International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Save Tiger

DON'T LET WILD TIGERS DISAPPEAR

Lady Rosetta

Potatoes with low sugar content and longer shelf life.

अबूझमाड़ के जंगल

जहां बाघ नही नक्सली राज करते हैं

खवासा का आदमखोर

जहां कांपती थी रूह उस नरभक्षी से

जानवर भी करते हैं योग

योगाचार्य धीरज वशिष्ठ का विशेष लेख

Sep 30, 2012

तू कितनी अच्छी है, तू कितनी प्यारी है....मां


इंसान ही नही पक्षियों में भी रहता है  'मां का दिल



कोयल के बच्चे को 'चूगा' देकर कौए दे रहे जिंदगी

- ऐ मां...तुझसे प्यारी सूरत भगवान की सूरत क्या होगी-गुलरिया में कोयल के बच्चे को 'चूगा' देता कौआ।

अब्दुल सलीम खान
बिजुआ(लखीमपुर)।  'कौआ और कोयल, के स्वभाव व बोली में एक दूसरे से मुखालफत से दुनिया बावस्ता है, लेकिन इन पर एक मां की ममता भारी है, इनकी न सिर्फ स्वभाव व बोली एक दूसरे  से जुदा है, बल्कि इनकी फैमिली तक अलग अलग है। लेकिन यहां एक कोयल के बच्चे के लिए कौआ मां का फर्ज निभा रहा है। कौआ अपनी चोंच से कोयल के बच्चे को चूगा देकर मां का फर्ज निभा रहा है।

मां का दिल आखिर मां का ही है, वह न जाति देखता है और न ही वर्ग, उसे तो सिर्फ अपने बच्चे से ही प्यार है। देख लीजिए न गुलरिया गांव में मेरे घर पर हर रोज कोओं का झुंड (हाउस क्रो) अपने साथ एक कोयल (एशियन कोयल) के मादा चूजे को लेकर आता है, इस झुंड में शामिल दो कौए इस कोयल के बच्चे को अपनी चोंच से चूगा देते हैं। कभी एक कौआ अपनी चोंच में पानी भरकर लाता है तो दूसरा कौआ रोटी के टुकड़े का चूगा कोयल के बच्चे को देता है।



दोनो पक्षियों में है काफी भिन्नताएं।
कौआ व कोयल में काफी भिन्नतांए होती हैं, ये दो  अलग अलग प्रजातियां  हैं। कौवे  की फैमिली कर्वडी व जंतु वैज्ञानिक नाम कर्वस स्पलेन्डेन्स होता है, वहीं कोयल की फैमिली क्यूकूलिडी व जंतु वैज्ञानिक नाम यूडीनैमिष स्कोलोपेसियय होता है। प्रजातियों में विभिन्नता होने के बावजूद  और एक दूसरे से   रंग रूप में  विपरीत नजर आने वाले इन पक्षियों में मां की ममता में कोई बदलाव नही है।



"कोयल जिसे संस्कृत में कोकिला कहते है, मानव द्वारा  इतिहास के दस्तावेजों में यह पक्षी बहुत पहले से दर्ज है, खासतौर से  भारत  में ।  इसके व्यवहार का अध्ययन हजारों वर्ष पूर्व हमारे लोगों ने किया जिसका ख़ूबसूरत वर्णन वेदों से लेकर तमाम   लोक कथाओ एवं लोक गीतों में किया  गया है । इस पक्षी के ब्रूड पैरासिटिज्म की जानकारी भी थी उन्हें, यानी कोयल का अपने अंडो को कौओं  के घोसले में रख देना अर्थात कोयल की संतति को कौओ  द्वारा पालना (एक प्रजाति की संतति को दूसरी प्रजाति द्वारा पालना ) यह हुआ  brood parasitism.

दुनिया की सभी जातियों में मातृत्व का भाव सार्वभौमिक है, वह चाहे इंसान हो या फिर जानवर मातृत्व के मामले में जाति, वर्ग व कैटॉगरी मायने नही रखती। गुलरिया में दिखा यह नजारा वास्तव में मां की ममता का सबसे खूबसूरत पहलू है।"
-----केके मिश्रा, वन्यजीव प्रेमी
-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
अब्दुल सलीम खान( लेखक लखीमपुर खीरी जनपद के गुलारिया गांव से ताल्लुक रखते हैं जंगल व् जीवों के तमाम किस्सों की बेहतरीन किस्सागोई अपनी कलम के जरिए उत्तर प्रदेश के नामी अखाबारात में करते आये हैं। पेशा पत्रकारिता,   इनसे salimreporter.lmp@gmail.com  पर संपर्क  कर सकते हैं।   )




