International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Save Tiger

DON'T LET WILD TIGERS DISAPPEAR

Lady Rosetta

Potatoes with low sugar content and longer shelf life.

अबूझमाड़ के जंगल

जहां बाघ नही नक्सली राज करते हैं

खवासा का आदमखोर

जहां कांपती थी रूह उस नरभक्षी से

जानवर भी करते हैं योग

योगाचार्य धीरज वशिष्ठ का विशेष लेख

Nov 29, 2010

लखीमपुर खीरी में जंगली हाथियों की आमद

शहर के नज़दीक पहुंचा गजराज
........अब ये विशाल जानवर कहाँ जाए!

(२९ नवम्बर २०१०, लखीमपुर खीरी) सिकुड़ते जंगल और अन्धाधुन्ध वन कटान भारत में जंगली हाथियो के लिए मुसीबत बनते जा रहे है, ताजा मामला लखीमपुर खीरी जिले के शरदानगर वन-रेन्ज  गौरतारा गाँव एंव  नऊवापुरवा गाँव का है, शारदा नदी से निकली हुई शारदा सहायक पोषक नहर के किनारे-किनारे ये जंगली हाथी  लखीमपुर शहर के नज़दीक  इन गांवों में आ पहुंचे, यहां आकर इस हाथी के झुण्ड ने फसलों  को नुकसान पहुचाना शुरू कर दिया। अपने जंगली व्यवहार के चलते हाथी तो अपना मौलिक व्यवहार ही कर रहा था, पर गांव वालों का व्यवहार हाथी के प्रति जो था वो भी कही से भी सामान्य नही कहा जा सकता। हाथी अपने व्यवहार के मुताबिक ही गन्ने की फसल को खा रहा था। पर गांव वाले मजा लेने को उस बेजुबान पर पत्थर  बरसा रहे थे। कुछ तो अपनी दिलेरी दिखाने को वहां कच्ची के नसे मे पत्थर फेंक रहे थे। हाथी तो ठहरा हाथी वो भी लोगों को अपनी ताकत और हिम्मत का बखूबी परिचय दे रहा था। कभी वो अपनी सूढ उठाकर अपनी ऊपर ईंटे फेंक रहे लोगों का विरोध जताता, पर लोग कहां मानने वाले वो तो हाथी के पीछे ही पड गए थे। ये सिलसिला देर शाम तक चलता रहा, करीब तीस बीघे का गन्ने का वो खेत हाथी के छुपने के लिए पर्याप्त था,  ग्रामीणों  द्वारा  गन्ने के खेत में ईंट-पत्थर फ़ेके जाने व शोर मचाने पर हाथी कभी गन्ने के खेत से अचानक निकल कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराता था, लेकिन लोगों के शोर मचाने पर वो फ़िर गन्ने के खेत में छुप जाता था, जंगली हाथी को देखकर लोगों की उत्सुकता भी इस कदर थी कुछ लोग शीशम व नीम के पेड़ों पर चढ़कर हाथी को लोकेट कर रहे थे, मामला शहर के नज़दीक का था, तो मीडियाकर्मी भी कहां पीछे रहने वाले थे, हाथी और ग्रामीणों का यह द्वन्द इलेक्ट्रानिक मीडिया के भाईयों के लिए चलती फ़िरती टी०आर०पी० का खेल था, वही प्रिन्ट मीडिया के कुछ क्षेत्रीय संवाददाता अपने-अपने फ़्लैश चमकाते हुए, कभी भागते हुए लोगों की तो कभी जंगली हाथी की तस्वीरे ले रहे थें। कुछ उत्साही युवक इस मनोरंजक क्षण को गवाना नही चाहते थे, आस-पास में खबर फ़ैलते ही वहां सैकड़ो की भीड़ इस अजूबे को देखने के लिए उमड़ पड़ी थी। मुझे जहां तक पता है, हाथी एक बेहद सीधा व अनुशासित जानवर माना जाता है, पर हाथी और लोगों के बीच का द्वन्द यह मैं अपनी आंखों से पहली बार देख रहा था, गन्ने के खेत अन्दर जाकर हाथी, लगभग विलुप्त सा हो रहा था, केवल उसकी थोड़ी सी पीठ कभी-कभी दिख रही थी, लेकिन जब वह सूढ उठाकर हवा में इधर उधर घुमाता था, तो मानो ऐसा लगता था, जैसे किसी निर्जन स्थान पर मोबाइल का सिग्नल चला जाता है, तो आदमी हवा में मोबाइल को ऊंचा उठाकर सिग्नल तलाश करता है, वैसे ही हाथी अपनी सूढ को उठाकर आस-पास के खतरे को भापने का प्रयास करता दिखाई पड़ता था।


खबर वन विभाग वालों तक भी पहुंच चुकी थी, सो वह भी अपनी ड्यूटी पर मुस्तैद थे, बन्दूको और रायफ़लो से लैस थे, कभी कभार दुस्साहसी गांव वालों को हड़का भी रहे थे, और समझा भी, सुबह से शुरू हुआ, हाथी और लोगों का यह द्वन्द देर शाम तक यूं ही चलता रहा, हाथी कई बार गन्ने के खेत से निकल निकल कर लोगों को घुड़की देता रहा, लेकिन उसकी आंखों में अपने झुण्ड से विछड़ने का दर्द और गुस्सा साफ़ दिखाई दे रहा था, पर इस दर्द और गुस्से को पढ़ने वाला वहा कोई नही था, गांव के कुछ बुजर्ग हाथी को देखकर युवाओं को हाथी की पुरानी कहानियां सुना रहे थे, कोई कह रहा था, कि हाथी सबसे तेज दौड लेता है, और गुस्से में आ जाए तो उससे खतरनाक भी कोई नही होता, पर इस सब के बीच वन विभाग के अफ़सरो का मानना था, कि ये हाथी, नेपाल के प्रवासी हाथियों से विछुड़ कर दुधवा नेशनल पार्क होते हुए यहां तक पहुंच गया है, इन हाथियों की सख्या तीन बताई जा रही है, जो अलग अलग जगहो पर होने का अन्देशा है, फ़ूलबेहड़ क्षेत्र से लेकर नकहा इलाके तक इन हाथियों के आने की खबर जंगल में आग की तरह फ़ैल चुकी है।
हांलाकि अभी हाथी रिहाईसी इलाके में ही है, अब रात में न जाने क्या हालात होगे, भय और रोमांच के बीच, हाथी और लोगो के बीच ये द्वन्द की परिणति कही खतरनाक न हो जाए, वन विभाग ने इसके लिए, लोगों को रात में सुरक्षित रहने और आग जलाने का फ़रमान जारी कर दिया है!
जंगलों से ये हाथी रिहाईशी बस्तियों मे क्यो आ रहे है, ये हमें और आप सभी को ही सोचना होगा।


प्रशान्त "पीयुष" (लेखक पत्रकार है, लखीमपुर खीरी में निवास, वन्य जीवन व उसके सरंक्षण में अभिरूचि। इनसे prashantyankee.lmp@gmail.com पर सम्पर्क कर सकते हैं।)

Nov 21, 2010

दुधवा में असफ़ल पर्यटन !

विदेशी पर्यटकों को लुभाने में असफल रहा दुधवा नेशनल पार्क
विश्व पर्यटन मानचित्र पर स्थापित उत्तर प्रदेश का एकमात्र विख्यात दुधवा नेशनल पार्क अपने स्थापित काल से लेकर अबतक 33 साल के इतिहास में विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करने में असफल रहा है। हालांकि दुधवा नेशनल पार्क में भ्रमण के लिए आने वाले स्वदेशी पर्यटकों की संख्या में इजाफा होता रहा है। लेकिन विदेशी पर्यटक लगातार घटते रहे हैं। इसके प्रमुख कारण क्या रहे हैं? इस बात पर अभी तक सूबे के वन विभाग के आला अफसरों ने गौर क्यों नहीं किया, यह स्वयं में विचारणीय प्रश्न है। ऊपरी तौर पर अगर यह माना जाए तो महानगरों से यातायात के उचित साधनों का न होना तथा दुधवा की कम सुविधाएं ही इसकी प्रमुख वजह रही हैं। इसके बाद भी दुधवा आने वाले पर्यटकों को दी जाने वाली सुविधाओं को तो नहीं बढ़ाया गया वरन् इस पर्यटन सत्र से प्रवेश कर सहित आवासीय किराए में भारी बृद्धि कर दी गई है। इसके कारण अब स्वदेशी पर्यटकों की संख्या में भी कमी आने की सम्भावनायें और बढ़ गई है।

