International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Save Tiger

DON'T LET WILD TIGERS DISAPPEAR

Lady Rosetta

Potatoes with low sugar content and longer shelf life.

अबूझमाड़ के जंगल

जहां बाघ नही नक्सली राज करते हैं

खवासा का आदमखोर

जहां कांपती थी रूह उस नरभक्षी से

जानवर भी करते हैं योग

योगाचार्य धीरज वशिष्ठ का विशेष लेख

Dec 31, 2014

जीवन भर का संग- प्रेम का प्रतीक सारस पक्षी


सारस पक्षी को भा रहा केन नदी का किनारा 
पन्ना टाइगर रिजर्व में दिख रहा सारस का जोड़ा 
उड़ान भरने वाला धरती का यह सबसे बड़ा पक्षी 
पन्ना, 30 दिसम्बर - अरुण सिंह 

उड़ान भरने वाला धरती का सबसे बड़ा पक्षी सारस म.प्र. के पन्ना टाइगर रिजर्व से होकर प्रवाहित होने वाली केन नदी के किनारे नजर आ रहे हैं. सारस पक्षी का एक जोड़ा पिछले कई दिनों से इस इलाके में डेरा डाले हुए है. ऐसा प्रतीत हो रहा है कि केन किनारे की आबोहवा व जलवायु इस विशालकाय पक्षी को भा रही है. मालुम हो कि सारस को उ.प्र. के राज्य पक्षी का दर्जा प्राप्त है. 

उल्लेखनीय है कि सारस पक्षी के जोड़े को दाम्पत्य प्रेम का प्रतीत माना जाता है. सारस पक्षी की सबसे बड़ी खूबी यह है कि अपने जीवन काल में यह सिर्फ एक बार जोड़ा बनाता है और जोड़ा बनाने के बाद जीवन भर साथ रहता है. यदि किसी कारण से एक साथी मर या बिछड़ जाता है तो दूसरा भी उसके वियोग में अपने प्रांण त्याग देता है. सारस को किसानों का मित्र पक्षी भी कहा जाता है, क्यों कि यह फसलों में लगने वाले कीड़ों को खाकर फसलों को नष्ट होने से बचाता है. दलदली व नमी वाले स्थान इसे प्रिय हैं, इसकी आवाज काफी दूर तक सुनाई देती है. जानकारों के मुताबिक विश्व में सबसे अधिक सारस पक्षी भारत में ही पाये जाते हैं. यहां इनकी कुल संख्या 8 से 10 हजार के बीच बताई जाती है. 

सारस पक्षियों में मनुष्य की ही तरह प्रेम भाव होता है, ये ज्यादातर दलदली भूमि, बाढ़ वाले स्थान, तालाब, झील और खेतों में देखे जा सकते हैं. अपना घोसला ये छिछले पानी के आसपास ही बनाना पसंद करते हैं. जहां हरे - भरे खेत, पेड़ - पौधे, झाडिय़ां तथा घास हो. नर और मादा देखने में एक जैसे ही लगते हैं, दोनों में बहुत ही कम अन्तर पाया जाता है. लेकिन जब दोनों एक साथ हों तो छोटे शरीर के कारण मादा सारस को आसानी से पहचाना जा सकता है. मादा सारस एक बार में दो से तीन अण्डे देती है. अण्डों से बच्चों को बाहर निकले में 25 से 30 दिन का समय लगता है. सारस पक्षी का औसत वजन 7.3 किग्रा. तथा लम्बाई 173 सेमी. होती है.


 पूरे विश्व में सारस पक्षी की कुल 8 प्रजातियां पाई जाती हैं जिनमें से चार प्रजातियां भारत में मिलती हैं. अब इन पक्षियों की संख्या तेजी से घट रही है, जिससे पक्षी प्रेमी व पर्यावरण के हिमायती काफी चिन्तित हैं. फसल उत्पादन के तरीके में हुए बदलाव यानी परम्परागत अनाज के बदले नगदी फसल उगाने के कारण सारस के भरण पोषण पर भी असर पड़ा है. औद्योगीकरण और आधुनिक कृषि से सारस के आवास को खतरा है. केन नदी के किनारे सारस के जोड़े की मौजूदगी से इन पक्षियों की ओर पर्यटकों का भी आकर्षण बढ़ रहा है. पन्ना टाइगर रिजर्व में आने वाले पर्यटक सारस पक्षी के इस जोडे को भी बड़े कौतूहल से निहारते हैं और उनकी छवि को अपने कैमरे में कैद करते हैं. 



अरुण सिंह 
पन्ना टाइगर रिजर्व 
मध्य प्रदेश 
aruninfo.singh08@gmail.com

Dec 28, 2014

खीरी के जंगलों से बाहर आबादी में घुसपैठ कर रहे हैं हाथी आखिर क्यों?



जंगली हाथियों ने बारह एकड़ गन्ना बर्बाद किया
दलराजपुर गांव में हाथियों का धावा
खैरागौढ़ी जंगल से अक्सर निकलता है झुंड
फोटो : गुरुवार रात खैरागौढ़ी जंगल से निकले जंगली हाथियों के झुंड ने दलराजपुर गांव के किसानों की गन्ने की फसल इस तरह रौंदकर तबाह कर दिया।

निघासन/खैरटिया-खीरी।
तिकुनियां इलाके में भारत-नेपाल सीमा पर खैरागौढ़ी जंगल से निकले जंगली हाथियों के झुंड ने गुरुवार रात दजराजपुर गांव के किसानों के खेतों में जमकर ऊधम मचाया। हाथियों के झुंड ने एक ही रात में करीब बारह एकड़ गन्ने की फसल रौंदकर और चबाकर नष्ट कर डाली। किसानों ने इसकी सूचना वन विभाग को दी है।
नेपाल सीमा से सटे खैरागौढ़ी जंगल से गुरुवार रात को निकले जंगली हाथियों के एक झुंड ने दजराजपुर गांव के किसानों के गन्ने के खेतों पर धावा बोल दिया। रात भर चले हाथियों के उपद्रव में किसानों की करीब बारह एकड़ गन्ने की फसल तबाह हो गई। पूरे खेत में हाथियों के पैरों के निशान और टूटा व कुचला पड़ा गन्ना ही दिख रहा था। इस नुकसान का पता किसानों को पता तब चला जब वे सुबह अपने खेत देखने गए। किसानों का कहना है कि नेपाल सीमा के इस इलाके के कई गांवों और खेतों पर अक्सर हाथी हमलावर होते रहते हैं। वे लोगों के घर भी तोड़ डालते हैं। तमाम गुहार लगाने के बावजूद अब तक जंगल महकमा इस पर बाड़ लगाने आदि की कोई कार्रवाई नहीं कर सका है।


दलराजपुर गांव के किसान सुखविंदर सिंह ने बताया कि गांव से कुछ दूरी पर उसका खेत है जिसमें गन्ना लगा हुआ है। शुक्रवार जब वह अपना खेत देखने गया तो उसे जंगली हाथियों के पैरों के निशान और टूटा-कुचला गन्ना मिला था। सुखविंदर सिंह के अलावा हाथियों ने उसकी दर्शन सिंह, जसविंदर सिंह और हरनेक सिंह आदि के खेतों में खड़ी फसल को भी रौंदकर, चबाकर और तोड़कर बर्बाद कर दिया है। इन सभी किसानों ने इसकी सूचना वन विभाग को दी है।


वन विभाग की ज़ुबानी -
जंगली हाथियों से दलराजपुर के किसानों की फसलों के नुकसान की इत्तिला मिली है। इसकी जांच करके किसानों को हुए नुकसान का मुआवजा दिलाने के लिए सरकार को आवेदन भेजा जाएगा।
एमएन सिंह, वन क्षेत्राधिकारी बेलरायां

सुबोध पाण्डेय 
पत्रकार एवं एडवोकेट 
निघासन-खीरी 
pandey.subodhlmp@gmail.com


Dec 27, 2014

Voice of The Forest


Photo Exhibition by Dudhwa Live at India Habitat Centre, New Delhi, India

(November 4, 2014, Summit of Digital development)





















