International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Save Tiger

DON'T LET WILD TIGERS DISAPPEAR

Lady Rosetta

Potatoes with low sugar content and longer shelf life.

अबूझमाड़ के जंगल

जहां बाघ नही नक्सली राज करते हैं

खवासा का आदमखोर

जहां कांपती थी रूह उस नरभक्षी से

जानवर भी करते हैं योग

योगाचार्य धीरज वशिष्ठ का विशेष लेख

Aug 25, 2012

बाढ़ ....क्योंकि नदियां कभी नही लौटती !

ये नदी नही एक गांव है, जो अब डूब चुका है।

बाढ़ की विभीषिका में बह रही है तराई की वन्य-संपदा- दुधवा राष्ट्रीय उद्यान प्रभावित

तराई के जंगल हुए जल-मग्न- जानवर बेहाल

इन्तजामियां कर रही है सिर्फ़ कागज़ी कवायदें-

लखीमपुर खीरी हिमालय की तराई का वह भूभाग है जहां तमाम नदियां इस जमीन पर कई रेखाये खींचती हैं! इन रेखाओं के बीच के हिस्सों को भरते हैं शाखू के विशाल जंगल, गन्ने की फ़सल और रिहाईशी इलाके। ...इनमें कुछ रेखायें मोटी तो कुछ बारीक है, लेकिन बारिश इन रेखाओं को अब सिर्फ़ मोटा नही करती बल्कि इन्हें बेडौल बना देती है, कही कही तो ऐसा लगता है जैसे किसी बच्चे ने स्याही गिरा दी हो ! जानते है ऐसा क्यो होता है? कहते हैं, "पानी अपना रास्ता खुद तलाश लेता है"! आखिर क्यो तलाशना पड़ता है पानी को रास्ता...जाहिर है उसे कही रोका जा रहा है, या फ़िर नदी के आगोश में शान्त बहने वाला पानी आज विकराल गर्जना करते हुए, अपने आवेग को बढाता हुआ जमीन पर इधर-उधर उमड़-घुमड़ कर सब कुछ तहस-नहस करने को आतुर क्यों है, उसके इस रौद्र रूप पे आप को यह नही महसूस होता कि उसे कही छेड़ा गया है, बांधा गया या फ़िर उसे रास्ता नही दिया जा रहा है, कुछ तो है जो वह नाराज है, अपनी धीमी, शान्त और कलरव की मधुर धुन करने वाला यह जल आज इतने आवेश में क्यों है? 

 सोचिए नदियों के किनारे जो मानों दो बाहें हों और अविरल बह रहे जल को बड़ी शिद्दत से समन्दर के आगोश में समर्पित कर देने को आतुर हों, आज बाहें (किनारे) खण्डित हो रही है- जगह जगह और जल धारायें इधर-उधर का रूख अख्तियातर करने को मानों विचलित हो रही हों! 

हमने नदियों पर बाधं बना कर उनकी निरन्तर बहने की प्रवत्ति को रोकने की कोशिश की, आप को बता दूं यदि किसी के स्वभाव और यानि प्रवत्ति से छेड़छाड़ की जाती है, तो फ़िर इसके दुष्परिणाम ही संभावित होते है, हमने इन नदियों के किनारे के जंगलों झाड़ियों, और घास के मैदानों को नष्ट कर दिया और वहा या तो खेती करना शुरू ए की या फ़िर रिहाईशी इलाके बना लिए, नतीजा सामने है, जो जंगल, वृक्ष, और घासें मिट्टी को जकड़े हुई थी वो जकड़न खत्म हो गयी और जल-धाराओं की विशाल ठोकरों ने किनारों को काटना शुरू ए कर दिया।

बाढ की विभीषिका ये शब्द बड़ा अजीब सा लगता है, कभी बाढ़ खुशहाली का सबब बनती थी, थोड़ी परेशानियों के साथ ! वजह थी बाढ़ के पानी के साथ आये वो तत्व जो जमीन को उपजाऊ बनते है, साथ ही उस पूरे भूभाग के तालाबों और कुओं को संचित करने का काम भी यह बाढ के पानी से ही था। नदियों के किनारे वाले भू-भाग को लोग केवल चरागाह के तौर पर इस्तेमाल करते थे, आज नदियों के किनारे क्या नदी के बीच में घर बना डाले लोगों ने और खेती करना शुरू कर दिया, किसी के दायरे में घुसना और फ़िर नुकसान होने पर मुआबजे की मांग, ये सब बड़ा अजीब है!

