International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Save Tiger

DON'T LET WILD TIGERS DISAPPEAR

Lady Rosetta

Potatoes with low sugar content and longer shelf life.

अबूझमाड़ के जंगल

जहां बाघ नही नक्सली राज करते हैं

खवासा का आदमखोर

जहां कांपती थी रूह उस नरभक्षी से

जानवर भी करते हैं योग

योगाचार्य धीरज वशिष्ठ का विशेष लेख

Oct 20, 2014

दुधवा में हिमरानी गैंडा की हुई मौत


दुधवा के गैंडा परिवार को चैथी पीढ़ी तक पहुंचाने में रहा योगदान


दुधवा में मादा गैंडा हिमरानी का पोस्टमार्टम करते डाक्टर

दुधवा नेशनल पार्क से देवेंद्र प्रकाश मिश्रा की रिपोर्ट

पलियाकलां-खीरी। दुधवा नेशनल पार्क में चल रही गैंडा पुर्नवास परियोजना की फाउंडर मेम्बर मादा गैंडा हिमरानी की बीमारी की चलते असमय मौत हो गई। इसके कारण दुधवा परिवार में शोक की लहर दौड़ गई। तीन डाक्टरों के पैनल से शव का पोस्टमार्टम कराया गया। बेलरायां वार्डन ने अपनी देखरेख में हिमरानी के शव को दफन करवा दिया।

दुधवा नेशनल पार्क में एक अप्रैल 1984 को विश्व की पहली गैंडा पुर्नवास परियोजना शुरू की गई थी। तब हिमरानी नामक मादा गैंडा को आसाम से यहां लाया गया था। लगभग चालिस वर्ष की आयु पूरी कर चुकी हिमरानी को बीते दिवस मानीटरिंग के दौरान बीमारी की स्थिति में सुस्त देखा गया था।

 दुधवा पार्क प्रशासन द्वारा उसके उपचार की कोई व्यवस्था की जाती इससे पहले ही बीती रात उसकी असमय मौत हो गई। इसकी सूचना से दुधवा परिवार में शोक दौड़ गई। दुधवा टाइगर रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर वीके सिंह ने बताया कि डब्ल्यूटीआई के पशु चिकित्सक डाॅ सौरभ सिंघई, राजकीय पशु चिकित्सालय परसिया के डाॅ नीरज कुमार तथा दुधवा की प्रतिनिधि डाॅ नेहा सिंघई द्वारा हिमरानी के शव का पोस्टमार्टम कराया गया है। इस दौरान डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के गैंडा विशेषज्ञ रोहित रवि भी मौजूद रहे। उन्होंने बताया कि हिमरानी ने पांच बच्चों को जन्म देकर दुधवा के गैंडा परिवार को चैथी पीढ़ी में पहुंचाया है।

 बेलरायां वार्डन एनके उपाध्याय की देखरेख में हिमरानी के शव को दफन किया गया। उल्लेखनीय है कि दिसम्बर 2012 में बाघ ने हमला करके हिमरानी गैंडा को बुरी तरह से जख्मी कर दिया था। तब डब्ल्यूटीआई के डाॅ सौरभ सिंघई एवं डाॅ नेहा सिंघई आदि ने अथक प्रयास करके उसे मौत के चंगुल से बचा लिया था। डीडी वीके सिंह ने चालिस वर्षीय हिमरानी की मौत पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए बताया कि वह दुधवा के गैंडा परिवार की सबसे बुजुर्ग सदस्य थी उसने यहां के गैंडा परिवार को चैथी पीढ़ी तक पहुंचाया उसके इस योगदान को दुधवा के इतिहास में हमेशा याद किया जाएगा।
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मादा गैंडा हिमरानी 

हिमरानी से चैथी पीढ़ी में पहुंचा दुधवा का गैंडा परिवार
बाघ के हमला से एक बार बची थी उसकी जान
दुधवा के गैंडा परिवार की थी सबसे बुजुर्ग सदस्य


