International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Save Tiger

DON'T LET WILD TIGERS DISAPPEAR

Lady Rosetta

Potatoes with low sugar content and longer shelf life.

अबूझमाड़ के जंगल

जहां बाघ नही नक्सली राज करते हैं

खवासा का आदमखोर

जहां कांपती थी रूह उस नरभक्षी से

जानवर भी करते हैं योग

योगाचार्य धीरज वशिष्ठ का विशेष लेख

Jan 29, 2014

तराई के जंगलों में फिर मिली एक तेंदुए को मौत



लखीमपुर खीरी  और शाहजहांपुर के बार्डर पर छापा भोजी गाँव में लगभग तीन साल के तेंदुए का शव संधिग्द हालत में मिला , मोके से वन विभाग के अधिकारी कर्मचारी नदारद ग्रामीण कर रहे है शव की रखवाली । लोगो का कहना है ये तेंदुआ कई दिनों से इलाके में घूम रहा था । उन्हें शंका है इसे किसी ने जहर दिया है ।यह बात सनद रहे की दुधवा नेशनल पार्क समेत पूरे खीरी जनपद के जंगलों में कभी तेंदुओं की तादाद बहुत थी जो आवासों के नष्ट होने से शिकार के चलते अब सिर्फ दहाई में इनकी सख्यां बची हुई है। इन हालातों में सरकार व् वन्य जीवन पर कार्य करने वाली संस्थाओं ने जल्दी कोइ मौजू कदम नहीं उठाये तो यह प्रजाति विलुप्त हो जायेगी खीरी जनपद से।

मनोज शर्मा
टी वी पत्रकार
मैलानी लखीमपुर खेरी

Jan 25, 2014

दुधवा पार्क में दो गैंडों की लड़ाई में एक की मौत



लखीमपुर-खीरी। उत्तर प्रदेश के एकमात्र दुधवा नेशनल पार्क के इतिहास में पहली बार राइनो इलाका में दो मदमस्त गैंडों के बीच हुए प्रणय युद्ध में एक युवा गैंडा की मौत हो गई है। जिसका शव सलूकापुर के जंगल में गश्त के दौरान मिला है। युवा गैंडा के शरीर पर गंभीर चोटों के कई निशान मिले हैं। वीडियोग्राफी की निगरानी में शव का मौके पर ही तीन डाक्टरों के पैनल से पोस्टमार्टम कराया गया। गैंडे की मौत से पार्क प्रशासन में हड़कंप मच गया है। गैंडा के शव को दफन करके निकाले गए सींग को पार्क अधिकारियों ने अपनी देखरेख में जला दिया है। इससे पहले लगभग पंद्रह दिन पूर्व पार्क में एक गैंडा शिशु की मौत ठण्ड से हो गई थी।


दुधवा नेशनल पार्क के तहत सोनारीपुर रेंज क्षेत्र में विश्व की एकमात्र गैंडा पुनर्वास परियोजना चल रही है। 27 वर्गकिमी के संरक्षित जंगल में 30 सदस्यीय गैंडा परिवार स्वछंद विचरण करता है। इन दिनों गैंडों का प्रणयकाल चल रहा है। इसमें कई दिनों से मदमस्त युवा गैंडा भीम, नकुल, सहदेव को एकसाथ अक्रामक स्थिति में देखा जा रहा था। गैंडों के प्रणयद्वंद में गंभीर रूप से घायल हुए सहदेव को दो दिन पहले निगरानी करने वाले पार्क कर्मचारियों ने गस्त के दौरान देखा था।

इस पर बीते दिवस मानीटरिंग करने वाली हाथियों की टीम उसे सलूकापुर क्षेत्र के सुरक्षित जंगल में हांक कर खदेड़ लाई थी। मीयटिंग फाइटिंग में गंभीर रूप से घायल हुए युवा गैंडा सहदेव का इलाज षुरू हो पाता इससे पहले ही उसकी बीती रात मौत हो गई। दुधवा नेषनल पार्क के इतिहास में पहली बार प्रणय युद्ध में युवा गैंडा की हुई असमय मौत की सूचना पर खासी सनसनी फैल गई और पार्क प्रषासन में हड़कंप मच गया है। मामले से उच्चाधिकारियो को अवगत कराया। मौके पर दुधवा नेषनल पार्क के डिप्टी डायरेक्टर वीके सिंह, वार्डन एके श्रीवास्तव स्टाफ सहित मौके पर पहुंच गए और मौका मुआयना किया।

 6 अगस्त 2002 में पैदा हुआ सहदेव मादा गैंडा हिमरानी का चैथा पुत्र था। वीडियोग्राफी की निगरानी में गैंडा के शव का पोस्टमार्टम राजकीय पशु चिकित्सालय के डाक्टर राजेश निगम, डाक्टर नीरज कुमार और डब्ल्यूटीआई के डाक्टर सौरभ सिंघई, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के राइनो एक्सपर्ट रूचिर शर्मा, प्रणव चंचानी की देखरेख में कराया गया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गैंडा की मौत का कारण षरीर के नाजुक अंगों में लगी गंभीर चोटों को बताया गया है। गैंडा के शव् को दफन करने के बाद उसके निकाले गए सींग को पार्क के अधिकारियों ने अपनी देखरेख में जला दिया।

