International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Save Tiger

DON'T LET WILD TIGERS DISAPPEAR

Lady Rosetta

Potatoes with low sugar content and longer shelf life.

अबूझमाड़ के जंगल

जहां बाघ नही नक्सली राज करते हैं

खवासा का आदमखोर

जहां कांपती थी रूह उस नरभक्षी से

जानवर भी करते हैं योग

योगाचार्य धीरज वशिष्ठ का विशेष लेख

Dec 31, 2010

पूरे जंगल में रोप दिए गये है, सोफ़े, अलमारी और....!


सागौन ! सागौन नही हैं, ये--
विलासिता की पूर्व योजनायें हैं

-----राजकुमार महोबिया*

कँटीले तारों की फ़ेंसिंग
और डेढ़ मीटर गहरी ट्रेन्चलाइन के इस पार 
आसमान की छत के नीचे
अभावों के जंगल में उगा
पलाश का अभागा पौधा
कातर दृष्टि से देखता है उस पार--
सुविधाओं की नर्सरी में
नर्म घास की छत के नीचे
प्लास्टिक की पन्नी में पलते
सागौन के रूट सूट को
--हरा होते
पलाश को पालती है
जेठ की चिलचिलाहट
मौसम का कर्कस पिता,
सागौन को सींचती, पालती 
और दुलराती है--
नर्सरी की कामगार रेजा
-रेजा जो एक माँ है।

मुझे याद है, कि मेरे गाँव से सटा हुआ
हुआ करता था एक जंगल 
या यह कि जंगल की ममता मयी
गोद में हुआ करता था मेरा गाँव
सरई, धवा, चार, जामुन, सेझ, साजा,
कारी, कसही, ह्ल्दू, पँदर, चिढ़्चिढ़ा,
भोथी, धनकट, गुंजा, पीपल, करंजी,
कहुआ, बजा, बरसज, सेमल, तेन्दू
महुआ, आँवला, घोटहर, मकोई और
करौंदे के साथ-साथ खूब हुआ करते थे
--पलाश--जंगल भर।
गाँव के गालों को चूमते और 
स्नेह से स्पर्श करते
पेड़ नही थे ये- गाँव की छानी थे
छानी के मलगे थे
हल, पहटे और जुआँडी थे
घरों के किवाड़, काका की चारपाई के
पाए, पाटी और खुरे थे
चूल्हे की आँच थे,

स्वप्न नही- स्वप्नों का साक्षात्कार थे,
जंगल पिता थे- पालनहार-
जो चलाते थे हल, पहटे और
जिन्दा रखते थे हमारे चूल्हे।
पेड़ अब कलम कर दिए गये सारे
जो जंगल विभाग के कार्पोरेशन में पड़े है।
चट्टे बने- हरसूद के विस्थापितों की तरह
जंगल-----गाँव के पिता----
निर्जीव, नि:श्वास और उतान--
जामुन, सरई, धवा---और सारे पलाश
इनकी कब्रो पर रोप दिए गये हैं
सुविधावादी नर्सरी से आयातित सागौन
हमारे गाँव से सटे सारे जंगल में
सागौन ! सागौन नही हैं ये--
विलासिता की पूर्व योजनायें हैं
स्वप्न और लालसायें हैं
किन्तु हमारे गाँव की नही।
इनसे बनेंगे महंगे सोफ़े,
ड्रेसिंग और डायनिंग टेबिल
जिनमें खड़खड़ायेंगी--
काँच की तस्तरियां और चम्मचें
इनसे बनेंगे महल, हवेली, सरकारी इमारते
आलीशान दरवाजे, अंग्रेजी स्कूलों की डेस्क और बेन्च॥

गाँव का जंगल अब जंगल नही रहा
पूरे जंगल में रोप दिए गये है सोफ़े, अलमारी
और आलीशान दरवाजे-जो चिढ़ाते हैं--
हमारे गाँव के हल, पहट, छानी और किवाड़ को
दिखाते हैं अँगूठा-- गाँव के चूल्हों को
किन्तु सरकार की नज़र में
सागौन सरकारी हैं- चूल्हे नहीं॥
अब गाँव के जंगल में पल रहे सागौन
सक्षम नही कि खिले पलाश जैसे
इनमें कूकें हों  कोयलों की और दे सकें
संदेशा, बंसत के आगमन का,
बंसत- बंसत नही लगता जबसे
कलम कर उसे भेज दिया गया है
सरकारी कार्पोरेशन में----
बंसत विस्थापित हैं॥


राजकुमार महोबिया (लेखक उमरिया, मध्यप्रदेश के निवासी है, पेशे से अध्यापक, शौक चित्रकारी, पर्यावरण सरंक्षण, अपने क्षेत्र में नारों की पेन्टिंग कर जल सरंक्षण के महत्व को बतलाने में सफ़ल भूमिका, वन्य जीव सरंक्षण के मसलों में जन-जागरूकता अभियानों की अगुवाई, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेखन, इनसे दूरभाष द्वारा 09893870190 पर संपर्क किया जा सकता हैं )






Dec 30, 2010

दुधवा में मुसलसल शिकार होते तेन्दुए और बाघ..

क्या तराई से विलुप्त हो जायेगा तेन्दुआ

क्रूरता की सभी हदे पार करते हुए मानव इन खूबसूरत वन्य जीवों का शिकार करता जा रहा है, और इन्तजामियां पूरी तरह से नाकाम होकर अपना दामन बचाने की कोशिश में जुटा हुआ है, बजाए इसके कि उसे इन जीवों की सुरक्षा में जुटना चाहिए !.. दुधवा टाइगर रिजर्व के अन्तर्गत किशनपुर वन्य जीव विहार में लगातार हो रहे वन्य जीवों के शिकार की एक ह्रदय विदीर्ण कर देने वाली घटना पर मैलानी-किशनपुर से सुनील निगम क रिपोर्ट... 

सुनीन निगम (मैलानी-खीरी) दुधवा नेशनल पार्क की किशनपुर सैंक्चुरी में एक लैपर्ड की हत्या ने फिर दुलर्भ वन्य पशुओं की सुरक्षा की पोल खोलकर रख दी है। यह घटना अम्बरगढ़ बीट में कटैया गाँव से चन्द दूरी पर अजांम दी गई है।

सूत्र बताते हैं कि गाँव वालों ने जंगली बेलों पर लपेटे गये महीन तार में उलझकर हुई है। बताया जाता है कि यह लेपर्ड पिछले कई दिनों से इस क्षेत्र में घूम रहा था। संभवतः शिकारियों की नजर इस लेपर्ड पर लगी हुई थी। और मौका पाते ही इस दुलर्भ वन्य प्राणी का शिकार कर डाला। अपनी नाकामी को छिपाने के लिए पार्क प्रशासन में भरसक कोशिश की, लेकिन मीडिया की नजरों से छिपाने की भरसक कोशिश की लेकिन असफल रहे। अब अपनी गर्दन बचाने के लिए पार्क अधिकारी यह बता रहे हैं कि यह लेपर्ड वृक्ष की लताओं में उलझकर मौत का शिकार हुआ है। लेकिन अत्यन्त फुर्तीले और अपनी आवाज से लंगूर बन्दर को पेड़ से गिरा लेने वाला लेपर्ड मात्र बेलों में उलझकर मौत का शिकार हो जायेगा, बिल्कुल हास्यपद ही है। माना कि अगर इसकी मृत्यु स्वाभाविक तौर पर हुई भी तो शव को पोस्टमार्टम के लिए आर.वी. आई. ले जाते वक्त गोपनीयता क्यों बरती जा रही थी?




आपको बता दें कि यह वही लेपर्ड है जो कि 31 जुलाई-10 को महराजनगर गाँव के समीप शिकारियों द्वारा लगाये गये खुड़के में फँसकर घायल हो गया था। जिसे पार्क कर्मियों और डब्लु. टी. आई. की टीम ने मुक्त कराया था। लेकिन उसे पूर्ण स्वस्थ हुए ही जंगल में उसकी किस्मत पर छोड़ दिया था। इससे ही पता चलता है कि दुधवा नेशनल पार्क प्रशासन कितना सजग है।

फिलवक्त किशनपुर रेन्ज के अधिकारी अपनी गर्दन बचाने की कोशिश कर रहे हैं।

(सुनील निगम दैनिक जागरण अखबार में मैलानी से संवाददाता है, वन्य-जीवन पर लेखन में विशेष अभिरूचि, इनसे suniljagran100@gmail.com पर संपर्कक र सकते हैं।)

Dec 29, 2010

मेरी बाते दोहराती है, जो गाती हूँ वह गाती है !

छायाचित्र: गौरैया  © कृष्ण कुमार मिश्र  2010
सभ्यता नई सिखलाती है
-लवकुश मिश्र

गौरैया गुपचुप आती क्यों
दर्पण में चोच लड़ाती क्यों

पतझड़ का मौसम आया तो
पीपल ने पात गिराया तो

गौरैया का घर टूट गया
पीपल से नाता टूट गया

अब नई गृहस्थी रचे कहाँ
बच्चों से अण्डे बचें जहाँ

सहसा दर्पण पर आँख पड़ी 
भोली गौरैया चौक पड़ी

ये दुष्ट यही रहती है क्या 
सर्दी गर्मी सहती है क्या!

मैं आती हूँ तब आती है
मैं जाती हूँ तब जाती है

मेरी बाते दोहराती है
जो गाती हूँ वह गाती है

मैं कहती हूँ घर रचे साथ
सर्दी-गर्मी से बचे साथ

गौरैया अपनी छाया को
दर्पण में बैठी काया को

घोसला नया दिखलाती है
सभ्यता नई सिखलाती है

("लवकुश मिश्र" -लेखक धर्म सभा इण्टर कालेज लखीमपुर खीरी में शिक्षक हैं।}

इस कविता की कुछ पंक्तियां  कभी अपने एक पत्रकार साथी विकास सहाय से सुनी थी, संयोग से गौरैया और दर्पण की किस्सागोई के चित्र भी मुझे प्राप्त हो गये जिसे एक नर गौरैया ने बड़ी संजीदगी से अपनी विभिन्न भावमुद्राओं में  छायांकन का मौका मुझे दिया, जिनमें से एक मुद्रा का छायाचित्र इस कविता के साथ प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह कविता जो इस चिड़िया के मार्फ़त हमसे इन्सानी जिन्दगी (फ़ितरत) की कहानी बयां कर रही है, सहज शब्दों में जिनमें सदियों पुरानी दार्शनिकता परिलक्षित होती है ! जिसे आप सब से साझा कर रहा हूँ।

कृष्ण कुमार मिश्र
मॉडरेटर
दुधवा लाइव   

Dec 28, 2010

दुधवा में एक और कत्ल हुआ तेंदुआ......

