International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Save Tiger

DON'T LET WILD TIGERS DISAPPEAR

Lady Rosetta

Potatoes with low sugar content and longer shelf life.

अबूझमाड़ के जंगल

जहां बाघ नही नक्सली राज करते हैं

खवासा का आदमखोर

जहां कांपती थी रूह उस नरभक्षी से

जानवर भी करते हैं योग

योगाचार्य धीरज वशिष्ठ का विशेष लेख

Dec 31, 2011

मूर्ति पूजा- एक जानवर की कहानी


इसलिए करते हैं हम मूर्ति पूजा

    एक बात तो है कि जो मजा चोरी से अपनी पसंद से तोडकर गन्ना खाने में है, वो पूछकर लेने में तो बिल्कुल भी नही। यही सोचकर मैं और मेरा छोटा भाई दूसरे गांव के गन्ने के खेत में घुस चुके थे। सबसे अच्छी किस्म का गन्ना था वो। ललचाई नजरों से हमने कईंयों गन्ने देखे पर बेहतर ना मिला। इसी खोज बीन में उस शाम हम जंगल की गहराईयों में उतरते चले गये।

    भगवान कसम ! हम दोनों ही भूल चुके थे कि आगे जाना बिल्कुल भी खतरे से खाली न होगा। तभी मुझे महसूस हुआ कि भाई मेरे आसपास नहीं है। मैंने इधर-उधर देखकर उसे आवाज दी तो उसने और भी अगले खेत से मुझे पुकारा-
“आगे आओ भाई ! यह गन्ना और भी अच्छा है, जल्दी आओ” इससे बेहतर मेरे लिए और क्या हो सकता था। मैं दौडकर उसके पास गया। हम खोजते हुए बस दो ही कदम बमुश्किल चले होंगें हमे अपने आस-पास कुछ सुगबुगाहट महसूस हुई। फिर लगा जैसे किसी शेर ने डकार भरी हो। मेरी और मेरे भाई की सांसें जस की तस थम गई। शरीर में रक्त की गति करीब दस गुनी हो गई थी। अगले ही पल महसूस हुआ कि उस विशालकाय प्राणी ने एक करवट बदली है।

    भाई ने फटी आँखों से मेरी आँखों में झांका, उसके चेहरे पर विस्मय और अजीब से भय की छाया थी। देर सवेरे कहीं जाना हो, किसी को तलब करना हो तो वो हमेशा आगे रहता है। पर यह कोई इन्सान नही बल्कि कोई खूंखार जानवर लगता है। और हमारे पास एक कील तक नही उसका सामना करने के लिए। मेरी भी धडकनें बेकाबू थी, मैंने उसे इशारे से समझाया।

        “लम्बी सांसें लो और अपने पैरों पर चढती चींटियों को फिलहाल नजर अन्दाज करके बडे आराम से अपनी बैल्ट निकाल लो, मेरे पैर के नीचे दो पत्थर जैसा कुछ है, मैं उन्हें भी उठा लेता हूँ, चप्पलें निकाल कर हम आराम से भाग निकलेंगे। जबकि जानवर बडा है, उसे भागने में दिक्कत होगी। अब आराम से पैर पीछे रख, करीब दस कदम हटने के बाद हम भागेंगे।”
और हमने वैसा ही किया भी, लेकिन जैसे हम चार-एक कदम पीछे हटे होंगें कि तभी एक सांप जैसा कुछ हमारे पैर के नीचे से सर्रर्रर्र...ऽऽऽऽऽ से निकला, हम दोनों भाईयों की तो चींख ही निकल गई। हम धडाम से एक-दूसरे को थामे नीचे गिरे। दिमाग सुन्न और हाथ-पैर ठण्डे हो रहे थे। एक बार आसमान की तरफ देखा तारे उपजने लगे थे। मन में यही आया कि बोल दूं-
“हम भी आ रहे हैं”।

    भाई ने कहा- “हम घर भी बताकर नहीं आए भाई”.........चुप यार ! सांप चला गया उसने शायद हमें नही काटा.........तू डर..........और इससे पहले कि मैं उसे “डर मत” बोल पाता, गन्नों को ताबडतोड रौंदता हुआ वो विशालकाय हमारी तरफ बढा। हम तो जहाँ-के-तहाँ पडे ही थे। मारे भय के दूसरी चींख निकली। वो जानवर भी हम पर चिल्लाया। पर इस बार हम नहीं चींखें क्योंकि हम जान गये थे कि यहाँ हमें सुनने वाला कोई नहीं है। हमने एक-दूसरे को कसकर जकड रखा था। अंधेरे में उसको पहचानना मुश्किल था। वो दौबारा झल्लाकर आगे बढा और इस बार हम दोनों खडे होकर पीछे को भागे ही थे कि वो जानवर धम्म-से धरती पर गिर पडा। और इस बार उसकी जो करूणामयी पुकार निकली वो वास्तव में हृदय विदारक थी, हमसे पीछे मुडे बिना रहा नही गया। वो खुद से जुझ रहा था। उसकी आवाज इस बार हम पहचान गये थे क्योंकि डर थोडा इतर हो चुका था।

    वो तो एक हष्ट-पुष्ट सांड था। हम उसके करीब पहुँचे। हमने हाथ लगाने से पहले दूर से ही उसको चुमकारना शुरू किया। उसने भी धीरे-धीरे हामी भरनी शुरू कर दी। भाई ने मुझसे कहा-
“भाई ! वो सांप नही रस्सा था ! देखो रस्से से इसकी गर्दन और अगले पैरों को एक साथ बांधा गया है।”

    वाकई उसको बुरी तरह से रस्सों में जकडा गया था। वो अपना एक पिछला पैर बार-बार पटक रहा था। मैंने महसूस किया कि उस जगह पर कोई धारदार हथियार भौंका गया होगा। हमें सबसे पहले इन रस्सों की जकडन से मुक्त कराना था, लेकिन रस्से एक तो भिगने की वजह से और दूसरे उसकी बेहिसाब झटपटाहट के कारण ऐंठ कर कडे हो चुके थे जो हमारे हाथों से खुल पाने मुश्किल थे। इसीलिए उन गोबर-मिट्टी-गारे से सडे रस्सों की गाठें हमने हाथों से ही नही, मुंह से भी खोलकर निकाल फैंकी। अब वो पूरी तरह आजाद हो चुका था। मन हुआ उसे बाहों में भरकर खूब प्यार दूँ, बात करूँ और धीरे-से कान में कहूँ-

“खबीश कहीं के ! तूने तो हमें डरा ही दिया था”

पर नहीं फिलहाल उसका लेटे रहना ही मुनासीब समझ हमने गन्ने तोडे, ऊपर की हरी कोकलें उसके सामने डाल दी, ताकि वो उन्हें खा सके। जाते वक्त भाई उससे बोला-

“ये गन्ने हमने अपने खाने के लिए नहीं बल्कि इसलिए तोडे ताकि तू कुछ खा सके ! वरना हम कभी किसी का कोई नुकसान नही करते।”

    डरे हांपे हम सीधे घर पहुँचे। लेकिन किसी को बताया कुछ नही। रात के सपनों में भी मुझे तो सांपों से बंधा एक सांड ही दिखाई देता रहा था। अचानक कुछ शोर सुनकर मेरी आँखें खुली। मेरा छोटा भाई बोल रहा था-

“हमने रात ही तो देखा था ! भाई ने नही बताया क्या !”
ओत्तेरी की-मर गये यार ! मैने तो देर से आने का कारण कुछ और ही बता डाला था, ये खबीश सारी पोल खोले जा रहा है। सोचकर मैं तेजी से उठा और रजाई ओढकर कमरे से बाहर निकला कि तभी मुझे सांड महाशय की भी आवाजें सुनाई दी। मैं लगभग फुदकता-सा बाहर आया। उसे देखते ही बरबस मेरे मुंह से निकल पडा-

“ओए...तूने तो घर भी ढूंढ लिया बे....!”

उसने अपने नथुनों से ढेर सारा धुआं उगलते हुए धीरे से हामी भरी और मेरी तरफ देखा। उसकी आँखों में पानी उतर आया। मम्मी उसके लिए दो बादाम और ढेर-सा गुड लेकर आई “सर्दी में गुड खिलाने से उसको थोडी गर्मी मिलेगी”

    मैं उसके पास पहुँचा ताकि उसे छू सकूं तो उसने अपनी खुरदरी जीभ से मेरा हाथ चाटना शुरू कर दिया-
“अरे छैनूं ! गुदगुदी हो रही है भाई, तुम्हारी जीभ है या रेगमार !”

    मम्मी ने मुझे उसके साथ खेलता देख गुड भी मुझे ही दे दिया और बोली-

“तू नाम बडी जल्दी रखता है रे ! छैनूं........! अच्छा नाम है।”

    देखते-ही-देखते उसे देखने वालों का जमावडा-सा लग गया वहाँ। तभी मुझे याद आया कि उसको एक घाव भी था। मैंने पीछे जाकर देखा-उसका पुट्टा चिरे तरबूज-सा खिला पडा था। आसपास भी गहरे निशान थे। मैं दौडकर अन्दर गया, मम्मी को गर्म पानी करने को बोल मैंने सबसे पहले उसे चारा डाला और घाव पर जमीं मिट्टी और थक्के साफ किये और फिर उसके घाव में मरहम भर दिया।

    लोगों में तरह-तरह की बात होने लगी। मुझे महसूस हुआ कि लोगों के अन्दर उसके प्रति सहानुभूति है। पूरे गांव में खबर फैल गई कि भगवान के आर्शीवाद से गांव में भगवान शिव के नन्दी पधारे हैं। औरतों ने उसे रोटियां, गुड और भी न जाने क्या-क्या खिलाया, मर्दों ने उसकी सुरक्षा के बारे में सोचना शुरू कर दिया। सभी का सक गौकशी की और था। गहरे जंगल में किसी जानवर का जकडे मिलना, इस बात का पुख्ता सबूत भी था। इसीलिए लोगों ने कईं अधकचरे कसाईयों पर भी नकेल कसी, और चेतावनी भी दी।

    छैनूं की चमत्कारिकता इसलिए भी बढ गई थी क्योंकि वो प्रत्येक शनिवार भूमिया और प्रत्येक सोमवार शिव मन्दिर प्रांगण में ही रहता था, तो लोगों की उसके अलौकिक होने की आशंका और भी बलवती होती जाती थी। बीतते-बीतते कुछ समय बीता। अब छैनूं मेरे पास सिर्फ मरहम पट्टी ही करवाने नही आने लगा था। उसका बाकी का वक्त गांव के बडे लोगों से सम्पर्क साधने में ही बीतने लगा था। मैं सुबह उठकर मम्मी से पूछता कि-
“आज छैनूं नही आया क्या !”
तब मम्मी से एक बहुत पुराना जवाब ही मिलता था-
“तू सबसे इतनी जल्दी मत घुला-मिला कर, तुझे नींद भी ठीक से आई थी ना”
“हाँ आई थी, पर मुझे रात छैनूं का सपना आया” “
तो ये कौन सी नई बात है ! चल फटाफट स्कूल के लिए तैयार हो”


    मुझे हर समय उसका वो भोला चहेरा और आँखें नजर आती जिनमें आंसू भर कर वो मुझे देखता था। उसकी धुआँ उगलती मीठी सांस, और गरजती आवाज, मेरी हर बात पर हामी भरना, हाथ चाटना, मेरी आवाज पर दूर से भी कान खडे करना और छैनूं कहते ही मेरी तरफ पलटना, उसके गले पर लटकता वो मखमली मोटा गद्दर कम्बल के जैसा कम्मल, जिस पर हाथ फिराते ही वो लम्बी डकारें भरता और आँखें बन्द करके अपना कुन्तलों का चहेरा मेरे छोटे से कंधे पर टिका लेता था, वो सब याद आता था। पर वो नही आता था क्योंकि वो अब बडे समाज का सामाजिक प्राणी हो चुका था। उसकी याद आती तो मैं अपनी गाय के बछडे में वो सब बाते ढूँढने की कोशिश करता, पर उसके छोटे नथुनों से तो बीडी जितना धुँआ भी बहुत मुश्किल से निकल पाता था। वो गरजता नही था, सिर्फ दूध पीने के लिए मिमिया सकता था। अगर उसकी भोली आँखों में झांकने की कोशिश करो तो टक्कर मारकर माथा फोड दे। उसके गले पर एक रूमाल के माफिक कम्मल लटका था। उसको छूने जाओ तो रस्सा तुडाने को आमादा हो जाता कि जैसे मैं उसे दूध पिलाने के लिए लेने आया हूँ।

    छैनूं सिर्फ छैनूं है और मेरे बिरजू को छैनूं बनने में ढेर सा वक्त लग जाना है। यही सोचते-सोचते अभी सिर्फ दो ही महीने गुजरे थे कि एक शाम मचे कोहराम ने छैनूं की पूरी प्रभुता इर्द-गिर्द कर दी। मुंतजिर और आमिर नाम के दो लोग उसके पीछे मशाल और भाले लेकर दौड रहे थे, दो और लोग उसके पीछे कनस्तर पीटते हुए दौडे आ रहे थे। छैनूं यहाँ से कूद वहाँ से टापे सीधा मेरे दरवाजे के सामने आकर हुंकारा। मैं बाहर निकला, हथियार बंद उसके बिल्कुल नजदीक और वार करने को एक दम तैयार !

    मैं सामने आया “ओए ! कोई हाथ नही लगावेगा”
“क्यों ! तेरा है !”
             “हाँ मेरा है”
“तो घर में बांध के रख, लोगों का नुकसान करेगा तो मार तो खावेगा”
दूसरा चिल्लाया-
“बरछी मार बरछी ! वकालत का टैम ना है”
तभी पापा आ गये- “ओ ! पिच्छै हट”
            “तुझे के पता इसनै चणे के पूरे खेत का के सत्यानाश.........!”
“मैं बोल्या पिच्छै हट.......! अर अगर इसै यहाँ मेरे दर पै जरा सी भी चोट आई तो म्हारे तै बुरा कोई ना होवेगा ! जा घर जा..........!”