 दुधवा नेशनल पार्क के डिप्टी डायरेक्टर वीके सिंह ने बताया कि प्रणय युद्ध में घायल हुए दूसरे गैंडा भीम और नकुल की खोजबीन के लिए टीमों को लगा दिया गया है, ताकि अगर जरूरत हो तो उनका इलाज किया जा सके। उन्होंने बताया कि गैंडों के बीच होने वाले इस प्रणय द्वंद को समाप्त करने के लिए जल्दी ही नर गैंडों का निकट बन रहे राइनो क्षेत्र में शिफ्ट कर दिया जाएगा, इसके लिए उच्चाधिकारियों से अनुमति मांगी गई है।


देवेंद्र प्रकाश मिश्र 
dpmishra7@gmail.com 


Jan 22, 2014

ग्रीनपीस कार्यकर्ताओं ने एस्सार मुख्यालय पर बैनर लहराया

महान (सिंगरौली) के ग्रामीणों को मिला शहरी नौजवानों का साथ। प्रस्तावित कोयला खदान को रद्द करने की मांग की।

स्पीडी क्लियरेंस दे रहे पर्यावरण मंत्री मोईली को हटाने का किया मांग

22 जनवरी,  मुंबई। ग्रीनपीस कार्यकर्ताओं ने एस्सार के महालक्ष्मी स्थित 180 फीट लंबे इमारत को 36 * 72 फीट लंबे बैनर से ढक दिया। बैनर पर लिखा था- वी किल फॉरेस्टः एस्सार। बैनर पर पर्यावरण व वन मंत्रालय के मंत्री वीरप्पा मोईली तथा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की तस्वीर भी थी। महान जंगल के प्रस्तावित विनाश को दर्शाते हुए 12 कार्यकर्ताओं ने बाघ की पोशाक में इमारत को घेर लिया। उन लोगों ने मांग किया कि एस्सार  महान जंगल को बर्बाद करने के लिए प्रस्तावित कोयला खदान को रद्द करे। साथ हीप्रधानमंत्री नवनियुक्त वन व पर्यावरण मंत्री वीरप्पा मोईली को हटाएंजो लगातार पर्यावरण की चिंताओं और लोगों के  वनाधिकारों को दरकिनार कर बिग टिकट प्रोजेक्ट को पर्यावरण क्लियरेंस दे रहे हैं।

   ग्रीनपीस कार्यकर्ता प्रिया पिल्लई ने सवाल उठाते हुए कहा कि  हमारे नये पर्यावरण मंत्री ने सिर्फ बीस दिनों में करीब 1.5 लाख करोड़ के 70  प्रोजेक्टों को क्लियरेंस दिया है। इसका मतलब है कि उन्होंने एक प्रस्ताव पर बहुत कम समय खर्च किया। क्या मोईली को  धनी कॉरपोरेट कंपनियों जैसे एस्सार जो महान जंगल को खत्म करने पर तुली है के जेब को भरने के लिए नियुक्त किया गया है। या फिर देश के पर्यावरण अधिकारों और वनजीवन को बचाने के लिए नियुक्त किया गया है  प्रिया ने विस्तार से बताया कि महान को जिस तरीके से एस्सार को आवंटित किया गया वो सवालों के घेरे में है। सबसे पहले जयराम रमेश ने इस प्रस्ताव को अस्वीकृत कर दिया था लेकिन कंपनी ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए पहले चरण क क्लियरेंस हासिल कर लिया। वनाधिकार कानून को लागू किए बिना खदान की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना  हमारे संविधान का उल्लंघन है।

   मुंबई के नौजवानों ने महान जंगल से आए आदिवासियों और अन्य समुदाय के लोगों के साथ कंधा से कंधा मिलाते हुए लिव आवर फॉरेस्ट अलोन (हमारे जंगल को अकेला छोड़ दो) लिखे बैनर को लहराया। सभी ग्रामीण महान संघर्ष समिति के सदस्य हैं। यह संगठन उनलोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए बनाया गया है जो महान जंगल में अपनी जीविका के लिए निर्भर हैं। ग्रामीणों और शहरी नौजवानों के बीच यह  अनूठा मिलन एक पहल हैजिसके माध्यम से विकास के नाम पर जंगलों के विनाश की तरफ ध्यान दिलाने की कोशिश की गई है।

   महान जंगल को महान कोल लिमिटेड को आवंटित किया गया है। इससे एस्सार पावर और हिंडाल्को इंडस्ट्री के पावर प्लांट को ईंधन सप्लाई किया जाएगा। यह उन कोल ब्लॉक में से एक है जिसे कोयला मंत्रालय ने कोयला घोटाले के दौरान औने-पौने दाम में कंपनियों को दे दिया था और अब वे सभी सीबीआई की जांच के दायरे में है। 14 हजार लोगों की जीविका, 160 तरह के पौधों और कई सारे जानवरों तथा पक्षियों के अलावा महान जंगल को इसलिए भी बचाना जरुरी हैक्योंकि यह मध्यभारत के सघन जंगलों का आखरी टूकड़ा ही बचा हुआ है।

