International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Save Tiger

DON'T LET WILD TIGERS DISAPPEAR

Lady Rosetta

Potatoes with low sugar content and longer shelf life.

अबूझमाड़ के जंगल

जहां बाघ नही नक्सली राज करते हैं

खवासा का आदमखोर

जहां कांपती थी रूह उस नरभक्षी से

जानवर भी करते हैं योग

योगाचार्य धीरज वशिष्ठ का विशेष लेख

Mar 20, 2012

..उनके घरौंदे ही खतरे में हैं !

खतरे में हैं गौरेया की मौसी बया
- घटता जा रहा है सबसे सुंदर घोसला बनाने वाला पक्षी
- प्रणयकाल में हर बार नया घोसला बनाती है बया
- रोशनी के लिए घोसले में चिपकाते हैं जुगनूं


हरिओम त्रिवेदी
पुवायां। सबसे सुंदर घोसला बनाने वाली और गौरेया की मौसी के नाम से मशहूर बया का अस्तित्व संकट में है। शिकार, पेड़ और झाडिय़ां घटने के अलावा अन्य कारणों से यह पक्षी अब घटता ही जा रहा है। गांवों के आसपास झुरमुट में लगे दिखने वाले घोसले भी अब कम ही दिखाई देते हैं।
बया अनोखा तूंबीनुमा घोसला बनाने के लिए विख्यात है।   घोसला लौकीनुमा हवा में लटकता होता है। यह पुआल और मोटे पत्तों वाली घास के असंख्य तिनकों से खपच्चियां चीर कर बनाया जाता है। डेढ़ से दो फुट तब लंबे घोसले में जाने के लिए एक लंबी नली सी होती है जिसमें केवल बया ही प्रवेश कर सकती है। ऐसा अंडों और बच्चों की सुरक्षा को ध्यान में रखकर किया जाता है। घोसले में गीली मिट्टी से पलास्तर भी किया जाता है। बया गीली मिट्टी में जुगनू चिपका देती है। यह रात में चमकते हैं जिससे घोसले में रोशनी होती रहती है। आधुनिक विश्वकर्मा के नाम से मशहूर यह पक्षी अपने आशियाने को एक बार ही उपयोग करता है। बया अपने घोसले में दूसरी मादाओं को भी अंडे देने और सेने के लिए आमंत्रित करती है। यह खूबी दूसरे किसी पक्षी में नहीं है।



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अधूरे आसियानों का राज
बरसात की शुरूआत होते ही बया का प्रणयकाल शुरू हो जाता है। प्रजनन काल के अलावा नर और मादा में कोई खास फर्क देखने को नहीं मिलता है। दोनो मादा गौरेया जैसे दिखते हैं। इनकी चोंच मोटी और पूंछ छोटी होती है। यह गौरेया की तरह ही चिट-चिट जैसे बोलते हैं। प्रणय काल में भूरे रंग के इस पक्षी का रंग इस दौरान गहरा पीला और पंख चमकीले हो जाते हैं। प्रजनन काल में नर सुखद आवाज निकालता है जिससे मादा बया उसकी ओर आकर्षित हो सके। बया एक मौसम में कई मादाओं से जोड़े बनाता है। इसी दौरान आशियाना बनाने का सिलसिला शुरू होता है। इसकी जिम्मेदारी नर पक्षी की होती है। आधा घोसला बनने पर मादा उसकी निरीक्षण करती है और पसंद नहीं आने पर रहने से इंकार कर देती है। नर फिर से दूसरा घोसला बनाना शुरू कर देता है। यही कारण है कि तमाम घोसले अधूरे लटके देखे जा सकते हैं। बेहतरीन घोसला बनाने की कारीगरी के कारण इसे टेलर पक्षी भी कहा जाता है।



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करने होगें प्रयास
गौरेया के साथ ही बया को भी बचाने के प्रयास करने की जरूरत है। इसके लिए सरकंडों, झाडिय़ों, पेड़ों की कटाई-छटाई, शिकार आदि पर रोंक लगानी होगी। नहीं तो यह खूबसूरत पक्षी विलुप्त होते देर नहीं लगेगी।

(हरिओम त्रिवेदी  अमर उजाला पुवायां शाहजहांपुर के तहसील प्रभारी हैं। निवास रायटोला खुटार जनपद शाहजहांपुर में निवास  इनसे मोबाइल नंबर . 09935986765 एवं ई.मेल hariomreporter1@gmail.com  के जरिए सम्पर्क कर सकते हैं)

विश्व गौरैया दिवस

घर-आंगन की इस चिडिंया की कैसे हो वापसी-
विश्व गौरैया दिवस- 20 मार्च 2012
 
गौरैया (House Sparrow-{passer domesticus}) जो हमारे घरों के भीतर-बाहर हमेशा मौजूद रही उसकी चहक और फ़ंखों की फ़ड़फ़ड़ाहट हमारे जहन में रोजमर्रा की घरेलू आवाजों की तरह थी। लेकिन आज न तो अल सुबह वह चह्क सुनाई देती है और न ही दोपहर में घर आंगन में बिखरे अनाज के दानों को चोच में दबाकर अपने घोसले तक उड़ान की आवाज...वजहे हमारे सामने है और इन वजहों के जिम्मेदार भी हम है। धरती पर करोड़ों प्रजातियों में से सिर्फ़ हम यानि मनुष्य एक ऐसी प्रजाति बन गयी कि सह-जीवी जीवन की विधा का ही बेड़ा गर्क कर दिया..जाहिर था हम इतने विकसित हुए प्रकृति की हर मार को झेलने की तकनीक विकसित कर ले गये, पर इसका खामियाजा ये हुआ कि हम प्रकृति के वरदानों से भी बे-राफ़्ता होते गये, इसके दुष्परिणाम भी हमारे सामने है। 