    आज की मुसीबत टली पर तभी के तभी दूसरी मुसीबत आन पडी, और तब के बाद शायद ही कभी धारदार हथियार बंद लोगों ने उसका पीछा छोडा हो। लेकिन इस बार आमिर या उसके भाई नही बल्कि कल तक उसको पूजने वाले अमर और उसके भाई थे। उस पर औचक हमले हुए, उसको घेर कर बींधा जाता था, उसकी फुर्ती ही थी जो हर बार उसे बचा ले जाती थी। उसके खिलाफ सही आरोप कम और अफवाओं के केस ज्यादा दर्ज थे। सभी आमिर चुप थे क्योंकि उनके पहल करने से पहले ही कुछ संवैधानिक धाराएं बाधित हो रही थी, पर अमर उसके खिलाफ कमर कसे हुए थे।

    अपने खिलाफ लोगों का बढता आक्रोश देख उसने हमारे घेर में अन्य पालतू जानवरों के साथ जामुन के पेड के नीचे अपना आराम गाह बना लिया, यह जगह उसके लिए ज्यादा महफूज थी, क्योंकि यह जगह मेन रोड से कटकर एक संकरी गली में थी।

    एक सुबह छैनूं ने अपनी बोझिल पलकें खोली, और अपने आस-पास के शान्त माहौल को निहारकर वो फिर निन्द्रा तल्लीन हो गया। कुछ ही देर में स्कूली बच्चों का कोलाहल शुरू हो गया, हम काॅलेज जाने को तैयार थे, सब कुछ सामान्य था, सिवाये इसके कि कुछ लोग आँखों ही आँखों में इशारे करते हुए हमारे घेर के चारों ओर बने मकानों की छतों पर चढ रहे थे। तभी घेर के दोनों ओर से ट्रेक्टर आकर इस तरह खडे हुए ताकि दोनों ओर की गली बंद हो जाए। आते-जाते लोगों ने तब भी ध्यान नही दिया, वो ट्रेक्टर से बचते-बचाते निकलते रहे। छैनूं की निन्द्रा टूटी, उसने नजरे उठाकर देखा, कुछ जाने-पहचाने, खुंखार और क्रूर चहेरे सामने थे। हमें आदत है कालेज जाते वक्त सभी सहगामियों को इक्ट्ठा करने की और इसी कारणवश मैं उधर जा रहा था, और मुझे यह भांपते पल भी न लगा कि यह जरूर छैनूं के प्राण के प्यासे ही खडे हैं। मैं झट से ट्रेक्टर पर चढा और उसे फांदते हुए घेर में कूदा। एक हमलावर ने छैनूं पर वार किया। भाला सीधा छैनूं के पैर के पास जमीन में घुस गया।


    “उसे मत मारो योगपाल भाई, उसे मत मारो”
मैं चिल्ला-चिल्लाकर उनसे विनती जैसी कुछ कर रहा था, पर उन्होंने तो भालों की बरसात सी ही कर दी पूरे प्रांगण में। वो भूल चुके थे कि वहाँ उनका कथित दुश्मन “एक जानवर” ही नही बल्कि एक “मैं” भी हूँ, वो शायद हर उस चीज को मिटा सकते थे जो उनके आडे आ रही थी, एक भाला मुझसे कुछ दूरी पर ही गडा, मैं बुरी तरह घबरा कर पीछे हटा तो एक ट्रेक्टर घुर्र-घुर्र करता लगभग मुझसे टकराया, ट्रेक्टर को नजदीक आता देख छैनूं ने ट्रेक्टर के ऊपर अपने अगले पैर रख लिए, वो उसे फांदना चाहता था, तभी उन्होंने एक और नुकीला हथियार दागा जो हम दोनों के बीच आकर गिरा। मैं समझ गया कि वो लोग क्रोध में इतने अन्धे हैं कि मुझे भी नही देख पा रहे हैं।

    छैनूं ताकतवर तो है लेकिन अगर मुझे कुछ हुआ तो वो मुझे बचा नही पायेगा। वहाँ मौत हमें छूकर गुजर रही थी। अब लोगों ने दिवारें उखाड कर ईंटे बरसानी शुरू कर दी थी। मुझे ट्रेक्टर को दौबारा कूद कर वापस आना पडा। मैं वहाँ से भी चिल्लाता ही रह गया। छैनूं घायल हुआ जा रहा था, उसकी ट्रेक्टर को फांदने की कोशिश नाकामयाब हो रही थी, और उन दानवों की युक्ति कामयाब हो रही थी। छैनूं ने आखिरी कोशिश की और इस बार उसके पैर स्टैरिंग तक चले गये। ड्राईवर जो अभी तक खिलखिला कर फटा जा रहा था, मारे भय के ट्रेक्टर लेकर पीछे भागा। छैनूं को रास्ता मिल गया, छैनूं वहाँ से सीधा भागा।

    मैं आज भी वो पल याद करता हूँ तो रोंगटे खडे हो जाते हैं, कि जब दो छोटे-छोटे बच्चे जो ठीक से चल भी नही पाते थे, फरवरी की ठण्ड में गली में बैठे खेल रहे थे। छैनूं ने जैसे ही घेर से निकल कर सीधी दौड लगायी तो मेरे हताश चेहरे पर रोनक आई, मैं खूब जोर और जोश से चिल्लाया-

“भाग छैनूं भाग”
लेकिन वो अबोध बालक मौत के इस मंजर से अनभिग थे। छैनूं जैसा विशालकाय एक बार में उन्हें रौंद सकता था। वो दृश्य देखकर मेरी सांसे थम गई थी, और मेरा मुंह फटा का फटा रह गया था कि जब वो उनके ऊपर से गुजरा था। बच्चे सिर्फ इधर-उधर देखते रह गये और फिर से खेल में मग्न हो गये, क्योंकि वो पूरी तरह सुरक्षित थे। इसके विपरीत वो वहशी ट्रेक्टर लेकर फिर से उस संकरी गली में उसके पीछे दौडे। उनको तो वो बच्चे भी दिखाई नही दिये, बहुत मुश्किल से उन बच्चों को वहाँ से बचाया जा सका।

    इस घटना के बाद खबर आस-पास तक फैल गई। हमलावरों की पूरे गांव में थू-थू हुई। पंचायत में आमिर और उसके भाईयों ने बताया कि वाकई में वो जानवर साधाहरण नही था। हमारे चने का खेत खाने के बाद एक ही जगह से दो-दो, तीन-तीन कौंपलें फूटने लगी थी, जहाँ इसने गन्ने के पौधे खाये थे अब वहाँ गन्ना इतना घना हो गया है कि वहाँ से निकल पाना कठिन है, हम उसमें खाद कैसे डाले ! या फिर ये कहें कि “डालने की जरूरत ही नही”। हम अपना इल्जाम वापस लेते है, इसकी जूठन में बरकत है, इसलिए और लोगों को भी अपने इल्जाम वापस ले लेने चाहिए।

    पर बाकि लोगों का आरोप यह था  िकवह रात के समय उनके जानवरों को टक्कर मार-मारकर घायल कर जाता है। हमनें रात में अक्सर उसको भैंसों को टक्कर मारते देखा है। तब पंचायत में फैसला हुआ कि सभी अपने तबेलों को रात के समय किसी भी तरह खुला न छोडें, ताकि वो अन्दर ही ना जा सके। लोगों ने यह भी मान लिया और शाम से ही अपने तबेलों की निगरानी शुरू कर दी।

    सुबह में सबने शुकून की सांस ली। सब कुशल-मंगल था। बहुत शान्ति थी। छैनूं को मैं सिर्फ अपना मान रहा था, पर उसका सार्वजनिकीकरण हो जाने से भी अब मुझे कोई खास दुःख नही था। हर वक्त ना सही कभी-कभी तो वो आता ही है। हर शनिवार और सोमवार तो मन्दिर प्रांगण में मिलेगा ही। मैं सुबह उठकर ये सोच ही रहा था कि तभी मेरे छोटे भाई ने आकर मुझे खबर दी-
“भाई छैनूं को किसी ने जहर देकर मार डाला”
“अपने छैनूं को.....!”

“हाँ भाई ! पीछे वाले बाग में मरा पडा है”
मैं झट से रजाई से निकला और उस ओर भागा। मुझे याद है भाई पीछे-पीछे चप्पलें और स्वेटर उठाये लाया था। हम सिर्फ उसे देखते रह गये, वो एकदम शान्त था। उसके कान, नाक, आँख, मुंह सब ओर से काला पड चुका खून बह रहा था, मक्खियाँ भिन-भिना रही थी। लोगों की भीड जमा होने लगी। मैं वहाँ ज्यादा देर तक रूक नही पाया। मैं उसे देखकर काफी कमजोर पड रहा था।

    उसे इस हालत में पडा देख वो दिन याद आ रहा था, जब हम उसे इसी हालत में बंधा देख देर-सवेर देखे बिना ही खोलने में लग गये थे। मुंह से रस्सियां खोलते-खोलते ये तक भूल चुके थे कि दादी को तीनों वक्त हाई जिनिक-जिनिक की स्पैलिंग रटवाने वालों के मुंह में खेत की गारा-मिट्टी भर गयी थी। “आज याद आ रहा है, जब वो सदा के लिए जा रहा है !” बार-बार अपने होंठ और दांत साफ कर रहे हैं, दातों में किरकिराहट महसूस हो रही है, दोनों के जहन में वो ही पल याद आ रहा है। बरबस ही जब हमनें एक-दूसरे की आँखों में देखा तो वो भरभरा रही थी, कह रही थी-
“जो भी हुआ अच्छा नही हुआ है”

    करीब दो घण्टे में ही आस-पास के गांव तक के लोग भी इक्ट्ठा हो गये। छैनूं को मन्दिर के प्रांगण में दफना दिया गया। शायद ही किसी मृत व्यक्ति की शवयात्रा में इतने लोग इक्ट्ठा हुए होंगें, शायद ही इतना कफन किसी और पर डाला गया होगा, शायद ही इतने लोग एक साथ किसी के अन्तिम दर्शन को कहीं उमडे होंगें जितने कि छैनूं के लिए आये थे। तीन शंख और तीन घण्टे एक साथ बज रहे थे। लोगों से शान्ति बनाये रखने के लिए अपील की जा रही थी। औरतों और बच्चों से न रोने का अनुरोध किया जा रहा था। छैनूं को उस दोपहर अश्रुपूर्ण विदाई दे दी गई और इसी के साथ ही साथ घोषणा की गई कि यहीं इसी स्थान पर प्यारे नन्दी महाराज की समाधि और मूर्ति लगाई जाएगी।

    छैनूं के स्वर्ग सिधारते ही गांव से पूरे छः भैंसे चोरी हुए, और तब सबके सामने बात सीधी हो गई कि चोर रात में भैंसे चोरी करने आ तो लगातार रहे थे लेकिन छैनूं अक्सर उनको वहाँ से मार भगाता था। पर दुर्भाग्य यह था कि जैसे ही जानवरों में भगदड मचती और मालिक उठकर वहाँ आते तो सामने हमेशा छैनूं को ही पाते थे। और उनका श कइस बात पर जाता कि छैनूं उनके जानवरों को मारने आता है।

    कुछ दिनों बाद मूर्ति भी लग गई, एक दम छैनूं जैसी। लोग आते हैं, जल चढाते हैं, मुंह पर गुड चिपकाते हैं, चरण छूते हैं, उसके पाक साफ व्यवहार को याद करके और उसकी कमी का अहसास करके आँखे नम करते हैं और चले जाते हैं।

    मैं उसकी आँखों में झांकता हूँ तो वो कोई उत्तर नही देता। उसका गला बहुत कठोर है, मीठी सांसे ना छोडना ही तो उसकी सबसे बडी खासियत है। अब वो किसी का खेत चरने नही जा सकता है, ना ही रोटी खाने किसी के घर जा सकता है, ना ही वो देर रात गलियों में रोनक करेगा, ना किसी के जानवरों को घायल करेगा। बस जैसे हमने बैठा दिया, चिपका दिया, चिपका रहेगा। अब वो निर्जीव हमारे वश में है।

“मैं समझ गया इसीलिए तो करते हैं हम मूर्ति पूजा”




अंकुर दत्त (लेखक मूलत: सहारनपुर जनपद उत्तर प्रदेश के निवासी है, मौजूदा वक्त में दिल्ली में निवास, वन्य जीवन एवं इतिहास में गहरी दिलचस्पी, भावनात्मक मसलों को कागज पर कलम और ब्रश से उतार लेने के हुनर में माहिर, इनसे ankurdutt@ymail.com पर सम्पर्क कर सकते हैं।)




   


Dec 30, 2011

एक नेचुरलिस्ट का घर...

