगलियाँ लाठी के सिरे पर लिपटने लगीं। तभी सहसा जोर की आवाज आई, "चीं-चीं, चीं-चीं!!!"

पिताजी के हाथ ठिठक गए। यह क्या? क्या गौरैयाँ लौट आईं हैं? मैंने झट से बाहर की ओर देखा। नहीं, दोनों गौरैयाँ बाहर दीवार पर गुमसुम बैठी थीं।

"चीं-चीं, चीं-चीं!" फिर आवाज आई। मैंने ऊपर देखा। पंखे के गोले के ऊपर से नन्हीं-नन्हीं गौरैयाँ सिर निकाले नीचे की ओर देख रही थीं और चीं-चीं किए जा रही थीं। अभी भी पिताजी के हाथ में लाठी थी और उस पर लिपटा घोंसले का बहुत-सा हिस्सा था। नन्हीं-नन्हीं दो गौरैयाँ! वे अभी भी झाँके जा रही थीं और चीं-चीं करके मानो अपना परिचय दे रही थीं, हम आ गई हैं। हमारे माँ-बाप कहाँं हैं?

मैं अवाक् उनकी ओर देखता रहा। फिर मैंने देखा, पिताजी स्टूल पर से नीचे उतर आए हैं। और घोंसले के तिनकों में से लाठी निकालकर उन्होंने लाठी को एक ओर रख दिया है और चुपचाप कुर्सी पर आकर बैठ गए हैं। इस बीच माँ कुर्सी पर से उठीं और सभी दरवाजे खोल दिए। नन्हीं चिड़ियाँ अभी भी हाँफ-हाँफकर चिल्लाए जा रही थीं और अपने माँ-बाप को बुला रही थीं।

उनके माँ-बाप झट-से उड़कर अंदर आ गए और चीं-चीं करते उनसे जा मिले और उनकी नन्हीं-नन्हीं चोंचों में चुग्गा डालने लगे। माँ-पिताजी और मैं उनकी ओर देखते रह गए। कमरे में फिर से शोर होने लगा था, पर अबकी बार पिताजी उनकी ओर देख-देखकर केवल मुसकराते रहे।

 भीष्म साहनी
दुधवा लाइव डेस्क 

Feb 20, 2016

गौरैया की घर वापसी- एक संकल्प



दुधवा लाइव का गौरैया बचाओं जनअभियान जिसमें आपकी भागीदारी महत्वपूर्ण हैं।

होली का तीसरा दिन था साल 2010 का, मैं जयपुर से लौट रहा था, तभी छत्तीसगढ़ से मेरे एक परिचित का फोन आया की एक अखबार में रवीश कुमार ने आपके दुधवा लाइव पर गौरैया से सम्बंधित लेख पर संपादकीय लिखा है, फिर क्या मेरे जनपद खीरी से तमाम फोन आने लगे की क्या तैयारी है इस नन्ही चिड़िया की घर वापसी के लिए। मेरे पक्षियों पर किए गए शोध व् वन्यजीवन के प्रति प्रेम पर लोगों की यह अपेक्षा एक उत्साह भर गयी नतीजतन मैंने निर्णय लिया की पक्षी सरंक्षण की मुहिम हम अपने जनपद से शुरू करेंगे, और ऐसा ही हुआ लोगों का साथ मिलता गया और इस कारवाँ ने खीरी से निकल कर आसपास के जनपदों से गुजरता हुआ पूरे भारत की फेरी लगा ली।


अखबार, पत्रिकाओं, आल इण्डिया रेडियो और टेलीविजन में दुधवा लाइव द्वारा आयोजित की गयी गोष्ठियों, सेमीनार और गाँवों में गौरैया सरंक्षण के लिए जनसम्पर्क को प्रकाशित व् प्रसारित किया गया, आखिरकार लोग अपने घरों की छतों पर पानी दाना रखने लगे और गौरैया लोगों के घरों और दिलों में फिर से वापसी करने लगी। बस यही सफलता थी हम सब की जिन्होंने इस नन्ही चिड़िया को सरंक्षित करने के संकल्प में हमारा साथ दिया। पत्रकारिता जगत के लोग, स्वयंसेवी संस्थाएं और जिन सभी साथियों का सहयोग मिला उन सभी को साधुवाद।


सन 2010 को हम सबने गौरैया वर्ष घोषित किया। और जनपद में गौरैया ग्राम व् गौरैया मित्र बनाये गए, गौरैया के लिए कौन सी माकूल परिस्थितियों को बनाया जाए ताकि वह फिर हमारें घर आँगन में लौट सके इसके उपाय जनमानस में बतलाए गए और अंतत: गौरैया लौट आई...

इन विगत 6 वर्षों में लोगों का ध्यान इस चिड़िया की तरफ खींचने में हम सफल हुए। गर्मियों की शुरुवात है और इस नन्ही चिड़िया का घरौंदे बनाने का वक्त आ रहा है, बस इसे हम इसका घर बनाने की थोड़ी जगह दे दे, सुरक्षा दें, और यह अपने चूजों को पाल सके इसलिए वह विषहीन हरियाली दे जहाँ तमाम कीड़ें और उनके लार्वा भी अपना जीवन चक्र सफलता से चला सकें, क्योंकि यह चिड़िया अपने नन्हे चूजों को कठोर अनाज नही खिला सकती। जाहिर है हम अपने घरों के पास देशी प्रजातियों के पौधे, बेले लगाएं और ज्यादातर कुकरबिटेशी फैमिली की बेलें जिन पर तमाम कीड़ों की प्रजातियां भी फल फूल सकें जो इन परिंदों का भोजन है। कुल मिलाकर एक समृद्ध जैवविविधिता जहाँ एक अखंडित भोजन चक्र अनवरत चलता रहे।


इस वर्ष भी विगत वर्षों की तरह हम गौरैया सरंक्षण के लिए जागरूकता अभियान चला रहे हैं, ये प्रयास होगा की हम प्रकृति और इसमें बसने वाली सभी सहचर प्रजातियों के प्रति संवेदनशील व् सहिष्णु बने। ताकि धरती पर वाकई वसुधैव कुटुम्बकम् की परिकल्पना को स्थापित किया जा सके।


