International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Save Tiger

DON'T LET WILD TIGERS DISAPPEAR

Lady Rosetta

Potatoes with low sugar content and longer shelf life.

अबूझमाड़ के जंगल

जहां बाघ नही नक्सली राज करते हैं

खवासा का आदमखोर

जहां कांपती थी रूह उस नरभक्षी से

जानवर भी करते हैं योग

योगाचार्य धीरज वशिष्ठ का विशेष लेख

Mar 30, 2011

गोमती की कथा-व्यथा

प्रदूषण और अवैध कब्जौं के चलते घुट रही गोमती की सांस
- गोमती यात्रा करेगी आक्सीजन का काम
हरिओम त्रिवेदी
पुवायां (शाहजहांपुर)। इंद्र भगवान को गौतम ऋषि के श्राप से मुक्ति दिलाने वाली गोमती नदी सिसक रही है। प्रदूषण के चलते उसकी सांस घुट रही है। कुछ लोग नदी की धार तक पर अवैध कब्जा कर उसका अस्तित्व मिटाने पर तुले हैं। गोमती यात्रा से एक उम्मीद जगी है कि लोग यात्रा के माध्यम से मिलने वाले संदेश से जागरूक होंगे और पतित पावनी गोमती को प्रदूषण मुक्त कर उसकी अविरल धारा बहते रहने का प्रयास करने में सहभागिता करेंगे।
कहा जाता है कि इंद्र ने एक बार गौतम ऋषि का रूप धर कर उनकी पत्नी अहिल्या से छल किया था। कुपित गौतम ऋषि ने इंद्र और अहिल्या कौ श्राप दे दिया था। काफी अनुनय-विनय करने पर गौतम ऋषि ने श्राप मुक्ति के लिए इंद्र को पतित पावनी गोमती नदी के तटों पर १००० स्थानों पर शिवलिंग स्थापित कर तपस्या करने को कहा। इंद्र ने ऐसा ही किया, तब कहीं जाकर उनको ऋषि के श्राप से मुक्ति मिल सकी।
इंद्र को श्राप मुक्त कराने वाली आदि गंगा आज खुद की मुक्ति के लिए छटपटा रही है। तमाम स्थानों पर नदी तट तक कब्जा कर खेती की जा रही है तो घरों का मलवा और गंदगी नदी में डालकर उसका दम घोटने का प्रयास किया जा रहा है। अवैध खनन से भी नदी को गहरे घाव दिए जा रहे हैं। जीवनदायिनी को बचाने के लिए हम सबको आगे आना होगा। सोंचे ? जब जीवन देने वाली सदानीराएं ही नहीं रहेंगी तो धरती पर जीवन कैसे बचेगा।


आदि गंगा की यात्रा
गोमती का उद्गम स्थल पीलीभीत के माधौटांडा कसबे के पास (गोमत ताल) फुलहर झील है। पीलीभीत से चलकर आदिगंगा के नाम से मशहूर गोमती शाहजहांपुर, लखीमपुर, हरदोई, सीतापुर, मिश्रिख, लखनऊ, बाराबंकी, सुल्तानपुर, प्रतापगढ़, जौनपुर, गाजीपुर, वाराणसी के बीच ९६० किमी का सफर तय कर बनारस जिले के कैथी स्थित मारकंडेय महादेव के पास मां गंगा की गोद में विश्राम लेती हैं।


तटों पर स्थित प्रमुख धार्मिक स्थल
० पीलीभीत- उद्गम स्थल, त्रिवेणी बाबा आश्रम, इकोत्तरनाथ
० शाहजहांपुर- सुनासिरनाथ (बंडा), बजरिया घाट, पन्नघाट, मंशाराम बाबा, भंजई घाट, मंझरिया घाट,
० लखीमपुर-सिरसाघाट, टेढ़ेनाथ बाबा, मढि़या घाट,
० हरदोई- धौबियाघाट, प्राकृतिक जलस्रोत, हत्याहरण, नल दमयंती स्थल
० सीतापुर- नैमिषारण्य, चक्रतीर्थ, ललिता देवी, अठासी कोस परिक्रमा, दधीचि आश्रम, मनोपूर्णा जल प्रपात।
० लखनऊ- चंद्रिका देवी मंदिर, क्डिन्य घाट, मनकामेश्वर मंदिर, संकटमौचन हनुमान मंदिर
० बाराबंकी- महदेवा घाट, टीकाराम बाबा
० सुल्तानपुर- सीताकुंड तीर्थ, धौपाप
० प्रतापगढ़- ढकवा घाट
० ज्नपुर- जमदग्नि आश्रम
० वाराणसी- गौमती गंगा मिलन स्थल, (कैथी) मारकंडेय महादेव


आदि गंगा (गोमती की सहायक नदियां)
नदी मिलन स्थल

वर्षाती नाला - घाटमपुर (पीलीभीत)
झुकना, भैंसी, तरेउना - शाहजहांपुर
छौहा,अंधराछौहा, '- लखीमपुर
कठिना, सरायन, गौन - सीतापुर
सरायन - सीतापुर
कुकरैल, अकरद्दी - लखनऊ
रेठ, कल्याणी - बाराबंकी
कादूनाला - सुल्तानपुर
सई - जौनपुर

कैसे हो रहा नुकसान
० नदी तटों तक कब्जा कर खेती करने से
० प्रदूषित जल नदी में गिराने और मछलियौं के शिकार के लिए जहर डालने से
० नदी तटों के पेड़ काटने से
० जल प्रवाह रोंकने का प्रयास करने से
० गंदगी डालने से


क्या करना होगा
० नदी के किनारे पौधारोपण
० गंदगी और गंदे पानी को नदी में पहुंचने से रोकना
० नदी धारा को सुचारू बहने की व्यवस्था में सहयोग
0 पूजन सामग्री को नदी में नहीं डाल कर भू विसर्जन करना
० जल प्रबंधन करना, श्रमदान से सफाई आदि करना
० अवैध खनन रौकना, नदी के किनारों पर अवैध कब्जे रोंकना


यात्रा को लेकर उत्साह
गौमती यात्रा को लेकर लोगों में खासा उत्साह है। २८ मार्च को बंडा से चलकर खुटार, गुटैया, पुवायां, पन्नघाट होते हुए बनारस जाने तक यात्रा का तमाम स्थानों पर भव्य स्वागत किया जाएगा। कई जगह गोष्ठियों का आयोजन लोगों को गोमती और उसकी सहायक नदियों को बचाने के लिए लोगों को  जागरूक किया जाएगा।





हरिओम त्रिवेदी (लेखक हरिओम त्रिवेदी अमर उजाला पुवायां शाहजहांपुर के तहसील प्रभारी हैं। निवास रायटोला खुटार, जनपद शाहजहांपुर, इनसे मोबाइल नंबर - 09935986765 एवं ई-मेल hariomreporter@gmail.com पर सम्पर्क कर सकते हैं)

Mar 26, 2011

एक पत्र जो दरअसल गौरैया के नाम है !


मेरे घर भी आई गौरैया
 
एक लेखिका, संपादिका, एंव सामाजिक कार्यकर्ता का दुधवा लाइव के संपादक के लिए एक पत्र, जिसमें तस्किरा है, हमारे घर आँगन की उस चिड़िया का, जिससे प्रत्येक मानव (छोटा बच्चा घर में पहली बार किसी उड़ने वाले जीव से परिचित होता था तो वह गौरैया ही तो थी !) अपने जीवन में किसी परिन्दे से पहली बार रूबरू होता आया, जिसे हम गौरैया कहते हैं...
 
20 मार्च गौरैया दिवस के लिए जब आपका मेल आया तो यही सोच कर उस समय जवाब नहीं दे पाई कि कुछ लिख कर ही भेजूंगी। पिछले वर्ष आपके प्रयास के बाद मैंने भी अपने घर में गौरैया को बुलाने के लिए कुछ प्रयास किए हैं, और अब भी कर रहीं हूं।  उस प्रयास को शब्द देना चाहती थी पर फालतू के कार्यों में उलझी रही और यह जरुरी बात लिखने से रह गई। 

.... खैर देर से ही सही अपने इस प्रयास से मिली खुशी को मैं आपके साथ बांटना चाहती हूं ....मुझे अपना बचपन याद है जब हम गर्मियों की छुट्टियों में अपने गांव जाया करते थे।  पक्षी तब हमारे जीवन का हिस्सा हुआ करते थे। खासकर गौरैया, कबूतर, कौआं और तोता। दादा जी ने घर की कोठी के एक तरफ ऊपरी मंजिल पर 10-12 मटके बंधवा दिए थे जहां ढेर सारे कबूतरों ने अपना स्थायी बसेरा बना लिया था। इनके गूटरगूं के हम इतने आदी थे कि जब उन्हें सैर के बाद शाम को घर लौटने में देर हो जाती थी तो हम चिंतित हो जाते थे।  सुबह आंगन में जब भी अनाज सुखाने या साफ करने के लिए डाले जाते सारे कबूतर मटकों से ऐसे उतर कर नीचे आते थे मानों वे आनाज उनके लिए ही डाले गए हों। हम बच्चे उनके पीछे भागते वे उड़कर फिर अपने मटके के ऊपर जा बैठते। यह हमारा कुछ देर का खेल ही बन जाता था। इसके साथ- साथ कौओं के झुंड के झुंड भी न जाने कहां से उड़ कर आते और कांव- कांव से सारा घर आंगन भर जाते। जिसे सुनकर मां कहती न जाने आज कौन मेहमान आने वाला है। ...और गौरैयों का तो कहना ही क्या वे तो इतनी अधिक संख्या में आंगन और घर की मुंडेरों पर आ बैठते कि गिनती करना मुश्किल होता। 

हमारे आंगन में तुलसी चौरा के पास एक बहुत ऊंचा हरसिंगार का पेड़ था, यह पेड़ उनकी चहचआहट से सुबह शाम गूंजता ही रहता। जरा सा धान या चावल का दाना कहीं बिखरा नहीं कि गौरैयों से पूरा आंगन ही नहीं भर जाता बल्कि वे बारामदे तक उतर आया करती थीं। और इस तरह हम बच्चे पूरी छुट्टियों में मां से  पका हुआ चावल या रोटी का टुकड़ा मांग कर लाते और कबूतरों, गौरैयों को अपने पास  बुलाने का जतन करते। ...तो इस तरह गुजरा है अपने घर के आंगन में इन पक्षियों के संग मेरा बचपन। 

यह खुशी की बात है कि मेरे शहर वाले घर के आस- पास भी कुछ बड़े पेड़ अब भी बचे हैं जिनमें कोयल की कूहू- कूहू और बुलबुल के गीत सुनाई पड़ते हैं। दूसरे कई तरह के छोटे- बड़े पक्षी भी शाम को अपने बसेरे की ओर लौटते हुए नजर आते हैं। यही नहीं घर के सामने सड़क  के किनारे एक पेड़, जिसे पेड़ लगाओ अभियान के तहत कुछ वर्ष पहले नगर निगम ने लगवाया था वह अब इतना बड़ा हो गया है कि वहां पक्षी अपना बसेरा बनाने लगे हैं।  बुलबुल ने इस छोटे से पेड़ पर अपना घोंसला बनाया और अंडे दिए। जब तक अंडे से बच्चा नहीं निकला और उडऩे लायक नहीं हुआ रोज उसकी मां उसे दाना खिलाने आती रही। बुलबुल के इस बच्चे को बड़ा होते मैंने देखा है। 

पक्षियों को आकाश में उड़ते देखकर खुश होना और उसके विलुप्त होते जाने पर दुख व्यक्त करना बहुत आसान होता है। पर जब उन्हें बचाने की दिशा में आपके हाथ भी आगे आते हैं तो उस आनंद को शब्दों में बयान करना मुश्किल हो जाता है। ऐसा ही कुछ मेरे साथ भी हुआ। दुधवा लाइव के कृष्ण कुमार मिश्र जी से जब पिछले वर्ष 20 मार्च गौरैया दिवस के अवसर परिचय हुआ और उनके द्वारा इस पक्षी को बचाए जाने के प्रयास के बारे में पता चला तभी से मन में छटपटाहट शुरु हो गई थी कि हम शहरों में रहने वालों को भी इसे बचाए रखने के लिए कुछ करना चाहिए। 