दुधवा नेशनल पार्क के जंगल में नेपाल से आए गजदल, बाघ, तेंदुआ, दुर्लभ प्रजाति के कई वयंजीवों को करीब से स्वछंद विचरण करते हुए देखकर पर्यटक खासे रोमांचित होते हैं। प्राकृतिक वैभव से परिपूर्ण दुधवा नेशनल पार्क के मनोहरी दृश्य देखने के साथ ही पशु-पक्षियों को कलरव को सुनकर पर्यटकों के लिए रोमांचकारी होता है। लेकिन अब प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण नयनाभिराम नजारों सहित दुर्लभ प्रजाति के वयंजीव-जंतुओ को स्वच्छंद विचरण करता हुआ देखने के लिए भ्रमण हेतु आने वाले देशी-विदेशी पर्यटकों के लिए 15 नवम्बर 2010 से दुधवा दर्शन और काफी महंगा हो गया है। दुधवा नेशनल पार्क में पर्यटकों को ठहरने के लिए जंगल के भीतर वन विश्राम भवन बने हैं तथा हाथी से वन भ्रमण की सुविधा उपलब्ध रहती है। इसके अतिरिक्त गाड़ियों से भी दुधवा के जंगल का भ्रमण किया जा सकता है। विख्यात दुधवा नेशनल पार्क में चल रही विश्व की एकमात्र अद्वितीय गैंडा पुर्नवास परियोजना पर्यटकों को आकर्षित करती रही है। वर्तमान में तीस सदस्यीय गैंडा परिवार के सदस्यों को दक्षिण सोनारीपुर रेंज के तहत ऊर्जा बाड़ से सरक्षित वन क्षेत्र में स्वछंद विचरण करते हुए देखना पर्यटकों की पहली पसंद रहती है। लेकिन अव्यवस्थाओं के चलते अक्सर होने वाली दुर्घटनाओं के कारण पार्क प्रशासन के अफसरों ने गैण्डा परिक्षेत्र में विदेशी एवं स्वदेशी पर्यटकों के भ्रमण पर अघोषित पावंदी लगा रखी है। इसके अतिरिक्त दुधवा पर्यटन परिसर के वन विश्राम भवन एवं थारू हट तथा कैंटीन आदि की सुविधाओं को नजन्दाज कर दिया जाए तो वन क्षेत्र के अन्दर बने अन्य वन विश्राम भवनों में रुकने के अलावा अन्य कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है। यहां तक इन वन विश्राम भवनों में न भोजन की समुचित व्यवस्था उपलब्ध है और न ही स्वच्छ पेयजल पर्यटकों को नसीब होता है। छोटी-मोटी जरूरतों के लिए पर्यटकों को इधर उधर भटकना पड़ता है। ऊपर से प्रोजेक्ट टाइगर एवं नेशनल पार्क के नाम पर इतने ज्यादा कानून-कायदे थोप दिए जाते हैं जिनके बीच पर्यटक अपने को बंधा व असहाय सा महसूस करता है। जबकि पैसा खर्च करने वाला पर्यटक चाहे विदेशी हो या स्वदेशी वह खुले वातावरण में भरपूर इनज्यॉय करना चाहता है, जो उसे दुधवा भ्रमण में नहीं मिल पाता है। यह बात अलग है कि केन्द्र व प्रदेश सरकार के राजनेता अथवा शासन के उच्चाधिकारी दुधवा भ्रमण पर आते हैं तो तथाकथित पावंदी लगाने वाले यहां के अफसर ही उनको शान से गैण्डा परिक्षेत्र का भ्रमण कराने ले जाते हैं और पार्क के नियमों व कानूनों को ताख पर रखकर वीआईपी का भरपूर स्वागत सत्कार भी करते हैं। मजे की बात यह है कि ‘वीआईपी‘ से भुगतान भी नाममात्र का लिया जाता है। ऐसी स्थिति को देखकर दुधवा भ्रमण के लिए पैसा खर्च करने वाला पर्यटक अपने साथ होने वाले इस सौतेले व्यवहार को देखकर ठगा सा महसूस करके मन मसोस कर रह जाता है। शायद अब तक यही कारण रहे हैं कि इतना सब कुछ होते हुए भी दुधवा नेशनल पार्क विदेशी पर्यटकों को लुभाने में कामयाबी हासिल नहीं कर पा रहा है। 
दुधवा नेशनल पार्क में आने वाले स्वदेशी पर्यटकों की संख्या में इजाफा जरूर हुआ है। परन्तु पिछले चार साल में अजब-गजब स्थिति यह भी रही कि पर्यटकों की संख्या में वृद्धि होने के बाद भी उनसे प्राप्त धनराशि यानी सरकार को राजस्व कम मिला है। दुधवा नेशनल पार्क के आंकड़ों के अनुसार पर्यटन सत्र 2006-07 में पर्यटकों की कुल संख्या 6260 रही और राजस्व मिला था 11,81,672 रूपए। जबकि पर्यटन सत्र 2009-10 में कुल 9944 पर्यटक आए जिनसे राजस्व मिला 11,39,829 रूपए। इसी प्रकार सन् 2007-08 के पर्यटन सत्र में 8104 पर्यटकों से 10,66,020 रूपए का राजस्व मिला था, और सन् 2008-09 के पर्यटन सत्र में आने वाले कुल 6728 पर्यटकों से 9,36,595 रूपए राजस्व प्राप्त हुआ था। यद्यपि उपरोक्त के सालों में विदेशी पर्यटकों की संख्या में कमी रही जबकि स्वदेशी पर्यटक तो बढ़ गए लेकिन राजस्व घट गया। यह स्थिति क्यों रही इस पर बिचार करने के बजाए पार्क प्रशासन अपनी कमियों पर पर्दा डालने के लिए दलील दे रहा है कि दुधवा में पर्यटकों को जंगल घुमाने वाले हाथी विगत के सालों में पर्यटन सत्र के दौरान जंगल से बाहर आने वाले बाघों की तलाश में पीलीभीत, शाहजहांपुर, लखनऊ, फैजाबाद, किशनपुर आदि स्थानों पर चले गए। इससे हाथियों के द्वारा जंगल घूमने पर पर्यटकों से प्राप्त होने वाली धनराशि घट जाने के कारण पर्यटकों के बढ़ने के बाद भी राजस्व में कमी आई है।

दुधवा नेशनल पार्क में सन् 2005-06 के पर्यटन सत्र में आने वाले स्वदेशी पर्यटकों की संख्या 5517 रही और सन् 2006-07 में बढ़कर जहां 6224 हो गयी, वहीं सन् 2007-08 में यह संख्या बढ़कर 8059 तक पहुंची तो सन् 2008-09 में स्वदेशी पर्यटक कम होकर 6714 रह गए। जबकि सन् 2009-10 में इनकी संख्या बढ़कर 9922 तक पहुंच गयी। इस तरह स्वदेशी पर्यटकों की संख्या में तो बृद्धि हुई, किन्तु दुधवा नेशनल पार्क भ्रमण हेतु आने वाले विदेशी पर्यटकों की संख्या पर गौर किया जाए तो सन् 2005-06 में 99 विदेशी पर्यटक आए थे। सन् 2006-07 में इनकी संख्या घटकर 36 रह गई। इसके बाद सन् 2007-08 में 45 विदेशी पर्यटक आए किन्तु सन् 2008-09 में इनकी संख्या घटकर मात्र 14 ही रह गयी। सन् 2009-10 के पर्यटन सत्र में 22 विदेशी पर्यटकों ने ही दुधवा का भ्रमण किया था। जबकि पड़ोस के ही प्रदेश उत्तरांचल के जिम कार्बेट नेशनल पार्क में विदेशी पर्यटकों का पूरे सीजन जमवाड़ा लगा रहता है। विदेशी पर्यटक दुधवा नेशनल पार्क की ओर क्यों आकर्षित नहीं हो रहें हैं। इस ओर न सरकार ध्यान दे रही है और न ही वन विभाग के उच्चाधिकारी ही उन कारणों को तलाश करने में दिलचस्पी ले रहे हैं। जबकि वह यह कहकर अपनी कमियों को छिपाने का प्रयास करते हैं कि महानगरों से यातायात के समुचित साधनों के न होने से ही विदेशी पर्यटक दुधवा नेशनल पार्क में आने से कतराते हैं। देखा जाए तो दुधवा नेशनल पार्क से छह किलोमीटर की दूरी पर मुंजहा में वर्षो पूर्व सरकार द्वारा बनवाई गई ‘हवाई पट्टी‘ निष्प्रयोज्य पड़ी है, जिसका उपयोग दुधवा नेशनल पार्क भ्रमण के लिए अबतक मात्र सूबे के राज्यपाल, कबीना मंत्री, राजनेता तथा केंद्र व प्रदेश के वीआईपी उच्चाधिकारी ही करते रहे हैं। सूबे की सरकार अगर प्रयास करके इस ‘हवाई पट्टी‘ को महानगरों से जोड़कर एयरबसों का संचालन शुरू करादे, अगर यह संभव न हो तो केवल लखनऊ से ही यहां के लिए हवाई सेवा उपलव्ध हो जाए साथ ही दुधवा नेशनल पार्क में ‘पर्यटन‘ को व्यावसायिक रूप दे दिया जाए। इससे दुधवा नेशनल पार्क में विदेशी पर्यटकों समेत स्वदेशी पर्यटकों की संख्या में स्वतः ही भारी इजाफा हो सकता है। पर्यटकों के बढ़ने से यहां के बेरोजगार युवाओं को रोजगार के नए अवसर मिलेंगे और क्षेत्र की आर्थिक उन्नति के भी नए रास्ते खुल सकते हैं। इसके अतिरिक्त सरकार का राजस्व भी बढ़ जाएगा।


 देवेन्द्र प्रकाश मिश्र  (लेखक वरिष्ठ पत्रकार है, अमर उजाला से काफ़ी समय तक जुड़े रहे है, वन्य-जीव संरक्षण के लिए प्रयासरत, दुधवा टाइगर रिजर्व के निकट पलिया में रहते हैं। आप इनसे dpmishra7@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।)











Nov 19, 2010

दुधवा लाइव पत्रिका के एडिटोरियल बोर्ड का गठन

दुधवा लाइव के संपादकीय मंडल का गठन:

१८ नवम्बर २०१० को दुधवा लाइव ई-पत्रिका एडिटोरियल बोर्ड के गठन का कार्य संपन्न हुआ। दुधवा लाइव को एक वर्ष पूरे होने वाले है, इस यात्रा में हमें तमाम महत्वपूर्ण व्यक्तियों का अभूतपूर्व सहयोग प्राप्त हुआ। जिनका जिक्र हम बार-बार करते आयें हैं। 

पत्रिका के संवर्धन में हमारे विशेष सहयोगी रहे व्यक्तियों को एडिटोरियल बोर्ड के तहत उनकी महत्वपूर्ण भूमिकाओं के अनुरूप कार्यभार दिए गये। जिसमें सोमेश रत्न अग्निहोत्री लीगल एडवाइज़र, देवेन्द्र प्रकाश मिश्र एसोशिएट एडिटर, अरूणेश सी दवे एसोशिएट एडिटर एंव सुशान्त झा एडिटोरियल एडवाइजर, सर्व सम्मति से नियुक्त किए गये।

एसोशिएट एडिटर दुधवा लाइव देवेन्द्र प्रकाश मिश्र  वाइल्डलाइफ़ पत्रकार, पलिया, खीरी द्वारा दुधवा नेशनल पार्क के जीवन्त व ताजा घटनाओं से यह पत्रिका सदैव समृद्ध होती रही है।

एसोशिएट एडिटर दुधवा लाइव अरूणेश सी दवे, लेखक व समाजसेवी रायपुर छत्तीसगढ़ द्वारा वन्य-जीवन की उत्कृष्ट लेखन विधा एंव भारत के ब्रिटिश राज व वर्तमान वन-संपदा प्रबन्धन पर एक नया नज़रिया पत्रिका को लेखों के रूप में प्राप्त हुआ। 

एडिटोरियल एडवाइजर दुधवा लाइव सुशान्त झा नई दिल्ली, पत्रकार एंव लेखक, इन्हे  महत्वपूर्ण अखबारों, और टीवी चैनल्स में कार्यानुभव प्राप्त हैं, मौजूदा समय में एक  महत्वपूर्ण लेखन कार्य में व्यस्त हैं। इनका प्रोत्साहन व दुधवा लाइव के संपादन में सहयोग मिलता रहा हैं।

लीगल एडवाइज़र दुधवा लाइव सोमेश रत्न अग्निहोत्री एडवोकेट सुप्रिम कोर्ट ऑफ़ इंडिया, नई दिल्ली, (मैगसेसे पुरस्कार विजेता संदीप पाण्डेय तथा भारत के विशिष्ठ कानूनविद प्रशान्त भूषण जी के साथ कार्यानुभव)  द्वारा समय समय पर दुधवा लाइव पत्रिका को कानूनी सहयोग मिलता रहा हैं।

इस नये संपादकीय मंडल के गठन के उपरान्त दुधवा लाइव के विकास व प्रचार-प्रसार में आशातीत सफ़लता एंव प्राकृतिक विज्ञान व प्राकृतिक इतिहास का प्रसार करने में मदद मिलेगी।

अन्तर्जाल पर आप सभी से ज्ञान के उन्मुक्त प्रचार व प्रसार के लिए विनम्र अनुरोध के साथ पूर्ण सहयोग की आशा की जाती है।

धन्यवाद
संपादक
दुधवा लाइव

http://www.dudhwalive.com

Nov 17, 2010

हल्कू बैगा और बाघ की नाक

एक जवान बाघिन कुछ दूर पर मौजूद हिरणों को देखकर जैकबसन आर्गन का इस्तेमाल करती हुई--फ़ोटो: अरूणेश सी दवे
हल्कू बैगा और बाघ की नाक- एक घटना !