फोटो साभार: शारिक़ खान

दुघर्टना नही साजिशन दी गई बेजुबान को मौत
- किशनपुर सेंक्चुरी में कांबिंग पर उठे सवाल
आखिरकार साल २०१० जाते जाते वन्यजन्तु प्रेमियों को निराश और बाघों के लिए संरक्षित दुधवा नेशनल पार्क के माथे पर बदनामी का एक और दाग दे गया। इसे किशनपुर सेंक्चुरी अधिकारियों की नाकामी नहीं तो और क्या कहेंगे कि पार्क एरिया में घुसकर हष्ठपुष्ठ तेंदुए को कातिलों ने आखिरकार बेजुबान की जान ले ली। किशनपुर सेंक्चुरी अधिकारी इस कत्ल पर लोगों और पार्क अधिकारियों को गुमराह कर अपना दामन बचाने में लगे हुए हैं।  साफ हो चुका है कि तेंदुए की मौत किसी झाड़ में फंसने से नहीं बल्कि शिकारियों के लगाए गए लोहे के तार के फंदे में फंसकर हुई है। इस फंदें में फंस कर यह बेजुबां जानवर तड़प-तड़प कर मर गया मगर शिकारियों के गढ़ किशनपुर मे अलर्ट का दावा करने वाले अफसरानों को कानों कान इसकी भनक भी न लगी। महकमा तब जागा जब चरवाहों ने इसकी जानकारी दी। लापरवाही की यह दास्तां किशनपुर में अब आम हो चुकी है।

दुधवा नेशनल पार्क के किशनपुर में ये पहला हादसा नही है, इससे पहले किशनपुर में कई हादसे हो चुके हैं। इस बार भी तेंदुआ लोहे के तार के शिकंजे में फंसा हुआ था और उसके कमर के हिस्से से बुरी तरह खून भी बह रहा था। किशनपुर सेंक्चुरी शिकारियों का गढ़ मानी जाती है,यहां शिकारी आए दिन किसी न किसी घटना को अंजाम देते रहते हैं।

काहे का अलर्ट, काहे की चौकसी
किशनपुर सेंक्चुरी में  अधिकारी अलर्ट का दावा भी करते हैं, लेकिन यह अलर्ट सिर्फ कागजी ही है जो इस घटना से साबित भी हो चुका है। अगर अलर्ट कागजों की बजाए अमली होता तो इस बेजुबां तेंदुए की जान बच सकती थी। 


अब्दुल सलीम खान (लेखक एक प्रतिष्ठित अखबार में संवाददाता हैं, मौजूदा हालात में मानवीय मूल्यों पर दमदार रिपोर्टिंग, वन्य-जीवन  के प्रति प्रेम, लखीमपुर खीरी के गुलरिया कस्बे में निवास, इनसे salimreporter.lmp@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं)

कानपुर चिड़ियाघर में शाहजहाँ के जलवे !

फ़ोटो साभार: सीजर सेनगुप्त*
"दुधवा के एक खूबसूरत बाघ की कहानी"

1. शाहजहां नाम उस बाघ को दिया गया जो मई से लेकर सितंबर तक पीलीभीत, लखीमपुर, शाहजहांपुर और फर्रूखाबाद में गदर काट दिया था।

2. यह बाघ पीलीभीत के दियोरिया रेंज के जंगल से निकला था, इसने आधा दर्जन से अधिक लोगों को अपना निवाला बनाया था।

3. इस बाघ को पकड़ने के लिए कई जिलों की वन टीमें लगी थीं और लाखों रुपये इसे पकड़ने पर खर्च किए गए थे।

4. अंत में शाहजहांपुर के डीएफओ पीपी सिंह के नेतृत्व में टीम ने इसे बेहोश कर पकड़ा और इलाज के बाद इसे कानपुर चिड़ियाघर भेजा।

5. चूंकि शाहजहांपुर की टीम ने इस खतरनाक हो चुके बाघ को पकड़ा था, इसलिए इस बाघ का नाम शाहजहां ही रख दिया गया।

शाहजहांपुर। उस वक्त तो बस पूछिए मत...हर कोई अपने घरों में दुबका रहता था। बंडा और खुटार इलाके में लगता था जैसे कि कफ्र्यू लगा हो। हर कोई उस आदमखोर हो चुके बाघ के हमले के डर से घर से निकलना ही नहीं चाहता था। एक नहीं चार-चार जिलों के लोगों में बाघ की दहशत साफ देखी जा सकती थी। वन महकमा भरी बरसात में जंगलों की खाक छान रहा था, लेकिन बाघ की लोकेशन तक नहीं मिल पा रही थी। एक के बाद एक आधा दर्जन लोगों को बाघ अपना निवाला बना चुका था। प्रदेश भर में इस बाघ का हल्ला मचा हुआ था। तब शाहजहांपुर के डीएफओ पीपी सिंह और उनकी टीम इस आदमखोर बाघ के पीछे लगी। इस टीम ने बाघ का तब तक पीछा नहीं छोड़ा, तब तक उसे बेहोश कर पड़क नहीं लिया। पकड़े जाने के बाद बाघ को लखनऊ चिड़ियाघर भेजा गया, वहां से उसे कानपुर चिड़ियाघर भेज दिया गया। तब से बाघ कानपुर में ही है और पूरी तरह से स्वस्थ्य है। बाघ को शाहजहांपुर की वन विभाग की टीम ने पकड़ा था, इसलिए उसका नाम भी शाहजहां रख दिया गया। अब यह बाघ कानपुर चिड़ियाघर में आने वालों का आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। वहां लोगों को बताया जाता है कि जब एक जानवर अपने आप को बदल कर सामान्य जिदंगी जी सकता है तो इंसान क्यों नहीं बदल सकता है। इधर, शाहजहांपुर के डीएफओ पीपी सिंह को पिछले दिनों मुख्यमंत्री ने बाघ को सफलता पूर्वक पकड़ने के लिए प्रशस्ति पत्र भी दिया है।

आइए बताते हैं शाहजहां की कहानी

बात मई की है। पीलीभीत वन प्रभाग की दियूरिया रेंज से एक बाघ निकला। उसने एक-एक कर छह ग्रामीणों को मार दिया। वन संरक्षक बरेली ने बाघ को पकड़ने के लिए अपनी अध्यक्षता में प्रभागीय वनाधिकारी पीलीभीत, प्रभागीय निदेशक सामाजिक वानिकी प्रभाग शाहजहांपुर की सदस्यता में एक समिति का गठन किया। इस कार्य में सहायता के लिए वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट ऑफ  इंडिया (डब्लू टी आई) तथा डब्ल्यूडब्ल्यूएफ इंडिया की सहायता ली गई। तमाम प्रयासों के बाद भी बाघ लगातार टीम को चकमा देता जा रहा था। इसी बीच बाघ ने पीलीभीत जिले से भागकर खन्नौत नदी पार करते हुये शाहजहांपुर में 23 अगस्त को प्रवेश कर एक ग्रामीण को मार डाला। जब तक शाहजहांपुर वन प्रभाग में आवश्यक तैयारी हो, 26 अगस्त को बाघ ने एक और ग्रामीण को मार दिया। तीन दिन के अंतराल में एक ही गांव के दो-दो लोगों की बाघ हमले में मौत के कारण जनता में भय व्याप्त हो गया था, साथ ही आक्रोश भी। 27 अगस्त को प्रमुख वन संरक्षक वन्य जीव ने आंतकी बाघ को पकड़ने के लिए प्रभागीय निदेशक सामाजिक वानिकी प्रभाग शाहजहांपुर को निर्देश दिया गया। भीषण बरसात, बाढ़ तथा दलदले वन क्षेत्र में, चारों ओर फैले गन्ने के खेत के अंदर बाघ को पकड़ना तो दूर की बात है, बाघ के दर्शन मात्र भी मुश्किल थे। 27 सिंतबर तक बाघ के लिए खुटार वन क्षेत्र में निरंतर प्रभागीय निदेशक सामाजिक वानिकी प्रभाग शाहजहांपुर के नेतृत्व में अनुश्रवण कराया गया। उक्त के दौरान बाघ को दो बार पकड़ने के लिए प्रयास भी किया गया, परन्तु बाघ भागने में सफल रहा। 

फिर आया सिंतबर का महीना

सितंबर के अंतिम सप्ताह में बाघ शाहजहांपुर से निकलकर लखीमपुर, हरदोई होते हुये 13 अक्टूबर की रात में रामगंगा तथा गंगा नदी पार करते हुये फर्रूखाबाद पहुंच गया। 14 अक्टूबर को प्रभागीय निदेशक सामाजिक वानिकी प्रभाग शाहजहांपुर अपने प्रशिक्षित दल के साथ हीरानगलासिंह गांव में दोपहर करीब एक बजे पहुंचे तथा बाघ को पकड़ने का अभियान प्रारंभ किया। लगभग दस हजार ग्रामीणों की भीड़ को नियंत्रति कर कटीले झाड़ीदार जंगल के अंदर बाघ को बेहोश करना अत्यंत ही कठिन कार्य था। सहयोगी कर्मचारियों की सहायता से शाम करीब पौने सात बजे अंधेरे मे सर्च लाइट की सहायता से बाघ को बेहोशी का इंजेक्शन लगा और वो लगभग 15 मिनट के अंदर बेहोश होकर जैसे ही जमीन पर गिरा, जाल की सहायता से उसे कब्जे में ले लिया गया तथा बाघ को लोहे के पिंजड़े में बंद कर दिया गया और उसे होश में लाने का इंजेक्शन दिया गया। बाघ संपूर्ण स्वस्थ्य एवं सही हालत में था। प्रमुख वन संरक्षक, वन्य जीव से प्राप्त निर्देशों के अनुसार उक्त आतंकी बाघ को रात्रि में ही लखनऊ प्राणी उद्यान पहॅुचाया गया। 