Sep 24, 2012

उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा पक्षियों का बसेरा तहस-नहस



स्टार्क पक्षी के हजारों घोसले कर दिए गये नष्ट


(लखीमपुर-खीरी) प्रवासी पक्षी ओपनबिल स्टार्क जिसे स्थानीय जनमानस पहाड़ी पक्षी या भाद के नाम से चिन्हित करता है। ये पक्षी लखीमपुर खीरी के सरेली गांव में तकरीबन १०० वर्षों से भी अधिक समय से अपना ठिकाना बनाये हुए है, खासतौर से प्रजनन काल का वक्त जून से नवम्बर तक।  इस चिड़िया ने इसी गांव में अपनी सन्तति को सैकड़ों वर्षों से जन्म दिया और खुले आसमान में उड़ जाने लायक हो जाने तक का समय यही गुजारा, यही की जमीन ने इसे भोजन मुहैया कराया और यही के पेड़ों ने इसे बसेरा दिया, इन्ही पेड़ों पर साल दर साल इस पक्षी ने अपने घोसले बनायें और उनमें अपनी सन्तति को जन्म दिया। लेकिन इस साल इस चिड़िया ने अपनी सन्तति को जन्मा तो लेकिन उन्हे आसमान में उड़ने लायक शहबाज़ नही बना पाई। इस बार किसी इन्सानी हरकत ने इनका आशियाना नही उजाड़ा बल्कि बन्दरों ने इनके घोसलों को तहस-नहस कर दिया।



इन पक्षियों को अतीत व् वर्तमान में इस गांव के लोगों द्वारा सरंक्षण मिलता रहा है , ग्रामीण इन्हें बरसात का सूचक मानते आये \
 
इस चिड़िया के नशेमन को इस तरह से बन्दरों ने बर्बाद किया कि एक सैकड़ों की तादाद में घोसले जिनमें अण्डे और बच्चे मौजूद थे जमीन पर गिर कर नष्ट हो गये, चिड़िया के बच्चों की गर्दने मरोड़ दी, या उनके सर धड़ से अलग कर दिए और दो रोज में ही हजारों जीवित पक्षियों का यह आशियाना कब्रगाह में तब्दील हो गया। आज उस जगह पर सिर्फ़ दो-चार परिन्दों के सिवा कुछ नही बचा...सिर्फ़ मुर्दा परिन्दों की लाशे इधर-उधर बिखरी है ।




आखिर एक प्रजाति के इस घर को पूरी तरह दूसरी प्रजाति के द्वारा इतने वीभत्स तरीके से नष्ट कर देना एक सवाल खड़ा करता है वन्य-जीवन के क्षेत्र में काम करने वाले लोगों के लिए...इस विनाश ने तमाम सवाल छोड़ दिए है हमारे सामने ! आखिर ऐसा क्यों हुआ...




प्राकृतिक आवासों में शिकार और शिकारी सदियों से एक साथ रहते आये, और दोनो की निर्भरता भी एक दूसरे पर निश्चित है बावजूद इसके कि शिकार ने समूल एक साथ किसी प्रजाति को खत्म कर दिया हो ऐसे उदारहण नही मिलते और यह अप्राकृतिक भी है? फ़िर यह पक्षी बन्दरों का शिकार भी नही है!

इस पक्षी के आशियाने पर तमाम हमले होते रहे जैसे किसी सांप ने पेड़ों पर बने घोसले से अण्डें खा लिए..या फ़िर बाज ने इनके चूजों को शिकार बना लिया, पर ऐसा कभी नही हुआ कि किसी शिकारी ने एक साथ पूरी आबादी को ही खत्म कर दिया हों ? और यह संभव भी नही ...शिकारी के स्वभाव के अध्ययन पर जाये तो उनके एक इलाके होते है और शिकार को खाने की एक निश्चित मात्रा, इसलिए एक साथ तमाम शिकारी एक जगह पर इकट्ठा नही हो सकते और न ही एक शिकारी जीव एक साथ सैकड़ो शिकार को खा सकता है?


लेकिन पक्षियों के जिस विशाल कुनबे को बन्दरों ने जिस तरह से खत्म कर दिया वह अजीब सी घटना है। जबकि इन पक्षियों और इन बन्दरों के बीच शिकार और शिकारी का रिस्ता भी नही है? और बन्दरों के उत्पाती स्वभाव के बावजूद इस तरह की बरबादी जंगल के इतिहास में शायद ही दर्ज हो?