गौरैया जो हमारे घरों की मेहमान हुआ करती थी बेटी की तरह, उसे फिर से बुला ले, ताकि वो मिठास भरी चहक, वो उसका फड़फड़ा कर उड़ना, और बच्चों के लिए उनकी उड़ने वाली सहेली फिर से ज़ाहिर हो सके ये सब हमारे बीच। गौरैया सिर्फ एक चिड़िया नही है, वो हमारी मानव सभ्यता का एक अंग है, और प्रकृति में हमारे गाँव व् शहरों में स्वस्थ्य वातावरण की सूचक भी है। चलो उसे फिर से उसी आदर से बुलाते हैं अपने घरों में ताकि प्रकृति की यह खूबसूरत कृति हमारे साथ साथ रह सके। 


सन 2010 में हमने शुरुवात की थी लखीमपुर खीरी जनपद से, तराई का यह हरा भरा भूभाग जहाँ नदी, जंगल, मैदान, गाँव और शहर सभी कुछ सरोबार है प्रकृति की सुंदरता से, फिर भी कुछ घट रहा है, सम्पूर्णता में तमाम दाग लग रहे है, जाहिर है प्रकृति का दोहन अनवरत जारी है, नतीजतन तमाम जंगल नष्ट हुए, प्रजातियां प्रभावित हुई, नदियां सिकुड़ गयी और मैदान ख़त्म हो गए, बाग़ बगीचे उजड़ गए, गाँव शहर हर जगह कंक्रीट का बोलबाला हो गया, नतीजतन इस बदले हुए परिवेश में न जाने कितने साथी जो मानव सभ्यता में उसके साथ रहते आये वो या तो नष्ट हो गए या पलायन कर गए और जो बचे वह मानव के इस कथित विकास की बलिबेदी पर दम तोड़ रहे हैं।



कहते हैं बदलती चीजों को एकाएक नही रोका जा सकता किन्तु इस बदलाव की रफ़्तार में भी हम उन्हें भी अपने साथ लेकर ज़रूर चलने की कोशिश कर सकते हैं जो सदियों से हमारे साथ हैं और मानव सभ्यता उनसे लाभ लेती आई हैं आज वो प्रासंगिक नही रहे तो हम उन्हें उनके हाल पर छोड़ चुके है, यकीनन यह अत्याचार है और मानवीय मूल्यों के विपरीत भी। घोड़ा हाथी कुत्ता कबूतर गौरैया गाय न जाने कितने जीव हैं जिन्हें सदियों पहले जंगल से निकलते वक्त इंसान अपने साथ लेकर चला, गाँव तक, क़स्बे तक, शहर तक, पर तकनीकी दौर में अनियोजित विकास की पगडंडी पर इन्हें वह पीछे छोड़ आया है, यह कहना कितना मुनासिब होगा की इंसान इसकी कितनी कीमत चुकाएगा पर यह निश्चित है की मानव इसकी कीमत चूका रहा है और भविष्य में चुकाएगा भी, प्रकृति से दूर होने के मानसिक अवसाद और गंभीर बीमारियों के तौर पर, छिन्न भिन्न होती जैवविविधिता एक गहरा लाल प्रभाव छोड़ रही है मानवता पर, फिर भी हम प्रकृति का हिस्सा होकर खुद को प्रकृति से अलाहिदा कर रहे है।


चिड़िया जंगल लगाती हैं, बीजों के प्रकीर्णन द्वारा, किसी फल को खाकर जब अपनी पाचन प्रक्रिया के पूर्ण होने के बाद बीट में वे बीज इधर उधर छोड़ती हैं तो वे बीज अंकुरित होते है और फिर वृक्ष बनते हैं, पीपल बरगद इसके बेहतर उदाहरण हैं।


ये गौरैया हमारे घरो से दूर हुई तो इसने यह बताने की कोशिश जरूर की होगी की अब यह जगह रहने लायक नही, लेकिन हमने उसकी आवाज नही सूनी, उसने कहा होगा की अब इस घर या गाँव या शहर में जहरीले रासायनिक तत्वों की तादाद बढ़ चुकी, कैंसर जैसी बीमारी पैदा करने वाले तत्व लेड आर्सेनिक जैसे तत्व बढ़ गए हैं, इसने कहा होगा की यहाँ पानी अशुद्ध हो गया है डिटर्जेंट, रासायनिक उर्वरक, डीडीटी, और जहरीले कीटनाशकों से, इसने ये भी बताया होगा की हमारे मित्र कीट भी नष्ट हो गए है हमारी फसलों से रसायन के इस्तेमाल से, और एक बड़ी कायदे की बात कही होगी इसने की तुम इंसान सामुदायिक स्नेह खो चुके हो, तुमने घर के बीच मौजूद बड़े से आँगन के कई टुकड़े कर दिए दीवारें उठाकर, तुमने चौकठे भी बाँट ली, और अब तुम छोटी छोटी कोठरियों में रहने लगे जहाँ रोशनी भी ठीक से नही आती, तंग गलियों और बड़े से दालान के बजाए सड़क पर आ गए, इसने जरूर ये बातें भरे मन से कही होंगी की जब तुम इंसानों ने दहलीजों को बाँट डाला, दालानों, आँगन के टुकड़े कर दिए तो फिर कैसे रखोगे हमारे जैसे मेहमान को जिसमें खुले आसमान में उड़ने की कशिश है, संकरे आशियाने और संकरे दिलों में मेहमान नही बसा करते----


इस नन्ही चिड़िया की इस व्यथा को हम भांप लेते तो यह जरूर हमारे घरों में आज भी आती। अभी भी वक्त हैं प्रकृति के इस हरकारे का सन्देश अगर हम सुन समझ ले तो मानव सभ्यता की तमाम दुश्वारियां ख़त्म हो जाए।