अब कानपुर में हैं इसके जलवे

आवश्यक चिकित्सीय परीक्षण के उपरांत कानपुर प्राणी उद्यान भेज दिया गया। प्रभागीय निदेशक सामाजिक वानिकी प्रभाग, शाहजहांपुर द्वारा उक्त आदमखोर बाघ का शाहजहांपुर जिले के नाम से नामकरण करते हुये उसका नाम ’’शाहजहां’’ रखा। आज की तिथि में लगभग तीन वर्ष उम्र्र का ’’शाहजहां’’ कानुपर प्राणी उद्यान में दर्शकों को रोमांचित कर रहा है। मई 2010 से अक्टूबर 2010 तक उत्तर प्रदेश के पांच जिलों में में आतंक फैलाने वाले आदमखोर बाघ को जीवित पकड़े जाने के उपरांत जनमानस में फैला आंतक समाप्त हुआ एवं ग्रामीण निश्चित होकर अपना कृषि कार्य कर रहे हैं।

पीपी सिंह को मिला सम्मान

बाघ को सफलतापूर्वक पकड़ने के लिए शासन द्वारा मुख्यमंत्री की सहमति से पीपी सिंह, प्रभागीय निदेशक सामजिक वानिकी वन प्रभाग, शाहजहांपुर को प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया। प्रश्नगत राष्ट्रीय पशु बाघ का नामकरण ’’शाहजहां’’ होने से तथा शाहजहांपुर जिले के वनाधिकारी पीपी सिंह प्रदेश स्तर से सम्मानित होने पर जिला शाहजहांपुर गौरवांवित हुआ।

( *बाघ की तस्वीर शाहजहाँ की नही हैं, यह मात्र प्रतीकात्मक है।)
हिन्दुस्तान दैनिक से साभार (शाहजहाँपुर संस्करण में २७ दिसम्बर २०१० को प्रकाशित)

Dec 26, 2010

दुधवा टाइगर रिजर्व में मिला तेन्दुए का शव

दुधवा में फ़िर हुआ शिकार?
किशनपुर सेंक्चुरी में तेन्दुए का मिला शव..../  
दुधवा में अलर्ट के बाद हुई वारदात....
वन्य जीवों की सुरक्षा पर सवाल ?

दुधवालाइव डेस्क (खीरी) सूत्रों से अभी मिली सूचना के मुताबिक दुधवा टाइगर रिजर्व के अन्तर्गत किशनपुर वन्य जीव विहार में एक तेन्दुए को मृत अवस्था में पाया गया है। सूत्रों के मुताबिक तेन्दुए की मौत तारों के फ़न्दे में फ़ंसकर हुई ऐसा बताया जा रहा हैं, चूकिं वन-विभाग द्वारा यहाँ अलर्ट जारी किया गया था, और पूर्व में भी शिकार की घटनाये होती रही है, इसलिए इस बात से भी इनकार नही किया जा सकता की इस तेन्दुए का शिकार हुआ हो। फ़िलहाल दुधवा टाइगर रिजर्व का प्रशासन इस घटना की जाँच में जुटा हुआ हैं।

बताया जा रहा है, कि तेन्दुए का शव कटैया वन-चौकी से थोड़ी ही दूर पर तार से लिपटा मिला है, इससे इससे आशंका व्यक्त की जा रही है कि तेन्दुए का शिकार हुआ है, किशनपुर सेंक्चुरी शिकारियो के निशाने पर पहले से ही थी, और पार्क की प्रशासन उस पर नज़र और चौकसी भी बढाये हुए था, पर तेन्दुए की इस तरह मिली लाश ने एकबार फ़िर वन्य जीवों की सुरक्षा पर सवाल खड़े कर दिए है। किशनपुर सेंक्चुरी में बाघ और तेन्दुओं  के शिकार की घटनायें पूर्व में भी होती रही हैं, और शिकारियों को  दुधवा टाइगर रिजर्व प्रशासन  द्वारा हवालात के पीछे पहुचांया गया, अभी कुछ महीने पहले ही एक तेन्दुए को किशनपुर गांव के निकट गन्ने के खेत में शिकारियों ने एक तेन्दुए को खुड़के में फ़ंसा लिया था, हालांकि इसकी जान बच गयी थी, पर इसका एक पैर घायल हो गया था, बाद में वन विभाग ने इलाज़ के बाद जंगल में छोड़ दिया था.....इस घटना के बाद  प्रशासन ने सुरक्षा और गस्त को और तेज कर दिया था, पर शायद शिकारियों के हौसलों के आगे सरकारी महकमा बौना ही साबित हो  रहा है...और आये दिन शिकार की घटनाये बढती जा रही हैं।

सूरज कभी नही डूबता !

सूरज कभी नही डूबता...
सूरज कभी नही डूबता...
सूरज कभी नही डूबता...
सूरज कभी नही डूबता...
सूरज कभी नही डूबता...
सूरज कभी नही डूबता...
सूरज कभी नही डूबता...
सूरज कभी नही डूबता...

चीजे जैसी दिखाई देती हैं, क्या हुबहू वे वैसी ही होती हैं?
क्योंकि सूरज कभी नही डूबता !- कृष्ण कुमार मिश्र
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"शाहजहाँपुर से तकरीबन १० मील दूर फ़रूखाबाद रोड के किनारे स्थित जस्नपुर गाँव जहां मैंने घर वापसी करते हुए या यूँ कह ले कि धरती के दूसरे छोर की तरफ़ जाते हुए, २४ दिसम्बर २०१० के इस सूरज को देखा, इसी बीच अचानक मेरी तर्जनी की जुंबिशों ने मेरे कैमरे में सीसीडी छवि संवेदक ने ये छवियां उकेर दी....!!".--कृष्ण
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नवीन वर्ष 2011 ईस्वीं के आगमन पर तमाम शुभकामनाओं के साथ
संपादक
कृष्ण कुमार मिश्र
दुधवालाइव

Dec 23, 2010

दुधवा टाइगर रिजर्व में रेलगाड़ी ने फ़िर ली हिरणों की जान

किशनपुर वन्य जीवविहार में हुआ ये हादसा...
हिरणों को रौंदते हुए गुजर गयी रेल....
 मैलानी रेन्ज में राजनरायनपुर रेलवे स्टेशन के आस-पास घटित हुई ये दुर्घटना...
प्रशान्त "पीयुष"(खीरी) दुधवा से निकली रेल ट्रैक बेजुबानों की मौत का सामान कब तक बनती रहेगी ये एक बडा सवाल है, जो हर बार उठता है? इस बार फिर ट्रेन दो चीतलो को मौत की नींद सुला गई। वाकया २१ दिसम्बर का है, सुबह का समय था.....ये जोड़ा सुबह की मस्ती मे चरने निकला था...कोहरे की चादर  थी... चीतलो का ये जोड़ा अपनी ही उमंग में था अभी ये जोड़ा चरते हुए आगे बढ़ रहा था, कि अचानक रेल पटरी आ गई... ये दोनो उस पर से पर जाने लगे ......पर अचानक जंगल का सीना चीरती  ट्रेन..मैलानी की तरफ से आ गई...जब तक ये दोनो बेजुबान कुछ समझते तब तक...बहुत देर हो चुकी थी...धड़धड़ाती हुई ट्रेन इन दोनो के चिथरे उड़ाते हुए ,रौन्दते उपर से निकल गई...दोनो ट्रैक पर खून से लतपथ परे थे...ट्रेन की आवाज धीरे-धीरे जंगल की खामोशी में गुम हो गई..और इन मासूमों की आवाजे तो शायद..मुंह मे ही घुट के....किसी ने खबर दी दुधवा का पार्क प्रशासन पहुंचा...देखा गया तो पता चला कि.. एक नर चीतल था एक मादा....मादा गर्भ से थी...जल्द ही जंगल मे खुशिया आने वाली थी..पर कातिल रेल ने पहले ही सब...खत्म  कर दिया....बच्चे ने जन्म से पहले दम तोड दिया वो भी कुछ इस भयावह तरह से...पार्क प्रशासन ने कागजी कार्यवाही  शुरू की.... वही...पोस्टमार्टम और लिखा-पढी ...शायद फिर रेल वालो को पत्र भी भेजा जाए...मुकदमा भी दर्ज करवाया जाए...पर इस सब से क्या होगा...जंगल और जीव जन्तु के तथाकथित बचाने वाले भी शायद शोर मचाए...पर वो सब नक्कार-खाने में तूती की तरह...ही साबित होगा....पर बडा सवाल ये भी है, की क्या बेजुबान इसी तरह मरते रहेंगे?  जंगल  की खुशिया क्या इस चीतल परिवार की तरह...उजड़ती रहेंगी? क्या इसी तरह खत्म होते रहेंगे,  ये बेजुबान अपने ही घर में? 

पहली घटना नही  है...ये?
देश भर में जंगल से निकाली ट्रेन ट्रैक तमाम जंगली जन्तुओ को समय से पहले ही मौत की नींद सुला रहे है...कही जंगली हाथी, तो कभी बाघ ,भालू और घड़ियाल....हम दुधवा की ही बाट करे तो करीब ६० किलोमीटर से ज्यादा जंगल से गुजरी रेल ट्रैक हर साल ही कोई न कोई वन्य जीव को मौत की नींद सुला रही  है...पिचले तीन महिलो मे ही यहाँ ८ चीतल ट्रैक से कट के मर चुके है...२४ अक्टूबर को दुधवा के ही कतरानिया घाट मे ५ चीतल ट्रेन से कट गए....३ नवम्बर को यही १ चीतल ट्रेन की चपेट मे आकार मौत के मुंह मे चला गया. 

बिली अर्जन सिंह ने कई बार लिखा था पत्र....
टाइगर मैन  के नाम से जाने जाने वाले बि्ली अर्जन सिंह कई बार उत्तर प्रदेश और केन्द्र सहित रेलवे को पत्र लिख कर दुधवा से निकाली ट्रेन को जंगल सेबहर निकाल्ने को लिखा..कई बार बिली खुद प्रधानमन्त्री और अफसरो से भी मिले और मांग की की दुधवा की रेल ट्रैक को हटाय जाए पर उनकी ये इच्छा पुरी नही हो पाई.