यकीनन इन बन्दरों के इस विनाशक व कुद्र स्वभाव के पीछे कोई मानव-जनित कारण है। इस गांव में इस बरबादी से रबरू होने जब मैं पहुंचा तो मन की गतिविधियां अराजक तौर पर गतिमान थी सवाल जवाब से बावस्ता नही हो पा रहे थे, लेकिन ग्रामीणों से बात करने के बाद राज जाहिर हुआ कि आखिर यह बन्दर इन परिन्दों की मौत का कारण क्योबन  गये....

मानव आबादी में नील-गाय की तरह बन्दरों का रूख इसका मुख्य कारण है, इन्सान नील-गाय को नियम-कानून और संवेदनाओं को ताक पर रखकर मारता और डराता आ रहा है, बावजूद इसके उसे बचपन से सिखाया जाता रहा कि जीव-हत्या पाप है, कम से कम तब तक जब तक उसकी जान का खतरा न बने वह जीव, बन्दरों को भी एक समुदाय पवित्र और पूज्य मानता रहा, कभी उसे भोजन देता और उसे मारना भी पाप समझा जाता रहा, लेकिन हालात बदल गये, जंगल काट दिए गये, परती भूमियां कृषि योग्य भूमि में तब्दील कर दी गयी नदी-नारों पर भी इन्सानी कब्जा, गांव की पुरानी बागे भी नदराद हो गयी और उनकी जगह ले ली कलमी आम की या अन्य टिम्बर योग्य प्रजातियों ने जहां कड़ा इन्सानी पहरा हर वक्रत मौजूद रहता है, फ़िर आप बताये जीव कहां जाए ? इनके बसेरों को हमने उजाड़ा और अब यह हमारे कथित बसेरों पर आ धमकते है, यह इनकी मजबूरी ही नही जिन्दा रहने की जरूरत है। लेकिन हम यह बिना सोचे यह चिल्लाना शुरू करते है कि यह बाघ, शेर, बन्दर या नील गाय हमारे इलाकों यानि रिहाईशी इलाकों में घुस आया है, जैसे जमीन पर सिर्फ़ इन्सानी हक हो और यह हक हम लिखवा कर ही पैदा हुए हों।



इन बन्दरों का रिहाईशी इलाकों में आना भी ऐसी ही घटना है, अब सुनिए इन्सानी हरकतों के किस्से, जिस गांव में बन्दरों की आवा-जाही बढ़ी वहां के लोगो ने शुरूवाती दौर में हवाई बन्दूक से इन जानवरों के जिस्म में लोहे के छर्रे धांस दिए या पटाखों से इन्हे डराया, फ़िर भी काम नही बना तो इन्हे ट्राली को जालनुमा बनाकर उसमें अनाज रखकर इन्हे धोखे से बन्द कर लिया, फ़िर इन्हे पकड़कर इनके हाथ-पैर बांध दिए और बोरों में भरकर इन्हे दूसरे इलाकों में जाकर छोड़ दिया, फ़िर यही सिलसिला अनवरत गति से जारी रहा, दूसरे गांव के लोगों ने भी ऐसा किया, और ऐसा करते वक्त इनके हाथ-पैर और चेहरे लहूलुहान होते रहे, कैद से अपने आपको छुड़ाने की छटपटाहट इन्हे और रक्त-रंजित करती गयी.....एक वाकया वहां के ग्रामीण ने बताया कि इस गांव के पास कुछ लोग बोरों में बन्दरों को बन्द कर छोड़ जाते है जिन्हे गांव के कुछ सहिष्ण लोग छुड़वा देते है, उन बंधे हुए बोरों से, किन्तु इन बन्दरों के बन्धे हुए हाथ पैर डर के कारण नही खोल पाते...एक दृष्टान्त ने तो मुझे रूला ही दिया कि एक बन्दरियां अपने बच्चे को लेकर पेड़ पर चढने की कोशिश कर रही थी लेकिन चढ नही पा रही थी जानते है क्यों, क्योंकि उस बन्दरियां के हाथ पीछे की तरफ़ बंधे हुए थे और बच्चा उसके पेट से चिपका हुआ था........मुझे अफ़सोस है कि इन्सान अपने गुलामी के दिनों को भूल गया जब मांये किसी और को बेच दी जाती थी और बच्चे किसी और को....! इन्सान इन्सान को गुलाम बनाता था ऐसे ही इन्सान इन्सान को बांधकर जहाजों में डाल देता था,  गुलाम महीनों भूख प्यास से तड़पते दूर देश के मुल्कों में बेचे जाते थे......