सो मैंने भी तभी से अपने घर की छत पर मट्टी के बर्तनों में पानी, धान और चावल के दाने रखना शुरु कर दिया था। शुरू में तो एक- दो गौरैया ही नजर आती थी पर आपको बताते हुए खुशी हो रही है कि आज साल के बीतते- बीतते मेरे घर के भीतर वाले छत पर गौरेया के चार जोड़े नियमति रुप से दाना चुगने और पानी पीने आते हैं तथा ऊपर की छत पर तो ढेरों गौरेया चहचहाने लगीं हैं। सुबह शाम उनकी चहचआहट से पूरा घर गूंजायमान रहता है। यही नहीं छत पर शाम होते ही जब कभी पंहुचों तो आसमान में और भी कई प्रकार पक्षी उड़ते हुए नजर आते हैं। उन्हें उड़ते हुए देखने का अहसास बहुत ही सुखद होता है। 

 मैं चूंकि किसान परिवार से ताल्लुक रखती हूं अत: जब फसल कट कर आती है, दीवाली के बाद तो गांव में किसान धान की पकी हुई नई बालियों से बहुत खूबसूरत झालर बनाते हैं। मैं भी पिछले वर्ष से ऐसे झालर बनवा कर लाती हूं और इन्हें छत पर ऐसी जगह लटका देती हूं जहां आ कर गौरेया इनके दाने चुग सके । अब तो इन झालरों में सिर्फ बालियां ही बची है गौरैयों ने सारे दाने चुग लिए हैं। इसलिए अब रोज उनके लिए चावल के दाने बिखेर देती हूं। उन्हें दूर से चुगते देखती हूं और मन ही मन खुश होती हूं कि देखो मेरे घर भी गौरैया आने लगी। इसी संदर्भ में पिछले वर्ष बहुत से शहरों में विभिन्न संस्थाओं और मीडिया ने भी गौरैया बचाओ अभियान के तहत जागरुकता अभियान जोर -शोर से चलाया था। यह सही है कि किसी संस्था या मीडिया द्वारा अभियान चलाने से लोगों में जागरुकता आती है पर अक्सर यह देखा गया है कि कुछ दिनों तक तो लोग उस बात को याद रखते हैं लेकिन जैसे ही अभियान की गति मंद पड़ती है या बंद कर दी जाती है तो लोग उस बात को भूलने लगते हैं। 

मुझे याद है पिछले वर्ष मेरे प्रदेश में भी गौरैया को बचाने के लिए कुछ संस्थाओं और समाचार पत्रों ने जागरुकता का बिगुल फूंका था और उसका असर भी दिखाई देने लगा था। तब समाचार पत्रों में लोगों द्वारा गौरैया के लिए अपने घरों के आस- पास घोंसला बनाने तथा पानी और दाना रखे जाने के समाचार बड़ी संख्या में प्रकाशित हो रहे थे। कितना अच्छा होता समाचार पत्र ऐसे अभियानों के लिए अपने अखबार का एक कोना प्रतिदिन सुरक्षित रख देते ताकि पशु- पक्षियों के संरक्षण के लिए जागरुकता का यह अभियान साल- दर- साल चलता ही रहता... और हमारे घर- आंगन में गौरैया सालो- साल यूं ही फुदकती रहती। 



डॉ. रत्ना वर्मा (लेखिका उदन्ती पत्रिका की संपादिका हैं, जर्नलिज्म में दशकों का कार्यानुभव, कई प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में पत्रकारिता, मध्य भारत के एक बड़े राजनैतिक परिवार से  ताल्लुक, आन्दोलनी विरासत, भारत के नव-गठित प्रदेश छत्तीसगढ की राजधानी रायपुर में निवास, इनसे udanti.com@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं। )

क्या इस गौरैय्या को बचाने की मुहिम में शामिल होंगे आप

Photo courtesy: Hohaeng.com

गौरैय्या दिवस 20 मार्च के उपलक्ष्य में विशेष
-शाहजहांपुर नगर क्षेत्र में लिंग अनुपात में भारी गिरावट
-एक हजार पर केवल छह सौ छियालिस लड़कियां

शाहजहांपुर। कटरी के गांव कुंडरी से खबर आई है कि वहां एक घर के आंगन में लगे शीशे को गौरैय्या ने चोंच मार-मार कर तोड़ दिया है। शीशा तोड़ देने से गौरैय्या पर कोई नाराज नहीं है। इस परिवार के लोगों ने पूरे गांव के लोगों को और बाहर वालों को भी बताया कि उनके घर का शीशा गौरैय्या ने तोड़ दिया है। यह बताते वक्त उस परिवार के प्रत्येक सदस्य के चेहरे पर भाव खुशी के होते हैं। जानते हैं इसका मतलब क्या है...यानी गौरैय्या ने लोगों के घरों के आंगन में आना शुरू कर दिया है। यह सब हो पाया है एक अघोषित मुहिम के तहत ही।
20 मार्च 2010 को एक साथ अखबारों में पढ़ने को मिला था गौरैय्या के बारे में। लोगों के दिमाग में यह बात घर कर गई कि आखिर क्यों गौरैय्या देखने को नहीं मिल रही। उसी समय अपील की गई थी कि आप अपने घर की छत पर और ताखों में कटोरी में पानी और गेहूं, चावल के दानें रखिए...ताकि आपके घर के आंगन में चिड़िया गौरैय्या आना शुरू कर दे, जो दिखना बंद हो गई। बात जरा सी थी, बहुत ही छोटी सी अपील थी, लोगों ने ऐसा किया और अब आप उसी गौरैय्या को कहीं भी, किसी के भी घर में आते-जाते यानी दाना चुगते हुए देख सकते हैं।
तो थोड़ा सा सचेत हो जाइए और एक और गौरैय्या को अपने घर के आंगन में आने दीजिए। यह गौरैय्या भी जहां आती-जाती है, वह घर खुशियों से भर जाता है। जी हां, हम बात कर रहे हैं, कन्या भू्रण हत्या रोकने के लिए। अभी कुछ दिन पहले की बात है जब अचानक एक दिन यूपी वात्सल्य प्रभारी डा. नीलम सिंह ने अपनी टीम के साथ शाहजहांपुर के कई अल्ट्रासाउंड सेंटर्स पर छापेमारी की। तमाम डाक्टर भाग गए, कई अल्ट्रासाउंड सेंटर्स को सीज कर दिया गया। ऐसा इसलिए हुआ कि अपने शाहजहांपुर नगर क्षेत्र में 1000 हजार पर केवल 646 लड़कियां ही हैं। बीच में यह अनुपात बढ़ा भी था, लेकिन अचानक घट गया। हड़कंप मचा और इसके बाद कार्रवाई के निर्देश हुए, तभी अल्ट्रासाउंड सेंटर्स पर छापेमारी की गई। 


एक साल पहले जब गौरैय्या के संरक्षण के लिए एक बहुत ही छोटी सी अपील लोगों के दिलों में घर कर गई तो इस गौरैय्या यानी पेट में पल रही कन्या को बचाने की मुहिम में आप शामिल हो जाइए...वरना जिस बेटे की चाहत में आप बेटियों का पेट में ही कत्ल कर रहे हैं, उन बेटों को बहुएं नहीं मिलेंगी...बेटे के लिए बहू खरीद कर लानी पड़ेगी...। तो चलिए अब इस गौरय्या यानी की पेट में पल रही कन्या भू्रण को बचाने के लिए।

छोटा सा किस्सा
एक नहीं कई ऐसे परिवार हैं, जहां गौरैय्या यानी बेटी के आने का इंतजार हो रहा है। ऐसा ही एक परिवार है गुप्ता जी का। प्रवीन गुप्ता नाम है इनका। इनके दो बेटे हैं। भाई के भी दो बेटे हैं, परिवार में एक भी बेटी नहीं है। मन्नतें मान रखी हैं कि परिवार में एक बेटी का जन्म हो, ताकि घर में रौनक आ सके। सोचने का तरीका यह है कि बेटों को कैसे पता चलेगा कि रक्षाबंधन का त्यौहार क्यों मनाया जाता है। बहन का महत्व क्या होेता है। बेटे किससे प्यार भरा झगड़ा करेंगे। गुप्ता जी का कहना है कि बेटी एक परिवार में पलती है, पढ़ती है, बढ़ती है और फिर दूसरे परिवार में उसकी शादी होती है। यह बेटी ही होती है तो दो कुनबों का मजबूत जोड़ बनती है। बेटे का क्या भरोसा, लेकिन बेटियों के बारे में देखा गया है कि वह अपने मां-बाप का अंत तक साथ देती हैं। यह बेटियां दो परिवारों का सहारा बनती हैं।


कैसे शामिल हों मुहिम
बेटी बचाओ मुहिम में शामिल होने के लिए सबसे पहले तो आपको अपने घर और आसपास वालों को बेटियों के महत्व के बारे में बताना होगा। खास कर उन लोगों पर ज्यादा ध्यान देना होगा, जिनके परिवार में बेटियां ज्यादा हैं और वह लड़के की चाहत रखते हैं। उन्हें बताना पड़ेगा कि बेटी और बेटे में अब कोई अंतर नहीं है। उन्हें जागरूक करने के लिए आपको चरणबद्ध तरीके से उनके दिमाग से बेटे की लालसा को मिटाना होगा। अगर आपको पता चलता है कि किसी अल्ट्रासाउंड सेंटर पर लिंग की जांच की जाती है तो इसकी शिकायत सीएमओ से करें।

विवेक सेंगर ( लेखक वर्तमान में दैनिक हिन्दुस्तान शाहजहांपुर के ब्यूरोचीफ हैं। इन्होंने पहले भी गौरैय्या को बहन और बेटी से जोड़ कर कई लेख लिखे हैं, उन लेख को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें। इनसे viveksainger1@gmail.com पर सम्पर्क कर सकते हैं)



Mar 24, 2011

पानी की बूँद-बूँद को महरूम है बुन्देलखण्ड के बाशिन्दें ?

जल संकट और पलायन ने होली से महरूम किया ! 

१-   जल आपदा के साथ दलित पलायन का गढ़ है गोखरही
२-  त्रिस्तरीय ग्राम पंचायत चुनाव 2010-11 के समय 3500 मतदाता और अब हैं महज 1000         लोग
३-    700 हरिजन एवं अन्य ग्रामीणों का हो रहा गांव से पलायन
४-    15 कुओं में से 11 सूखे जिनमे से 1947 का हरिजन बन्धुओं को समर्पित कुआ भी शामिल

बुन्देलखण्ड़ी होली और यहां का फाग कभी आस पास भले ही चर्चा का विषय हुआ करता था मगर अब हालात इन काल खण्ड़ो से बहुत दूर खड़े हैं। पिछले 7 सूखे देख रहे बुन्देल खण्ड़ के जनपद बांदा में ग्रामीण क्षेत्रों पर जल आपदा और पलायन की त्रासदी लगातार जारी है। ग्राम गोखरही, तिन्दवारी विकास खण्ड़ में इस दफा होली नहीं मनाई गयी वजह साफ है जब गांव के मवेसी,जानवरों के लिये पीने का पानी नहीं अट रहा तो भला रंग और गुलाल का खुमार गांव के बुन्देलियों पर कैसे चढ़ता।

एक सरसरी नजर से इन आकड़ों पर देखे तो तस्वीर अपने आप जमीन की सूखती आखों का हाल बयान करती है। 2010-11 के त्रिस्तरीय ग्राम पंचायत चुनाव में कुल मतदाता गोखरही गांव 3500 थे लेकिन पिछले 3 माह से हो रहे पलायन के चलते जहां हरिजनों के सैकड़ो घरो में ताले जड़े है वहीं गांव में इस समय कुल आबादी मतदाता सूची के हिसाब से 1000 रह गयी है। 700 दलित परिवारो के लोगों के साथ 100 ब्राहृमण, क्षत्रिय परिवार में म0प्र0 के मुरैना,बहुआ(फतेहपुर),राजस्थान के ईट भटटो मे मजदूरी करने के लिये पलायन कर चुके है जो अब आगामी उम्मीद पर निर्भर वर्षा ऋतु में ही घरो को वापस लौटेगें। पलायन करने वालो ंमें शामिल हरिजन बिरादरी के गरीबां,बिन्दा,रामसिया,लालू,मांझिल,बिन्दा,बिसाली,भईयालाल और ऊचें कुनबो के प्रदीप शुक्ला, प्रहलाद तिवारी,आदेश अवस्थी,महदी,दयाराम,शिवप्रसाद,ब्रजकिशोर उन परिवारों के मुखियां है जिनके घरों बीते 3 महीने से पलायन की मोहर लगी है।