हल्कू बैगा से मेरी मुलाकात सन १९९१ मे मध्य प्रदेश के डिंडौरी जिले के शाहपुर के पास एक छोटे से बैगा टोले मे हुई थी । वहा मै अपने एक मित्र के साथ मे उसके पिता के लिये जड़ी बूटी लेने के लिये गया था । उस मित्र को हर महिने जाना पड़ता था और हरदम वह किसी न किसी साथी की तलाश मे रहता था और मै मुफ़्त मे जंगल घूमने और महुआ की बियर पीने के अवसर को नही छोड़ सकता था अतः हर महिने ह्ल्कू बैगा से मिलना तय था ।

हल्कू एक छोटे कद का गठीला अधेड़ आदमी था जिसकी दो पत्नियां थी जिसमे से छोटी महज २२ २३ साल की रही होगी । अपनी जड़ी बूटी की जानकारी बदौलत गांव मे ह्ल्कू एक बड़ी हैसियत वाला आदमी था इसके अलावा वह बैगा लोगो की जादू और टोने की शक्तियों का भी बड़ा जानकार था इस कारण से हल्कू से कॊई भी बैगा बिना कारण के नही मिलता था और खासकर उसकी छोटी पत्नि के पास नजर आ जाना दुर्भाग्य का सूचक माना जाता था ।

फ़ोटो साभार : विकिपीडिया (बैगा महिलायें अपनी पारंपरिक पोशाक में)

ऐसी परिस्थितियों मे मै और हल्कू नजदीक आये तो कारण केवल यह था कि एक समय  हल्कू मेरे बड़े पिताजी श्री ज्ञान शंकर दवे जो एक समय मंडला के वनमंडलाधिकारी थे के पास लम्बे समय तक काम कर चुका था और उनके सदव्यहवार का वह बहुत मान रखता था । एक कारण यह भी था की मै वन्यप्राणियो के व्यहवार के बारे मे सुनने के लिये सारी रात जाग सकता था और चूंकि हल्कू अपने जड़ी बूटियो की जानकारी स्थानीय बैगाओ तक नही जाने देना चाहता था तो ऐसे मे मै और मेरा दोस्त उसकी जंगल यात्रा के दौरान उसके लिये अच्छे कुली थे ।

हलकू के साथ जंगल यात्रायें
हल्कू के साथ घूमने के दौरान मुझे जंगल और उसके जीवो के बारे मे एक नया परिदृष्य सीखने का मौका मिला और हल्कू के साथ मैने जो खाना खाया वो किसी भी चीनी को शर्मिंदा करने के लिये काफ़ी है लेकिन मेरे मन के एक हिस्से मे एक शक हरदम से था कि हम जंगल का नुकसान कर रहे है ऐसे मे भारद्वाज (greater indian cocul) पक्षी के घोसले से पूरे अंडे लेते समय मेरा और हल्कू का झगड़ा हो गया मैने हल्कू धमकाया कि वो जो कर रहा है वह सही नही है और मै इसके खिलाफ़ हूं । ऐसे मे हल्कू जो की मुझसे अनुभव और उम्र मे बहुत आगे था उसने मुझे शांत किया और कहा हम कल बात करेंगे इस बारे मे । अगले दिन सुबह हम जब वापस वहां पहुचे तो हल्कू ने मुझे घोसले तक पहुचाया और पूछा कि घोसले मे अंडॆ है कि नही मैने पाया कि अंडे पूरे वापस आ गये है । इस घटना के बाद मेरा और हल्कू का विवाद २ साल तक नही हुआ लेकिन जब विवाद हुआ उसके बाद तो विवाद गहरा गया ।

विवाद था बाघ की नाक और उसके सूंघने की शक्ती के बारे मे हुआ ऐसा कुछ कि मैने एक किताब का अध्ययन किया जिसमे वर्णन था कि बाघ की सूंघने की शक्ती बेहद कम होती है ऐसे मे मै और हल्कू उसके घर मे महुआ पीते हुए और देशी मुर्गा खाते हुए एक विवाद मे फ़स गये । हुआ कुछ ऐसा कि हल्कू बहुत समय से मुझे जानकारी झाड़ रहा थ और चूंकि मै उसका एक तरह से शिष्य था तो मुझे उसकी पहुंच से दूर किसी विषय मे होशियारी झाड़नी थी तो ऐसे मैने बाघ की नाक का विषय छेड़ा इस पर छूटते ही हल्के ने कहा बाबू तुम शहर वाले क्या जानते हो बाघ न केवल सूंघ सकता है बल्कि वह मुह बिगाड़ कर हवा को धमकाता है तो हवा उसको सारी खबर दे देती है यह सुनकर मै जोर जोर से हसने लगा मेरे मित्र ने जो जादू टोने पर बड़ा विश्वास रखता था उसने मुझे धीरे से चेताया भी पर मै तो महुए की तरंग मे और अपनी किताबी होशियारी मे मगन था और मैने इस बारे मे ह्ल्कू से  शर्त लगा ली शर्त लगी मेरी घड़ी की और मित्र के पिताजी की दो महिनो की जड़ी बूटी की ।
हलकू बैगा जिसने साबित किया कि बाघ हवा में चीजों को भाँप लेता हैं- यह वाकया जितना रोमांचकारी था उससे कही ज्यादा खतरनाक- हाँ तो चलिए इस बैगा की जोखिम भरी प्रयोगशाला में हम भी साथ है!...............
अगली सुबह जब नींद खुली तो मुझे रात की शर्त का कोई हिस्सा याद नही था पर हल्कू ने इस बात को दिल पर ले लिया था और मेरा मित्र जिसे दो महिने की दवायें मुफ़्त मे मिल सकती थी और हारने पर घड़ी तो मेरी जानी थी अतः उसे शर्त की सारी बात याद थी ऐसे मे मेरे पास कोई रास्ता शेष न था और किताबी जानकारी तो मेरे ही पक्ष मे थी अतः मै एक बार फ़िर अपनी बात पर अड़ गया । तय फ़िर यह हुआ कि दो दिनो के भीतर हल्कू इस बात को सिद्ध करेगा कि बाघो की सूंघने की शक्ती बहुत विकसित है ।

बस फ़िर क्या था हम दो दिनो का राशन जिसमे चावल तेल और नमक मिर्च आदि मसाले शामिल थे लेकर निकल पड़े शाम ढलने तक करीब चार बजे हमने पड़ाव डाला और हल्कू अभी आता हूं कह के गायब हो गया हमने आग जलाई और  रास्ते मे एकत्रित भोजन सामग्री के साथ भोजन तैयार करने मे जुट गये रात करीब आठ बजे ह्ल्कू वापस आया और हम सभी खाना खा कर सोने के पहले बातचीत करने लगे इस समय तक शर्त को लेकर मेरा आत्मविश्वास थोडा डगमगाने लगा था ऐसे मे मैने ह्ल्कू कॊ अपने बड़े पिताजी की याद दिलायी और कहा आपस के लोगो मे शर्त ठीक नही इस पर हल्कू ने कहा बाबू आपको अभी दुनिया देखनी है और बैगा अपनी जबान से कभी पीछे नही हटता अतः शर्त अपनी जगह कायम है ।


अगले दिन अल सुबह हल्कू फ़िर गायब हो गया लौटा तो नौ बज चुके थे आते ही उसने हड़बड़ी शुरू कर दी और हमे लेकर रवाना हो गया कुछ दूर जाकर हल्कू ने हमे पेड़ पर चढ़ा दिया और फ़िर गायब हो गया उसका ऐसा व्यह्वार अनपेक्षित नही था पर ऐसा वो तभी करता था जब वह बाघ के शिकार मे से एक हिस्सा हमारे खाने के लिये चुरा लाता था पर इस बार वह एक बच्चे वाली बाघिन के इलाके मे ऐसा कर रहा था और ऐसा पहले कभी नही हुआ था
इन सब बातो पर चर्चा हो ही रही थी कि हल्कू नजर आ गया इस बार वह खाली हाथ था उसने हमे आवाज दी और हम उसके पीछे हो लिये कुछ दूरी पर आसमान मे गिद्धो के नजर आते ही मै समझ गया कि मामला गंभीर है पर हल्कू तेजी से आगे बढ़ रहा था बेहद तेजी से सोचने का समय ही नही था अचानक सेमल के पेड़ के नीचे घास के  झुरमुट के सामने वह रुका और जब वह लौटा तो उसकी पीठ पर एक मादा चीतल का शव था  उसका कुछ  ही हिस्सा बाघ ने खाया था  हल्कू की गती अब पहले से भी तेज थी और बात बात मे वह पीछे मुड़ कर देखता था उस जगह से करीब दो किलोमीटर दूर जाने के बाद एक मैदान आया उस मैदान को पार करने के बाद हल्कू ने मुझे कहा बाबू अब जल्दी चलना होगा बाघिन अपना शिकार खोजती आयेगी और हम सुरक्षित जगह से २ किलोमीटर दूर है अतः हम सभी तेजी से बढ़ चले कुछ दूर बाद फ़िर एक मैदान आया इस बार हल्कू सीधे न जाकर घुमावदार रस्ते पर चलने लगा १० मिनट  मे तय हो सकने वाला सफ़र आधे घंटे मे तय हुआ हल्कू ने उस मैदान को पार करने मे जान बूझ कर समय बर्बाद किया था खैर  हम सभी खेतो की रखवाली करने के लिये बनी करीब १०-१२ फ़ुट उंची मचान पर जा कर बैठ गये हल्कू फ़िर उतरा और और उसने जल्दी से लकड़ी एकत्रित कर मचान के एक कोने मे आग जला ली । दिन मे मचान पर आग जलाना मेरी समझ से हल्कू का बाघिन का ध्यान आकर्षित करने  की चाल थी पर इस बात को मैने शर्त हारने के बाद विवाद खड़ा करने के लिये सुरक्षित रख लिया  ।