Dudhwa Live Desk*

जानवरों के नर्क यानी चिड़ियाघर


चिड़ियाघरों की त्रासदी और व्यथा को अपने शब्दों में परिभाषित करते अरुणेश तिवारी जो मूलत: ब्रिटिश भारत के अवध प्रांत के संडीला क्षेत्र के निवासी है, आप को बताता चलूँ ये जगह कभी कार्य क्षेत्र रही कांग्रेस के संस्थापक व् महान पक्षी विज्ञानी ड्रॉ ह्यूम की, बॉम्बे नेचरल हिस्ट्री सोसाइटी के संस्थापकों में से वह एक थे। ।कभी उन्होंने ने ही लिखा था की (Siberian Crane) साइबेरियन क्रेन  जो भारत में राजस्थान के केवला देव नेशनलपार्क में आने के लिए मशहूर थी वह कभी इटावा के वेटलैंड्स में भी आया करती थी.… पढ़िए अरुणेश तिवारी की यह मार्मिक रिपोर्ट जो चिड़ियाघरों की अमानवीयता को दर्शाती है। …संपादक दुधवालाइव 

हुक्कू की हूक :

गाँव के स्कूल की बस शैक्षिक भ्रमण के लिये लखनऊ जाने वाली थी. किसी कारण बस मैं उस टुअर में शामिल न हो पाया, उस भ्रमण में लखनऊ की भूल भुलैया, इमामबाड़ा व चिड़ियाघर (हम बच्चे zoo या प्राणी उद्यान को इसी नाम से जानते थे) विशेष आकर्षण थे. लेकिन उस सबमे सबसे ज्यादा अगर किसी के किस्से थे तो वो थे "हुक्कू बन्दर" के. उस भ्रमण दल का शायद ही कोई सदस्य हो जिसने उसकी चर्चा ना की हो. कई सालों बाद मुझे भी लखनऊ प्राणी उद्यान घूमने का सौभाग्य प्राप्त हुआ. सो उसका जिक्र यहां कर रहा हूँ। …


प्रिंस ऑफ़ वेल्स जूलॉजिकल गार्डन जिसका नामकरण 2001 में लखनऊ प्राणी उद्यान कर दिया गया का निर्माण प्रिंस ऑफ़ वेल्स के लखनऊ आगमन पर प्रान्त के तत्कालीन गवर्नर सर हरकोर्ट बटलर द्वारा सन 1921 में कराया गया. अगर भारतीय प्राणी उद्यानों के इतिहास की बात करें तो भारत में पहला जू बनाने का श्रेय राजा राजेन्द्र मलिक को दिया जाता है जिन्होंने सन 1954 में कलकत्ता स्थित मार्बल पैलेस के भीतर अपनी निजी हवेली में वन्य जीवों का संग्रह किया था जो वर्तमान में भी मार्बल पैलेस जू के नाम से कलकत्ता में स्थित है. लेकिन जहाँ तक दर्शकों के लिये खोले जाने के आधार पर देखा जाये तो 1855 में स्थापित मद्रास जू को भारत को पहला जू कहा जा सकता है हालांकि सन 1880 में इसे बंद कर स्थानांतरित कर दिया गया था जो वर्तमान में Arignar Anna Zoological Park के नाम से जाना जाता है. 


भारत में सन 1800 के बाद से अब तक तकरीबन 355 बड़े छोटे जू स्थापित किये जा चुके हैं जिनमे 64 बड़े व 190 मध्यम आकार के जू हैं. सेंट्रल जू अथॉरिटी के अनुसार जू स्थापना का मुख्य उद्देश्य जानवरों की कैद में रक्षा करना व लोगों को उनके प्रति जागरूक करना है. जानवरों को जू के भीतर कृत्रिम रूप से बनाये गये वास में रखा जाता है. लेकिन हकीकत कुछ और ही बयां करती है. और इसका अहसास मुझे प्राणी उद्यान जाने के बाद हुआ. जू में घुसने पर ऐसा लगता है कि आप किसी प्राणी उद्यान में नहीं बल्कि कैद घर में आ गये हैं. 

तमाम प्रवासी व् अप्रवासी पक्षी जो हर वर्ष हजारों मील का सफ़र अपने पंखों से तय करते हैं, जंगलों में खेत खलिहानों में स्वछंद विचरण करते है, एक छोटे से तालाब में कैद हैं.  बाघ जिसे जंगल का राजा की ख्याति हासिल है बमुश्किल पांच सौ वर्ग मीटर के जेलनुमा बाड़े में बंद है. तमाम छोटे बड़े जानवर, पक्षी व अन्य जीव तथाकथित कृत्रिम वास में कैद हैं. जिन हिरणों की चौकड़ी से पूरा जंगल छोटा पड़ जाये वो सशंकित चौकन्नी आँखों से दर्शकों को देख कर सहम जाते हैं. तमाशबीनों का पूरा  हुजूम उमड़ पड़ता है इन बाड़ों के आस पास. केजिंग (caging) के खिलाफ राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तमाम अभियान समय समय पर चलते रहे जिनमें पेटा (PETA) का "say no to ZOO" भी शामिल है. मुझे आश्चर्य होता है कि इन अभियानों के बावजूद भारत में वर्ष दर वर्ष जू की संख्या में बढ़ोत्तरी होती रही. 

जबकि हकीकत यह है कि वन्यजीवों के प्रति अत्याचार का इससे बड़ा मामला बन ही नहीं सकता. शायद ही कोई संगठन ऐसा हो जिसने जानवरों के प्रति निर्दयता को लेकर गरीब सर्कस वालों को कठघरे में ना खड़ा किया हो. बन्दर बंदरिया का खेल दिखाने वाले ना जाने कितने मदारियों की दो जून की रोटी छीन गयी लेकिन सरकार के संरक्षण में हो वन्य जीवों पर हो रही निर्दयता पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई. सेंट्रल जू अथॉरिटी के एक अनुमान के मुताबिक विश्व आबादी का दसवां हिस्सा प्रति वर्ष जू की सैर करता है. भारत में हर साल करीब 5 करोड़ से अधिक लोग जू देखने आते हैं. यह तथ्य यह बताने के लिये पर्याप्त है कि जू भी किसी सर्कस से कम नहीं हैं.

साथ ही जू जाने वाले दर्शकों में अधिकांश का रवैया वन्य जीवों के प्रति किस कदर गैर जिम्मेदाराना होता है उसका एक उदाहरण मै आपको बताता हूँ. लखनऊ प्राणी उद्यान के गेट से प्रवेश करने के बाद ज्यों ही आप बायीं ओर चलेंगे तो कोई दस बाड़े छोड़कर आपको एक बाड़ा मिलेगा. आप पूछ सकते हैं यह बाड़ा ही क्यों ? क्योंकि लखनऊ प्राणी उद्यान का यह एक ऐसा बाड़ा है जिसके आस पास सबसे ज्यादा भीड़ मिलेगी. यह बाड़ा है "हुक्कू बन्दर" का (जिसेअंग्रेजी में Hoolock gibbon कहते हैं और इसका वैज्ञानिक नाम Hoolock hoolock है). यह वन मानुष प्रजाति का बन्दर है जिसकी पूँछ नहीं होती और यह मनुष्य की तरह दो पैरों पर शरीर को साध कर चल सकता है. इसीलिये इसे वनमानुष कहा जाता है. 

यह भारत के उत्तर पूर्वी राज्यों के अलावा बांग्लादेश के पूर्वी हिस्से तथा दक्षिण - पश्चिम चीन के सदा हरित वनों में पाया जाता है. इनका रंग काला होता है लेकिन वयस्क होने पर मादा हुक्कू के शरीर के बालों का रंग भूरा हो जाता है. यह "हुक्कू - हुक्कू" की  बहुत तेज आवाज निकालते हैं. इसीलिये इन्हें हुक्कू बन्दर कहा जाता है. लेकिन जब आप प्राणी उद्यान में इनके बाड़े के पास जायेंगे तो बाड़े के भीतर का द्रश्य देखकर दंग रह जायेंगे. 