दुधवा नेशनल पार्क के गैंडा परिवार को चैथी पीढ़ी तक पहुंचाने वाली फांउडर मेम्बर मादा गैंडा हिमरानी की असमय मौत से गैंडा पुर्नवास परियोजना को करारा झटका लगा है। हालांकि उसके जवान पांच बच्चों के तीस सदस्यीय गैंडा परिवार दुधवा के जंगल में स्वच्छंद विचरण कर रहा है जो यहां आने वाले पर्यटकों के लिए आकर्षण के केन्द्र बिन्दु होते हैं। 


तराई इलाका के मैदानों से एक सदी पूर्व विलुप्त हो चुके एक सींग वाले भारतीय गैंडा को फिर से उनके पूर्वजों की धरती पर बसाने की दुधवा नेशनल पार्क में विश्व की एकमात्र दुधवा पुर्नवास परियोजना चल रही है। एक अप्रैल 1984 को शुरू की गई इस परियोजना में आसाम से छह गैंडा को लाया गया था। इसमें से तीन गैंडों की असमय मौत हो जाने पर सोलह हाथी के बदले छह गैंडा नेपाल के चितवन राष्ट्रीय उद्यान से लाया गया था। उतार-चढ़ाव के तमाम झंझावतों को झेलने के बाद भी गैंडा पुर्नवास परियोजना सफलता के फायदान पर चढ़ रही है। हालांकि पितामह नर गैंडा वार्क से ही सभी सतानें हुई हैं, इसके कारण दुधवा के गैंडा परिवार पर आनुवंशिक प्रदूषण यानी इनब्रीडिंग का खतरा मंडरा रहा है। इससे निपटने के लिए बाहर से अन्य गैंडों का यहां लाया जाना आवश्यक बताया जा रहा है।

 दुधवा नेशनल पार्क की सोनारीपुर दक्षिण रेंज के 27 वर्गकिमी जंगल को ऊर्जाबाड़ से संरक्षित इलाका के पास ही गैंडों के लिए नया प्राकृतिक आवास तैयार किया गया है। इसमें आसाम से गैंडा लाने की योजना है, जो शासन में विचाराधीन चल रही है। दुधवा के गैंडा परिवार को बीती रात तब करारा झटका लग गया जब सबसे बुजुर्ग मादा गैंडा हिमरानी की बीमारी के चलते असमय मौत हो गई। चालिस बंसत देख चुकी हिमरानी ने चार मादा एवं एक नर बच्चे को जन्म देकर परियोजना को आगे बढ़ाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इसमें हिमरानी से पैदा हुए राजश्री, विजयश्री, राजरानी, सहदेव एवं हेमवती दुधवा के गैंडा परिवार की वंशवृद्धि कर रहे हैं। राजश्री ने दो तथा हेमवती ने एक बच्चे को जन्म देकर दुधवा के गैंडा परिवार की वंशवृद्धि कर रहे हैं। हिमरानी की नाक का छोटा सींग ही उसकी पहचान भी था।

 संकटकाल में गैंडा अपने सींग के घातक प्रहार दुश्मन पर करके अपनी सुरक्षा करते हैं। चूंकि हिमरानी का सींग छोटा था, इसीलिए दिसम्बर 2012 में दुधवा के इतिहास में पहली बार बलशाली बाघ ने उसपर पीछे से हमला करके गंभीर रूप से घायल कर दिया था। कड़े पहरा और सुरक्षित बाड़ा में चले उपचार के दौरान हिमरानी ने मौत को पराजित कर नई जिंदगी हासिल कर ली और फिर से जंगल मे स्वच्छंद घूमने लगी थी। दुधवा टाइगर रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर वीके सिंह ने बताया कि गैंडों की अनुमानित आयु 36 से 40 साल के बीच मानी जाती है। बाघ के हमला से तो हिमरानी की जान प्रयास करके बचा ली गई थी। लेकिन इस बार वह कुदरत की मौत से हार गई।
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देवेन्द्र प्रकाश मिश्र 
dpmishra7@gmail.com

Oct 12, 2014

उत्तर प्रदेश सरकार ने दुधवा लाइव को किया सम्मानित


पर्यावरण के क्षेत्र में जागरूकता अभियान व् पर्यावरण एवं वन्य जीवन के सरंक्षण में योगदान के लिए उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा डिजिटल एम्पावरमेंट प्रोग्राम के तहत दुधवा लाइव ई पत्रिका के संस्थापक/सम्पादक कृष्ण कुमार मिश्र को ११ अक्टूबर २०१४ को क्लार्क्स अवध में आयोजितई उत्तरा एवार्ड समारोह में सम्मानित किया. कार्यक्रम का उदघाटन उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव आलोक रंजन ने किया व् एवार्ड वितरण के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री अभिषेक मिश्रा उपस्थित रहे.