हम न तो इतिहास से कुछ सीख रहे है और न ही बर्बरता की अपनी नियति में फ़र्क ला पा रहे है, मानवता के लिए ही नही सारी धरती की और धरती पर बसने वाली प्रजातियों के लिए यह खतरानाक है।


मैं यहां सिर्फ़ यही कहना चाहता हूं कि इन बन्दरों की इस दशा के बाद इनकी मनोदशा में क्या तब्दीली आई होगी..अगर आप के साथ यह सब किया जाए तो कैसे बन जायेंगे आप?, शायद इस गांव के परिन्दों के इस आशियाने को उजाड़ने में इनकी यही मनोदशा का ही परिणाम रहा होगा, और इस मनोदशा की उत्पत्ति का कारण हम ही हैं, यह घटना  साबित करती  है कि इन परिन्दों को  बंदरों द्वारा उजाड़ने का कारण अप्रत्यक्ष रूप से हमारी मानव बिरादरी है, नाकि ये बन्दर- ये तो सिर्फ़ माध्यम है..निमित्त मात्र...!
 (तबाही के मंजर से आप सभी को नाज़िर नही करा रहां हूं क्योंकि वह बहुत वीभत्स है। साथ ही अपने शोध पत्रों का समावेश यहां पर नही कर पाया सन्दर्भ में जो भविष्य में उनका संकलन वेब-पत्रिका में अवश्य करूंगा, इनकी इस सुन्दर आबादी व् व्यवहार का जिक्र मैने अपने शोध कार्य के दौरान विश्व पटल पर तमाम पत्र-पत्रिकाओं और वैज्ञानिक जर्नल्स के माध्यम से  किया है।)


----------------------------------------------------------------------------

थोड़ा परिचय हो जाए इस सुन्दर और सीधे स्वभाव वाले पक्षी का, यह ओपेनबिल्ड स्टार्क(Openbilled Stork) जिसका वैज्ञानिक नाम एनॉस्टामस ओसीटेन्स (Anastomus oscitans)है,  जो सिकोनिडी (Ciconiidae) फ़ैमिली के अन्तर्गत है। यह पक्षी भारत के अतिरिक्त पाकिस्तान, चीन, वियतनाम, थाईलैण्ड, श्रीलंका आदि देशों में रहता है, और अपने प्रवास काल में 1500 कि०मी० से अधिक तक की दूरी तय कर लेता है, जून से नवम्बर तक भारत में इसका प्रजनन काल का समय है, जहां ये पक्षी सामुदायिक तौर पर हजारों घोसले बनाते हैं और अण्डे देने से लेकर बच्चों के वयस्क हो जाने तक का समय अपने इसी प्रजनन स्थल पर गुजारते है, इसके बाद ये पक्षी भोजन की तलाश में मीलों दूर तितर-बितर हो जाते है, सबसे खास बात यह है कि ये पक्षी अपने प्रजनन काल के समय फ़िर उसी स्थल पर वापस होते है जहां उसने पिछले वर्ष घोसले बनाये थे, यह प्रक्रिया साल दर साल चलती है, जब तक उन्हे उस स्थान पर अनुकूल परिस्थियां मिलती रहती हैं, यानि घोसले बनाने के लिए वृक्ष, आस-पास में तमाम जल स्रोत मौजूद हों। इनका मुख्य भोजल घोघा (Pila) है। सफ़ेद-काले पंखों वाला यह स्टार्क पक्षी जिसकी तांगे लम्बी व गुलाबी रंग लिए होती हैं, बड़ी चोंच जिसका रंग काला होता है, इसकी चोच के मध्य रिक्त स्थान होने के कारण ही इसे ओपनबिल कहते है, और यह चोंच का आकार इसे इसका भोजन पकड़ने में सहायता करता है।


 प्रजनन से पूर्व ये पक्षी जोड़े बनाते है, चार से पांच अण्डे एक घोसले में पाये जाते है, नर व मादा दोनो मिलकर अपनी सन्तति का पोषण व सुरक्षा करते हैं।   