लकडी ढोने को बिछी थी रेल...
दुधवा मे रेल ट्रैक साखू की लकडी ढोने को बिछी थी...अंग्रेजों ने देश भर मे रेल पटरी बिछाने के लिए साखू के जंगल को काट कर बेशकीमती लकडी को देश भर में तराई के इस क्षेत्र से ही पहुंचाया। पर अब ये बेजुबानो की मौत का सामान बन रही है.

Dec 18, 2010

महामहिम ने देखा तराई का अदभुत प्राकृतिक सौन्दर्य

महामहिम मुख्य न्यायाधीश एफ़०आई०रेबेलो ने देखा तराई का स्वर्ग-दुधवा जंगल:

दुधवा नेशनल पार्क से देवेंद्र प्रकाश मिश्र की रिपोर्ट* उत्तर प्रदेश के एक मात्र दुधवा नेशनल पार्क में अब तक भ्रमण के लिए आने वाले गेस्ट वीआईपी को बाघ दर्शन न होने के रिकार्ड को ब्रेक तब लग गया जब शुक्रवार को दुधवा भ्रमण के दौरान हाईकोर्ट इलाहाबाद के मुख्य न्यायाधीश एफआई रेबेलो (Justice Ferdino Inacio Rebello (CJ)) आदि को वनराज के परिवार सहित दर्शन हो गए। इसके साथ ही उन्हें तीन गैंडा भी घूमते हुए दिखाई दिए। दुर्लभ प्रजाति के इन वयंजीवों को देखकर श्री रेबेलो काफी प्रफुल्लित दिखाई दिए। 

उल्लेखनीय है कि दुधवा नेशनल पार्क के इतिहास में देखा जाए तो कभी जंगल के साथ ही सीमावर्ती खेतों में वनराज के दर्शन आम रूप से हुआ करते थे। स्थिति यहां तक थी कि जब लोग वाहन लेकर चंदनचौकी या गौरीफंटा रोड से जाते थे तब उनको यह भय रहता था कि कहीं न कहीं बाघ जरूर दिखाई देगा। इसके कारण भयभीत लोग तीन चार वाहन की संख्या होने पर ही उक्त मार्गो से गतंव्य तक जाते थे। कालांतर में बाघ के दर्शन जब कम होने लगे तो देशी विदेशी वीआईपी पर्यटकों को बाघ के दर्शन जब कम होने लगे तो देशी विदेशी वीआईपी पर्यटकों को बाघ के दर्शन कराने के लिए अस्सी के दशक में तत्कालीन पूर्व फील्ड डायरेक्टर डा आर एल सिंह ने निश्चित स्थानों पर पड्डे यानी गैस के बच्चे को चारा के रूप में बांधकर बाघों को ललचाना शुरू कर दिया। जब बाघ पड्डे को मारकर खाता था तब उसके दर्शनों के लिए मचानों पर पर्यटकों की भीड़ जमा हो जाती थी। फिर समय बदला और कालान्तर में वनराज बाघों के दर्शन दुर्लभ ही नहीं अति दुर्लभ होने लगे। लोग यहां तक कहने लगे कि पहले बाघ देखना खास नहीं होता था अब भाग्यशाली को ही बाघ के दर्शन हो पाते हैं। दुधवा नेशनल पार्क में केन्द्रीय तथा प्रदेश सरकार के तमाम मंत्री, राजनेता, फिल्म अभिनेता समेत सूबे के कई राज्यपाल भ्रमण हेतु आ चुके हैं। लेकिन इनमें से ऐसा कोई भाग्यशाली नहीं रहा जिसे वनराज बाघ के दर्शन हुए हों। इससे सभी को निराशा ही हाथ लगी। लेकिन इस इतिहास को अब ब्रेक मिल गया जब शुक्रवार को दुधवा भ्रमण के दौरान इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एफआई रेबेलो को सलूका परिक्षेत्र में वनराज बाघ के सपरिवार दर्शन हो गए। दुधवा टाइगर रिजर्व के डीडी संजय पाठक के अनुसार वन भ्रमण के दौरान सलूकापुर परिक्षेत्र के ककराहा वनखंड में एक बाघ के साथ ही बाघिन को बच्चे के साथ विचरण करता देखकर सीजे श्री रिवेलो समेत उनकी पत्नी एवं पुत्र अपलक देखते ही रहे। इसके बाद गैंडा इकाई परिक्षेत्र में अलग-अलग स्थानों पर तीन गैंड़ों को जंगल में स्वच्छंद घूमते देख वह सभी लोग खासे प्रफुल्लित दिखाई दिए। इसके अलावा जंगल में चीतल, पाढ़ा आदि वन्यजीवों को भी देखकर सभी लोग खुश हुए हैं। उल्लेखनीय है कि अब तक के इतिहास में वीआईपी को वनराज के दर्शन न होने के कारण पार्क के अधिकारी हमेशा उपहास के पात्र बन जाते थे। किन्तु मुख्य न्यायाधीश को वनराज बाघ के दर्शन हो जाने के बाद दुधवा में बाघ न दिखने के कलंक से मिली निजात से पार्क के आला अफसरों के चेहरों पर भी खासी रौनक दिखाई दी।


दुधवा नेशनल पार्क के नवीन पर्यटन सत्र के द्वितीय माह की शुरूआत में टाप गेस्ट वीआईपी इलाहाबाद उच्च न्यायालय के चीफ जस्टिस एफआई रेबेलो ने यहां आकर दुधवा के नयन भिराम प्राकृतिक सौंदर्य का अवलोकन करके स्वच्छंद विचरण करने वाले वन्यजीवों को देखा। इससे पूर्व उनके आगमन के मद्देनजर दुधवा पर्यटन परिसर की व्यापक साफ सफाई करने के साथ ही गेस्ट हाउस को भी नीट एंड क्लीन कराया गया था।

जानकारी के अनुसार इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एफआई रेबेलो पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के तहत सपरिवार १६ दिसम्बर गुरूवार की देर शाम को दुधवा नेशनल पार्क भ्रमण हेतु पहुंचे। यहां पर परंपरागत ढंग से उन्होंने गार्ड आफ आनर की सलामी ली। इससे पूर्व दुधवा पार्क प्रशासन द्वारा पर्यटन परिसर की व्यापक सफाई कराई गई थी एवं गेस्ट हाउस के वीआईपी रूम को भी नीट एंड क्लीन कराया गया था। दुधवा आगमन पर फील्ड डायरेक्टर शैलेष प्रसाद एवं डिप्टी डायरेक्टर संजय पाठक तथा एसडीएम महेन्द्र सिंह आदि ने श्री रिवेलो का जोरदार स्वागत किया। शुक्रवार को प्रातःकाल श्री रिवेलो परिवार के साथ जंगल भ्रमण पर निकल गए। बताया गया कि एफडी शैलेष प्रसाद तथा डीडी संजय पाठक की अगुवाई में श्री रेबेलो ने सलूकापुर परिक्षेत्र की गैंडा इकाई, सोनारीपुर, बांकेताल आदि स्थानों का भ्रमण करके दुधवा के प्राकृतिक सौंदर्य को निहरा तथा स्वच्छंद विचरण करने वाले दुर्लभ प्रजाति के वयंजीवों को देखा। लगभग साढ़े चार घंटा जंगल भ्रमण के बाद दुधवा वापस आए श्री रिवेलो परिवार के साथ गेस्ट हाउस में कुछ समय व्यतीत करके लंच किया और उसके बाद किशनपुर वयंजीव विहार भ्रमण करने के लिए रवाना हो गए। श्री रिवेलो दुधवा में रात्रि विराम करने के बाद शनिवार को लखीमपुर के लिए रवाना होंगे। श्री रिवेलो के आगमन पर पुलिस के साथ ही वन विभाग के अमला खासा चौबंद दिखाई दिया।


खास-O-आम! के किस्से:
उल्लेखनीय है कि दुधवा नेशनल पार्क में जब कभी भी कोई मोस्ट वीआईपी आता है तो पूरा पार्क अमला उनके स्वागत सत्कार में जुट जाता है। ऐसे में पैसा खर्च करने वाले पर्यटक की खासी छीछालेदर हो जाती है। जानकारी के अनुसार इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सपिरवार दो दिवसीय दुधवा भ्रमण के लिए आए हैं। ऐसे में दुधवा के थारूहट आदि अफसरों के लिए पहले से आरक्षित कर दिए गए। परिणाम शुक्रवार को आए तमाम पर्यटकों का दुधवा प्रवास का सपना साकार न होने से वह निराश होकर वापसी के लिए विवश हो गए। 

दुधवा नेशनल पार्क में जंगल भ्रमण के लिए सपरिवार आए उन्नाव के सौरभ बाजपेई, सीतापुर के आशुतोष सिंह, अम्बेडकरनगर के अजीत वर्मा, कानुपर के पंकज कुमार, सविता देवी, नागपुर के हरनदी मिली आदि को दुधवा में रहने के लिए थारूहट आदि नहीं मिल सके। सभी पर्यटक परिवार एवं बच्चों के साथ इधर उधर घूमकर पार्क कर्मचारियों से मनुहार करते दिखाई दिए लेकिन लगभग सभी ने रटारटाया जवाब दिया कि वीआईपी आए हैं, इसीलिए यहां कुछ भी कोई व्यवस्था नहीं हो सकती है। इससे निराश होकर जहां सभी पर्यटक वापसी के लिए विवश हुए। वहीं लखनऊ की नावार्ड की टीम में शामिल अमित कुमार, विनसेट लाका, मलय कुमार भी दुधवा में थारूहट न मिलने से खासे मायूस दिखाई दिए। इन लोगों ने बतायाकि बड़ी मुश्किल से दुधवा के लिए समय निकाला था। हम लोगों की किस्मत ही खराब है। यह लोग भी इधर उधर भटककर धनगढ़ी (नेपाल) घूमने के लिए चले गए।


देवेन्द्र प्रकाश मिश्र- (लेखक वाइल्डलाइफर /पत्रकार है- दुधवा नेशनल पार्क के निकट पलिया में निवास, इनसे dpmishra7@gmail.com पर सम्पर्क कर सकते हैं।)

Dec 13, 2010

A beautiful naturalist with her beautiful mission !

volunteering at my local shelter with the dog
World Wide Animal Society: Small charity, big mission!
Maybe I should tell you a little bit about myself first and introduce myself on a more personal level. I am currently a student in the United Kingdom doing a degree in zoo-biology, however I am not so much your typical student!