केन्द्र सरकार की मनरेगा योजना के विकास का पहिया चुनाव होने के 3माह गुजरने के बाद भी गोखरही में नहीं दौड़ा है। निर्वाचित ग्राम प्रधान महिला श्रीमती मालती देवी का कहना है कि उनका सारा काम गया तिवारी देखते है मतलब साफ है प्रधान पतियों की जमात में खड़े गया तिवारी गांव की प्रधानी करने का बीड़ा उठायें है। जॉब कार्ड धारक सन्तराम यादव ने बताया कि इस वर्ष गोखरही से महुई सम्पर्क मार्ग एवं चन्दन तालाब के किनारे ही एक पुलियां मे मिट्टी डालने का काम कराया गया है ग्रामीणों को समय पर काम और मजदूरी भुगतान न होने से गांव में रोजगार का संकट वर्ष भर बना रहता है जिससे पलायन ही इनके घरों में रोजी रोटी की जुगाड़ करने का एक मात्र जरिया है। उन्होने बताया कि गांव बेरोजगार युवक शारदा प्रसाद,गुलाब चन्द्र, ज्ञान सिंह,अरबिन्द,कमल आदि ऐसे युवा साथीं है जो होली के त्यौंहार के बाद गुजरात चले जायेगें। जानकारों के मुताबिक इस गांव में कुल 15 कुऐ है जिनमें की 11 पूरी तरह सूख चुके है ज्यादातर सूखे कुओं को कूड़ेदान के लिये उपयोग किया जाता है। 



 बुन्देलखण्ड में जल संकट से बावस्ता हो रही है गौरैया
गौर तलब है कि सन् 1947 में बने हरिजन बन्धुओं को समर्पित एक मात्र कुआं भी अपनी बदहाली और दलित जल संकट की कहानी बिन पानी बुन्देलखण्ड़ के गोखरहीं गांव से बतलाने की शासन और प्रशासन को कोशिशे करता रहता है, लेकिन यह सिर्फ नक्कारखाने में बजे तूती की तरह ही है जिसकी आवाज सरकारी अमलो को बेसुरी लगती है। विश्व गोरैयां दिवस 20 मार्च 2011 पर गांव में जागरूकता गोष्ठी आयोजित करने गये स्वैच्छिक संगठन प्रवास को जल संकट के भयावह दौर से गुजर रहे गोखरही गावं के बाशिन्दों ने प्रकृति प्रेम की बानगी के तौर पर एक नन्ही गोरैयां मकानो की दरार में दिखलाने की कामयाब कोशिश की जिससे कही न कहीं उनकी पेयजल संकट की पीड़ा गोरैया के साथ यह प्रश्न चिन्ह लेकर संगठन और सरकार के सामने पूछने की कूबत रख रही थी कि विकास के मानक क्यां पलायन और जल संकट बुनियाद पर तय किये जाते है जिसने गोखरही के हजारों घरों में तालें जड़कर होली से महरूम कर दिया ? बुन्देलखण्ड़ क्षेत्र के जनपद चित्रकूट के जिला अधिकारी ने उ0प्र0 सरकार से सूखा क्षेत्र घोसित करने की सिफारिश की है लेकिन बताते चले कि जल संकट वाली 40 जनपदीय सूची में अन्तरमुखी अकाल का पर्याय बुन्देलखण्ड़ के किसी जनपद को शामिल नही किया गया है वहीं पिछले 3 वर्षाे में जनपद बांदा,चित्रकूट,महोबा,हमीरपुर का जल स्तर 3 मी0 नीचे चला गया है और कहीं भी सूखी धरती पर बिना पत्तियों के खड़े हुये पेड़ो की बीच पानी की उम्मीद छोड़ चुके खेतो पर 200 से 800 मी0 तक 7 फुट गहरी दरारे पड़ चुकी है और इन सब की पीछे सरकार की आकड़ो पर विकास का मॉडल तैयार करने वाली योजनाओं के साथ साथ जलदोहन करने वाले कुटीरउद्योग बुन्देलखण्ड़ का अवैध ग्रेनाइट खनन् उद्योग प्रमुख रूप से दोषी है। जिनसे सैकड़ो ली0 पानी 300 फिट गहरी और 200 ऊचीं पहाड़ खदानों व कृसिंग (पत्थर तोड़ने) मशीन के द्वारा पम्पिंग सेट से बाहर फेका जाता है लेकिन उ0प्र0 सरकार यह मानने को तैयार नहीं की बुन्देलखण्ड़ में खनन् उद्योग जल आपदा का हिस्सा है यहां तक कि उसने इन क्षेत्रों में क्रशर नहीं होने का भी दावा किया है। गोखरही जैसे सैकड़ो गांव आने वाले अप्रैल,मई में पलायन की हूबहू तस्बीर बनकर विकास और विनाश के बिचौलिये शाबित होगंे। क्यां शहरों की तरफ ग्रामीणो का प्रवास उनके माकूल पुनर्वास की दस्तक बनेगा ?


आशीष दीक्षित "सागर" (लेखक सामाजिक कार्यकर्ता है, वन एंव पर्यावरण के संबध में बुन्देलखण्ड अंचल में सक्रिय, प्रवास संस्था के संस्थापक के तौर पर, मानव संसाधनों व महिलाओं की हिमायत, पर्यावरण व जैव-विविधता के संवर्धन व सरंक्षण में सक्रिय, चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय से एम०एस० डब्ल्यु० करने के उपरान्त भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय के उपक्रम कपाट में दो वर्षों का कार्यानुभव, उत्तर प्रदेश के बांदा जनपद में निवास, इनसे ashishdixit01@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं)

Mar 23, 2011

...अब मेरे घर के आंगन में आती है गौरैय्या


गौरैया तुम रोज मेरे घर आया करो....


वह एक साल पहले की बात है, जब आप सबने दुआएं की थी कि गौरैय्या मेरे घर भी आए। वाकई दिल से निकली थीं वह दुआएं और मेरे घर पर गौरैय्या ने आना शुरू कर दिया। गौरैय्या अब डरती नहीं है, वह बेधड़क पूरे अधिकार के साथ आती है और गेहूं धुलते समय ही आकर चुगने लगती है। पिता जी भी अब अपने कदमों को सहारे से रखते हैं कि कहीं उड़ न जाए। तब मैं शाहजहांपुर था और अब भी मैं शाहजहांपुर हूं। हां, गौरैय्या को अपने घर के आंगन में गेहूं का दाना चुगते देखने के लिए ऊपर वाले ने मुझे छह महीने के लिए मुझे अपने घर पर तैनाती दे दी। मैं और मेरा बेटा एक दिन घर की सीढ़ियों पर बैठे थे और अचानक सामने लगी घास में पड़े गेहूं के दानों को चुगने के लिए गौरैय्या आ गई, मैनें देखा तो खुशी का ठिकाना न रहा। दौड़ कर घर के अंदर गया और सबको बुलाकर लाया गौरैय्या को दिखाने के लिए। फिर मेरा बेटा भी शोर मचा रहा था, जोर-जोर से कह रहा था गौरैय्या तुम आओ मेरे पास...वह गौरैय्या के पास जाना चाहता था, लेकिन वह उड़ जा रही थी। इसके बाद बाद तो बहुत देर तक बेटा रोता रहा कि पापा मुझे गौरैय्या चाहिए। किसी तरह से समझाया, फिर वह खेलने में लग गया...भूल गया। अब मैं अपने घर के आंगन में गौरैय्या को अठखेलियां करते देखता हूं...तब मुझे याद आते हैं, वह लोग जो मेरी एक साल पुरानी खबर पढ़कर खूब रोए थे, तब उनके मुंह से दुआएं निकली थीं कि विवेक भाई के घर गौरैय्या जरूर आए। दुआएं रंग लाईं, गौरैय्या मेरे घर आने लगी।

कुछ दिन पहले की बात है कि मेरे दोस्त सुदीप ने बताया कि भैय्या आप कहां है, फोन ट्राई किया, नहीं मिला। इसीलिए आया हूं आपको यह बताने के लिए कि मेरे गांव के घर के आंगन में लगे आइने को गौरैय्या ने तोड़ दिया है। बड़ा ही सुखद अहसास हुआ था तब। मेरे दोस्त पंकज बाथम ने आफिस आकर बताया कि सेंगर जी मैंने फार्म हाउस पर गौरैय्या बड़ी तादात में आने लगी हैं। ऐसे वह तमाम किस्से मेरे सामने आने लगे, जिसमें गौरैय्या को देखने और गौरैय्या के आने का जिक्र होता है।

पूरा एक साल हो गया। बीस मार्च को गौरैय्या दिवस होता है। मेरे जेहन में बार-बार कुछ लिखने को विचार उमड़ रहे थे, लेकिन होली थी और काम बहुत था, घर आया था दिवाली के बाद तो सबके साथ समय बिताने से अपने को रोक नहीं पा रहा था। गौरैय्या तो आने लगी है मेरे ही नहीं, आप सबके आंगन में भी।

इस गौरैय्या ने मुझे शाहजहांपुर में पहचान दे दी। जो भी मिलता है साल भर के बाद, दो महीने के बाद, छह महीने के बाद आकर केवल उसी गौरैय्या वाली खबर की चर्चा करता है। इस बार गौरैय्या को लोगों ने बहुत याद नहीं किया, इसका कारण है कि अब गौरैय्या लोगों के आंगन में आती है, ताखों में रहती है, दाना चुगती है और हम सबको उसमें दिखती है बेटी और बहन। तो सामने होता है, उसे याद नहीं किया जाता है। धन्यवाद केके भाई...आपकी मुहिम रंग लाई...हम सब आपके सहयोगी के तौर पर काम कर रहे थे। आगे भी कोशिश रहेगी कि हम आपका साथ देते रहें गौरैय्या जैसी और भी चिड़ियों को संरक्षित करने में।

"गौरैया दिवस 20 मार्च 2010 को विवेक सेंगर की गौरैया पर दुधवा लाइव में प्रकाशित एक मार्मिक कथा जिसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।"

विवेक सेंगर (लेखक हिन्दुस्तान दैनिक शाहजहांपुर के ब्यूरो चीफ हैं, इनसे viveksainger1@gmail.com पर सम्पर्क कर सकते हैं)

Mar 22, 2011

हमारे घर का यह परिन्दा आखिर कैसे हुआ हमसे दूर ?

