International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Save Tiger

DON'T LET WILD TIGERS DISAPPEAR

Lady Rosetta

Potatoes with low sugar content and longer shelf life.

अबूझमाड़ के जंगल

जहां बाघ नही नक्सली राज करते हैं

खवासा का आदमखोर

जहां कांपती थी रूह उस नरभक्षी से

जानवर भी करते हैं योग

योगाचार्य धीरज वशिष्ठ का विशेष लेख

Feb 28, 2014

खूनी बाघ की आहट, गांव वालों ने आंखों में काटी रात


डिमरौल गांव का गुनाहगार बाघ, वापस आया गांव?

बुधवार रात दो बार बाघ ने गांव में घुसने की कोशिश

 डिमरौल में अब भी खौफ कायम, लोग लाठी डंडों को लेकर खेतों में,
बिजुआ। अपने सिर एक इंसानी कत्ल का इल्जाम लेकर घूम रहे बाघ ने क्या फिर से इसी गांव की ओर रुख कर लिया है? बुधवार रात करीब दस बजे व तीसरे पहर गांव वालों ने बाघ को गांव के करीब देखा, उन्होंने दावा किया कि वह गांव में फिर से आ रहा था, लेकिन उन्होनें हाका लगाया व आग जलाई। ऐसे करते ही ग्रामीणों की पूरी रात कट गई। वहीं वन महकमा इस दावे पर इत्तफाक जता रहा है।

बुधवार की रात करीब दस बजे डिमरौल गांव में शौच गई एक युवती ने रास्ते से गुजर रहे ट्रैक्टर की रोशनी में बाघ को देखा। युवती ने दौड़कर गांव में खबर दी, लोग लाठी, डंडे लेकर हाका लगाते हुए व ट्रैक्टर लेकर बाघ के पीछे दौड़ पड़े। बाघ के खौफ में लोगों ने रतजग्गा किया। तीसरे पहर भी करीब तीन बजे एक बार फिर गांव की ओर बाघ आने का दावा करते हुए लोगों ने हाका लगाया। 


डिमरौल गांव में बाघ के देखे जाने की सूचना महज अफवाह है। यहां पर विभागीय टीम को जो पगमार्क मिले हैं, वह कई दिनों पुराने हैं, फिलहाल वह सेमरिया गांव में हैं, यहां पगमार्क तलश जारी है। 
मंगत सिंह मलिक, रेंजर भीरा। 
----------------------------



अब्दुल सलीम खान  अमरउजाला  में  पत्रकार है, हिंदुस्तान अखबार में  कई वर्षों तक  पत्रकारिता  कर चुके है  वन्य जीवन एवं सामाजिक मुद्दों पर पैनी नज़र, गुलरिया खीरी में निवास, इनसे  salimreporter.lmp@gmail.com पर संपर्क कर सकते है. 


अब बाघ चाहते है भारतीय गाँवों की नागरिकता!


बाघ की तलाश में फिर से घूमे हाथी, नही मिला बाघ

सेमरिया, बहादुरनगर, डिमरौल में पूरे दिन हुई कांबिंग

डीएफओ, रेंजर व डब्ल्यूटीआई टीमों ने अलग-अलग घूमे

बिजुआ। भीर रेंज से निकले बाघ के बुधवार को कोई नई लोकेशन व ताजा पगमार्क न मिलने से वन महकमे ने राहत की सांस ली है। लोगों के बीच कायम खौफ को कम करने के लिए  दुधवा नेशनल पार्क के हाथी अब भी यहां डटे हैं। बुधवार को एक बार फिर दोनो हाथी सुबह से ही सेमरिया, बहादुरनगर व डिमरौल गांव के आस पास गन्ने के खेतों में बाघ की तलाश में घूमते रहे। 
डिमरौल गांव में शुक्रवार को छैलबिहारी को मौत के घाट उतारने व उसी रोज पोला ङ्क्षसह पर हमला कर घायल करने वाले बाघ की तलाश में एक बार फिर हाथी डिमरौल गांव के आस पास डटे रहे। सुबह से रेंजर मंगत ङ्क्षसह मलिक महकमे की टीम व हाथी के दल के साथ सेमरिया, बहादुर नगर व सौनाखुर्द गांव के आसपास के गन्ने के खेतों में काङ्क्षबग करते रहे। 