जब बाघिन और उसके शावकों ने हमारे मचान के नीचे उड़ाई दावत
करीब आधे घंटे बाद जिस दिशा से हम आये थे उसी दिशा से चीतल की सावधान करने वाली आवाज सुनाई दी कुछ ही समय बाद एक बाघिन उस रास्ते पर प्रकट हुई जिस पर हम आये थे उसके पीछे उसके दो किशोरवय शावक भी थे । तीनो ठीक उसी रास्ते पर थे जिससे पर हम चलकर आये थे अब मुझे हल्कू के मैदान घुमावदार रास्ते पर चलने का राज समझ मे आ गया था हल्कू मेरे पास घड़ी न देने का कोई भी बहाना नही छोड़ना नही चाहता था । बाघिन निश्चित ही हमारा अनुसरण कर रही थी और वह वाकई रास्ते मे बार बार मुह बिगाड़ कर गुस्सा करती प्रतीत हो रही थी और ऐसा वह हमे देख या सुन कर नही कर रही थी वरना वह एक दम सीध मे आसानी से हम तक आ सकती थी । कुछ ही देर मे बाघिन मचान के ठीक नीचे अपने दोनो शावको के साथ थी महज कुछ फ़ुट की दूरी से उनको देख कर मुझे घड़ी के साथ जान भी जाती नजर आयी तभी बाघिन जोर से दहाड़ लगाई और हल्कू ने तुरंत हिरण नीचे फ़ेक दिया बाघिन तो हिरण लेकर  पीछे हट गयी पर किशोरवय नर शावक मचान पर चढ़ने की कोशिश करने लगा हर छलांग के साथ वह और उपर पहुंच रहा था हल्कू के हाथ मे जलती हुई लकड़ी तो थी पर वह उसका इस्तेमाल नही कर रहा मैने लकड़ी खीचने की कोशिश की तो उसने मुझे जलती लकड़ी दिखाकर पीछे ढकेल दिया तभी बाघिन ने चेतावनी भरी आवाज निकाली तो शावक गुर्राता हुआ पीछे हट गया । मां और दोनो शावक वही हिरण की दावत उड़ाने लगे और मैं गुस्से से हल्कू को घूर रहा था पर बाघिन के डर से मेरे मुह से कोई आवाज नही निकल रही थी और रही बात मेरे मित्र की तो मेरे अंदाज 
से वो अर्धमूर्छा की स्थिती मे था ।  करीब दो घंटे के बाद बाघिन बचे खुचे हिरण को लेकर शावको के साथ वहां से निकल गयी ।

 बाघिन के नजरों से ओझल होने के कुछ समय बाद वापस लौटते वक्त मैने हल्कू से गुस्से से कहा कि उसने शावक कॊ जलती हुई लकड़ी से क्यों नही भगाया इस पर हल्कू ने मुसकुराते हुये जवाब दिया बाबू उस शावक के मुह से निकली एक दर्द भरी आवाज को सुनते बाघिन एक क्षण मे मौत बनकर हमारे सर पर पहुंच जाती दस बारह फ़ुट की उंचाई उस बाघिन के लिये कोई मायने नही रखती वह लकड़ी हम केवल बाघिन पर ही मार सकते थे शावको पर नही इस पर मैने कहा कि हो सकता था बाघिन रात तक वहां से नही जाती फ़िर इस पर उसका जवाब था बाबू मचान से तीन कोस आस पास कहीं पानी नही है ऐसे मे दोपहर के वक्त मांस खा कर बाघिन इससे ज्यादा रुक नही सकती थी इस पर भी मेरा गुस्सा शांत नही हुआ मैने उससे कहा कि तुम उस हिरण कॊ मचान से दूर भी छोड़ सकते थे मचान तक लेकर क्यों आये उसने कहा बाबू आज तुमने  जो बाते सीखी है वे अनमोल है तुम्हारे जीवन मे बहुत काम आयेंगी तुमको जंगल घूमने का नशा है तुमको ये चीज सिखाना जरूरी था और फ़िर आज के बाद तुम भूलकर भी कभी शर्त भी नही लगाओगे यह कहकर वह ठठाकर हसने लगा और मै भी बाघिन को भूल कर उस घड़ी के बारे मे सोचने लगा जो मेरे पिताजी की थी और मै बिना बताए पहन आया था ।

मैने तुरंत गिरगिट की तरह रंग बदला और हल्कू से लिपट गया मैने कहा हल्कू आज से तुम मेरे भाई हो आज के बाद हम दोनो सदा एक दूसरे के काम आयेंगे इस पर ह्ल्कू ने हसते हुए कहा बाबू मै तुम्हारे साथ बहुत लंबे समय से घूम रहा हूं शहर मे आदमी जिंदगी साथ गुजार ले पर एक दूसरे को नही जान पाता है पर जंगल मे केवल कुछ समय मे आदमी का व्यहवार समझ लेता है निकालो मेरी घड़ी इस पर दुखी मन से मेरी घड़ी जिसके वापस घर ना ले जाने पर मेरी पिटाई निश्चित थी मैने हल्कू को दे दी ।

अगले दिन सुबह वापस लौटते समय हल्कू मे दोस्त कॊ जड़ीबूटी दी और मुझे मेरे मन पसंद जंगली फ़लॊ का टोकरा दिया और मुझसे कहा बाबू किताब मे दिया हुआ ज्ञान हरदम सही नही होता है अपना दिमाग भी लगाना पड़ता है जरा सोचते तो जिस बाघ को अपना इतना बड़ा इलाका संभालना पड़ता है वह बिना सूंघे दूसरे बाघो के बारे मे कैसे जान पायेगा बाबू हम लोग बोल कर जानकारी बाटते है बाघ जंगल के नॊटिस बोर्ड पर गंध सूंघ कर ही ऐसा करते है  देख कर और सुनकर तो केवल अभी क्या हो रहा है यह मालूम पड़ता है इसके पहले क्या हुआ है कैसे मालूम पड़ेगा क्यो बाघ हर बारिश के बाद पॆड़ो पर अपना मूत्र छोड़ते है क्योंकि बारिश से गंध मिट जाती है । और शिकार किस दिशा मे गया है यह बाघ को कैसे मालूम पड़ेगा या जिस दिशा मे वह जा रहा है उससे पहले उसमे कौन सा जानवर गया है यह बाघ को कैसे मालूम पड़ेगा

घर लौटते समय जब मैने फ़लो का टोकरा खोला तो सबसे उपर मेरी घड़ी थी । इस घटना के बाद कई बार मै और हल्कू साथ जंगल मे घूमने गये पर मेरा मित्र फ़िर कभी हमारे साथ नही गया । इस घटना के ३ वर्षों बाद हल्कू और उसकी छोटी पत्नी भालूओं के हमले मे मारे गये । और इसके  अनेको वर्ष बाद मुझे फ़्लेहमेन रिसपांस और जैकबसन आर्गन के बारे मे मुझे मालूम पड़ा जिससे हल्कू के मुंह बिगाड़ने से हवा के द्वारा राज उगलने की सच्चाई ज्ञात हुई ।


 अरूणेश दवे (लेखक छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में रहते है, पेशे से प्लाईवुड व्यवसायी है, प्लाई वुड टेक्नालोजी में इंडियन रिसर्च इंस्टीट्यूट से डिप्लोमा।वन्य् जीवों व जंगलों से लगाव है, स्वतंत्रता सेनानी परिवार से ताल्लुक, मूलत: गाँधी और जिन्ना की सरजमीं से संबध रखते हैं। सामाजिक सरोकार के प्रति सजगता,  इनसे aruneshd3@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।) 

Nov 16, 2010

Interview of The Tigerman by Dr. Marie Muller

An Interview of Billy Arjan Singh 
                     by
            Dr. Marie Muller

When you turn on the computer and start web surfing you never know where virtual trip can take you...in real life!!!
You start to make friends all over the world you share or discuss thoughts, life, values.......you talk about different cultures issues and u learn things. In my case, I learned about wildlife and specially the tigers...
Because of the conservation issues the tiger cause...tiger which are not man eater by nature are symbol of  eco system and its health.  Then a friend, K K Mishra, from Utter pradesh kheri Dudhwa  told me about a legend in tiger conservation, a real fighter and  his books,
 But most important for me was that he was still alive!!
 I found amazing that tigers have probably been more written about than other animals..(Billy wrote this)
 then i thought that I had to meet that man.
 I wrote some greetings from Brazil
 .and I went to dudhwa first time in 2007,,it was elections period and couldn’t meet him....
    again I went to bhira farm..i got the chance to became a family member,
   , thanks again to KK Mishra uncle's help. So, now I had family in bhira...
  It was october16,, 2009, at 16 pm
 ..diwali period.
 ..Lets go meet Billy
 Yea tiger haven near. so by bike after 25 minutes I could not believe my eyes


 Yes sitting in front of a table full of papers, letters, manuscripts, and books. Totally concentrated....
 ,It was Billy
 ...simply the legend...
 Human being, sitting in his  pajamas’...and with 2 servants near..


hello dr namaste sat sri akal my name is Marie I am from brazil , I am a far away big fan of you and your work. Its a honor to meet you .I wish if you could give me some minutes to talk.( by the way, this conversation turned to be one hour...).....
 .thank you for your time..
 he looked at me and gave me a smile, stood up, despite the can...came to my direction.
 .so gentleman. We shook hands...I helped him to sit again..
 Yea Namaste,

 can I get you some water, its very hot,,
 yea ,please many many thanks I said..
 he smiled and ask ..what are you doing here. what do you do. why you are here..(like he were the reporter...)
 I explain that I work as doctor, in a government hospital,  and animal lover ,,
 I travel to visit India and the jungles and very interested about tigers.
 told that my country Brazil ,we  are also facing  difficult situation, like India
 on wild life conservation issues, massive animal traffic , poaching. corruption ...bureaucracy.
 Amazon jungle destruction, and also Atlantic forests..
 .its a big country. few people on ground. to really work. they have good will but we know sometimes its not good enough...we really lack of eyes and legs .haha
 He smiled..(I don’t  know if  it was not a smile like ,,oh god all world is the same...yea I think it was this kind of smile..)..
 ( I read how this man fought and how he always was so critical at the functioning of the Forest department..)
 so I could see through his smile that understood what I was talking about...
but despite all these ,we can see some members of government fighting...yea...they go like little steps but. we can use some changes..