महान संघर्ष समिति के सदस्य और अमिलियासिंगरौली (मध्यप्रदेश) के ग्रामीण कृपानाथ ने कहा कि यह हमारे लिए ऐतिहासिक दिन है। एस्सार महान जंगल से  हमारे घरों को नष्ट करने के लिए तथा खुद पैसा बनाने के लिए हमारी जीविका छीनने को प्रयासरत है। आज हमलोग करीब 2000 किलोमीटर की दूरी का सफर तय करके एस्सार के मुख्यालय पर आए हैं ताकि उन्हें यह संदेश चला जाय कि हमारी आवाज मौन नहीं हो सकती। 

मुंबई के नौजवानों ने ग्रामीणों को मजबूत समर्थन दिया।  अपनी चिंताओं को दोहराते हुए जंगलिस्तान के सदस्य बृकेश सिंह ने  कहा कि भले हमलोग शहरों में रहते हों लेकिन हमारा महान के लोगों से मजबूत लगाव है। हमलोग जोखिम उठाते हुए इस इमारत को घेर रहे हैं ताकि कॉरपोरेट कंपनियों और वन व पर्यावरण मंत्रालय का घिनौना चेहरा लोगों के सामने आ सके। प्रस्वावित महान खदान को बंद करना ही पड़ेगा। हमलोग भारत के जंगलों को भ्रष्टाचार तथा लालच की भेंट नहीं चढ़ने देंगे।
जंगलिस्तान ग्रीनपीस इंडिया का सबसे ज्यादा दिनों तक चलने वाला अभियान है जिसके तहत शहरी नौजवान एकत्रित होकर जंगल बचाने के लिए खड़े हो रहे हैं।

    ग्रीनपीस कार्यकर्ताओं ने लंदन में एस्सार पावर के मुख्यालय के सामने भी प्रदर्शन किया। उन्होंने महान के लोगों और शहरी युवाओं के साथ आवाज मिलाते हुए नारा लगया- एस्सार स्टे आउट ऑफ महान (एस्सार महान से बाहर रहो)। एस्सार कंपनी लंदन स्टॉक एक्सचेंज में लिस्टेड है। ग्रीनपीस लंदन के कार्यकर्ता पॉल मोरजुओ ने कहा कि  “भौगोलिक रुप से भले ही हम महान से हजारों किलोमीटर दूर हैं लेकिन हम महान के समुदाय के साथ मजबूती से खड़े हैं जो अपने घर को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। भारत सरकार को अपने नागरिकों की इच्छाओं का सम्मान करना चाहिए तथा अपने महत्वपूर्ण पर्यावरण को बचाना चाहिए न कि कुछ निजी उद्योगपतियों के हित में काम करना चाहिए

एस्सार पावर और हिंडाल्को उन 61 निजी कंपनियों में है जिनको फरवरी 2014 तक पर्यावरण मंत्रालय द्वारा अंतिम चरण का क्लियरेंस लेना है नहीं तो उनकाआवंटन रद्द किया जा सकता है।


साभार: अविनाश कुमार, ग्रीनपीस
avinash.kumar@greenpeace.org  

Jan 18, 2014

The Universe Is A Giant Brain!

We often speak of the universe being a reflection of ourselves, and point to how the eye, veins, and brain cells mirror visual phenomenon in the natural universe. As above so below right? Well check this out. How about the idea that the universe is a giant brain? The idea of the universe as a ‘giant brain’ has been proposed by scientists and science fiction writers for decades, but now physicists say there may be some evidence that it’s actually true (in a sense).
According to a study published in Nature’s Scientific Reports, the universe may be growing in the same way as a giant brain - with the electrical firing between brain cells ‘mirrored’ by the shape of expanding galaxies. The results of a computer simulation suggest that “natural growth dynamics” – the way that systems evolve – are the same for different kinds of networks – whether its the internet, the human brain or the universe as a whole.
When the team compared the universe’s history with growth of social networks and brain circuits, they found all the networks expanded in similar ways: They balanced links between similar nodes with ones that already had many connections. For instance, a cat lover surfing the Internet may visit mega-sites such as Google or Yahoo, but will also browse cat fancier websites or YouTube kitten videos. In the same way, neighboring brain cells like to connect, but neurons also link to such “Google brain cells” that are hooked up to loads of other brain cells.
“The new study suggests a single fundamental law of nature may govern these networks”, said physicist Kevin Bassler of the University of Houston. “”For a physicist it’s an immediate signal that there is some missing understanding of how nature works,” says Dmitri Krioukov from the University of California San Diego.
As summarized by the original study: “Here we show that the causal network representing the large-scale structure of spacetime in our accelerating universe is a power-law graph with strong clustering, similar to many complex networks such as the Internet, social, or biological networks. We prove that this structural similarity is a consequence of the asymptotic equivalence between the large-scale growth dynamics of complex networks and causal networks.”
So this may seem weird, but let’s think about this.  Scientists always talk about consciousness being the underlying fabric of the universe from which all things emerge (M-theory, string theory, Unified Field Theory, etc. see work of Dr. Amit Goswami and Dr. John Hagelin). So not only is the fabric of the universe conscious like a brain, it is growing like a brain as well. But here’s a question…a brain to what? Is it possible we exist as a thought within the mind of some Super Intelligence? Are we just brain cells operating within a Cosmic Mind? Maybe, maybe not, but it’s fascinating to think about.
Courtesyhttp://www.spiritscienceandmetaphysics.com/

Jan 9, 2014

ग्रीनपीस ने महान कोल खदान को रद्द करने की मांग की


ग्रीनपीस ने कहा है कि ऊर्जा मंत्रालय के कड़े विरोध के वावजूद इस्सार-हिंडालको को गलत तरीके से कोल खदान आबंटित किया गया.