I have always wanted to look after and work with animals, even from a young age, although mum wasn’t always happy about me bringing snails into the house, I loved it. Although my favorite animal is the Orca, I do have a big passion for Felids and Canids (cats and dogs of all sizes). Despite this i have had many wonderful opportunities to interact with exotic animals such as dolphins, lemurs, alligators, beluga whales, tigers and sea lions to name but a few, most of them were however in captivity, i also work voluntary at my local shelter.

I did a small project looking at endangered species, and realized how important they are to the world and how much they need to be saved, and I decided I wanted to make a difference.

I noticed how people say “there needs to be change”, but then sit there and do nothing about it, well what use is that! This is why I have decided to dedicate myself to make a difference.


The world wide society has a lot of aims, but they are to me and others, absolute necessities. However our main aim above everything else is to protect and conserve endangered species before its too late, and most of our other aims link in with this, such as educating not only children in the UK but children in the area’s where the endangered species live.

When I say we, I mean the members of WWAS and I, but we also think that to help the species, you have to help the people that live around these precious species, as providing them with seeds for crops, and other simple necessities may help reduce poaching.

Education is extremely important, the more you know about a species the more you can help it, and if I ever have children, I would not like them to grow up in a world where beautiful animals are going extinct, due to us not taking any action.

We also take pride in working towards run down zoo’s or zoo’s that are not up to high standards, we also want it to be made by law that all mammals kept in zoo’s worldwide should be provided with enrichment. Enrichment prevents boredom, and is also good for the animals mental state, to keep an animal ‘happy’ its mental state must be stimulated by new things, why keep animals such as bears which need something to do and provide them with 4 walls and a concrete floor, most end up self mutilating out of bordom, to us it seems that if no enrichment is provided it is somewhat cruel.



How would you like to spend a lifetime, behind bars staring at a wall and pacing up and down? I for one know that I would probably rather be euthanized. We want to set regulations around the world for what is suitable to have, and what isn’t, for example size of enclosures. Some zoo’s are in such awful conditions, and nothing is being done about it, most of them containing endangered species, shameful.

Another one of our aims is to stop cruelty, now we have all seen some shocking animal cruelty videos, with the owners getting minimal jail and low fines, why? It’s ok to kill an animal apparently in cruel ways and get a pretty useless sentence with a usually small fine, however it’s a completely different story when we kill one of our own species.

So what we wish to do about this is tackle cruelty full on, a lot of nonprofit shelters all over the world simply don’t have enough money to house all of the animals, and so many are put to sleep daily, and this is one thing we will be looking at in the future. We will try and support some shelters so more animals don’t have to face that lethal injection, we will also be looking at doing a spaying and neutering campaign. As for cruelty, we really want to push sentences, fines and bans to a much higher level. We want more action to be taken when a serious act of cruelty takes place, we want the ban on keeping animals for life to be used more, higher fines and longer jail sentences.

Cruelty takes place in many forms, from abusing animals such as kicking them, to starving them or skinning them alive – all are cruel and none of them should take place, but they do, and they all happen millions of times a day all over the world. Poaching in some countries is taken very lightly, where as other countries take it more seriously, we want it to be taken seriously everywhere, especially when they are killing animals that are almost extinct, don’t you?

Moving on! As we get more donations, we really want to conduct research on endangered species to learn more about them, as understanding them could actually be the key to actually saving them, research is absolutely critical to understanding anything!

A new project we are starting to work on and develop is ‘Animal India’. When all details are finalized, we want to build education centers around the places in India that are close to tiger populations. We then aim to send uniforms and equipment such as binoculars for the rangers who guard the tigers, and also provide seeds and other necessities for the locals in the village hoping they will use these instead of resorting to poaching.


Your help and support is extremely precious to us. 

Much love and care
Nicola & World Wide Animal Society 

Nicola Marsh* The Author is a founder of World Wide Animal Society in Southwell, Nottingham, United Kingdom, She may be reached at worldwideanimalsociety@gmail.com

Dec 12, 2010

आओ प्यारे कम्प्यूटर पर बाघ बचायें!

वन्य जीवन सरक्षण बनाम टोपीधारी वन्य-जीव प्रेमी!
 .....जंगल-जंगल...तो क्या ये सब बेमानी है
...क्या मात्र कथित विरोध दर्ज करना और वन्य जीव अध्ययन के नाम पर पढ़ी किताब को दोहराते रहना वन्य संपदा के सरंक्षण में कितना लाभप्रद है!
कुछ  दिनों पूर्व मेरे मित्र सप्तर्षि सहगल के साथ हो रही चर्चा के दौरान एक बात उठी कि क्या मै कभी पारधी जाति के लोगो से मिला हूं , वे लोग कैसे हैं फ़िर चर्चा बाघो के शिकार पर पहुंच गयी , उनका कहना था कि पन्ना मे बाघों के खात्मे के लिये पारधी लोग ही जिम्मेदार हैं । इस बात पर मेरा ध्यान कान्हा मे पिछले दिनो राष्ट्रीय उद्धान की सीमा के भीतर वनोपज एकत्रित करने गये एक आदिवासी के मारे जाने पर फ़ेसबुक मे की गयी टिप्पणियों पर गया   जिसमे मारे गये व्यक्ती को बेवकूफ़ ,अच्छा हुआ , इसी के लायक था  इस प्रकार की टिप्पणियां की गयी थी एक सज्जन तो और आगे पहुच गये वे अफ़सोस व्यक्त कर रहे थे कि मारे गये व्यक्ति का साथी बच कर निकल गया उसे भी मर जाना था ।

जंगल में किसने किसको नोचा, किसने किसको खाया- देखिए फ़ेसबुकिया !
फ़ेसबुकिया आदि पर शोक प्रगट करते लोग, अक्सर आप को वहाँ वर्चुअल मुण्डन कराते लोग मिल जायेंगें, जबकि पर्यावरण के नाम पर एक पीपल-बरगद रोपने या घर के आस-पास पौधों को पानी देने या फ़िर शिकारियों से वन्य जीवों की सुरक्षा में कोई जमीनी कदम नही उठायेंगे....क्योंकि इन्टरनेट है न! कोई खतरा नही! कोई खर्चा नही!... मामला जम जाता हैं, एक नौटंकी में एक किरदार को क्या चाहिए ? ..वाह-वाही..जो यहां नेट पर आँखें जमाए कुछ खलिहर लोग कर ही देते हैं!
आज भारत मे वनों और वन्यप्राणियों से प्रेम करने वाली एक नयी पीढ़ी तेजी से सामने आ रही है जो येन केन प्रकारेण बाघो को वापस स्थापित करना चाहती है । पर्यावरण तंत्र के लिये यह पुनर्जागरण काल से कम नही है । 
एक एक बाघ की मौत पर देश के बुद्धिजीवी वर्ग मे मुर्दनी छा जाती है वह दिन भी दूर नही जब इस बात पर राष्ट्रीय शोक की घोषणा भी होने लगे । इस प्रबुद्ध वर्ग के बाघ प्रेम मे सबसे बड़ा रोड़ा वे आदिवासी है जो बाघ के रहवास स्थल और इसके आसपास रहते हैं हर शिकार की घटना मे इनका ही नाम सामने आता है पर इन्होने अपने घरों से हटने से इंकार कर दिया है और इनके रहते बाघो के बचने की कल्पना भी नही की जा सकती ऐसा इस  प्रबुद्ध वर्ग का मानना है |


क्या मुवावजा कोई मौजूं विकल्प है?
आज सदियो से वन्यप्राणियो के साथ समरसता से रहते आये आदिवासियो की स्थिती अजीब सी हो गयी है प्राक्रुतिक वनो के अभाव मे अमीर आदिवासी गरीब हो गया है वनो मे उसके और उसके पशुधन के लिये कुछ नही है उपर से वन्यप्राणी उसकी फ़सलों और पशुओ कॊ हानी पहुचा रहे है । मुआवजे के लिये दर दर ठोकर खाने के बाद जब वह बदला लेता है तो वह अपराधी बन जाता है । सेव द स्ट्राईप नामक जबलपुर स्थित संस्था के आकलन के अनुसार एक गाय के मरने के बाद वन विभाग के द्वारा दिये जाने वाले महज 2000 रूपये मुआवजे के लिये ग्रामीणो को १००० रूपये रिश्वत देनी होती है इसके कई महिनो बाद मुआवजा प्राप्त होता है ।
नव उदित बाघ प्रेमियो के पास इसका भी जवाब है कि सरकार उचित मुआवजा देगी पर यदि सरकारी तंत्र सही मुआवजा देने मे कुशल होता तो क्यों ये आदिवासी फ़सलो और पशुओ का नुकसान होने के बाद वन्यप्राणियो को मारते ।  देखिये कुछ आदिवासी पैसों के लिये शिकार करते हैं इसमे कोई शक की बात नही है पर आम आदिवासी बाघो को तभी मारता है जब पशुओ पर  हमले लगतार हो रहे हों हाल ही मे सरिस्का मे हुई मौत इसका जीवंत उदाहरण है ST1 नामक बाघ लगातार पशुओ को मार रहा था और वनविभाग ने कॊई कदम नही उठाया निश्चित ही उचित मुआवजा भी नही दिया गया होगा तब जाकर गांव वालो ने उसको मारा । अब उस गांव को हटाने की मांग उठा रहे पर्यावरण वादियो को क्या वन विभाग के अफ़सरॊं को नौकरी से हटाने का खयाल नही आता जिनकी हरामखोरी के कारण पहले एक बाघ का जीवन बरबाद हुआ और अब गांववालो का जीवन बरबाद होगा  ।