योरोपियन नेचुरलिस्ट का घर-जहां आज भी मौजूद है योरोपियन वनस्पतियां।
भारत में योरोपियन रियासत की एक कहानी-
महान! एंग्लो- इंडियन हर्षे परिवार के निशानात मौजूद है उत्तर भारत के खीरी जनपद में-

ईस्ट इंडिया कम्पनी सरकार से शुरू होकर आजाद भारत के रियासतदारों में हर्षे कुनुबा-

अब वे दरो-दीवार भी मायूस है ..
जंगल कथा ब्लॉग से- उत्तर भारत की तराई सर्द मौसम, घना कोहरा जो नज़ारों को धुंधला देखने के लिए मजबूर कर रहा था, कोहरे की धुंध और सर्द हवाओं में गुजरते हुए इतिहास की रूमानियत लिए मैं ब्रिटिश-भारत के उस महत्वपूर्ण जगह से रूबरू होने जा रहा था जो अब तक अनजानी और अनकही थी इतिहास के धरातल पर...
इस जगह के बारे में मैं एक दशक से किताबी राफ़्ता रख रहा था, किन्तु नाजिर होने का मौका आज था, मन में तमाम खयालात और अपने किताबी मालूमात के आधार पर कहानियां गढ़ते मैं अपने एक साथी गौरव गिरि (गोलागोकर्ननाथ) के साथ गोला से मोहम्मदी मार्ग पर चला जा रहा था। बताने वालो के मुताबिक मार्ग पर स्थित ममरी गांव को पार कर लेने के बाद एक नहर पुल मिलना था और फ़िर उस जगह से वह एतिहासिक स्थल दिखाई पड़ेगा ऐसा कहा गया था!
 ज्यों ही नहर के पुल पर पहुंचा और ठहर गया, आंखे खोजने लगी उस अतीत को जो हमारा और उनका मिला जुला था, बस फ़र्क इतना था कि इस इतिहास को गढ़ने वाले वे लोग हुक्मरान थे, इस जमीन के, और हम सामन्य प्रजा। नहर के पुल से मैं पश्चिम में जल की धारा के विपरीत चला, जहां एक बागीचा था और उसमें मौजूद कुछ खण्डहर, अपने अतीत और वर्तमान के साथ, और उनका भविष्य उनके वर्तमान में परिलक्षित हो रहा था। मैं मायूस हुआ वो एक नहर कोठी थी सुन्दर किन्तु ध्वंश ! बरतानिया शासन की नहर कोठियों में बहुत दिलचस्पी रही मेरी, परन्तु आज मैं कुछ और ही तलाश रहा था......
हमारी जमीन पर गोरो की सत्ता का केन्द्र- हर्षे बंग्लो:
आखिरकार हमें वापस पुल पर फ़िर आना पड़ा और नहर की जल धारा के समानान्तर चलते हुए मुझे कुछ दिखाई पड़ा एक सुन्दर दृष्य- खजूर के विशाल वृक्ष, तालाब, पीली सरसो के फ़ूलों से भरे खेत और इसके बाद एक किलेनुमा इमारत-----बस यही तो वह जगह थी जिसकी मुझे तलाश वर्षो से थी। जिसके बारे में पढ़ते और सुनते आये थे...किवदन्तियां, रहस्य और वृतान्त.....
उस किले के नजदीक जाने से पहले कुछ तस्वीरे खीची और फ़िर मैं उस इमारत के सामने के प्रांगण में जा पहुंचा, जहां पास  के खेत में काम करता हुआ एक व्यक्ति दिखाई दिया, आवाज देने पर वह मेरे नजदीक आया- नाम पूछने पर पता चला वह छोटे सिंह है, इस कोठी के मालिक ज्वाला सिंह का पुत्र । मैने उस कोठी के अन्दर घुसने का विनम्र दुस्साहस करने की बात कही तो उसने मना कर दिया, वह सहमा हुआ सा था, जिसकी कुछ अपनी वजहे थी। किन्तु थोड़ी देर बाद वह इमारत से बाहर आया और अन्दर आने के लिए कहा, मेरे मन में बस कोठी की अन्दरूनी बनावट, पुराना एंग्लो-इंडियन फ़र्नीचर और कुछ अवशेष देखने भर की थी, खैर मैं इमारत के बाहरी कमरे में घुसा तो नजारा बिल्कुल अलग था, एक बांस की खाट (खटिया) पर लेटे एक बुजुर्ग रूग्ण और बुरे हालातों से लत-पत, कमरे कोई फ़र्नीचर नही और न ही बरतानिया हुकूमत के कोई शाही निशानात सिवाय गीली छत और बे-नूर हो चुकी दीवारो के, छतों में भी घास और वृक्षों की पतली जड़े सांपों की तरह घुमड़ी हुई दिखाई दे रही थी।
 एडिमिनिस्ट्रेटर जनरल  ने इसकी नीलामी कराई
उनसे मुलाकात हो जाने पर कुछ मैं खश हुआ चलो इनकी आंखो से इस इमारत के इतिहास को देखते है, ज्वाला सिंह जो कभी मिलीट्री वर्कशॉप बरेली में नौकरी कर चुके थे और अब रिटायर्ड होकर यही रहते थे अपनी पत्नी और बेटे के साथ, इनके पिता गम्भीर सिंह (डिस्ट्रिक एग्रीकल्चर आफ़ीसर) ने इस इमारत को सन 1966 में खरीदा,  भारत सरकार द्वारा जमींदारी विनाश एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम के तहत इस सम्पत्ति की नीलामी की और मात्र २९ हजार रुपयें में यह शाही इमारत और ३० एकड़ भूमि को क्रय कर दिया गया, और तबसे यह सम्पत्ति इनके परिवार के आधीन है। गम्भीर सिंह के तीन पुत्रों में सबसे छोटे ज्वाला सिंह इस जगह के मालिक है। ये पुणीर क्षत्रियों का परिवार मूलत: मुजफ़्फ़रनगर का है

तिब्बतियों ने भी शरण ली हर्षे के महल में-
ज्वाला सिंह के मुताबिक सन 1962 में चाइना-भारत युद्ध के समय तमाम तिब्बती प्रवासियों को इस इमारत में ठहराया गया और उसके बाद इसमें रेवन्यु आफ़िस खोला गया। नतीजतन इस किले का शानदार फ़र्नीचर और सामान या तो सरकारी मुलाजिम जब्त कर गये या तिब्बतियों ने- आज बस वीरान इमारत के सिवा यहां कुछ नही।  
इमारत के निर्माण वर्ष को ठीक से वे बता नही सके, और इमारत की प्राचीरों से कोई लिखित प्रमाण भी नही मिला, सिवाय ईंटों के, शुक्र है कि उस वक्त ईंट भट्टों में जिन ईंटों का निर्माण किया जाता था उनमें ईंस्वी सन या संवत का वर्ष पड़ा होता था, और इस वजह से ध्वंश अवशेषों के निर्माण-काल ज्ञात हो जाता है। किन्तु आजकल ईंट भठ्ठे वाले उल्टे सीधे नामों को छापते है ईंटों पर ! 
फ़ूस-बंग्ला-
ध्वंशाशेषों में कुएं की प्राचीर से मिली ईंटों पर सन 1884 की ईंटे प्राप्त हुई और दीवार की प्राचीरों से सन 1912 ई० की, यानि यह जगह सन 1884 के आस-पास आबाद की गयी। बताते हैं मौजूदा इमारत के पहले फ़ूस के बंगलों से आछांदित था यह बंगला, इस इमारत के मालिकों को भारतीय घास फ़ूस के वातानुकूलित व मजबूती के गुणों का शायद भान था और इसी लिए जिला मुख्यालय पर मौजूद इनकी कोठी भी फ़ूस से निर्मित थी- जिसे लोग फ़ूस -बंग्ला भी कहते आये। 
ज्वाला सिंह के मुताबिक इस इमारत और जमीन जायदात के मालिक जे० बी० हर्षे जमींदारी विनाश अधिनियम के पश्चात सम्पत्ति जब्त हो जाने के बाद मसूरी में रहने लगे थे और सन 1953 में  वही हार्ट अटैक से उनकी मृत्यु हुई।
योरोपियन वनस्पति?-
एक बात और और इन्सान जहा रहता है वहां के वातावरण को अपने मुताबिक ढालता है, और वही वजह रही कि इस जगह पर अभी भी योरोपियन वृक्ष, लताये मौजूद है । अपने गौरवशाली अतीत में यह इमारत बहुत ही खूबसूरत रही होगी और इस इमारत का एक गृह-गर्भ भी है, यानि जमीन के भीतर का हिस्सा जो रियासती दौर में खजाना रखने के काम आता था।
इमारत के चारो तरफ़ फ़ूली सरसों इसकी सुन्दरता को अभी भी स्वर्णिम आभा दे रही , आस-पास में बने सर्वेन्ट क्वार्टर्स, रसोई, कुआ इत्यादि, जिनमें तमाम अनजानी बेल, झाड़िया...1857, और कुछ रहस्य पोशीदा है, जिन्हे वक्त आने पर बताऊंगा.....!
मिलनिया-
एक नये शब्द की खोज भी हुई उस जगह पर अपने अन्वेशण के दौरान इमारत के पिछले हिस्से की तरफ़ मैं तस्वीरे ले रहा था तभी लकड़ियों का बोझ लिए एक महिला वहां से गुजरी, मै बात कर रहा था बहुत छोटे कमरे की जिस पर खपरैल बिछा था, उसने कहा कि यह मन्दिरथा जिसे योरोपियन मालिको ने नह बल्कि मौजूदा मालिकों ने बनवाया था और यहां पर एक मिलनिया लगवाई थी- पूछने पर पता चला गन्ना पेरने वाला कोल्हूं को उसने मिलनिया कहा था !  

मंजर वही है बस नाजिर और वक्त बदल गये-
...अब मैं लौट रहा था सूरज भी यहां से मेरे साथ-साथ चल दिया था, मै उस जाते हुए सूरज को कैमरे में कैद कर रहा था, यह सोचकर इसने अब तक मेरा साथ दिया, नजारों को रोशन किया और इसकी रोशनी ने तस्वीरे लेने में मदद की, यह भी गवाह बना मेरी मौजूदगी का, कृत्यज्ञता का भाव था उस कथित डूबते सूरज के लिए, मैं सोचने लगा कि कभी बरतानिया हु्कूमत में इस रियासत के हुक्मरान हर्षे परिवार के लोग बड़ी रूमानियत से सूरज के डूबने का नजारा देखते होगे और खुश होते होगे- कि ब्रिटिश राज का सूरज कभी नही डूबता.....और आजादी के बाद जब यह सूरज डूब रहा होगा तब भी उन गोरो ने अपने इस किले से बड़ी मायूसी और हार के भाव से उसे डूबते हुए देखा होगा, और आज ये आजाद भारत के ठाकुर साहब जो मौजूदा मालिक है अपने रूग्ण शरीर और विपरीत परिस्थिति के साथ इस सूरज के डबने के मंजर को देख रहे होगे, मंजर एक ही है पर मनोभाव जुदा-जुदा है...काल और परिस्थिति इन्सानी सोच में इतनी तब्दीली लाती है की चीजों के मायने बदल जाते है जहन से....
इति 
नोट- इस किले के रहस्य और इसके मालिकानों का तस्किरा कभी और...हां इतना बता दूं कि खीरी जनपद की इस इमारत में रहने वाले योरोपियन मालिकान बंकिमघम पैलेस से लेकर फ़्रान्स और अमेरिका में अपनी बुलन्द हैसियत के लिए जाने जाते रहे हैं।  
© कृष्ण कुमार मिश्र (सर्वाधिकार सुरक्षित)

रो्टी- एक कथा


रोटी..............


    छोटे-छोटे बच्चों की उस बहुत बडी सी खुशी का कोई ठिकाना नहीं है कि जब पूरे मुहल्ले की वफादार और चहेती “हीरोइन” ने उस सर्द शाम में प्यारे-प्यारे पांच पिल्लों को जन्म दिया है। हैरान न हों “हीरोइन” उसके प्यार का नाम है ! जिसे वो बखुबी जानती है। वाकई ! वो है हीरोइन ही। एकदम साफ सुथरी, प्यारी और शाकाहारी। पूरे मुहल्ले की तवज्जो उस पर मेहरबान है, जिस घर जाती, पुचकायी जाती, खिलाई जाती, पिलाई जाती है।

    आज वो माँ बनी, अपने नन्हें मुन्नों को चाट रही है। उसकी पूंछ आज बेहिसाब खुशी से गद्गद् एक जगह टिक ही नहीं पा रही है। बच्चों का तांता लगा है उसे अजवाइन की चाय पिलाने के लिए वो उसके बच्चों के नाम दे रहे और झगड रहे हैं यह कहकर कि “नहीं वो काले वाला मेरा है, मैं पहले आया था, मैंने उसे पहले देखा”।

20 दिसम्बर, 1999

    “हीरोइन” बहुत खुश है, उसके बच्चे बडे हो रहे हैं, उनकी आँखे खुलनी शुरू हो गई हैं। वो उन्हें अपने मुंह में दबोच कर धूंप सेंकने के लिए लेकर जाती है। बडे ताज्जुब की बात है कि उसके जिस जबडे से गांव के बडे-बडे समजातीय सूरमा खौप खाते थे, उन्हीं में जकडे वो नन्हें गोलू-मोलू चीं तक नही कर रहे।

2 फरवरी, 2000

    अब छिटकु-पिटकू के पेट के साथ-साथ भूख भी बढने लगी है। वो मां की गंद पाते ही, क्यारें, नालें, गलियां और सडके कूद फांदकर उसके पीछे दौडते हैं। सडको पर सरपट दौडती बैल बग्गी, साईकिलें और ट्रेक्टर उन्हें देख रूक जाते हैं। नालों में गले तक धंसने के बावजूद जब वो पूरे जोर लगाकर बाहर निकलते हैं और पूरे शरीर को झटककर फिर पूरे जोश से दौडते हैं, बडे ही हसीन लगते हैं। मां जैसे ही उनके हाथ लगती है, आत्म समर्पण कर देती है, पर वो जान गई है कि उनकी बढती उम्र के साथ ही साथ स्तनों में दूध भी कम पड रहा है।

14 अप्रैल, 2000

    “हीरोइन” बहुत खुश है, मैं जानता हूँ, पर फिर भी वो अपने नाम की रोटी बच्चों को खाने देगी। वो सिर्फ उन्हें दुलारती रहेगी, चुमकारती रहेगी, दूसरो की बूरी नजरों से बचाने के लिए उनकी अंगरक्षक बन जायेगी, और उन्हें लम्बी उम्र की दुआएं देती-देती ही सो जायेगी, मैं जानता हूँ।

29 अक्टूबर, 2000

    “हीरोइन” निश्चित है, अब उसके बच्चे बडे हो चुके हैं। उन्हें अपने-अपने मेहरबान मिल गये हैं, वो जानती है कि खुद तो कहीं भी पेट भर लेगी, उसको प्यार करने वालो की कोई कमी नहीं है, जरूरत तो उसके बच्चो को है। लेकिन यह सोच उस वक्त गलत फहमी में बदल गई जब उसी के पुराने मालिकों ने घर से उसे यह कहकर खदेड दिया कि अभी-अभी तो इसके बच्चों को रोटी दी थी, अभी कहीं से ये भी आ धमकी। वो वहाँ से बाहर निकली और वापस मुडकर सिर्फ एक बार अपनी नम आंखों से अपनी मालकिन को देखा और वहां से चली गयी। इस वक्त वो मन्दिर के आंगन में अपने अगले पैरों पर मुंह टिकाये एकाएक किसी गहरे चिन्तन में डूबी सी नजर आ रही है। उसकी आंखों में आंसू भी आएंगे यह मै नहीं जानता था।

09 मई, 2001

    “हीरोइन” गलियों में जब किसी अपने के पास से गुजरती है तो बाद में अफसोस भरी नजरों से वापस मुडकर देखती जरूर है कि क्या किसी ने मुझे देखा, या कोई टिप्पणी की ! पर नहीं हीरोइन अब वैसा नही हो रहा है, ये इन्सान हैं जो अपनो तक से बहुत जल्दी बोर हो जाते हैं, तुम्हारी नटखटी शरारतें अब उनका ध्यान आकर्षण नही करती बल्कि उल्टा उन्हें उससे परेशानी महसूस होने लगी है।

