International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Save Tiger

DON'T LET WILD TIGERS DISAPPEAR

Lady Rosetta

Potatoes with low sugar content and longer shelf life.

अबूझमाड़ के जंगल

जहां बाघ नही नक्सली राज करते हैं

खवासा का आदमखोर

जहां कांपती थी रूह उस नरभक्षी से

जानवर भी करते हैं योग

योगाचार्य धीरज वशिष्ठ का विशेष लेख

Jan 7, 2016

एक पवित्र नदी को फिर से बना दिया निर्मल- एक और भागीरथ


"नदी से रिश्ता बनाओ, वाहे गुरु फतेह करेगा’’
कारसेवा का करिश्मा
निर्मल कालीबेंई 

होशियारपुर के धनोआ गांव से निकलकर कपूरथला तक जाती है 160 किमी लंबी कालीबैन। इसेे कालीबेरी भी कहते हैं। कुछ खनिज के चलते काले रंग की होने के कारण ’काली’ कहलाई। इसके किनारे बेरी का दरख्त लगाकर गुरुनानक साहब ने 14 साल, नौ महीने और 13 दिन साधना की। एक बार नदी में डूबे, तो दो दिन बाद दो किमी आगे निकले। मुंह से निकला पहला वाक्य था: ’’न कोई हिंदू, न कोई मुसलमां।’’ उन्होने ’जपजीसाहब’ कालीबेईं के किनारे ही रचा। उनकी बहन नानकी भी उनके साथ यहीं रही। यह कोई 500 साल पुरानी बात है। अकबर ने कालीबेईं के तटों को सुंदर बनाने का काम किया। ब्यास नदी, इसे पानी से सराबोर करती रही। एक बार ब्यास ने अपना पाट क्या बदला; कालीबेईं पर अगले 400 साल संकट ही संकट रहा। उपेक्षा व संवेदनहीनता का नतीजा यह हुआ कि कपूरथला कोच फैक्टरी से लेकर तमाम उद्योगों व किनारे के पांच शहरों ने मिलकर कालीबेईं को कचराघर बना दिया।

इसी बीच काॅलेज की पढाई पूरी न सका एक नौजवान नानक की पढाई पढ़ने निकल पङा। बलबीर सिंह सींचवाल, संत सींचवाल ने किसी काम के लिए कभी सरकार की प्रतीक्षा नहीं की। पहले खुद काम शुरु किया; बाद में दूसरों से सहयोग लिया। उन्होने कारसेवा के जरिए गांवों की उपेक्षित सङकों को दुरुस्त कर ख्याति पाई। वर्ष 2003 में कालीबेईं की दुर्दशा ने संत की शक्ति को गुरु वचन पूरा करने की ओर मोङ दिया - ’’ पवन गुरु, पानी पिता, माता धरती मात्।’’ कहते हैं कि कीचङ में घुसोगे, तो मलीन ही हो जाओगे। सींचवाल भी कीचङ में घुसे, लेकिन मलीन नहीं हुए। उसे ही निर्मल कर दिया। यही असली संत स्वभाव है। 

संत ने खुद शुरुआत की। समाज को कारसेवा का करिश्मा समझाया। कालीबेईं से सिख इतिहास का रिश्ता बताया। प्रवासी भारतीयों ने इसे रब का काम समझा। उन्होने धन दिया, अनुनायियों ने श्रम। सब इंतजाम हो गया। काम के घंटे तय नहीं; कोई मजदूरी तय नहीं; बस! तय था, तो एक सपने को सच करने के लिए एक जुनून - ’’यह गुरु का स्थान है। इसे पवित्र होना चाहिए।’’ नदी से कचरा निकालने का सिलसिला कभी रुका नहीं। 27 गावों के कचरा नाले नदी में आ रहे थे। तालाब खोदे। नालों का मुंह उधर मोङा। पांच शहरों के कचरे की सफाई के लिए ट्रीटमेंट प्लांट की मांग बुलंद की। पूरे तीन साल यह सिलसिला चला। ए पी जे अब्दुल कलाम इस काम को देखने सुल्तानपुर लोदी आये। एक वैज्ञानिक राष्ट्रपति ने राष्ट्रीय तक्नालाॅजी दिवस जैसे तकनीकी रुचि के मौके पर संत के सत्कर्म की सराहना की। प्रशासन को भी थोङी शर्म आई। उसने पांच करोङ की लागत से सुलतानपुर लोदी शहर में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाया; 10 करोङ की लागत से कपूरथला में। टांडा, बेगोवाल जैसे औद्योगिक नगरों में भी तैयारी शुरु कर दी गई। ’वीड टैक्नोलाॅजी’ पर आधारित तालाबों ने नतीजे देने शुरु कर दिए हैं। 