7, जनवरी 2014। कोल खदानों के आबंटन घोटाले पर जिस तरह सीबीआई के संदेह खड़ा किया है उसमें आदित्य बिड़ला ग्रुप के हिंडालको को महान कोल खदान आबंटन में भी धांधली नजर आ रही है। नए तथ्य के सामने आने के बाद ग्रीनपीस इंडिया ने महान कोल खदान को तत्काल रद्द करने की मांग की है। ग्रीनपीस इंडिया ने सरकार से यह भी मांग की है कि इस आबंटन में एस्सार ऊर्जा और मध्य प्रदेश सरकार की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए।

ग्रीनपीस का कहना है कि कोल आंबटन में किसी तरह की पारदर्शिता नहीं बरती गई है। ऊर्जा मंत्रालय ने सीबीआई को बताया है कि उसने हिंडालको को महान कोयला खदान आबंटित करने की सिफारिश नहीं की थी। इसी तरह, शुरु में एस्सार ऊर्जा को कोल खदान आबंटित किए जाने की मांग को मध्य प्रदेश सरकार और स्क्रीनिंग कमिटी ने भी खारिज कर दी थी। लेकिन बाद में दोनों ने अपने निर्णय को बिना किसी कारण के पलट दिया।

इससे पहले भी सीबीआई ने आदित्य बिड़ला ग्रुप के अध्यक्ष पर जालसाजी, धोखाधड़ी और वित्तीय गलतबयानी करके तालबिरा कोल खदान हासिल करने का आरोप लगाया था। ग्रीनपीस ने कहा है कि इस खुलासे से इस शक को बल मिलता है कि वर्ष 2004 से 2009 के बीच जितने भी कोल खदान आबंटित हुए थे उसमें कुछ न कुछ गड़बड़ियां जरूर हुई थी।

ग्रीनपीस की कंपैनर अरुंधति मुतु ने कहा, महान कोल खदान के आबंटन की जांच में एस्सार ऊर्जा को भी शामिल किया जाना चाहिए क्योंकि मध्य प्रदेश सरकार ने एस्सार और हिंडालको को 1 मार्च 2005 को हुई बैठक में कोल खदान आबंटन का विरोध किया था लेकिन तीन हप्ताह के भीतर 23 मार्च 2005 में उसने अपने फैसले को पलट कर हिंडालको को नहीं बल्कि एस्सार को कोल खदान आबंटित करने की अनुशंसा कोयला मंत्रालय से कर दिया।

अरुंधति मुतु ने इस आबंटन पर प्रश्न चिन्ह लगाते हुए पूछा कि यह कैसे हुआ कि, ऊर्जा मंत्रालय ने इसी अनुशंसा को स्क्रीनिंग कमिटी को भेज दिया। स्क्रीनिंग कमिटी ने 1 मार्च 2005 की बैठक में एस्सार को कोल खदान आबंटित करने से मना कर दिया था, लेकिन इस बार बिना किसीस्पष्टीकरण के एस्सार और हिंडालको को 2006 में कोल खदान आबंटित कर दिया।
अरुंधति मुतु ने सरकार से महान कोल खदान के आबंटन की जांच करने की मांग की है और कहा कि जब तक जांच पूरी न हो जाय तब तक वहां सभी तरह के काम पर रोक देनी चाहिए।


महान कोल खदान की खुदाई महान कोल लिमिटेड द्वारा की जा रही है जो एस्सार ऊर्जा और हिंडालको का संयुक्त उपक्रम है। वहां पर स्थानीय नागरिकों द्वारा इसका पुरजोर विरोध किया जा रहा है क्योंकि उनके जल, जंगल, जमीन के अधिकार को मानने से इंकार किया जा रहा है।


एस्सार और हिंडालको, दोनों ने मिलकर मार्च 2005 में 27वीं स्क्रीनिंग कमिटी में महान कोल ब्लॉक के आबंटन के लिए प्रयास किया था, जिसका मध्य प्रदेश सरकार ने विरोध किया था (यह मिनट्स में शामिल है )। ठीक इसके तीन हप्ते बाद मध्य प्रदेश सरकार ने पलटी खाया और कोयला मंत्रालय को एस्सार को शामिल किए जाने की वकालत कर दी (यह चिठ्ठी में शामिल है)। एस्सार को क्यों कोल खदान आबंटित किया जाय, इसका जिक्र मिनट्स में कहीं नहीं है। फिर भी, 3 जुन 2006 की स्क्रीनिंग कमिटी की 29वीं बैठक में उन दोनों कंपनियों को महान कोल खदान आबंटित कर दिया गया।

ग्रीनपीस शुरु से ही महान कोल खदान के आबंटन का विरोध करता रहा है। ग्रीनपीस की कंपैनर अरुंधति मुतु ने सरकार से मांग की है कि जब जब तक सुप्रीम कोर्ट का फैसला नहीं आ जाता है तब तक विवादास्पद समय में आबंटित किए गए सभी कोल खदानों पर चल रहे काम पर प्रतिबंध लगा दी जाए।
संपर्कः
अरुंधति मुतु  - 09880639937 amuthu@greenpeace.org
अविनाश कुमार चंचल- 8359826363