 In brazil we do not have any more some animals and many are on verve of extinction...
 and then I asked about tigers in India...what he can say to me. how he felt about it , I asked him about what he wrote that "TIME IS OF THE ESSENCE, FOR ONCE THE SYMBOLIC TIGER IS GONE , THE REST WILL FOLLOW IN SHORT ORDER ."

 he was not happy....he said he was depressed...he was disappointed ..and he said that people should read more and he was still pessimist the future of the tiger.....
 he said about the time he was living, the remaining days of his life. he wanted only to read and he was waiting for new autobiography, that he have just finished...and maybe released in few months (ps. this was october.2009..now , july 2010 ,,,Jairaj Singh told me still couple months to be launched in delhi and Bombay)...
 but he showed enthusiasm when his nephew Jairaj  arrived and started explain about TIGER HAVEN project..
 a wild life center.. ( I must add here the website, because now its really under construction !!! its tigerhavensociety.org.)

 then I asked him if this project also include his own experience .the leopards and then tigress. TARA   a zoo cub back in jungle to live freely as a wild animal.. ....the successful. she was..
 he smile and said. no..
 and he asked me how I knew about him and his work...I said friend name , KK Mishra ,that admires you as a guru. because your actions on behalf conservation...he told me a lot about you ...
billy said yea I know this guy he’s very fond of animals...good !
he remember. he is  from lakhimpur na...
 yea I reply...
 then  billy wanted me to choose a book from his library ..and gave me ...I choose 'the legend of the man eater "....
I could see he was tired.....
 then, as it was diwali time I  offered him a candle as a wish that he could have good days calm days...good health..
 he sounds perfectly lucid. over his nineties....only a common old man disease...

 I am geriatric doctor so I can tell you how happy I was to find him like that...very   conscientious ....good conversation...
He thanked  me........
 but still talk to me little life things, and asked me to talk to his servant ,that was suffering from some lung condition....
I thought this guy is wonderful. he cares...
he made me feel very comfortable with him, and I felt that I could even tease him....I asked if he needs a secretary. because loots of papers and letters he had to reply
 he said yes
I see you next year...and smiled..
 then I said ok doctor I will come back...
Unfortunately since last January...we can be with him only through the books...
 and India, specially have to thank forever this man
 his vision about environment....
 Dudhwa
and I think that no medals are good enough to say
 Thank you
Billy Arjan Singh
(Billy Arjan Singh Interviewed by Marie Muller)
( इस एतिहासिक वार्तालाप का हिन्दी संस्करण देखने के लिए यहाँ क्लिक करे।)
Dr. Marie Muller
(The auther is a Doctor(Medicine) in Sao Paulo Brazil, She may be reached at muller2ster@gmail.com.)

Nov 15, 2010

दुधवा लाइव चैनल


            दुधवा लाइव चैनल के सभी वीडियो/ डाक्युमेन्ट्री फ़िल्म देखने के लिये यहाँ क्लिक करे ।



सामुदायिक पक्षी सरंक्षण, जनपद खीरी, उत्तर प्रदेश, भारत

Nov 14, 2010

मुसलसल बदलती दुनिया में ज्ञान का अलबेला संसार !

गाँव के वन और वन्य जीव
 "सोपान Step पत्रिका में इन्टरनेट के आभासी संसार पर विशेष सामग्री के साथ अक्टूबर २०१० के इस अंक में  दुधवा लाइव पत्रिका को कवर स्टोरी के रूप में प्रकाशित किया गया।"
 - दुधवा लाइव डेस्क






बदलती दुनिया की आभासी खिड़कियां- सोपान स्टेप पत्रिका (Sopan Step Magazine), अक्टूबर २०१०                                                                                                                                   

Nov 10, 2010

दुधवा में पर्यटन हुआ महंगा !

देशी-विदेशी पर्यटकों के लिए मंहगा हुआ दुधवा नेशनल पार्क 
 दुधवा नेशनल पार्क से देवेन्द्र प्रकाश मिश्र की रिपोर्ट
उत्तर प्रदेश के एकमात्र विश्व विख्यात दुधवा नेशनल पार्क का भ्रमण करना अब देशी- विदेशी पर्यटकों के लिए खासा मंहगा हो गया है। दो से तीन गुना तक हुई बढ़ोत्तरी की दरें इस साल 15 नवम्बर से शुरू हो रहे नवीन पर्यटन सत्र से लागू होगी। सन् 2003 के बाद यह वृद्धि की गई है। जिससे दुधवा नेशनल पार्क के पर्यटन व्यवसाय पर बिपरीत प्रभाव पड़ सकता है इस संभावना से कतई इंकार नहीं किया जा सकता है। 

उल्लेखनीय है कि यूपी का इकलौता विश्व पर्यटन मानचित्र पर स्थापित दुधवा नेशनल पार्क प्रकृति की अनमोल धरोहर के साथ विलुप्तप्राय वन्यजीवों की विभिन्न प्रजातियों को अपने आगोश में समेटे है। इसमें शेड्यूल वन की श्रेणी में चिन्हित बाघ एवं तेंदुआ के साथ ही हाथियों के झुण्ड को स्वच्छंद रूप से विचरण करता हुआ देखा जा सकता है। जबकि देश में आसाम के बाद दुधवा ही ऐसा नेशनल पार्क है जिसमें तीस सदस्यीय गैण्डा परिवार रहता है। इनके संरक्षण और संवर्द्धन के लिए दुधवा पार्क में जहां ’गैण्डा पुनर्वास परियोजना’ चल रही है। वहीं बाघों की सुरक्षा एवं संरक्षण का दायित्व ’प्रोजेक्ट टाइगर’ संभाले है।  
दुधवा नेशनल पार्क के वन क्षेत्र में वृक्षों की 75 प्रजातियां 21 प्रकार की झाड़ियां, 17 तरह की बेल व लताएं तथा 77 प्रकार की घासों समेत 179 प्रकार की पानी में उगने वाले पौधे चिन्हित किए जा चुके हैं। इनमें से 24 प्रजातियां संरक्षण की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। इसके अलावा चिड़ियों की 411, टेपटाइल की 25, एम्फीबियन की 15 तथा स्तनपाई जीवों की 51 प्रजातियां पाई जाती हैं। जबकि यूरोप, साइबेरिया आदि बर्फीले क्षेत्रों के विदेशी प्रवासी पक्षी भी शीतकाल के दौरान दुधवा पार्क के तालाबों एवं झीलों में देखे जा सकते हैं। इसमें यहां पाए जाने वाले बंगाल śलोरिकन एवं लेसर śलोरिकन नाम के दुर्लभ पक्षी भी दुधवा पार्क की पहचान बन चुके हैं। प्राकृतिक वैराव से परिपूर्ण दुधवा नेशनल पार्क के मनोहरी दृश्य देखने के साथ ही पशु-पक्षियों को कलरव को सुनकर पर्यटकों के लिए रोमांचकारी होता है। लेकिन अब प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण नयना भिराम नजारों सहित दुर्लभ प्रजाति के वयंजीवों को स्वच्छंद विचरण करता हुआ देखने के लिए भ्रमण हेतु आने वाले देशी-विदेशी पर्यटकों को दुधवा दर्शन काफी महंगा साबित होगा। वह भी इसीलिए क्योंकि 15 नवम्बर से शुरू हो रहे पर्यटन सत्र से शासन द्वारा की गई मूल्य वृद्धि के अनुसार ही रेस्ट हाउस, थारूहट आदि का आरक्षण किया जाएगा। सन् 2003 से चल रही दरों में सात साल बाद दो से तीन गुना की वृद्धि की गई है।

उल्लेखनीय है कि प्रवेश शुल्क में हुई वृद्धि के अनुसार प्रति व्यक्ति तीन दिन के लिए पहले पचास रूपया था अब एक सौ रूपए हो गया है। पूर्व में बच्चों का प्रवेश निःशुल्क था अब देशी पर्यटक बच्चे का शुल्क 60 रूपए और विदेशी को सात सौ रूपए देने होगें। इसी प्रकार गाड़ियों के प्रवेश शुल्क में भी वृद्धि की गई है। जबकि हाथी सवारी के लिए चार व्यक्ति दो घंटा हेतु 300 रूपए देते थे अब प्रति व्यक्ति को 150 रूपए देने होंगे। दुधवा नेशनल पार्क में ठहरना भी महंगा हो गया है। इसमें वन विश्राम भवन दुधवा का कक्ष चार सौ रूपए में आरक्षित होता था अब हुई वृद्धि में भवन की श्रेणी निर्धारित की गई है। उसके अनुसार पर्यटक को भुगतान करना होगा। थारूहट 150 रूपए के बजाय अब चार सौ से पांच सौ रूपए में आरक्षित किए जायेंगे। इसी प्रकार डारमेटŞी में भी पचास रूपए से बढ़ाकर 75 रूपए प्रति व्यक्ति किया गया है। जबकि पूर्व में बनकटी वन विश्राम भवन आदि एक सौ रूपए में बुक होते थे अब तीन सौ रूपए प्रतिदिन का लिया जाएगा। किशनपुर वन विश्राम भवन अब 150 रूपए के बजाय 500 रूपए में आरक्षित होगा। दुधवा में फीचर फिल्म तथा डाक्युमेंट्री बनाने के शुल्क में भी भारी वृद्धि की गई है। पूर्व की नागिनल दर यानी फीचर फिल्म 2500 रूपए एवं डाक्युमेंट्री फिल्म 1500 था तब दुधवा में कोई निर्माता दिलचस्पी नहीं लेता था अब चार गुना वृद्धि के साथ फीचर फिल्म का एक लाख रूपए एवं डाक्युमेंट्री फिल्म का 6 हजार रूपए लिया जाएगा। इस पर भी निर्माता को सुरक्षा शुल्क अलग से देना होगा। दुधवा में भ्रमण महंगा होने से अब आम पर्यटक इससे और दूर हो जाएगा जिससे पर्यटन व्यवसाय से होने वाली आय पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है इस बात से कतई इंकार नहीं किया जा सकता है।