----गौरैया की घटती तादाद की कुछ वजहें, बता रहे है भारतीय प्रौद्यगिकी संस्थान नई दिल्ली के शोध छात्र अनिल प्रताप सिंह 
पिछले कुछ सालों में शहरों में गौरैया की कम होती संख्या पर चिन्ता प्रकट की जा रही है।

आधुनिक स्थापत्य की बहुमंजिली इमारतों में गौरैया को रहने के लिए पुराने घरों की तरह जगह नहीं मिल पाती। सुपरमार्केट संस्कृति के कारण पुरानी पंसारी की दूकानें घट रही हैं। इससे गौरेया को दाना नहीं मिल पाता है। इसके अतिरिक्त मोबाइल टावरों से निकले वाली तंरगों को भी गौरैयों के लिए हानिकारक माना जा रहा है। ये तंरगें चिड़िया की दिशा खोजने वाली प्रणाली को प्रभावित कर रही है और इनके प्रजनन पर भी विपरीत असर पड़ रहा है, जिसकते परिणाम स्वरूप गौरैया तेजी से विलुप्त हो रही है। 

गौरैया को घास के बीज काफी पसंद होते हैं जो शहर की अपेक्षा ग्रामीण क्षेत्रों में आसानी से मिल जाते हैं। ज्यादा तापमान गौरेया सहन नहीं कर सकती। प्रदूषण और विकिरण से शहरों का तापमान बढ़ रहा है। कबूतर को धार्मिक कारणों से ज्यादा महत्व दिया जाता है। चुग्गे वाली जगह कबूतर ज्यादा होते हैं। पर गौरैया के लिए इस प्रकार के इंतज़ाम नहीं हैं। खाना और घोंसले की तलाश में गौरेया शहर से दूर निकल जाती हैं और अपना नया आशियाना तलाश लेती हैं।

अनिल प्रताप सिंह (लेखक भारतीय प्रौद्यगिकी संस्थान नई दिल्ली के सेन्ट्रल फ़ॉर रूरल डेवलपमेन्ट  एण्ड टेक्नालॉजी में बायोकैमिस्ट्री प्रभाग में शोध छात्र है,)

Mar 21, 2011

घर आंगन की चिड़िया है गौरैया

 इन्सानी गतिविधियों ने तबाह ही कर डाला इस चिड़िया का बसेरा....
विश्व की 14000 पक्षी प्रजातियों में से कुछ ऐसी भी हैं जिन्हे बस्ती का पक्षी या घरेलू जनमित्र कहकर पक्षी जगत में ही नहीं आम सामाजिक जीवन में भी मनुष्य के बदलते परिवेश के साथ और कभी गुजरे जमाने की स्मृतियों में पुकारा जाता था। समय बीतता गया और विस्मृत होते बचपन के भूले बिसरे पलों के साथ-साथ विकास की धुन्ध में मेरे बचपन की करीबी मित्र गौैरैया अब लगभग प्रकृति से ही नहीं हमारे घरों के आंगन, छतों की मुण्डेर, पक्के मकानों में ट्यूब लाइट पर छुपते छुपाते घोंसला बनाने की आदत से काफी दूर जा चुकी है। गौरैया को पेसरी फार्म्स (छोटे व मध्यम आकार के पक्षी) वर्ग में रखा गया है इसे अंग्रेजी व लैटिन भाषा में हाउस स्पैरो कहा जाता है वहीं छः इंच से 15 सेमी0 तक लम्बी गौरैया को तमिल में अंगाड़ी कुरूवी और मलयालम में आड़िकलाई कुरूवी जिसका शाब्दिक अर्थ है घर बाजार का पक्षी व रसोई घर की चिड़िया। इसी के विलुप्त होते जीवन की एक छोटी सी पुर्नजीवित परिकल्पना को एक मर्तबा फिर पतझड़ से सूखे पेड़ों में प्रवास करने की जद्दो जहद के साथ बुन्देलखण्ड में मनाया गया विश्व गौरैया दिवस।

विकास की आपाधापी में अब शायद लोगों को प्रकृति से इतनी दूरियां की आदत सी पड़ गयी है कि कभी उनके घर आंगन में बैठकर चीं-चीं की आवाज करने वाली गौरैया का जीवन भी अब रास नहीं आता है। गौरैया की बातों को याद करते हुए दूसरे की क्या कहें हमें अपना ही बचपन याद है कि घर में लगे अनार के पेड़ मंे बहुत स्नेह के साथ बैठती थी गौरैया। गांव में तो इसका परिदृश्य ही कुछ अलग हुआ करता था। गर्मी की छुट्टियों में जब कभी मां के साथ ननिहाल जाना हुआ करता या फिर बाबा दादी के पास गांव में गर्मी की छुट्टियों और पके हुऐ आमों को चुराने की ललक हुआ करती तो इस गौरैया के जीवन के अनछुऐ पहुलुओं  से सामना हो जाता। गौरैया की अठखेंलियां देखकर प्रकृति के रंग को सलामत रखने की दुआ जाने अनजाने मुंह से निकल जाया करती थी। मगर यह क्या हुआ हमारी उम्र के फासलों के साथ विकास का कारवाँ, गांव की तस्वीर और हमारे घरों की प्राकृतिक चेतना सिमटती चली गयी। उसमंे कहीं न कहीं अब अस्मिता के संघर्ष से जूझ रही अस्तित्व को बचाने की जुगाड़ में विलुप्त होती गौरैया किसी न किसी बहाने की सही आज विश्व गौरैया दिवस पर बांदा जनपद के ग्राम गोखरही के किसान परिवार संतराम यादव के आंगन में बिछी निबाड़ की खाट के पावे में बैठी हुयी दिखाई दे गयी। गौरैया के बारे में जितनी जानकारी पर्यावरण, वन्य जीव क्षेत्रों से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ताओं के माध्यम से उपलब्ध हो पायी है। उनके मुताबिक कभी गांव जुड़ई कीट खाकर जीवित रहने वाली यह घरेलू चिड़िया अब खेत खलिहानों से विलुप्त होने की कगार पर है। जलवायु परिवर्तन के कारण गौरैया की प्रजनन क्षमता में भी समय के साथ बदलाव आये हैं। एक ही मौसम में कई बार अण्डे देने वाली मटमैली-भूरे रंग की तथा छाती पर एक काली सी पट्टी लिये हुऐ गौरैया कभी कभी बया चिड़िया की तरह दिखाई पड़ती है। कहना गलत नहीं की अगर बया और गौरैया को साथ-साथ देखा जाये तो धोखा होना लाजमी है।

जानकार बताते हैं कि जबसे किसानों ने खेतों में जैविक कृषि से मुंह चुराकर अधिक उत्पादन खेतों से लेने के लिये हाइब्रिड बीजों, कीटनाशक दवाओं व रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग शुरू किया तभी से बदलते क्लाइमेट से उत्पन्न होने वाले अनाज के दानों को खाकर गौरैया भी मरने लगी है। कभी प्राकृतिक आपदा मसलन भारी वर्षा, ओला से भी यह बांदा-चित्रकूट के नेशनल हाइवे-76 पर भारी मात्रा में सड़कों पर मृत अवस्था में पायी जाती है। इसके लिये दोषी हैं वे सरकार की नीतियों जिन्होंने गौरैया के साथ-साथ यहां पाये जाने वाले अन्य दुर्लभ पक्षियों के घौंसले बनाने के संसाधन हरे महुआ के पेड़, अर्जुन व आम के पेड़ों को भी फोरलाइन सड़कों में काटकर दफन कर दिया। गौरैया चिड़िया की उम्र 15 से 20 वर्ष के बीच अनुमानित की गयी है। आज इसके पुनर्वास की एवं घरों मंे पुनः एक घोंसला बनाने की नितान्त आवश्यकता है। कहीं कल यह चिड़िया कवि की कल्पना, चित्रकार की कैनवास में पेन्टिंग का रूप लेकर अवशेष में तब्दील न हो जाये। इन्ही सब गौरैया से जुड़े सामाजिक सरोकार के मुद्दों को लेकर विश्व गौरैया दिवस मनाया गया। जिसमें इसके जीवन संरक्षण के लिये एक से प्रत्येक व्यक्ति को प्रकृति के करीब आने की गुजारिश की गयी है। साथ ही किसान भाईयों को अपने खेत खलिहानों में गौरैया को वापस लाने के लिये जैविक कृषि की तरफ निर्णायक कदम उठाकर प्रकृति के संसाधनों के साथ गौरैया के जीवन प्रवास की उपकल्पना उतारने के लिये सकारात्मक परिचर्चा भी ग्राम गोखरही में महिलाओं, ग्रामीणों के बीच रखकर विलुप्त होते प्रकृति के उपहार को संजोने की कोशिश की गयी।



आशीष दीक्षित "सागर" (लेखक सामाजिक कार्यकर्ता है, वन एंव पर्यावरण के संबध में बुन्देलखण्ड अंचल में सक्रिय, प्रवास संस्था के संस्थापक के तौर पर, मानव संसाधनों व महिलाओं की हिमायत, पर्यावरण व जैव-विविधता के संवर्धन व सरंक्षण में सक्रिय, चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय से एम०एस० डब्ल्यु० करने के उपरान्त भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय के उपक्रम कपाट में दो वर्षों का कार्यानुभव, उत्तर प्रदेश के बांदा जनपद में निवास, इनसे ashishdixit01@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं) 

जानवरों के लिए डगर...


विश्व-प्रकति निधि ने नेपाल के गाँव धनबेलियां में की बैठक
बसंता वनक्षेत्र सामुदायिक वन समन्वय समिति हसुलिया कैलाली द्वारा ग्राम धन बेलिया वन्य जीव सरंक्षण पर एक गोष्ठी का आयोजन-

धनबेलिया (नेपाल) से देवेंद्र प्रकाश मिश्र की रिपोर्ट- 
नेपाल (धनबेलिया, 17 मार्च 2011) वन और वन्यजीवों की सुरक्षा व संरक्षण को लेकर विश्व प्रकृति निधि के तत्वाधान में नेपाल-भारत सीमा पार बैठक हुई। इसका आयोजन सीमावर्ती नेपाल की ग्रामीण संस्था बसंता वनक्षेत्र सामुदायिक वन समन्वय समिति हसुलिया कैलाली द्वारा ग्राम धन बेलिया में किया गया था। जिसमें भारत के दुधवा नेशनल पार्क से नेपाल के जंगल को जोड़ने वाले वसंता जैविक मार्ग को समृद्धशाली बनाने पर विस्तार से चर्चा की गई ताकि दोनों देशों के वन्यजीव निर्वाध रूप से आवागमन कर सकें।

दुधवा नेशनल पार्क के जंगल से सटे नेपाल के जिला कैलाली के ग्राम धनवेलिया में आयोजित नेपाल सीमापार बैठक को सम्बोधित करते हुए मुख्य अतिथि हसुलिया इलाकाई वन क्षेत्राधिकारी विजय चंद्र ने नेपाल में चल रहे वन प्रबंधन के कार्यो को बताते हुए कहा लालबोझी क्षेत्र में जगल की जमीन को अतिक्रमणकारियों से मुक्त कराया गया है। उन्होंने वनों की उपयोगिता को बताकर कहा कि अगर लोग उन्नतिशील पशुपालन करें तो मवेशियों का जंगल पर दबाव कम होगा साथ ही दूध के उत्पादन में भी वृद्धि होगी। श्री चंद्र ने कहा कि वन संरक्षण नहीं होगा तो वन्यजीव कहां रहेंगे। इसके लिए जैव विविधता को बचाए रखना जरूरी है। मोहाना नदी में डालफिन मछली पर शोध करने वाले प्रमुख जीव जंतु संरक्षक विजयराज श्रेष्ठ ने कहा कि नेपाल-भारत के बीच रोटी और बेटी का संबंध है वन्यजीव भी अनादिकाल से दोनों देशों के बीच आते जाते रहते हैं अब समय आ गया है कि वन्यजीवों का संरक्षण पार्को तक ही सीमित न रहे आज हम इस मुद्दे को घर आंगन तक ले आए हैं आगे हमरे बच्चे संरक्षण की बात सीखकर बड़े होंगे यही सफलता होगी। आशा है भविष्य में परिवर्तन जरूर आएगा। 