पूरे उत्तर प्रदेश में प्रत्येक जनपद से जिलाधिकारियों एवं इंटरनेट के माध्यम से नामांकन हुए जिनमे विभिन्न क्षेत्रों से  कुल १३७ नामांकन शामिल किए गए. कृषि एवं पर्यावरण में १४ नामांकन थे जिनमे अंतिम चरण में ५ नामांकनों को शामिल किया गया. पूरे उत्तर प्रदेश में पर्यावरण के क्षेत्र में बेहतर कार्य करने के लिए दुधवा लाइव पत्रिका को फाइनलिस्ट की श्रेणी में ई उत्तरा पुरस्कार दिया गया.




गौरतलब है सन २०१३ में जर्मन सरकार के डाईचे वैले संस्थान ने १४ भाषाओं में विशिष्ट कार्य करने वाले विभिन्न देशों के लोगों में भारत से दुधवा लाइव को हिन्दी भाषा में श्रेष्ठ कार्य करने के लिए "द बाब्स"  पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है.



भारत के उत्तर प्रदेश की तराई में मौजूदवनों व् कृषि क्षेत्रों में मौजूद जैव विविधिता के अध्ययन व् सरंक्षण में दुधवा लाइव पिछले पांच वर्षों से प्रयत्नशील है. पर्यावरण सरंक्षण व् गौरैया बचाओ अभियान जैसे जमीनी कार्यक्रमों द्वारा लोगों में गाँव गाँव तक पर्यावरण के प्रति जागरूकता फैलाने का कार्य किया है.



दुधवा लाइव उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त भारत के सरंक्षित क्षेत्रों के वन्य जीवों व् वनस्पतियों के सन्दर्भ में भी समय समय पर खबरे प्रकाशित करता आया है साथ ही दुनिया के तमाम देशों से पर्यावरण व् वन्य जीवन की कहानियों को दुधवा लाइव  पत्रिका में स्थान मिलता रहता है ताकि जनमानस की रूचि जीवों एवं पर्यावरण के सरंक्षण में बढ़ सके.

दुधवा लाइव ने बुंदेलखंड के अवैध खनना व् जल माफियाओं की ख़बरों को प्रमुखता से जगह दी ताकि बुंदेलखंड की धरती पर बहती नदियाँ सदानीरा रह सके.

दुधवा लाइव के प्रोजेक्ट "रेजिंग एन्वायरमेंटल अवेअरनेस थ्रू दुधवा लाइव ई मैगजीन " को डिजिटल एम्पावरमेंट फाउन्डेसन व् द पब्लिक इंटरेस्ट रजिस्ट्री संस्थान व् उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा प्रकाशित किताब में प्रमुखता से जगह दी है.


प्रकृति की कहानियों को संजोने का यह कार्य करते हुए दुधवा लाइव पत्रिका को पांच वर्ष हो गए, भविष्य में वन्य जीवन सरंक्षण, पशु क्रूरता के खिलाफ आवाज़, नदियों-तालाबों के सरंक्षण, व् कृषि क्षेत्र में मौजूद जैव विवधिता के सरंक्षण में हम यूं ही काम करते रहे इसके लिए आप सभी का सहयोग व् स्नेह की आकांक्षा है.