आदिवासियों का विस्थापन क्या उचित है?
किसी भी जीव की स्वनिर्भर आबादी को बनाए रखने और उसमे संख्या  वृद्धि करने का एक मात्र उपाय उसकी भोजन श्रंखला को अधिक संमृद्ध  करना और उसमे बढोत्तरी करना है, मौतों पर नियंत्रण उपाय नही हो सकता ।
बाघो की बची खुची आबादी को बनाए रखने और उनकी संख्या में बढोत्तरी करने का एकमात्र उपाय यह है कि बाघो की भोजन श्रंखला कॊ नये भोजन स्रोत उपलब्ध कराने होंगे प्रजाति विविधता वाले वनो के अभाव मे एक मात्र आसान तरीका जो बचता है वह यह है कि इन अभागे आदिवासियो को बेघर कर के उनके खेतो को घास के मैदानो मे बदल दिया जाय । ये मैदान हिरणो की एक बड़ी आबादी को सहारा देते हैं ,आज जितने भी राष्ट्रीय उद्धानों मे बाघ बड़ी तादाद मे हैं उन सभी मे गावों को हटा कर बनाए गये बड़े बड़े घास के मैदान है 


बरबाद होते वन और तबाह होते लोग:
हम शहर वासियो की गाड़ियों और कारखानों से निकलने वाले धुएं की कीमत किसी न किसी को तो चुकानी ही होगी और बाघो के बिना जंगलो का पर्यावरणतंत्र भी असफ़ल होगा । बिना सागौन और साल के हम शान से जी भी नही सकते और अगर हम ठान भी ले तो इमारती वनो को प्राक्रुतिक वनो मे बदलने के लिये जरूरी शासनतंत्र भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुका है । बाघ के रहवास स्थलों एवं उसके आस-पास के वन-स्थलों में  फ़ल और फ़ूल दार वृक्षों का रोपण करना वन विभाग के न तो मसूबों में है और न ही बस में। ऐसे मे बलि का बकरा तो वनवासियों को ही बनना होगा आखिर देश ने सारे बलिदानो का ठेका तो गरीबो को ही दे रखा है ।

नक्सलवाद और जंगल और घातक-बुद्धिजीवी:
इन सब परिस्थितियों मे कोई आश्चर्य नही की आदिवासियों ने नक्सलवाद का दामन थाम लिया है और एक के बाद एक वनक्षेत्रो मे उनका कब्जा होता जा रहा है । और बाघ प्रेमियो के प्रबुद्ध वर्ग को मै यह भी बताना चाहुंगा कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रो से बाघ और अन्य वन्यप्राणियो की संख्या मे अच्छी व्रुद्धी की खबरें मिल रही हैं और उत्पादन वनमंडल के बहुत बड़े वनक्षेत्र मे प्रक्रुतिक वन फ़िर अपनी जड़े जमाने लगे है । इन इलाको मे जहा वन विभाग का कोई नियंत्रण नही है वनवासियो ने वापस अपनी प्राचीन जीवन शैली को अपना लिया है और बेवार पद्धती की खेती से वन्यप्राणियो को घास के नये मैदान मिलने लगे है और उन्होने फ़िर अपनी संख्या मे बढ़ोतरी कर ली है । हालाकि हमारे उच्चशिक्षा प्राप्त वनाधिकारी भी कैनोपी ओपेनिंग के नाम से यह काम करने का प्रयास कर रहे है पर उनका तरीका कामयाब नही है । शायद नवनियुक्त भारतीय वनसेवा के अधिकारियो को देहरादून मे प्रशिक्षण देने के बजाय उनको नक्सल कब्जे वाले अबूझमाड़ मे २ वर्षो के लिये भेजना ही उचित होगा जहां वे सीख सकते हैं कि कैसे एक जंगल मे आदिवासी और बाघ एवं उसकी प्रजा समरसता से रह रहे है । 

जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों  की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।


अरूणेश दवे (लेखक छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में रहते है, पेशे से प्लाईवुड व्यवसायी है, प्लाई वुड टेक्नालोजी में इंडियन रिसर्च इंस्टीट्यूट से डिप्लोमा।वन्य् जीवों व जंगलों से लगाव है, स्वतंत्रता सेनानी परिवार से ताल्लुक, मूलत: गाँधी और जिन्ना की सरजमीं से संबध रखते हैं। सामाजिक सरोकार के प्रति सजगता,  इनसे aruneshd3@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।) 

A story of species killers Part-II

....concluding part of 


 .......With Kalandars:
“AssaSalaam Alaokum bhai”, I said. “Waileikum ass Salaam”, one of the bear owner replied. I could see only 3 bears and 3 owners. Still two of them were missing, so I thought I will wait for them and spend time in discussing with them. I told, “Yahhan kamai nahi hai”. One Kalandar said, ‘ye kamai ka ilaqa nahi hai, kamai to Raipur mei hai”. One of the kalandar offered me bidi (I don’t smoke, but 90% of the kalandars smoke and I accepted their offer). I took the bidi and started smoking. We discussed all issues, I collected lot of information on bear cub trade in the state of Chattisgarh. The information helped me a lot in sloth bear cub trade control. Now I have substantial information about bear owners. All the bear owners are from Chorbhatti, Bilaspur. They all got these cubs from Marvaha Range of Amarkantak Reserve Forest.
In the meantime two other kalandars also came with their bears. I thought this is the right time, now I should inform the enforcement team. I told one kalandar that I will piss and come. I went 50 m away from the tents behind the bush. I took out the mobile, there was no network. I tried all the options, moved my phone in all directions but was not able to get any signal. I came back to the Kalandars. They were planning to go to other side of the river. I have to do something. I told them, “ Mei zara thandi chai (Local liquor) peekar aata hoon”. One of them also came with me. We went to a theka nearby the village. As  I don’t drink so it was totally a different situation for me. We bought an Adha (100ml liquor bottle) that costs Rs 25. I made two packs. He finished his pack within a fraction of a second and I was taking the smallest sip as I can’t tolerate the smell of liquor. So the whole bottle was finished by the other kalandar. He bought another bottle soon and that was also finished. Now he was quite drunk and he told me, “you know why we are moving? Saleem (another kalandar) had seen the forest department’s jeep at the Chowk”. 


 I understood this operation is going to be difficult and I didn’t want my first operation to be a failure. I have to do something. I said, ‘You carry on, I will call my family and come”. I came out of the bar. I saw a small khoka (small wooden shop  mainly for selling pan, tobacco, cigarette) with STD facility. I called the ranger and said, “Sir aajayei ye log jaanei walei hai, jaldi aa jao”. He said, “Ok we are reaching”. I came back to theka, basher was almost unconscious. We both left to the river. When I reached to the river I saw they have already packed everything and were waiting for Basher. Within 15 min they all were ready to leave. 


I was eagerly waiting for the team. In front of my eyes they were going and I was not able to do anything. When team reached they have already crossed 85% of the bridge. They directly stopped the vehicle near me and asked about them. This was the biggest blunder he did. Kalandars were seeing all this from the bridge. Now they understood that I am not a kalandar or I am a kalandar working with forest department as informer. As now I was out of cover so I told the ranger that they are crossing the river, please arrest them. I don’t know why none of the team members were able to see them. In the meantime they had crossed the river and went to the other side. Ranger told me, “ We can’t arrest them now because now they are not in our division. We will inform Raipur division and they will arrest them”. I was shocked. Wildlife criminals are going in front of you with schedule-I species and you are talking about division and all. I took out my phone it was showing single network signal. I called Bhagat Sir, Chief Wildlife Warden. Because of the network problem it took 10 calls and almost half an hour to explain him the situation.
Once he understood the problem, he called Ranger and gave him a good dose, “All divisions comes under me and you are supposed to follow my instructions”. In all this Kalandars had moved far away, we crossed the bridge and enquired about the bear owners. They said, “ aagei gayei hai sahib”. We travelled 10 km by jeep and reached to the main road and we all sat at one dhaba, the time was 10:30 PM. We all had dinner there. Although there was not much food variety available and the food was not hygienic too, but I was so hungry that I had 5 chapati. Two locals were also sitting there and having food. They were taking about everything right from village girls to Prime Minister of India. One of them said, “ You know bear owners are staying in our village”.
I got the information I wanted and so at 11:30 pm we all planned to do a raid at 12:30 AM. Forest officers were very enthusiastic now as they have received a good lecture from CWLW. We waited for an hour, in the meantime and we had arranged one 407 vehicle for transporting the bears. Vehicle reached at 3:30 AM. I, ranger and 3 forest guards left for the location. We were sitting on a highway from midnight, this was first time when I spent my whole night on road. 


5 tents were there in a big field. All of them were in deep sleep. I requested one of the forest guards to call one of the kalandars. Basheer came near to me. Ranger asked, ‘Bhaloo ke kagaz dikhao”. He called other kalandars too, all of them had shown the copy of their ownership certificates. Ranger was not interested in the raid from the beginning and so he said to me, “they all have ownership certificate so we can’t arrest them”. I tried to explain him “Sir first they are supposed to carry certificates in original and second he is showing us certificate issued by the name of basher, but how do we know he is basher, there is no photo on the license”. I asked Basher to show his voting card, he was not able to show that. So at last I convinced the ranger to arrest all of them. 


 In all this we have wasted three hours, and villagers started coming. Actually they were supporting Kalandars, and it is not wrong also as they don’t know the real picture of illegal wildlife trade happening behind this bear dance picture, for them kalandars are poor people who earn money from street shows and we are harassing them. I have to lead the team now, so I gave duty to two forest guards to manage the crowd. We started loading the bears in truck, kalandar ladies started crying as today was Ed. I was also bit moved after seeing this. I am not King Ashoka, but you can’t see ladies and children crying. Especially children they were crying like anything, their fathers were arrested in front of their eyes on Ed, they must be expecting some Edi (Money given to children on Ed) today, they have not seen in their wildest dream that their father will be arrested on Ed. Then I thought I am just doing my duty and if police starts thinking in the same way then no criminals will be arrested. We left the location within next half an hour. We reached Nandanvan, Raipur Zoo at 1:30 PM. We told Kalandars to tie all the bears behind the main office building. We gave them some bread with milk. 