डब्लूडब्जूएफ नेपाल के परियोजना अधिकारी तिलक ढकाले, भलमंसा महासंघ के अध्यक्ष दीपक चौधरी, बसंता ग्राम के मणि प्रसाद चौधरी, राजेश चौधरी, कमल चौधरी, कलेशू चौधरी, कैलाश चौधरी, कर्ण बहादुर वन्य एवं वन्यजीव प्रेमियों ने कहा कि इस क्षेत्र में सामुदायिक वनों का विकास हो रहा है इससे ग्रामीणों की जंगल पर निर्भरता पर कमी आ रही है। भारत के दुधवा नेशनल पार्क के जंगल के समीप वर्दिया राष्ट्रीय निकुंज का जंगल है और दोनों को जोड़ने में वसंता जैविक मार्ग का महत्वपूर्ण स्थान है इसका संरक्षण किया जाना जरूरी है ताकि दोनों देशों के वयंजीवों का निर्वाध आवागमन बना रहे। इस जैविक मार्ग को समृद्धिशाली बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं बावजूद इसके बसंता जैविक मार्ग की सुरक्षा एवं संरक्षण की बात नेपाल और भारत की संसद में भी उठनी चाहिए। नेपाली वक्ताओं ने इस बात पर भी चिंता जाहिर करते हुए कहा कि बसंता कारीडोर समाप्त होने के बाद अब नेपाल में हाथी, बाघ, गैंडा आदि वनपशु दिखाई देना बंद हो गए हैं। इससे पूर्व बैठक में पहुंचे भारत के प्रतिनिधिमंडल में शामिल लोगों का माल्यार्पण करके स्वागत किया गया। बैठक का संचालन करते हुए वन समिति के सचिव रामू चौधरी ने सामुदायिक वन प्रबंधन एवं समिति के उद्देश्यों एवं कार्यो को बताते हुए कहा कि मोहाना नदी द्वारा किए गए कटान के बाद खाली भूमि पर समिति द्वारा वृक्षारोपण करके सामुदायिक वन तैयार किया जा रहा है। श्री चौधरी ने नेपाल में चल रहे जैव विविधता संरक्षण के कार्यो को भी बताया। बैठक में शामिल डब्ल्यूडब्ल्यूएफ भारत के वरिष्ठ परियोजना अधिकारी डा. मुदित गुप्ता ने वन एवं वयंजीव संरक्षण के लिए गांवों में गठित ईको विकास समितियों के कार्यो को बताते हुए कहा कि इनके माध्यम से जीविका के साधन एवं रोजगार आदि ग्रामीणों को उपलब्ध कराए जा रहे हैं जिससे जंगल पर आबादी का बढ़ रहा दबाव कम हुआ है। डा. गुप्ता ने वन उत्पाद तस्करी, अवैध शिकार आदि रोकने के लिए दोनों देशों के बीच शीघ्र ही प्रशिक्षण शिविर आयोजित करने की घोषणा की तथा बसंता जैविक मार्ग को पूर्व की स्थिति में लाने के लिए दोनों देशों के बीच संयुक्त कार्य योजना की जरूरत बताई। 


 सृष्टि कनजरवेशन एंड वेलफेयर सोसाइटी के सेक्रेटरी डीपी मिश्रा ने कहा कि वनों के संरक्षण के लिए जरूरी हो गया है कि प्रत्येक नागरिक इसकी उपयोगिता को समझे और घासफूस जलौनी लकड़ी आदि की व्यवस्था स्वयं करे तभी वनों पर निर्भरता कम होगी। ईको विकास समिति के मोटीवेटर छविनाथ चौहान, बरातीलाल आदि ने उपस्थितजनों से घर या खेत में एक पेड़ लगाने की अपील की और कहा कि इससे पर्यावरण संरक्षण होगा और सभी को शुद्ध आक्सीजन भी मिलेगी। बैठक में भारत की ओर से राधेश्याम भार्गव, बिट्टू राना, अवधेश तिवारी, प्रेमलाल राना, फूल सिंह राना, रामप्रसाद राना, परमानंद आदि के साथ ही भारी संख्या में नेपाली नागरिक एवं महिलाएं उपस्थित रहीं।

सीमापर नेपाल के जिला कैलाली के ग्राम धनवेलिया में हुई नेपाल-भारत सीमापार बैठक में भारतीय प्रतिनिधिमंडल में शामिल मेहमानों का नेपालियों ने भव्य स्वागत किया। इसके अतिरिक्त होली के पावन अवसर पर रेखा चौधरी ने जहां स्वागत गीत प्रस्तुत किया वहीं पारम्परिक वेशभूषा में नेपाली वाद्य पर बालिकाओं ने झुमारा लोक नृत्य पेश करके उपस्थित जन समुदाय को मंत्रमुग्ध कर दिया। नेपाली संस्कृति को देखकर भारतीय प्रतिनिधिमंडल में शामिल लोगों ने उसकी भरपूर प्रशंसा की।

 देवेन्द्र प्रकाश मिश्र (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, वन्य-जीव सरंक्षण पर लेखन, अमर उजाला में कई वर्षों तक पत्रकारिता, मौजूदा वक्त में एक प्रतिष्ठित अखबार में पत्रकारिता, आप पलिया से ब्लैक टाइगर नाम का अखबार भी निकाल रहे हैं, इनसे dpmishra7@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं। )

यहाँ भी हैं परिन्दों को दाना-पानी देने का दस्तूर...

....जीवों के प्रति यह सौहार्दपूर्ण बरताव बता रहा कि इन्सानियत जिन्दाबाद !!
विश्व गौरैया दिवस 20 मार्च के उपलक्ष्य में पक्षी प्रेम की एक मिसाल...
कहते हैं कि परिंदों के लिए शहरों में पानी कौन रखता है, पर लखीमपुर-खीरी जिले के निघासन नाम के छोटे से कस्बे के कई लोग अभी भी प्रकृति और इसके बनाए जीवों के प्रति अपने दायित्वों को समझते हैं। तभी तो यहां चिड़ियों को भोर उठते ही दाना चुगाने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। इसकी शुरूआत कब हुई, यह कोई नहीं जानता और न जानना चाहता है। इन लोगों को केवल यह मालूम है कि उनके पिता या बाबा के जमाने से सुबह होते ही चिड़ियों को दाना खिलाने का  पुण्य का यह काम होता चला आ रहा है। पहले उन्होंने इसको एक ड्यूटी समझकर करना शुरू किया था लेकिन अब उनको मजा आने लगा है। वजह यह है कि इस जमाने में जब मनुष्य एक-दूसरे पर यकीन करने से परहेज करता है तब सैकड़ों पक्षी इन दाना डालने वालों के इंतजार में न केवल सुबह से ही उनके दरवाजे पर मंडराने लगते हैं बल्कि इन लोगों के ऊपर तक बैठकर दाना चुगने में भी नहीं हिचकते।

इन लोगों में शामिल हैं निघासन के संदीप बाथम। यह युवा मिठाई व्यवसायी सुबह करीब छह बजे अपनी दुकान खोलने के बाद सबसे पहले नमकपारे, नमकीन, जलेबी या ऐसी ही अन्य बची हुई चीजें एक थैली में लेकर दुकान के बाहर खड़ा हो जाता है। इनके चारों तरफ चिड़ियों, कौओं और अन्य पक्षियों का झुंड मंडराने लगता है। दाना नीचे फेंकते ही पक्षियों के झुंड यहां उतरने लगते हैं। यह पक्षी संदीप के पास तक बैठकर दाना चुग लेते हैं। यही नहीं पक्षी उनकी आवाज तक पहचानते हैं।

यही करते हैं यहां के होटल मालिक मनोज गुप्ता। वह अपना होटल खोलने के बाद शाम का बची चीजें चिड़ियों को खिलाने के लिए एक थाल में लेकर खड़े हो जाते हैं। उनके आसपास भी चिड़ियों का झुंड इकट्ठा हो जाता है। सुबह होते ही पूरा चौराहा चिड़ियों की चहचहाहट से भर उठता है। हालांकि इन लोगों को अफसोस है कि अब  सिलगुटिया और कौओं की बहुतायत है। छोटी सी गौरैया के बहुत मुश्किल से और कभी-कभार ही दर्शन हो पाते हैं।

इस कस्बे में पक्षियों को दाना डालने की यह प्रथा कोई नई नहीं है। करीब पचास सालों से यहां के कई लोग इस कर्तव्य का निर्वहन करते चले आ रहे थे। पुण्य का काम समझकर करने वालों में यहां के व्यापारी स्व0 पं0 बनवारी लाल चौबिया, स्व0 हृदय नारायण शर्मा और स्व0 रामऔतार शर्मा शामिल थे। इन लोगों की कई सालों पहले मृत्यु हो चुकी है। लेकिन इनमें से बनवारी लाल चौबिया के पुत्र राधेश्याम चौबिया और रामऔतार शर्मा के बेटे हरीशंकर शर्मा अब भी अपने पिता के इस पुनीत काम को करते चले आ रहे हैं। सुबह होते ही यह लोग अपनी छतों या छप्परों पर रोटी आदि के छोटे-छोटे टुकड़े करके डाल देते हैं। इनको चुगने के लिए सैकड़ों पक्षी यहां इकट्ठे हो जाते हैं। हम पक्षी प्रेमी उनके बिना किसी पारितोषिक या प्रशंसा की इच्छा के लगातार किए जा रहे इस पावन काम और उनकी भावना को प्रणाम करते हैं।

 सुबोध पाण्डेय ( लेखक सामाजिक कार्यकर्ता एंव पत्रकार हैं, पेशे से कानून के पैरोकार हैं, जिला खीरी  की तहसील निघासन में निवास,  मौजूदा वक्त में हिन्दुस्तान दैनिक में निघासन तहसील के संवाददाता हैं। इनसे pandey.subodhlmp@gmail.com पर सम्पर्क कर सकते हैं)


Mar 18, 2011

घर के इस परिन्दे को बचाने की एक मुहिम- गौरैया दिवस- 20 मार्च

अन्तर्राष्ट्रीय गौरैया दिवस- 20 मार्च 
दुधवा लाइव ई-पत्रिका ने  पूरे वर्ष गौरैया सरंक्षण  का जन-अभियान चलाकर मनाया गौरैया वर्ष- 2010

दुधवा लाइव की एक मुहिम जो उत्तर भारत के तराई क्षेत्र के जनपदों में एक जन-अभियान के रूप में अपना व्यापक प्रभाव छोड़ा, दुधवा लाइव के सहयोग से इस बार खीरी जनपद में मितौली, मोहम्मदी, पलिया, धौरहरा, कस्ता, बेहजम आदि स्थानों पर विभिन्न कार्यक्रम वन्य-जीव प्रेमियों व आम-जनमानस द्वारा संपन्न कराये जायेंगे। इसके अलावा, पीलीभीत, शाहजहांपुर, सीतापुर, फ़ैजाबाद आदि जनपदों में जागरूकता अभियान चलाकर पक्षी प्रेमी, जन-समुदाय को जागरूक करेंगे, ताकि वह अपने इस घर-आंगन के पक्षी को सरंक्षित कर सके जो अनियोजित  विकास की भेट चढ़ रहा है, गौरैया की तादाद पिछले एक दशक में तीव्रता से घटी, नतीजतन पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों, पक्षी विशेषज्ञों का ध्यान नष्ट होती इस प्रजाति की ओर गया, खासतौर से इंग्लैंड के जन-मानस व पक्षी प्रेमियों ने इसकी संख्या का आंकलन करने की शुरूवात की और उन कारणों का पता लगाने का प्रयास किया जो इस चिड़िया की प्रजाति के लिए हानिकारक थे।

गौरैया को वापस लाने में ये बाते हो  सकती हैं, मददगार है-

१-घर व आस-पास की जगहों पर विदेशी झाड़-झंखाड़ लगाने के बजाए स्वदेशी पुष्प व फ़लदार पौधे लगायें, क्योंकि खूबसूरती के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले पौधे व वृक्ष अमूनन पक्षियों को भोजन उपलब्ध नही कराते। क्योंकि उनमें न तो फ़ल आते है और न ही उनके पुष्पों में पर्याप्त मकरंद व रस होता है। साथ ही अन्य कीट भी जो गौरैया का भोजन है, इन पौधों पर अपना जीवन यापन नही कर सकते।
 
२-कुकरबिटेशी प्रजाति का रोपड़ अत्यधिक किया जाए जिसमें लौकी कद्दू आदि।
३- घरों में ऐसा स्थान अवश्य छोड़े जहां गौरैया अपना घोसला बना सके, यदि ये स्थान पक्के व नव-निर्मित घरों में मौजूद नही है तो वहां लकड़ी आदि से निर्मित बाक्स बनवा कर लागाये जा सकते है, जो गौरैया को घोसला बनाने के लिए आकर्षित कर सकते हैं
५- पेस्टीसाइड का इस्तेमाल घरों व लॉन आदि में न करे, प्राकृतिक पेस्टीसाइड जैसे नीम का तेल आदि का इस्तेमाल करें।

 ६- याद रहे गौरैया के चूजे तभी जीवित रह सकते है, जब उन्हे मुलायम कीड़े खाने को मिल सके और यह तभी संभव है जब आप के घर देशी पौधे और बेलें हो जहां कीट अपना भोजन पा सके, और उन पौधों पर कीटनाशक का प्रयोग न किया जाए।

