International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Save Tiger

DON'T LET WILD TIGERS DISAPPEAR

Lady Rosetta

Potatoes with low sugar content and longer shelf life.

अबूझमाड़ के जंगल

जहां बाघ नही नक्सली राज करते हैं

खवासा का आदमखोर

जहां कांपती थी रूह उस नरभक्षी से

जानवर भी करते हैं योग

योगाचार्य धीरज वशिष्ठ का विशेष लेख

Jun 18, 2014

प्रणय युद्ध में दुधवा के जंगल में हुई हाथी की मौत




तीन डाक्टरों की टीम ने किया पोस्टमार्टम
फोटो: दुधवा क्षेत्र के बांकेंताल में मृत पड़ा हाथी का शव



दुधवा-खीरी से, डीपी मिश्र। दुधवा नेशनल पार्क के इतिहास में पहली बार दो नर हाथियों के बीच बांकेताल के पास हुए प्रणय युद्ध में एक युवा हाथी को अपनी जान असमय गंवानी पड़ गई। हाथी की मौत से पार्क प्रशासन में खासा हड़कंप मच गया है। सूचना पर दुधवा के एफडी शैलेष प्रसाद, डीडी वीके सिंह आदि मौके पर पहुंच गए एवं घटनास्थल का निरीक्षण किया। तीन डाक्टरों के पैनल से हाथी केशव का पोस्टमार्टम किया है। जिसमें मौत का कारण घावों से अधिक खून का बह जाना बताया गया है। हाथी के शव को पार्क अधिकारियों ने अपनी देखरेख में दफन करा दिया है।

यूपी के एकमात्र दुधवा नेशनल पार्क के जंगल में चार दर्जन से ऊपर हाथियों का दल स्वच्छंद विचरण कर रहा है। इस दल में शामिल दो युवा नर हाथियों के बीच बांकेताल के पास प्रणय को लेकर बलशाली साबित करने के लिए हुए युद्ध में कमजोर पड़े एक हाथी की मौत हो गयी। पार्क के इतिहास में प्रणय युद्ध में पहली बार हाथी की मौत की हुई घटना से दुधवा पार्क प्रशासन में खासा हड़कंप मच गया। सूचना पर दुधवा टाइगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर शैलेष प्रसाद, डिप्टी डायरेक्टर वीके सिंह, बेलरायां वार्डन आनंद कुमार, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के वरिष्ठ समन्वयक डाॅ मुदित गुप्ता आदि मौके पर पहुंच गए एवं घटनास्थल का गहनता से निरीक्षण किया। डब्ल्यूटीआई के डाॅ सौरभ सिंघई तथा राजकीय पशु चिकित्सालय सूंडा के डाॅ वीआर निगम, खजुरिया के डाॅ नीरज गुप्ता ने हाथी के शव का परीक्षण किया। लगभग दस-बारह वर्ष की आयु वाले हाथी की मौत का कारण अधिक रक्तस्त्राव बताया गया है। उसके गले तथा पिछले हिस्से में हाथी दांत के गहरे निशान मिले हैं। बीते रविवार को दोपहर बाद दो से चार बजे के आसपास हाथी की मौत होने के समय का अनुमान लगाया गया है। दुधवा के डिप्टी डायरेक्टर वीके सिंह ने बताया कि पोस्टमार्टम के बाद शव को मौके पर निगरानी में ही दफन करा दिया गया है।


देवेन्द्र प्रकाश मिश्र 
पलिया - खीरी 
dpmishra7@gmail.com

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Jun 17, 2014

ये है किशनपुर वन्य जीव विहार की खूबसूरत बाघिन

किशनपुर वन्य जीव विहार लखीमपुर खीरी में स्थित है, मौजूदा  वक्त में यह दुधवा टाइगर रिजर्व का भी हिस्सा है, शारदा नदी के निकट झादी ताल मुख्य आकर्षण का केंद्र है यहां, वजह यहाँ मौजूद बारहसिंघा की अच्छी तादाद और  बाघों का इस ताल के आसपास विचरण, किन्तु यहां बाघों व् अन्य जीवों के शिकार की घटनाएं  होती रही है, स्थानीय गाँवों के अपराधिक लोगों विशेषत: क्रिमिनल ट्राइब्स और वन्य जीव अपराधियों की साठ - गाँठ हमेशा इस वन्य जीव विहार के जीवों के लिए ख़तरा बना हुआ है. जंगल के बफर जोन में भूमि अतिक्रमणकारी भी किशनपुर के वन्य जीवन के लिए दुश्मन बने हुए है. मानव और वन्य जीवों के मध्य यहां संघर्ष जारी है, गुनहगार मानव ही जीतता है इस जंग में, जो इन जीवों के आवासों और इनकी जिंदगियों का दुश्मन है.
गर्मियों में बाघों व् अन्य वन्य जीवों के लिए सेंक्चुरी में पानी के स्रोतों की अत्यधिक आवश्यकता है. और  सुरक्षा की भी. ताकि खीरी के ये वन सदैव इस धारीदार चमकीले पीतवर्ण व् साहस के प्रतीक जंगल के राजा बाघ की प्रजाति को सरंक्षित रख सके.....