Me and ranger started working on the paper work for moving the bears from Raipur to Agra. At 3:30 PM we went back to the Raipur court for taking a court order to shift the bears. Judge has already left the court and next day was Sunday so we have to wait for next two days. But we have already given the application as according to the law we have to submit an application within 24 hrs. I decided to shift to a hotel then and take rest.
Sunday morning I started early morning as I wanted to feed bears myself. I took a bus to Nandanvan, bus dropped me to the main road, from there I walked 3km to reach the zoo. At 9:00 am I reached the zoo. Because of Sunday ranger was not there so I directly went to meet the kalandars, they have already given the food to the bears. I just played with bears for 15-20 min, this was the first time I was touching the bears, I had never seen bears so closely.  I took some photos with my Kodak easy share camera, which I bought at Rs 595/- during my MSC field orientation work. 



Then I decided to take a tour of the zoo.  There were 6 common leopards in the zoo, when I asked the keeper about the source of leopards. He said all these leopards were rescued from conflict situation and all of them are man eaters. I really felt bad about the leopards as they all were in small cages. Leopards are the most suffered animals because of conflict, they get life imprisonment for entering in the human settlement. Then I saw a tiger, its paw was half cut, when I asked about it to the keeper. He told me the story that this tiger was rescued from Panna Tiger Reserve, when we reached there to rescue its leg was trapped in the leg hold trap, during the rescue it lost half paw. These were some of my observations about wildlife in the zoo, I also observed some other things which I would like to share with you. During my trip I saw so many couples in objectionable positions in the zoo, some were sitting on a bench behind the tiger enclosure, some were sitting behind the canteen, some were near the hyaena enclosure. Before this I had seen the same thing happening in two more zoos one in Delhi and one in Lucknow and now big part of the zoo’s income comes from these couples. The most important thing is these people even don’t feel ashamed and they will do everything without bothering about the movement happening near them. After giving evening food to the bears I left for Raipur. I reached the hotel at 7:30 pm.
Next day I reached court early morning, ranger was already there with government advocate. 1:00 PM was our hearing time, but I thought it will be better to talk and explain the issue to judge in advance. Although government advocate was with us all the time, but he was not at all trained to fight wildlife cases, even he was not aware of the Wildlife Protection Act (1972). Before coming to the hearing he bought a small Rs 50/-  manual on WPA from nearest stationary shop. Now I know why the conviction rate is less than 1% in wildlife crime cases. At 2:30 PM judge called us, he hardly gave us 10 min and I explained it to him that these rescued bears are not in healthy condition and for the better care of these bears they have to be shifted to  Agra Bear Rescue centre. He was confused or you can say he was not interested in the case but within three hours we received the letter for shifting the bears to ABRF. 


My next aim was to arrange the vehicle for shifting the bears. We have arranged a 407 for transporting the bears. Next day early morning I reached to the Nandan Van zoo. Because the Kalandars had been shifted to Raipur jail, so one night before forest guards were shifted four bears to transportation cages, but one bear was in a leopard enclosure. The bear in the enclosure was a ferocious one, it was a challenge for all of us to shift the bear to transport cage from the enclosure. After trying all possible inhumane methods by the forest officials, I decided to enter into the enclosure. Although I was also very afraid as this was the first time when I was handling a bear in such situation, but I was not showing my fear to any forest officials or even to the bear, because once a Kalandar told me that if you show your fear to a bear then the bear will surely try to dominate you. Bear was sitting in a corner with long thick plastic rope coming out of its nose. I had seen how Kalandars handle bears before, but now I can say seeing and doing is different especially in case of bear it is really different they are the most unpredictable animals. Already so many people have pulled the rope from outside, even little blood was coming out of the nose, this has made the bear more aggressive, so I decided that I wouldn’t pull the rope, first I will try to pet the bear. I reached near the bear and in first chance itself the bear attacked on me, and I have lost my favorite shirt, my first branded shirt. it was not only the shirt that was damaged but I also got a scratch mark on the chest…for which later on I have to give several explanations to my parents. I tried again, and same thing happened bear was not even giving me a chance to reach to the rope. But like in Hindi films, the third time I got success and the rope was in my hand. Then I sat near the bear and pet her for 20 minutes. I gave some honey to the bear, and then we made a continuous line of honey from the leopard enclosure to the transporting cage, we have kept the transportation cage at the entrance of the enclosure. Both the gates of the cage were open and I brought the bear slowly in the cage and came out of the cage from the other door. At last the bear was in the transportation cage. 


Rohit Singh
rohit601@gmail.com
Technical Advisor-Eastern Plain Landscape-Law Enforcement
WWF Cambodia Country Programme
House #54, Street 352,
Boeung Keng Kang I,
PO Box 2467, Phnom Penh, Cambodia

Dec 11, 2010

नदियों की मौत का जिम्मेदार कौन?

सरयू नदी सर्वेक्षण रिपोर्ट

तराई की नदियों का ध्वस्त होता पारिस्थितिकी तन्त्र !
...नदियों के जल-जीवन में चीनी उद्योग ने मचाई तबाही...!
शासन-प्रशासन की नाक तले नदियों में गिराये जा रहे हैं गन्दे नाले...!

स्थानीय समुदाय से वार्तालाप करते संस्था के सदस्य
पिछले कई सालों से तराई एन्वायरन्मेन्टल फ़ाउन्डेशन गोण्डा जिले के सभी तालाबों और सरयू नदी (बहराइच और गोण्डा जिला) में कछुवों के विभिन्न प्रजातियों के उप्लब्धता एवं उनकी संख्या तथा इन कछुवों कें शिकार और उनके व्यापार के बारे में लगातार सर्वे कर रही है। इस कार्य को हम  मद्रास क्रोकोडाइल बैंक ट्रस्ट चेन्नई के मार्गदर्शन से कर रहें हैं। कछुवों के बारे में जानकारी एकत्र करते हुये हमें सरयू नदी और उनके किनारों पर रहने वाले लोगों और समुदायों की बहुत सी समस्याओं के बारे में भी जानकारी होती गयी और इस सर्वे में कुछ जबरदस्त चौकाने वाले तथ्य भी सामने आयें जिससे सरयू नदी का अस्तित्च ही खतरे में दिख रहा है।
  
सरयू नदी का संक्षिप्त परिचय

सरयू नदी का उद्गम बहराइच जिले से हुआ है। बहराइच से निकली ये नदी गोण्डा से होती हुयी अयोध्या तक जाती है। दो साल पहले तक ये नदी गोण्डा के परसपुर तहसील में पसका नामक तीर्थ स्थान पर घाघरा नदी से मिलती थी किन्तु अब बाँध बनने के कारण ये नदी पसका से करीब 8 किमी0 आगे चन्दापुर नामक स्थान पर मिलती है। अयोध्या तक ये नदी सरयू के नाम से ही जानी जाती है लेकिन उसके बाद ये घाघरा के नाम से पहचानी जाती है। सरयू नदी की कुल लम्बाई 160 किमी0 के लगभग है। 



मछलियों का शिकार करते स्थानीय
इस नदी का भगवान श्री राम के जन्म स्थान अयोध्या से हो कर बहने के कारण हिन्दू धर्म में विशेष स्थान है। रामायण के अनुसार भगवान श्री राम ने सरयू में ही जल समाधि ली थी। ऐसी भी मान्यता है कि हर वर्ष तीर्थराज प्रयाग देव रुप में आकर सरयू में स्नान करके अपने को धन्य मानते है। सरयू नदी का वर्णन ऋग वेद में भी मिलता है।

लोगों की ऐसी मान्यता है कि इस नदी के पानी में चर्म रोगों को दूर करने की अद्भुत शक्ति है। लोगों का ऐसा भी मानना है कि इस नदी के अन्दर सब कुछ समाहित करने की अपुर्व ताकत भी है।


अगर हम इस नदी की परिस्थितिकी तंत्र के बारे में बात करे तो ये नदी निरंतर बहने के बावजूद एक बहुत बड़े वेटलैण्ड की तरह भी लगती है। इस नदी में मछलियों और कछुवों के अलावा बहुत तरह के जलीय छोटे-बड़े जीव-जन्तु रहते है। इस नदी में विभिन्न प्रकार की वनस्पतियाँ भी हैं जो नदी के पानी को शुद्ध करने के साथ साथ पानी में कुछ औषधीय शक्ति को भी बढ़ाती हैं। लेकिन 2007-08 के सर्वे के दौरान एक महत्वपुर्ण जानकारी सामने आयी। अप्रैल माह से सरयू में मछलियों का शिकार तेज हो जाता है लेकिन पसका क्षेत्र के पास करीब 10 किलोमीटर के दायरे में सरयू नदी के पानी में नहाने से बदन में खुजली की शिकायत शुरू हो गयी जिसके कारण इस क्षेत्र में लोग नदी में उतरने से कतराने लगे जिस के कारण यहाँ मछलियों का बहुत कम शिकार हो पाया। इस तरह की घटना को प्रकृति का अपने को इन्सानों के हाथों से बचाने का एक तरीका कहें या फिर हम इन्सानों का प्रकृति के साथ खिलवाड़ करने का एक परिणाम।

सरयू नदी का प्रदूषण 

इन दिनों इस औषधीय शक्ति वाली नदी अपने इस उपयोगिता को खोती जा रही है। कारण है इस नदी के परिस्थितिकी तंत्र के साथ छेड़छाड़ और खिलवाड़ किया जाना। नदी में गैरजिम्मेदाराने ढंग से जलीय जीव-जन्तुओं का शिकार और इसे प्रदुषित करती हुई विभिन्न गन्ना मिलों का कचड़ा  और प्रदूषित पानी इस पवित्र नदी की उपयोगिता को कम करती जा रही है।

चीनी की मिलों का अनुपयोगी प्रदूषित जल और कचड़ा बह कर इस नदी में आ रहा है और सरयू नदी के जल से मिल कर ये पूरे नदी को ही प्रदूषित कर रही है और कई बार तो इस प्रदूषण के कारण बहुत से जलीय जीव-जन्तुओं को बहुत बड़ी संख्या में एक साथ मरते हुये भी देखा गया है।