पांच स्कूलों में ताले खुले, खौफ में कम आए छात्र

बिजुआ। बुधवार को बेसिक शिक्षा महकमे के पांच स्कूलों में बंद ताले खोल दिए गए, लेकिन इन स्कूलों में छात्र कम आए। खंड शिक्षा अधिकारी अनुराग कुमार मिश्रा ने बताया गुरुवार को छुट्टी होने से स्कूल बंद ही रहेंगे। अगर कल कोई बाघ की नई लोकेशन नही मिलती है तो संभव है शुक्रवार को कुछ स्कूलों में बंद ताले खुल सकते हैं।




अब्दुल सलीम खान  अमरउजाला  में  पत्रकार है, हिंदुस्तान अखबार में  कई वर्षों तक  पत्रकारिता  कर चुके है ,वन्य जीवन एवं सामाजिक मुद्दों पर पैनी नज़र, गुलरिया खीरी में निवास, इनसे  salimreporter.lmp@gmail.com पर संपर्क कर सकते है. 


आखिर जाए तो जाए कहाँ ये बाघ

 ग्रामीणों ने बाघ को हांका लगाकर दूर किया आबादी से 
अब्दुल सलीम खान
डिमरौल गांव-बिजुआ से। जिस बाघ ने रात को एक इंसान को अपना निवाला बनाया था। वन विभाग की लापरवाही से आजिज आकर ग्रामीणों ने खुद ही मोर्चा संभालने का फैसला कर लिया। बाघ शिकार करने वाले गन्ने के खेत से बाहर नही गया था। ग्रामीणों ने जब गन्ने में आग लगाई तो वह एक खेत से दूसरे खेत दौड़ता रहा। ग्रामीणों ने धीरे-धीरे चार गन्ने के खेतों को आग के हवाले कर दिया। आखिरकार गांव वाले बाघ को अपने गांव की हद से बाहर करने में कामयाब रहे। दो घंटे तक चले इस पूरी कवायद में वनमहकमे व प्रशासन महज तमाशबीन बना रहा।


डिमरौल गांव के लोग वाकई शेरदिल निकले, वन महकमा सुबह नौ बजे मौके पर पहुंचने के बाद से गांव वालों से दावा करता रहा कि अब बाघ यहां नही है। दोपहर एक बजे गांव वालों के दबाव में जब कांबिंग की गई, तो छैलबिहारी का शव मिल गया। लेकिन बाघ खेत से बाहर नही निकला। महकमे ने दावा किया कि बाघ अब चला गया है लेकिन गांव वालों का सब्र टूटा,खेत को आग के हवाले कर दिया। इसी बीच बाघ खेत से ही निकला तो महकमा मुंह ताकता रह गया। गांव वाले अब बाघ के पीछे थे, बाघ भाग रहा था। धीरे-धीरे गांव के करीब सौ से ज्यादा लोग एक खेत से दूसरे खेत तक बाघ को दौड़ाते रहे। आखिरकार बरौंछा के नजदीक गांव की हद के आखिरी खेत से भी दौड़ाकर भगा दिया। बाघ यहां से निकलकर सेमरिया गांव की हद में चला गया। इस पूरे आपरेशन में वन विभाग व पुलिस महकमे के अफसर महज तमाश देखते रहे। 

अब्दुल सलीम खान  अमरउजाला  में  पत्रकार है, हिंदुस्तान अखबार में  कई वर्षों तक  पत्रकारिता  कर चुके है , वन्य जीवन एवं सामाजिक मुद्दों पर पैनी नज़र, गुलरिया खीरी में निवास, इनसे  salimreporter.lmp@gmail.com पर संपर्क कर सकते है. 