७- घरों की छतों पर, आंगन व दरवाजे पर पानी-दाना रखें ताकि पटते तालाबों और जमीन पर बिछते पत्थरों पर जहां बरसात का एक बूँद पानी भी नही ठहर सकता वहां ये आप के द्वारा रखी हुई पानी की बूंदें गौरैया ही नही वरन तमाम तरह के परिन्दों की प्यास बुझाएंगी---आप को लगता है कि इससे भी बड़ा कोई पुण्य होगा...कोई पूजा...कोई हवन......।

दुधवा लाइव डेस्क

Mar 14, 2011

तेंदुए के दो शावकों की ग्रामीणों ने पीट-पीट कर ली जान

फ़ोटो: मो० ज़ैद खान (गिरिजापुरी कालोनी बहराइच)
दुधवा के इतिहास में एक और दर्ज हुआ  काला अध्याय
 
कतर्निया रेंज में नही रूक रहा मानव- बाघ टकराव


अजीब इत्तफाक है, कतर्निया घाट में जिस दिन बाघों को बचाने के उद्देश्य से  बूढ़ी कारों का काफिला पहुंचा, उस दिन पास के गांव मे ही दो तेंदुओं को गांव वालों ने पीट कर मार डाला। इन्सान और बाघ के बीच में यहां काफी समय से लड़ाई चल रही है, जो दूसरे के इलाके में पहुंचा मानो जुर्म हो गया।


फ़ोटो: मो० ज़ैद खान (गिरिजापुरी कालोनी बहराइच)
शनिवार से था लोगों में गुस्सा

इसे खून का बदला खून कहें या कुछ और? शनिवार की बात है, श्रीरामपुरवा की पुष्पा उम्र २५ जंगल को लकड़ी लेने गई थी, घर पर पुष्पा का पति और एक साल का बेटा था, जंगल से वह वापस नही लौटी, एक बाघ ने पुष्पा को अपना शिकार बना लिया। गांव सिर्फ पुष्पा की लाश आई।


फ़ोटो: मो० जैद खान
 पुष्पा की चिता की आग अभी ठण्डी भी नही हुई कि रविवार को श्रीरामपुरवा से कुछ दूर बसे गांव बडख़रिया में दिन के लगभग २ बजे बाघ ने खेत मे पानी लगा रहे सोनू २० पर हमला कर दिया, साथ ही इसी गांव के फौजी ६३ और गीता ६० भी बाघ के हमले के शिकार बने। किसी तरह गांव वालो ने तीनो को बचाकर सुजौली के अस्पताल ले गये। लेकिन वहां कोई भी डाक्टर नही मिला। यहां भी ग्रामीणो का गुस्सा बढ़ गया, घायलो को प्राइवेट अस्पताल में भर्ती कराया गया।

दो दिन से बाघ के हमले से ग्रामीण यूं ही भड़के थे, कि आनन्द नगर और बडख़रिया गांव के पास एक गेंहू के खेत मे ग्रामीणों और तेंदुओ का आमना सामना हो गया। बताते हैं यहां चार तेंदुए एक साथ बैठे थे, खतरा भांप तेंदुए का व्यस्क जोड़ा तो भाग खड़ा हुआ, लेकिन कम उम्र के दो नर तेंदुए उग्र भीड़ के गुस्से का शिकार बन गये। लोगों ने  पीट-पीट कर दोनो शावको की जान ले ली।


 अब्दुल सलीम खान (लेखक युवा पत्रकार है, वन्य-जीवन के सरंक्षण में विशेष अभिरूचि, जमीनी मसायल पर तीक्ष्ण लेखन, खीरी जनपद के गुलरिया (बिजुआ) गाँव में निवास, इनसे salimreporter.lmp@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं)

Mar 10, 2011

माता का वाहन खतरें में !

माता पार्वती का वाहन संकट - बाघ संरक्षण पर एक व्यंग - अरूणेश सी दवे
वनविभाग के कुख्यात अधिकारी पन्नाश्री पाबला जी के दफ़्तर के सामने  शेहला मह्सूद , दिया बेनर्जी आदि की अगुवाई मे एक जनसभा चल रही थी मंच से वक्ता पानी पी पी कर वनविभाग और मुख्यमंत्री कॊ कोस रहे थे । वहा से गुजरते हुये भगवान जटाशंकर ने खतरे को भापते हुये नंदी को कलटी काटने का इशारा किया । लेकिन देर हो चुकी थी माता पार्वती की नजर पड़ गयी । उन्होने भगवान शिव से पूछा प्रभू माजरा क्या है इन लोगो ने मेरे वाहन बाघ की तस्वीरे अपने हाथो मे ली हुईं है और देखो एन डी टी वी की कैमरा टीम भी है जरूर मेरे वाहन पर कॊई संकट आया है ।

अब महादेव ने क्रोध के हथियार से मामले को दबाने पर विचार किया लेकिन आदतन नंदी महिला थाने के सामने पहुंच चुका था भाई सेवक भले भगवान का था पर दो टाईम का चारा तो माता से ही मिलना था । हार कर भगवान ने माता से कहा केवल १४११ बाघ ही बचे हैं । माता का चेहरा क्रोध से लाल हो उठा बोली ऐसे मे तो मेरे प्रति अवतार एक एक बाघ भी उपलब्ध नही होगा आप नाम बतायें दोषी का अभी मै उसका संहार कर देती हूं । भगवान ने उन्हे शांत करते हुये कहा दोषी तो मनुष्य जाती है पर गलती मेरी है । माता ने अचंभे से पूछा कैसे प्रभु ने कहा अपने जीसस अवतार मे मैने बुद्धि का पेड़ नही हटाया था और आदम ने मेरे मना करने पर भी उसका फ़ल खा लिया था । उसी कारण मनुष्यो ने प्रक्रुति के विनाश के नये नये तरीके खोज लिये नतीजतन बाघो की संख्या मे भारी गिरावट आ गयी है। माता ने कहा गलती आपकी है तो सुधार भी आप करो मैं कुछ नही जानती मुझे कम से कम १०००० बाघ चाहिये बस । प्रभु ने कहा मजाक है क्या मुह से निकला और हो गया अरे भाई जंगल ही नही तो बाघो का भोजन कहां से आयेगा ।

माता ने दिव्य द्रुष्टी डालॊ और तुरंत भोलेनाथ पर फ़ट पड़ीं - " विश्व महिला दिवस पर भी आप झूठ बोलने से बाज नही आये भारत मे  6 ,78,000 वर्ग किलोमीटर का जंगल है और आप कहते हो जंगल नही है "। प्रभु सकपकाये और उन्होने भी दिव्यद्रुष्टी का प्रयोग किया  फ़िर मुस्कुराते हुये बोले अरे भाई तुम भी हड़बड़ी मे गड़बड़ी करती हो ध्यान से देखो जिसे तुम जंगल कहती हो दरअसल वो तो सागौन साल नीलगिरी आदी इमारती लकड़ी के प्लांटेशन हैं इन इमारती लकड़ी के पेड़ो के पत्ते , फ़ल और फ़ूल खाध थोड़ी होते हैं कि उन्हे हिरण आदि खाये और तो और इनके नीचे घांस और छोटी झाड़िया भी नही उग पाती हैं हां लैंटाना जैसी बेकार खरपतवार उग जाती है । माता भी कहां पीछे हटती उन्होने कहा अब आप कहोगे की कान्हा राष्ट्रीय उद्यान भी प्लांटेशन है प्रभु ने तुरंत हामी भरी अब विजयी मुस्कान से माता ने कहा अगर कान्हा  भी प्लांटेशन का जंगल है तो वहां सौ बाघ कैसे जीवित हैं मेरे तथाकथित महान प्रभु । प्रभू भी अनुत्तरित थे उन्होने आखिरी लाईफ़लाईन का प्रयोग करते हुये फ़िर से जादुई नजर डाली फ़िर संतोष पूर्वक बोले प्रिये वहां से आदिवासियों को हटा दिया गया है और उनके गांव घास के मैदान बन चुके हैं इन्ही मैदानो मे वो हिरण बसते हैं जिनको खाकर वे बाघ जिंदा हैं ।

अब माता बिफ़र गयीं रांउड रांउड बात मत कीजिये प्रभु बाघ जंगल आदिवासी दंद फ़ंद ये सब मुझे नही मालूम मुझे १०००० बाघ चाहिये बस । प्रभु क्रुपाशंकर ने प्रेमपूर्वक कहा प्रिये तुमसे शादी करने के बाद कॊई राउंड नही है पर अकर्म से कॊई भी काम करना भी मेरे बस मे नही । कही भी बाघ होने का मतलब हैं कि वहां शाकाहारी वन्यप्राणी हो और उनके लिये स्वस्थ पर्यावरण तंत्र का होना जरूरी है जो इन वन्यप्राणियो को भोजन दे सके । हां मै तुमको राह सुझा  सकता हूं ध्यान से सुनो बाघो की संख्या १०००० पहुचाने के तीन रास्ते हैं पहला रास्ता ५००० आदिवासी गांवो मे रहने वाले एक करोड़ लोगो को विस्थापित करना ताकी उनके खेत घास के मैदान बना कर हिरणो को भोजन उपल्ब्ध कराया जा सके , दूसरा भारत के समस्त  वनो कॊ फ़ल और फ़ूल दार पेड़ो से युक्त मूल प्राक्रुतिक वनो मे तब्दील करना तीसरा --- तभी माता ने टोका वाह क्या इससे भी मुश्किल और श्रमसाध्य तरीका खोज रहे हो । प्रभु मुस्कुराये और कहा लो भागवान मै आसान राह बता देता हूं इन ५००० गांवो मे रहने वाले किसानो से घास की खेती करवाई जा सकती है और धीरे धीरे प्राक्रुतिक वनो के पुर्नस्थापन के कार्य मे लगाया जा सकता है ।

माता ने पूछा और घास की खेती करने वह घास बिकेगा कहां प्रभु ने जवाब दिया वह घास वन्यप्राणियो और गांव के पशुओ के लिये होगी और  घास की खेती मे लागत और श्रम कुछ नही है और प्रति एकड़ धान की खेती मे होने वाला १०००० का फ़ायदा तो सरकारी सबसीडी से ही आता है उसी सबसीडी को नकद भुगतान किया जा सकता है। और रही बात दीगर खर्चो की वह तो जिन इमारती पेड़ो को काट कर हटाया जायेगा उनको बेच कर  ही पूरा हो जायेगा । इस विधी का प्रयोग करने से आदिवासियो को हटाना भी नही पड़ेगा और एक बार प्राक्रुतिक वन स्थापित हो गये तो वनवासियो का जीवन उनसे और पर्यटन से खुशहाल हो ही जायेगा ।

प्रभु ने माता से कहा कि उपाय मैने बता दिया है अब तुम नेताओ और वनाधिकारियो को समझाकर यह कार्य संपन्न कराओ । माता के जाते ही प्रभु ने चैन की सांस ली और नंदी से कहा चल भाई अब कम से कम १०० साल तक माता सरकारी दफ़्तरों के चक्कर लगाती रहेंगी तब तक  कैलाश चल कर कुवांरी जिंदगी का आनंद लिया जाय ।

Mar 7, 2011

वे कोंदो, जामुन, और प्याज खाकर रहे जिंदा

"मुकद्दर में लिखा के लाये हैं दर-बदर फिरना
परिंदे कोई मौसम को परेशानी में रहते हैं"
गुरबत की कहानी, वनटांगिया की जुबानी
- भूंख से बिलबिलाते बच्चे देखकर बाप बना था चोर
-बीते लम्हों को याद कर लरजे होंठ और भीग गई पलके
(अब्दुल सलीम खान की एक टांगिया से हुई बातचीत पर आधारित)

गोला गोकरण नाथ के टांगिया गांव से। पिछले ५० साल से खानाबदोशों की जिंदगी बसर कर रहे वन टांगियों ने मौसम के हर तेवर झेले हैं। कभी भूंख से बिलबिलाते बच्चों को देखकर मजबूर एक बाप रोटी चोर बन जाता है। तो जेठ की तपिस में भूंखे पेट खेतों में मिट्टी के ढेले फोड़ रहे अपने शौहर के लिए बीबी कई फिट ऊंचे पेड़ो से जामुन तोड़कर लाती थी। तो कभी फसल के बीज जब खराब निकल गये तो पूरे साल बेल,तेंदू, जामुन और आम के फलों के सहारे खुद को और बच्चों को जिंदा रखा। तब जाकर यह लहलहाते खीरी की शान जंगल जिंदा हुए।