10 जून, 2001

    “हीरोइन” कईं दिनों से भूखी है, मैं घर पर ही हूँ, उसे रोटियां खिला रहा हूँ, वो रोटियां उठाकर खुले आंगन की तरफ जा रही है, मुझे उसे अपने सामने खाना खाते देख खुशी होती, पर वो शायद ऐसा नही चाहती इसीलिए जा रही है। तो ठीक है, मैं भी अपना होमवर्क कर रहा था। मैं जा रहा हूँ। लेकिन अगले ही पल उसकी करूण पुकार मुझे सुनाई दे रही है। मैं दौडकर बाहर आया हूँ और देख रहा हूँ कि उसी के तीन बेटे उसको घायल कर उसकी रोटियां छिन कर ले जा रहे हैं।

    वो आज पहली बार घायल हुई, पहली बार वो मारे दर्द के चींखी और पहली बार वो किसी नाले में पडी असहाय महसूस कर रही है, मेरे पास सिर्फ एक ही रास्ता है कि मैं नाले में अन्दर हाथ डालकर सबसे पहले उसकी कमर को सहारा देते हुए बाहर निकालूं, पर क्या वो उस इन्सान को थोडा भी को-आॅपरेट करेगी जिसे वो आज से पहले सिर्फ पहचानती थी, जानती नही थी।

01 जौलाई, 2001

    “हीरोइन” को ठीक होता देख खुशी हो रही है, कि मेरी डाॅक्टरी रंग तो ला रही है, थोडी शक्ल-सूरत बिगड गई है, बट नाॅट बैड। वो आती है, मुझसे हाथ मिलाती है, रोटी का टुकडा हवा में उछलकर पकडती है, सीधी खडी होकर चलती है, मेरी गाय के बछडे के साथ खेलती है। मैं उसके बेटों को खदेडकर जब उसकी तरफ देखता हूँ तो वो भौहें उठाकर गौर से मुझे देख रही होती है, पर मैं मुस्कुरा उठता हूँ यह जानकर कि वो नाराज नहीं है।

    सबसे अच्छी बात है कि वो अपना बडा घर छोडकर मेरे छोटे से घर में भी खुश है और उसे कभी गन्दा भी नही करती। अरे हाँ ! अब मुझे काली बिल्ली का भी डर नही जो अक्सर मेरा दूध धरती पर गिराने के बाद पीती थी, और घर का कोई-न-कोई कौना गन्दा कर जाती थी। थैंक यू “हीरोइन”। मैं कल से कालेज जाना शुरू कर रहा हूँ, अपना ख्याल रखना।

15 जौलाई, 2001

    तुम रोज सडक क्रोस करके मन्दिर के आंगन में जाती हो, तुम्हें नही लगता के ये तुम्हारा मुझे सी-आॅफ करने का बहाना है ! तुम बडी हो मेरी साईकिल पर नही आ पाओगी और काॅलेज में कोई तुम्हें आने भी नही देगा। मैं जानता हूँ तुम समझदार हो, तुम हमारी भावनाओं को समझती हो, वरना आज तुम मेरा खोया हुआ जूता ठीक उसी वक्त कैसे खोज लाती कि जिस वक्त मैं खुद उसे ढूंढ रहा था। जिस वक्त तुम पूंछ हिलाती हुई और मुंह में दबाये मेरा जूता लाकर मेरे सामने खडी हुई, मुझे वो पल याद आ गया जब तुम अपने बच्चों को ऐसे ही उठाती थी। तुम्हे शायद नही पता पर मैं तुम्हे देखा करता था। बाॅय अपना ख्याल रखना।

16 जौलाई, 2001

    पता है भगवान पूरे काॅलेज में मेरा कोई दोस्त नही, जिससे मैं कुछ भी शेयर कर सकूं। मेरे बचपन के दोस्त शहरों में जाकर बस गये हैं। मेरा सबसे अच्छा दोस्त, मेरा भाई भी अपनी पढाई पूरी करने के लिए शहर चला गया। शायद तुम्हे अच्छा नही लगता कि मैं तुम्हारे अलावा किसी और से भी बाते करूँ। पता है भगवान। मैं “हीरोइन” को अभी खोना नही चाहता था, लेकिन आज उसी के बच्चों ने सिर्फ एक रोटी के लिए बडी लडाई में उसको इस बेरहमी से फाड डाला कि उसकी सांसें मेरे आने का इंतजार तक नही कर पायी। तुम्हे पता है भगवान। उसकी आँखे खुली थी। उसने आखरी दम तक मेरी राह तो तकी होगी। उसे पता था कि मैं उसे बचा लूँगा, लेकिन इसलिए नही कि वो जीना चाहती थी या उसने और ज्यादा जीने की प्रबल इच्छा थी ! नहीं ! बल्कि इसलिए क्योंकि शायद वो जानती थी कि मुझे उसके बाद बहुत दुःख होगा।

    तुमने धोखा दिया है उसको। वो रोज तुम्हारे आंगन में आकर बैठती थी। वो तुम्हारी मन्त्र प्रणाली भले ही नही जानती थी, पर मै जानता हूँ तुम्हारा आवाह्नन करती थी वो। तुमने ये रोटी चीज ही बहुत बुरी बनाई है, इसने अपनों को अपना ना रहने दिया। तुमने धोखा दिया है उसको।



अंकुर दत्त (लेखक मूलत: सहारनपुर जनपद उत्तर प्रदेश के निवासी है, मौजूदा वक्त में दिल्ली में निवास, वन्य जीवन एवं इतिहास में गहरी दिलचस्पी, भावनात्मक मसलों को कागज पर कलम और ब्रश से उतार लेने के हुनर में माहिर, इनसे ankurdutt@ymail.com पर सम्पर्क कर सकते हैं।)




Dec 28, 2011

धरती के सीने को फ़ाड़-फ़ाड़ कर लूट रहे है ये सरकारी लोग

‘‘खनिज अधिकारी महोबा के रिश्तेदार हैं क्रेशर और खदान माफिया’’

 बांदा में है खनिज अधिकारी की करोड़ों की बेनामी सम्पत्ति 

 करीबियों ने किये नजूल भूमि पर अवैध कब्जे 

   रिश्तेदारों को मिले गरीब कांशीराम आवास

 
बांदा- आखिर क्या वजह है कि जिला खनिज अधिकारी महोबा जो पूर्व में जनपद बांदा में भी तैनात रह चुके हैं की पुरजोर कोशिश है कि गृह निवास से दूर न जाना पड़े।

    जब पड़ताल की गयी तो सच बेनकाब होकर सामने आया और साक्ष्यों की माने तो बांदा, महोबा में जिला खनिज अधिकारी मुइनुद्दीन रहमानी महोबा की करोड़ों की बेनामी सम्पत्तियां हैं। इतना ही नहीं इन्होंने अपने करीबी और चहेते रिश्तेदारों को क्रेशर, खदानों के पट्टे करवा रखे हैं। जब कभी बुन्देलखण्ड के जनपद महोबा में अवैध खनन के विरोध मे किसानो का आन्दोलन हुआ तो जिला प्रशासन और जिला खनिज अधिकारी ने उसे कुचलने के लिए बखूबी भूमिका निभायी है। मामला चाहे वर्ष 2010 में बन्द हुयी 87 खदानों का हो या फिर बीते 4 अक्टूबर से 13 नवम्बर तक ग्राम जुझार में बड़ा पहाड़ के ऊपर किसानों का अखण्ड कीर्तन को लेकर खण्डित हुआ एक समग्र आन्दोलन।

    यही नहीं मा0 शहरी गरीब कांशीराम आवासीय योजना में भी इनके कुनबों के लोगों को विधवा, विकलांग व अन्य गरीबों के नाम पर जनपद बांदा में आवास दिलाये गये हैं। नगर पालिका बांदा द्वारा जारी 345 अवैध कब्जेधारकों की नोटिस में जिला खनिज अधिकारी के रिश्ते नातों की आमद दर्ज है। सूत्र बताते हैं कि सत्ता के कद्दावर कैबिनेट मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी से इनकी करीबी पैठ है। 3-4 वर्षों से जनपद महोबा में जमे खनिज अधिकारी ने इस बीच काली कमाई खनिज रायल्टी, तहबाजारी से वसूल करके बनायी है। जनपद महोबा के ग्राम कहरा थाना-खन्ना में चल रहे इण्टरनेशनल ग्रेनाइट स्टोन क्रेशर में इनके बहनोई श्री अकील अहमद पुत्र पीर बक्स निवासी मर्दननाका समेत शकील अहमद पुत्र शईद अहमद, अकील अहमद पुत्र शईद अहमद निवासी तकियापुरा महोबा, जाहिदा खातून पत्नी फखरूद्दीन निवासी अलीगंज बांदा के नाम से संयुक्त रूप से यह क्रेशर संचालित हो रहा है। कहरा खदान में भी पट्टे के लिये उक्त लोगों ने आवेदन कर रखे हैं। जिसकी प्रक्रिया चल रही है। इसी प्रकार ग्राम मकरबई में भी मंत्री पक्ष के दबंग लोगों के 70 एकड़ के पहाड़ पर पूर्व खनिज मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा के रिश्तेदारों के साथ खनन के पट्टे हैं।

    जनपद बांदा में रामलीला मार्ग पर खुले एस0बी0आई0 बैंक बिल्डिंग भवन को वर्ष 2008 में श्री सोहनलाल सहगल की पत्नी श्रीमती शकुन्तला सहगल से स्टाम्प चोरी करके 85 लाख रूपये में रजिस्ट्री करवाया गया। जिसकी कीमत 1 करोड़ 20 लाख रूपये चुकायी गयी थी। यह बिल्डिंग जिला खनिज अधिकारी महोबा मुइनुद्दीन रहमानी के भाई और पेशे से बैंक वकील फजलुद्दीन रहमानी के नाम से बेनामी सम्पत्ति के रूप में दर्ज है। कुछ लोगों का मानना है कि इसका पंजीकृत मालिक अजमल खान पुत्र फैयाज खान निवासी मर्दननाका है।

    गौरतलब है कि एक बैंक वकील के पास इतनी रकम कहां से आयी कि वह करोड़ों की बिल्डिंग का मालिक बन गया ? या फिर जिला खनिज अधिकारी के पास यह रूपया कैसे और कहां से आया इसकी भी जांच होनी चाहिए। इनके बैंक खातों में कितनी सम्पत्ति जमा है, इन्होंने बीते पांच सालों में कितना आयकर चुकाया है इसकी भी जांच होनी चाहिए। यह दीगर बात है कि जिला खनिज अधिकारी ने ज्यादातर सम्पत्तियां बेनामी बनायी हैं।

    इसी प्रकार मा0 कांशीराम आवासीय योजना के तहत क्रम संख्या-82 शईद अहमद पुत्र अमीर बक्स निवासी परशुराम तालाब बांदा आवास संख्या-एच0जी0 38/594, श्रीमती फाकरा पत्नी स्व0 करीम बक्स निवासी मर्दननाका विधवा आवास संख्या-एन0एफ0 19/295 जो नजूल भूमि पर भी काबिज हैं। क्रम संख्या-177 व 207 मुख्य बात है कि जनपद बांदा में 445 अवैध कब्जे धारक नजूल भूमि पर हैं। श्रीमती पियरिया पत्नी स्व0 अमीर बक्स निवासी मर्दननाका को कांशीराम आवास संख्या-एन0एफ0 20/325, इन्हांेने नजूल भूमि क्रम संख्या- 171 में कब्जा कर रखा है। श्रीमती करीमन पत्नी स्व0 खुदा बक्स निवासी हाथीखाना मजार के बगल में अलीगंज को विधवा आवास संख्या-एच0आर0 46/728 दिया गया। वसीम अहमद पुत्र सलीम बक्स यह बी0पी0एल0 कार्ड धारक हैं जिन्हें कांशीराम आवास आवंटित किया गया। जिला खनिज अधिकारी महोबा से जुड़े ऐसे कई नाम हैं जिनकी यदि पड़ताल की जाये तो एक दशक पूर्व जनपद बांदा में यह परिवार तंगहाल जीवन बसर करता था। आज करोड़ों रूपयों की बिल्डिंग और आलीशान कोठियों के मालिक बने खनन माफियाओं की जमात में रिश्तेदारों के साथ खड़े जिला खनिज अधिकारी की सम्पत्ति पर प्रश्न चिन्ह उठना लाजमी है कि यह अवैध सल्तनत कैसे बनाई गयी है ?