संत सींचवाल कहते हैं - ’’ अभी लोग प्लान बनाते हैं कि नदी गंदी हो गई हैं; क्या करें ? इसके लिए जाने कितने अध्ययन होते हैं। मीटिंगों में लोग मांग करते हैं कि नया कानून बनाओ। मैं कहता हूं कि भाई, अभी जो कानून है, पहले उसे तो लागू करा लोे। कानून, नदी के पक्ष में है। लोग हाउस टैक्स देते हैं। म्युनिसपलिटी वालों से क्यों नहीं पूछते कि नदी में कचरा क्यों डाल रहे हो ? लोग चुप क्यों रहते हैं ? सरकार जब करेगी, तब करेगी। लोगों को चाहिए कि हिम्मत करें। लोग नदी पर जाकर खुद खङे हों। जहां-जहां लोग जाकर नदी पर खङे हो जायेंगे, कई कालीबेंई निर्मल हो उठेंगी। लोगों के खङे होने से होता है। लोग खङे हों।’’

संत का कहते है कि उन्होने कालीबेंई नदी में कोई अजूबा नहीं दिया - ’’हमने सिर्फ मिस-मैनेजमेंट ठीक किया है। हमने लोगों को 100 प्रतिशत विकल्प दिया। यह साधारण सा काम है। समझें, तो बात भी साधारण सी है। क्या करना है ? पानी कम खींचो। आसमान से बरसा पानी तालाबों में रोको। बाढ का पानी भूजल रिचार्ज के काम में कैसे आये ? सोचो! हर शहर से गंदे पानी की एक नदी निकलती है। उस गंदे पानी को साफ करके, खेती में दे दो। नियम बना लो कि शोधन के पश्चात् भी नदी में नहीं डालना है। हमने यही किया है। सुल्तानपुर लोदी के आठ किलोमीटर के दायरे में यही गंदा पानी साफ करके खेती में पहुंचा रहे हैं। लोग आनन्दित हैं। इससे भूजल खींचने का काम कम हुआ है। ग्राउंड वाटर बैंक में हमारा अकाउंट बैलेंस बढ गया है। पानी का टीडीएस नीचे आ गया है। सबसे बङी बात कि इससे कालीबेंई को साफ रखने में हमे मदद मिल रही है। हर शहर में यह हो सकता है। आपको कभी आकर देखना चाहिए।’’

संत का संदेश: नदी से रिश्ता बनाओ, वाहे गुरु फतेह करेगा।

पंजाब में कैंसर बेल्ट.. कैंसर टेªन जैसे शब्द सुनकर संत की आंखों में आंसू आ जाते हैं। कहते हैं कि जिस पानी का काम पानी जीवन देना है, हम उससे मौत ले रहे हैं। यह क्यों हुआ ? क्योंकि हम रिश्ता भूल गये। हमने यह रिश्ता याद रखा होता, तो हम जिस नदी में स्नान करते हैं, उसमें पेशाब नहीं करते।  कहावत है - ’’जैसा पाणी, वैसा प्राणी। लोगों को सोचना होगा कि पीने के पानी की बोतल कोई मंगल ग्रह से नहीं आने वाली। हम अमृतजल बर्बाद कर रहे हैं। मेरी तो यही प्रार्थना है कि रब के सच्चे बंदों! अपने लिए न सही, अगली पीढ़ी के लिए सही, कुछ करो। जिस पीढी की पढाई, दवाई और परवरिश पर इतना पैसा और समय खर्च करते हो, उसकी खातिर घरों से बाहर निकलो। नदी से रिश्ता बनाओ। वाहे गुरु फतेह करेगा।’’

सत्कर्म से मिली नसीहत: किसी भी काम से लोगों को जोङने के लिए लोगों को उससे उनका रिश्ता समझाना पङता है। आस्था, इतिहास और नियमित संसर्ग इसमें बङी भूमिका अदा कर सकते हैं। अच्छी नीयत व निस्वार्थ भाव से काम शुरु कीजिए। संसाधन खुद-ब-खुद जुट जायेंगे। शासन-प्रशासन भी एक दिन साथ आ ही जाएंगे।

अरुण तिवारी 
दिल्ली 
amethiarun@gmail.com

Jan 6, 2016

तराई के जंगलों में दो बाघों की मौत, बाघ सरंक्षण मुहिम एक बार फिर सवालों के घेरें में...