Jan 6, 2014

बाघ सरंक्षण की विधा के पितामह की याद में



बात सन १९९९ की होगी जब मैं पहली बार बिली अर्जन सिंह से मिला, मुझे आज भी याद है वो मंजर टाइगर हैवन का, खीरी के जंगलों में से होकर गुजरता वह गलियारा जिसके किनारों पर तमाम वृक्ष और कहीं कहीं ऊंची ऊंची घास के मैदान, अपनी मोटर बाईक से सुहेली के किनारे स्थित टाइगर हैवन की जानिब मैं चला जा रहा था, मन बहुत रोमांचित हो रहा था उस महान व्यक्तित्व से रूबरू होने के लिए जिसे मैं अभी तक किताबों में पढता आया था, बहुत से किस्से बन विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों से भी सुन रखे थे बिली के बारे में, जिनमे किसी ने कहा था मुझसे बिली जब चलते थे तो सबसे आगे उनकी हथिनी, फिर तेंदुएं उसके बाद तारा बाघिन और सबसे पीछे बिली अर्जन सिंह अपनी जीप में सवार होते थे, लोग उन्हें देखकर डर कर सड़को से भाग जाते थे! एक सज्जन ने तो बताया की बिली की बाघिन तारा जब गुस्से में होती तो वह उनके पास आती गुर्राने लगती और बिली उसके मुहं में गुड (गन्ने से बनी मिठाई) का बड़ा टुकड़ा ठूस देते...वाह बाघ गुड भी खाते होगे ये नहीं पता था मुझे !!!....एक किस्सा और लोग-बाग़ सुनाते थे की एक रोज बिली की बाघिन तारा उनका हाथ चाटने लगी और जब उनहोंने अपना हाथ हटाने की कोशिश की तो बाघिन ने गुर्राना शुरू कर दिया...बिली ने अपने नौकर को इशारा किया की अब वह इसे मार दे और इस प्रकार अपनी प्रिय बाघिन को मरवाना पडा ...!! वन विभाग के कुछ पुराने मुलाजिम जो छोटे छोटे पदों पर कार्यरत थे वे कुछ अफ़साने भी सुनाते थे बिली साहब के बारे में...वो मुझसे कहते अरे आप क्या जानते हो बिली को, मैंने देखा है बहुत सारी अंग्रेज लड़कियाँ उनकी दोस्त रही...!!!टाइगर हैवन में   अक्सर गोरी मेमे आती हैं ....वगैरह वगैरह ...!!! मुझे हंसी आ जाती!..हाँ लोग कहते वो बड़े बड़े अफसरों से नहीं मिलते है...लोगों को बिना मिले ही वापस कर देते है..आदि आदि .....रोमांच और भय दोनों का मिला जुला रसास्वादन करता हुआ मैं आगे बढ़ता जा रहा था टाइगर हैवन की तरफ....जंगली गालियारे में थोड़ी थोड़ी दूर पर रास्ता पार करते हुए चीतलों के झुण्ड, पाढे, दिखाई दे जाते है, चिड़ियों की चहकन, और दूर से आती मिली जुली आवाजे एक अजीब सा माहौल पैदा कर रही थी.....

इन तमाम किस्सों को मैं मजे लेकर सुनता बहुत सी सच्चाई पता होने पर भी कुछ न कहता, क्योंकि इन किस्सागोई में जो मजा मिलता उसका जिक्र कर पाना मुश्किल है!

दरअसल बिली से मेरा पहला परिचय जो किताबी था वह डा. रामलखन सिंह की एक किताब से हुआ था जो बिली की बाघिन तारा पर आधारित थी, बेशक डा. रामलखन सिंह के लेखन की विधा से मैं प्रभावित हुआ था, मार्मिक और विवरणात्मक शैली, डा. सिंह बिली के नजदीकी और दुधवा के पहले निदेशक पद पर कार्यरत थे उस वक्त जब बिली बाघों और तेंदुओं के साथ अपने प्रयोग कर रहे थे.

चलिए अब टाइगर हैवन आने ही वाला, एक तरफ गन्ने के विशाल खेत उसके बाद गेहूं की लहराती हुई  स्वर्णिम बालियों से भरा पूरा मैदान दिखाई देने लगा था, इन फसली जमीनों के आख़िरी छोर में एक कतार में बने सफ़ेद रंग के मकान....हाँ यही तो था बिली और उनके बाघों का घर, जिसे दुनिया  "टाइगर हैवन" के नाम से जानती है,तीन तरफ से जंगलों से घिरा ये खुला क्षेत्र मुझे अद्भुत लग रहा था, तभी वे पंक्तिबद्ध घरों के नजदीक मैं पहुँच गया...वहां एक छोटे कद का गठीला व्यक्ति जो खाकी वर्दी में मिला वह श्रीराम था बिली का नौकर, श्रीराम को बिली साहब बोल्टू कहते थे, ये बात मुझे बाद में पता चली!