सदा हरित वनों में स्वच्छंद विचरण करने वाले प्राणी के बाड़े को चारो तरफ से छत समेत जाली से बंद कर दिया गया है. छोटे से बाड़े के बाहर लगने वाला हुजूम हुक्कू बन्दर से ज्यादा "हुक्कू - हुक्कू" की आवाजें निकालता है. प्रत्युत्तर में बन्दर भी आवाजे निकालता है तालियाँ बजती हैं सीटी बजती है और यह सिलसिला जब तक शाम में जू बंद नहीं हो जाता तब तक अनवरत चलता रहता है. उस बाड़े के बाहर इकट्ठे  हुजूम को हुक्कू बन्दर की मनोरंजक "हुक्कू - हुक्कू" सुनाई देती है लेकिन मुझे उस "हुक्कू - हुक्कू" में उसकी "मौन हूक". मुझे ऐसा लगता है जैसे वो चीख चीख कर कह रहा हो कि "अब तो बख्श दो". काश मनुष्यों की तरह चल सकने की क्षमता रखने वाले को मनुष्य की तरह बोल पाने का वरदान भी होता जिससे वह अपना दर्द बयां कर सकता.


अरुणेश तिवारी (लेखक इंजीनयरिंग की शिक्षा लेने के बाद, देश व् राजनीतिक मसलों से जुड़े मुद्दों को अपने फेसबुक पेज "राष्ट्र सर्वोपरि" के माध्यम से उजागर करते है, विशेषता: दक्षिणपंथी विचारधारा से ताल्लुक, लखनऊ में निवास इनसे aruneshtiwari30@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं )


Dec 26, 2014

तो यूं बना पेंच से आया बाघ टी -3 मिस्टर पन्ना

पन्ना टाईगर रिजर्व को आबाद करने वाला बाघ टी - 3
पन्ना बाघ पुर्नस्थापना योजना के पांच वर्ष हुए पूरे 
बाघों की नई दुनिया आबाद करके रच दिया इतिहास 

पन्ना, 25 दिसम्बर -  
पांच साल में म.प्र. के पन्ना टाइगर रिजर्व ने देश और दुनिया में अपनी एक अलग पहचान बनाई है. इन पांच सालों में यहां जो कुछ हुआ उसे देखकर दुनिया भर के वन्य जीव प्रेमी उत्साहित और हतप्रभ हैं. वर्ष 2009 में बाघों से उजड़ चुका पन्ना टाइगर रिजर्व फिर बाघों से आबाद हो चुका है और यह करिश्मा पेंच से पन्ना लाये गये नर बाघ टी - 3 ने कर दिखाया है, जिसे अब मिस्टर पन्ना के नाम से जाना जाता है. इतिहास रचने वाले इस बाघ को पांच वर्ष पूर्व 26 दिसम्बर 2009 को पन्ना टाइगर रिजर्व में बाघों की वंश वृद्धि के लिए छोंड़ा गया था, इसलिए यह दिन पन्ना बाघ पुर्नस्थापना योजना के लिए एक चिर स्मरणीय दिन है. 


उल्लेखनीय है कि पन्ना में बाघों की नई दुनिया आबाद करने के लिए 7 नवम्बर 2009 को पेंच टाइगर रिजर्व से नर बाघ टी - 3 को यहां लाया जाकर इन्क्लोजर में रखा गया. बाड़े में कुछ दिन रखने के बाद 13 नवम्बर को खुले जंगल में स्वच्छन्द विचरण के लिए छोंड़ दिया गया. मालुम हो कि बाघ टी - 3 को पन्ना लाये जाने से पूर्व कान्हा व बांधवगढ़ से दो बाघिनों को लाया जाकर टाइगर रिजर्व के जंगल में छोंड़ दिया गया था ताकि नर बाघ के संपर्क में आकर दोनों बाघिन वंशवृद्धि कर सकें. लेकिन नर बाघ की मुलाकात इन बाघिनों से नहीं हो सकी और 27 नवम्बर को पेंच का यह बाघ पन्ना से अपने घर पेंच की तरफ कूच कर गया. पूरे 30 दिनों तक यह बाघ कड़ाके की ठंड में अनवरत यात्रा करते हुए 442 किमी. की दूरी तय कर डाली. जिसे 25 दिसम्बर को पकड़ लिया गया और 26 दिसम्बर को दुबारा पन्ना टाइगर रिजर्व में छोड़ा गया. 


पन्ना टाइगर रिजर्व के क्षेत्र संचालक आर.श्रीनिवास मूर्ति बताते हैं कि टी - 3 पेंच से लाया गया वह नर बाघ है जो एक तरह से पुन: स्थापित बाघों के कुनबा का पिता है. बाघ टी - 3 के 30 दिनों की यात्रा का स्मरण करते हुए श्री मूर्ति बताते हैं कि ये दिन हमारे लिए बेहद चुनौतीपूर्ण व महत्व के थे, क्यों कि इसी नर बाघ पर पन्ना बाघ पुर्नस्थापना योजना का भविष्य टिका हुआ था. इन 30 दिनों में टी - 3 ने बाघ आवास व उनके जीवन के बारे में पन्ना टाइगर रिजर्व की टीम व पूरे देश को इतना ज्ञान दिया जो अन्यत्र संभव नहीं था. यह बाघ पन्ना के दक्षिणी दिशा में छतरपुर, सागर एवं दमोह जिलों में विचरण करते हुए 442 किमी. की यात्रा की. जिस इलाके में बाघ विचरण कर रहा था वह पूरी तरह असुरक्षित था और शिकार हो जाने की प्रबल संभावना थी. लेकिन हमने हिम्मत नहीं हारी और कडाके की ठंड में नदी, नाले व जंगल पार करते हुए उक्त बाघ को सुरक्षित तरीके से पुन: बेहोश करते हुए पन्ना टाइगर रिजर्व में मुक्त किया. बाघ टी - 3 की इस खोज ने ही पन्ना टाइगर रिजर्व के प्रबंधन को एक टीम का रूप दिया. अपनी इस यात्रा में बाघ प्रतिदिन 15 से 50 किमी. तक चला, जिस जगह शिकार करता वहां तीन से चार दिन तक रूकता. इस यात्रा के दौरान चार भारतीय वन अधिकारियों ने बाघ टी - 3 का पीछा करने वाली टीम का नेतृत्व किया. टीम में 70 वनकर्मी, चार हांथी व 25 वाहन शामिल रहे. बाघ ने केन, सुनार, बेबस और व्यारमा जैसी नदियों को तैरकर पार किया.
बाघ द्वारा विचरण के दौरान खोजे गए कॉरीडोर का मानचित्र


पांच साल में जन्मे 32 से अधिक बाघ शावक 
पन्ना बाघ पुर्नस्थापनायोजना के इन पांच सालों में 32 से भी अधिक बाघ शावकों का जन्म हुआ. इन जन्मे बाघ शावकों में 6 की मृत्यु हो गई तथा 7 बाघ यहां पल बढक़र बाहर निकल गये और बुन्देलखण्ड क्षेत्र के जंगलों में स्वच्छन्द विचरण कर रहे हैं. क्षेत्र संचालक श्री मूर्ति के मुताबिक मौजूदा समय पन्ना टाइगर रिजर्व में 22 बाघों का कुनबा है. आपने बताया कि बाघ टी - 3 ने अपने 30 दिन की बाहरी यात्रा में पन्ना टाइगर रिजर्व एवं नौरादेही के कॉरीडोर को खोज निकाला. यहां जन्मे एक अन्य बाघ पन्ना - 212 ने इतिहास रचते हुए पन्ना - बांधवगढ़ - संजय टाइगर रिजर्व के कॉरीडोर की खोज की तथा संजय टाइगर रिजर्व में बाघिन के साथ जोड़ा बनाकर पिता का दर्जा भी हासिल किया. पन्ना की बाघ पुर्नस्थापना योजना को मिली उल्लेखनीय सफलता के लिए श्री मूर्ति ने स्थानीय लोगों से मिले सहयोग को भी अहम बताया और कहा कि जन सहयोग के बिना इतना बड़ा कार्य संभव नहीं था.

अरुण सिंह 
पन्ना टाइगर रिजर्व मध्य प्रदेश भारत
 aruninfo.singh08@gmail.com


Dec 24, 2014

और आज भी यह जय जवान जय किसान वाली धुन पर थिरकता हुआ..