अपने शोध के दौरान जो मैने देखा यह प्रजाति मानव प्रजाति के लिए बहुत लाभदायक हैं, इन पक्षियों के द्वारा हेल्मिन्थीज से होने वाली बीमारियों पर नियन्त्रण इन पक्षियों द्वारा होता है, चूकिं ये घोघा को मुख्य आहार के रूप में लेते है, और घोघा (Mollusca) मुख्य वाहक होता है हेल्मन्थीज (mainly Trematode) का, जिसके कारण मानव समुदाय  व उनके पालतू जानवरों में तमाम भयानक बीमारिया पनपती हैं जैसे सिस्टोसोमियासिस, आपिस्थोराचियासिस, सियोलोप्सियासिस व फैसियोलियासिस (लीवरफ्लूक) जैसी होने वाली बीमारियां जो मनुष्य व उनके पालतू जानवरों में बुखार, यकृत की बीमारी पित्ताशय की पथरी, स्नोफीलियां, डायरिया, डिसेन्ट्री आदि पेट से संबंधित बीमारी हो जाती हैं।

प्लेटीहेल्मिन्थस संघ के परजीवियों से होने वाली बीमारियों पर यह पक्षी नियंत्रण रखता है  चूंकि इन परजीवियों का वाहक घोंघा (मोलस्क) होता है जिसके द्वारा खेतों में काम करने वाले मनुष्यों और जलाशयों व चारागाहों में चरने व पानी पीने वाले वाले पशुओं को यह परजीवी संक्रमित कर देता है। और इस घोघे को यह स्टार्क पक्षी खाता है नतीजतन यह इन परजीवियों जो घोघा में मौजूद होते है उनकी तादाद पर नियन्त्रण रखता है।

--------------------------------------------------------------------------------


कृष्ण कुमार मिश्र ( वन्य जीव सरंक्षण, अपनी परंपरा और इतिहास को संजोने की जुगत, लखीमपुर खीरी में निवास, इनसे krishna.manhan@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है।)


Sep 16, 2012

बिखरता हिमालय





 जल जंगल जमीन- जो बुनियादी हैं! उन्हें ही तहस नहस किया जा रहा है-

विकास बनाम विनाश




मानव सभ्यता की हम बात करते रहते हैं. कितने दशक बीत गये, बीतते जा रहे हैं. कहते हैं. इतिहास खुद को दुहराता है. उसी कि राह हम देख रहे हैं. समाज के बनने बिगड़ने के हम साक्षी बनते रहते हैं. यह बनना बिगड़ना क्या है, यह समझ पाना कठिन होता जा रहा है. क्योंकि जिसे हम ‘बनना’ कहते हैं, वह दूसरे के दृष्टि में बनना ही हो ऐसा आवश्यक नहीं है. बनना शब्द रचनात्मक पहल को दर्शाता है.



    इस बनने और बिगड़ने की परिभाषाओं को भी समझना चाहिये.किसी बसी-बसाई या बनी हुई सभ्यता को बिगाड़कर किसी नई चीज़ का निर्माण उसी पर करना इसे बनना कहना या मानना चाहिये कि बिगड़ना! यह तय कर पाना कठिन हो रहा है. सारी मान्यताएं,अवधारणाएं और पैमाने बदल गये हैं. ये बदलाव भी इतनी तेजी से हो रहे हैं, कि मौलिकताओं को टिका पाना कठिन होता जा रहा है. जो मौलिक है, वो उन्हें पुराना लगता है और पुराना अर्थात उसका नवीनीकरण होना ही चाहिये, नवीनीकरण कैसे होना चाहिये, तो कहते हैं, कि विकास हो!! विकास कैसे हो!? तो एक ही रास्ता उन्हें समझ में आता है, कि जो उनकी दृष्टि में विकास है?.



 ---अनियोजित विकास



           इस विकास का लाभ एक बहुत ही छोटे तबके को हुआ है, जो बड़ी तेज़ी से विकसित हुआ है. सवा अरब के हिंदूस्तान में यह समृद्धि ज़्यादा से ज़्यादा तीस करोड़ लोगों तक पहुँची बताई जा रही है, इसके बाद के तीस करोड़ लोग संघर्ष के बीच जीवन व्यतीत कर रहे हैं, और आखिरी साठ करोड़ लोग अपने मनुष्य होने के स्वयं के अस्तित्व को तलाश रहे हैं. हमारे वनवासी भाई पहले ही बड़े बाँधों के नाम पर उजाड़े जाते रहे हैं और अब बड़ी पूँजी के नाम पर उन्हें बेदखल किया जा रहा है. तिजोरियों वाला इंडिया अलग देश है और अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ता और नक्सलवाद से जूझता हिन्दूस्तान एक अलग देश है और दोनों ही के बीच एक लम्बी, गहरी और चौड़ी खाई है.



