International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Save Tiger

DON'T LET WILD TIGERS DISAPPEAR

Lady Rosetta

Potatoes with low sugar content and longer shelf life.

अबूझमाड़ के जंगल

जहां बाघ नही नक्सली राज करते हैं

खवासा का आदमखोर

जहां कांपती थी रूह उस नरभक्षी से

जानवर भी करते हैं योग

योगाचार्य धीरज वशिष्ठ का विशेष लेख

Oct 25, 2012

पीताम्बर एक अनोखा पुष्प !

ये है पीताम्बर  

एक वनस्पति जो अपने सुन्दर पुष्प के अतिरिक्त तमाम व्याधियों के मूलनाश की क्षमता रखती है ।

हाँ पीताम्बर एक प्रजाति जिसका पुष्प पीत वर्ण की अलौकिक आभा का प्रादुर्भाव करता है  हमारे मध्य, मानों साक्षात गुरूदेव बृहस्पति विराजमान हो इन मुकुट रूपी पुष्पगुच्छों पर,   और मधुसूदन स्वयं उपस्थित हो इस छटा  में! क्योंकि पीताम्बर कृष्ण का भी एक नाम है, इस पुष्प का पीत वर्ण सहज ही मन को शान्ति, विचारों में सात्विकता और मन में क्षमा का भाव स्थापित करता है।

वर्षा ऋतु में विभिन्न प्रकार की वनस्पतियों सुन्दर कीट पतंगों व तितलियों के जीवन चक्र के महत्वपूर्ण हिस्से का आरम्भ होता है-प्रजनन, वनपस्तियों में सुन्दर पुष्प खिलते है, तितलियां अपने लार्वा के स्वरूप को त्यागकर रंग-बिरंगे पंखों वाली परियों में तब्दील होती हैं, और तमाम कीट-पंतगे प्रकृति के रंगों में रंग कर उन्ही में अपने अस्तित्व को डुबोए हुए नज़र आते हैं, बरसात के अंत में प्रकृति अपने उरूज़ पर होती है, अजीब सूफ़ियाना माहौल होता है, प्रकृति में वनस्पतियों और जीवों के इस परस्पर मिलन का, एक दूसरे पर निर्भरता और सामजस्य जो अदभुत सा लगता है, मानों इन सभी प्राकृतिक प्रक्रियाओं का संचालन बड़े करीने से सुनियोजित ढग से किसी द्वारा चलाया जा रहा हो, बिना रंच मात्र त्रुटि किए हुए !

इसी सिलसिले में एक पीले रंग का सुन्दर पुष्प उगा लखीमपुर खीरी के मोहम्मदी तहसील के एक परगना में जिसे कस्ता के नाम से जानते हैं, यहाँ से गुजरती एक नहर के किनारों पर यह वनस्पति अपने पुष्पों के कारण एक पीली छटा सी विखेरती नज़र आती है इस बरसाती हरियाली के मध्य,  हाँ मैं बात कर रहा हूँ पीताम्बर की,  यह वनस्पति भारत भूमि में आई तो इसके औषधीय महत्त्व से भी हमारे लोग हुए और और इसके त्वचा रोगों पर असरकारक तत्वों को भी जान पाए, क्योंकि इसकी पत्तियों व् फूल का रस ग्राम-पाजटिव बैक्टीरिया पर बहुत असरकारक है। और पेट संबधी रोगों में भी यह रामबाण औषधि है, यह ई0 कोलाई बैक्टीरिया को नष्ट कर देता है, इसके फंगल और बैक्टीरिया जनित बीमारियों के साथ साथ ब्लड शुगर व् मूत्र-संबधी बीमारियों  पर असर के कारण इसे तमाम देशो के स्थानीय समुदाय पीताम्बर के औषधीय गुणों से लाभान्वित होते रहे है। इस वनस्पति को विदेशी आक्रामक प्रजातियों के अंतर्गत रखा गया, लेकिन जहां की धरती इसे अपना ले तो फिर वह विदेशी कैसे हुई, फिर हर प्रजाति अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए संघर्ष शील है, और यदि प्रकृति में जीवन संघर्ष की दौड़  में कोई प्रजाति कुछ विशेष गुण अर्जित कर ले, तो यह उसका खुद का विकास है!