डॉ धर्मेन्द्र सिंह के कैमरे की नज़र से .......(सभी तस्वीरें: डॉ धर्मेन्द्र सिंह)












डॉ धर्मेन्द्र सिंह ( वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर, जंगलों में नियमित भ्रमण, पेशे से आटोलैरिंगोलॉजिस्ट (ई इन टी सर्जन) लखीमपुर खीरी में निवास, इनसे dharmusingh.balyan@facebook.com पर संपर्क  कर सकते हैं)

खीरी के युवाओं ने ली बागडोर नदियों को बचाने की- अफ़सोस प्रशासन और सरकार हैं तटस्थ

लखीमपुर खीरी जनपद में छोटी बड़ी नदियों का एक बड़ा जाल है जो इस धरती को उपजाऊँ बनाती है साथ ही कृषि को उन्नत भी, और बड़ी नदियों की जलधारा को मजबूत करती है ताकि वो विशाल नदियां बंगाल की खाड़ी तक पहुँच सके. मगर अफ़सोस की प्रदूषण बोर्ड के नियमों और संवेधानिक व् नैतिक कर्तव्यों से विमुख प्रशासन की नाक के टेल चीनी मिल और अन्य सरकारी व् गैर सरकारी उद्यम इन नदियों में खुलेआम जहरीला पानी व् कचरा दाल रहे है. एक बड़ी मुहीम की जरूरत ताकि भ्रष्ट तंत्र को सुधारा जा सके पर्यावरण के लिए जिसमे हम और न जाने कितने जीव व् वनस्पतियाँ निवास करती है. नदियां नहीं बची तो मानव सभ्यता प्रभावित होगी और साथ ही न जाने कितनी प्रजातियां नष्ट हो जाएंगी जो जरूरी है हमारे पारिस्थतिकी तंत्र के लिए.।इन युवाओं के जज्बे को हमारा सलाम।...  सम्पादक दुधवा लाइव।

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद,लखीमपुर-खीरी। जैसा कि विदित है कि अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद कई सप्ताह से पर्यावरण संरक्षण बचाओ कार्यक्रम चला रही है। इस श्रंखला मे उल्ल नदी की सफाई विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओ ने श्रमदान करके अपने स्तर से पुरजोर कोशिश की। इसके अगले चरण मे वृक्षारोपण, पक्षी संरक्षण, जल संरक्षण, तथा जन जागरण के लिए पर्यावरण बचाओ रैली निकाली। 

      पर्यावरण बचाओ कार्यक्रम के संदर्भ मे विद्यार्थी परिषद का प्रतिनिधि मण्डल जिला प्रमुख आशीष श्रीवास्तव और जिला संयोजक सूर्यान्श गुप्ता की अगुवाई मे खीरी सांसद अजय मिश्र टेनी से मिला और जिले मे पर्यावरण संरक्षण की दिशा मे परिषद द्वारा किये जा रहे कार्याें से अवगत कराया और जिले मे पर्यावरण सुधार की दिशा मे लाइफ लाइन, नदियो के संरक्षण व जल संसाधन एवं पर्यावरण वृक्षारोपण करवाने के लिए प्रधानमंत्री और जल संसाधन एवं पर्यावरण मंत्री को सम्बोधित ज्ञापन खीरी सांसद अजय मिश्र टेनी को सौपा। जिससे अपने जिले का पर्यावरण स्वच्छ हो और वो हरित जिला के रुप मे मानचित्र मे जाना जाये। जिला प्रमुख आशीष श्रीवास्तव ने बताया कि नदियो मे शहर का सीवेज वाटर, कचड़ा गिरने, जिले की मिलो का अपशिष्ट पदार्थ नदियो मे गिरने से नदियां नाला का रुप ले चुकी है, और नदियां अपने ही जीवन को बचाने के लिए जद्दोजहद व त्राहिमाम कर रही है। ऐसे मे जनसामान्य, प्रशासन और सरकार सभी को आगे आने की आवश्यकता है। जिला संयोजक सूर्यान्श गुप्ता ने कहा कि प्रदूषित और बदलते वातावरण के लिए हम सभी जिम्मेदार है, अतः इसको बचाने की जिम्मेदारी भी हम सभी की है। 