आशीष सागर (लेखक सामाजिक कार्यकर्ता है, वन एंव पर्यावरण के संबध में बुन्देलखण्ड अंचल में सक्रिय, प्रवास संस्था के संस्थापक के तौर पर, मानव संसाधनों व महिलाओं की हिमायत, पर्यावरण व जैव-विविधता के संवर्धन व सरंक्षण में सक्रिय, चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय से एम०एस० डब्ल्यु० करने के उपरान्त भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय के उपक्रम कपाट में दो वर्षों का कार्यानुभव, उत्तर प्रदेश के बांदा जनपद में निवास, इनसे ashishdixit01@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं)

Dec 27, 2011

जंगल में लकड़ी बीनने गई वृद्ध महिला को खा गया बाघ

कर्तनिया घाट बार्डर के प्रताननगर गांव की घटना, सुबह परिजनों की तलाश के बाद मिला महिला का क्षत-विक्षत शव, वन विभाग ने बढ़ाई चौकसी

लखीमपुर/धौरहरा-खीरी। रविवार की दोपहर जंगल में लकड़ी बीनने गई एक वृद्ध महिला पर बाघ ने हमला कर उसकी जान ले ली। बाघ महिला के एक पैर को चबा गया है और पीठ व कंधे पर भी पंजों से कई प्रहार किए हैं। सोमवार की सुबह परिजनों की तलाश के बाद महिला का क्षत-विक्षत शव जंगल से बरामद हुआ है।

धौरहरा रेंज के गांव प्रतापपुर निवासी स्व. हजारी की पत्नी मैकिन (65) रविवार की दोपहर मटेरा जंगल में अकेले लकड़ी बीनने गई थी। लेकिन देर रात तक घर नही लौटी। रात में मैकिन के घर न लौटने पर परिजनों को आशंका होने लगी। परिजन व ग्रामीण महिला की तलाश करने मटेरा जंगल पहुंचे। जंगल से करीब पचास मीटर की दूरी पर परिजनों ने मैकिन का क्षत-विक्षत शव बरामद किया। बताते हैं मैकिन के दाए पैर को बाघ खा गया है। इसके अलावा बाघ ने मैकिन पर कई हमले किए हैं। जिसके कारण मैकिन की पीठ और कंधों पर बाघ के पंजों के गहरे निशान पड़े हैं। मैकिन के मुंह से खून निकलता मिला है। 

ग्रामीणों ने इस घटना की सूचना इलाकाई रेंजर एनएन पांडे को दी। रेंजर ने मौके पर पहुंच कर शव को जंगल से बाहर निकलवाया। बता दें कि धौरहरा रेंज की मटेरा बीट बहराइच के कर्तनिया घाट इलाके से लगा है। वन विभाग को दो दिन पहले भी मटेरा में बाघ की मौजूदगी की सूचना मिली थी। जिसके बाद वनकर्मियों की टीम ने वहां बाघ की लोकेशन जानने के लिए गश्त की थी। लेकिन बाघ को जंगल में पाया गया। वन विभाग ने बाघ के शिकार की इस घटना के बाद प्रतापपुर व मटेरा इलाके में निगरानी टीमों को एलर्ट किया गया है। वहीं रेंजर ने इलाकाई गांवों के लोगों को सर्तकता बरतने की सलाह दी है। रेंजर का कहना है कि घटना जंगल के अंदर हुई है। इसके बावजूद सुरक्षा इंतजाम बढ़ा दिए गए हैं।

गंगेश उपाध्याय (लेखक एक बड़े दैनिक अखबार में वाइल्ड-लाइफ़ रिपोर्टर है)
gangeshmedia@gmail.com

Dec 25, 2011

मैलानी जंगल में देखे गये सात तेंदुआ शावक



-वन विभाग ने शुरू कराई शावकों की निगरानी, दो टीमें लगाई गई
-मैलानी खास व खैरटिया जंगल में मादा तेंदुआ पाल रहीं शावकों को
-वन्यजीव प्रेमियों में खुशी,कहा-खीरी में बढ़ेगी तेंदुओं की संख्या

खुशखबरी ---

मैलानी जंगल में पैदा हुए दो दिन के चार तेंदुआ शावक

लखीमपुर-खीरी। खीरी जिले में तेंदुए की घटती आबादी से चितिंत वन विभाग के अफसरों और वन्यजीव प्रेमियों के लिए खुशखबरी है। मैलानी जंगल में दो मादा तेंदुओं ने सात शावकों को जन्म दिया है। ये शावक अभी ठीक से चल नही पा रहे हैं। इनकी निगरानी के लिए वन विभाग ने पूरे जंगली इलाके को सील कर दिया है। निगरानी के लिए मैलानी खास व खैरटिया बीट में दो टीमें लगाई गई हैं। वन्यजीव प्रेमी तेंदुआ शावकों के पैदा होने से काफी उत्साहित हैं। उनका कहना है कि सात शावकों के पैदा होने से जंगल में तेंदुओं की आबादी में इजाफा होगा।


बीती रात मैलानी खास में चार तेंदुए के शावक देखे गए। वन विभाग रूटीन गश्त के दौरान झाड़ियों में ये शावक मादा तेंदुए के साथ ठंड से बचने का प्रयास कर रहे थे। रेंजर एके श्रीवास्तव के मुताबिक, इन शावकों का जन्म दो दिन पहले ही हुआ है। वन विभाग की टीम देखने के बाद मादा तेंदुआ शावकों से दूर चली गई। इसके बाद इन शावकों को वन विभाग के रेस्ट हाउस में लाया गया। रेंजर की सूचना पर एसडीओ एसएन सिंह भी रात में ही मौके पर पहुंचे। रेस्ट हाउस में आग जलाकर शावकों को ठंड से बचाया गया। शनिवार को इन चारों शावकों को जंगल के उसी ठिकाने पर छोड़ दिया गया। जहां से उन्हें लाया गया था। रेंजर ने बताया कि शावकों की मौजूदगी वाले जंगली क्षेत्र को सील कर दिया गया है और मजदूरों के आने-जाने पर पाबंदी लगा दी गई है। इधर, खैरटिया बीट में रईस के गन्ने के खेत में तेंदुए के तीन शावकों की मौजूदगी की पुष्टि हुई है। खेत मालिक रईस की सूचना पर वन विभाग ने गन्ने के खेत की निगरानी शुरू करा दी है। बताते हैं गन्ने के खेत में मादा तेंदुआ भी देखी जा रही है। अफसरों के मुताबिक, तेंदुए के शावकों का जन्म पन्द्रह से बीस दिन पहले हुआ है। तेंदुआ शावकों के जन्म को लेकर वन विभाग के अफसरों और वन्यजीव प्रेमी खासे उत्साहित हैं।

वन्यजीव प्रेमी केके मिश्रा का कहना है पीलीभीत, उत्तर खीरी व दक्षिण खीरी को मिलाकर जो रिजर्व फारेस्ट इलाका बन रहा है। शावकों की आबादी बढ़ना इस इलाके के लिए एक अच्छा संकेत हैं। खीरी के रिजर्व फारेस्ट इलाके में तेंदुओं की आबादी में कमी थी। सात शावकों के पैदा होने से जंगल में तेंदुए की आबादी बढ़ेगी। 


गंगेश उपाध्याय (लेखक पत्रकार है)
gangeshmedia@gmail.com

जब बाघिन पहुंची स्कूल में अपने बच्चों को मिड डे मील खिलाने !


Photo Courtesy: desktopnexus.com
शावकों के साथ स्कूल पहुंच गई बाघिन, भगदड़


तिकुनिया-खीरी। जंगल से निकलकर शनिवार को एक बाघिन जूनियर हाई स्कूल में पहुंच गई। उसके साथ दो शावक भी थे। वहां खाना बन रहा था। बाघिन के पहुंचने पर स्कूल में अफ़रा -तफ़री मच गई। किसी तरह बच्चों ने कमरे में खुद को बंदकर अपनी जान बचाई। बाघिन करीब आधे घंटे तक स्कूल में रूकी रही।

ये घटना शनिवार की दोपहर खरौटिया ग्रामसभा के मजरा चक्करपुर की है। जंगल से निकलकर एक बाघिन अपने दो शावको के साथ जूनियर हाई स्कूल के परिसर सएं पहुंच गई। बता दे कि चक्करपुर में दो सप्ताह पहले भी बाघिन अपने शावकों के साथ बलविन्दर सिंह के झाले पर पहुंच गई थी। शुक्रवार को शाम भी यह बाघिन अपने शावको के साथ शाम करीब सात बजे चक्करपुर गांव में अपनी आमद दर्ज करा चुकी थी। दोपहर में जब बाघिन अपने शावको के साथ स्कूल पहुंची। उस समय बच्चो के लिए खाना बन रहा था। बाघिन व शावको को देखकर स्कूल के बच्चे काफ़ी डर गये। बाघिन के डर बच्चो ने स्कूल के कमरों में खुद को बन्द कर लिया। इस दौरान बच्चो की चीख पुकार सुनकर ग्रामीण पहुचे लेकिन बाघिन के जमे रहने के कारण ग्रामीण कुछ नही कर पाये। आधे घंटे बाद बाघिन वापस लौट गई।


साभार: हिन्दुस्तान दैनिक बरेली-लखीमपुर दिनांक- 25 दिसंबर 2011 पेज-03

लखीमपुर खीरी के जंगलों में एक बाघिन ने चार शावको को जन्म दिया


photo courtesy: Vipin Sharma's blog at earthmatters ning

जंगल से निकली एक खुशी की खबर-

दुधवा लाइव डेस्क (लखीमपुर खीरी- 24 दिसम्बर) खीरी जनपद के दक्षिण खीरी वन-प्रभाग के मैलानी रेन्ज में एक बाघिन ने चार शावको को जन्म दिया। रिजर्व फ़ारेस्ट में बाघों की आमद-रफ़्त हमेशा रही, और कई बार तेन्दुओं और बाघों ने अपने शावको को यहां जन्म दिया, यह अच्छे संकेत है, इस प्रजाति की संख्या में वृद्धि के। और यह साबित होता है कि बाघों ने इन इलाकों को अपनी टेरिटरी बना रखा। बावजूद इन रिजर्व फ़ारेस्ट में इनकी सुरक्षा व भोजन दोनो की कमी है। दुधवा टाइगर रिजर्व से इतर खीरी के कभी संमृद्ध रहे ये जंगल अब मानव-गतिविधियों के चलते अपने मूल स्वरूप को शनै: शनै खो रहे है, और इनकी जैव-विवधिता भी जीर्ण-शीर्ण हुई है। किन्तु अभी भी संभावनायें बची हुई है, यदि खीरी और पीलीभीत के जंगलों को प्रोटेक्टेड एरिया का दर्जा मिल जाए यानि एक नये नेशनल पार्क का निर्माण किया जाए तो बाघों की प्रजाति की वृद्धि के लिए उनके दायरे को बढाया जा सकता है, और ये इलाके कभी इस प्रजाति के पूर्वजों के निवास स्थल रहे।

खीरी-पीलीभीत के जंगल जो कभी तेन्दुओं और बाघों की मौजूदगी के लिए मशहूर रहे वहां दोबारा इन प्रजातियों को सरंक्षण देकर इनकी तादाद में बढोत्तरी संभव है।




Dec 17, 2011

दस दिनों से मरे नाग के पास रह रही नागिन को देखने उमड़ रहे लोग

फ़ोटो साभार: विकिपीडिया

भउवापुर गांव में नाग नागिन का किस्सा बना कोतूहल का विषय
आस्था कहे या अंधविश्वास चढने लगा चढावा
पंकज सिंह गौर। सीतापुर

आपने नाग नागिन के किस्से अनेकों सुने और देखे होंगे इन दिनों एक नाग नागिन का किस्सा जिला मुख्यालय से 15 किलोमीटर दूर भउवापुर गांव में देखने को मिल रहा है। पिछले बुधवार को ओपलों (कण्डां) की भठिया में दो सांप मिलने पर उनको मारने के बाद बगल के बाग में फेंक दिया गया था। जिसमें से एक सांप जिंदा हो गया और मरे हुए सांप के आसपास घूमने लगा। इसकी खबर फैलते ही मजमा लगना शुरू हो गया लोग नाग नागिन का रूप बताकर चढावा चढाने लगे और इसे चमत्कार बताकर आस्था जताने लगे। पिछले एक सप्ताह से मरे हुए सांप के पास जिंदा सांप टहल रहा है लोग मरे हुए सांप को नाग और जिंदा सांप को नागिन होना बता रहे है।


सीतापुर हरदोई रोड के किनारे स्थित भउवापुर गांव में शत्रोहन उर्फ लाला के ओपलों की भठिया में बुधवार को दो काले सांप दिखाई देने के बाद उन्हे लाला ने मारकर सड़क के उस पर स्थित बाग में फेंक दिया था। इसके बाद मरे सांप को चिड़िया निवाला बनाने लगी इसी बीच उसमें से एक सांप जिंदा होकर उसे बचाने की जद्दोजहद करने लगा। मरे सांप के आधे हिस्से को चिड़िया खा पाई लेकिन आधे हिस्से को जिंदा सांप बचाने मे सफल रहा। यह नजारा कुछ लोगों ने देखा और इसकी खबर जब गांव में फैली तो लोगों का मजमा उमड़ पड़ा। जाकर लोगों ने देखा तो मरे हुए सांप के आसपास यह जिंदा सांप घूमता हुआ पाया गया। वह लोगों के भगाने के बाद भी दूर जाने का नाम नही ले रहा है। यह दृश्य जब लोगों ने देखा तो इसे चमत्कार मानते हुए उसके प्रति आस्था जताने लगे। धीरे धीरे लोग जिंदा सांप के लिए दूध लाकर रखा लेकिन उसने कुछ भी खाया पिया नही। तब लोगों की सहानभूति और भी उसके प्रति हो गई फिर क्या लोग चढावा चढाने लगे। मामला सड़क के किनारे का होने के कारण उधर से जो भी गुजरता वह इस दृश्य को देखे बिना नही रहता।



 इस घटना की खबर जब लगी तो जाकर देखा कि मरे हुए सांप के पास जिंदा सांप घूम रहा था और सैकड़ों लोगों का मजमा उमड़ा था। हाथ जोड़े खड़े लोग इसे चमत्कार होना मान रहे थे गांव की बब्बली सिंह ने बताया कि यह दोनो नाग नागिन है हालांकि कुछ लोग इन्हे काले सांप होना बता रहे है। लेकिन वह मरे हुए नाग के प्रति जिंदा नागिन का प्रेम देख एक पति के प्रति सच्ची पत्नी की आस्था के रूप में देखती है और पतिवृता पत्नी की यही पहचान होती है कि वह अपने पति के लिए कुछ भी कर सकती है। उसने कहा कि लोग नागिन का गलत अर्थ लगाते है। जैसे कि कई पत्नियां अपने पतियों को प्रेमी के साथ मिलकर मार देती है तब लोग उसे नागिन का दर्जा देने लगते है मगर नागिन क्या होती है यह भउवापुर मे आकर देखा जा सकता है। बब्बली सिंह ने बताया कि इससे ज्यादा जीता जागता उदाहरण क्या हो सकता है कि अपने नाग को ढूढने में नागिन ने खाना पीना छोड़ रखा है। और वह मरे हुए नाग के समीप ही बैठी हुई है। मौके पर मौजूद बाबा रामदास ने बताया कि सांपों का यह जोड़ा कण्डो की बठिया में रहता था जिसे बठिया मालिक ने मार दिया था लेकिन उसमें से नागिन जिंदा हो गई तब से वह सात दिनों से अपने मरे नाग के आसपास बैठी हुई है और अब लोगों की इसके प्रति आस्था उमड़ने लगी है लोग चढावा तक चढाने लगे है।

