International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Save Tiger

DON'T LET WILD TIGERS DISAPPEAR

Lady Rosetta

Potatoes with low sugar content and longer shelf life.

अबूझमाड़ के जंगल

जहां बाघ नही नक्सली राज करते हैं

खवासा का आदमखोर

जहां कांपती थी रूह उस नरभक्षी से

जानवर भी करते हैं योग

योगाचार्य धीरज वशिष्ठ का विशेष लेख

Feb 27, 2012

क्या वाकई हम अपने मुस्तकबिल को जानते है?

भारतीय राजनीति में पर्यावरण और वन्य जीव कभी मुद्दा नही बनते ! क्यो?

उत्तर प्रदेश की सियासी जंग में तमाम राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियां चुनाव के मैदान में जोर आजमाइस कर रही है, साथ ही भारत और उत्तर प्रदेश के कुछ कथित पुरोधा भी पांच वर्ष के लिए जनता के भाग्य-विधाता बनने की पुरजोर कोशिश में है, इनके पास बड़े-बड़े सपनों की फ़ेहरिस्त भी है, इनका ये खयाली सब्ज बाग इनके काम भी आता है, हम इन्हे चुन कर प्रदेश या देश की उस इमारत में बैठने का मौका दे देते है, जहां ये बड़े आराम से गुत्थम-गुथ्थी खेलते मजे से पूरे पांच वर्ष ! क्या वाकई ये हमारा मुस्तकबिल सवांर रहे हैं? या हम ही अनजान है, अपने मुस्तकबिल से?....असल में पर्यावरण चुनावी मुद्दा कभी नही होता, कुरूप होती प्रकृति को सवांरने की बात भी कोई नही करता, यही तो है हमारा मुतकबिल “मदर नेचर”।

हमारे राज नेता या खुद हमने क्या कभी गौर किया कि हमारे आस-पास कितनी प्रजातियों के वृक्ष है, कितनी झाड़ियां है, और उन पर रहने वाले कितने प्रकार के रंग-बिरंगे जीव है? या किसी ने समीक्षा करने की जहमत उठाई, कि आज से पचास या बीस या फ़िर दस वर्ष पहले हमारे गांव-शहर में कितनी वनस्पतियां थी, और् आज कितनी बची हुई है, साथ ही यह कभी सोचा गया, कि इस अनियोजित विकास में उन वनस्पतियों या जीवों पर कितने समुदाय अपनी रोजी-रोटी चलाते रहे है, और ग्रामीण जीवन में कितनी वनस्पतियों का उपयोग औषधि के रूप में होता आया हैं...कितना बचा है अब हमारे पास? अवैध पट्टों के चलते हमारे चरागाह, खलिहान और तालाब सभी नदारद है गांवों से, हां नक्शे पर कही विराजमान हो तो अलग बात है। असल में यही तो मौजूद होती है जैव-विविधता विभिन्न प्रकार के जीव-जन्तु वनस्पतियां, जिनका पर्यावरण में कोई न कोई अमूल्य योगदान है, चिड़िया जंगल लगाती है, तितलियां और कीट-पंतगें वनस्पतियों में परागण में सहयोगी होते है, और वनस्पतियां भोजन से लेकर औषधीय प्रयोगों में काम आती है।

जब ये जंगल तालाब और नदियां नही बचेगी तो हवा, पानी और भोजन इन तीनों बुनियादी चीजे प्रभावित होगी। हां अगर ये जीव-जन्तु भारतीय राजनीत में मताधिकार का प्रयोग करते होते तो शायद इनके ठिकाने यानी तालाब, परती भूमियां, जंगल, इत्यादि के पट्टे इनके नाम कर दिए जाते जो वास्तव में वैध होते।

खीरी पीलीभीत और बहराइच जनपदों में जो जंगलों की टूटी फ़ूटी श्रंखलायें बची हुई है उन्हे सरंक्षित करने की जरूरत है, ये जैव-विविधता का खजाना संजोए हुए है, और अतुलनीय प्रजातियों की मौजूदगी भी इनमें है। क्या हम तराई में यदि हम विशाल से लेकर छोटी-छोटी नदियों और जंगलों को बचाने का मुद्दा चुनाव में नही बना सकते है जो कि जरूरी है, और अपने वास्तविक मुस्तकबिल के लिए वोट नही कर सकते।

क्यों कि एक बार अगर ये जंगल नष्ट हुए तो इन्हे इनके पूर्व स्वरूप में वापस लाना नामुमकिन होगा, और इन नदियों को अगर हम नही बचा पाए तो इनका लौटना मुश्किल है- क्योंकि नदियां कभी भी वापस नही लौटती।

मुद्दे-
१-    दक्षिण खीरी और पीलीभीत के नष्ट हो रहे जंगल व उनमें रहने वाले वन्य जीवों को संरक्षित किया जा सकता है, इन जंगल श्रंखलाओं को जोड़कर नये वन्य जीव विहार का दर्जा देकर।

२-    पद्म-भूषण टाइगरमैन बिली अर्जन सिंह के निवास टाइगर हावेन को संग्रहालय का दर्जा-ताकि नई पीढ़िया उनके वन्य जीवन पर किए कार्य से अवगत होकर प्रेरणा ले सके।

३-    तराई की नदियों में खुलेआम बहाया जा रहा औद्योगिक कचरा जिससे जल मे रहने वाले सभी जीवों व वनस्पतियां नष्ट हो रही है और प्रदूषित भी, इन जीवों व वनस्पतियों पर निर्भर समुदाय हो रहे है रोग-ग्रस्त।

४-    ग्रामों की परती भूमियों, जलाशयों, चरागाओं, व बचे हुए छोटे छोटे जगलों पर अतिक्रमण।

५-    सामुदायिक जंगलों के विकास का मुद्दा

६-    संकर प्रजातियों व जहरीले कीटनाशकों के खिलाफ़ मोर्चाबन्दी और देशी प्रजातियों को बढावा देने का मुद्दा ताकि हम अपनी जैव संपदा को सरंक्षित कर सके।

कृष्ण कुमार मिश्र

विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था