प्रकृति हमेशा हमें सन्देश देती है पर हम अपनी बेजा ख्वाइशों की चीख चिल्लहाट में उसे नजरअंदाज कर देते हैं। 


बस इसी कोशिश में हम हैं की हम इस नन्ही चिड़िया को दुबारा अपने घरों में बुलाए। और इसके लिए हमें उसे वो माहौल देना होगा जो हमारे लिए भी उतना ही मुफीद है जितना उस परिंदे के लिए।



कृष्ण कुमार मिश्र, 

संस्थापक सम्पादक- दुधवा लाइव सामुदायिक संगठन व् पत्रिका।

Feb 16, 2016

Bittu Sahgal Raises Conservation Concerns With U.P. Chief Minister




On February 11, 2016, Sanctuary’s Editor Bittu Sahgal wrote to Uttar Pradesh Chief Minister Shri. Akhilesh Yadav requesting him to look into a number of issues that plague Uttar Pradesh’ only Tiger Reserve – Dudhwa.
This grainy image shows one of the tiger cubs stranded on a village roof, surrounded by dogs. The cub has disappeared since.
Shri Akhilesh Yadav
Hon'ble Chief Minister
5, Kalidas Marg,
Lucknow, Uttar Pradesh
Dear Sir,
My late friend Billy Arjan Singh, the driving force behind the notification of your state's celebrated Dudhwa Tiger Reserve, loved Uttar Pradesh's forests dearly. It was through him that I too came to appreciate the wonderful wilderness of U.P. It is thus with great sorrow that I write to you on a number of concerns. Your initiatives towards wildlife conservation are well known and appreciated and I trust that you will look into and settle these matters urgently to the benefit of wild nature.
District Magistrate, Lakhimpur Kheri
Several reliable sources have written to me with concern that the DM of Lakhimpur Kheri has been entering into the Kishanpur Wildlife Sanctuary of the Dudhwa Tiger Reserve after hours, and often with guests. The Bel Danda area in particular was of major concern as it was the territory of a tigress with four young cubs. As reported by the forest staff, their attempts to control the situation were dismissed, and the night visits stretched to the extent that the disturbed tigress was seen moving her cubs into the sugarcane fields that lie adjacent to the reserve. This placed the entire family at great risk. Tigresses are heavily invested in the success of their cubs and will do everything in their power to bring them up safely to adulthood. Unfortunately, displaced from their 'nursery' into a human-dominated landscape, this tiger family has met a horrific end. One cub was found dead on January 4, 2016. Another cub was found stranded on the terrace of a house in Tanda village surrounded by stray dogs. Though the forest staff managed to chase the dogs away and allow the young tiger to escape into the forest, the cub has vanished since. Similarly, the tigress and the remaining two cubs have disappeared. By all accounts the forest staff is highly demotivated by the actions of the DM, but still continue their search for the missing tigers.
Kindly ask the Chief Wildlife Warden and the NTCA to investigate the matter and if found true, disciplinary action needs to be taken immediately.
Unregulated and Rowdy Tourism in the Reserve
A member of the Sanctuary Asia team visited the Dudhwa Tiger Reserve in the first week of January this year. Her first-hand report on the tourism at the reserve was extremely disconcerting. With no limit to the number of vehicle entries into the park, she found absolute chaos inside the park. The government licensed guides were unable to keep a check on tourist behaviour, which included urinating, littering, and screaming loudly inside the reserve.
Encroachments into the Sathiana Range
This range includes sprawling grasslands that provide breeding grounds for the critically endangered Bengal Florican. Unfortunately, my team member witnessed for herself the extreme encroachments into the range. Just metres from the RFO's checkpost, she saw villagers lopping wood. This scene repeated itself four times in a span of three hours. The encroachers seemed to have little fear of being caught or reprimanded. This easy entrance into a Protected Area raises immense concerns about the safety of wildlife in the park.
Problems in the Katarniaghat Wildlife Sanctuary
The beautiful Katarniaghat Wildlife Sanctuary seems to be suffering from mismanagement. A large tourist complex has been built on the banks of the Girwa river in the likes of a cantonment area. The staff that operate the tourist activity from here, in this case boat rides, are inefficient and rude. Plastic bottles were observed in the sandbanks of the river near basking gharials, the boats were dilapidated and leaking diesel, and there was no communication on the biodiversity of the area from any of the staff. In addition, a captive population of gharial hatchlings is kept in this tourist complex. However, there is no caretaker present to inform the tourists about the programme, and ensure that tourists do not harass the hatchlings. Similar to the Sathiana range, blatant encroachments were noticed in the sanctuary.
Uttar Pradesh hosts some of the most spectacular tracts of the terai landscape, and is blessed with an abundance of wildlife. Your initiatives, such as the recently concluded Bird Fair and the notification of the Pilibhit Tiger Reserve are proof of your deep interest and concern for the natural heritage of the state. With the correct guidance and expert management, I have no doubt that U.P. can become a model state for wildlife conservation and ecotourism practices. However, if these issues are not addressed urgently, I fear that the future of U.P's wilds will come undone.
May I request an audience with you to discuss conservation management in the state? My team and I are at your disposal to ensure that U.P emerges as a leader in the conservation realm. It will be my honour and privilege to bring a group of experts together to secure the state's natural heritage.