एक दौर था तो हमारे तराई के गांजर क्षेत्र के लोग इस बात के लिए तैयार रहते थे, कि अब थोड़े दिन शारदा मैया या घाघरा मैया (नदी) उफ़नायेंगी तो तैयारी पहले से कर लो, लोग नदियों की पूजा करते थे कि मैया अब लौट जाओ हमारे गांव से । 



आज नदियों का यह उफ़नाना सामान्य नही रहा, ये विकराल रूप धारण कर रही है, क्योंकि पहाड़ों पर कटते हुए जंगलों की वजह से, मैदानी क्षेत्रों में नदियों के किनारों पर खेती होने से, इन नदियों के भीतर सिल्ट और मिट्टी इकट्ठा होती जा रही है, नतीजतन इनकी गहराई समाप्त हो गयी, समतल होती नदियां, बिना किनारों के जब गुजरेगी हमारे मध्य से तो नतीजा क्या होगा?



बड़ी नदियों के अलावा अगर हम बात करे छोटी नदियों की, जो इन विशाल नदियों को पोषित करती रही है, तो हमने इन छोटी नदियों लगभग नष्ट कर दिया, इनके किनारो पर कब्जा कर लिया,  बदलती परम्परायें और विकास ने मानवीय सभ्यता को जो प्रभावित किया उसके चलते अब गांवों में लोग इन नदियों से मिट्टी नही निकालते अपने घर और घर के तमाम सामान को बनाने के लिए जो कभी बहुत जरूरी था। ये नदियां भी अपनी गहराई खो चुकी है, और किनारे सिकुड़ गये हैं। ये छोटी नदियां बारिश के अतिरिक्त भी पूरे वर्ष मनुष्य और जानवरों के लिए जल की उप्लब्धता बनाये रखती थी, और बड़ी नदियों की जलधारा को पोषित भी करती थी, ताकि वह सागर तक पहुंच सके।


नदी ने जो रास्ता एक बार अख्तियार कर लिया, फ़िर राह में कुछ भी हो, उसे तहस नहस करती हुई, वो आगे बढती रहती है, और दोबारा पीछे नही मुड़ती अपने छोड़े हुए मार्ग पर।  इन नदियों को इनका रास्ता मिल जाये इनके मुहाने और मीलों तक फ़ैली इनके किनारों की सरहदें फ़िर ये कभी नाराज़ नही होगी, सिर्फ़ बारिश के दिनों में उफ़नायेंगी, जिन इलाकों से गुजरेगी, वहां की मिट्टी को गीला और उपजाऊ बनाती हुई, जलाशयों को संचित करते हुए गुजर जायेगी...मानों जैसे हमें तोहफ़ा देने ही आई हों, इन्हे बचा ले हम क्यों कि ये कभी वापस नही लौटती- यह इनकी वृत्ति है! ..ये दोनों ही सन्दर्भों में सत्य है, नदियां वापस नही होती- जिस रास्ते पर रूख कर लिया उससे और अगर ये खत्म हो गयी तब भी...वापस नही लौ्टेगी, फ़िर हम किसी भागीरथ को खोजते फ़िरेगे ! इस इन्तज़ार में कि.....



एक और विडम्बना है, सरकारी कवायदे जिनका कोई मौजू परिणाम नही निकलता ! बन्धों के निर्माण के साथ ही बाढ की तबाही को और बढ़ा दिया गया।  अत्यधिक बाढ़ क्षेत्र और कम बाढ़ क्षेत्र से इतर करने के लिए बीच मे मिट्टी के बड़े बड़े बन्धे बना दिए गये ताकि पानी यही तक आकर रूक जाए, नतीजा यह हुआ कि जहां अधिक बाढ वाले इलाके थे, वो जल-मग्न हो गये, लोगों के घर और गांव डूब गये, जानवर और आदमी सड़कों पर बसर करते है,  इन बारिश के दिनों में, सबसे खराब बात तो यह है, कि एक तरफ़ तबाही दूसरी तरफ़ के लो्ग अमन चैन में, यह कौन सा तरीका है, बाढ़ से बचाव का। एक गौर बात जब ये बन्धें पानी के दबाव में टूटते है, तो उन इलाकों और तबाही मचती है, जो अभी तक सुरक्षित थे। पानी का आवेग इतना अधिक होता है कि इमारते डूबती ही नही धराशाही हो जाती है। 

ये बन्धे मानव समाज में आपसी वैमनस्य का कारण भी बनते है, जब बन्धे के उस तरफ़ के लोगों के गांव घर डूब जाते है, तो वह कोशिश करते है, कि बन्धे को काट दिया जाए ताकि पानी दूसरी तरफ़ चला जाए और उनकी फ़सले और घर् बरबाद होने से बच जाए, इस वजह से बन्धे के दोनों तरफ़ के लोग आपस में लड़ते है।

जानवरों का प्राकृतिक आपदाओं के प्रति बोध हमसे अधिक है, बारिश के शुरूवात में ही नदियों का गन्दला होता पानी, उसके बेग में जरा सी भी हुई तब्दीली वो भांप लेते है, और कोशिश करते है कि नदी जब रौद्र रूप ले तो अपना बचाव कर सके, लेकिन हमने उनके घरों से भी छेड़छाड़ की नतीजतन वो अपने कथित प्राकृतिक आवासों में भी अपने को बचा पाने में अक्षम हो रहे है।

कुल मिलाकर इस अनियोजित विकास और क्षणिक लाभ के लिए प्रकृति से छेड़ छाड़ मानव सभ्यता को इतना प्रभावित कर देगी कि हम कुछ नही कर पायेगे !