गाँधी विचार की प्रासंगिकता-



          इन सब बातों को हम सोचते हैं, तो गांधीजी ने ‘हिंद स्वराज’ में जो कहा है, वह ध्यान आता है, कि “मनुष्य कि वृत्तियाँ चंचल हैं. उसे शरीर को जितना ज़्यादा दिया जाये, उतना ज़्यादा माँगता है. ज़्यादा लेकर भी वह सुखी नहीं होता. भोग भोगने से भोग कि इच्छा प्रबल होती जाती है.” वे यह भी कहते हैं, कि “सभ्यता वह आचरण है, जिससे आदमी अपना फर्ज़ अदा करता है. फर्ज़ अदा करने के मायने हैं, नीति का पालन करना. नीति का पालन करने का मतलब है, अपने मन और इंद्रियों को बस में रखना. ऐसा करते हुए हम स्वयं को पहचानते हैं. यही सभ्यता है. इससे जो उल्टा है, वो बिगाड़ करने वाला है. समझना यही है कि यह सभ्यता दूसरों का नाश करने वाली और खुद नाशवान है.”       ......



एक तरफ हम अपनी सुविधाओं के लिये प्राकृतिक संसाधनों को दोहन कर आराम के साधन जुटा रहे हैं, तो दूसरी तरफ लाखों लोग अपनी भूमि और आजीविका के संसाधनों से वंचित हो रहे हैं, इसलिये हमें भी यह समझ में आना चाहिये कि असली विकास हम किसे कहेंगे!! वह जो सभी लोगों को सम्मान भरी आजीविका दे और प्रकृति के साथ सामंजस्य से जीना सिखाये या फिर वह जो कुछ लोगों के लोभ-लाभ के लिये निसर्ग-मानव के सम्पोषित प्रयासों को समूल नष्ट कर दे!!?? हमारी सभ्यता हमें सिखाती आई है, जितने हम प्रकृति से जुड़े रहेंगे उतने ही हम सम्पोषित स्वरूप में रहेंगे. हमनें फिर किया भी वही. जब तक हमारा प्रकृति से सामंजस्य था, तब तक किसी प्रकार का असंतुलन नहीं था. सभी प्राकृतिक संसाधन – जल, जंगल और ज़मीन हमारे साथ और हमारे लिये थे. परंतु बाद में हमने यह महसूस किया कि प्रकृति जो हमसे अभिन्न थी, उससे हमें अलग कर दिया गया है और उस पर अधिकार और मालिकाना हक जताना शुरु हुआ, अब वो प्राकृतिक संसाधन कुछ ही लोगों के हाथ में जा रहे हैं.



सही एवं स्वमानी आजीविका आयोजन – जल, जंगल, ज़मीन, तकनीक, श्रम और मानव प्रेरणा पर स्थानीय लोगों के नियंत्रण और अपनी आवश्यकताओं के हिसाब से उसके असरदार इस्तेमाल पर निर्भर करता है. परंतु विकास के नाम पर किये जाने वाले ज़्यादतर हस्ताक्षेप स्थानीय संसाधनों को ऐसी विशाल और केंद्रीकृत संस्थाओं के हवाले कर देते हैं, जिनकी ना लोगों के प्रति जवाबदेही होती है और ना ही उनकी ज़रूरतों के प्रति समझ होती है.



    जिस प्रक्रिया में से थोड़े से लोगों के हाथ में सत्ता एवं सम्पत्ति का संकेंद्रण होगा और व्यापक स्तर पर लोग अपनी जीविकोपार्जन के साधन से बेदखल कर दिये जायेंगे, वह कैसे स्वीकार की जा सकती है? उद्योग के विकास के नाम पर बड़े व भारी उद्योगों की ही चर्चा क्यों होती है? उद्योग के विकास का अर्थ ग्रामीण उद्योग का विकास क्यों नहीं हो?



   उत्तरप्रदेश में भट्टापरसोल तथा आछेपुर गाँव, बिहार में मुज़फ्फरपुर के निकट मरा गाँवमहाराष्ट्र के रत्नागिरी जिला के जैतापुर गाँव तथा देश के अन्य कई गाँवों में भूमि अधिग्रहण कानून के तहत बड़े उद्योगों द्वारा किसानों पर अत्याचार किया गया.  इसे सरकार ने अनदेखी कर दिया है. पश्चिम बंगाल में सिंगूर तथा नंदीग्राम में बहुत पहले ही किसानों की भूमि छीन लेने की कार्यवाही भूमि अधिग्रहण कानून के तहत की गई, जिसकी चर्चा पूरे देश में हुई. फिर भी इसका क्रम टूट नहीं रहा है. शासनकर्ताओं ने मान लिया है, कि इस देश का उद्योगीकरण करने के लिये भारी उद्योगों का निर्माण करना ज़रूरी है, जो बड़े उद्योगों कि इकाईयों द्वारा ही सम्भव है.