 बोल्टू से मैंने कहा की बिली साहब से कहो की के के मिश्रा मिलना चाहते है जो युवराज दत्त महाविद्यालय से आये है (उस वक्त में महाविद्यालय में जन्तुविज्ञान का श्रमिक! प्रवक्ता हुआ करता था), कुछ देर में बोल्टू ने आकर सूचना दी की साहब उधर बैठे है, आप जाकर मिल सकते हो, मैं उस कतार में बने उस भवन की तरफ बढ़ रहा था जहां एक उम्रदराज व्यक्ति खाकी पतलून और चार-खाने की कमीज पहने कुर्सी पर बैठा कुछ पढ़ रहा था, जी हां यही थी कुंवर बिली अर्जन सिंह, ...मैंने उनके चरण छुए, बैठने की अनुमति देते हुए वह मुखातिब हुए मेरी तरफ, उनका पहला सवाल था क्या करते हो, औपचारिक परिचय देने के बाद जब मैंने कहा की एम् एससी जन्तुविज्ञान में की है और ओपंबिल्ड स्टार्क पर रिसर्च की तैयारी में हूँ....वो उठे और डा. सालिम अली की बुक आफ इन्डियन बर्ड्स लाकर मेज पर रखते हुए बोले इसे पढ़ा है, मैंने कहा हाँ ! फिर वो चिडियों की बाते करने लगे, उनका एक किस्सा कही पढ़ा था, जब बिली नॅशनल वाइल्ड लाइफ बोर्ड के सदस्य बने, और तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती गांधी की अध्यक्षता में सभा हुई तो डा. सालिम अली भी मौजूद थे सदस्य के तौर पर, कहते है बिली साहब ने पतले दुबले सालिम अली साहब को किसी बात पर उनका गिरहबान पकड़ कर उठा लिया था, मैंने जब इस बात का जिक्र किया तो वह बहुत तेज हंस पड़े, बोले वह तो मजाक में किया था!

बिली साहब से चिड़ियों की बातों के दौरान मैंने तारा का जिक्र कर दिया, तारा का नाम सुनते ही उनकी आँखों में एक चमक सी आ गयी, लेकिन तुरंत मैंने डा. रामलखन सिंह की किताब का जिक्र करते हुए कहा की उन्होंने उसे मारा ऐसा लिखा है, और तारा साइबेरियन नस्ल की बाघिन थी जिसने दुधवा के बाघों में आनुवंशिक प्रदूषण फैलाया!....ये कहते वक्त मैं तनिक भी नहीं सोच पाया की मामला जज्बाती हो जाएगा....
बिली साहब बोले सब झूठ बोलते है, फिर बोले  युवराज दत्त महाविद्यालय डा. विजय प्रकाश ने भी तो कहा है की तारा ही थी जो मारे गयी,......बिली ने तमाम आनुवंशिक विज्ञान की किताबे लाकर मुझे बताने की चेष्टा की की बाघों में आपस में क्रास होने से कोइ आनुवंशिक प्रदूषण नहीं होता, फिर वह चाहे जिस भौगोलिक स्थिति से सम्बन्ध रखते हो...कुछ कुछ इंसानों की तरह ऐसा मैं सोच रहा था, की यदि अफ्रीकन अमेरिकन से शादी करता है तो क्या उसकी आने वाली नसले प्रदूषित होगी!

तारा के ज़िंदा होने वाली बात पर सब मैंने सवाल किया की अब वह कहाँ होगी तो बोले दुधवा के जंगलो में मर खप गयी होगी अब तो काफी अरसा हो गया...यह कहते वक्त उनकी आवाज में भावुकता थी जिसे वो तेज आवाज के पीछे छिपाने की पुरजोर कोशिश कर रहे थे.

वार्तालाप के बाद बिली ने अपने एक नौकर जिसका नाम हप्लू था से कहा की इन्हें टाइगर हैवन दिखा लाओ, और दक्षिण की तरफ इशारा करते हुए बोले की वहा ओपंबिल्ड स्टार्क आती है, उस जगह ले जाना....इतनी देर बाद भी वो मेरे रिसर्च का टापिक नहीं भूले थे यह जानकार मुझे अच्छा लगा.


अर्जन सिंह ने मुझे ताकीद किया की मैं उन की किताबे पढूं, बाघिन तारा के प्रति उनका स्नेह एक पिता  की तरह था, और टाइगर हैवन में एक वक्त ऐसा भी था जब तेंदुए, बाघ और बिली की कुतिया एली सब साथ साथ खेलते थे. 

कपूरथला रियासत के राजकुमार बिली अर्जन सिंह जिन्हें पद्म श्री व् पद्मभूषण पुरुस्कारों से नवाजा गया उनके वन्य जीवन के सराहनीय कार्यों के लिए, अब हमारे बीच नहीं है, किन्तु उनके अनुभव और कार्य हमारे बीच किताबों और दुधवा राष्ट्रीय उद्यान के रूप में मौजूद है,.

यहाँ एक तस्वीर में बिली साहब अपने मित्र ज्ञान चन्द्र मिश्र के साथ है, जो दुधवा के तत्कालीन निदेशक थे, श्री मिश्रा बिली के जीवनकाल में उनकी टाइगर हैवन सोसाइटी के निदेशक रहे, ज्ञान चन्द्र मिश्रा का खीरी जनपद या यूं कहे की तराई के जंगलों से बहुत पुराना नाता रहा, जब दुधवा, नेशनल पार्क नहीं था, तब श्री मिश्रा तराई के तमाम जनपदों के वाइल्ड लाइफ वार्डन हुआ करते थे, दुधवा नेशंला पार्क से दुधवा टाइगर रिजर्व बनने तक ज्ञान चन्द्र मिश्रा दो बार दुधवा के निदेशक (फील्ड डाइरेक्टर) रहे, उत्तर प्रदेश वन विभाग के कई उच्च पदों पर कार्य करने के बाद सेवानिवृत्त होकर आजकल लखनऊ में रह रहे है, उनके अनुभवों से मैंने दुधवा और बिली दोनों के बारे में बहुत कुछ सीखा और यह सीखने की प्रक्रिया अनवरत जारी है. बिली अर्जन सिंह की यह तस्वीर लखीमपुर के वन्य जीव फोटोग्राफर अजीत कुमार शाह ने सन १९८६ में खींची थी, आज यह तस्वीर और प्रासंगिक हो जाती है, क्योंकि बिली अर्जन सिंह की उन विगत स्मृतियों को ज़िंदा करती है यह तस्वीर  हमारे बीच.