Yours sincerely,
Bittu Sahgal
Editor, Sanctuary Asia





Corresponding person: Cara Tejpal, Assistant Editor- Sanctuary Asia, email: cara@sanctuaryasia.com 

Feb 12, 2016

एच.इ.सी. यानी विकास का मकबरा


   -बरखा लकड़ा
किसी भी देश राज्य का विकास के लिए आर्थिक विकास का होना जरूरी हैं, और आर्थिक विकास के लिए औद्योगिक विकास का होना। ये कुछ हद तक सत्य हैं, कि औद्योगिक विकास से ही आर्थिक विकास संम्भव हैं। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री श्री जवाहर लाल नेहरू जिन्हें भारत के आधुनिक विकास का जनक कहा जाता हैं। उन्होंने राज्य के विकास के लिए 1960 में एचइसी- हैवी एंजिनियरिंग कारपोरेशन, की स्थापना झारखंड जैसेे पिछड़े इलाके राॅची जिले में की थी। ताकि  आदिवासियों मूलवासियों को विकास की मुख्यधारा में लाया जा सके।  अब सवाल ये उठता है कि विकास किसका. औद्योगिक घरानों का या फिर राज्य की जनता. या फिर उन विस्थापितों का जिन्होंने राष्ट् के विकास के नाम पर अपनी जमीन खुले दिल से दे दी. इतना बड़ा दिल और मन कि आज की तारीख में उस देने वाली सभ्यता का कोई मुकाबला नहीं है. जहां केवल जमीन लेने वालों की केवल फौज खड़ी हो. सदियों पुराना अपनी पारम्परिक, ऐतिहासिक जमींन जो कभी हमारे पुरखे अपनी मेहनत से जंगल-झाड़, पहाड़- पर्वत को काटकर घर-आंगन, खेत- खलियान एंव पूजा- स्थल बनाया। आज इसी जमीन का सौदाकरण हो रहा है। जमीन के असली मालिक को दूध में मक्खी की तरह निकाल कर फंेका जा रहा हैं। इतना ही नहीं एचइसी द्वारा अधिग्रहीत जमींन में आदिवासियों का 30 सरना स्थल खत्म हो रहा हैं। पर सरकार को उन आदिवासियों की आस्था की परवाह नहीं हैं। क्या आदिवासियों को आस्था के साथ जीवन जीने का अधिकार नहीं हैं। इसी जगह मन्दिर होता तो आस्था का खयाल रखकर मन्दिर के लिए जमींन छोड़ दी जाती। झारखंड के बहुत से जगहों पर मन्दिर के लिए में जगह छोड़ दी गई हैं। इतना ही नहीं अगर रास्तें में मन्दिर हो तो रास्तें को मोड़ दिया जाता हैं। पर मन्दिर को नहीं तोड़ा जाता हैं।    

 एचइसी का स्थापना का मकसद क्या था , और एचइसी का विकास किसके लिए? अगर हम थोड़े एचइसी के इतिहास में जाए तो एचइसी स्थापना का मकसद गरीबी एंव बेरोजगारी उन्मूलन था। एचइसी के लिए जमीन भू्र-अर्जन अधिनियम 1894 के तहत लिया गया था। जिसका अधिग्रहण 1955 से लेकर 1960 तक चला। जिसके तहत आदिवासी मूलवासियों ने अपनी खेतीवाली 9,200 एकड़ हरी-भरी जमीन एचइसी को समर्पित कर दिया। 1996 में बिहार सरकार ‘डीड आॅफ कानवेन्स ’ के तहत एचइसी द्वारा अर्जित जमींन का मलिकाना हक पूर्ण रूप से एचइसी को कर दिया।  एचइसी ने जरूरत से तीन गुणा ज्यादा जमीन का अधिग्रहण किया और केवल लगभग  3 हजार एकड़ में ही तीन प्लांट लगाए गए.। एच. एम.टी. पी., एच. एम बी. पी. और एफ एफ पी. इसमें एक एक प्लांट एफ एफ पी बंद हो चुका है.। बाकी अधिग्रहित भूमि में रैयत अपनी ख्ेाती बारी और पारम्पारिक बसाहट के साथ कायम रह गए. सरकार ने इस अतिरिक्त भूमि की सुध नहीं ली और एच. ई सी. प्रबंधन मनमानी कर भूमि की बिक्री कर अंधाधुंध कमाई करता रहा. इसके विरोध में विस्थापित लोग आंदोलन करते रहे. लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई. 2010 में सरकार ने एच. ई. सी. को अतिरिक्त भूमि बेचने पर रोक लगा दी.

एच. ई सी. ने कानूनों का उल्लंघन कर सी. आई एस एफ को 58 एकड़, क्रिकेट स्टेडियम को 158 एकड़ और हाई कोर्ट को 158 एकड़ भूमि बेच दी और मनमाना दर से पैसा वसूला. लेकिन अतिरिक्त भूमि को बचाकर रखने के एवज में विस्थापितों को कुछ भी नहीं दिया गया.। यह सब ऐसे ही चलता रहा क्योंकि 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून के तहत विस्थापितों में खासकर आदिवासियों ने भूमि वापसी का कोई केस छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम के तहत नहीं दायर किया. इसी का लाभ उठाकर  भूमि की बंदरबंाट होती रही. जून 12, 2015 को आपाधापी में झाड़खंड सरकार ने विधान सभा का शिलान्यास उस धरती में किया जो कानूनी तौर पर सरकार की है ही नहीं. लगभग 55 सालों तक अधिग्रहण के बाद दखल कब्जा नहीं होने के बावूजद बिना नए सिरे से अधिग्रहण कर सरकार ने जिस तरह से जोर जबरदस्ती किया है उससे लोकतंत्र की मर्यादा को खतरा पैदा हो गया है. आम तौर पर नई सरकार किसी मेगा प्रोजेक्ट का शिलान्यास करती है तो अखबारों में पूरा विज्ञापन प्रचारित प्रसारित करती है. लेकिन विधान सभा के मामले में बिना प्रचार प्रसार के रातों रात ही निर्माण कार्य प्रारंभ कर दिया गया. पूरे रास्ते को बैरीकेटिंग कर दिया गया और 16 मजिस्ट्रेट के साथ 200 पुलिसकर्मियों को ड्यूटी पर तैनात कर दिया गया ताकि परिंदा भी पर ना मार सके।लंकिन विस्थापितों ने तीखा प्रतिरोध किया.