हो सके तो नदियों के सिकुड़ते किनारों को रोक ले, इनके मार्गों को इनकी गहराई इन्हे फ़िर से दे सके तो एक बार फ़िर नक्शे पर ये खूबसूरत सर्पिल रेखायें दमकती हुई, भागती हुई सागर से मिलन को आतुर, दिखाई देगी ।



कृष्ण कुमार मिश्र
krishna.manhan@gmail.com

Aug 24, 2012

दुधवा में रेलगाड़ी से टकराया मगरमच्छ

 रेल दुर्घटना में मगरमच्छ घायल-

(दुधवा-पलिया) २३ अगस्त को शाम के वक्त दुधवा-पलिया रेलमार्ग पर एक मगरमच्छ की रेलगाड़ी से टकरा कर घायल होने खबर मिली है, बताया जा रहा है, कि इस घटना में मगरमच्छ के शरीर का पिछला हिस्सा  ट्रेन से टकराया जिसमें उसकी पूंछ धड़ से अलाहिदा हो गयी। सूत्रों द्वारा ज्ञात हुआ है, कि दुधवा नेशनल पार्क प्रशासन द्वारा स्थानीय वेटनरी डाक्टर से उसका इलाज कराया जा रहा है। 

दुधवा जंगल से होकर गुजरने वाली रेलवे लाइन जो कभी ब्रिटिश भारत में इस लिए निर्मित कराई गयी थी ताकि तराई की अकूत जंगल संपदा का दोहन किया जा सके। शाखू के जंगलों से इमारती लकड़ी के इस कारोबार को तब बन्द किया गया जब इसे संरक्षित क्षेत्र का दर्जा मिला, और सन १९७७ में नेशनल पार्क बनने से पूरे इलाके से कटान बन्द कर दिया गया और वन्य जीवों व वन संपदा के सरंक्षण के प्रयास शुरू किए गये।

यह एक मात्र दुर्घटना नही इससे पूर्व न जाने कितने बाघ, हाथी और अन्य वन्य जीव रेल दुर्घटना का शिकार हो चुके हैं। इसके बावजूद सरकारे कोई ठोस कदम नही उठा रही हैं। गौरतलब ये है, कि इतने विशाल जंगल में इतनी लम्बी रेललाइन पर कब कौन जानवर रेल से टकराकर मरा इसकी जानकारी भी बाहर नही निकल पाती, यानि इन जानवरों की मौत का कोई सही लेखा-जोखा भी नही है, बस मीडिया या स्थानीय लोगों के अतिरिक्त रेल-यात्रियों द्वारा कोई जानकारी मिलती है, वही रिकार्ड्स में दर्ज है।


वन्य-जीव प्रेमियों द्वारा रेलवे लाइन हटाने की बावत तमाम प्रयास किये जा चुके हैं, यदि इस जंगल से तेज रफ़्तार रेलगड़ियां यूं ही गुजरती रही तो तराई में पाये जाने वाले दुर्लभ जीव-जन्तु की प्रजातियां  मुसलसल पटरियों पर अपनी जान गवाती रहेंगी।

दुधवा लाइव डेस्क

Aug 17, 2012

आदिवासियों एवं बाघों का मुकदमा कैलाशपति की अदालत में

शिव पार्वती की अदालत में बाघ और आदिवासी

आदिवासियों की वकालत कर रहे है नंदी महराज तो बाघों की तरफ़ से वकील है पार्वती के शेरू-

आदिवासियो ने दूर दूर तक फ़ैले बांझ इमारती जंगलो में, वन विभाग के कोप से बचे हुये एक्का दुक्का फ़ल और फ़ूलदार पेड़ो से एकत्रित स्वादिष्ट फ़ल फ़ूलों और पत्तियो के चढ़ावे के साथ शिवगणो के प्रमुख नंदी जी की पूजा की। प्रसन्न होकर नंदी प्रकट हुये, आदिवासियो ने बिलखते हुये अपनी व्यथा सुनाई- "इन बाघो ने जीना हराम कर दिया है। पहले ही इन बाघो को बचाने के नाम पर हमारा जंगल में प्रवेश बंद कर दिया गया है। उसके बाद अब हमको  विस्थापित किया जा रहा है। उपर से ये बाघ हमारी सुंदर सुंदर गायो को मार के खा जाते हैं वो अलग। हमारे उपर भी हमला कर मार देते हैं, और तो और ऐसा होने पर शहरी बाघ प्रेमी खुश होते हैं। कि अच्छा मारा साले को, जंगल में घुसते हैं। ’हे नंदी’ शहरी पर्यावरणविदो और खदान पतियो को हम ही दुश्मन लगते हैं, आप हमारी रक्षा करें।