 उत्तर भारत के तराई में  कस्ता  गाँव में कैसे पहुंची यह प्रजाति, इसका अंदाजा भर लगाया जा सकता है, कि  किसी अन्य प्रादेशिक  समुदाय या किसी तीर्थ यात्री द्वारा लायी गयी फलियों से पीताम्बर उगाने की कोशिश  हो । और इसतरह अब पीताम्बर इस लखीमपुर खीरी के तराई की धरती का बाशिंदा हो गया अपने पुष्पित बालियों की पीली आभा का दृश्य स्थापित करने के लिए हमारे मध्य । 

इस बेलनाकार पुष्प गुच्छ वाली वनस्पति जो अपने आप में तमाम रंग बिरंगे कीट-पतंगों को रिहाइश और भोजन दोनों मुहैया कराता है, साथ ही आप के स्वास्थ्य के लिए भी लाभदायक है। दुनिया के तमाम देशों में पीताम्बर की पत्तियों और पुष्प के रस को साबुन में मिलाया जाता है, जो त्वचा के रोगों को दूर करता है और साथ ही त्वचा की दमक को बढाता भी है।

 इस प्रजाति को वैज्ञानिक  भाषा में सेना अलाटा कहते है, यह मैक्सिको की स्थानीय प्रजाति है, पीताम्बर फैबेसी परिवार का सदस्य है। यह वनस्पति ट्रापिक्स (उष्ण-कटिबंधीय क्षेत्र ) में 1200 मीटर तक के ऊँचें स्थानों में उग सकती है। आस्ट्रेलिया और एशिया में यह इनवेसिव (आक्रामक) प्रजाति के रूप में जानी जाती हैं। धरती के तमाम भूभागों में इसका औषधीय महत्त्व है। मौजूदा वक्त में यह प्रजाति अफ्रीका साउथ-ईस्ट एशिया, पेसिफिक आइलैंड्स और ट्रापिकल अमेरिका में पायी जाती है।

पीताम्बर जंगल के किनारों, परती नम-भूमियों, नदियों व् तालाबों के किनारों पर उगने वाली वनस्पति हैं, इसके बीज रोपने के कुछ ही दिनों में अंकुरित हो जाते है, एक बार एक पौधा तैयार हो जाने पर इसकी तमाम फलियाँ जो 50-60 बीजों का भंडार होती है, पकने के पश्चात जमीन पर गिरती है और एक ही वर्ष में यह प्रजाति वहां की जमीन पर अपना प्रभुत्व बना लेती है, सैकडों झाडियाँ एक साथ उग आती है। इसी कारण इसे आक्रामक प्रजाति कहा जाता है, और विदेशी भी? चूंकि यह उत्तरी-दक्षिण अमेरिका की स्थानीय प्रजाति है और इसने  अपने बड़े व् सुन्दर पीले पुष्प-गुच्छों वाली  बालियों के कारण मानव-समाज को आकर्षित किया और यही वजह रही की यह मनुष्यों द्वारा एक स्थान से दुनिया के दूसरे इलाकों में लाया गया, और साथ में आई इनकी खूबियाँ जिनमें औषधीय गुण प्रमुख है। 

पीताम्बर का पुष्प-गुच्छ 6-24 इंच लंबा, इसमें गुथे हुए पुष्पों का आकार 1 इंच  तक का होता है। इसके ख़ूबसूरत पुष्प-गुच्छ के वजह से ही इसे दुनिया के तमाम हिस्सों में कई नामों से जाना जाता है जैसे इम्प्रेस कैंडल, रोमन कैंडल ट्री, येलो कैंडल, क्रिसमस कैंडल, सेवन गोल्डन कैंडल बुश  साथ ही औषधीय गुणों के कारण भी लोगों ने इसे कई नाम दिए रिन्गवार्म बुश आदि।  पुष्पंन का वक्त सितम्बर-अक्टूबर है।