इतनी कुर्बानी के बाद भी मूलवासियों और आदिवासियों के बड़े मन की बात की जा रही है. किसका मन और दिल बड़ा है. या 1960 में आदिवासयों एंव मूलवासियों की अग्निपरीक्षा हो गई और राष्ट् के विकास के नाम पर आदिवासियों और मूलवासियों ने अपनी जमीन को कुर्बान कर सुअरबाड़े जैसे घरों में रहने को विवश हो गए। इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता हैं, कि आदिवासी प्राकृतिक की तरह हमेशा देते ही आये हैं। बदले में उन्हें चिडि़याघर के जानवरों की तरह जीवन जीने को मजबूर कर दिया गया हैं। अब सवाल यहाॅ ये है कि क्या आदिवासी इस देश के नागरिक नहीं या क्या इन्हें सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकार नहीं। 

विकास के नाम पर हमेशा आदिवासियों की बलि चढ़ायी गई हैं।  आजादी के बाद से पूरे देश में विकास व राष्ट् हित के नाम पर लगभग 3 करोड़ से ज्यादा लोग विस्थापित तथा प्रभावित हुए हैं। जिनमें 40 प्रतिशत आदिवासी, 20 प्रतिशत दलित व कमजोर वर्ग के लोग हैं। यानि 60 प्रतिशत लोगों को राष्ट्हित के नाम पर जमींन की कुर्बानी देनी पड़ी। कुल विस्थापितों में से मात्र 25 प्रतिशत लोगों का किसी तरह पुर्नवास हो सका हैं। तथा शेष 75 प्रतिशत विस्थापित लोग कहाॅ गये इसकी जानकारी सरकार तक को मालूम नहीं हैं। अजादी के 66 बर्षाो के बाद भी पुर्नवास नीति नहीं बन पायी हैं। जबकि वही सरकार बिशेष आर्थिक क्षेत्र के नाम पर कानून बनाने में सफल हुए हैं। जिसे लाखों लोग विस्थापन के कगार पर हैं। विकास के नाम पर लाखों लोग बेघर हो रहे, उनका अभी तक कोई विकास नहीं हो पाया हैं। पर औद्योगिक घरानों के लोगों का विकास जरूर हुआ हैं। उदाहरण के तौर पर  फोब्र्स की धनवान सूची 2015 के अनुसार, धनाढ्य मुकेश अंबानी फिर इस साल भारतीयों में से सबसे अमीर व्यक्ति हुए हैं, जो 21 अरब डाॅलर के नेटवर्थ के साथ अपनी शीर्ष स्थिति लगातार आठवें साल बरकरार रखी हैं। इसके बाद दिग्गज कारोबारी में दिलीप सांधवी 20 लाख डाॅलर के नेटवर्थ के साथ 44वें, पायदान वैष्विक स्तर से  रहें। इसके बाद अजीम प्रेमजी 19.1 अरब डाॅलर के साथ वैष्विक स्तर से 18वें पायदान पर रहें। ये तो थे पूॅजीपतियों का पायदान।

 इन पायदानों में कहीं भी विस्थापितों का पायदान नहीं हैं। जबकि जमींन अधिग्रहण विकास के नाम पर लेते रहा गया हैं। जिसमें एचइसी मुख्य रूप से शामिल हैं। एचइसी स्थापना से आदिवासियों का विकास नहीं बल्कि विनाश हुआ हैं। एचइसी में बड़े पैयमाने पे बाहरी लोगों की बहाली हुई जिसमें आदिवासियों का नाममात्र का ही बहाली हुआ। 22 हजार कर्मचारियों की बहाली की गई थी । सिर्फ दो तीन साल ही एचइसी मुनाफे में रही बाकी साल सिर्फ घाटे में ही चलते रही।  22 हजार कर्मचारी वाला संस्थान  आज 2 हजार कर्मियों पर सिमट गया है. एचइसी अपना कर्ज माफ करवाने के लिए सरकार को जमींन रिज्यूम कर दे रही हैं। जिसमें सरकार हाई कोर्ट एंव विधानसभा का निर्माण कर रहीं हैं। इतिहास में पहली बार सरकार 144 धारा लागू कर हाईकोर्ट का शिलान्यास किया। लेकिन पूर्व से ही संगठित आदिवासियों मूलवासियों की भीड़ ने सरकार के मंसूबे में पानी फेर दिया. मुख्यमंत्री को तीखे प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। यह कहना गलत नहीं होगा कि आदिवासी मूलवासियों का इतिहास बहुत ही गौरवपूर्ण एवं संघर्षशील रहा हैं। हमारे आदिवासी आजादी से पहले अपने देश के दुश्मनों से लड़ाईयाॅ लड़ी. और आजादी के बाद अपने ही देश के स्वार्थी, दमनकारी नीति बनाने वाले प्रशासन के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं। आजाद होते हुए भी गुलाम की जिन्दगी जीने को मजबूर है। भूमि अधिग्रहण कानून का दंष से कोई भू-स्वामी नहीं बच पाऐगा। अगर सरकार की मंशा इन आदिवासियों मूलवासियों के प्रति नहीं बदली तो, एक बार फिर नयी क्रांतिकारी विचारधारा आने में देर नहीं लगेगी.

बरखा लकड़ा


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Feb 11, 2016

वसंतोत्सव : प्रेम का पर्व


-डॊ. सौरभ मालवीय
प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति में ऋतुओं का विशेष महत्व रहा है. इन ऋतुओं ने विभिन्न प्रकार से हमारे जीवन को प्रभावित किया है. ये हमारे जन-जीवन से गहरे से जुड़ी हुई हैं. इनका अपना धार्मिक और पौराणिक महत्व है. वसंत  ऋतु का भी अपना ही महत्व है. भारत की संस्कृति प्रेममय रही है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण वसंत पंचमी का पावन पर्व है. वसंत पंचमी को वसंतोत्सव और मदनोत्सव भी कहा जाता है. प्राचीन काल में स्त्रियां इस दिन अपने पति की कामदेव के रूप में पूजा करती थीं, क्योंकि इसी दिन कामदेव और रति ने सर्वप्रथम मानव हृदय में प्रेम और आकर्षण का संचार किया था. यही प्रेम और आकर्षण दोनों के अटूट संबंध का आधार बना, संतानोत्पत्ति का माध्यम बना. 