दुधवा नेशनल पार्क में 15 नवम्बर से आवास सुविधा
पर लागू होने वाली नई दरें-
 
विवरण                                                  देशी                        विदेशी
दुधवा वन विश्राम भवन-
   वातानुकूलित कक्ष संख्या एक          1000 रुपए     3000 रुपए
   विश्राम भवन कक्ष संख्या दो            750 रुपए     2250 रुपए
   विश्राम भवन कक्ष संख्या 3,4,5          400 रुपए     1200 रुपए
थारूहट एक व दो                       500 रुपए     1500 रुपए
थारूहट तीन से चौदह                    400 रुपए     1000 रुपए
डारमेट्री प्रति व्यक्ति                       75 रुपए      225 रुपए 

सोठियाना वन विश्राम भवन                400 रुपए     1200 रुपए
         लाग हट                      200 रुपए      600 रुपए
सोनारीपुर वन विश्राम भवन प्रथम तल       400 रुपए     1200 रुपए
                     द्वितीय तल        300 रुपए      900 रुपए
वनकटी वन विश्राम भवन                  300 रुपए      900 रुपए
किशनपुर वन विश्राम भवन                 500 रुपए     1500 रुपए
सलूकापुर, मसानखंभ, वेलरायां,
किला, बेलापरसुआ, वन विश्राम भवन        300 रुपए      900 रुपए


दुधवा नेशनल पार्क में फीस एवं किराया
15 नवम्बर से लागू नई दरें-
दुधवा नेशनल पार्क में-
प्रवेश शुल्क प्रति व्यक्ति तीन दिन          100 रुपए
                      विदेशी          800 रुपए
                      वच्चा            60 रुपए
                      विदेशी          700 रुपए
                     अतिरिक्त दिन      40 रुपए
                      विदशी          350 रुपए

किशनपुर वन्यजीव विहार में-                       
प्रवेश शुल्क प्रति व्यक्ति तीन दिन            50 रुपए 
                      विदेशी           600 रुपए
                      वच्चा             30 रुपए
                      विदेशी           350 रुपए
                     अतिरिक्त दिन       40 रुपए
                       विदशी          350 रुपए
दुपहिया वाहन                            20 रुपए
कार, जीप                              100 रुपए
पर्यटक बस                             200 रुपए
रोड फीस हल्की गाड़ी                    300 रुपए
         मिनी बस                      800 रुपए
         भारी गाड़ी                    1600 रुपए
कैमरा फीस पर्यटकों के लिए               निःशुल्क
कैमरा फीस मूवी एवं वीडीयो               5000 रुपए
                  विदेशी              10000 रुपए
फीचर फिल्म प्रतिदिन                   100000 रुपए
                  विदेशी             150000 रुपए
डाक्युमेंट्री फिल्म प्रतिदिन                  6000 रुपए
                  विदेशी              12000 रुपए
उपरोक्त के लिए सुरक्षा फीस-
फीचर फिल्म                           100000 रुपए
                  विदेशी              150000 रुपए
डाक्युमेंट्री फिल्म                         25000 रुपए
                  विदेशी               25000 रुपए
हाथी सवारी दो घंटा प्रति व्यक्ति              150 रुपए
                  विदेशी                 300 रुपए
मिनी बस 10 सीटर प्रति किमी                 45 रुपए
                  विदेशी                  90 रुपए
जीप 6 सीटर प्रति किमी                      40 रुपए
                  विदेशी                  80 रुपए 

गैंडा क्षेत्र में पर्यटक
दुधवा नेशनल पार्क का विश्राम गृह
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 देवेन्द्र प्रकाश मिश्र (लेखक वाइल्डलाईफर एवं पत्रकार हैं। दुधवा नेशनल पार्क के निकट पलिया में रहते है, इनसे dpmishra7@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।)

Nov 8, 2010

खवासा का आदमखोर

खवासा (करवासा) का नर-भक्षी: 
जब महिलायें पड्डे की जगह इस्तेमाल हो जाती थी। -मौत के तांडव को रोकने के लिए औरतें देती थी अपनी जान की कुर्बानी !!

अमावस्या की अंधेरी रात मे अलाव की रोशनी जिन चेहरों को उजागर कर रही थी वे सभी शोक  भय असहायता से ग्रस्त थे । इन लोगो मे शामिल थे खवासा के बचे खुचे ग्रामीण ब्रिटिश सरकार के ३ अंग्रेज अफ़सर और ५०० रूपये इनाम की लालच मे आया नन्दू नाम का शिकार सहायक । इस असहायता का कारण था वह बाघ जो पिछले कई महिनो से इलाके मे कहर ढा रहा था । हालत यहां तक पहुच चुकी थी कि नामी शिकारी भी हथियार डाल चुके थे और सरकार द्वारा इसे मारने के लिये रखा गया इनाम बढ़ते बढ़ते ५०० रूपये तक पहुंच चुका था।

खवासा जो आज पेंच राष्ट्रीय उद्यान का प्रवेश द्वार है उस समय एक छोटा सा गांव था और वहां तक पहुचने के लिये  बैलगाड़ी का सहारा लेना पड़ता था । खवासा और उसके आस पास के गांवो में उस समय पिछले दो वर्षो से एक आ कहर ढा रहा था उसने १५० से ज्यादा आदमियो का शिकार किया था लेकिनउस समय अंग्रेज शासन  मध्य भारत मे पूरी तरह स्थापित नही हुआ था अतः इस आदमखोर ने कुल कितने लोगों का शिकार किया था यह तथ्य स्थापित नही हो पाया


यह बाघ एक लहीम शहीम नर था और पहले इसने कभी किसी पशु तक को नही उठाया था  ग्रामीण भी निडर होकर इसके सड़क किनारे बैठे रहने पर भी आराम से निकल जाते थे । लेकिन मई के महिने मे जब पानी के सभी सोते सूख गये तब जंगल के इकलौते तालाब मे मचान बनाकर नागपुर से आया एक अंग्रेज अफ़सर बैठा हुआ था । वह अफ़सर इस विशाल बाघ की खाल को लंदन मे अपनी प्रेमिका को भेंट करना चाहता था । पर उसे यह गुमान नही था कि यह भेंट एक नही बल्की सैकड़ों जानो की कुर्बानी ले लेगी । उसका निशाना चूक गया और उसकी गोली बाघ के पिछले पैरो पर लगी और वह बाघ हमेशा के लिये अपंग हो गया । अफ़सर चूंकि गोली लगने के बारे मे निश्चित नही था अतः वह यह बात बिना किसी को बताये लौट गया ।

इस घटना के कुछ दिन पश्चात गावों मे पशुओ पर हमले होने लगे और ग्रामीणॊ ने अपने पशुओ की सुरक्षा कड़ी कर दी इससे बाघ के लिये भोजन जुटाना कठिन होता जा रहा था इसी बीच मंगलू नाम का एक ग्रामीण साथी के साथ पगडंडी से गांव लौट रहा था उसने सड़क के किनारे बैठे बाघ को देखा और हमेशा की तरह आगे बढ़ा पर इस बार भूखे बाघ का इरादा कुछ और था मंगलू के आगे निकलते ही उसने पीछे से हमला किया और खामोशी से मंगलू को ले गया साथी ने कुछ कदम बाद मुड़ कर देखा तो उसे बाघ की झलक दिखाई दी पर मंगलू नही दिखा उसने आवाजे लगाई जवाब न मिलने पर वह तेजी से गांव की ओर भाग चला । ग्रामीणो ने जब खोज बीन की तो उन्हे मंगलू का आधा खाया शव मिला । मंगलू  खवासा के आदमखोर का पहला शिकार था ।

इस घटना के बाद तो हत्याओं की झड़ी लग गयी लोगो ने झुंड मे आना जाना शुरू कर दिया इससे कुछ दिन तो शांती रही पर फ़िर बाघ ने झुंड पर भी हमला करना शुरू कर दिया और एक घटना मे तो उसने अपने शिकार की खोज मे आये लोगो मे से ही एक को उठा लिया । इसके बाद बाघ ने जिसको भी उठाया उसके शव को खोजने भी कोई नही जाता था । इलाके के गांव रास्ते जंगल कोई जगह सुरक्षित नही रही । सरकार ने इनाम घोषित किया उसे मारने शिकारी आये जगह जगह गारे बांधे गये । पर उस पर गोली चलाने का अवसर एक ही शिकारी को मिल पाया ।

उमेद सिंग नाम का यह शिकारी पीपल के पेड़ पर अपने एक साथी के साथ बैठा हुआ था नीचे एक बहुत मिमयाने वाले बकरे को बांधा गया था । रात के तीसरे पहर जब आदमखोर की गंध बकरे को मिली तो वह भय से जोर जोर से मिमयाने लगा उमेद सिंग भी तैयार था । आधे घंटे तक जब आदमखोर नही आया तो उमेद सिंग थोड़ा असावधान हो गया अचानक
बिजली की तेजी से आदमखोर बकरे पर लपका और एक झटके बकरे को लेकर गायब हो गया । उमेद सिंग ने गोली चलाई पर गोली आदमखोर के कान को भेदते हुये निकल गयी ।
पूरा घटनाक्रम अप्रत्याशित था और बकरे की रस्सी बकरे की ताकत के हिसाब से बांधी गयी थी बाघ की नही इसके अलावा उमेद सिंग बाघ के आराम से आने की उम्मीद मे था जैसा की
आम गारे पर होता और उमेद सिंग पैसा बचाने के लिये भैंस या बैल के बदले बकरा लाया था । और बाघ के शिकार के बाद वह उस बकरे की दावत भी उड़ा सकता था ।

उमेद सिंग की भूल अब सैकड़ो लोगो पर भारी पड़ने वाली थी यह बकरा वो आखिरी गारा था जिसपर आदमखोर ने हमला किया था अब उसने गारे और बंदूक मे संबंध जोड़ लिया था और फ़िर कभी उसने गारे की तरफ़ रूख नही किया । उसने हत्या करने का एक नायाब तरीका ढूंढ लिया था वह  मनुष्यो की आवाज से आकर्षित होकर हमला करता था । लोग मरते गये इनाम बढ़ता गया कई शिकारी अनेको रातों तक गारे के उपर घात लगाकर बैठे पर सब के हाथ निराशा ही लगी । बड़े बड़े लाट साहब लाव लश्कर के साथ आते और गांव वालो की उम्मीद बढ़ जाती पर नतीजा सिफ़र का सिफ़र ।