"किसी भी प्रजाति को खत्म करना हो तो उसके आवास और उसके भोजन को खत्म कर दो" कुछ ऐसा भी हुआ गौरैया के साथ...शहरीकरण, गांवों का बदलता स्वरूप, कृषि में रसायनिक खादें एंव जहरीले कीटनाशक गौरैया के  खत्म होने के लिए जिम्मेंदार बने। फ़िर भी प्रकृति ने हर जीव को विपरीत परिस्थितियों में जिन्दा रहने की काबिलियत दी है और यही वजह है कि गौरैया कि चहक आज भी हम सुन पा रहे हैं।

कभी खुले आंगन में फ़ुदकने वाली यह चिड़िया, छप्परों में घोसले बनाने वाली यह चिड़िया, बच्चों के हाथों से गिरी हुई झूठन (पकाया हुआ अनाज) खाने वाली चिड़िया, अब बन्द जाली के आंगनों और बन्द दरवाजों की वजह से अपनी दस्तक नही दे पाती हमारे घरों में, गाहे-बगाहे अगर यह दाखिल भी होती है, तो छतों में टंगे पंखों से टकरा कर मर जाती है।    बड़ा दर्दनाक है यह सब जो इस अनियोजित विकास के दौर में हो रहा है, हम अपने आस-पास सदियों से रह रहे तमाम जीवों के लिए कब्रगाह तैयार करते जा रहे है बिना यह सोचे कि इनके बिना यह धरती और हमारा पर्यावरण कैसा होगा।

जंगल चिड़ियों की देन है, ये परिन्दे ही जंगल लगाते है, तमाम प्रजातियों के वृक्ष तो तभी उगते है, जब कोई परिन्दा इन वृक्षों के बीजों को खाता है और वह बीज उस पक्षी की आहारनाल से पाचन की प्रक्रिया से गुजर कर जब कही गिरते है तभी उनमें अंकुरण होता है, साथ ही फ़लों को खाकर धरती पर इधर -उधर बिखेरना और परागण की प्रक्रिया में सहयोग देना इन्ही परिन्दों का अप्रत्यक्ष योगदान है। 

कीट-पंतगों की तादाद पर भी यही परिन्दे नियन्त्रण करते है, कुल मिलाकर पारिस्थितिकी तन्त्र में प्रत्येक प्रजाति का अपना महत्व है, हमें उनके महत्व को नजरन्दाज करके अपने पर्यावरण के लिए अपनी गैर-जिम्मेदाराना भूमिका अदा कर रहे हैं।

अपने घरों के अहाते और पिछवाड़े विदेशी नस्ल के पौधों के बजाए देशी फ़लदार पौधे लगाकर इन चिड़ियों को आहार और घरौदें बनाने का मौका दे सकते है। साथ ही जहरीले कीटनाशक के इस्तेमाल को रोककर, इन वनस्पतियों पर लगने वाले परजीवी कीड़ो को पनपने का मौका देकर इन चिड़ियों के चूजों के आहार की भी उपलब्धता करवा सकते है, क्यों कि गौरैया जैसे परिन्दों के चूजें कठोर अनाज को नही खा सकते, उन्हे मुलायम कीड़े ही आहार के रूप में आवश्यक होते हैं।

अपने घरों में सुरक्षित स्थानों पर गौरैया के घोसले बनाने वाली जगहों या मानव-जनित लकड़ी या मिट्टी के घोसले बनाकर लटकाये जा सकते है। इसके अलाव पानी और अनाज के साथ पकाए हुए अनाज का विखराव कर हम इस चिड़िया को दोबारा अपने घर-आंगन में बुला सकते हैं।

हमें इतना याद रखना चाहिए कि अकेले रहने से बेहतर है, कि हम उन सब प्रजातियों के साथ मिलकर रहे जो सदियों से हमारे साथ रहती आई है, और यकीन मानिए तब आप को खुद-ब-खुद पता चल जायेगा कि साथ मिलकर रहने के क्या-क्या फ़ायदे है।

कृष्ण कुमार मिश्र

 

Mar 19, 2012

चलो हम उसे और उसके नशेमन को बचा ले...

विश्व गौरैया दिवस-

२० मार्च गौरैया दिवस के रूप में बिगत दो वर्षों से मनाया जा रहा है. दुधवा लाइव की पहल पर यह "गौरैया बचाओ अभियान" सबसे पहले सन २०१० में शुरू किया गया, उत्तर भारत के पूरे तराई क्षेत्र के जनपदों में इस अभियान ने शहरों से लेकर गांवों तक पक्षी सरंक्षण में अपनी सार्थक भूमिका निभाई। जागरूकता का पैमाना इस बात से आंका जा सकता है, कि गांवों और शहरों मे लोगों ने अपने दरों-दीवार पर पानी और दाना रखना शुरू कर दिया,  अपने आंगन के इस पक्षी की वापसी की उम्मीद से..नतीजे भी सामने आये हर जगह से फ़ोन और मेल आना शुरू हुए कि "गौरैया हमारे घर वापस आ गयी"

गौरैया बचाओ अभियान में रेडियों अखबार और टेलीविजन ने जो सहयोग दिए वो सराहनीय रहे, जन-जन तक पक्षी सरंक्षण की बात पहुंची और उस पर अमल भी हुआ। इस वर्ष भी हम मीडिया और सरंक्षण पर काम कर रहे गैर-सरकारी संस्थानों से उम्मीद करेगें कि वह जीवों के महत्व को बतलाने और उन्हे कैसे बचाया जाय इस अनियोजित विकास के दौर में, इस बात को सबके मध्य पहुंचानें में अपना सहयोग देंगें।

कृष्ण कुमार मिश्र
दुधवा लाइव 

विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था