Feb 27, 2014

बाघ तेंदुआ और आदमी दरिंदा कौन?

कहीं ऐसा न हो की जंगल से निकले इन जानवरों को  दुर्दान्तता से क़त्ल कर दे आदमी।
खमरिया-खीरी। रमेश मिश्र

खीरी में तराई बेल्ट से पश्चिम में मेरठ और पीलीभीत तक बाघ और तेंदुए का आतंक फैला हुआ है। ऐसे ही आतंक का माहौल धौरहरा में भी साल 2007 और 2008 में बना था। जब जंगल से निकल कर धौरहरा इलाके में आए बाघ और तेंदुए के आतंक के चलते किसानों/मजदूरों ने खेत जाना बंद कर दिया था और स्कूलों में छुट्टी हो गई थी। तब आधी अधूरी तैयारियों के साथ वहशी जानवर को काबू करने के लिए आई वन विभाग टीम देखती रह गई थी और आदमखोर बन चुके इस जंगली जानवर ने पांच इंसानी जिंदगियों समेत दर्जन भर से ज्यादा मवेशियों की जिंदगी खत्म कर दी थी। उस दौरान धौरहरा में तेंदुए ने एक दर्जन से ज्यादा लोगों को जख्मी भी किया था। वन विभाग के विशेषज्ञ मौके पर मिलने वाले पगमार्क देख कर पहले इलाके में बाघ की मौजूदगी का दावा कर रहे थे। मगर उनके दावों की पोल तब खुली जब ईसानगर के बेलाहार में पूरे दिन प्रशासन को हलकान करने के वाले तेंदुए को गांव वालों ने एक ग्रामीण के घर में मारकर जला दिया था।
27 दिसम्बर 2007 से आठ मई 2008 तक धौरहरा इलाके में आतंक फैलाने वाले जंगली जानवर को काबू करने में वन विभाग और वन्य जंतु विशेषज्ञ जिस तरह नाकाम हो रहे थे। उससे उनकी कार्य प्रणाली पर सवालिया निशान उठने लगे थे। यह लोगों के आक्रोश का ही नतीजा था कि ग्रमीणों ने खमरिया कस्बे के पास बहा नाले पर वन विभाग के लागों को घेर लिया था और नौबत मारा मारी तक आ गई थी। उस समय कुछ स्थानीय लोगों के हस्तक्षेप से मामला वक्ती तौर पर शांत हो गया था। मगर इसका असर बेलाहार में तेंदुए की घेराबंदी के दौरान सामने आ गया। जब एक खास इशारे पर मारपीट हो गई थी। इस मामले में वन क्षेत्राधिकारी धौरहरा समेत इलाके के कई मोअज्जिज़ लोगों पर मुकदमा भी दर्ज हुआ था। बाद में जब ग्रामीणों ने तेंदुए को मार गिराने के बाद जला डाला तब वन विभाग और पुलिस का परा बंदोबस्त धरा रह गया था। तेंदुए को मार कर जलाने के मामले में वन विभाग ने करीब 100 लोगों पर मुकदमा दर्ज कराया था।

फैक्ट फाइल

* 27 दिसम्बर 2007 धौरहरा में पहली बार तेंदुए की सरसवा गांव में आमद दर्ज की गई। जहां तेंदुए ने राजेंद्र की गाय को मार डाला। इसके बाद करीब एक महीने तक तेंदुए की कोई हलचल सामने नहीं आई। वन विभाग ने तेंदुए के जंगल वापस लौट जाने का दावा किया।

* 27/28 जनवरी 2008 को तेंदुए ने ईसानगर के सेमरहना गांव में 12 वर्षीय केशव को अपना शिकार बनाया। छात्र केशव की मौत के बाद वन विभाग ने जहां तहां पिंजड़े लगवा कर तेंदुए को पकड़ने का प्रयास किया। मगर तेंदुआ पिंजड़ों के नजदीक नहीं फटका।