वसंत पंचमी का पर्व माघ मास में शुक्ल पक्ष की पंचमी के दिन मनाया जाता है, इसलिए इसे वसंत पंचमी कहा जाता है. इस दिन विद्या की देवी सरस्वती की पूजा-अर्चना की जाती है. भारत सहित कई देशों में यह पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है. इस दिन घरों में पीले चावल बनाए जाते हैं, पीले फूलों से देवी सरस्वती की पूजा की जाती है. महिलाएं पीले कपड़े पहनती हैं. बच्चे पीली पतंगे उड़ाते हैं. विद्या के प्रारंभ के लिए ये दिन शुभ माना जाता है.  कलाकारों के लिए इस दिन का विशेष मह्त्व है. 

प्राचीन भारत में पूरे वर्ष को जिन छह ऋतुओं में विभाजित किया जाता था, उनमें वसंत जनमानस की प्रिय ऋतु थी. इसे मधुमास भी कहा जाता है. इस दौरान सूर्य कुंभ राशि में प्रवेश कर लेता है. इस ऋतु में खेतों में फ़सलें पकने लगती हैं, वृक्षों पर नये पत्ते आ जाते हैं. आम पर की शाख़ों पर बौर आ जाता है. उपवनों में रंग-बिरंगे पुष्प खिलने लगते हैं. चहुंओर बहार ही बहार होती है. रंग-बिरंगी तितलियां वातावरण को और अधिक सुंदर बना देती हैं.

वसंत का धार्मिक महत्व भी है.  वसंत ऋतु का स्वागत करने के लिए माघ मास के पांचवे दिन महोत्सव का आयोजन किया जाता था. इस उत्सव में भगवान विष्णु और कामदेव की पूजा होती थी.  शास्त्रों में वसंत पंचमी को ऋषि पंचमी से उल्लेखित किया गया है, तो पुराणों-शास्त्रों तथा अनेक काव्यग्रंथों में भी अलग-अलग ढंग से इसका चित्रण मिलता है. मान्यता है कि सृष्टि के प्रारंभिक काल में भगवान विष्णु की आज्ञा से ब्रह्मा ने जीवों की रचना की, परंतु इससे वे संतुष्ट नहीं थे. भगवान विष्णु ने अपने कमंडल से जल छिड़का, जिससे एक चतुर्भुजी सुंदर स्त्री प्रकट हुई, जिसके एक हाथ में वीणा तथा दूसरा हाथ वर मुद्रा में था. अन्य दोनों हाथों में पुस्तक एवं माला थी. ब्रह्मा ने देवी से वीणा बजाने का अनुरोध किया. जैसे ही देवी ने वीणा का मधुरनाद किया, वैसे ही संसार के समस्त जीव-जन्तुओं को वाणी प्राप्त हो गई. जलधारा में कोलाहल व्याप्त हो गया. पवन चलने से सरसराहट होने लगी. तब ब्रह्मा ने उस देवी को वाणी की देवी सरस्वती के नाम से पुकारा. सरस्वती को बागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पूजा जाता है. वे विद्या और बुद्धि प्रदान करती हैं. संगीत की उत्पत्ति करने के कारण वे संगीत की देवी कहलाईं. वसंत पंचमी को उनके जन्मोत्सव के रूप में भी मनाते हैं. ऋग्वेद में भगवती सरस्वती का वर्णन करते हुए उल्लेख गया है-

प्रणो देवी सरस्वती वाजेभिर्वजिनीवती धीनामणित्रयवतु।
अर्थात ये परम चेतना हैं. सरस्वती के रूप में ये हमारी बुद्धि, प्रज्ञा तथा मनोवृत्तियों की संरक्षिका हैं. हममें जो आचार और मेधा है, उसका आधार भगवती सरस्वती ही हैं. इनकी समृद्धि और स्वरूप का वैभव अद्भुत है.

मान्यता है कि वसंत पंचमी के दिन देवी सरस्वती पूजा करने और व्रत रखने से वाणी मधुर होती है, स्मरण शक्ति तीव्र होती है, प्राणियों को सौभाग्य प्राप्त होता है तथा विद्या में कुशलता प्राप्त होती है.

"यथा वु देवि भगवान ब्रह्मा लोकपितामहः।
त्वां परित्यज्य नो तिष्ठंन, तथा भव वरप्रदा।।
वेद शास्त्राणि सर्वाणि नृत्य गीतादिकं चरेत्।
वादितं यत् त्वया देवि तथा मे सन्तुसिद्धयः।।
लक्ष्मीर्वेदवरा रिष्टिर्गौरी तुष्टिः प्रभामतिः।
एताभिः परिहत्तनुरिष्टाभिर्मा सरस्वति।।

अर्थात् देवी! जिस प्रकार लोकपितामह ब्रह्मा आपका कभी परित्याग नहीं करते, उसी प्रकार आप भी हमें वर दीजिए कि हमारा भी कभी अपने परिवार के लोगों से वियोग न हो. हे देवी! वेदादि सम्पूर्ण शास्त्र तथा नृत्य गीतादि जो भी विद्याएं हैं, वे सभी आपके अधिष्ठान में ही रहती हैं, वे सभी मुझे प्राप्त हों. हे भगवती सरस्वती देवी! आप अपनी- लक्ष्मी, मेधा, वरारिष्टि, गौरी, तुष्टि, प्रभा तथा मति- इन आठ मूर्तियों के द्वारा मेरी रक्षा करें.

पुराणों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने सरस्वती से प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिया था कि वसंत पंचमी के दिन तुम्हारी भी आराधना की जाएगी. इस तरह भारत के कई हिस्सों में वसंत पंचमी के दिन विद्या की देवी सरस्वती की भी पूजा होने लगी. त्रेता युग में जिस दिन श्रीराम शबरी मां के आश्रम में पहुंचे थे, वह वसंत पंचमी का ही दिन था. श्रीराम ने भीलनी शबरी मां के झूठे बेर खाए थे. गुजरात के डांग जिले में जिस स्थान पर शबरी मां के आश्रम था, वहां आज भी एक शिला है. लोग इस शिला की पूजा-अर्चना करते हैं. बताया जाता है कि श्रीराम यहीं आकर बैठे थे. इस स्थान पर शबरी माता का मंदिर भी है, जहां दूर-दूर से श्र्द्धालु आते हैं.