किसान- फोटो: आशीष सागर 
किसान की कथा-व्यथा 
-कृष्ण कुमार मिश्र

आज फिर हमारे लखीमपुर खीरी के अवधीकवि व् प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के तत्कालीन विधायक पंडित बंशीधर शुक्ल जी याद आ गए और याद आ गयी उनकी वह कविता "चौराहे पर ठाढ़ किसनऊ ताकए चारिहवार"...आज फिर एक सरकारी दिवस है "किसान दिवस" भारत के प्रधानमंत्री रहे चौधरी चरण सिंह के जन्म दिवस को यह गरिमा प्रदान की भारत सरकार ने की २३ दिसम्बर किसान दिवस के तौर पर मनाया जाए...भारत के अन्नदाता का जो सूरत ए हाल है उसमे क्या इस देश व् प्रदेश का विकासवाद का नारा और कथित कवायदें फिट बैठती है ..देखिएगा ज़रा ये तस्वीर  और विचारिएगा की ये वही किसान जो जाड़ा गरमी बरसात बिना किसी हाइजीन के दिन रात म्हणत करता है और तब आकर हमें मयस्सर होती है रोटी वो रोटी जो ज़िंदा रहने के लिए जरूरी...फिर भी ये वही पर है जहां सदियों पहले था ..आजादी आयी तो उम्मीद जगी की अपना मुल्क अपना राज अब इस किसान के दिन बेहतर होगे आखिर यही तो जमीन का आदमी है जिस पर टिका है समाज तंत्र व्यापार और सरकार ..सबने इसकी महत्ता स्वीकारी वादे नारे और योजनाएं ...न जाने क्या क्या इस किसान की जागती आँखों को दिखा दिया गया ....जो केवल सपना था और है ......बावजूद इसके इस किसान के जीवन की यात्रा अनवरत जारी है और ये ढो रहा है हमारे व्यभिचार भ्रष्टाचार का बोझ बिना कराहे हुए शायद इसकी आँखों से वह सपना अभी भी नहीं टूटा की अच्छे दिन आयेगे ...और आज भी यह जय जवान जय किसान वाली धुन पर थिरकता हुआ अपना पसीना बहाता जा रहा है उन लोगों के किए जिनके जिस्म से एक बूँद पसीना भी शायद कभी निकलता हो वातानुकूलित घरो कारों और जहाज़ों में जो अयासियों के सारे साजों सामान के साथ रहते है....

भारत कुमार का वह गीत भी अब किरकिरा लगता है जिसे सुनकर कभी आँखें नम हो जाती थी गर्व से ...इस देश की धरती सोना उगले उगले ....यकीनन ये धरती हमें वह सब मुहैया कराती है जो हमें चाहिए पर क्या मिलता है इन किसानों को ये सोना रुपया ..बस ये सीजनल मजदूर के सिवा कुछ नहीं ...राह ताकना इनकी नियति बन गयी है कभी बादल की राह, कभी सहकारी समितियों के काले व्यापारियों से बची खुची फ़र्टिलाइज़र की राह कभी राशन की दूकान पर मिट्टी के तेल की राह और अंत में चीनी मीलों और सरकार के उस फरमान की राह जिसमे इन्हे अपने ही उगाये गन्ने की फसल की रकम की दरियाफ्त होती है ...

कोफ़्त होता है की खुद उत्पन्न करने वाला रहमों करम पर रहता है कभी चीनी मिल मालिकों के नखरों के और कभी सरकार के फरमानों के ....ये गुलामी नहीं तो और क्या है ...हम जिस फसल को उगाते है उसका मूल्य निर्धारण करने वाले और लोग क्यों ....यह बात जाहिर करती है इस बात को की हम अपनी जमीनों के मालिक तो छोड़िए किरायेदार भी नहीं सिर्फ मजदूर है इस व्यवस्था के....

आज गन्ने  के किसान की दशा व्यथा अंगरेजी हुकूमत के नील की खेती करने वाले किसानों से ज्यादा बेहतर नहीं है....ये किसान जो अन्न उपजाता था इससे कृषि क्रान्ति के तहत सरकारों और नीतिकारों ने अन्न के देशी बीज भी छीन लिए अब यह निर्भर है देशी विदेशी कंपनियों या कालाबाजारियों पर जो इसे हर वर्ष हाइब्रिड बीज बेंचते है ...इनके घरों से अन्न रखने के वे सारे साजों सामान भी नदारद है अब जिन्हे अवध में डेहरिया बख्खारिया और मेटुके कहते थे ...इनके खेतों से और इनकी थालियों से दालों की किस्में गायब हो गयी..अनाज की विविधिता भी ...बस ये नपुंसक बीजों के गेहूं की रोटी और चावल खाता है ...सब्जियों के बीज भी हाइब्रिड बीजों ने नष्ट कर दिए इनके घरों से अब ये सब्जी व्यापारियों की दी हुई कीटनाशक युक्त कालाबाजारियों से प्राप्त बीजों से उगाई गयी सब्जियों पर निर्भर है ...

 इस अनियोजित विकास ने भारत की मूल सभ्यता के उस मूल व्यक्ति को ही बदल दिया जिसकी वजह से गाँव और गाँव का पारिस्थितिकी तंत्र मौज़ू  था, और  इस परिवर्तन के साथ ही बदल रही है वह सच्चाई  जिसे बापू ने अपने शब्दों में कहा था  की भारत गाँवों में  बसता है। अब सिर्फ जमीने और उन पर खेती करने वाले मजदूर और उनकी कालोनियां। गाँव गाँव नहीं रहे और न ही गाँव का हरा भरा विविधितापूर्ण पर्यावरण। न खलिहान न चौपाल और न  ही  चरागाह जो संस्कृति का केंद्र हुआ करते थे.… और न ही  पुराने दरख्तों वाले बाग़ बगीचे व् छोटे जंगल जहां पशु पक्षियों और  तितलियों का बसेरा  होता था कुल मिलाकर किसान बदला तो संस्कृति और पर्यावरण दोनों बदल गए या यूं कहे की ये लहूलुहान है इस संक्रमण से। … अनियोजित विकास का संक्रमण !

किसान जिसे अन्नदाता कहते है अब वह अन्न दाता नहीं रहा वह गुलाम हो गया नीतिकारों का अब वह वही फसल उगाता है जो सरकार और व्यापारी कहते है मसलन चीनी मीलों का तंत्र इन किसानों को आगाह करता है की ये बीज बोना है और इसमें यह खाद और ये पेस्टीसाइड पडेगा तो ये किसान वही करता है क्योंकि ऐसा न करने पर इसकी फसल मिल नहीं खरीदेगा....यह वही बीज बोता है जो स्थानीय बीज के सौदागर इन्हे मुहैया कराते है महंगे दामों पर नकली और रुग्ण बीज ..क्योंकि इन सौदागरों को चाहिए मुनाफ़ा और इस मुनाफे के लिए ये तमाम नकली कंपनियों के अप्रमाणित बीजों को फैला देते है हमारी जमीन पर किसान के माध्यम से ...और यही वजह किसान की खुद की निर्भरता ख़त्म हो गयी और वह आश्रित है इन सरकारों और बाज़ार का ..दरअसल यह किसान जान ही नहीं पाया की कब वह किसान से मजदूर बन गया व्यवस्था का ...आज न तो उसकी थाली में अन्न के असली दाने है और न वे सुनहरे बीज जिन्हे वह उगाता था वसुंधरा की गोद में ....अब वह बोता है नपुंसक बीज जिनमे जरूरी होता है जहर यानी कीटनाशक और उगाता है नकली अन्न के दाने .......यही दास्ताँ है अन्नदाता की एक घिनौना सफर जिसने उसे मालिक से मजदूर बना दिया .....जिम्मेवार कौन ? यह सवाल उभरता है और डूब जाता है हर बार सरकारी फाइलों में अखबार की कतरनों में और लोगों के जहन में ....





कृष्ण कुमार मिश्र 
संस्थापक -संपादक : दुधवा लाइव 
editor.dudhwalive@gmail.com
krishna.manhan@gmail.com






Dec 23, 2014

आज का दिन मुक़र्रर है अन्नदाता के नाम...



23 दिसंबर 2014 किसान दिवस

समाजवाद का ये ही नारा- नही मरा किसान हमारा !

गत 26 फरवरी को विधान सभा सत्र में उत्तर प्रदेश के बाँदा जिले से कांग्रेस के विधायक दलजीत सिंह ने और हमीरपुर से भाजपा विधायक साध्वी निरंजन ज्योति ने बुंदेलखंड में किसान आत्महत्या और कर्ज से खुदकुशी का मामला प्रश्नकाल में उठाया.