  इन सब बातो को ( खास कर सुंदर गायो वाली ) सुनकर नंदी के नथुने फ़ड़क उठे। वे तुरंत आदिवासियो का प्रतिनिधी मंडल लेकर कैलाश की ओर चल पड़े। यह खबर सुनते ही बाघो ने भीमाता पार्वती की वीआईपी ड्यूटी मे लगे अपने साथी के मार्फ़त अपने प्रतिनिधी मंडल को भी भेजा
कोलाहल सुन, चैन से सो रहे भोलेनाथ बाहर आये। नंदी ने बाघो पर आरोपो की झड़ी लगा दी,  सुंदर गायो के विषय पर तो वे बेकाबू ही हो गये थे। माता का प्राईवेट बाघ शेरू भी पीछे न था बोला- "ये आदिवासी बाघों को जहर दे देते हैं। गलती से कोई बाघ इनके गांव पहुच जाये तो लाठियो से पीट कर मार देते हैं। यहां तक की चैन से प्रेमालाप भी करने नही देते। पर्यटको की जिप्सी लेकर पीछे पड़ जाते हैं,  चोर शिकारियो तस्करो की मदद करते हैं वो अलग।"


भगवान शंकर बोले- "आदिवासियों, मै तुम्हारी कोई मदद नही कर सकता। बाघ राष्ट्रीय पशु है और तुम  राष्ट्रीय नागरिक तो छोड़ो नागरिक भी नही हो।  अगर तुम शहर जा कर झुग्गी में बस जाओ। तब तुम भारत के नागरिक बन जाओगे।  मैं तुमको ३ रूपये वाला सस्ता चावल, बच्चो को मध्यान भोजन बस्ता कापी और लड़कियों को साईकिल आदि दिलवा दूंगा। जंगल में रहोगे तो ताड़्मेटला जैसे जला दिये जाओगे और विपक्ष का नेता तो क्या मैं भी दस दिन तक वहां पहुच नही पाउंगा।" फ़िर भगवान ने कुछ नरम पड़ते हुये कहा- "बेटा सलवा जुड़ूम और नक्सलवाद की चक्की से बाहर निकलो और शहर जाकर झुग्गीवासी बन जाओ।" वहां कम से कम न्यूज चैनल वाले भी आते हैं,  मीडिया तुम्हारी तकलीफ़ें देश को बतायेगा।"



घर गांव जंगल छोड़ने की बात सुनते ही दुखी आदिवासी  आखों में पानी भर गिड़गिड़ाये


आदिवासी बैरी और बाघ है प्यारा ।
कहो प्रभु अपराध हमारा ॥


प्रभु कुछ कहते उसके पहले ही पीछे से मां दुर्गा बोल उठीं- "जब भगवान ही न्याय न करें तो नेताओ को दोष देने का क्या फ़ायदा। प्राणनाथ मुझे आप से ऐसी उम्मीद न थी। आज से अपना खाना खुद ही बनाईयेगा बता देती हूं।" प्रभु धीरज रख बोले- "प्रिये, अपनी इस हालात के जिम्मेदार भी ये  लोग हैं। जब इनके जंगल कट रहे थे तो क्या इनकी अकल घांस चरने गयी थी। क्यों लगने दिया  अपने जंगलो में सागौन, नीलगिरी और साल के पेड़, अपने साथ साथ वन्यप्राणियो को पर्यावास भी खत्म होने दिया।" नंदी ने अपील की- "प्रभु तब ये लोग अंजान थे। इन्हे नही पता था कि इससे क्या हो जायेगा।" प्रभु ने कहा- "अब तो अकल आ गयी है न,  देखो एक अन्ना के खड़े होने से सरकार थर थर कांपने लगती है। तो जब करोड़ो आदिवासी खड़े हो जायेंगे फ़िर क्या उनकी अकल ठिकाने नहीं आयेगी। पर नहीं, इनमे से जिसको नेता होने का आशीर्वाद देता हूं। दिल्ली जाकर सुरा, सुंदरी के मजे मारने लगता है। इनकी तो मै भी मदद नही कर सकता।"