* 01 अप्रैल 2008 को तेंदुए ने बैचरी गांव में उपेंद्र (14) को जख्मी कर दिया। इसके बाद हरकत में आए वन विभाग ने दुधवा नेशनल पार्क से दो हांथी मंगवा कर तेंदुए को ट्रैंकुलाइज़ करने का अभियान शुरू किया। इसके लिए लखनऊ चिड़िया घर के डा.उत्कर्ष शुक्ला को विशेष तौर पर बुलाया गया था। 

* 23/24 अप्रैल की शाम चौंरा गांव के पास तेंदुए ने राजापुर दुलही गांव की रहने वाली रामदेवी (30) को उस वक्त मार डाला। जब उसका रिश्तेदार उसे मायके से विदा करवा कर ससुराल छोड़ने जा रहा था। उस वक्त रामदेवी की गोद में एक साल का बच्चा भी था। जिसे उसके साथी रिश्तेदार ने तेंदुए से भिड़कर किसी तरह बचा लिया था।

* 25 अप्रैल को वन विभाग ने ऑपरेशन लैपर्ड शुरू किया। डीएफओ खीरी नार्थ केके सिंह,डीएफओ कर्तनिया घाट रमेश चंद्र,रेंजर धौरहरा रेंजर संत कुमार तिवारी,लखनऊ चिड़िया घर के डा.उत्कर्ष शुक्ला और वन्य जंतु विशेषज्ञ डा.वीपी सिंह व केके मिश्रा के साथ वन विभाग की टीम एक सप्ताह तक चौंरा और उसके आस पास डेरा डाले रही। मगर तेंदुए की झलक तक नहीं मिली।

* 03/04 मई की रात चौंरा इलाके से करीब 15 किलोमीटर दूर रेहुआ गांव में आदमखोर तेंदुआ 65 साल की फूल कुमारी को उस वक्त मार कर खा गया। जब वे अपने घर के बाहर सो रही थीं। इसके बाद वन विभाग की टीम लगातार तेंदुए का पीछा करती रही। मगर उसके पास पहुंचने में नाकाम रही।

* 06 मई 2008 को खमरिया कस्बे से बाहर बहने वाले बहा नाले के पास तेंदुए की लोकेशन ट्रैस की गई। वन विभाग ने पूरे लाव लश्कर के साथ घेराबंदी की। तेंदुए ने यहां भी झाड़ी से बाहर निकल कर खमरिया कस्बे के रहने वाले संतराम भार्गव व नउवन पुरवा के राम पाल को जख्मी कर दिया और गुम हो गए। यहां मौजूद हजारों लोगों की भीड़ वन विभाग का रवैया देख भड़क गई। ग्रामीणों और प्रशासन के बीच एकबारगी टकराव की नौबत आ गई थी। मगर एक स्थानीय लोगों के हस्तक्षेप से किसी तरह विवाद शांत हो गया था।


* 08 मई 2008 को ईसानगर थाना क्षेत्र के ढखिनिया गांव के बाहर एक आम की बाग में छिपकर बैठे तेंदुए ने इसी गांव के राम गोेपाल मिश्रा,उमेश कुमार व हरी शंकर को बुरी तरह जख्मी कर दिया। यहां से भाग कर तेंदुआ पड़ोस के बेलाहार में छिप कर बैठ गया। जहां वन विभाग ने एक बार फिर तेंदुए की घेराबंदी की। पूरा दिन वन विभाग यहां ड्रामे बाजी करता रहा। इसी बीच एक अधिकारी के इशारे दपर बेलाहार में कुछ लोग पीट दिए गए। बाद में तेंदुए को पकड़ पाने में नाकाम हो रहे वन विभाग के लोगों के प्रति ग्रामीणों का अक्रोश बढ़ने लगा। इसी बीच तेंदुआ झाड़ियों से निकल कर गांव में घुस गया। जहां तेंदुए ने सिसैया के उमाशंकर और बेलाहार के तेजपाल को जख्मी करता हुआ रामदुलारे के घर में घुसकर बैठ गया। यह सब देख गांव वालों ने वहां मौजूद अधिकारियों को दौड़ा लिया। इधर अफसर और पुलिस वाले अपनी गाड़ियां लेकर भागे। उधर ग्रामीणों ने दुलारे के घर में छिपे तेंदुए को पीट पीट कर मौत के घट उतार दिया। आक्रोशित गांव वालों ने दुलारे के घर के पास खाली पड़े प्लाट में मिट्टी का तेल डाल कर तेंदुए को जलाकर इलाके भर में फैले आतंक को खत्म कर डाला।