       इस अवसर पर जिला संयोजक सूर्यान्श गुप्ता, सह जिला संयोजक राम सहारे पाण्डेय, नगर मंत्री अमोघ वर्मा, नगर संयोजक पीयूष बाजपेई, नगर सहमंत्री जितेन्द्र अवस्थी, शशांक तिवारी, रजनीश मिश्र, कोषाध्यक्ष अपूर्वम कात्यायन, कार्यालय मंत्री मंजेश चक्रवर्ती, वरिष्ठ कार्यकर्ता अविरल शुक्ला तथा परिषद के मीडिया प्रभारी शुभम त्रिपाठी समेत तमाम कार्यकर्ता मौजूद रहे।



शुभम् त्रिपाठी
मीडिया प्रभारी
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद
लखीमपुर-खीरी
मो0 नं0: 91.8090476921

Jun 4, 2014

महुआ के फूल- एक जाती हुई संस्कृति



महुआ की महक से गुलजार महान जंगल


अविनाश कुमार चंचल

सुबह के चार बज रहे हैं - महुआ का महीना - जब जंगलों में रात-दिन महुआ बीनने (चुनने) वालों का मेला लगा है। सिंगरौली के महान जंगल में भी आसपास के जंगलवासी अपने पूरे परिवार के साथ महुआ बीन रहे हैं। परिवार के बड़े भी, बूढे भी, बच्चे भी, महिलायें और किशोर भी।



जंगल में चारों तरफ महुआ की महक बिखरी हुई है। हालांकि महुआ इसबार कम गिरा है। ऐसा लगता है कि महुआ के ये पेड़ भी कंपनी के आने की खबर सुनकर निराश हो गए हैं। आदमी और पेड़ के बीच के इस खूबसूरत संबंध को न तो कंपनी के लोग समझेंगे और न ही कंपनी को जंगल सौंपने वाली सरकार। दरअसल महान जंगल को सरकार ने महान कोल लिमिटेड (एस्सार व हिंडाल्को का संयुक्त उपक्रम) को कोयला खदान के लिए दे दिया है। महान जंगल। जिसमें करीब पांच लाख पेड़, 164 प्रजातियां और 54 गांवों के लोगों की जीविका का वास है।
पास ही एक पेड़ के नीचे एक ढिबरी की रौशनी में कुछ गांव वाले गीत गा रहे हैं। गीत और महुआ की महक ने मिलकर माहौल को मादक बना दिया है-



महुआ बीने दोहर होये जाय,
परदेशी के बोली नोहर होये जाय।




ये बोल हैं उधवा के। उधवा एक लोकगीत है। गीत में गांव वालों का महुआ के साथ संबंध है, महुआ बीनते-बीनते पैदा हुआ प्यार है। गीत में थोड़ी सी खुशी है, थोड़ा सा गम। खुशी इस बात की कि बड़ी संख्या में महुआ इकट्ठा हो गया है। दुख इस बात का कि महुआ बीनते-बीनते जिस परदेशी से लगाव हो गया था वो अब बिछड़ जायेगा। उसकी आवाज सुनने को नहीं मिलेगी। आसपास के कई गांव के लोग महुआ बीनने जंगल पहुंचते हैं। महिलाएँ भी और पुरुष भी। इस बीच अलग-अलग गांव के लोगों के बीच आपसी रिश्ता भी गहराता है। थोड़ी सी हिचकिचाहट, थोड़ी सी हंसी-ठिठोली का विस्तार प्यार के खूबसूरत रिश्ते तक पहुंच जाता है। उसी प्यारे से रिश्ते को शब्दों में पिरो कर यह गीत गाया जा रहा है।