पीताम्बर झाडी के रूप में उगता है, जिसकी ऊंचाई 4 मीटर तक हो सकती है। पत्तियाँ 50-80 से०मी० लम्बी होती हैं। पुष्प गुच्छ की शक्ल मोमबत्ती की तरह चमकीले पीले रंग की, और इसके बीजों की फलियाँ 25 सेमी लम्बी होती हैं। इसकी यही पंखनुमां फलियाँ पानी के बहाव द्वारा एवं जानवरों द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाती हैं। इस प्रकार यह ख़ूबसूरत प्रजाति इलाहिदा जगहोँ में अपना अस्तित्व बनाती है। पीताम्बर की फली पक जाने पर भूरे व् काले रंग की हो जाती है, और प्रत्येक फली में 50-60 चपटे त्रिकोंणनुमा बीज निकलते है।

बालियों में लगे दर्जनों पुष्पों  में काफी तादाद में पराग मौजूद होते है, वह तमाम तरह की प्रजातियों को आकर्षित करते है, जैसे तितलियाँ, कैटरपिलर, मख्खियों, और चीटियों  को, इन कीट-पतंगों को पीताम्बर के  विशाल पुष्प-गुच्छों  से  भोजन तो मिलता ही है साथ ही ये इनके निवास का स्थान भी बन जाते हैं। परागण  की ये प्रक्रिया इन्ही कीट-पतंगों द्वारा होती है यह एक तरह का सयुंक्त अभ्यास है, जीवन जीने का वनस्पति और जंतुओं  के मध्य। दोनों एक दूसरे से लाभान्वित होते हैं। 

पीताम्बर के इस पुष्प का औषधीय इस्तेमाल अस्थमा ब्रोंकाइटिस एवं श्वसन संबधी बीमारियों में किया जाता है। पत्तियों का रस डायरिया कालरा गैस्ट्राईटिस और सीने की जलन में उपयोग में लाते है।

इसका पुष्प, पत्तियाँ तथा जड़ में एन्टी-फंगल, एंटी-ट्यूमर  व् एंटी-बैक्टीरियल तत्व होते है, जिस कारण यह मानव व् जानवरों के विभिन्न रोगों में इस्तेमाल होता रहा है, दुनिया के तमाम भू-भागों में। ग्राम-पॉजटिव   बैक्टीरिया पर इसके रस का प्रभाव जांचा जा चुका है, यही वजह है की मनुष्य एवं जानवरों में होने वाली त्वचा संबधी व्याधियों में इसके इस्तेमाल सबसे ज्यादा किया जाता है।


दुनिया के तमाम हिस्सों में स्थानीय समुदायों में पीताम्बर का अलग-अलग इस्तेमाल किया जाता है जिसमें रेचक (लक्जेटिव )  के रूप में तथा त्वचा रोगों में विशेष तौर से इसकी पत्तियों व् पुष्प का प्रयोग होता हैं, कुछ प्रमुख बीमारियों में पीताम्बर का उपयोग- एनीमिया, कब्ज, लीवर रोग, मासिक धर्म से जुडी बीमारियाँ, एक्जीमा, लेप्रोसी, दाद, घाव, सिफलिस गनोरिया, सोरियासिस, खुजली, डायरिया, पेचिश,   मूत्र-वर्धक, एवं त्वचा की सुन्दरता निखारने के लिए भी इसका इस्तेमाल किया जाता है।

पीताम्बर कृमिहर औषाधि के रूप में तथा जहरीले कीड़ों के काटने पर भी औषधि के तौर पर प्रयोग में लाया जाता है, विभिन्न स्थानों पर इसका प्रयोग इन्सेक्टीसाइड, लार्वीसाइड के तौर पर भी होता है।

बसंत ऋतु के आख़िरी दिनों में पीताम्बर के बीजों की बुआई करना चाहिए नम भूमि में व् जहां सूर्य की किरणे सीधी आती हो।  फिर क्या है आप भी तैयार हो जाइए इस ख़ूबसूरत फूल को अपनी बगिया में उगाने के लिए जो सुन्दरता के साथ साथ आप और आप के पशुओं की बीमारियों में दवा के काम भी आयेगा।