दक्षिण खीरी वन प्रभाग में गन्ने के खेत में मिला मृत बाघ का शव 
खीरी, 3 जनवरी-दुधवा नेशनल पार्क के करीब साउथ खीरी वन क्षेत्र में रविवार दोपहर एक बाघ की लाश मिलने से सनसनी फैल गयी। भीरा वन रेंज में एक गन्ने के खेत में बाघ का कई हफ्ते पुराना शव पाया गया है। बाघ के शव की हालत ऐसी हो चुकी है कि यह भी पहचान होनी मुश्किल है कि बाघ नर है या मादा लेकिन बाघ के नाखून और दांत सुरक्षित मिलने से शिकार की आशंका को वन अधिकारी नकार रहे हैं। शव को पोस्टमार्टम के लिए आईवीआरआई बरेली भेजने की तैयारी हो रही है।
बाघ का शव रविवार दोपहर भीरा इलाके के एक गन्ने के खेत में देखा गया। यह खेत दुधवा पार्क के करीब और शारदा नदी की तलहटी में है। दोपहर के वक्त गन्ना छील रहे मजदूर जब खेत के अंदर गए तो वहां उनको बाघ की लाश मिली। बाघ का यह शव पूरी तरह से सड़ चुका था। उससे बदबू उठ रही थी और यह कई दिन पुराना लग रहा था। सूचना पर डीएफओ साउथ खीरी नीरज कुमार, दुधवा पार्क के उप निदेशक पीपी सिंह भी पहुंच गए।
दुधवा के डिप्टी डायरेक्टर पीपी सिंह ने बताया कि बरामद शव टाइगर का ही है। शव सड़ने के बाद भी बाघ के नाखून और सभी दांत प्री मेलर से लेकर केनाइन तक सुरक्षित हैं। दांतों को देखने से वे घिसे हुए लग रहे हैं, जिससे अंदाजा लगाया जा रहा है कि यह बूढ़ा और शिकार करने के नाकाबिल हो चुका बाघ था। अधिकारियों ने शिकार जैसी आशंका से इंकार किया है।


किशन पुर वन्यजीव विहार में मिला मृत बाघ शावक 

खीरी, ४ जनवरी-दुधवा टाइगर रिजर्व की किशनपुर सेंक्चुरी में सोमवार सुबह बाघ शावक का शव बरामद हुआ है। शावक की उम्र एक साल के करीब है। उसके पिछले हिस्से का मांस गायब है और पिछला पैर भी धड़ से अलग है। दुधवा के उप निदेशक पीपी सिंह ने शावक का शव मिलने की पुष्टि की है।
रविवार को दुधवा जंगल के करीब एक बूढ़े बाघ का शव मिलने के बाद वन विभाग सवालों में घिरा हुआ था। इस बीच सोमवार सुबह एक और खबर ने बाघ संरक्षण की मुहिम को कटघरे में खड़ा कर दिया। दुधवा टाइगर रिजर्व के किशनपुर सैंक्चुरी क्षेत्र में झादी ताल के पास एक बाघ शावक का शव मिला है। शव पाए जाने की लोकेशन जंगल के कोर जोन में मचान नंबर एक के पास बताई गई।
मौके पर पहुंचे वन अधिकारियों के मुताबिक, बाघ शावक के पिछले हिस्से का मांस गायब था। उसका पिछला पैर भी शरीर से अलग हुआ पड़ा था। दुधवा नेशनल पार्क के उप निदेशक पीपी सिंह ने बाघ शावक का शव मिलने की पुष्टि करते हुए बताया कि इस शावक की मौत किसी नर बाघ के हमले में हुई है। बाघ के शावक को वयस्क बाघ अक्सर मारकर खा जाते हैं। वन विभाग ने बाघ शावक के शव को कब्जे में ले लिया है। उसको पोस्टमार्टम के लिए आईवीआरआई बरेली भेजा जाएगा।
दुधवा लाइव डेस्क 