यही नही आस्था लोगों मे ही नही देखनी मिली बल्कि जिनके हाथों से सांप मारा गया उनकी पत्नी रामश्री काफी दुखी और सदमें में है वह बताती है कि जब से इन सांपों को मारा था तब से उनके पति शत्रोहन उर्फ लाला घर में ही बैठे है उन्हे अपने किए पर बेहद अफसोस हो रहा है वह बताती है कि उनके पति ने दोनो को मार दिया था फिर बाद मे पता नही कैसे एक सांप जिंदा हो गया। अब वह चाहती है कि अपने इस किए पर पछतावे के रूप में मरे हुए सांप के समीप एक चबूतरा बनवा दें ताकि वह इनकी पूजा कर सके।


खबर-२


आज भी मरे नाग से अलग नही हुई जिंदा नागिन
देखने वालों की उमड़ती जा रही भारी भीड़


जनपद मुख्यालय से 15 किलोमीटर दूर सीतापुर हरदोई मार्ग पर भउवापुर के पास मरे सांप के पास एक जिंदा सांप के घूमने का किस्सा इन दिनों नाग नागिन से जोड़कर देखा जा रहा है। सात दिसम्बर को दो सांपों को मारकर फेंकने के बाद एक मरे सांप के पास एक जिंदा सांप के होने की खबर जंगल में आग की तरफ फैल गई और लोग उसे नाग नागिन बताकर पूजा तक करने लगे है। दस दिन से मरे सांप के पास जिंदा सांप की मौजूदगी को लोग किसी चमत्कार के रूप में होना मानकर चल रहे है। यही कारण है कि अब इस नजारे को देखने के लिए भारी मजमा उमड़ने लगा है।

ज्ञातव्य हो कि भउवापुर के रहने वाले शत्रोहन उर्फ लाला के कण्डो की बठिया में दो सांप सात दिसम्बर को निकल आए थे जिन्हे मारकर सड़क के उस पर बाग मे फेंक दिया गया था। एक मरे सांप को चिड़िया अपना निवाला बना रही थी जिनके मुंह से एक जिंदा सांप मरे सांप को बचा लिया यह नजारा कुछ लोगों के आंखों के सामने घटा उसके बाद से जिंदा काला सांप मरे सांप के इर्द गिर्द ही घूमता फिर रहा है। तमाम लोगों के मौके पर पहुंचने के बावजूद यह सांप वहां से भागने की कोशिश भी नही कर रहा है। ऐसे में लोग इसे नाग नागिन होना बता रहे है और अब तो लोग वहां पर चबूतरा बनाकर पूजा पाठ करने तक की तैयारी मे जुट गए है गांव के प्रधान राजकुमार ने बताया कि दसवें दिन बाद भी मरे सांप के पास यह जिंदा सांप बैठा हुआ है जिसे देखने के लिए अब तक तमाम लोग आ और जा रहे है।


 पंकज सिंह गौर टी०वी० पत्रकार है, एक प्रतिष्ठित चैनल में कार्यरत, इलेक्ट्रानिक एवं प्रिन्ट मीडिया में एक दशक से अधिक समय से सक्रिय, सीतापुर जनपद के जमीनी मसायल पर पैनी नज़र, इनसे pankaj.singh.gaur22@gmail.com पर सम्पर्क कर सकते है। 

विकिपीडिया में दुधवा लाइव को मिला स्थान



दुधवा लाइव पत्रिका के दो वर्ष- एक सफ़र
2011 गुजर रहा है, 2012 के मिलन को आतुर- इस अनुभूति में जनवरी 2010 से शुरू की गई यह ई-पत्रिका अपने दो वर्ष पूरे करने को है, इस यात्रा में इस पत्रिका को कहां कहां गौरव हासिल हुआ इसका एक सिजरा मात्र है-

विकिपीडिया- एक मुक्त ज्ञानकोष में दुधवा लाइव ई-पत्रिका का पन्ना, विवरण यहाँ मौजूद है।

विकिपीडिया के एक पन्नें में जहां पर्यावरण पर आधारित पत्रिकाओं का उल्लेख है, वहां दुधवा लाइव को भी सम्मलित किया गया है, इस पन्ने पर जाने के लिए यहां क्लिक करे।

दुधवा लाइव डेस्क

Dec 16, 2011

पर्यावरण और प्राकृतिक संपदा के विनाश में लगा सरकारी धन

फ़ोटो साभार: विकिपीडिया
बुन्देलखण्ड पैकेज के ट्रैक्टरों पर सवार मंत्री का कुनबा-

बांदा- बुन्देलखण्ड के जरूरत मन्द किसानों के लिए आये ट्रैक्टर दबंग मंत्री के परिजन मार ले गये। बुन्देलखण्ड के लिए केन्द्र सरकार का ड्रीम प्रोजेक्ट बुन्देलखण्ड पैकेज जिसके लिए 7266 करोड़ रूपये का हवाला देकर हासिये पर खड़े किसानो को राहत के लिए रूपया दिया गया। बुन्देलखण्ड पैकेज का किस तरह बन्दर बाट किया गया यह छोटी सी बानगी है कि बुन्देलखण्ड पैकेज के ट्रैक्टरों पर सवार है मंत्री का कुनबा।

    बुन्देलखण्ड पैकेज योजना से वर्ष 2010-11 में 33 यू0पी0 स्टेट एग्रो इण्डस्ट्रियल कार्पोरेशन लिमिटेड सेवा केन्द्र बांदा द्वारा मंत्री परिवार को खुश रखने के लिए उनके चहेते और परिजनों को बुन्देलखण्ड पैकेज के ट्रैक्टर थमा दिये गये। जिले का जरूरत मन्द आम किसान मुह ताकता रह गया। बुन्देलखण्ड पैकेज की इस विशेष योजना का लाभ भुखमरी से मर रहे किसानों को नहीं मिल पाया। अब यह ट्रैक्टर जनपद बांदा में अवैध खनन, बालू ढुलाई के लिए नरैनी क्षेत्र के कोलावल रायपुर, नरसिंहपुर, पैगम्बरपुर, भुरेड़ी और तिन्दवारा में चल रहे क्रेशर के पत्थरों को ढोने का काम कर रहे हैं। सीमित किसानों को कृषि कार्य हेतु ट्रैक्टर उपलब्ध कराने हेतु 45000 रूपये अनुदान प्रति ट्रैक्टर दिया गया था। जैसे ही यह योजना जनपद बांदा मंे आयी मंत्री की रिश्तेदारी ट्रैक्टर पर सवार हो गयी। सारे नियम कायदे ताक पर रखकर यू0पी0 स्टेट एग्रो संस्था ने इन ट्रैक्टरों को वितरित किया। जरा गौर करें बुन्देलखण्ड पैकेज के मालिक बने ट्रैक्टरों के नुमाइंदों पर यह कौन हैं जिनके निशाने पर है गरीब मजलूम किसान ?


1.    जुबैरूद्दीन सिद्दीकी, वजाहुद्दीन सिद्दीकी पुत्र जमीरूद्दीन सिद्दीकी के नाम एक-एक सोनालिका ट्रैक्टर।
2.    खालिद खान पुत्र शफी खान निवासी पुंगरी के नाम महिन्द्रा-27 ट्रैक्टर।
3.    सरदार अली पुत्र मुबारक अली निवासी करबई ( प्रधान) के नाम महिन्द्रा-26 ट्रैक्टर।
4.    नोमान अहमद सिद्दीकी, फैजान अहमद सिद्दीकी पुत्र इफ्तेखार अहमद सिद्दीकी निवासी खाईंपार बांदा (मूल निवास जनपद फतेहपुर) के नाम एक-एक महिन्द्रा-26 ट्रैक्टर। जिसमें फैजान अहमद सिद्दीकी नरैनी क्षेत्र में खनन माफिया भी हैं।
5.    नफीस अहमद पुत्र अब्दुल रशीद निवासी जमवारा को महिन्द्रा-26 ट्रैक्टर।
6.    अमानउल्ला खां पुत्र फरहत उल्ला खां निवासी डिंगवाही बांदा को महिन्द्रा-26 ट्रैक्टर।
7.    शबनम बेगम निवासी लड़ाकापुरवा के नाम आयशर-380 ट्रैक्टर।
8.    छोटा खां पुत्र छैला खां निवासी कोर्रही को आयशर-380 ट्रैक्टर।
9.    अब्दुल शफीक पुत्र अब्दुल वहीद निवासी लहुरेटा को आयशर-380 ट्रैक्टर।
10.    मोहम्मद अयूब पुत्र हाजी अब्दुल खालिक निवासी चिल्ला के नाम आयशर-333 ट्रैक्टर।
11.    करीबी लोगों में पिपरहरी निवासी अमर सिंह को महिन्द्रा-26 और बेटे शिव सिंह को महिन्द्रा-26 ट्रैक्टर दिया गया जो बांदा में स्वराज कालोनी निवासी हैं।
12.    ग्राम भुरेड़ी के सियाराम, बाघा के प्रदीप कुमार, मटौंध के वंशगोपाल, धौंसड़ के रामराज, बाकरगंज बांदा निवासी नोखेलाल, महोखर के राहुल, सिंहपुर के रमेश सिंह, जसईपुर के जगमोहन सिंह, जौहरपुर के छत्रसाल, परमपुरवा के बालेन्द्र, मूंगुस के लल्लू, तिन्दवारी के रामचन्द्र, लड़ाकापुरवा के शिवबरन ऐसे नाम हैं जिनके हिस्से में आये गरीब किसानों के बुन्देलखण्ड पैकेज में मिलने वाले खेतिहर ट्रैक्टर।

गौरतलब है कि बुन्देलखण्ड पैकेज से मिले उपरोक्त ट्रैक्टरों को ज्यादातर बालू खनन, पत्थर खनन की ढुलाई के लिए ही लगाया गया है। तिन्दवारा के ग्राम प्रधान अनिल द्विवेदी बताते हैं कि किसानों के हिस्से आये ट्रैक्टर मंत्री परिवार के चहेतां को दे दिये गये। गरीब किसानों को जब यह बात पता चली तो उन्होंने अपने पैर खामोशी से पीछे खींच लिये।

आशीष सागर दीक्षित
सामाजिक कार्यकर्ता

 ashishdixit01@gmail.com

इंडिया वाटर पोर्टल में दुधवा लाइव ई-पत्रिका का विवरण





 आभासी दुनिया में दुधवा लाइव-


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हिन्दी की एक प्रतिष्ठित वेबसाइट हिन्दी मीडिया डॉट इन ने वन्य जीवन व पर्यावरण पर आधारित दुधवा लाइव पत्रिका का जिक्र बड़े सुन्दर लहज़े में अपनी वेबसाइट पर किया है, यकीनन इससे पत्रिका की प्रतिष्ठा व दुधवा लाइव पर उप्लब्ध शैक्षिक सामग्री व खबरे अधिकतम लोगों तक पहुंच सकेगी।

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Dec 15, 2011

सामुदयिक वनाधिकारों व वनोपज पर समुदाय के लिए जंग का ऐलान

फ़ोटो साभार - जनसंघर्ष ब्लाग
15 दिसम्बर 2011 को बड़ी संख्या में आदिवासी एवं अन्य परम्परागत वन समुदाय जंतर मंतर पर देगें सरकार को चुनौती

20 राज्यों से हज़ारों की संख्या में जनवनाधिकार रैली में भाग लेने के लिए वनाश्रित समुदाय दिल्ली रवाना

संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान हज़ारों की संख्या में देश के आदिवासी एवं अन्य परम्परागत वनसमुदाय मागेगें सरकार से जवाब कि आखिर पांच साल बीत जाने पर भी वनाधिकार कानून 2006 को पूरी तरह से देश में लागू क्यों नहीं किया जा रहा। दिल्ली में सर्दी बढ़ने के बावजूद भी कल रात से ही कई प्रदेशो जैसे उत्तराखंड़, उत्तरप्रदेश व झाड़खंड़ के वनक्षेत्रों से हज़ारों की संख्या में वनाश्रित समुदाय जंतर मंतर पर एक़ि़त्रत होना शुरू हो गये हैं। जिसमें 80 फीसदी महिलाए हैं जो कि जंगल पर अपने सामुदायिक वनाधिकारों के लिए यह ऐलान करने आई हैं कि अब वनों पर समुदाय का नियंत्रण रहेगा न कि सरकार व वनविभाग का। आज शाम तक कई राज्यों से हज़ारों की संख्या में वनाश्रित समुदाय जंतर मंतर पर इकट्ठा हो जाएगें। यह राज्य हैं छतीसगढ़, बिहार, तमिलनाडू, कर्नाटक, केरल, पं बंगाल, अरूनांचल प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, उड़ीसा, मध्यप्रदेश आदि। यह जनवनाधिकार रैली अपने वनाधिकारों को लेकर ही नहीं बल्कि केन्द्र सरकार द्वारा लाए जाने वाले काले कानून ‘भूमि अधिग्रहण कानून’ का भी विरोध दर्ज करने आ रहे हैं जिसकी मंशा वनाधिकार कानून की मंशा के ठीक विपरीत है जोकि एक हाथ दे और दूसरे हाथ ले की मंशा पर आधारित है। इस जनवनाधिकार रैली के तहत वनाश्रित महिलाओं अपने नेतृत्व में यह ऐलान करने आ रही हैं कि अगर उनके अधिकारों को तत्काल मान्यता नहीं दी गई तो वे अपने खोए हुए जंगल, भूमि, नदी, तलाब, समुद्र, वनोपज आदि सरकार, वनविभाग, कम्पनियों से छीन कर अपना दख़ल कायम करेगें।