इस पर माता ने सिफ़ारिश की - "अगर आप मुझसे तनिक भी प्रेम करते हैं, तो कुछ तो कीजिये।" प्रभु ने मुस्कुराते हुये जवाब दिया- " जैसे नेतागण भ्रष्टाचारियो के दिल में राज करते हैं। वैसे ही आप भी मेरे मन पर राज करतीं है। मै आशीर्वाद देता हूं कि आज से कुछ साल बाद, जब देश में भुखमरी की हालत आयेंगे। तब यूरोप और अमेरिका के वैज्ञानिक गहन शोध करके, यह पता लगायेंगे कि भारत में जो इमारती लकड़ी के प्लांटेशन हैं, अब वो किसी काम के नहीं है। और उनके बदले फ़ल और फ़ूलदार पेड़ लगाने से देश को को भोजन तथा पशुओं को चारा मिल सकता है। जिससे देश की भुखमरी दूर की जा सकती है। तब मनमोहनी नीतियो से कंगाल हो चुके भारत को, वर्ल्ड बैंक अरबो रूपये का कर्ज देकर इस काम को करवायेगा। तब ये आदिवासी रहेंगे तो मजदूर ही। लेकिन कम से कम जंगल के शुद्ध वातावरण में रह पायेंगे ।  बाघ और  उसकी  प्रजा के लिये भी उनमे भरपूर भोजन होगा और वे  उनमे चैन से जी पायेंगे।"

नंदी अभी तक सुंदर गायो वाली बात भुला न पाये थे- "बोले इन बाघो का  क्या है प्रभु ये तो इमारती  पेड़ो के जंगलो मे भी रह लेते हैं।"  इस पर प्रभु ने मुस्कुराते हुये पूछा- "कभी सागौन और नीलगिरी के पत्ते खाये हैं क्या  बेटा। माता के हाथ का स्वादिष्ट खाना खा खा कर तुम जमीनी हकीकतों से अनजान हो। आज शहर में रहने वाली गाय और इमारती जंगलो में रहनी वाली गायो का दूध एक समान क्यों है? मियां नंदी अमूल बेबी का खिताब तुमको मिलना चाहिये, राहुल गांधी को नहीं। फ़जीहत से बचने नंदी ने टी वी पर इंडिया टीवी लगाया और सारे शिव गण प्रभु के लंका दौरे की सच्चाई सुनने मे मगन हो गये ।


अरूणेश दवे लेखक व्यंगकार है, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में निरन्तर राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दों पर लेखन, छत्तीसगढ की राजधानी रायपुर में निवास, इनसे aruneshd3@gmail.com पर सम्पर्क कर सकते हैं।



Aug 5, 2012

सरचु में हो रहा है मरमोट का शिकार


टूरिज्म की भेंट चढ़ रहे है, ये खूबसूरत जीव-
सरचू में हो रहा है, मरमोट (Marmot) का शिकार-

(लाहोल-स्पिति-हिमाचल प्रदेश) मनाली से तकरीबन 222 कि०मी० दूर स्थित पहाड़ों से घिरे मैदानी भाग जिसे सरचु के नाम से जानते है, वहाँ मनाली आदि स्थानों से टूर-ट्रेवल का काम करने वाले लोग टेन्टिंग कैम्प का आयोजन करते है, जिसमें मनाली के स्थानीय कर्मचारी बहुतायात में कार्य करते है, इन वादियों में मरमोट जैसा खूबसूरत जानवर रहता है जो खरगोश से आकार में बड़ा होता है, इसे जमीन पर रहने वाली गिलहरी भी कहते है, वन्य जीव सरंक्षण के मानकों में इसे सेड्यूल प्रथम श्रेणी का सरंक्षण प्राप्त है, बावजूद इसके टेन्टिंग की व्यवस्था करने वाले लोग जो पूरे सीजन यहां प्रवास करते है, इनके द्वारा इसका धड़ल्ले से शिकार किया जाता है, चौकाने वाली बात यह है, कि स्थानीय लोग इसका बिल्कुल शिकार नही करते है, और हिमाचल-लद्दाख के बार्डर पर स्थिति इस जगह पर मानव जनसख्या घनत्व भी बहुत कम है, मरमोट बिलों मे रहते हैं, और टेन्टिंग का काम करने वाले लोग सुबह के बाद जब शैलानी यहां से चले जाते है, तब बिलों के पास बड़े पत्थर लेकर बैठते है, मरमोट प्रकृति से सुस्त प्राणी है, और जब वह बिल से बाहर निकलता है, तो पत्थर की चोट से उसे मार देते है, ये लोग उसके मांस का स्वयं इस्तेमाल करते है, साथ ही शैलानियों को भी इसके मांस की तमाम खूबियां बताकर उन्हे भी इसका मांस खाने के लिए आकर्षित करते हैं। 