टाइगर हैवन और बिली से यह मेरी पहली पहचान थी, और यह सिलसिला उनके जीवनकाल भर मुसलसल चलता रहा बिना रुके...जब तक...!!

क्रमश: ..........................

  
कृष्ण कुमार मिश्र 
krishna.manhan@gmail.com












Jan 3, 2014

Tribute to Billy Arjan Singh

                               
In 1999, I was fortunate to go to India for the first time, I was to go to meet up with Billy Arjan Singh..The only person to my knowledge to date to release a captive born Tiger into the wild, also leopards..


He was at this time 81,slim with a strong mind, it was down to his tenacity and perseverance that he persuaded Indira Gandhi, the then Prime Minister of India in the 1970s,to have Dudhwa, become a Tiger reserve.

We had lunch a couple of times over the next few days, also showing me around Tiger Haven, one of the most beautiful places in the world, on the periphery of the Dudhwa National Park..He talked about how Tiger calls of Aoowm each evening, would be heard and visit on most evenings.

He spent 50 years of his life fighting beaurocracy and administrations in the area as a honorary wildlife warden and trying just as hard for Tiger across the country..

He asked me why the west, did not do more to conserve Tiger and forests, I could not give him an answer at this time..

Billy Passed away four years ago, Dudhwa and Tiger needs more fighters across the globe like him, people prepared to fight with all resources available at ground level.
He has and always be an inspiration to me...
Long live Tiger in WILD..


 Phil Davis (England)
www.tigerawareness.co.uk
email: tigerwild@btinternet.com



Jan 2, 2014

बिली और उनका टाइगर हैवन.......


आज मौसम में सर्दी नहीं थी,गुनगुनी धूप थी टाइगर हेवेन के गेट पे भी कुछ उदासी छाई दिख रही थी.गेट के अंदर गन्ने की फसल भी मानो इस उदासी में शामिल थी,सामने विली का वो सफ़ेद झक्कास बंगला नुमा मकान की सफेदी भी इस उदासी में शामिल थी.हम आगे बढे तो एक नौकर दौड़ा चला आया पूछा कौन है हमने कहा विली की समाधी पे फूल चढाने आये है..वहाँ पहुचे तो कुछ फूल पहले से उनकी समाधी पे चरणो में रखे थे...दो तीन अगरबत्तियां अधजली लगी थी..हमने भी फूल उनकी समाधी पे चढ़ाये...और उनकी आत्मा की शांति की दुआ की.वहाँ से हट के उस व्यक्ति से पूछा ये फूल कौन चढ़ा गया,वो बोला,अभी थोडा देर पहले श्रीराम और कोई और दो लोग आये थे...मैंने सोचा चलो विली की किसी को तो याद रही.वैसे श्रीराम विली का सबसे नजदीकी परिचारक रहा..है उनके आखिरी दिनों तक...विली की समाधी पे लिखा था "होनेरेरी टाइगर" दुधवा की स्थापना में विली का कितना योगदान रहा किसी से छिपा नहीं है.पर आज उनकी समाधी पे कोई फूल चढाने वाला भी नहीं...वन विभाग ने भी उन्हें भुला दिया...खैर मरने के बाद कौन किसको याद रखता है पर विली को याद रखने वाले आज भी बहुत है...'पाल गेटी' अवार्ड से लेकर 'यशभारती' पाने वाले को उमके ही इलाके के लोग भुला दे,लोग तो लोग सरकारी महकमे भी तो इससे बड़ी विडम्बना क्या होगी...खैर कुछ नौजवानो ने ही सही विली को याद किया याद ही नहीं उनकी बातो को आगे बढ़ने का संकल्प भी लिया.विली की याद में दुधवा तिराहे पर विली की एक मूर्ति लगवाने की बात भी उठी है,और इसका नाम विली अर्जन सिंह मार्ग रखवाने की मांग भी...चलो कुछ लोग ही इस मुहिम को आगे बढ़ाएंगे...विली हमेशा कहते थे "टाइगर अगर वोट देता होता तो नेता उसकी फिक्र करते" उनकी यादे उनके वाइल्डलाइफ के लिए किये गए कार्य उनको हम सबकी यादो में जिन्दा रखेंगे...दुधवा के संस्थापक सदस्य रहे बिली अर्जन सिंह की आज पुण्य तिथि थी.तीन साल पहले इसी दिन उनके प्राण पखेरू उड़ गए,मरते दम तक जंगल,टाइगर और वाइल्ड लाइफ की हिमायत करने वाले विली हम सबकी यादो में हमेशा जिन्दा रहेंगे.