एक दिन एक अंग्रेज अफ़सर अपने तीन भारतीय शिकार सहायकों के साथ बाघ की तलाश मे घूम रहा था । तभी उन्हे सांभर की चेतावनी की आवाज सुनाई पड़ी उत्साहित होकर सभी सावधानी से बिना आवाज उस तरफ़ बढ़ चले लंगूर भी बाघ की उपस्थिती के चेतावनी देने लगे  माहौल मे तनाव छा गया कि अचानक चेतावनी की आवाजे आना बंद हो गयी अफ़सर ने मशवरे के लिये  उसके पीछे चल रहे सहायको मे से सबसे अनुभवी सहायक मोहन को धीरे से आवाज दी कोई जवाब न मिलने पर वह पलटा उसने देखा की दो सहायक भी मोहन की तलाश मे दायें बायें देख रहे थे अचानक उनकी नजर जमीन पर पड़ी मोहन की पगड़ी और टंगिये पर पड़ी एक सहायक चिल्लाया साहिब मोहन को आदमखोर ले गया दूसरा बोला साहिब ये आदमखोर शैतान है जो मोहन को हमारे बीच से उठा कर ले गया है । अफ़सर ने मोहन की तलाश करने की बात कही लेकिन सहायक किसी कीमत पर तैयार नही थे अफ़सर ने दोनो को ५० ५० रूपये का लालच भी दिया और तोप के सामने खड़े कर उड़ा देने की धमकी भी दी । लेकिन सहायकॊं ने बोला साहिब भले जान से मार दे पर अगर आदमखोर हमे उठा कर ले गया तो हमारी आत्मा भी शैतान बन जायेगी और हमे कभी मुक्ती नही मिलेगी । इस अंधविश्वास के आगे बेबस अफ़सर वापस शिविर लौट गया ।

उस अफ़सर और सहायकों के वापस नागपुर अपनी रेजिमेंट तक  पहुचते पहुचते बाघ एक भयंकर दानव मे बदल चुका था और उसने मोहन को अफ़सर और सहायकों को सम्मोहित करके उनकी आंखो के सामने उठाया था । आप ही बताएं जिस मोहन ने अपने जीवन काल मे अपने टंगिये से ३ बाघो और अनगिनत भालुओं का सामना किया था और जो मदमस्त  नर हाथी से भी नही डरता था उसे क्या कोई आम बाघ रेजीमेंट के सबसे अनुभवी शिकारी गोरा साहिब के सामने ऐसे  उठा सकता था वो भी बिना आवाज के ।

इस घटना के बाद कोई शिकार सहायक किसी भी कीमत पर उस आदमखोर के शिकार मे शामिल होने के लिये तैयार नही होता था एक दो बार अफ़सरों ने बंदूक की नोक पर सहायकों को साथ लिया पर वे या तो रास्ता भूल कर गलत जगह पहुच जाते थे या रास्ते से गायब हो जाते थे । हार कर सरकार ने बाघ पर ५०० रू. का इनाम रख दिया । ऐसे मे नंदू नाम का एक बेहद अनुभवी शिकारी तीन अंग्रेज अफ़सरों से ५०० का इनाम पूरा उसे मिलेगा इस शर्त पर तैयार हो गया । इस ५०० रू. जिसकी कीमत आज के लाखों रू. के बराबर थी से वह भूमिहीन आदमी बड़ा किसान बन सकता था ।

वही नंदू उस अलाव के सामने तीन अंग्रेज अफ़सरों और बेबस गांववालों के साथ बैठा हुआ था । गांववाले जो न अब उस गांव मे रह सकते थे और न ही उसे छोड़कर जा सकते थे क्योंकि उनके सालभर का जीवन यापन वह फ़सल थी जो उनके खेतो मे लगी हुई थी जिसके कटने मे अभी वक्त था और उनके वहा से चले जाने पर जंगली जानवर फ़सल सफ़ाचट कर देते । नंदू और अफ़सरों की सारी कोशिशें नाकाम हो चुकी थी और उनके लौटने का वक्त भी आ गया था । अलाव के चारों ओर एक अजीब लगने वाली खामोशी पसरी हुई थी  किसी के पास बोलने के लिये शब्द नही थे अफ़सर भी इस गांव मे कुछ समय रहने के बाद गांववालो के दर्द से भली भाती वाकिफ़ थे और अंदर से उद्वेलित भी । तभी उस खामोशी कॊ चीरते हुए गांव के एक बुजुर्ग की आवाज गूंजी " एक ही रास्ता है साहिब इस बाघ को आदमी का गारा चाहिये तभी वह आयेगा और तभी उसकी मौत संभव है बिना बली दिये इस दानव का अंत संभव नही है "।

इन शब्दो को सुनने के बाद सन्नाटा और गहरा हो गया । इस चुप्पी को तॊड़ते हुये एक अवाज और गूंजी " मै बनूंगी गारा साहिब "  । यह आवाज थी शशी की एक २५-३० साल की खूबसूरत लेकिन अस्तव्यस्त औरत जिसका पति और बच्चा  आदमखोर का शिकार बन गये थे । सरपंच बोला " यह औरत पागल हो गयी है साहब इसकी बात पर ध्यान मत दो " । फ़िर वह शशी की ओर मुड़ा और बोला " क्या अनाप शनाप रही है भाग यहां से "। शशी ने कहा "मै बनूंगी साहब मुझे बदला लेना है मेरे परिवार को मार कर इस आदमखोर ने मुझे अनाथ कर दिया है मै गारा बन कर गाना गाते हुये इस आदमखोर को आपके कदमों मे खींच लाउंगी " । मैं तो मर जाउंगी पर मेरा नाम हमेशा के लिये अमर हो जायेगा ।  नंदू अजीब सी निगाहो से उसे घूर रहा था अफ़सर ने कहा " इस बात का सवाल ही नही उठता है किसी भी आदमी को गारा बनाना अक्षम्य अपराध है " । नंदू ने कहा " लोग तो वैसे भी रोज मर ही रहे है साहिब शशी के गारा बन जाने से  बाकियो की जान तो बचेगी "। इसपर अफ़सर ने कहा "अगर ऐसा है तो तू खुद गारा क्यों नही बन जाता इस बारे में अब आगे बात नही होगी "।

अगले दिन दोपहर बाद नंदू ने अफ़सर से कहा साहिब आज गांव के खेत के पास आदमखोर दिखा है ३ दिनो से उसने शिकार नही किया है रात मे आज हमे उसको मारने का पूरा मौका होगा । अफ़सर ने कहा कि इतने दिनो तक हमने क्या प्रयत्न नही किये कितनी बार ऐसी खबरे आयी पर कल हमे निकलना है सफ़र लंबा है रात मे आराम कर लेते हैं । नंदू बोला नही साब आज की रात हम उस राक्षस को मारेंगे यह बात तय है । नंदू की जिद पर साहब राजी हो गया । शाम को जब वे नंदू के साथ मचान पर पहुचे तो अफ़सर ने कहा अरे यहां तो कोई गारा नही है नंदू ने कहा साहब आज गारा लाने के तरीके पर मैने बदलाव किया है आज मेरे भरोसेमंद ४ साथी अंधेरे मे बाते करते हुए गारा लायेंगे उनकी आवाज सुनकर बाघ आयेगा और उनको पेड़ो पर चढ़ाकर हम बाघ का इंतजार करेंगे इस बात को सुनकर अफ़सर भी खुश हो गया और वे सभी मचान पर चढ़कर गारे का इंतजार करने लगे अफ़सर को शराब की तीव्र बदबू आयी नंदू बेहद पिया हुआ था पर अफ़सर ने फ़िलहाल के लिये इस बात को नजरंदाज कर दिया । इंतजार करते हुये जब काफ़ी देर हो गयी तब अफ़सर ने नंदू को डंटकर पूछा "क्या तुम शराब के नशे मे आकर उटपटांग बाते कर रहे हो इस अंधेरे मे कौन मरने के लिये गारा लेकर आयेगा । नंदू ने कहा नही साहिब गारा जरूर आयेगा मै कसम खाकर कहता हूं । उस अफ़सर के मन मे पहला खयाल यही आया कि इस नशे मे धुत्त आदमी की बात पर भरोसा करना बेकार है पर वह अफ़सर भारत मे दो दशको से रह रहा था और उसके मन के एक हिस्से मे यहां के किस्से कहानियों ने घर कर लिया था और मोहन के साथ वह अनेको शिकार अभियानो मे जा चुका था । आखिर भारत एक ऐसी जगह ही है कि जो यहां आता है वह यहां के माहौल के अनुसार ढल जाता है । अफ़सर के मन मे शैतान से जीसस क्राईस्ट बचा पायेंगे की नही इस शक ने घर कर लिया था आखिर भारतीय देवी देवताओं को चढ़ाया गया चढ़ावा भी इस शैतान को रोकने मे असफ़ल था और अफ़सर पिछले छह महिनो से किसी भी प्राथना मे चर्च नही गया था अतः उसने रुकने मे ही भलाई समझी ।


रात करीब दस बजे नंदू के खर्राटॊं से आस पास का माहौल गुजांयमान था तभी कही दूर से एक महिला के गाने की आवाज आयी उस आवाज को सुनकर अफ़सर पहले चौकन्ना हुआ रात के इस पहर कौन औरत खेतो मे गाना गा सकती है । तभी आवाज नजदीक आते प्रतीत हो रही थी नंदू भी जाग गया और चौकन्ना हो गया उसमे आये इस परिवर्तन से अफ़सर हैरान था  लेकिन आवाज भी नजदीक आते जा रही थी । तभी मचान के ठीक बाजू से एक कोटरी भौंका !!! नंदू एकदम सावधान हो गया उसने अफ़सर को फ़ुसफ़ुसाकर कहा  साहिब बाघ आया तैयार हो जाओ तभी चांद की रौशनी मे औरत स्पष्ट दिखाई देने लगी । वह गाते हुये नजदीक आने लगी कोटरी ने फ़िर आवाज दी । अफ़सर ने अब शशी को पहचान लिया वह चिल्लाया भागो आदमखोर है पर शशी पर इस चेतावनी का कोई असर नही हुआ वह मचान की ओर बढ़ती गई तभी एक चट्टान के पीछे से बाघ का विशाल सिर दिखाई पड़ा अफ़सर ने फ़िर शशी को चेतावनी दी लेकिन शशी निर्बाध गती से आगे बढती गई   कोई और बाघ रहता तो वह इतने शोरगुल मे वहां से भाग जाता लेकिन इस आदमखोर को तो मनुष्यों के बीच से शिकार उठाने की आदत थी मचान के ठीक सामने शशी ठिठक कर खड़ी हो गयी और उसकी नजरों के सामने से आदमखोर ने उस पर छलांग लगाई ठीक उसी समय अफ़सर ने गोली चलाई पर निशाना चूक गया और बाघ ने शशी का गला दबोच लिया । ऐसा नही है कि अफ़सर के ध्यान में कोई कमी थी या निशाना कमजोर था लेकिन उसका ध्यान शशी को सावधान करने मे ज्यादा था और बाघ को मारने मे कम नंदू दम साधे इंतजार कर रहा था और उसने दूसरे अफ़सर को करीब करीब दबोच रखा था जैसे बाघ साशा के उपर कूदा वैसे ही उसने अफ़सर कॊ छोड़ा और बोला साहिब मारो अफ़सर ने छूटते ही निशाना साधा बाघ भी आती आवाजो से भ्रमित था उस एक क्षण मे निशाना सटीक बैठा गोली सर पर लगी बाघ वही ढेर हो गया । 
नंदू पेड़ से यह सुनिश्चित करने के बाद कूदा कि बाघ मर चुका है वह बाघ के पास गया उसने उसे एक लात मारी और सरपट भाग निकला ।