साध्वी निरंजन ने बाकायदा किसानो के नाम गिनवाकर सदन से पूछा कि बुंदेलखंड का किसान कर्ज से टूट कर आत्महत्या क्यों कर रहा है ? अब तक कितने किसानो ने बुंदेलखंड में आत्महत्या की है ?


उन्होंने राजस्व मंत्री अम्बिका चौधरी से जानना चाहा कि किसानो का इस बेमोसम बारिस से कितना नुकसान हुआ , किसान को कितना मुआवजा दिया जायेगा और कब ? इस पर जवाब में सपा के शिवपाल सिंह यादव और राजस्व मंत्री ने कहा कि बुंदेलखंड का आज तक कोई किसान कर्ज से नहीं आत्महत्या किया है ! जबकि बीते साल के अंत तक बुंदेलखंड में 3269 किसानो ने कर्जखोरी में आत्महत्या की है l और 7 जनवरी 2014 से 14 नवम्बर 2014 तक कुल 58 किसान आत्महत्या से जान दिए है जहाँ तक कर्जमाफी का सवाल है तो समाजवादी सरकार ने बुंदेलखंड में 29928 किसानो का 62 करोड़ 82 लाख 74 हजार 617 रुपया कर्जा माफ़ किया है ! यहाँ ये भी बतलाना है कि बुंदेलखंड का अधिकतर किसान बड़े बैंक मसलन एसबीआई, इलाहाबाद यू.पी. ग्रामीण बैंक अन्य का कर्जा लिए है जबकि न के बराबर किसान कापरेटिव बैंक से कर्जा लिए है जिसका कर्जा समाजवादी सरकार ने माफ़ी किया है.



  चुनाव पूर्व इसी सरकार के नेताओ ने किसानो का पूरा कर्जा माफ़ किये जाने की घोषणा की थी सरकार ने कभी ये माना ही नही कि कोई किसान कर्ज से मर रहा है ये सरकार रही हो या और कोई  मगर हाँ जब जिसकी सरकार नही होती है तो अवश्य विपक्षी दल किसान को मुद्दा बनाने का काम कर रहा होता है सत्ता आने पर सब भूल जाते है इस किसान को  लोकसभा चुनाव 2014 में हर पार्टी का अपना चुनावी मेनिफेस्टो – घोषणा पत्र बना. विकास के बरगलाने वाले और अच्छे दिनों के ख्याली मुद्दों के साथ केंद्र सरकार भी बन गई.

 माननीय लोगो के अगर पिछले 5 साल के रिपोर्ट कार्ड देखे जाये तो शायद कोई सांसद अपने मतदान क्षेत्र में एक माह भी लगातार रहा हो ये बड़ी बात है क्यों हर लोकसभा या विधान सभा क्षेत्र का घोषणा पत्र वहां की आवाम या किसान के साथ बैठकर तैयार नही किया जाता है ? आखिर क्यों जनता से ये नही पूछना वाजिब समझा जाता है कि आपको विकास किन शर्तो पर और किस स्वरुप में चाहिए ?



केन – बेतवा नदी गठजोड़ जैसी प्रकृति विरोधी बांध परियोजना बनाकर केन्द्रीय जल संसाधन मंत्री उमा भारती कौन सा जल संकट समाधान करने जा रही है ? नपुंसक बीजो पर खेतो में तैयार होती फसले सरकारी खाद और बीज गोदाम के चक्कर लगाकर कमीशन खोरी में तरबतर है. ओला, पाला या सूखे से टूटे खेतो की जान लेने का ज़िम्मेदार ये किसान नीतियाँ ही है जिनमे किसान हित नही होता बल्कि यूज़ कर्जदार , मुफ्तखोर बना देने की साजिश होती है. 

यह सियासत को ही तय करना पड़ेगा, किसान को गर अन्नदाता मानकर चलते है तो चुनाव के पहले और बाद में उसको कृषि नीति में सहभागी नियोक्ता के रूप में रखना चाहिए. नदी – बांध परियोजना बनाते समय किसान – आदिवासी लोगो से सुझाव लेना चाहिए.


आशीष सागर दीक्षित (लेखक बुंदेलखंड की जल जंगल और जमीन के मसायल पर संघर्षशील सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार व् प्रवासनामा पाक्षिक पत्रिका के संपादक है इनसे prawasnama@gmail.com पर संपर्क कर सकते है ) 

Dec 18, 2014

लीमा में बनी सहमति का मतलब

कोरल डेवनपोर्ट 



यह इतिहास में पहली बार हुआ है। विगत रविवार को लीमा में वार्ताकार इस पर राजी हो गए कि सभी देश ग्रीन हाउस गैस की उत्सर्जन दर को कम करने का प्रयास करेंगे। हालांकि अब भी यह ग्लोबल वार्मिंग के खतरनाक और खर्चीले प्रभाव से खुद को बचाने का छोटा प्रयास ही होगा। मगर लीमा में 196 देशों के प्रतिनिधियों ने उस मसौदे को कुबूल कर लिया है, जिस पर अगले वर्ष पेरिस में हस्ताक्षर होने हैं।


संयुक्त राष्ट्र के अधिकारी इस मसौदे को शुक्रवार को ही सार्वजनिक करने वाले थे, लेकिन अमीर और गरीब देशों के बीच तकरार की वजह से रविवार तक मामला टलता रहा। नए मसौदे के अनुसार, अगले छह महीने के अंदर सभी देशों को ग्लोबल वार्मिंग कम करने को लेकर घरेलू नीतियां बनानी होंगी। यही नीतियां 2015 के पेरिस समझौते का आधार होंगी, जो 2020 में प्रभावी होंगी। यह एक बेहतर ग्लोबल वार्मिंग समझौते को लेकर उस राजनीतिक गतिरोध का टूटना है, जिसे खत्म करने के लिए संयुक्त राष्ट्र पिछले 20 वर्षों से प्रयास कर रहा था। अब तक सारी चर्चाएं क्योटो प्रोटोकॉल के आधार पर ही होती रही थीं, जिसे लेकर विकसित और विकासशील देशों में मतभेद रहा है। इसमें विकसित देशों को बाध्य किया गया था, मगर चीन और भारत जैसे दो बड़े ग्रीन हाउस उत्सर्जक देश इससे मुक्त थे।


शोध करने वाली एक अंतरराष्ट्रीय संस्था द वर्ल्ड रिसोर्स इंस्टीट्यूट से जुड़ी जेनिफर मॉर्गन कहती हैं, 'यह नया समझौता अंतरराष्ट्रीय सहयोग का एक ऐसा नया रूप है, जिसमें सभी देश शामिल हैं। इसलिए कहना अतिशयोक्ति नहीं कि पेरिस का नया वैश्विक समझौता बस मुट्ठी में ही है।' हालांकि लीमा की राजनीतिक सफलता से भी समझौते का यह घोषित लक्ष्य स्वतः नहीं पाया जा सकता कि महज वैश्विक उत्सर्जन को कम करने से ही 3.6 डिग्री फारेनहाइट से ज्यादा बढ़ रही वैश्विक गर्मी से धरती को बचाया जा सकता है। यही वजह है कि समुद्री जलस्तर बढ़ने, समुद्री बर्फ के पिघलने, बाढ़ और अकाल बढ़ने, खाद्यान्न और जल की कमी और अत्यधिक तूफान जैसे खतरनाक और अपरिवर्तनीय प्रभावों में धरती के डूबने की आशंका वैज्ञानिक जता रहे हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि जिन प्रतिबद्धताओं की बात मसौदे में कही गई है, वे उन प्रयासों के आधे हैं, जो 3.6 डिग्री फारेनहाइट की वृद्धि रोकने के लिए जरूरी हैं। इसलिए समझौते में तापमान में हो रही वृद्धि को रोकने के लिए उत्सर्जन कम करने का स्तर दोगुना करना होगा। हालांकि लीमा समझौते के बाद अब गेंद देशों की संसदों तथा ऊर्जा, आर्थिक और पर्यावरण मंत्री अथवा मंत्रालयों के पाले में है कि वे कार्बन कटौती को लेकर अपना दायित्व कितना पूरा कर पाते हैं।