सरयू में अवैध बंधिया

सरकार हर साल नदियों के पानी को ठेकें पर विभिन्न मछुआरा समितियों को देती है तथा साथ ही साथ नदियों में मछलियों के शिकार के कुछ मापडण्ड भी निर्धारित करती हैं लेकिन इन नियमों को ताक पर रख कर लोग खूले आम गैरकानूनी तरीके से मछलियों के शिकार कर रहें हैं।
नदियों में किसी भी तरह का बाँध बाँधना वो भी एक किनारे से दूसरे किनारे तक गैरकानूनी है लेकिन ये दृश्य नदी में हर 10 से 15 किमी0 पर देखने को मिल जायेगा।
   बाँध बनाने के अलग अलग तरीके प्रयोग में लाये जा रहे है। कोई लकड़ी के लठ्ठों को गाड़ कर उसमें जाल लगा कर पानी को बाँध रहा है तो कोई बाँस को गाड़ कर उसमें बाँस की चटाई बुन कर नदी को बाँध रहा है। कुछ लोगों ने तो मच्छरदानी को ही लगा कर नदी को बाँध दिया है। सभी बधियों में एक बात की समानता है कि जिस समिति के हिस्से में जो नदी का ठेका आया है वो उस हिस्से को पूरी तरह से साफ या नष्ट करने में लगा है। इन सब कार्यों के लिये विशेष रूप से बिहार से बाँध बनाने वाले और शिकार करने वाले बुलाए जाते हैं।

इस तरह के बाँध के कारण नदी के पानी का बहाव अवरूद्ध हो रहा है जिसके कारण मछलियाँ, कछुवें और अन्य जीव जन्तु नदी के दो बाँधों के बीच में फँस जाते है जिससे उनका ठीक तरह से विकाश नही हो पाता है। बरसात में ये मछलियाँ नदी के बहाव के विपरीत दिशा की तरफ जा कर अण्डे देती है लेकिन बरसात के बाद जब ये मछलियाँ नदी के बहाव की तरफ वापस होती है तो उस समय नदी पर फिर से बाँध बधनी सुरू हो जाती है ऐसे हालत में ये मछलियाँ दो बाँधों के बीच में फँस जाती हैं और उनका पूरे नदी में घूमना बन्द हो जाता है। जो मछली जिन दो बधियों के बीच में होती है वो वही कैद हो जाती है और ये पूरे नदी में बराबर तरीके से नही फैल पाती है। इस कारण नदी के कुछ समितियों को तो काफी मात्रा में मछलियाँ मिल जाती है लेकिन कुछ समितियों को खाने के भी लाले पड़ जाते है। 

जगह जगह से बह कर आने वाली गन्दगी भी इन बधियों के बीच में फस जाती है जो कुछ समय के बाद सड़ कर पानी को प्रदूषित कर के पानी मे तरह तरह के बीमारी पैदा करने वाले जीवाणु और कीटाणु को जन्म देती है जिससे पानी में रहने वाले जीव जन्तुओं के अलावा नदी के किनारे रहने वाले लोग भी विभिन्न तरह की बिमारियों का शिकार हो जाते है। हमे नदी के सर्वे के दौरान इस तरह के बहुत से दृश्य देखने को मिले जिसमें बधिया के पास कई प्रजाति के कछुवें मरे मिले।
 
              

मछलियों के शिकार के लिये प्रयोग जाल 


मछलियों के शिकार करने के लिये जिन जालों का प्रयोग किया जाना है उन खानों का आकार सरकार द्वारा निर्धारित किये गये आकार के बराबर होना चाहिये लेकिन लोगो ने इस बात को भी ताक पर रख दिया है। लोग मच्छरदानी के जाल से  शिकार कर रहे हैं जिससे मछलियों के छोटे छोटे बच्चे भी उनके हाथों से नही बच सकते। इन जालों में विभिन्न प्रकार के जलीय जीव जन्तु भी फस कर अपनी जान गवा बैठते हैं।
        

छोटी मछलियाँ (बच्चें) पकड़ना तो मना ही है और इन्हे सुखा कर बेचना तो और भी बढ़ा अपराध है लेकिन लोग बहुत बड़ी संख्या में इन्हे सुखा कर बेच रहे है क्योंकि ताजी बेचने पर इसका सही दाम नही मिल पाता है।
 
                   
हमने ये भी देखा कि जिन महीनों में मछलियाँ अण्डे देने लगती है उस समय नदी पर शिकार पर पाबन्दी हो जाती है (नीचे की चित्र में तारीख देखें)लेकिन उस समय भी लोग शिकार में लगे रहते है। ऐसी दशा में उन मछलियों का भी शिकार हो जाता है जिनके पेट में अण्डे होते हैं जिसके कारण दिन प्रति दिन नदी मे मछलियों की संख्या में तेजी से गिरावट हो रही है।

         
स्थानीय समुदाय के लोगो, खास तौर पर बुजुर्गो से बात करने पर ये बात और स्पष्ट हो गयी कि नदी मे शिकार के नियमों के पालन न करने के कारण नदियों में मछलियों की संख्या में निरंतर गिरावट हो रही है।

स्थानीय लोगों और मछुआरा समुदाय के लोगो की समस्याए 


स्थानीय लोगों और मछुआरा समुदाय के लोगो से बात करने पर कुछ और समस्याए और प्रश्न सामने आये।  
  
  

क्या जिन लोगों के आर्थिक और सामाजिक उत्थान के लिये सरकार इन नीतियों को लागू कर रही है उन लोगो तक ये योजनायें पहुच रही है और अगर पहुच रही है तो क्या वे इन योजनाओं का पूरा लाभ पा रहे है ?

इस प्रश्न का उत्तर ही इन मछुआरा समुदाय के लोगो की वास्तविक परेशानियों को ठीक से उजागर कर सकता है।

ऐसा नही है कि सरकार की नीतियों मे किसी तरह की कोई कमी है। सरकार ने मछुआरों के उत्थान के लिये अलग अलग समितियों का गठन किया लेकिन समस्या ये है कि इस समुदाय के ज्यादातर लोग अनपढ़ है कुछ लोग सिर्फ थोड़ा बहुत ही पढ़े है इसी कारण धीरे धीरे सरकार द्वारा गठित उसकी समिति पर दूसरे अन्य जाति और समुदाय के लोगों का वर्चश्व स्थापित हो जाता है। कुछ समय के बाद समिति का कागजी अध्यक्ष अपनी ही समिति में मजदूरों की तरह कार्य करने लगता है। कुछ समितियों के अध्यक्ष को अन्य जाति अथवा समुदाय के लोगों द्वारा पैसे का लालच देकर समिति पर कब्जा करने की बात भी जानकारी में आयी है। कभी कभी समिति के पास मछलियों को पकड़ने के लिये प्रयाप्त संसाधन नही होते है ऐसी परिस्थिति में इस तरह की समितियाँ किसी अन्य लोगो के हाथ अपने पानी के ठेके को बेंच देते हैं। सबसे अन्त में कुछ दबंग लोग इन समितयों पर अपना अधिकार स्थापित कर लेते है। 

जो लोग नदी से ही अपना और अपने परिवार का पालन करते है उन लोगो को दो वक्त की रोटी भी ठीक से नसीब नही हो रही है और यही कारण है कि परिवार की जरूरी जरूरतो को पूरा करने के लिये इन लोगो को अनेक तरह के गैरकानूनी कार्यो में अपने को लगाना पड़ता है। 

निष्कर्ष

कछुओं के इस सर्वे को करते हुये हम नदी और नदी के आस पास के लोगों की समस्याओं को नजरअंदाज़ नही कर सकते और हम इस निष्कर्ष पर पहुचे है कि अगर किसी नदी के परिस्थितिकी तंत्र को ठीक करना है तो पहले उस नदी पे निर्भर लोगों को नदी और नदियों की उपयोगिता के बारे में जागरूक करना होगा हमें उन्हें बताना होगा कि हमें नदी से सिर्फ अपनी जरूरत भर की ही चीजों को निकालना होगा और अगर कुछ लोग इस बात का उलंघन करे तो सभी को एक स्वर में उनका विरोध करना होगा यानी उन्हें जागरूक बनाना होगा। दूसरा सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं को ठीक तरह से इन समुदायों तक पहुचाना तथा इनकी समस्याओं को समझने के लिये इनके बीच जाना, इन लोगों से बात करना और निचले स्तर तक पहुच कर इन योजनाओं का क्रियान्वन करना जिससे इन लोगो का जीवन के स्तर में सुधार हो सके। इनके जीवन स्तर मे बदलाव आते ही हम नदी की स्थिति में भी सुधार कर सकते है।

शासन और प्रशासन से आपेक्षित सहयोग 

1.    चीनी मिलों को पवित्र सरयू नदी को प्रदूषित करने से रोकने के लिये लिखित आदेश जारी करना।
2.    सम्बन्धित विभागों को जो नदी में मछलियों के शिकार का ठेके देते हैं उनको निर्देशित करना और नदी में सभी तरह की गैरकानूनी बाँधों पर रोक लगाना।
3.    सम्बन्धित विभाग को निर्देशित करना और मछलियों के शिकार में प्रयोग की जा रहे जालो की निर्धारित आकार को शक्ति से लागू करना।
4.    नदी के पानी का ठेका अथवा पट्टा मछुवारा समुदाय के नाम ही कराया जाय और किसी अन्य समुदाय के लोगों का हस्तक्षेप इन की समितियों से पुर्ण रूप से समाप्त किया जाय।
5.    मछुवारा समुदाय के लोगों का कम पढ़े लिखे होने की वजह से उनको आत्मनिर्भर बनाने के लिये ठेके- पट्टें के नियम तथा कागजी प्रक्रिया सरल किया जाय और कोई अन्य समुदाय इन पर अपना कब्जा न स्थापित कर ले इस बात पर भी नजर रखा जाय।
6.    सम्बन्धित विभाग को इस समुदाय के लोगों से सीधे उनके गाँवों में जा कर उनकी समस्या का निवारण कराने की व्यवस्था की जाय।

 भास्कर मणि दीक्षित (लेखक वन्य जीव सरंक्षण व उनके अध्ययन में  "तराई एन्वाइरनमेन्टल फ़ाउन्डेशन गोन्डा" द्वारा बेहतर सामूहिक प्रयास कर रहे हैं। गोण्डा जनपद में निवास, इनसे   bdixit63@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं)

विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था