* 27 दिसम्बर 2008 को ठीक एक साल बाद धौरहरा रेंज में एक बार फिर बाघ और तेंदुए की आमद दर्ज की गई। धौरहरा रेंज की मटेरा बीट में प्रताप पुर जंगल में बाघ और तेंदुए के टकराव में बाघ ने तेंदुए को मार डाा। वन विभाग ने उस वक्त कहा था कि एक मादा बाघिन अपने दो बच्चों के साथ प्रताप पुर जंगल में आ गई है। सम्भावना जताई गई थी कि बाघिन कर्तनिया जंगल से यहां पहुंची है।

* 26 दिसम्बर 2011 को एक बार फिर प्रतापुर जंगल में बाघ की मौजूदगी नोट की गई। जहां जंगल में लकड़ियां बीनने गई मैकिन (65) को बाघ ने मार डाला। हालांकि इस घटना के बाद से धौरहरा में जंगली जानवरों की मौजूदगी नहीं पाई गई है। मगर पिछले अनुभवों को याद कर लोगों के दिल आज भी दहल जाते हैं।


रमेश मिश्र (हिंदुस्तान अखबार में पत्रकारिता, एक दशक से अधिक समय से शारदा और घाघरा जैसी विशाल नदियों के मध्य क्षेत्रों में इंसान और जानवर की कहानी बड़ी ख़ूबसूरती से बयां करते रहे है, इनसे  rameshmishra.khamaria@gmail.com पर संपर्क कर सकते है )



Feb 16, 2014

नियमों का उल्लंघन करते हुए मोईली ने महान को पर्यावरण क्लियरेंस दिया


एस्सार-हिंडाल्को के पक्ष में नीचे गिरते हुए मोईली ने महान को दूसरे चरण की मंजूरी दी।

12 फरवरी, नई दिल्ली। एस्सार एनर्जी ने घोषणा की है कि सिंगरौली में स्थित महान कोल ब्लॉक को दूसरे चरण की पर्यावरण क्लियरेंस मिल गयी है। जबकि पर्यावरण व वन मंत्रालय ने इससे पहले किसी तरह की घोषणा नहीं की थी। इस खबर पर प्रतिक्रिया देते हुए ग्रीनपीस की प्रिया पिल्लई ने कहा, हमें पहले ही डर था। मोईली लगातार जल्दबाजी में पर्यावरण क्लियरेंस बांट रहे हैं उससे हजारों लोगों की जीविका खत्म हो जायेगी। वनाधिकार कानून तथा दूसरे अन्य जरुरी शर्तों के उल्लंघन के बावजूद मोईली ने महान कोल ब्लॉक को दूसरे चरण की मंजूरी दे दी है। इस प्रोजेक्ट से करीब 500,000 पेड़ और हजारों लोगों की जीविका को नुकसान होगा। मोईली ने जनजातिय मामलों के मंत्री केसी देव द्वारा उठाये गए सरोकारों को भी नजरअंदाज कर दिया। बड़ा सवाल है कि क्या वास्तव में सरकार जंगलों के निवासी और पर्यावरण की चिंता करती है?”