पर्यावरण को लेकर काम करने वाली कुछ संस्थाओं ने नए मसौदे की 'नरम' भाषा की आलोचना की है। उनका कहना है कि इस दिशा में कठोर पारदर्शी प्रयासों की जरूरत है। मसलन, उत्सर्जन में जब से कटौती की जाएगी, उसका एक ही टाइम टेबल और एक ही बेस लाइन वर्ष होगा। लीमा समझौते में सरकारों को इन मापकों के इस्तेमाल की बात तो कही गई है, लेकिन इसे जरूरी नहीं बताया गया है। इसलिए यूनियन ऑफ कंसर्न्ड साइंटिस्ट्स के प्रमुख अल्डेन मेयर कहते हैं, 'हमें जितने प्रयासों की आवश्यकता है, उस लिहाज से यह काफी कम है। मगर इन समझौतों के साथ ही हम बढ़ना चाहेंगे, ताकि दबाव बन सके।' मेयर और अन्य विशेषज्ञ गैर सरकारी समूहों, अनुसंधान संस्थानों और विश्वविद्यालयों की वकालत करते हैं, ताकि वे देशों की कार्बन कटौती नीतियों की स्वतंत्र समीक्षा कर यह बता सकें कि तुलनात्मक रूप से उनकी नीति कितनी तर्कसंगत है।


बहरहाल, इससे इन्कार नहीं कि अमेरिका और चीन में हुआ पर्यावरण समझौता ही लीमा समझौते के लिए उत्प्रेरक बना। ग्रीन हाउस गैसों के दो सबसे बड़े उत्सर्जक देशों के मुखिया अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कार्बन उत्सर्जन में कटौती करने को लेकर पिछले दिनों समझौता किया था। इसी समझौते ने तय किया कि गरीबों की बड़ी आबादी होने के बाद भी विकासशील देशों को कार्बन कटौती के गंभीर प्रयास करने चाहिए। इसलिए लीमा में चीन के राष्ट्रीय विकास और सुधार आयोग के उप मंत्री शी जेन्हुआ ने कहा कि इसकी सफलता ने पेरिस की सफलता के लिए एक अच्छी नींव रख दी है।


ग्रीन हाउस गैस के तीसरे सबसे बड़े उत्सर्जक देश भारत ने भी लीमा समझौते की तारीफ की है। पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर का कहना है, भारत इसे लेकर सहमत है। हालांकि बढ़ रहे कार्बन प्रदूषण में शुद्ध कटौती को लेकर प्रतिबद्धता जताने से भारत ने इन्कार किया है। उसका कहना है कि सस्ते कोयला आधारित बिजली संयंत्रों के इस्तेमाल में कटौती नहीं होनी चाहिए, क्योंकि लाखों गरीब भारतीय अब भी बिजली के बिना रहते हैं। लेकिन उसने यह संकेत जरूर दिया है कि उत्सर्जन की अपनी दर को कम करने के लिए वह योजना बनाने का इरादा रखता है।


हालांकि लीमा समझौते के बाद सभी देशों के लिए यह जरूरी हो जाएगा कि उत्सर्जन को कम करने को लेकर वे योजना प्रस्तुत करें, पर उनकी अर्थव्यवस्था के आकार के मुताबिक योजनाओं का चरित्र अलग-अलग हो सकता है। अमेरिका जैसे विकसित देशों से यह उम्मीद है कि वे इन योजनाओं के साथ सामने आएंगे कि आखिर कैसे 2020 के बाद वे अपने उत्सर्जन का स्तर नीचे ले जाएंगे। इसी तरह चीन जैसी बड़ी, लेकिन विकासशील अर्थव्यवस्था वह वर्ष स्पष्ट करेगी, जो उत्सर्जन के लिहाज से उनका शिखर होगा। जबकि गरीब अर्थव्यवस्था से ऐसी योजनाओं की उम्मीद होगी, जिसमें उनके प्रदूषण बढ़ाने की बात तो होगी, पर उसकी दर धीमी रहेगी।

     साभार: अमर उजाला 




कोरल डेवनपोर्ट  (Coral Davenport) न्यूयार्क टाइम्स में ऊर्जा व् पर्यावरण नीतियों के मामलों की लेखिका हैं इनसे coral.davenport@nytimes.com संपर्क पर कर सकते है.

Dec 16, 2014

आखिर क्यों निकलना पड़ता है इन्हें अपने जंगलों से बाहर...

अर्धवयस्क बाघिन को बेहोश कर रेस्क्यू दल उसे रेडियो कॉलर पहनाते हुए 


बाघ शावक ने खेत में बंधी गाय का किया शिकार 
पन्ना टाइगर रिजर्व के बाहर छतरपुर जिले के चुरारन गांव की घटना 
रेस्क्यू टीम ने अर्धवयस्क बाघिन को बेहोश कर मड़ला परिक्षेत्र में छोंड़ा 
पन्ना, 12 दिसबर - 
म.प्र. के पन्ना टाइगर रिजर्व की सीमा से बाहर निकलकर एक अर्धवयस्क बाघिन ने छतरपुर जिले के चुरारन गांव स्थित खेत में बंधी एक गाय का शिकार किया है. घटना की जानकारी मिलते ही पन्ना टाइगर रिजर्व के अधिकारी रेस्क्यू दल के साथ मौके पर पहुंचे और इस 17 माह की अर्धवयस्क बाघिन को बेहोश करके उसे सुरक्षित तरीके से पन्ना टाइगर रिजर्व के मड़ला वन परिक्षेत्र में गुरूवार को स्वच्छन्द विचरण के लिए छोड़ दिया है. 
पन्ना टाइगर रिजर्व के क्षेत्र संचालक आर.श्रीनिवास मूर्ति ने घटना की जानकारी देते हुए आज बताया कि मादा बाघ शावक पन्ना - 433 विचरण करते हुए रिजर्व क्षेत्र से बाहर निकल गई थी. इसके द्वारा छतरपुर जिले में स्थित चन्द्रनगर परिक्षेत्र के बाहर नादिया बेहर के आगे चुरारन गांव के खेत में बंधी एक गाय का किल किया गया था. यहां चारो तरफ आबादी का माहौल था, फलस्वरूप गांव के लोगों ने जैसे ही इस मादा बाघ शावक को देखा तो यह खबर पूरे इलाके में फैल गई. जानकारी मिलने पर तत्काल पन्ना टाइगर रिजर्व एवं छतरपुर वन मण्डल का अमला मौके पर पहुंच गया. घटना स्थल का जायजा लेने के बाद प्रशिक्षित हांथियों की मदद से उक्त मादा बाघ शावक को बेहोश करके उसे दोबारा पन्ना टाइगर रिजर्व के भीतर पहुंचा दिया गया है. इस अर्धवयस्क बाघिन की पहचान पन्ना 433 के रूप में की गई है, जो बाघिन टी - 4 की संतान है. इस बाघिन की विगत माह मौत हो चुकी है.

बाघिन टी - 4 की असमय मौत होने के बाद उसके तीन अर्धवयस्क शावक अनाथ हो गये, जिनमें से एक पन्ना - 433 है. अनाथ हो चुके तीनों शावक कुछ दिनों तक अपनी मां की तलाश करते रहे लेकिन जब वह नहीं मिली तो तीनों एक साथ रहने लगे. लेकिन बीते कुछ दिनों से यह मादा शावक अपने दोनों भाईयों से बिछुड़ गई और भटककर चुरारन गांव के क्षेत्र में पहुंच गई. जहां पर इसने खेत में बंधी गाय का शिकार किया. क्षेत्र संचालक श्री मूर्ति ने बताया कि इस अर्धवयस्क बाघिन की पीठ के ऊपर पुराना घाव भी देखा गया है. ऐसी आशंका जताई जा रही है कि यह घाव किसी अन्य बाघ या फिर तेंदुए के हमले से हुआ होगा. बाघिन को बेहोश किये जाने के उपरान्त पन्ना टाइगर रिजर्व के वन्य प्रांणी चिकित्सक डा. संजीव कुमार गुप्ता द्वारा घाव का समुचित इलाज किया गया. ऐसा बताया गया है कि यह घाव जल्दी ही ठीक हो जायेगा. पूरे कार्यक्रम का नेतृत्व एस.के. मण्डल मुय वन संरक्षक छतरपुर के द्वारा किया गया. बेहोश करने की कार्यवाही पन्ना टाइगर रिजर्व के वन्य प्रांणी चिकित्सक डा. सजीव कुमार गुप्ता के द्वारा की गई. इस दौरान क्षेत्र संचालक आर.श्रीनिवास मूर्ति, डा. राघवेन्द्र श्रीवास्तव वन मण्डलाधिकारी छतरपुर, डा. अनुपम सहाय उप संचालक पन्ना टाइगर रिजर्व मौजूद रहे. मौके पर भीड़ के नियंत्रण की जिमेदारी छतरपुर पुलिस विभाग के द्वारा निभाई गई. 