 भारत जैसे उष्ण -कटिबन्धीय क्षेत्र में  जहां पर  कुपोषण, गरीबी, गन्दगी  और अशिक्षा जैसी तमाम दिक्कते मौजूद हों वहां त्वचा-रोगों की उपस्थिति अवश्यभामी है, त्वचा जैसा संवेदी और महत्वपूर्ण अंग में कुष्ठ आदि रोगों के लग जाने से मनुष्य का जीवन जीना दूभर हो जाता है, ऐसे में पीताम्बर के पुष्प पत्ती और जड़ के रस का लेपन त्वचा रोगों को समाप्त कर देता है,  उत्तर भारत के तराई जनपदों में वातावरण में अत्यधिक नमी और जल-भराव के कारण त्वचा रोगों का फैलाव  सबसे ज्यादा होता हैं, इसलिए पीताम्बर की यहाँ उपस्थिति जनमानस के स्वास्थ्य के लिए प्रकृति की अनुपम भेट है ।

बात सिर्फ पीताम्बर की नहीं हमारे आसपास तमाम वनस्पतियाँ व् जंतु रहते है, किन्तु हम उन्हें न तो जानना चाहते है और न ही उनकी उपस्थित के महत्त्व को खोजना और इस जिज्ञासा का अनुपस्थित  होना हमारे मानों में , हमारे मानव समाज के लिए ही अहितकर है, प्रकृति के मध्य सभी के अस्तित्व को स्वीकारना उनकी रक्षा करना और उनके महत्त्व को समझ ले तो फिर हमारी मनोदशाओं में जो  सकारात्मकता आयेगी  वह हमको और बेहतर बनायेगी साथ ही प्रकृति के सरंक्षण का कार्य खुदब-खुद हो जाएगा हमसे, हमारे इस बोध मात्र से !@



कृष्ण कुमार मिश्र 
(krishna.manhan@gmail.com)



References:

N. Ali-Emmanuel, M. Moudachirou, J.A. Akakpoc, Quetin-Leclercq, 2003. Treatment of bovine dermatophilosis with Senna alata, Lantana camara and Mitracarpus scaber leaf extracts, Journal of Ethnopharmacology 86 (2003) 167–171


Sule WF, Okonko IO, Joseph TA, Ojezele MO, Nwanze JC, Alli JA, Adewale OG, Ojezele OJ8, 2010.  In-vitro antifungal activity of Senna Alata Linn. Crude leaf extract, Pelagia Research Library Advances in Applied Science Research, 1 (2): 14-26

J.H. DOUGHARI* AND B. OKAFOR, 2007. Antimicrobial Activity of Senna alata Linn. East and Central African Journal of Pharmaceutical Sciences Vol. 10, 17-21


A. T. Oladele1, B. A. Dairo, A. A. Elujoba and A. O. Oyelami 2010. Management of superficial fungal infections with Senna alata (“alata”) soap: A preliminary report. African Journal of Pharmacy and Pharmacology Vol. 4(3), pp. 098-103, March 2010

OWOYALE, J A; OLATUNJI, G A; OGUNTOYE, S O, 2005. Antifungal and Antibacterial Activities of an Alcoholic Extract of Senna alata Leaves. J. Appl. Sci. Environ. Mgt. Vol. 9 (3) 105 - 107


Oct 14, 2012

तो फिर उसने पेड़ पर ही दम तोड़ दिया ?

टाइगर रिजर्व क्षेत्र में एक तेंदुए को मिली मौत
भारत-नेपाल सीमा पर कतरनिया घाट  वाइल्ड लाइफ  सेंक्चुरी  का मामला 
"अब्दुल सलीम खान  की  रिपोर्ट "

लखीमपुर। दुधवा टाइगर रिजर्व क्षेत्र के कतरनिया घाट वाइल्ड लाइफ सेंक्चुरी में एक तेंदुआ का शव पेंड़ पर लटका हुआ मिला है। मूर्तिहा वन रेंज में तेंदुआ का शव रोहिनी के पेंड़ में लटका हुआ था, शव की हालत देखकर अनुमान लगाया जा रहा है कि इसकी मौत  कई दिन पहले हुई होगी।

मूर्तिहा वन रेंज में शनिवार को फॉरेस्ट गार्ड बब्बन मिश्रा वाचरों के साथ गश्त पर थे, तभी टीम को जंगल में तेज बदबू आई, उन्होंने देखा कि एक रोहिनी के पेंड़ पर पांच फिट की ऊंचाई पर तेंदुए का शव लटका हुआ है, फॉरेस्ट गार्ड ने तत्काल वन अफसरों को सूचना दी। जिस पर डीएफओ कतर्निया वन्य जीव प्रभाग आरके सिंह व रेंज आफीसर पीएन राय ने मौके पर पहुंच कर शव का जायजा लिया। भारत-नेपाल सीमा पर बहराइच जिले में पडऩे वाले इस स्थान से पास का गांव सलारपुर व एसएसबी की चेक पोस्ट की दूरी एक से डेढ़ किमी है। 