वसंत पंचमी के दिन मथुरा में दुर्वासा ऋषि के मंदिर पर मेला लगता है. सभी मंदिरों में उत्सव एवं भगवान के विशेष शृंगार होते हैं. वृंदावन के श्रीबांके बिहारीजी मंदिर में बसंती कक्ष खुलता है. शाह जी के मंदिर का बसंती कमरा प्रसिद्ध है. मंदिरों में वसंती भोग रखे जाते हैं और वसंत के राग गाये जाते हैं वसंम पंचमी से ही होली गाना शुरू हो जाता है. ब्रज का यह परम्परागत उत्सव है.

इस दिन हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले के पौराणिक नगर पिहोवा में सरस्वती की विशेष पूजा-अर्चना होती है. पिहोवा को सरस्वती का नगर भी कहा जाता है, क्योंकि यहां प्राचीन समय से ही सरस्वती सरिता प्रवाहित होती रही है. सरस्वती सरिता के तट पर इस क्षेत्र में अनेक प्राचीन तीर्थ स्थल हैं. यहां सरस्वती सरिता के तट पर विश्वामित्र जी ने गायत्री छंद की रचना की थी. पिहोवा का सबसे मुख्य तीर्थ सरस्वती घाट है, जहां सरस्वती नदी बहती है. यहां देवी सरस्वती का अति प्राचीन मंदिर है. इन प्राचीन मंदिरों में देशभर के श्रद्धालु आते हैं. यहां भव्य शोभायात्रा निकलती है.

वसंत पंचमी का साहित्यिक महत्व भी है. इस दिन हिन्दी साहित्य की अमर विभूति महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' का जन्मदिवस भी है. 28 फरवरी, 1899 को जिस दिन निराला जी का जन्म हुआ, उस दिन वसंत पंचमी ही थी. वंसत कवियों की अति प्रिय ऋतु रही है. कालजयी रचनाकार रवींद्रनाथ टैगोर ने वसंत ऋतु के महत्व को दर्शाते हुए लिखा है-
आओ आओ कहे वसंत धरती पर, लाओ कुछ गान प्रेमतान
लाओ नवयौवन की उमंग नवप्राण, उत्फुल्ल नई कामनाएं घरती पर

हिंदी साहित्य में छायावादी युग के महान स्तंभ सुमित्रानंदन पंत वसंत का मनोहारी वर्णन करते हुए कहते हैं-
चंचल पग दीपशिखा के धर
गृह मग वन में आया वसंत।
सुलगा फागुन का सूनापन
सौंदर्य शिखाओं में अनंत।
सौरभ की शीतल ज्वाला से
फैला उर-उर में मधुर दाह
आया वसंत भर पृथ्वी पर
स्वर्गिक सुंदरता का प्रवाह।

वसंत पंचमी हमारे जीवन में नव ऊर्जा का संचार करती है. ये निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है. जिस तरह वृक्ष पुराने पत्तों को त्याग कर नये पत्ते धारण करते हैं, ठीक उसी तरह हमें भी अपने अतीत के दुखों को त्याग कर आने वाले भविष्य के स्वप्न संजोने चाहिए.


लेखक का परिचय
उत्तरप्रदेश के देवरिया जनपद के पटनेजी गाँव में जन्मे डाॅ.सौरभ मालवीय बचपन से ही सामाजिक परिवर्तन और राष्ट्र-निर्माण की तीव्र आकांक्षा के चलते सामाजिक संगठनों से जुड़े हुए है. जगतगुरु शंकराचार्य एवं डाॅ. हेडगेवार की सांस्कृतिक चेतना और आचार्य चाणक्य की राजनीतिक दृष्टि से प्रभावित डाॅ. मालवीय का सुस्पष्ट वैचारिक धरातल है. ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और मीडिया’ विषय पर आपने शोध किया है. आप का देश भर की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं एवं अंतर्जाल पर समसामयिक मुद्दों पर निरंतर लेखन जारी है. उत्कृष्ट कार्याें के लिए उन्हें अनेक पुरस्कारों से सम्मानित भी किया जा चुका है, जिनमें मोतीबीए नया मीडिया सम्मान, विष्णु प्रभाकर पत्रकारिता सम्मान और प्रवक्ता डाॅट काॅम सम्मान आदि सम्मिलित हैं. संप्रति- माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में सहायक प्राध्यापक, जनसंचार विभाग के पद पर कार्यरत हैं. मोबाइल-09907890614 
ई-मेल- malviya.sourabh@gmail.com  drsourabhmalviya@gmail.com
वेबसाइट-www.sourabhmalviya.com