जंगल का यह समूचा दृश्य इतना सजीव और साफ है। इतना जिन्दा, इतना संपूर्ण और शाश्वत कि एक पल को यह यकीन नहीं होता कि अगर कंपनी जंगल में कोयला खदान खोलने में सफल हो जाती है तो आने वाले सालों में सबकुछ मटियामेट हो जायेगा। महुआ, डोर, तेंदू, साल के पत्तों का हरापन, झोपड़ी, लोगों के भावुक रिश्तों को समेट गाए जाने वाले गीत- सबकुछ एक गंदे औद्योगिक कचरे,कोयले से भरी धूल में दब कर रह जायेगा। और ये हंसते-गाते, महुआ बीनते जंगलवासी जबलपुर, भोपाल, वैढ़न के किसी सड़क के किनारे मजदूरी करते नजर आयेंगे। राजधानी दिल्ली के बंद कमरे में फैसले लेने वाली सरकार और कंपनी शायद ही इस बात को समझे कि इस विकास के शोर में सिर्फ एक मनुष्य ही नहीं विस्थापित होता बल्कि उसके साथ उसका पूरा हंसता-खेलता परिवेश, जीने का ढंग भी उजड़ने को मजबूर होता है।



आदिवासी समुदाय संकोची होता है। गांवों में हँसी-मजाक और गाना गाने में संकोच करने वाला। लेकिन जब यही लोग जंगल में होते हैं तो गाते हैं और खूब गाते हैं। महिलायें गाती हैं, पुरुष गाते हैं – दोनों मिलकर गाते हैं। उधवा में दो टोली होते हैं, अलग-अलग महुआ के नीचे। एक पहले गाता है तो दूसरा उसके सुर में साथ मिलाता है।

महुआ में बहुत कुछ है। लता, महुआ रोटी, रसपुटक्का, महुआरस के सेवई का मिठास है। कुची के साथ आने वाली महक है, महुआ का फुल है, अषाढ़ (जूलाई)में महुआ के फल (डोरी) से निकलने वाला तेल है। तेल जो खाना पकाने में काम आता है, तेल जो बेहद मुलायम होता है। बुधेर गांव के  रामलल्लू खैरवार बताते हैं कि, “ठंड में शहरी लोग क्रीम लगाते हैं और हम डोरी का तेल। पैर फटने से लेकर चेहरे तक। महुआ सिर्फ हमारी आर्थिक जरुरत पूरी नहीं करता बल्कि हमारे शरीर का भी ख्याल रखता है”।



जंगल में सिर्फ महुआ नहीं बीना जाता। आपस में संबंध बेहतर किया जाता है। अपने-अपने परिवार के साथ रात-दिन जंगल में जमे लोग आपस में बातें करते हैं, लिट्टी बनाकर बांटते हैं, एक-दूसरे का हाल जानते हैं, अपने छोटे-छोटे बच्चों को महुआ बीनना सीखाते हैं, जंगल से बच्चों की पहचान करायी जाती है। ये साल का पेड़ है, ये महुआ और ये तेंदू का बताया जाता है।

जंगल में अपने छोटे नाती के साथ महुआ चुन रहे दीपचंद समझाते हैं, “हमको हमारे पिता जी लेकर आते थे जंगल, हम अपने बेटे को लेकर आए और अब हमारा बेटा अपने बेटे को लेकर आता है। इस तरह हमने जंगल की हमारी जानकारी सहेजी है। ये जानकारी कहीं लिखित में भले नहीं हो लेकिन पीढ़ियों से ये हमें ऐसे ही मिलता आया है। महुआ चुनने के साथ-साथ बच्चों को जंगल में जाने-रहने और जानवरों-पौधों से किस तरह का व्यवहार करना है भी सीखाया जाता है”।

जंगल में ही एक जंगलवासी के मन का गांठ खुलता है। उसका मन गाता है-



पत्ती त बराय बराय
पतरईली सिटी मारय, डेराय-डेराय।



गीत का अर्थ है तेंदू का पत्ता तो बहुत बड़ा और बहुत अच्छा हुआ है लेकिन इस खुशी के बावजूद पतली लड़की अभी भी गाना डर-डर कर, संकोच से ही गा रही है। इस गाने में अश्लीलता नहीं है, लाज है, संकोच है, थोड़ी सी छेड़-छाड़ और बहुत-सा प्यार है।



महुआ जंगलवासियों के बीच रचा-बसा है। महुआ-जंगल-जंगलवासी – एक दूसरे पर निर्भर। एक दूसरे का ख्याल रखते, एक दूसरे से प्यार करते- इनका जीवन चला आ रहा है सदियों से। महुआ और जंगल के आसपास ही जंगलवासियों की पूरी संस्कृति विकसित हुई है, परंपरागत जीवनशैली का विकास हुआ है। इसलिए इनके गानों में, त्योहारों में, हंसी-ठिठोली में आसानी से महुए की महक महसूस होती है।

अविनाश कुमार, ग्रीनपीस इंडिया 
avinash.kumar@greenpeace.org

विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था