दूसरा पहलू........
.....कितनी तडफ़ से आई होगी जंगल के राजा को मौत


फोटो- पेंड़ पर लटके शव के सामने खड़े वन-अधिकारी व्  कर्मचारी।


लखीमपुर। यूं तो वह जंगल का राजा कहलाता है, लेकिन उसकी आखिरत देखकर इंसानों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया कि अपने आखिरी समय पर पेंड़ पर फंसकर यह तेंदुआ मदद के लिए कितना तडफ़ा होगा। काश यह गश्ती दल उस रोज भी इधर से गुजर जाता जब अपनी जिंदगी बचाने के लिए इसको किसी की जरूरत थी।

वन महकमे के अफसरों की माने तो दुधवा रिजर्व एरिया के मूर्तिहा वन रेंज में रोहिनी के लगभग १२ फिट ऊंचे पेंड़ पर तेंदुआ चढ़ा होगा, लेकिन उतरते समय वह फंस गया। मौत की असली वजह तो पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही पता चल सकेगी, लेकिन अगर वजह पेंड़ में फंस कर मौत हो जाने की रही होगी तो वह मौत से पहले काफी दहाड़ा होगा, तब क्यों नही इस गश्ती टीम को वह आवाजें सुनाई दीं। कई दिनों तक तेंदुए ने जिंदगी और मौत की लड़ाई लड़ी होगी, और उम्मीद की होगी कि शायद कोई रहनुमा इधर से गुजर जाए और उसे जिंदगी बख्श दे। वन अफसर दावा कर रहे हैं कि इसकी मौत तीन से चार दिन पहले हुई है, जब कि शव की हालत बता रही है कि यह कितना पुराना हो चुका है। तेंदुआ का जहां शव मिला है वहां से नेपाल की सीमा महज दो किमी के करीब है, ऐसे में तेंदुए के साथ किसी अनहोनी से भी इनकार नही किया जा सकता।

क्या कहते हैं जिम्मेदार.......मूर्तिहा वन रेंज में मिले तेंदुआ का शव के मामले में प्रथम दृष्टया देखकर लगता है कि यह तेंदुआ पेंड़ पर चढ़ गया होगा, लेकिन उतरते समय पेंड़ की शाखाओं में फंस गया, वजन ज्यादा होने से यह निकल नही सका, जिससे इसकी मौत तीन से चार दिन पहले हुई होगी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद मौत की वजह और इसके नर या मादा होने की पुष्टि हो जाएगी।

"आरके सिंह, डीएफओ कतर्निया वन्य जीव प्रभाग"

अब्दुल सलीम खान 
salimreporter.lmp@gmail.com


Oct 8, 2012

बार्डर पर राष्ट्रीय जलीय जीव डॉल्फिन की गणना शुरू


'माई गंगा माई डॉल्फिन अभियान में दो दिन में मिलीं ६९ सूंस 

 इंडो-नेपाल की गेरूआ व कौडिय़ाला नदी में शुरू हुई डॉल्फिन की गणना, व गणना के दौरान यूं उछलती मिलीं डॉल्फिन ।


भारत-नेपाल की सीमा पर बहने वाली गेरूआ व कौडिय़ाला नदी में भारत की राष्ट्रीय जलीय जीव डॉल्फिन की गणना शुक्रवार को शुरूआत हो गई। पांच से सात अक्टूबर के बीच 'माई गंगा माई डॉल्फिन अभियान के तहत शुरू हुए इस गणना कार्यक्रम में पहले दिन टीम को ३९ डॉल्फिन इन नदियों में मिली हैं। वहीं दूसरे दिन बहराइच-खीरी के बार्डर पर बहने वाली घाघरा नदी में गैंगटिक डॉल्फिन की गणना की शुरूआत हुई, जिसमें टीम को ३० डॉल्फिन मिलने की पुष्टि हुई है। इस नतीजे से गणना में लगीं डब्ल्यूडब्ल्यूएफ व वन महकमें की टीमें काफी उत्साह में हैं।