अगले दिन सुबह पता नही किस संचार व्यवस्था से यह बात आस पास के बीसियों गांवो तक फ़ैल चुकी थी हजारो लोग बाघ को देखने और शशी के अंतिम संस्कार मे शामिल होने पहुच गये थे अफ़सरो ने भी पूरा खर्चा उठाया हालांकि वे ऐसा नही करते तो भी अंतिम संस्कार उतने ही सम्मान से होता पर उनके सिर मे जो बोझ था उसको उतारने का यही एक रास्ता था और रही बात नंदू की तो अफ़सर ने उसे देखते ही गोली मारने की कसम ले ली शशी की मौत के लिये वो पूरा पूरा जिम्मेदार था ।

इस घटना के तीन महिने बाद एक महिला अफ़सर के दरवाजे पहुंची और फ़ूट फ़ूट कर रोने लगी अफ़सर ने उससे कारण पूछा तो उसने कहा कि नंदू उसका पति है और वह गांव के जमीदार से ५०० रू कर्जा लेकर उसे गिरवी रखकर भाग गया है उसकी इज्जत तभी बच सकती है जब सरकार इनाम का ५०० रू दे दें । अफ़सर समझ चुका था कि नंदू ने ही अपनी पत्नी को भेजा है पर अफ़सर को आदमखोर को मारने के एवज मे प्रमोशन मिल चुका था और नियम से नंदू इनाम का हकदार भी था उसने इनाम भी दे दिया । पर ताउम्र वह अफ़सर अपराधबोध से उबर न पाया  उसके मकबरे जो कि ईंग्लैड मे है मे लिखा हुआ है मै एक पाप का भागीदार था---
( I WAS A PARTY IN A WORST SIN POSSIBLE )


इस सत्य घटना मे नंदू के उपर क्रोध आना लाजिमी है पर उसने केवल एक महिला के बदला लेने की चाहत को अपने फ़ायदे के लिये इस्तेमाल किया और वह महिला भी इसका अंजाम जानती थी और नंदू बेहद गरीब था । लेकिन हमारे देश मे आज ऐसे कई लोग नेताओ उद्योगपति और अफ़सरों के रूप मे काम कर रहे है जो न गरीब है ना मजबूर लेकिन चंद रूपयो की लालच मे वे एक पूरी पीढ़ी के भविष्य से खिलवाड़ कर रहें है बेजुबान वन्य प्राणियो और बेबस आदिवासियों के रहवास क्षेत्र को धुएं और धूल के गुबार से बरबाद कर रहे हैं । देश के बहुमूल्य पारस्थितीतंत्र से खिलवाड़ करने वाले ऐसे बेरहम लालचियों के सामने तो नंदू एक देवता नजर आता है।

 अरूणेश दवे (लेखक छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में रहते है, पेशे से प्लाईवुड व्यवसायी है, प्लाई वुड टेक्नालोजी में इंडियन रिसर्च इंस्टीट्यूट से डिप्लोमा।वन्य् जीवों व जंगलों से लगाव है, स्वतंत्रता सेनानी परिवार से ताल्लुक, मूलत: गाँधी और जिन्ना की सरजमीं से संबध रखते हैं। सामाजिक सरोकार के प्रति सजगता,  इनसे aruneshd3@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।)

Nov 6, 2010

टाइगर हैवन

जहाँ मनुष्य और बाघ एक साथ रहते थे।

द्वितीय विश्व युद्ध के समाप्त होने के बाद लेफ़्टीनेंट बिली अर्जन सिंह खीरी जनपद में खेती करने के उद्देश्य से सन १९४६ में आये। खीरी के जंगलों से वह पूर्व परिचित थे कभी विजय नगर के राजा के साथ वह यहाँ शिकार खेलने आया करते थे। वर्तमान दुधवा नेशनल पार्क जो उस वक्त खीरी वन विभाग का उत्तरी-पश्चिमी वन प्रभाग हुआ करता था में पलिया कस्बे के निकट एक कृषि-भूमि क्रय की, और अपने पिता के नाम पर इस कृशि फ़ार्म का नाम "जस्वीर नगर" रखा। खीरी के जंगलों में भ्रमण करते वक्त सन १९५९ में सुहेली और नेवरा नदी के जंक्शन पर इन्होंने वह भूमि देखी जहाँ आज टाइगर हैवन स्थित हैं। इस सुरम्य स्थल को वन्य जीवन की प्रयोगशाला बनाकर बिली अर्जन सिंह ने ५० वर्ष से अधिक वन व वन्य जीव सरंक्षण में महत्व पूर्ण भूमिका निभाते रहे।

सन १९७२ में श्रीमती इन्दिरा गाँधी के टाइगर हैवन आने की संभावना पर बिली अर्जन सिंह नें इस भवन को दोमंजिला बनाया कुछ इस तरह जैसे ग्रेट ब्रिटेन में महारानी के वहाँ जाने पर उस भवन में ऊपरी मंजिल को एक खूबसूरत शक्ल देकर एक अलग हिस्से का निर्माण किया जाता था।
टाइगर हैवन में निवास कर रहे बाघ व तेन्दुओं पर कई अन्तर्राष्ट्रीय फ़िल्म निर्माताओं ने डॉक्युमेन्ट्री फ़िल्मों का निर्माण किया। इन फ़िल्मों के माध्यम से टाइगर हैवन को विश्व में ख्याति अर्जित हुई।
तारा नाम की बाघिन, जूलिएट व हैरियट तथा प्रिन्स नाम के तेन्दुओं का दुधवा के जंगलों में पुनर्वासन कार्यक्रम।
प्रसिद्ध बाघ सरंक्षक बिलिंडा राइट की माँ श्रीमती एन राइट ने बिली अर्जन सिंह को तेन्दुए का शावक भेंट किया, जो बिहार में अपनी माँ से बिछड़ गया था। बिली ने इसका नाम प्रिन्स रखा, यह तेन्दुआ वयस्क होकर खीरी जनपद के जंगलों में अपनी प्रजाति से घुल-मिल गया था।
टाइगर हैवन के इन सफ़ल प्रयोगों पर बिली द्वारा दुधवा के बाघों में आनुवंशिक प्रदूषण फ़ैलाने के आरोप भी लगे। तारा बाघिन जो इंग्लैड से लाकर दुधवा में पुनर्वासित हुई वह साइबेरियन व रायल बंगाल की शंकर नस्ल साबित हुई। बाघ की कोई उप-जाति नही होती हैं, वह विभिन्न भौगोलिक स्थितियों में रहते हैं, था इसके अनुरूप उनका शारीरिक विकास होता है, यह रेसेज में विभिन्न माने जाते हैं, जैसे होमो-सैपियन्स, चाहे वह अफ़्र्रेकन हो या भारतीय, इनके आपस में प्रजनन करने से किसी प्रकार की आनुवशिंक प्रदूषण की आंशका नही होती। विभिन्न आनुवंशिक विज्ञान के अनुसार इससे इन-ब्रीडिंग की समस्या समप्त होती हैं, और नस्ले और अधिक संमृद्ध व विकसित होती हैं।
टाइगर हैवन में बाघों पर हुए प्रयोगों के परिणाम स्वरूप दुधवा के जंगलों में रायल बंगाल-साइबेरियन (साइबेरियन-बंगाल टाइगर की संकर नस्ल वाली तारा बाघिन के दुधवा के रायल बंगाल टाइगर्स के मध्य प्रजनन के कारण) नस्ल के बाघों की उपस्थिति दर्ज हुई हैं, कई वैज्ञानिक सम्स्थानों ने डी०एन०ए० की जाँच के उपरान्त यह आंशकां व्यक्त की हैं, कि बिली के बाघ पुनर्वासन से दुधवा व खीरी जनपद के वनों में द्वि-नस्ली बाघ उत्पन्न हुए।
टाइगर हैवन के बाघ व तेन्दुओं के जंगली बाघों व तेन्दुओं के संपर्क में आने के पश्चात जंगल के बाघों व तेन्दुओं की आमद टाइगर हैवन में बढ़ गयी। जिस कारण वहाँ कई मानव भक्षण की घटनायें हुई। कहा जाता है कि टाइगर हैवन की बाघिन तारा नर-भक्षी हो गयी थी और उसने ५० से अधिक मानव-भक्षण की घटनायें की। किन्तु टाइगर हैवन के मालिक अर्जन सिंह यह नही मानते थे। उनके अनुसार ये घटनाएं दुधवा के बाघों द्वारा की जा रही थी।

वर्तमान में बिली के उपरान्त टाइगर हैवन इस वर्ष आई बाढ़ में क्षतिग्रस्त हो गया। और अब यहाँ वन्य-जीव सरंक्षण से संबधित कोई कार्य नही किया जाता। टाइगर हैवन की कृषि-भूमि पर की फ़सले उगाई जाती है।

कृष्ण कुमार मिश्र ( मन के द्वन्दों को शब्द देना, अपने आस-पास की घटनाओं को वैचारिक मंथन के उपरान्त  शब्दों की शक्ल में संकलन करना, प्रकृति के रहस्यों व इतिहास की परते उखाड़ने की आदत, लखीमपुर खीरी में निवास, वार्तालाप के लिए krishna.manhan@gmail.com पर सम्पर्क कर सकते हैं।)

विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था