टेन्टिंग कैम्प-सरचु



इस इलाके का वन-विभाग एवं सरंक्षण में कार्य कर रही संस्थायें भी मरमोट के हो रहे इस क्रूर शिकार को अनदेखा कर रही है, सूत्रों से ज्ञात हुआ है, कि सरचु में टेन्टिंग कैम्प का आयोजन करने वाली ट्रेवल कम्पनियां वन-विभाग को मोटी रकम मुहैया कराती है, टेन्टिंग कैम्प के आयोजन की अनुमति प्राप्त करने के लिए।

प्रदीप सक्सेना
pdpsaxena@gmail.com

Aug 1, 2012

बाघों का कोरजोन जंगल बन जाएगा शिकारियों का शरणगाह

हिंदुस्तान में बाघों की सिमटती दुनिया के प्रति गंभीर होकर सुप्रीम कोर्ट ने देश की प्रदेश सरकारों को टाइगर रिजर्व के ‘कोरजोन‘ जंगल का ‘बफरजोन‘ वनक्षेत्र बढ़ाए जाने का आदेश दिया है, साथ में कोरजोन में पर्यटकों के प्रवेश पर भी रोक लगा दी है। यह फैसला स्वागत योग्य है, लेकिन इस व्यवस्था से क्या बाघों की वंशवृद्धि को कोई फायदा पहुंचेगा? इस बात पर सवाल उठना लाजिमी है। वह भी इस वजह से कि बाघों के संरक्षण के लिए भारत सरकार ने सत्तर के दशक में बाघों के संरक्षण के लिए प्रोजेक्ट टाइगर शुरू किया था। इसके बाद भी बाघों की संख्या अरबों रुपए खर्च होने के बाद भी घटती जा रही है। यह प्रोजेक्ट टाइगर की असफलता ही कही जाएगी कि राजस्थान के सारिस्का नेशनल पार्क और पन्ना नेशनल पार्क मध्य प्रदेश में प्रोजेक्ट टाइगर शुरू किया गया उसके बाद बाघों की संख्या तो नहीं बढ़ सकी वरन् दोनों नेशनल पार्कों से बाघ जरूर गायब हो गए। प्रोजेक्ट टाइगर भी क्यों असफल हो रहा है इसकी समीक्षा किसी भी स्तर पर नहीं की गई है। तो क्या बफरजोन बढ़ा देने से बाघ अपना कुनबा बढ़ा पाएगें? इसपर संदेह होना लाजिमी है। दूसरी बात यह है कि विभिन्न कारणों के चलते बाघ जंगल के अपने प्राकृतिक वासस्थलों में न रुककर वह जंगल के बाहर आकर अपना रैन बसेरा बना लेते हैं, जहां उनके अवैध शिकार की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। जरूरत है व्यवस्थाएं इस तरह की जंगल के भीतर होनी चाहिए जिससे बाघ बाहर न आएं, तभी वह सुरक्षित रह सकते हैं और उनकी वंशवृद्धि भी हो सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने बाघों के प्राकृतिक वासस्थल यानी ‘कोरजोन’ जंगल में पहले से ही मानव की दखलंदाजी पर पूर्णतया प्रतिबंध लगाया ही था अब पर्यटकों के प्रवेश पर भी रोक लगा दी है। जबकि इससे पूर्व कोर्ट द्वारा दिए गए एक आदेश के अनुपालन में उत्तर प्रदेश की सरकार ने दुधवा नेशनल पार्क में बाघों की हिफाजत और वंशवृद्धि के लिए नार्थ एवं साउथ खीरी फारेस्ट डिवीजन एवं जिला शाहजहांपुर की खुटार रेंज तथा जिला बहराइच के कतर्निया घाट वन्यजीव प्रभाग के जंगल के ‘दुधवा टाइगर रिजर्व’ का बफरजोन वनक्षेत्र घोषित कर दिया है। इसके पीछे यह अनुमान लगाया जा रहा है कि बाघों के रहने और घूमने का क्षेत्रफल बढ़ेगा ही साथ में उनका संरक्षण भी वाजिब ढंग से हो सकेगा। उधर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुपालन में पर्यटक जंगल में प्रवेश न कर सके, इसकी तैयारी में भी वन विभाग जुट गया है। अगर पर्यटकों के प्रवेश पर रोक लगाई जाती है तो इससे सरकार को ही पर्यटन व्यवसाय से होने वाले राजस्व की क्षति होगी। जबकि जंगल के भीतर क्या सही और क्या गलत हो रहा है इसकी जानकारी अब बाहर नहीं आ पाएगी। इससे वंयजीवों को कम और वन प्रवंधन में लगे स्टाफ को फायदा अधिक होगा। अभी तक यह था कि लोगों की आवाजाही से जंगल में चल रही गतिविधियों की जानकारी बाहर तक आ जाती थी, लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। इस तरह जंगल के भीतर वन विभाग का जंगलराज हो जाएगा।