गंगा नदी का बाघ कही जाने वाली डॉल्फिन को सूंस व हीहू? भी कहा जाता है। पिछले कुछ दशकों में तेजी से घट रही इनकी संख्या को देखते हुए चिंतित हुई सरकार व जिम्मेदार लोगों ने जब सर्वे कराया तो पता चला कि गंगा नदी में तीन दशक पहले तक छह हजार से ज्यादा डॉल्फिन थीं, लेकिन औद्योगिककरण की बाढ़ से इन नदियों में कचरा बढ़ा व जल प्रदूषण के चलते डॉल्फिन की संख्या में साल दर साल गिरावट आती गई। अब यहां महज दो हजार से भी डॉल्फिन के पाए जाने का अनुमान है।

पांच अक्टूबर २००९ राष्ट्रीय जलीय जीव का मिला दर्जा
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भारत सरकार ने डॉल्फिन  को बचाने के लिए इसे पांच अक्टूबर २००९ को राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित किया था। प्रदेश में अखिलेश सरकार ने इसे बचाने व इनकी वास्तविक तादात जानने में उत्सुकता दिखाई। इसी के चलते लोगों को जागरूक करने के लिए  डब्ल्यूडब्ल्यूएफ समेत वन विभाग व एनजीओ के माध्यम से २८०० किमी क्षेत्र में 'माई गंगा माई डॉल्फिन अभियान चलाया।

लखनऊ में विभागीय मंत्री ने की शुरूआत

तीन दिनी इस अभियान की शुरूआत लखनऊ में परिवहन मंत्री राज अरिदमन सिंह ने की। इसके साथ ही भारत नेपाल सीमा की सीमा पर बीने वाली गेरूआ नदी से गणना कार्यक्रम की शुरूआत हो गई।

मीठे पानी की रानी है डॉल्फिन

कौडिय़ा व गेरूआ नदी का पानी दूसरी नदियों की अपेक्षा काफी साफ व प्रदूषण रहित व मीठा है। इसलिए इन नदियों में इनका प्राकृतिक वासस्थल पाया जाता है। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के परियोजना अधिकारी दबीर हसन की अगुवाई में एलके स्टीफेंस अधिकारी डब्ल्यूडब्ल्यूएफ समते छह सदस्सीय टीम इस अभियान में लगी रही। कि २० जून २००७ को हुई गणना में कुल ४८ डॉल्फिन मिली थीं। पहले दिन अभियान गिरिजापुरी के चौ.चरण सिंह बैराज के एक छोर पर खत्म हुआ। दूसरे छोर से  घाघरा नदी में अपने अभियान की शुरूआत करते हुए जालिम नगर डाबर घाट होकर सीतापुर की सीमा पर जाकर थमा।

.....तो ये है सूंस की गणना का तरीका

दबीर हसन बताते हैं कि डॉल्फिन की सामान्य चाल पौने पांच से पांच किमी प्रति घंटा होती है, इसलिए मोटरबोट को ७ से १० किमी प्रतिघंटे की रफ्तार से लेकर चलते हैं, इस दौरान नदी में मौजूद डॉल्फिन पानी से बाहर सांस लेने के लिए हर तीन मिनट के करीब बाहर आकर उछलती है, इसी जम्प लेने के दौरान डॉल्फिन की गिनती होती जाती है।


गणना के साथ ही चला जागरूकता अभियान

नदी के किनारे रहने वाले मछुवारों से टीम ने कहा कि वह नॉयलान का जाल न इस्तेमान करें, क्यों कि यह जीव अंधा माना जाता है, डॉल्फिन अल्ट्रॉसॉनिक तरंगों से पानी में आगे का रास्ता तय करती है, लेकिन नायलान के जाल से ये तरंगे आरपार हो जाती है, जिससे यह जाल में फंस जाती है। नदी में मिलने वाली छोटी मछलियों को खाकर यह जीव नदी का संतुलन बनाए रखती है।
भारत के अलावा बंगलादेश, नेपाल, की नदियों में डॉल्फिन की खासी तादात पाई जाती है।

अब्दुल सलीम खान


विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था