डेस्क दुधवा लाइव

Oct 3, 2014

विश्व प्रकृति दिवस ३ अक्टूबर पर विशेष




बाँदा – सरकारी दस्तावेजो से निकली 3 अक्तूबर की तारीख एक बार फिर आ गई  विश्व प्रकृति दिवस है आज पूरी दुनिया में आज के दिन प्रकृति को बचाने , उसे सुन्दर और अपनी गतिविधि को प्रकृति सम्यक बनाने की पुनः कसमे खाई जाएगी 

बुंदेलखंड भी तो अपना प्राकृतिक रूप से खुशहाल था न इतिहास पलटे तो यहाँ भी चन्देल कालीन स्थापित किले और मंदिर हरे – भरे जंगलो और सीना ताने पहाड़ो के मध्य ही बने थे  लेकिन कंक्रीट के विकास की रफ़्तार इतनी तेज हो गई कि हमने प्रकृति के साथ न सिर्फ बलात्कार किया बल्कि उसकी अस्मिता पर ही आज प्रश्न चिन्ह लगा दिया है l बुंदेलखंड के खजुराहो और कालिंजर के अवशेष कभी इसलिए ही ख्यातिप्राप्त स्तम्भ थे क्योकि उनको पर्यावरणीय नजर से सम्रध पाया गया था मगर अब यहाँ परती होती कृषि जमीने,प्राकृतिक संसाधनों के उजाड़ ने इसको सूखा और नदी – पहाड़ो के खनन की मंडी के रूप में स्थापित कर दिया है  एक सर्वे के मुताबिक इस प्राकृतिक उजाड़ के खेल में पल रहे है 8500 बाल श्रमिक जिनके हाथो में बस्ता नही हतौड़ा है lसात जनपद में तेजी से जंगल का प्रतिशत घट कर 7 फीसदी से कम है तो वही 200 मीटर ऊँचे पहाड़ो को 300 फुट नीचे तक गहरी खाई में तब्दील कर दिया गया है बुंदेलखंड में इस वर्ष 19 वा सूखा है l पानी का एक्यूप्रेशर कहे जाने वाले पहाड़ अब देखने में डरावने लगते है  पर यह सब प्रकृति की तबाही जारी है क्योकि हमें विकास करना है ! एक ऐसा अंधा विकास जो बुंदेलखंड को रेगिस्तान बना देगा  चित्रकूट,महोबा और झाँसी , ललितपुर यहाँ काले पत्थर के खनन और बाँदा,हमीरपुर,जालौन लाल बालू के लिए मशहूर है  एनजीटी , सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालय इलाहाबाद के कई आदेश इस प्रकृति विरोधी कार्य के लगाम लगाने में जारी हुए पर थक हारकर उसकी लड़ाई लड़ने वाले या तो खामोश हुए या करा दिए गए  ठेठ हिंदी पट्टी के केन , यमुना,मंदाकनी,बेतवा,पहुंज,धसान,उर्मिल,चन्द्रावल,बागे नदियों की कभी अविरल धार में खेलता बुंदेलखंड आज समसामयिक द्रष्टि से किसान आत्महत्या और जल संकट के लिए अधिक पहचाना जाता है 




सरकारी तंत राजस्व की आड़ में चुप है और प्रकृति के दुश्मन बेख़ौफ़ है आंकड़ो में निगाह डाले तो बुंदेलखंड के हिस्से कुल 1311 खनन पट्टे है  जिसमे 1025 चालू और 86 रिक्त है वही पुरे उत्तर प्रदेश में ये सूरत 3880 खदान पर है जिसमे 1344 खनन पट्टे चालू है बालू और पत्थर के खनन के लिए वनविभाग की एनओसी लेनी होती है कानून का राज बुंदेलखंड में नही चलता, यहाँ लोग प्रगतिशील किसान नही खनन माफिया कहलाना अधिक पसंद करते है l बकौल बाँदा जिले के तिंदवारी से कांग्रेस के विधायक दलजीत सिंह खुद कहते है ‘ हाँ मै बालू माफिया हूँ और गुंडा टैक्स भी देता हूँ  

इसके ठीक उलट एक गाँव का कर्जदार किसान गर्व से यह नही कह पाता कि हाँ मै कर्ज के मकड़ जाल में फंसा हूँ  और समय से कर्ज अदा करता हूँ क्योकि उसको तो प्रकृति के विनाश से ख़ुदकुशी ही मिलनी है दबंग , दादू विनाशकारी ताकतों की बदौलत 


सामाजिक कार्यकर्ता - आशीष सागर दीक्षित,बाँदा   
 ashishdixit01@gmail.com

विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था