महान संघर्ष समिति के कार्यकर्ता और अमिलिया निवासी कृपानाथ ने कहा कि हमलोग इस फैसले से निराश हुए हैं। इस प्रोजेक्ट से हमारी जिन्दगी खतरे में है। हम हजारों लोग इसी जंगल पर निर्भर हैं। हमलोग अपनी लड़ाई को जारी रखेंगे और अपना जंगल महान कोल ब्लॉक को नहीं देंगे।केन्द्रीय जनजातिय मामलों के मंत्री के समर्थन के बावजूद इस खबर ने हमें अचंभित किया है। क्या केन्द्र और राज्य सरकार आदिवासियों और जंगल निवासियों के लिए सही में चिंता करती हैउसी सरकार द्वारा वनाधिकार कानून लाने का क्या औचित्य है जो खुद उसके कार्यान्वयन से बचता है ?”

जूलाई 2013 में, जनजातिय मामलों के मंत्री ने मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री और राज्यपाल को सिंगरौली में वनाधिकार कानून के उल्लंघन के बारे में लिखा था। साथ ही, मांग की थी कि बिना वनाधिकार कानून लागू किए बिना पर्यावरण क्लियरेंस नहीं दिया जाय। वनाधिकार कानून को लागू करवाना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है लेकिन पर्यावरण क्लियरेंस देने से पहले केन्द्र सरकार की जिम्मेदारी है कि वो वनाधिकार कानून को सुनिश्चित करे। वनाधिकार कानून लागू न करने की वजह से ही नियामगिरी में वेदान्ता और ओडिसा में पोस्को के प्रोजेक्ट आगे बढ़ने में असफल हुए।

22 जनवरी को ग्रीनपीस तथा महान संघर्ष समिति ने एस्सार के मुंबई स्थित मुख्यालय पर विरोध प्रदर्शन किया था तथा मोईली द्वारा जल्दबाजी में उद्योगों के पक्ष में दिए जा रहे निर्णय पर सवाल उठाया था। एस्सार ने ग्रीनपीस और महान संघर्ष समिति के ग्रामीणों पर 500 करोड़ का मानहानि तथा चुप रहने का मुकदमा किया है।

एस्सार ने ग्रीनपीस द्वारा मांगे जा रहे पर्यावरण मंत्री मोईली के इस्तीफे पर भी निषेधाज्ञा लगाने की कोशिश की थी। न्यायालय में उपस्थित ग्रीनपीस की कार्यकर्ता अरुंधती मुत्थू ने बताया कि एक निजी कंपनी द्वारा केन्द्रीय मंत्री को बचाने की कोशिश करना बेहद संदेहास्पद था। एस्सार द्वारा तेजी से क्लियरेंस बांट रहे  वीरप्पा मोईली को बचाने का मतलब अब आसानी से समझा जा सकता है। उनलोगों को पहले से ही उम्मीद थी कि यह क्लियरेंस मिलने वाला है

कोयला घोटाले के दौरान महान कोल ब्लॉक 2006 में एस्सार और हिंडोल्को को संयुक्त रुप से आवंटित किया गया था। फिलहाल यह कोल ब्लॉक सीबीआई की जांच के दायरे में भी है। कोल ब्लॉक के आवंटन के तरीकों पर सवाल उठ रहे हैं शुरुआत में राज्य सरकार द्वारा इस कोल ब्लॉक को एस्सार को देने का विरोध किया था और फिर सिर्फ तीन महीने के भीतर उसने अपना पाला बदल लिया।
ग्रीनपीस और महान संघर्ष समिति मांग करती है कि वनाधिकार कानून के उल्लंघन के सबुत के आधार पर इस क्लियरेंस को रद्द किया जाय। साथ ही वो क्लियरेंस के खिलाफ लड़ने के सभी उपायों पर विचार करेगी। 

Please contact
Priya Pillai, Senior Campaigner, Greenpeace India: 09999357766,priya.pillai@greenpeace.org
Avinash Kumar Chanchal, Media Officer, Greenpeace India: 08359826363, avinash.kumar@greenpeace.org
Jagori Dhar, Senior Media Officer, Greenpeace India: 09811200481,jagori.dhar@greenpeace.org
Anindita Datta Choudhury, Senior Media Officer, Greenpeace India: 09871515804, adattach@greenpeace.org

विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था