यूपी के एकमात्र दुधवा नेशनल पार्क में सन् 1988 से प्रोजेक्ट टाइगर चलाया जा रहा है। दुधवा में जब इसे शुरू किया गया था तब दुधवा के आंकड़ों में यहां बाघों की संख्या 76 थी। उस समय जंगल और समीपवर्ती गन्ना के खेतों मे आमरूप से बाघ दिखाई देते थे एवं बाघों द्वारा मानव की हत्या करने या फिर मवेशियों को मारने की घटनाएं भी बहुतायत में होती थीं। अब बाघों की संख्या 110 बताई जा रही है, तो जंगल में ही वनराज बाघ के दर्शन दुर्लभ हैं, यह बात अलग है कि अब बाघ अक्सर खेतों में दिखाई देते हैं। अब तक दुधवा में ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ पर करोड़ों रुपया खर्च किया जा चुका है फिर भी बाघ अपने प्राकृतिक वासस्थल में रहने के बजाय बाहर खेतों में डेरा जमाए रहते हैं।

अंगे्रजी शासन काल में जिस किसी भी विधि से ग्रामीणों के सहयोग से बन प्रवधंन किया जाता था तब जंगल का संरक्षण भी होता था और वंयजीव-जंतु भी बहुतायत में पाए जाते थे। बदले परिवेश में आजाद हुए भारत में फारेस्ट मैनेजमेंट की विधियां बदलती गई साथ ही समीपवर्ती ग्रामीणों को वन प्रवंधन के कार्यों से अलग कर दिया गया। यहां तक उनको पूर्व में वन उपज आदि की दी जाने वाली सुविधाओं को बंद कर दिया गया है, इसके कारण समीपवर्ती ग्रामीणों का जंगल से भावात्मक लगाव खत्म हो गया साथ ही उनका वंयजीवों के प्रति रहने वाला संवेदनशील व्यवहार  भी क्रूरता में बदल गया है। पिछले दस साल से दुधवा के तत्कालीन फील्ड डायरेक्टर रूपक डे द्वारा तैयार पंचवर्षीय ‘फारेस्ट मैनेजमेंट प्लान’ पर वैज्ञानिक विधि से वन प्रवंधन का कार्य किया जा रहा है। पांच साल में फारेस्ट मैनेजमेंट प्लान कितना सफल रहा अथवा असफल, इसकी समीक्षा या मूल्यांकन किए बगैर उसे पुनः पांच सल के लिए लागू किया जाना ही स्वयं में विचारणीय प्रश्न है। केवल ‘प्रोजेक्ट टाइगर‘ की बात की जाए तो इसकी असफलता की कहानी जग जाहिर भी हो चुकी है कि पूरे देश के नेशनल पार्कों में चल रहा प्रोजेक्ट टाइगर बाघों को संरक्षण देने में नाकाम्याब ही रहा है। अब अगर जंगल में पर्यटकों के प्रवेश पर रोक लगा दी जाएगी तो देशी-विदेशी पर्यटक जंगल में स्वच्छंद घूमने वाले दुर्लभ प्रजाति के वयंजीवों को न देख सकेंगे और न ही उनके संबंध में ज्ञानवर्धक जानकारी ही मिल पाएगी साथ ही वह प्राकृकि वनस्पतियों से भी वह अंजान ही रहेंगे। इसके अतिरिक्त कोरजोन में मानव अथवा पर्यटकों की आवाजाही पर पावंदी लगा दिए जाने से जंगल के अंदर शिकारियों और वन मफियाओं को अपना शरणगाह बनाने में आसानी रहेगी। इससे वंयजीवों के अवैध शिकार को बढ़ावा मिलेगा। अभी तक जंगल के भीतर मानव की अधिक दखलंदाजी तो नहीं है वरन् पर्यटकों के आने-जाने के कारण वन अपराधी जंगल के अंदर रहकर सुनियोजित अपराध नहीं कर पाते हैं। लेकिन अगर जंगल के भीतर घुसने में ही रोक लगा दी गई तो बन अपराधियों को एक तरह से जंगल के भीतर अपराध करने का अपरोक्ष लाइसेंस मिल जाएगा। यह स्थिति वंयजीवों के लिए कतई हितकर नहीं कही जा सकती है।