गौर तलब है कि सन् 2006 में अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वननिवासी(वनाधिकारों को मान्यता) अधिनियम-2006 लोकसभा में पारित किया गया लेकिन अभी तक इस कानून को लागू करने की राजनैतिक इच्छा सरकारों में दिखाई नहीं दे रही है। अभी भी वन क्षेत्रों में वनविभाग का उत्पीड़न बादस्तूर ज़ारी है व वनविभाग पर इस कानून को लागू करने की जिम्मेदारी सौंप दी गई है जिसका ज्वलंत उदाहरण छतीसगढ़ व मध्यप्रदेश में है। इस कानून के लागू होने से जहंा एक और वनाश्रित समुदाय को जंगलों के अंदर एक जनवादी जगह बनाने में मदद मिली है व पहली बार शासन व प्रशासन का दख़ल हुआ है जिसके कारण जहां लोग संघर्ष कर रहे हैं वहीं पर इस अधिनियम के तहत कुछ सफलाताए जरूर हासिल हो रही हैं लेकिन अभी तक व्यापक तौर पर वनों में रहने वालों को उनके अधिकारों की मान्यता नहीं मिल पाई है। सबसे पहले इस कानून के तहत वनाश्रित समुदायों को व्यक्तिगत दावों में ही उलझा कर रख दिया गया है व लाखों के पैमाने पर इन दावों को भी निरस्त कर दिया गया है यह कह कर कि यह दावें ग्राम स्तरीय वनाधिकार समिति ने निरस्त किए हैं। जबकि इन दावों को उपखंड़ स्तरीय समिति एवं वनविभाग द्वारा गैरकानूनी ढं़ग से निरस्त किया जा रहा है। लगभग 50 फीसदी दावें अन्य परम्परागत वनसमुदाय के निरस्त किए गए हैं यह कारण बता कर कि उनके पास 75 वर्ष का प्रमाण मौजूद नहीं है। अन्य परम्परागत वनसमुदाय में दलित, पिछड़ी, मुस्लिम व अन्य ग़रीब तबका शामिल है जो कि सदीयों से आदिवासीयों की तरह वनों में रहते चले आ रहे हैं। इनमें से एक समुदाय टांगीयां वननिवासीयों ने तो अंग्रेज़ों के ज़माने से हिमालय की तलहटी पर लाखों हैक्टेयर इमारती वनों को आबाद किया व देश के औद्योगिकरण में एक विशिष्ट भूमिका निभाई। लेकिन इनके अधिकार तो देने की बात दूर इनके गांवों को गिना तक नहीं जा रहा है। देश में वनग्रामों की संख्या लगभग 7000 के आसपास है लेकिन सरकारी दस्तावेज़ों में इनकी गिनती ही नहीं की गई है। ऐसे कई मिसालें हैं जैसे पं0बंगाल, असम, उत्तराखंड़, उत्तरप्रदेश आदि। इन गांवों को वनाधिकार कानून के तहत राजस्व ग्राम में बदलने की प्रक्रिया को करना है लेकिन इस संवैधानिक अधिकारों को देने की बजाय बेदखली के नोटिस व अतिक्रमण के झूठे मुकदमें दायर कर उन्हें जेल भेजा जा रहा है। वहीं दूसरी और कानून की प्रस्तावना में उल्लेखित ऐतिहासिक अन्याय को समाप्त करने की मंशा के ठीक विपरीत वनाश्रित समुदायों पर सन् 2006 के बाद हज़ारों मुकदमें भारतीय वनअधिनियम 1927 के तहत किए जा रहे हैं। यह वहीं कानून हैं जिसे अंग्रेज़ों ने भारत के जंगलों को साम्राज्यवादी मुनाफे के लिए इस्तेमाल करने के लिए बनाया था और इसी कानून को वनाश्रित समुदाय के प्रति किए गए ऐतिहासिक अन्याय की बुनियाद माना गया है लेकिन फिर भी अभी तक केन्द्र सरकार द्वारा वनविभाग के उपर लगाम नहीं कसी जा रही है। उसी तरह न्यायपालिका भी अभी तक नए कानून वनाधिकार कानून को समझने में नाकाम है या जानबूझ कर समझना नहीं चाहती व अभी तक ब्रिटिश के बनाए कानून व वनों से जुड़े अन्य सामान्य कानूनों के तहत ही कार्यवाही कर वनश्रित समुदाय के प्रति नाइंसाफी कर रही है। यहीं नहीं वनक्षेत्र में पाई जाने वाली आपार खनिज एवं भूगर्भभीय संपदा को गैरकानूनी रूप से अनापति प्रमाण पत्र ज़ारी किए जा रहे हैं जो कि लाखों हैक्टेयर वनभूमि पर अपना कब्ज़ा जमा कर हमारे देश की धरोहर प्राकृतिक संपदा को राजसता में बैठे लालची राजनेताओं के माध्यम से नष्ट करने पर आमादा है। इस मामले में अभी हाल ही में वन सलाहकार समिति ने इस तथ्य को उजागर किया कि कई बड़ी कम्पनियों को पर्यावरण अनुमानको के विरूद्ध अनापति प्रमाण पत्र ज़ारी करने में कई उच्च वन अधिकारीयों को दोषी पाया गया है।

इन सब मुददों को लेकर जनवनाधिकार रैली में कई जनसंगठनों व सामाजिक आंदोलनों की भागीदारी 15 व 16 दिसम्बर को जंतर मंतर पर होने वाली है। जिसे कई पार्टीयों के सांसद सम्बोधित करेगें। यह जनसंगठन व जनांदोलन कई प्रदेशों से हैं जिनमें मुख्य तौर पर राष्ट्रीय वन-जन श्रमजीवी मंच, कैमूर क्षेत्र महिला मज़दूर किसान संघर्ष समिति, महिला वनाधिकार एक्शन कमेटी, तराई क्षेत्र एवं थारू आदिवासी महिला मज़दूर किसान मंच, वनग्राम एवं भू-अधिकार मंच, घाड़ क्षेत्र मज़दूर संघर्ष समिति, घाड़ क्षेत्र मज़दूर मोर्चा, कैमूर मुक्ति मोर्चा, बिरसा मुंडा भू-अधिकार मंच, पाठा कोल दलित अधिकार मंच, मानवाधिकार कानूनी सलाह केन्द्र, वनवासी जनता यूनियन, दक्षिण बंगा मत्सयजीवी मंच, हिमालय वनग्राम यूनियन दार्जिलिंग, हिमालय नीति अभियान हिमाचल प्रदेश, झाड़खंड़ खनन क्षेत्र समन्वय समिति, केरल स्वतंत्र मतस्य थोज़ीलई यूनियन, किसान मुक्ति संग्राम समिति असम, लोक संघर्ष मोर्चा महाराष्ट्र, नदी घाटी मोर्चा छतीसगढ़, राष्ट्रीय आदिवासी गठबंधन, दलित भूमिअधिकार संघर्षो का राष्ट्रीय संघ, बुनकारों को राष्ट्रीय संघ, राष्ट्रीय मछुआरा मंच, राष्ट्रीय वनाधिकार अभियान, पं0 बंगा खेत मजदूर समिति, सुन्दरबन वनाधिकार संग्राम समिति, वनपंचायत संघर्ष समिति, मजूर श्रमिक यूनियन असम व पं0बंगाल, जनसत्याग्रह उड़ीसा, आदिवासी सालीडारीटी काउसिल, डायनमिक एक्शन, माटू जनसंगठन, जनआंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय, राष्ट्रीय घरेलू कामगार यूनियन, राष्ट्रीय हाकर संघ, न्यू ट्रेड यूनियन इनिशिएटिव, पार्टनर इन जस्टिस कन्सर्न, प्रोग्राम फार सोशल एक्शन, विकल्प सामाजिक संगठन, सेंटर फार हयूमन राईटस इनिशिएटिव, ट्रेनिंग एण्ड रिसर्च एसोशिएशन, वनटांगीया समिति गोरखपुर,इत्यादि।




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Uttar Pradesh
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Dec 12, 2011

हिन्दी होम पेज में दुधवा लाइव


दुधवा लाइव मैगजीन के संबध में एक आलेख जिसे हिन्दी होम पेज डॉट कॉम ने अपने प्रतिष्ठित पोर्टल पर स्थान दिया हैं। वन्य जीवन व पर्यावरण पर आधारित हिन्दी की इस प्रथम ई-पत्रिका दुधवाLive की सराहना करने की लिए दुधवा लाइव के संपादकीय मंडल की तरफ़ से हिन्दी होम पेज डॉट कॉम की पूरी टीम को साधूवाद ।
यह आलेख देखने के लिए यहां क्लिक करे

संपादक
दुधवा लाइव



Dec 4, 2011

भरतपुर टू मथुरा

राजस्थान यात्रा- चित्र-माला
केवलादेव पक्षी विहार एवं भरतपुर-मथुरा मार्ग












सतपाल सिंह वाइल्ड लाइफ़ फ़ोटोग्राफ़र है, अभी तक कई अन्तर्राष्ट्रीय व राष्ट्रीय फ़ोटोग्राफ़ी प्रतियोगिताओं में अपना लोहा मनवा चुके है, खीरी जनपद के मोहम्मदी में निवास, इनसे satpalsinghwlcn@gmail.com पर सम्पर्क कर सक्ते है।

Dec 2, 2011

जंगलवासियों के अधिकारों के लिए संघर्ष

photos courtesy: hillpost.in
राष्ट्रीय वनजन श्रमजीवी मंच-
वनाधिकारों के लिए एक आंदोलन-
ताकि उन्हे उनका हक मिले !

आज दिनांक 2 दिसम्बर 2011 को अमीनाबाद स्थित गंगाप्रसाद मेमोरियल हाल में राष्ट्रीय वनजन श्रमजीवी मंच द्वारा ‘ उत्तरप्रदेश में वनाधिकार आंदोलन और वनाधिकार अधिनियम के क्रियान्वन व राष्ट्रीय आंदोलन की रणनीति’ पर एक दिवसीय प्रांतीय अधिवेशन आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम में वनाच्छित जनपदों से लगभग 1000 लोगों ने भागीदारी निभाई। इस सम्मेलन में काफी महत्वपूर्ण जनपदों जैसे सहारनपुर, लखीमपुर खीरी, बहराइच, गोंण्ड़ा, गोरखपुर, महराजगंज, सोनभद्र, मिर्जापुर, वनगुर्जर समुदाय, चित्रकूट, चन्दौली के अलावा अन्य प्रदेशों जैसे उत्तराखंड़ व बिहार से भी संगठन के कार्यकताओं द्वारा प्रतिनिधित्व किया गया। इस कार्यक्रम का मुख्य उददेश्य प्रदेश व वनाधिकार कानून को लागू करने में अधिकारीयों द्वारा कोताही बरतने व अधिकारीयों द्वारा वनविभाग से सांठ गांठ कर इस कानून को लागू करने में तरह तरह की अड़चनें पैदा कर रहे हैं। इसी के साथ कानून के पालन करने में राज्य व सरकार को चुनौती देने के लिए आगामी रणनीति के तहत 15 दिसम्बर 2011 को दिल्ली जाने का कार्यक्रम भी तय करना था, चूंकि इस समय संसद का सत्र चालू है।

इस कार्यक्रम महिलाए काफी संख्या में आई थी जिसमें आदिवासी, दलित व अन्य परम्परागत समुदाय की संख्या काफी अधिक थी। इस सभा में वनसमुदाय द्वारा काफी सरकार व सरकारी अधिकारीयों पर काफी गुस्सा फूटा चूंकि पांच वर्ष बाद भी यह कानून लागू नहीं हो पाया है। सहारनपुर से आए वनटांगीयां निवासी शेर सिंह ने कहा कि जहां उनका संगठन पहंुच जाता है वनविभाग को भागने की कहीं रास्ता नहीं मिलता है। शोभा सोनभद्र ने कहा कि इस कानून को लागू करने का काम हमारा है और खासतौर पर महिलाओं की जिन्हें इस कानून को लागू कराने में काफी मेहनत करनी है। इसलिए सभी महिलाए घरों में न रहे बल्कि आदमी घरों में रहे और महिलाए दिल्ली जा कर इस बात का जवाब ले कि इस कानून को लागू करने में इतनी बाधाए क्यों आ रही है। खीरी से रामचंद्र राणा ने कहा कि वनाश्रित समुदायों की लड़ाई हमारे अपने संगठन ने लड़ी है इसलिए यह वनाधिकार कानून भी पारित हुआ है इस लिए हमारी सरकार व वनविभाग के साथ सीधी टक्कर है। हमें राजनैतिक लोग कहते हैं कि आप संगठन की मिटिंग में क्यों जाते हैं।

सोनभद्र से आए रामशकल ने कहा कि सोनभद्र में हजारों की संख्या में आदिवासीयों के उपर झूठे मुकदमें लादे गए है जबकि वनाधिकार कानून लागू हो चुका है। एक तरफ तो अधिकार देने की बात कही जा रही है वहीं वनविभाग द्वारा झूठे फर्जी मुकदमें लाद कर जेल भेज रहा है। इसलिए अब इन मामलों में हम लोग जेल नहीं जाएगें और जबरदस्ती करेगें तो जेल भरो आंदोलन जाएगें। गोंण्ड़ा से आए ख्ुाशीराम और अमरसिहं ने जिलाप्रशासन गोण्ड़ा द्वारा टांगीयां वननिवासीयों पर झूठे केसों व अधिकार पत्र को उपखंड़ स्तरीय समिति द्वारा निरस्त करने के विषय में जिलाप्रशासन के खिलाफ एक जबरदस्त आंदोलन का ऐलान किया।  पीलीभीत से आई गीता ने कहा कि अब अगर हमारे भूमि के अधिकार नहीं दिए जाएगें तो महिलाओं द्वारा खाली पड़ी भूमि पर अपना दख़ल कायम करेगें। सहारनपुर के शिवालिक जंगलों से आए वनगुर्जर घुमन्तु समुदा के तालिब हुसैन ने कहा कि अभी तक जंगलों में रहने वाले समुदायों जो कि घुमन्तु जनजाति से हैं को किसी भी प्रकार का अधिकार नहीं मिला है।