ऋषि पर्व- एक खूबसूरत मौसम का आगाज़


वर दे, वीणा वादिनि !
-सुधाकर अदीब
प्रकृति जब शीतकाल के अवसान के पश्चात् नवल स्वरुप धारण करती है, तब मनुष्य धरती पर विद्या और संगीत की अधिष्ठात्री देवी मां सरस्वती का आह्वान एवं पूजन करते हैं, जो उनमें नव रस एवं नव स्फूर्ति का संचार करती है.
यह वह आनंदमय समय होता है, जब खेतों में पीली-पीली सरसों खिल उठती है, गेहूं और जौ के पौधों में बालियां प्रकट होने लगती हैं, आम्र मंजरियां आम के पेड़ों पर विकसित होने लगती हैं, पुष्पों पर रंग-बिरंगी तितलियां मंडराने लगती हैं, भ्रमर गुंजार करने लगते हैं, ऐसे में आता है 'वसंत पंचमी' का पावन पर्व. इसे ऋषि पर्व भी कहते हैं.
माता सरस्वती जिन्हें मां वाणी, मां शारदा, वाग्देवी, हंसवाहिनी, वीणापाणि, वागीश्वरी, भारती और भगवती इत्यादि अनेक नामों से भी जाना जाता है, उनका माघ माह के शुक्ल पक्ष में पंचमी के दिन प्रायः सभी आस्थावान कवि, लेखक, गायक, वादक, संगीतज्ञ, नर्तक, कलाकार और नाट्यविधा इत्यादि से जुड़े हुए लोग पूजन एवं वंदन करते हैं.
वसंत पंचमी के दिन श्रद्धालु जन प्रातः उठकर बेसन और तेल का उबटन शरीर पर लगाकर स्नान करते हैं. इसके बाद पीले वस्त्र धारण कर मां शारदा की पूजा और उनका ध्यान करते हैं. केशरयुक्त मीठे चावल का भोग लगाकर, प्रसाद ग्रहण करते हैं. सरस्वती मां के पूजन का वास्तविक अर्थ तभी है, जब हम अपने मन से ईर्ष्या-द्वेष, छल-कपट, ऊंच-नीच और भेदभाव जैसे तुच्छ विकारों को विसर्जित कर शुद्ध एवं सकारात्मक सोच को अपनाएं, तभी मां वीणापाणि की अबाध अहैतुकी कृपा हम पर संभव होती है.
मां सरस्वती की कृपा होने पर महामूर्ख भी महाज्ञानी बन सकते हैं. जिस डाल पर बैठे, उसी को काटने वाले जड़ बुद्धि कालिदास कैसे एक दिन महाकवि बन गए, यह एक बहुश्रुत दृष्टान्त है. सरस्वती की आराधना से ही यह संभव हुआ. उनकी कृपा के बिना साहित्य और संगीत की साधना अधूरी है.

प्राचीन ऋषि-मुनियों ने ज्ञान, संगीत और कला की देवी सरस्वती की स्तुति जिन शब्दों में की है, उनसे उनकी पवित्र छवि इस प्रकार प्रकट होती है-
" श्वेत कमल के पुष्प पर आसीन, शुभ्र हंसवाहिनी, तुषार धवल कान्ति से संयुक्त, शुभ्रवसना, स्फटिक माला धारिणी, वीणा मंडित करा, श्रुति हस्ता" ऐसी भगवती भारती की प्रसन्नता की कामना की जाती है. यह जन-आस्था है कि मां सरस्वती की कृपा मनुष्य में विद्या, कला, ज्ञान तथा प्रतिभा का प्रकाश देती है. यश उन्हीं की धवल अंग ज्योत्स्ना है. वे सत्त्वरूपा, श्रुतिरुपा, आनंदरूपा हैं. विश्व में श्री सौंदर्य की वही करक हैं. वे वस्तुतः अनादि शक्ति भगवान ब्रह्मा की सृष्टि में स्वर और संगीत की सृजनकर्त्री सहयोगिनी हैं.

आधुनिक हिन्दी साहित्य जगत में महाप्राण निराला द्वारा रचित 'सरस्वती वंदना' सर्वाधिक लोकप्रिय है और अक्सर सारस्वत समारोहों के प्रारंभ में गाई जाती है-
"वर दे, वीणा वादिनि वर दे।
प्रिय स्वतंत्र-रव अमृत-मंत्र नव
भारत में भर दे।
काट अंध-उर के बंधन-स्तर
बहा जननि ज्योतिर्मय निर्झर,
कलुष-भेद-तम हर प्रकाश भर
जगमग जग कर दे।
नव गति, नव लय, ताल-छंद नव
नवल कंठ, नव जलद-मंद्र रव,
नव नभ के नव विहग-वृंद को
नव पर, नव स्वर दे।"

वस्तुतः सरस्वती का ध्यान जड़ता को समाप्त कर मानव मन में चेतना का संचार करता है. सरस्वती का यह ज्ञानदायिनी मां का स्वरुप भारत में ही नहीं, विश्व के अनेक देशों में विभिन्न नामों से प्रचिलित है और वे श्रद्धापूर्वक वहां भी पूजी जाती हैं. उदाहरण के लिए हमारी 'सरस्वती' बर्मा में 'थुयथदी', थाईलैंड में 'सुरसवदी', जापान में 'बेंजाइतेन' और चीन में 'बियानचाइत्यान' कहा जाता है.

भारतीय वांग्मय में सरस्वती के जिस स्वरुप की परिकल्पना हुई है, उसमें देवी का एक मुस्कान युक्त मुख, चार हाथ और दो चरण हैं. वे एक हाथ में माला, दूसरे हाथ में वेद हैं, शेष दो हाथों से वे वीणावादन कर रही हैं. हंस उनका वाहन है. देवी के मुखारविंद पर स्मित मुस्कान से आतंरिक उल्हास प्रकट होता है. उनकी वीणा भाव संचार एवं कलात्मकता की प्रतीक है. स्फटिक की माला से अध्यात्म और वेद पुस्तक से ज्ञान का बोध होता है. उनका वाहन हंस है जो नीर-क्षीर विवेक संपन्न होता है और विवेक ही सतबुद्धि कारक तत्व होता है. अतः माता सरस्वती को नमन करने से चित्त में सात्विक भाव और कलात्मकता की सहज अनुभूति होती है.

वैसे तो प्राचीन शरदापीठ का मंदिर पाक अधिकृत कश्मीर में नीलम ज़िले में है, जो अब एक खंडहर के रूप में वहां भग्नावस्था में स्थित है. भारत में मां शारदा का एकमात्र मंदिर एवं सिद्धपीठ मध्य प्रदेश के सतना ज़िले में त्रिकूट पर्वत पर अपनी संपूर्ण भव्यता के साथ स्थित है, जहां पहुंचने के लिए लाखों दर्शनार्थी लगभग एक हज़ार सीढ़ियां चढ़कर दर्शनार्थ जाते हैं. अब तो वहां जाने के लिए रोप-वे की भी आधुनिक सुविधा हो गई है.

संपर्क
सुधाकर अदीब
चंद्र सदन, 15 – वैशाली एन्क्लेव
सेक्‍टर – 9, इंदिरानगर
लखनऊ – 226016
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विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था