प्रशांत पाण्डेय ( लेखक मीडियाकर्मी हैं, हिन्दुस्तान एवं जागरण जैसे नामी संस्थानों में अपनी सेवा दे चुके है, मौजूदा वक्त में ई.टीवी में पत्रकार है, लखीमपुर खीरी में निवास, इनसे prashantyankee.lmp@gmail.com पर संपर्क  कर सकते हैं .)

Jan 1, 2014

पद्मभूषण बिली अर्जन सिंह की स्मृति में....

पद्मभूषण बिली अर्जन सिंह की मनाई गयी तीसरी पुण्य तिथि:

(पलिया-खीरी: दुधवालाइव डेस्क)  दुधवा लाइव डाट काम द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में पलिया के विकास खंड सभागार में कुंवर अर्जन सिंह की स्मृति में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसमे जनपद मुख्यालय एवं पलिया विकास क्षेत्र से कई गणमान्य व्यक्तियों ने भागीदारी दी. सभागार में सर्व प्रथम बिली की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया गया तथा उनके द्वारा किए गए कार्यों पर चर्चा हुई. 


दुधवा नेशनल पार्क के प्रणेता एवं बाघों पर दुनिया में सर्वाधिक शोध कार्य करने वाले बिली अर्जन सिंह के कार्यों अतिरिक्त जो जंगल व् बाघ सरंक्षण में उनके कार्य अधूरे रह गए उन्हें पूरा करने का सकल्प भी लिया गया. सभागार में विमर्श के बाद ब्लाक के प्रांगण में एक विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमे बिली के टाइगर हैवन के निकट के कृषि फ़ार्म के मालिक हरदीप सिंह ज्ञानी ने बिली के वन्य जीव सरंक्षण के कार्यों की सराहना करते हुए उनके अधूरे कार्यों में पूर्ण सहयोग देने की बात कही साथ ही बिली से अपनी मित्रता का जिक्र करते हुए बाघ सरंक्षण में अपनी पूरी निष्ठा जताई, श्री ज्ञानी कभी दुधवा के प्रथम डाइरेक्टर डा. राम लखन सिंह के कार्यकाल के समय टाइगर गार्जियन भी बनाए गए थे.

पलिया के वरिष्ठ पत्रकार व् वाइल्ड्लाइफ़र डी. पी. मिश्रा ने अफ़सोस जताते हुए कहा की बिली को पूरी दुनिया जानती है और सम्मान करती है उनके बाघों के सरंक्षण में किए गए कार्यों के लिए किन्तु स्थानीय स्तर पर उन्हें अपने पूरे जीवन में ख़ास सहयोग नहीं मिला, श्री मिश्रा ने टाइगर हैवन के मौजूदा हालातों पर अफ़सोस जाहिर किया, की बिली के न रहने से वन्य जीवों का यह घर अब सूना हो गया है.

विश्व प्रकृति निधि (डब्ल्यू डब्ल्यू ऍफ़) के आफीसर दबीर हसन ने बिली की प्रतिमा का माल्यार्पण किया, साथ ही उन्होंने बिली अर्जन सिंह की स्मृति में पलिया-दुधवा चौराहे पर बिली की प्रतिमा स्थापित करवाने के लिए कहा, ताकि वन्य जीव सरंक्षण के पितामह की स्मृतियाँ व् उनके कार्य हमारी नई पीढी को बिली की याद दिलाते रहे.
सेंक्रोसेंट संस्था के प्रमुख नीरज बरतरिया ने बिली अर्जन सिंह की लखीमपुर महोत्सव में मौजूदगी का स्मरण करते हुए, उनके बाघ व् जंगल के बचाव के मुद्दों को ज़िंदा रखने की बात कही. 

पलिया ब्लाक के ब्लाक डेवलेपमेंट अधिकारी ने भी पद्मभूषण अर्जन सिंह की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित किए व् खेद प्रगट किया की इतने महान व्यक्ति  की पुण्य तिथि बहुत ही बड़े पैमाने पर मनानी होगी, और उनके कार्यों का प्रसार होना चाहिए.

प्रशांत पाण्डेय वरिष्ठ पत्रकार व् मोहम्मद सकील (वन्य जीव प्रेमी) सुनील जयसवाल (दुधवा फाउंडेशन ) ने बिली को श्रद्धांजलि दी व् अपने विचार व्यक्त किए. कार्यक्रम में तमाम क्षेत्रवासी लोगों ने शिरकत की जिन्होंने बिली की बाघिन, तेंदुओं को उनके साथ रहते देखा.



वन्य जीवन के शोधार्थी  के. के. मिश्र ने कहा की बिली की प्रतिमा स्थापित करवाने के लिए वो प्रधानमंत्री व् प्रदेश के मुख्यमंत्री को पत्र लिखेंगे व् एक मुहीम भी चलायेगे प्रतिमा की स्थापना के सन्दर्भ में, साथ ही श्री मिश्र ने बिली अर्जन सिंह के वन्य जीवन के कार्यों व् अनुभवों को प्रदेश व् देश की शिक्षा प्रणाली में पाठ्यक्रम के तौर पर शामिल करने की मांग की.


टाइगर हैवन पहुंचकर बिली अर्जन सिंह के सभी प्रशंसकों ने बिली की समाधि पर पुष्प अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजली दी. 




विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था