नदियां और जंगल-

इसी प्रकार के तथाकथित विकास का शिकार पिछले काफी अरसे से उत्तराखंड भी हो रहा है. उत्तराखंड हिमालय के प्रचुर प्राकृतिक संसाधनों युक्त इलाका ही नहीं वरन एक करोड़ मनुष्यों का घर भी है. जल, जंगल और ज़मीन जैसे प्राथमिक संसाधन उत्तराखंड के अलावा देश के बड़े हिस्से को सदियों से जीवन दे रहे हैं. यहाँ से निकलने वाली नदियों का पानी दिल्ली के साथ – साथ देश के नौ राज्यों के अलावा बांग्लादेश तक फैले करोड़ों लोगों की प्यास बुझा रहा है. यहाँ के वन इन तमाम जीवनदायिनी नदियों सहित हज़ारों जलधाराओं के उद्गम और जलग्रहण क्षेत्रों की नाज़ुक पारिस्थितिकी को टिकाये हुए हैं. वनों से ही स्त्रोतों वा नदियों में पानी है. इतना ही नहीं यहाँ के वन हिमालय की नाज़ुक भूसंरचना की उथल- पुथल रोकने के साथ ही पर्वतीय ग्रामीण अर्थतंत्र का आधार भी हैं. आज भी प्राकृतिक जंगल बचे हैं, तो इसलिये कि यहाँ की 80% आबादी जीविकोपार्जन के लिये प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से वनों पर निर्भर हैं. हिमालयी आबादी और प्राकृतिक संसाधनों का यह ताना- बाना उत्तराखंड में प्राकृतिक संसाधनों और आबादी के रिश्तों को प्रगाढ़ करने वाली प्रक्रियाओं का परिणाम है और उसे बनाये रखने की ज़िम्मेवारी लोगों और सरकार की है. हमारी सरकारें इस समझ को लगातार नज़र अंदाज़ करतीं आ रहीं हैं. अब तक जो विकास नीतियाँ बनाई गईं हैं, उनमें न हिमालय बचाने की हिमायत है और नही लोगों को समृद्ध करने का ज़रिया. पर्यावरण संरक्षण के नाम पर स्थानीय लोगों की सदियों पुरानी वनाधारित जीवनशैली को समाप्त कर अभयारण्यों और वन्यजीव विहारों का विस्तार किया जा रहा है. वन संरक्षण के नाम पर पर्वतीय गाँवों की वेनाप और ग्राम समाज की भूमि को वन विभाग के अधीन कर दिया गया है. इससे 93% भूमि राज्यके कब्ज़े में आ गई है. जबकि 64% वन क्षेत्र पहले ही वन विभाग के अधीन है. इस भूमि के आधे हिस्से में भी वन नहीं है.



        ग्रामीण अर्थतंत्र की रीढ़ और सामूहिक वन प्रबंध की मिसाल वन पंचायतों को विश्व बैंक के कर्ज़ से चल रही संयुक्त वन प्रबंध योजना के हवाले कर सरकारी नियंत्रण बढ़ा दिया है. प्राकृतिक वनों का ह्रास हो रहा है. वनों में प्रतिवर्ष आग लगने की घटनाएँ बढ़ रहीं हैं. इसके अलावा प्रतिवर्ष हज़ारों हेक्टेयर वनक्षेत्र एवं वनावरण बड़ी परियोजनाओं के कारण नष्ट हो रहे हैं. परिणामस्वरूप जलग्रहण क्षेत्रों में भूक्षरण की गति तेज़ हुई है और उनकी जल ग्रहण क्षमता में कमी आई है, और हिमालयी नदियों में बाढ़, भूस्खलन व पारिस्थितिकी बदलावों की गति तेज़ हुई है, जिससे यहाँ के नाज़ुक पर्वत ही नहीं वरन उनसे निकलने वाली हिमानी पोषित एवं गैर हिमानी वर्षा पोषित नदियों का अस्तित्व खतरे में है.