याद आये लम्हे तो बरस पड़ी आंखे
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गोला रेंज के टांगिया के लोगों से जब पुराने दिनो को कुरेद कर बात की गई तो कई अनछुए पहलू सामने आये। बातों-बातों में टांगियों की आंखे भर आई लेकिन हमारी भी आंखो की कोरे आंसुओं से गीली हो गई। बुजुर्ग त्रिभवन से पूंछा कैसे गुजरे थे शुरूआती दिन? बूढ़ी आंखो कुछ सोचने लगी बोले कि सन् ६२ में जब हमें भीरा रेंज में जंगल चैनी कर वृक्षारोपण के साथ खेती की जगह दी गई, तो हम लोग अपने घर से कोदो, सावां, काकून,मक्का, मेंडुआ,के बीज लाये थे। किस्मत खराब थी, फसल के साथ बांस जम गया, भीरा रेंज में वह बांस का जंगल इस बात की आज भी गवाही देता है। फसल खराब होने से भूंखे मरने की नौबत आ गई, कुनबे के पट्टू उनकी पत्नी समेत बच्चे तीन दिन तक भूंख से छटपटाते रहे। भूंखे बच्चों की बेबसी पट्टू से देखी न गई, और वह भीरा में चक्की से आंटे की बोरी लेकर भाग खड़ा हुआ। पीछे से आई भीड़ ने जंगल के पास ही पट्टू को पकड़ लिया, गुस्साई भीड़ को देखकर बेबस बाप के लरजते होंटो से सिर्फ  इतना निकला कि हम चोर नही है,बच्चे भूंख से मरे जा रहे है, इस लिए चोर बन गये। भूंखे परिवार की हालत देखकर आंटा चक्की वाले ज्ञानी जी ने दो पसेरी आंटा देकर उन्हें भूंख से तब मरने नहीं दिया।

ऐसी बेबसी कि जामुन और प्याज से मिटाई भूख
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६५ साल के रम्मन काका बोले बात उन दिनो की है जब महकमें ने जंगलात को चैनी कर खेती करने के लिए दिया था, गोरखपुर से लाये हुए मक्का, कोदो को खाकर दिन गुजार रहे थे, खेत तैयार करने में कहीं फावड़े, कहीं हांथो से ही ढेले फोडऩे पड़ते थे। ऐसे भी दिन थे जब घर के मर्द  भूंखे पेट खेत में काम करते थे, तो उनकी औरतें जामुन के पेड़ो से जामुन तोड़कर एक टाईम के खाने का बंदोबस्त होता था। तो शाम के खाने में नमक लगे प्याज के टुकड़े से मियां बीबी की भूंख मिटती थी। धीरे-धीरे कुछ इस तरह बुरा वक्त बीत गया, और लाखों पेड़ इनके हांथो से जिंदगी पा गये। लेकिन यह बेचारे आज भी गुरबत भरी जिंदगी जी रहे है।





अब्दुल सलीम खान (लेखक युवा पत्रकार है, वन्य-जीवन के सरंक्षण में विशेष अभिरूचि, जमीनी मसायल पर तीक्ष्ण लेखन, खीरी जनपद के गुलरिया (बिजुआ) गाँव में निवास, इनसे salimreporter.lmp@)gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं)

Mar 5, 2011

एक बच्चे के कुछ अनुत्तरित सवाल अपनी माँ से....

कुछ सवालों के जवाब शायद आप दे सको ...........

माँ मैं कौन हूँ? एक बच्चे ने अपनी माँ से पूछा, माँ ने कहा मेरे बच्चे तुम इस जंगल के राजा हो! बड़े होकर जंगल पर राज करोगे, तो क्या में अभी भी जंगल का राजा हूँ? बच्चे ने पूछा, हाँ बिल्कुल हो माँ ने जवाब दिया! तो फिर जब वो दूसरा जानवर आता है, तो हम उसे देखकर क्यों छुप जाते है? क्या वो हम से ज्यादा ताकतवर जानवर है? नही माँ ने कहा वो इस दुनिया में सबसे शातिर दिमाग का जानवर है..............
वो पूरी दुनिया पर राज करता है, हम इस जंगल के राजा है सिर्फ़ एक दूजे के लिए उसके लिए नही, क्योकि अगर हम राजा है तो वो तभी तक है जब तक वो कहता है और नही तो एक ही पल में हमारी जिन्दगी को ख़त्म कर सकता है, लेकिन माँ प्रकृति ने तो सब को बराबर हक दिया है और सबको अपनी मर्जी से जीने का और इस धरती पर रहने का हक है तो फिर वो कौन होता है? हमारी जिन्दगी का फ़ैसला करने वाला? मेरे बच्चे  तुम अभी बहुत छोटे हो नही समझोगे! माँ ने कहा। फिर मुझे पता कैसे चलेगा माँ? जब तुम बड़े हो जाओगे तो खुद सब कुछ जान जाओगे कि ये दुनिया क्या है, और तुम क्या हो! माँ ने कहा जब कुदरत ने सबको बनाया था, तो सब का पूरा ख्याल रखा था, एस धरती पर कुदरत की बनाई कोई चीज बेकार नही है, हर किसी की जरुरत है इस धरती पर उसने पेड़-पौधे,जानवर,पानी,पहाड़,किट-पतंगे बनाये!
फिर वो कौन है माँ? मेरे बच्चे उसे इन्सान कहते है! वो कहा रहता है माँ? कहने के लिए तो वो इस जंगल से बाहर रहता है, उसे दो पैरो वाला जानवर कहते है, वो बड़ा ही खतरनाक है! 
क्या वही राजा है इस धरती का? माँ ने कहा नही वो कुछ नही है इस धरती पर बिना हमारे, पर वो खुद को इस धरती का मालिक समझ बैठा है, उसे ये पता है के वो हमारे बिना कुछ नही है, पर वो इस बात को कभी नही मानेगा, उसने कुदरत का नियम तोडा है,  उसने सब कुछ ख़त्म कर दिया ताकि वो इस धरती पर राज कर सके, बिना ये सोचे के दुसरो को भी जीने का उतना ही हक है जितना कि उसे है! लेकिन माँ हमने तो कुदरत का कोई नियम नही तोडा फिर हमे क्यों सजा मिलती है? क्योकि कुदरत ने सबको एक दूसरे के लिए बनाया था।

धरती पर हर कोई एक दूसरे के बिना अधुरा है, हम सब एक है, नियम चाहे  कोई भी तोड़े सजा तो सभी को मिलेगी! क्या मुझे भी?? मैने क्या किया? क्योकि अब ये दुनिया इंसानों के हाथ में है वही धरती का हमारा विधाता बन बैठा है, वो चाहे जो करे सजा सिर्फ़ हमें ही मिलेगी! मुझे तो ये भी नही पता कि मैं अगले ही पल तुम्हारे लिए खाना  लेने गई तो वापस तुम्हरे पास लौटूगी कि नही! क्यों माँ वो तुम्हे क्यों मरेगे? और तुम्हे कुछ हो गया तो मैं ..................माँ ने कहा बच्चे वो ये समझता है कि धरती पर हमारा कोई कम नही, हम सिर्फ़ उनके इस्तेमाल  के लिए ही इस धरती पर है! ये इस्तेमाल क्या है ?
ये क्या है माँ? वो हमे मरकर हमारे जैसा बनना चाहता है वो ये सोचता है के कुदरत ने हमे उनके इस्तेमाल के लिए बनाया है, हमारी खाल को अपने ऊपर सजाना चाहता है! लेकिन माँ हम भी तो दूसरे जानवरों को मारकर खाते है क्या तब कुदरत का नियम नही टूटता?  नही बच्चे हमने कभी कुदरत का नियम नही तोडा हम सिर्फ़ उतना लेते है, जितनी हमें जरुरत है, हम जानते है, अगर हमने सब कुछ आज ही ख़त्म कर दिया, तो कल किसी के लिए कुछ नही बचेगा! माँ क्या ये बात इन्सान नही सोच सकता ? अपने तो कहा के उसका दिमाग बहुत तेज है, तो क्या वो इतनी सी बात नही समझ सकता? 
तो फिर हम क्यों इंसानों के बनाये नियमो का पालन क्यों  करे? जो सिर्फ़ उनके लिए सही है, उनका गलत काम भी और जो हमारी जरुरत है वो उनके लिए गलत है? अगर वो हमे अपने घर में बर्दाश्त नही कर सकता तो फिर हम क्यों करे? जब वो हमे पकड़कर ले जाते है, अपने घर तब भी हमे ही सजा मिलती है? और जब वो मेरे घर में आते है तो भी हमें ही क्यों सजा मिलती है? क्यों? माँ मुझे राजा नही बनना है। 

मैं सिर्फ़ आपके साथ रहना चाहता हूं, आजादी से रहना चाहता हूँ, और कुछ नही, क्या मैने इस दुनिया में आकार कोई गलती की है? क्या मुझे जीने का कोई हक नही? 

क्या मेरी यही गलती है, कि मैं इन्सान नही? क्या इसी लिए हमे सजा मिलती है? हमारी यही गलती है, कि हम इन्सान की तरह मतलबी नही? क्या हमेशा वही हमारी जिन्दगी का फ़ैसला करता रहेगा? क्या मैं भी एक दिन आपका इंतजार करता रहूंगा? .........

....या आप मुझे खोजती रहेगी और मैं आपको कही नही मिलूंगा?  शायद मैं जब कुछ टाइम के बाद उनके घर जाऊंगा तो आपको उनकी दिवार से टंगा पांऊगा और उसकी दूसरी दिवार पर मैं.....!? 

क्यों माँ?  माँ बस यही मेरी दुनिया है? मुझे तो कुछ नही चाहिये दुनिया में आपके सिवा?? माँ-माँ-माँ-माँ??.............
उसे कोई जवाब नही मिला!

...कहाँ गई उसकी माँ उसे छोड़कर? मासूम बच्चे के मासूम सवालो के जवाब कोई दे सकता है? उस मासूम की आँखों में देखो, 
क्या वो हमारा गुनहगार था? वो अपनी माँ के बोलने का इंतजार कर रहा है!  
क्या कोई जायेगा उसे प्यार करने के लिए? 
उसकी माँ की जगह लेने के लिया? उसके सवालो का जवाब देने के लिए? कोई दे सकता है मेरे सवालो का जवाब???

सुरेश बरार (लेखिका गुड़गांव में रहती हैं, ताईकांडों सीखना व सिखाना इनका मनपंसद कार्य है, वन्य जीवों से प्रेम, अभी तक ताईकांड़ों जैसी विशेष कला में तमाम एवार्ड अर्जित कर चुकी हैं, वन्य जीवन के सरंक्षण में कार्य करने वाली कई राष्ट्रीय एंव अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं से जुड़ी हुई हैं, इनसे  brar.suresh@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।)

Mar 1, 2011

मेरी शाख पर बने बया के उस घोंसले को तो जरूर बचा लेना...


आदमी हो, कर दोगे एक साथ, कई-कई हत्याएं...
 - योगेन्द्र कृष्णा
**********************
काटने से पहले
लकड़हारे ने पूछा
उसकी अंतिम इच्छा क्या है

वृद्ध पेड़ ने कहा

जीवन भर मैंने
किसी से कुछ मांगा है क्या
कि आज
बर्बर होते इस समय में
मरने के पहले
अपने लिए कुछ मांगूं

लेकिन

अगर संभव हो
तो मुझे गिरने से बचा लेना
आसपास बनी झोपिड़यों पर

श्मशान में

किसी की चिता सजा देना
पर मेरी लकड़ियों को
हवनकुंड की आग से बचा लेना

बचा लेना मुझे

आतंकवादियों के हाथ से
किसी अनर्गल कर्मकांड से

मेरी शाख पर बने

बया के उस घोंसले को
तो जरूर बचा लेना

युगल प्रेमियों ने

खींच दी हैं मेरे खुरदरे तन पर
कुछ आड़ी तिरछी रेखाएं

बड़ी उम्मीद से

मेरी बाहों में लिपटी हैं
कुछ कोमल लताएं भी

हो सके तो बचा लेना

इस उम्मीद को
प्रेम की अनगढ़ इस भाषा
इस शिल्प को

मैंने अबतक

बचाए रखा है इन्हें
प्रचंड हवाओं
बारिश और तपिश से
नैसर्गिक मेरा नाता है इनसे
लेकिन डरता हूं तुमसे

आदमी हो

कर दोगे एक साथ
कई-कई हत्याएं
कई-कई हिंसाएं
कई-कई आतंक

और पता भी नहीं होगा तुम्हें


तुम तो

किसी के इशारे पर
काट रहे होगे
सिर्फ एक पेड़... 