अर्धवयस्क बाघिन को पहनाया गया रेडियो कॉलर 
बाघों से आबाद हो चुके पन्ना टाइगर रिजर्व में नर बाघों की तादाद मादा बाघों की तुलना में अधिक है. इस असंतुलन के चलते मादा बाघ शावकों व बाघिनों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाता है. अर्धवयस्क बाघिन पन्ना - 433 की चौबीसों घंटे निगरानी हो सके तथा यह दोबारा रिजर्व वन क्षेत्र के बाहर न जा पाये, इसके लिए पार्क प्रबंधन द्वारा इसे रेडियो कॉलर पहना दिया गया है. पन्ना टाइगर रिजर्व की सभी बाघिनों को सुरक्षा के लिहाज से व्ही.व्ही.आई.पी. का दर्जा प्राप्त है, अब इस अर्धवयस्क बाघिन को भी इसी दर्जे की सुरक्षा प्रदान की जायेगी ताकि आगे चलकर यह बाघों की वंशवृद्धि में योगदान कर सके. मालुम हो कि पन्ना टाइगर रिजर्व में जन्में तकरीबन आधा दर्जन बाघ शावक (नर) वयस्क होने के बाद पन्ना टाइगर रिजर्व के बाहर विचरण कर रहे हैं. 

अरुण सिंह 
पन्ना 
मध्य प्रदेश भारत 
aruninfo.singh08@gmail.com



Dec 15, 2014

देखने काबिल है पन्ना के लखनपुर सेहा का मशरूम रॉक

पन्ना शहर के निकट स्थित लखनपुर सेहा का मशरूम रॉक 

जैव विविधता से परिपूर्ण है यहां का घना जंगल
पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र बन सकता है यह स्थल 

पन्ना- जिला मुयालय पन्ना से महज 10 किमी. की दूरी पर सड़क मार्ग के निकट स्थित लखनपुर सेहा का घना जंगल तथा ऊंची मीनार जैसा नजर आने वाला यहां का मशरूम रॉक देखने जैसा है. जैव विविधता से परिपूर्ण इस मनोरम स्थल में पर्यटन विकास की असीम संभावनाएं मौजूद हैं, फिर भी आश्चर्य इस बात का है कि अभी तक प्रकृति की इस अनूठी और विस्मय विमुग्ध कर देने वाली कृति की ओर शासन व प्रशासन का ध्यान नहीं गया. यदि इस स्थल का समुचित विकास हो जाय तो यह देशी व विदेशी पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र बन सकता है. 

उल्लेखनीय है कि पन्ना जिले को प्रकृति ने अनुपम सौगातों से नवाजा है. यहां के हरे - भरे घने जंगल, अनूठे जल प्रपात व गहरे सेहे देखकर लोग हैरत में पड़ जाते हैं कि यहां इतना सब है फिर भी यह इलाका पिछड़ा और गरीब क्यों है? पन्ना शहर में जहां भव्य व विशाल प्राचीन मंदिर हैं वहीं इस जिले में ऐतिहासिक महत्व के स्थलों की भी भरमार है. प्रकृति तो जैसे यहां अपने बेहद सुन्दर रूप में प्रकट हुई है. यदि इन सभी खूबियों का सही ढंग से क्षेत्र के विकास व जनकल्याण में रचनात्मक उपयोग हो तो इस पूरे इलाके का कायाकल्प हो सकता है. पन्ना शहर के बेहद निकट स्थित लखनपुर का सेहा एक ऐसा स्थान है जो इस जिले को पर्यटन के क्षेत्र में समानजनक स्थान दिलाने की क्षमता रखता है. जरूरत सिर्फ इस बात की है कि इस अनूठे स्थान को देश व दुनिया के सामने सही तरीके से प्रस्तुत किया जाय तथा इस स्थल का अपेक्षित व जरूरी विकास किया जाय. 

जानकारों का यह कहना है कि लखनपुर का सेहा सैकडों वर्षों से बाघों का प्रिय रहवास रहा है. यहां पर सैकडों प्रजाति की जहां वनस्पतियां व वृक्ष पाये जाते हैं वहीं वन्य जीवों के मामले में भी यह जंगल अत्यधिक समृद्ध है. बारिश के मौसम में तो लखनपुर का सेहा जीवंत हो उठता है. पहाड़ के ऊंचे शिखरों से जब जल प्रपात के रूप में पानी की धारा नीचे गिरती है तो यह नजारा लोग अपलक होकर निहारते हैं. इसी सेहा से होकर रूंज नदी गुजरती है, क्यों इस जंगल और पहाड़ का पानी इसी नदी में जाकर मिलता है. सब कुछ इतना निराला और अनूठा है कि इस स्थान के बारे में यही कहा जा सकता है कि अवश्य देखिये यह देखन जोगू मशरूम रॉक है वल्चरों का बसेरा 

ऊंची मीनार की शक्ल जैसा दिखने वाला लखनपुर सेहा का मशरूम रॉक आकर्षण का केन्द्र बिन्दु है. प्रकृति ने इस कलाकृति को बड़े ही अनूठे अंदाज में गढ़ा है. पहली मर्तबे जो कोई यहां जाता है वह यहां के घने हरे - हरे भरे जंगल का विहंगम दृश्य व मशरूम रॉक के अद्भुत नजारे को देख अवाक रह जाता है. ऊंचे पहाड़ों के बीच स्थित यह मशरूम रॉक बल्चरों का सुरक्षित ठिकाना भी है. यहां के जंगल में दर्जनों की संया में बल्चर ऊंची उड़ान भरते नजर आते हैं. कुछ आकाश की ऊंचाई को नापते हुए उड़ते हैं तो कुछ इस मीनार में आकर विश्राम करते हैं. बल्चरों के लिए शायद यह बेहद प्रिय व अनुकूल जगह है, क्यों कि यहां उनकी जिन्दगी में किसी भी तरह का कोई खलल और बाधा नहीं है. 


पर्यटन विकास समिति इस ओर दे ध्यान 

पन्ना जिले में पर्यटन विकास की संभावनाओं की तलाश करने के लिए अभी हाल ही में कलेक्टर आर.के. मिश्रा द्वारा जिला स्तरीय समिति का गठन किया गया है. प्रदेश शासन द्वारा वर्ष 2015 को पर्यटन वर्ष के रूप में मनाये जाने की घोषणा की गई है. इसी परिप्रेक्ष्य में पर्यटन वर्ष मनाने के लिए पन्ना जिले में भी कार्य योजना तैयार की जा रही है. जिसके लिए बकायदे समिति बनाई गई है जिसमें जिले के कई प्रमुख अधिकारियों को शामिल किया गया है. इस अच्छे अवसर का पन्ना जिले को भरपूर फायदा मिल सकता है, क्यों कि इस जिले में वह सारी चीजें और परिस्थितियां मौजूद हैं जो एक अच्छे पर्यटन स्थल के लिए जरूरी हैं. यदि पर्यटन विकास समिति ने रूचि के साथ कार्य किया और बेहतर कार्ययोजना बनाई तो पन्ना एक अनूठा पर्यटन स्थल बन सकता है. 



अरुण सिंह 
पन्ना 
मध्य प्रदेश भारत 
aruninfo.singh08@gmail.com




Dec 12, 2014

एक लालची करुणाहीन शिकारी की तरह जिसकी हवस अंतहीन है.....