Jan 3, 2016

बाघों के महान सरंक्षक कुंवर अर्जन सिंह की पुण्यतिथि पर आयोजित बाघ सरंक्षण कार्यशाला


दुधवा नेशनल पार्क के संस्थापक थे बिली अर्जन सिंह 
 जंगल में स्थित टाइगर हैवन में बाघिन और तेंदुओं के साथ रहते थे बिली 

दुधवा-खीरी। नववर्ष के आरम्भ में पहली जनवरी 2016 को पलिया सम्पूर्णानगर रोड पर स्थित जसबीर नगर में पद्म भूषण बिली अर्जन सिंह की याद में दुधवा लाइव के बैनर तले के के मिश्र के संयोजन में बाघ सरंक्षण जागरूकता कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के आयोजक शमिन्दर बोपाराय थे जिन्होंने बिली अर्जन सिंह पर एक किताब लिखी "टाइगर ऑफ दुधवा" और वह मौजूदा वक्त में बिली के घर को संग्रहालय के रूप में विकसित कर रहे हैं।

बिली अर्जन सिंह की सातवीं पुण्य तिथि पर आयोजित इस कार्यक्रम में दुधवा के उपनिदेशक पी पी सिंह, स्थानीय विधायक रोमी साहनी, पलिया ब्लॉक प्रमुख जॉर्जी, वनस्पतिविज्ञान प्रवक्ता ब्रजेंद्र प्रताप सिंह अभय मिश्रा के अलावा महाविद्यालयों के स्नातक स्तर के सैकड़ों छात्र छात्राओं ने भाग लिया।


कार्यक्रम की शुरुवात बिली अर्जुन सिंह के टाइगर हैवन पर स्थित उनकी समाधि पर पुष्पांजलि से हुई फिर जसबीर नगर में उनकी तस्वीर पर स्थानीय निवासियों एवं कार्यक्रम में आये हुए गणमान्य व्यक्तियों ने पुष्प अर्पित कर कुंवर अर्जन सिंह को श्रद्धांजलि दी।


कार्यशाला की शुरुवात सर्वप्रथम दुधवा के उपनिदेशक ने की उन्होंने बिली के साथ अपने एक दशक से अधिक बिताये समय में दुधवा और यहाँ के बाघों के बारे में तमाम संस्मरण सुनाए और विद्यार्थियों को बाघ और जंगल बचाने की प्रेरणा दी।

विधायक रोमी साहनी ने कहा की बिली अर्जन जैसी अंतर्राष्ट्रीय शख्सियत के बारे में नई पीढ़ी को सबक लेना चाहिए ताकि हम अपने वन्य जीवन को सरंक्षित कर सके।

बिली अर्जन सिंह की धरोहर को सरंक्षित करने वाले शमिन्दर बोपाराय ने कहा कि वह इस जगह को बिली साहब के स्मारक के तौर पर विकसित करेंगे। और वह बिली और उनकी बाघिन तारा पर एक फिल्म निर्माण के प्रोजेक्ट पर काम कर रहे है.

पलिया के ब्लॉक प्रमुख जॉर्जी ने अर्जन सिंह के बाघों को बचाने के जूनून के कई किस्से बताये।
कार्यक्रम के अंत में सभी अतिथियों और छात्रों को बिली अर्जन सिंह और बाघ व् तेंदुओं पर किए गए उनके प्रयोगों से सम्बंधित फिल्में दिखाई गयी।

कार्क्रम का संचालन बिली अर्जन सिंह के नजदीक रहे वन्य जीव विशेषज्ञ के के मिश्र ने किया और उन्होंने बताया 16 वर्षों से अधिक समय में उन्होंने बिली अर्जन सिंह के सानिध्य में रहकर बाघ सरंक्षण की जो प्रेरणा उन्हें मिली वह उनके जीवन का आदर्श है। मिश्र ने बताया की बिली की किताबे और उनके महान कार्य हमें अगली पीढ़ी में पहुंचाना है और हमारे जंगलों को संवर्धित करना है


गौर तलब है की बिली ने एक बाघिन तारा और तीन तेंदुओं को जंगल में पुनर्वासित किया। यह दुनिया में अकेला सफल प्रयोग है जो बिली अर्जन सिंह ने कर दिखाया। 

डेस्क 

विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था