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योगेन्द्र कृष्णा (लेखक साहित्यकार है, कवि, कहानीकार व समालोचक, अंग्रेजी में शिक्षा प्राप्ति के बावजूद हिन्दी में बेहतरीन लेखन, "खोई दुनिया का सुरंग", "बीत चुके शहर में" इनके प्रमुख काव्य संग्रह, "स्मृतियों में टाल्स्टाय" (Tr. of Reminiscences of Tolstoy by his son Ilya Tolstoy), "गैस चैम्बर के लिए कृपया इस तरफ़" (Translation of Nazi Concentration Camp stories ' This Way for the Gas Ladies and Gentlemen ' by the Polish writer Tadeusz Borowski) जैसी महत्वपूर्ण कृतियों का अनुवाद, पटना बिहार में निवास, इनसे  yogendrakrishna@yahoo.com पर सम्पर्क कर सकते हैं  )


मरती नदियां मरते लोग..


नदी बांध परियोजनायें है पानी व किसान की मौत !


मर रही नदियों का जिम्मेदार कौन?
प्रवास संस्था ने नदियों को बचाने का लिया संकल्प...

तो फिर होगे 6700 किसान विस्थापित, कुछ कर रहे है आत्मदाह तो बाकी है तैयारी में, मुवावजे और पुर्नवास की जद्दोजहद में आंदोलन शुरू, कैसे बनेगा संभावित बिन पानी बुंदेलखंड राज्य आत्मनिर्भर, विदेशी कंपनी - सरकारे तय करेगी पानी का मोल, अनसुलझे तथ्यों को ढोती ये करोडो की परियोजनायें, बांध परियोजना में प्रस्तावित है 806.50 करोड रू0 जिसमें की परियोजना विस्तार में 2009-10 की समयावधि तक 24.30 करोड रू0 केन्द्रीय अंशदान में जारी किये जा चुके है तथा 160.315 करोड रू0 2010-11 के लिये अनुदानित राशि रिलीज की जा चुकी है इस परियोजना के प्रभाव क्षेत्र मे शामिल है 59 बडे व अन्य छोटे मजरे मिलाकर कुल 112 गांव जिनमें कि बांदा के 9 , हमीरपुर 29, महोबा 21 और डूब क्षेत्र में आते है महोबा जनपद के कबरई इलाके में बसने वाले 4 गावों के बासिंदे जिनमें कि झिरसहेबा, गंज , अलीपुरा, गुगौरा इस लिंक बांध की कुल लम्बाई है 165.40 कि0मी0 लेकिन उचित मुवावजे को नजरअंदाज करने वाली शासन सरकारो के विरोध मे लामबंद हुये किसान मांग रहे है बतौर विस्थापन , पुर्नवास की कीमत सात लाख रू0 प्रति हेक्टेअर भूमि मगर सरकार ने दी सरकुलर रेट के मुताबिक कहीं पर 2.20 लाख तो कहीं पर 4.5 लाख प्रति हेक्टेअर ।

पलायन और तबाही का मंजर
तो फिर गुजरे 17 सूखे झेल चुके बुंदेलखंड के किसान एक मर्तबा फिर केन्द्र सरकार व राज्य सरकार द्वारा बुदेलखंड क्षेत्र विशेष के लिये सिंचाई के माकूल संसाधन उपलब्ध कराने के लिये बनायी जा रही अर्जुन सहायक बांध परियोजना के चलते विस्थापित होगे, पुर्नवास के लियेजद्दोजहद करेगें फिर चाहे भले ही इसकी कीमत उन्हे आत्मदाह, आंदोलन और जनआक्रोश के द्वारा सडको , खेतो, प्रशासनिक अमलो के सामने विरोध के रूप में प्रस्तुत करनी पडे। बताते चले कि बिन पानी बुदेलखंड में अब तक वर्ष 1887 से लेकर 2009 तक कुल 17 सूखे जिनमें की 2005-06 का भयावह अकाल भी शामिल है के बावजूद यहां के किसानो के लिये सरकार ने न तो उनकी आत्महत्या की पूरी कीमत चुकायी और न ही भूमि अधिग्रहण किये जाने के बाद उन बदहाल किसानो को पूरा मुवावजा दिये जाने का कदम उठाया है। आखिर क्या करें बुंदेलखंड का गरीब किसान जिसके पास न तो वर्ष का बीज उपलब्ध होता है और न ही घरो में भूख से टूटते परिवारो को बचाने के लिये दो जून की रोटी ये बात अलग है कि कहीं पर इस अकाल से उबरने के लिये बुंदेलखंड की वीर महिलाये मुफलिसी और अकाल से निजात पाने के लिये अपने ही गांव में पिता को कर्ज से दबा देखकर आत्महत्या करने की तरफ बढते हुये कदमो को रोकने के लिये दादरे की आखत जैसे तत्कालीन लेकिन वैकल्पिक उपायों का सहारा लेती है।

    गौरतलब है कि सूचनाधिकार अधिनियम 2005 के तहत केन्द्रीय जलायोग के निदेशक श्री जोगेन्दर सिंह ने दी गयी सूचनाओं के अनुसार बताया है कि अर्जुन सहायक बांध परियोजना की कुल लागत प्लानिंग कमीशन कंे अनुसार 806.50 करोड रू0 है जिसके लिये 90 फीसदी केन्द्र सरकार व 10 फीसदी राज्य सरकार का रू0 अनुदान राशि में सम्मिलित किया गया है। परियोजना विस्तार में 2009-10 की समयावधि में 24.30 करोड रू0 व 2010-11 के लिये 160.315 करोड रू0 जारी किये जा चुके है। उन्होने बताया कि इस लिंक को बुंदेलखण्ड क्षेत्र के महोबा जनपद की धसान नदी से जोडकर 38.60 कि0मी0 लम्बी नहर लहचुरा डैम जिसकी क्षमता 73.60 क्यूमिक पानी को रोकने की है से अर्जुन बांध में मिलाया जायेगा तथा 31.30 कि0मी0 लम्बी लिंक नहर अर्जुन बांध से नये कबरई बांध जिसकी क्षमता 62.32 क्यूमिक पानी रोकने की है को शिवहार चंद्रावल बांध से मिलाते हुये जनपद बांदा की केन नहर से जोडा जाना प्रस्तावित है । वर्षा जल संग्रहण के मद्देनजर बरसात मे कबरई डेम 9.23 मी0 से 163.46 मी0 जलस्तर बडने पर 1240 हेक्टेअर मी0 से 13025 हेक्टेअर मी0 तक की भूमि को कृषि के लिये सिंचाई का जल उपलब्ध करायी जाने की परियोजना की डी0पी0आर0 में बात कहीं गयी है। वहीं इस पूरी नहर बांध की कुल ल0 165.40 किमी0 है जिसमें 50 किमी. नये कबरई बांध व 115.40 किमी0 अन्य विस्तारित माइनर की लं0 रखी गयी है। 


सूखे कुएं

इस परियोजना बांध मे कुल 149, 764 हेक्टेअर भूमि समतली करण के अध्रिग्रहण का प्रस्ताव  है जिसमें कि वार्षिक समतलीकरण 59, 485 हेक्टेअर भूमि महोबा क्षेत्र से ली जानी है इन जमीनो के अधिग्रहण को लेकर जहां एक तरफ प्रभावित क्षेत्र के कुल 112 गांव जिनमें की जनपद महोबा से करबई , कबरई , मरहटी, टोला उत्तर, गोहारी, कैमहा , इमलहाई , सिरसीकलां, कहला, बंहिंगा , सिरसीखुर्द , बधवा , नहदौरा, घंडुवा , तिदुही, खिरूही, नायकपुरवा, अतघार, पचपहरा, खम्हरिया, रूपनगर, अकगेहा, घुटवई , राइलपुर, बेरीखेडा ,सुदामापुरी , उदयपुरा, इमलीखेरा, बनमेथा, इटवा, सुईजना, फतेहपुर, इमलिया डाड़ , दयालपुरा , बगरौन , छिकहरा, बरातपहाड़ी, गंज, गुगौरा एवं जनपद हमीरपुर के खंडेह अकबई, जिनौड़ा, इचौली, गुसियारी, अडाईपुरवा, कपसा, टिकरी बुजुर्ग , भटरी, तिदुआ, चांदीखुर्द , बेहरका, सिजवाही, घटकना, पाखून, लेवा, बेजेमऊ, किसवासी, परहेटा व बांदा के नूरपुर , मोहनपुरवा, उजरेहटा, गोयरामुगली, अछरौड़ , त्रिवेनी, उजरेहटा, सुरौली बुजुर्ग , सुरौली खुर्द , अमरौली के साथ छोटापुरवा जैसे बडे छोटे गांव लिंक क्षेत्र में आते है।

मगर क्या करे उन किसानो का जो बीते 6 माह से इस भूमि अधिग्रहण काला कानून जो के बिट्रिश शासन की देन है से आजिज आकर अधिग्रहण की मार झेलते हुये अपने मुवावजे की मांगे कर रहे है। केन्द्र सरकार के मुताबिक बांध क्षेत्र के लिये ली गयी जमीनो का मुवावजा 2.20 लाख प्रति हेक्टेअर सरकुलर रेट के तहत है लेकिन यह कही पर 4.5 लाख प्रति हेक्टेअर भी दिया गया है जिनमें गंज ,धरौन , गुगौरा, जैसे गांव आते है। कहीं कहीं सरकार की पक्षपातपूर्ण नीति से किसानो में आपसी असंतोष भी उपजा है इसी के चलते ग्राम झिरसहेवा के युवा किसान रामविशाल कुशवाहा ने गुजरे दिवस नायब तहसीलदार सदर एम0 ए0 फारूकी के सामने धरना प्रदर्शन के समय कैरोसीन का तेल डालकर आत्मदाह कर लिया मौके पर मौजूद किसानो ने बताया कि तकरीबन 100 मी0 तक मृतक किसान आग का गोला बनकर नेशनल हाइवे 76 की तरफ दौड पडा लेकिन किसी की भी इतनी जहमत नही हुयी कि वो उसकी जिंदगी को बचा पाता वहीं नायब तहसीलदार इस घटना को देखकर मौके से फरारा हो गये। आज भी इस बांध परियोजना से आहत किसान एकजुट होकर संघर्ष पर उतारू है। हाल कुछ भी हो इन किसान आंदोलन का पर तयशुदा है कि वर्ष के 6 महीनो में पानी को निहारते पत्थर वाली नदियां भला कैसे बांध परियोजना से किसानो के लिये सिंचाई का पानी मुहैया करा पायेगी। आधे अधूरे अध्ययन और प्लानिंग कमीशन में बैठे आला अधिकारियों को न तो देश प्रदेश की भूगौलिक क्षेत्रो का अनुमान होता है और न ही वहां कि परिस्थिति का आंकलन फिर कैसे और क्यों तैयार होती है नदी बांध परियोजनायें जो कि पानी व किसान की मौत का एक मात्र कारण है।


आशीष दीक्षित "सागर" (लेखक सामाजिक कार्यकर्ता है, वन एंव पर्यावरण के संबध में बुन्देलखण्ड अंचल में सक्रिय, प्रवास संस्था के संस्थापक के तौर पर, मानव संसाधनों व महिलाओं की हिमायत, पर्यावरण व जैव-विविधता के संवर्धन व सरंक्षण में सक्रिय, चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय से एम०एस० डब्ल्यु० करने के उपरान्त भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय के उपक्रम कपाट में दो वर्षों का कार्यानुभव, उत्तर प्रदेश के बांदा जनपद में निवास, इनसे ashishdixit01@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं)

विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
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दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था