दुधवा नेशनल पार्क क्षेत्र के वंयजीवप्रेमी सवाल उठते हैं कि कागजों में लिखापढ़ी करके दुधवा टाइगर रिजर्व का वफरजोन जंगल बढ़ा दिया गया है, इससे वन्यजीवों को फायदा क्या पहुंचेगा? जबकि भौगोलिक परिस्थितियां तो वहीं है। बाघ अपने प्राकृतिक वासस्थल यानी कोरजोन में न रूककर जंगल के समीपवर्ती खेतों में आकर रहते हैं। दुधवा में फारेस्ट मैनेजमेंट के जो कार्य चल रहे हैं उनमें ही कहीं न कहीे कोई कमी है उसी का परिणाम है कि बाघ समेत अन्य वन्यजीव जंगल के बाहर भाग आते हैं। प्राकृतिक कारणों से जंगल के भीतर चारागाह भी सिमट गए अथवा वन विभाग के कर्मचारिययों की निजस्वार्थपरता से हुए कुप्रबंधन के कारण चारागाह ऊंची घास के मैदानों में बदल गए इससे जंगल में चारा की कमी हो गई है। परिणाम स्वरूप वनस्पति आहारी वन्यजीव चारा की तलाश में जंगल के बाहर आने को विवश हैं तो अपनी भूख शांत करने के लिए वनराज बाघ भी उनके साथ पीछे-पीछे बाहर आकर आसान शिकार की प्रत्याशा में खेतों को अस्थाई शरणगाह बना लेते हैं। परिणाम सह अस्तित्व के बीच मानव तथा वन्यजीवों के बीच संघर्ष बढ़ जाता है।
दुधवा का कोरजोन हो या फिर बफरजोन का जंगल हो उसके प्राकृतिक चारागाह सिमट गए हैं, इससे जगल में वनस्पति आहारी वंयजीवों को जहां नर्म घास यानी चारा उपलव्ध नहीं है। वहीं प्राकृतिक तालाबों अथवा जलश्रोतों का रखरखाव ऐसा है कि उनकी गहराई कम हो जाने के कारण गर्मियों में वयंजीवों को पानी के लिए जंगल के बाहर आने को बिवश होना पड़ता हैं। मानसून सीजन में नदियों की बाढ़ वन ही नहीं वरन् वंयजीवों को बुरी तरह से प्रभावित करती है। दुधवा का हरा-भरा जंगल सूखने लगा है और बाढ़ की विभीषिका अब राजकीय पशु बारहसिंघों के जीवन चक्र पर विपरीत प्रभाव डालने लगी है। जिसके कारण दुधवा नेशनल पार्क में बारहसिंघा कठिन दौर से गुजर कर अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए संघर्ष कर रहा है। इसी तरह वनराज बाघ भी अपनी सल्तनत जंगल को छोड़कर बाहर आने को बिवश हैं। जंगल चाहे कोरजोन का हो अथवा बफरजोन का, उसमें अगर वंयजीवों के लिए चारा-पानी की व्यवस्था नहीं है तो उसका जंगल होना या न होना एक समान है।

भारत में बाघों की दुनिया सिमटती ही जा रही है। इसका प्रमुख कारण है कि पिछले कुछेक सालों में मानव और बाघों के बीच शुरू हुआ संघर्ष। बढती आवादी के साथ प्राकृतिक संपदा एवं जंगलों का दोहन और अनियोजित विकास वनराज को अपनी सल्तनत छोड़ने के लिए विवश होना पड़ रहा है। उत्तर प्रदेश के पूरे तराई क्षेत्र का जंगल हो अथवा उत्तरांचल का वनक्षेत्र हो या फिर मध्य प्रदेश, महाराष्ट्, उड़ीसा आदि प्रदेशों के जंगल हों उसमें से बाहर निकलने वाले बाघ चारों तरफ अक्सर अपना आतंक फैलाते रहते हैं और वेकसूर ग्रामीण उनका निवाला बन रहे हैं। बाघ और मानव के बीच संधर्ष क्यों बढ़ रहा है? और बाघ जंगल के बाहर निकलने के लिए क्यों बिवश हैं? इस विकट समस्या का समय रहते समाधान किया जाना आवश्यक है। वैसे भी पूरे विश्व में बाघों की दुनिया सिमटती जा रही है। ऐसी स्थिति में भारतीय वन क्षेत्र के बाहर आने वाले बाघों को गोली का निशाना बनाया जाता रहा तो वह दिन भी दूर नहीं होगा जव भारत की घरा से बाघ विलुप्त हो जाएगें। प्रोजेक्ट टाइगर रिजर्व का बफरजोन वनक्षेत्र बढा़ देना केवल समस्या का समाधान नहीं है। अब जरूरत इस बात की है कि जंगल के भीतर चाहे वह कोरजोन हो या फिर बफरजोन का वनक्षेत्र हो उसमें ऐसी व्यवस्थाएं की जानी चाहिए जिससे न वन्यजीव चारा-पानी के लिए बाहर आएं और न ही बाघ जंगल के बाहर आने को विवश न हो सकें।

देवेन्द्र प्रकाश मिश्र वरिष्ठ पत्रकार, अब तक तमाम बड़े अखबारों में पत्रकारिता, दुधवा के वन्य जीवन पर विशेष लेखन, इनसे dpmishra7@gmail.com पर सम्पर्क कर सकते हैं।

विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था