मंच के संयोजक अशोक चैधरी ने वनाधिकार अधिनियम पारित होने को इतिहास पर जिक्र किया कि जनसंगठन ही सरकार को सही कर सकते हैं और अगर सरकार सहीं ढं़ग से कानून को लागू नहीं करती तो ऐसी सरकार का तख्ता जनता ही पलट सकती है। यह कार्यक्रम 15 दिसम्बर को इसलिए लिया गया क्योंकि इसी तारीख में पांच साल पहले यह कानून पास हुआ था संसद अभी चल रही है इन्हीं सब मुददों को लेकर संसद को घेरा जाएगा। अभी तक कई सांसदों ने इस कानून को पारित तक नहीं किया है। सारी पार्टीया सता के हिसाब से सोच रही है व अदिवासीयों, दलितो एवं किसानों की भूमि को लूटने में लगी है। पार्टीयां भी जनता से दूर होती जा रही है इसलिए संगठन की ताकत से ही जनता की ताकत को बढ़ाना है व जनशक्ति को बढ़ाना है।
एनएपीएम के संदीप पांडे ने कहा कि महिलाओं की इतनी संख्या काफी उत्साहजनक है और किसी भी सामाजिक बदलाव बिना महिलाओं की अगुवाई के नहीं हो सकता। स्थिति तो पहले भी गंभीर थी लेकिन उदारीकरण व भूमंडलीकरण की नीतियों के चलते प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर जनता के अधिकार समाप्त होते जा रहे हैं। वनाधिकार कानून को सही पालन बिल्कुल नहीं हो रहा है जिसके जिम्मेदार सरकार, प्रशासन, माफिया, सांमत, वनविभाग सब शामिल हैं। 
ओमकार सिंह ने कहा कि इस कानून की जरूरत क्यों पड़ी क्योंकि देश जब आज़ाद हुआ तो इस कानून को पास नहीं किया गया और न ही वनों में रहने वालो को उनके अधिकार व जंगल नहीं सौंपे गए। केन्द्र सरकार में जो शासक वर्ग बैठे है वह मज़दूर विरोधी व ग़रीब विरोधी है। देश में जंगलों में कई विदेशी कम्पनियों का दखल हो गया है जिसके कारण काफी लोग हथियार उठाने पर मजबूर हो गए हैं। इस लिए इन सब मुददों को लड़ने के लिए हमारी पार्टी ने भी इन सब के लिए संघर्ष का ऐलान किया है जिसमें मेघा पाटकर, राजेन्द्र सच्चर, कुलदीप नययर आदि शामिल हैं। आज सामाजिक कार्यकता जो समाज में काम कर रहे हैं उनके उपर कार्यवाही की जा रही है जैसे सामाजिक कार्यकर्ता रोमा पर रासुका लगाई गई वह निदंनीय है । इस भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ आवाज़ बुलन्द करने की जरूरत है।

सम्मेलन में सबसे ज़ोरदार तरीके से महिलाओं ने बोला व ग्रामीण क्षेत्रों से आई थारू, उरांव, कोल, गोंड़ जनजाति व दलित महिलाओं ने जो वक्तव्य रखे वो निश्चित ही रूप से आने वाले दिनों में जनराजनीति की बयार की ओर इंगित कर रही थी। महिलाओं ने कहा कि अब जनता जागरूक हो रही है उसे मूर्ख बनाना इतना आसान नहीं है और न ही उनके अधिकारों को कुचलना। वक्ताओं ने कहा कि असली भ्रष्टाचार अधिकारों को न दिया जाना है जब तक जुल्म, आंतक व गैरबराबरी है तब तक भ्रष्टाचार समाप्त नहीं हो सकता। जैसे वनाश्रित समुदायों के उपर जो उत्पीड़न हो रहा है उस के उपर अगर वह थाने में प्राथमिकी दर्ज कराने जाते हैं तो दर्ज भी नहीं होती है।

सभी वक्ताओं ने कहा कि दिल्ली में केन्द्र सरकार को एक जबरदस्त धक्का देना जरूरी है इसलिए केवल उत्तरप्रदेश से 25000 लोग दिल्ली कूच करेगें व वहां पहुंच रहे अन्य देश के सभी संगठनों व जनांदोलनों जैसे मछुआरे के संगठन, खेतीहर मज़दूर के संगठन, महिला संगठन, ट्रेड यूनियन और उन तमाम लोग जो कि प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर हैं उनके साथ एकजुट हो कर अपने वनाधिकार के लिए संघर्ष की रणनीति बनायेगें। 

इस कार्यक्रम में मुख्य रूप से वनाधिकारों के लिए गठित राज्य स्तरीय निगरानी समिति के रामचंद्र राणा, विशेष आंमत्रित सदस्य रोमा, राष्ट्रीय जनआंदोलन का समन्वय से संदीप पांडे, सोशिलिस्ट पार्टी के ओमकार सिंह, घरेलू कामगार यूनियन से गीता, राष्ट्रीय वनजन श्रमजीवी मंच के संयोजक अशोक चैधरी, कैमूर क्षेत्र महिला मज़दूर संघर्ष समिति की शांता भटटाचार्य व रजनीश शामिल थे। मंच का संचालन शांता भटटाचार्य व मुजाहिद नफीस ने किया। 

राष्ट्रीय वनजन श्रमजीवी मंच
222, विधायक आवास, राजेन्द्र नगर, ऐशबाग रोड, लखनऊ, उत्तरप्रदेश
दिनांक- ०२-१२-२०११

Nov 30, 2011

दुधवा के गैंडों पर मड़राता खतरा

लापरवाही की भेंट चढ़ा दुधवा का गैंडा
-डी0पी0 मिश्रा

पलियाकलां-खीरी। दुधवा नेशनल पार्क में चल रही विश्व की एकमात्र अद्रितीय गैंडा पुनर्वास परियोजना के गैंडों का भविष्य सुरक्षित नहीं रह गया है इसका प्रमुख कारण है कि बीते दिवस गैंडा इकाई परिक्षेत्र में मरे गैंडा का शव एवं कंकाल पड़ा रहा उसे वनपशु खाते रहे उसकी भनक पार्क के कर्मचारियों को नहीं लग पाई यह अपने आप में ही विचारणीय प्रश्न है साथ ही गैंडों की मानीयटरिंग किए जाने का दावा भी खोखला साबित हो गया है। इस मामले को गंभीरता से लेकर प्रमुख वन संरक्षक (वंयजीव) ने कहा है कि जांच के बाद जो भी दोषी पाया जाएगा उसके खिलाफ सख्त कार्यवाही होगी ताकि इस तरह की घटनाओं की पुनरावृतित न हो सके।
एक अप्रैल 1984 को दुधवा नेशनल पार्क में पूर्वजों की भूमि पर पुनर्वासित करने की विश्व में एक अनूठी गैंडा पुनर्वास परियोजना शुरू की गई थी। डेढ़ दर्जन हाथियों के बदले में आसाम से लाए गए छह सदस्यीय गैंडा परिवार के साथ ही सन् 1985 में सोलह हाथियों के बदले नेपाल के चितवन नेशनल पार्क से चार मादा गैंडों को लाया गया था। तमाम उतार-चढ़ाव के झझांवटों को झेलने के बाद दुधवा में गैंडा परिवार बढ़ता चला गया। पितामह बांके नामक गैंडा से शुरू हुई वंशवृद्वि अब चैथी पीढ़ी तक पहुंच गई है। वर्तमान में सात नर, 15 मादा एवं नौ बच्चे यानी 31 सदस्यीय गैंडा परिवार पर्यटकों को आकर्षण का केंद्र विंदु बना हुआ है अगर यहां बच्चों समेत युवा दस गैंडा असमय कालकवति न होते तो इनकी संख्या 40 हो सकती थी। गैंडा पुनर्वास परियोजना बनाने वालों ने यहां तीस गैंडो को बाहर से लाकर बसाने और उसके बाद फैंस हटाकर उनको खुले जंगल में छोड़ देने का सपना संजोया था। उनका यह उददेश्य तो पूरा नहीं हुआ। लेकिन पितामह गैंडा की बढ़ती संतानों के कारण योजना सफलता के पायदान पर चढ़ती जा रही है। एक ही पिता की संताने होने के कारण गैंडा परिवार पर अंतःप्रजनन यानी इनब्रीडिंग का खतरा मंडराने लगा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे निपटने के लिए आवश्यक हो गया है कि गैंडो को बाहर से लाया जाए। इस विकट समस्या से छुटकारा पाने का कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है वरन् यहां के गैंडों का ही भविष्य सुरक्षित रखने में पार्क प्रशासन असफल हो रहा है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण यह है कि नेपाल में सोमवार को गैंडा सींग वरामद होने के बाद वहां से आई सूचना के बाद हरकत में आए पार्क प्रशासन ने दो मुलजिमों को पकड़ कर उनकी निशानदेही पर गैंडा इकाई परिक्षेत्र से एक गैंडा का शव कंकाल की दशा वाला बरामद किया जो करीव एक-डेढ़ माह पुराना है। बेस कैंप से एक-डेढ़ किमी की दुरी पर गैंडा शव पड़ा रहा उसे वनपशु खाते रहे उसकी भनक कर्मचारियो को नहीं लग पाई। इससे स्पष्ट हो जाता है कि गैंडों की मानीयटरिंग के नाम पर मात्र खानापूर्ति की जा रही है अगर प्रापर मानीयटरिंग हो रही होती यह जरूर पता लग जाता कि एक गैंडा गायव है। इस लापरवाही का नतीजा यह निकला कि शिकारी अपने मकसद में काम्याव हो गए और उसका सींग नेपाल तक पहुंचाने में भी सफल रहे जिसकी भनक पार्क प्रशासन को नहीं लग पाई। पार्क कर्मचारियों की इस लापरवाही एवं उदासीनता को  गंभीरता से लेकर प्रमुख वन संरक्षक  (वंयजीव) जेबी पटनायक ने कहा है कि जांच के बाद जो भी दोषी पाया जाएगा उसके खिलाफ सख्त कार्यवाही होगी ताकि इस तरह की घटनाओं की पुनरावृतित न हो सके। देखना यह है कि इस वात पर कितना अमल किया जाता है या फिर दुधवा के गैंडा लापरवाही की भेंट चढ़ते रहेगें इस बात को आने वाला भविष्य तय करेगा। 


दुधवा के नाम दर्ज है कीर्तिमान

पलियाकलां। पूर्वजों की धरती पर से एक सदी पूर्व विलुप्त हो चुके एक सींग वाले भारतीय गैंडा को 25 साल पहले एक अप्रैल 1984 को तराई क्षेत्र की जन्मभूमि पर उनको बसाया गया था। किसी वन्यजीव को पुनर्वासित करने का यह गौरवशाली इतिहास विश्व में केवल दुधवा नेशनल पार्क ने बनाया है। विश्व की यह एकमात्र ऐसी परियोजना है जिसमें 106 साल बाद गैडों को उनके पूर्वजों की धरती पर पुनर्वासित कराया गया है। गंगा के तराई क्षेत्र में सन् 1900 में गैंडा का आखिरी शिकार इतिहास में दर्ज है, इसके बाद गंगा के मैदानों से एक सींग वाला भारतीय गैंडा विलुप्त हो गया था।


भारतीय जंगलों में घूम रहे हैं नेपाली गैंडा
पलियाकला। दुधवा प्रोजेक्ट टाइगर में शामिल किशनपुर वनपशु बिहार तथा नार्थ-खीरी वन प्रभाग की संपूर्णानगर बनरेंज के जंगल और उससे सटे खेतों में पिछले करीब एक साल से मादा गैंडा अपने एक बच्चे के साथ घूम रही है। इसके अलावा साउथ खीरी फारेस्ट डिवीजन के गोला के जंगलों में भी इस साल एक गैंडा देखा गया है। बन विभाग एवं पार्क प्रशासन इसकी सुरक्षा एवं निगरानी करने के बजाय यह कहकर अपना पल्लू झटक रहा है कि यह गैंडा नेपाल की शुक्लाफांटा सेंक्चुरी का है, जो पीलीभीत के लग्गा-भग्गा जंगल से होकर आया है और घूम-फिर कर वापस चला जाएगा।



कर्मचारियों के प्रशिक्षण की नही है व्यवस्था

पलियाकला। दुधवा के जंगलों में स्वच्छंद विचरण करने वाले तीस सदस्यीय गैंडा परिवार का जीवन हमेशा खतरों से घिरा रहता है, क्योंकि इनकी रखवाली व सुरक्षा में तैनात पार्ककर्मियों को निगरानी करना तो सिखाया जाता है किंतु बाहर भागे गैंडा को पकड़कर वापस लाने का प्रशिक्षण नहीं दिया जाता है। इन अव्यवस्थाओं के कारण विगत एक दशक से तीन नर एवं दो मादा गैंडा उर्जाबाड़ के बाहर दुधवा नेशनल पार्क क्षेत्र की गेरुई नदी के किनारे तथा गुलरा क्षेत्र के खुले जंगल समेत निकटस्थ खेतों में विचरण करके फसलों को भारी नुकसान पहुंचा रहें हैं।



सुविधाएं के अभावों के बीच रहते हैं कर्मचारी

पलियाकला। गैंडा पुनर्वास परियोजना क्षेत्र में आवश्यक मूलभूत सुविधाओं के अभाव के चलते इसमें की जाने वाली तैनाती को कर्मचारी कालापानी की सजा मानते है। इससे वे पूरी कार्य क्षमता से डयूटी को अंजाम न ही देते हैं जिससे गैंडा इकाई परिक्षेत्र की सुरक्षाा प्रभावित होती है। जिससे गैंडों के जीवन पर भारतीय ही नहीं वरन् नेपाली शिकारियों की कुदृष्टि का हर वक्त खतरा मंडराता रहता है। इससे निपटने के लिए यह आवश्यक हो गया है कि परियोजना से जुड़े कर्मचारियों कों आवश्यक सहूलियतें दी जांए साथ ही साघन एवं ससांधनों को बढ़ाया जाए।



पशुचिकित्सक की नियुक्ति है जरूरी

पलियाकलां। दुधवा नेशनल पार्क में प्रोजेक्ट टाइगर तथा गैंडा पुनर्वास परियोजना जैसी अति महत्वपूर्ण महत्वाकांक्षी योजनाएं चल रही हैं। इसके बाद भी पार्क स्थापना के 34 साल बीत जाने के बााद भी विशेषज्ञ पशुचिकित्सक की नियुक्ति शासन द्वारा नहीं कर सका है। जबकि पूर्व के सालों में उपचार के अभाव में हाथी उसके बच्चे, गैंडों के बच्चे असमय मौत का शिकार बन चुके हैं। आए दिन नर गैंडो के बीच होने वाले प्रणय द्वन्द-युद्ध में गैंडों के घायल होने की घटनाएं होती रहती हैं। बिगत साल नर गैडों की ‘मीयटिंग फाइट’ में घायल हुई एक मादा गैंडा की उपचार के अभाव में असमय मौत हो चुकी है। दुर्घटना में घायल होने उनके उपचार के लिए अथवा असमय मरने वाले वनपशु के शव के पोस्टमार्टम के लिए लखनउ, कानपुर, बरेली से डाक्टरों को बुलाना पड़ता है। जिससे दिक्कतें होती हैं एवं अधिक धन भी व्यय होता है। ऐसी दशा में दुधवा में विशेषज्ञ पशुचिकित्सक की नियुक्ति जरूरी मानी जा रही  है।

विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था