         हिमालयी नदियों का संकट और भी गहरा है. भूमंडलीय तापमान में वृद्धि और मानवीय गतिविधियों के हिमरेखा तक पहुँच जाने के कारण हिमालयी नदियों के जलस्रोत ग्लेशियर अपना प्राकृतिक स्वरूप खो रहें हैं. इनके सिकुड़ने की गति तेज़ हो गई है. बर्फ पिघलने से ग्लेशियर झील में तब्दील हो रहें हैं और निचली घाटियों में आने वाली बाढ़ का कारण बन रहे हैं.



अब तक उत्तराखंड हिमालय के विकास का जो मॉडल सामने आया है, उसमें दशकों से स्थानीय गाँवों को रोशन करने वाली थल- पिथोरागढ़, आरे- बागेश्वर, मसूरी तथा रामगाड़ नैनीताल जैसी विद्युत परियोजनाओं की अनदेखी कर कुछ लोगों की ऊर्जा की भूख मिटाने के लिए विकास के नाम पर हिमालय की पारिस्थितिकी को रौंदने वाली टिहरी जैसी परियोजनाओं को प्राथमिकता देने वाली विकास नीति आई है. इसके तहत उत्तराखंड की नदियोंको सुरंगों और बाँधों में समाने और अति संवेदनशील पहाड़ों को खोखला करने का काम शुरु हो गया है.

नदियों का कत्ल कर रही परियोजनायें



         सरकारी दस्तावेज़ों के अनुसार गंगा, यमुना, टौंस से लेकर काली तक उत्तराखंड की लगभग सभी बड़ी नदियों पर बिजली उत्पादन हेतु लगभग 600 परियोजनाएँ निर्माणाधीन अथवा प्रस्तावित हैं. जिसमें नदियों की अविरल धाराओं को बाँध कर और संवेदनशील पहाड़ों को खोखला कर नदियों के जल को लम्बी लम्बी सुरंगों में डाला जा रहा है अथवा डाला जाएगा. हक़ीक़त यह है, कि इनसे लोगों तथा देश को कोई दीर्घकालीन लाभ नहीं मिलने वाले हैं. इन नदियों के किनारे सदियों में विकसित हमारी समूची नदी घाटी सभ्यता विलुप्त हो सकती है. इसकी शुरुआत टिहरी से हो चुकी है. फिर भी दर्जनों बाँध निर्माणाधीन और प्रस्तावित हैं. सुरंगों के माध्यम से कार्यांवित होने वाली परियोजनाओं से अनेक गाँवों का अस्तित्व खतरे मे पड़ने वाला है. चमोली जिले में सुरंग आधारित विष्णुप्रयाग जल विद्युत परियोजना से चॉई गाँव का विध्वंस, बागेश्वर में सुडिंग गाँव और उत्तरकाशी जिले में पाला गाँव के अस्तित्व का संकट इसके नवीनतम उदाहरण हैं. इसके अलावा अनेक बस्तियाँ विस्थापन के कगार पर हैं और अनेक बस्तियों के साथ – साथ उनके खेत, जंगल और उनसे जुड़े जीविका के साधन समाप्त हो रहे हैं, जिनकी कोई भरपाई नहीं होने वाली है. निरंकुश सरकारें लोगों की आस्था और आजीविका के आधारों को नष्ट करने पर जुटी हुई हैं.



         इस प्रकार उत्तराखंड की नदियों के लिए दो तरह के खतरे साफ नज़र आ रहे हैं. जिनके घातक परिणाम हो सकते हैं, इसकी शुरुआत हो चुकी है. जिसे निम्न रूप में देखना उचित होगा- पहला जल विद्युत परियोजनाओं के अंतर्गत नदियों में बनने वाले बड़े बाँध और सुरंगों के दुष्परिणामों के रूप में. दूसरा उत्तराखंड हिमालय की जीवन रेखा कही जाने वाली गैर हिमालयी वर्षा पोषित नदियों में निरंतर पानी की कमी के दुष्प्रभावों के रूप में सामने आईं हैं.





                                                

रूपल अजबे ( गाँधी शांति प्रतिष्ठान नई दिल्ली में शोध सहायक के तौर पर कार्यरत, महात्मा के जीवन-दर्शन को मुसलसल जारी रखने की कवायदों में मशरूफ़, हिन्दी-उर्दू अदब  के मुख्य नगरों में से एक नगर इन्दौर से ताल्लुकात रखती हैं, क्रान्तिकारी विरासत, इनसे सम्पर्क rupalajbe@gmail.com पर कर सकते हैं। )






                                            







विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था