प्रवासनामा एक बहुत सुन्दर शब्द ...असल में हम सभी प्रवासी ही तो है। धरती पर इंसान और जानवर में फर्क इतना है की सभ्यता के विकास के साथ इंसान ने ठहरना सीख लिया एक जगह वजह थी कृषि का सृजन जिसे इंसानी दिमाग ने धीरे धीरे विकसित किया और आज चरम पर आकर वैज्ञानिक प्रयोगों और अतिउत्पादन की लालसाओं ने कृषि की बुनियाद को खोखला कर दिया नतीजतन हमारी बुनियादी जरूरतें भी प्रवासी हो गयी। हम एक जगह से दूसरी जगह उसी सदियों पुराने आदमी की आदिम प्रवृत्ति को दोहराने लगे फर्क बस इतना है की तब संसाधनों से भरी धरती का दोहन हम अपने और अपने परिवार के लिए करते थे और अब हम दूर दूर जाकर जल जंगल जमीन को खोजकर उसका व्यापार करते है! समय दोहरा रहा है खुद को और हम भी प्रक्रियाओं के दोहराव में है पर एक लालची करुनाहीन शिकारी की तरह जिसकी हवस अंतहीन है।

धरती को नोचता खसोटता ये इंसान जिसकी शक्ल तो काफी कुछ आदिम मनुष्य से मिलती है पर मौजूदा आदमी जो इंसानियत का आविष्कार करने के बाद खुद को इंसान कहता आया है इसकी इंसानियत की परिभाषाएं बदली हुई...

प्रवास धरती के जीवों की मूल प्रवत्तियों में से एक है और जो उस जीव के जीने और अपनी नस्ल को वजूद देने के लिए एक बुनियादी जरूरत रही है। आदमी की इस कहानी में बड़े खूबसूरत प्रवासों का जिक्र है बापू को ही ले तो साउथ अफ्रीका में प्रवास के कारण क्रान्ति का बिगुल बजा। भारत भूमि में ऋषियों के जगह जगह प्रवास कर शिक्षा और नैतिकता का प्रसार और प्रचार हुआ। महावीर और गौतम के प्रवासों ने भारत भूमि के कोने कोने में शिक्षा शान्ति और प्रेम का प्रादुर्भाव किया।

पशु पक्षी बाघ तितली सभी जीव अपनी जरूरतों की खातिर प्रवास करते है विभिन्न स्थानों पर प्रकृति से कुछ लेते है तो परागण और बीज प्रकीर्णन की प्रक्रियाओं में सहयोग के साथ साथ वहां के जैविक संतुलन में भी अपनी भूमिका निभाते है।

बस प्रवासन की कहानियों के वे दस्तावेज तैयार करने है प्रवास नामा में जो इस बात को समझा सके की हम धरती के प्रवासी जिन जिन जगहों पर प्रवास करते है तो उस जगह की प्राकृतिक संपदा का कितना शोषण करते है और हमारी कितनी सकारात्मक  भूमिका होती है प्रकृति के लिए। और हाँ उन चेहरों को भी बेनकाब कर यह सुनश्चित किया जाए की जो बुनियादी जरूरतों के अलावा जल जंगल जमीन का सौदा करते है उन सौदागरों की भी एक फेहरिस्त तैयार हो।

वसुंधरा के हम सभी प्रवासियों को अब प्रवास नामा लिखना होगा ताकि सनद रहे की हमने जीने की जरूरतों से अलाहिदा इस धरती को कितना नोचा है और अगर कोइ सज़ा मुक़र्रर हो सके तो इन अपराधियों को जरूर हिरासत में ले अन्यथा एक दिन हम जीने के लिए पानी की बूँद बूँद और हरियाली के टुकड़ों की खातिर लड़ते लड़ते ख़त्म हो जायेंगे और इस पश्चाताप के साथ की जहां हमें प्रवास मिला पानी मिला अन्न मिला जीने का सब सामान, हमने उस धरती को बंजर कर दिया और बंजर जमीनों में बीज नहीं उगते...


प्रवास नामा में प्रकृति कृषि और आदम सभ्यता की कहानियों का सुन्दर दस्तावेजीकरण हो और जिससे हम और हमारी सरकारे कुछ सीख सके और हमारी वसुंधरा की हरियाली में इजाफा हो बस इसी आशा के साथ प्रवास नामा के अतुलनीय सफर को शुभकामनाएं।।।।
कृष्ण 

(यह लेख बुंदेलखंड से प्रकाशित पाक्षिक पत्रिका "प्रवासनामा" के नवम्बर अंक में प्रकाशित हो चुका है)





संपादक की कलम से........ 
कृष्ण कुमार मिश्र 
editor.dudhwalive@gmail.com
संस्थापक संपादक 
दुधवा लाइव पत्रिका व् दुधवा लाइव  रेडियो 

Dec 11, 2014

एशिया पेसिफिक मंथन पुरस्कार २०१४ में दुधवा लाइव को किया गया नामित



नई दिल्ली: इंडिया हैविटेट सेंटर में चार दिसम्बर को आयोजित एशिया पेसिफिक मंथन पुरस्कार २०१४ में दुधवा लाइव डिजिटल मैगजीन व् दुधवा लाइव रेडियों को नामित किया गया. इस आयोजन में ३५ देशों ने हिस्सा लिया जिसमे श्रीलंका, बांग्लादेश व् पाकिस्तान के तकनीकी संस्थाओं व् इन्नोवेटर्स ने प्रमुखता से अपनी हिस्सेदारी की. इंडिया हैविटेट सेंटर में पुरस्कार समारोह के अतिरिक्त डिजिटल डेवलपमेंट समिति का भी आयोजन किया गया जिसमे तमाम देश विदेश की संस्थाओं ने हिस्सा लिया, इस समिति में श्रीलंका के शिक्षा मंत्री बंदुला गुनावर्धने ने मुख्य अतिथि के तौर पर विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों को संबोधित किया.

इस आयोजन के प्रमुख डिजिटल एम्पावरमेंट फाउन्डेसन के संस्थापक ओसामा मंजर थे और कार्यक्रम समिति के सरंक्षकों में सैम पित्रोदा, प्रो. अनिल गुप्ता, प्रो. अशोक झुनझुनवाला, डॉ. आर इ माशेलकर जैसी हस्तियाँ रही. यूनेस्को की संस्कृति कार्यक्रम विशेषग्य मो चीबा व्  योर पब्लिक इंटरेस्ट रजिस्ट्री के वाइस चयरमैन ने कार्यक्रम में शिरकत की. 



दुधवा लाइव ने इंडिया हैविटेट सेंटर नई दिल्ली में लगाई प्रदर्शनी

नई दिल्ली: इंडिया हैविटेट सेंटर में दुधवा लाइव ने वन्य जीवन से सम्बंधित तस्वीरों एवं तराई के जंगलों की कहानियों को इस वैश्विक मंच पर प्रस्तुत किया, तस्वीरों, व् डिजिटल तकनीक से विभिन्न आडियो व् वीडियों व् पावर पाइंट प्रजेंटेशन के जरिये एशिया पेसिफिक देशों से आये प्रतिनिधियों को तराई के जंगलों की जैविक विविधिता व् पर्यावरण की समस्याओं से अवगत कराया. 

इंडिया हैविटेट सेंटर में लगे उस डिजिटल बाजार में विश्व की वन्य जीवन व् पर्यावरण पर पहली हिन्दी पत्रिका दुधवा लाइव व् दुधवा लाइव वेब रेडियो को दुनिया से आये तमाम तकनीकी विशेषज्ञों व् आगुन्तकों द्वारा अत्यधिक सराहना मिली. 

तराई के जंगलों पर केन्द्रित दुधवा लाइव की इस प्रदर्शनी को दुधवा लाइव के संस्थापक व् सम्पादक कृष्ण कुमार मिश्र ने आयोजित किया, दुधवा लाइव टीम के प्रमुख सहयोगी सदस्यों में हिमांशु तिवारी, सुशांत झा, मंगेश त्रिवेदी, व् सतपाल सिंह मौजूद रहे.


गौरतलब है की मंथन अवार्ड २०१४ नई दिल्ली इंडिया हैविटेट सेंटर में दुधवा लाइव को ई उत्तरा पुरस्कारों की श्रंखला में बेस्ट इनीसिएटिव ऑफ़ ई उत्तरा अवार्ड २०१४ में प्रथम श्रेणी में स्थान मिला.


दुधवा लाइव डेस्क  


     

विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था