International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Save Tiger

DON'T LET WILD TIGERS DISAPPEAR

Lady Rosetta

Potatoes with low sugar content and longer shelf life.

अबूझमाड़ के जंगल

जहां बाघ नही नक्सली राज करते हैं

खवासा का आदमखोर

जहां कांपती थी रूह उस नरभक्षी से

जानवर भी करते हैं योग

योगाचार्य धीरज वशिष्ठ का विशेष लेख

Oct 31, 2010

सफ़ेद बाघ

मनोज शर्मा* इसका रंग ही बन गया इसकी कैद का सबब:
मैंने सफ़ेद टाइगर को छतीसगढ़ में भिलाई के मंत्री गार्डेन में पहली बार देखा था तो लगा की सफ़ेद टाइगर कुदरत का ये अनमोल तोफहा है। लेकिन  उस के  बारे जाने की कोशिश की  तो लगा अपने सफ़ेद रंग के कारण से यह कितनी बड़ी सजा मानव के द्वारा मिल रही है।  अपने सफ़ेद रंग के कारण से पूरा जीवन जेल में कटाता है  क्या उसके साथ हम अन्याए नहीं कर रहे है  ? 
सफेद बाघ  बड़े ही आकर्षक - विशाल आकार, श्वेत चर्म पर गहरी भूरी धारियां, हल्के गुलाबी होंठ और नाक, तथा कठोर नीली आंखें। इन विलक्षण जानवरों की कहानी अत्यंत रोचक है।

देश-विदेश के चिड़ियाघरों में प्रदर्शित सभी सफेद बाघों का पूर्वज मोहन नाम का सफेद बाघ है। उसे १९५१ में रीवा के बाग्री वनों में अपनी मां के साथ विचरते समय पकड़ा गया था। उसकी मां तो शिकारियों की गोलियों की भेंट चढ़ गई पर मोहन, जो उस समय एक निरा दूध-पीता बच्चा था, जिंदा पकड़ लिया गया। उसके विलक्षण रंग को देखकर रीवा के महाराजा ने उसके विशेष परवरिश की व्यवस्था कर दी। जब वह बड़ा हुआ तो बेगम नाम की एक साधारण बाघिन से उसका जोड़ा बांधा गया। बेगम ने १९५३-५६ के दौरान तीन बार बच्चे जने और कुल १० शावक पैदा किए। ये सब साधारण रंग के बाघ थे। वर्ष १९५८ में उनमें से एक बाघिन राधा से, जो मोहन की ही पुत्री थी, मोहन के चार बच्चे हुए, जो सभी श्वेत रंग के निकले। आज चिड़ियाघरों में दिख रहे बीसियों सफेद बाघ सब इन्हीं चार शावकों के वंशज हैं। इन सबके पितामह मोहन ने २० वर्ष की लंबी आयु पाई और १९६९ में मध्य प्रदेश में रीवा नरेश के एक महल में उसका देहांत हुआ।


यद्यपि मोहन से पहले भी जंगलों में सफेद बाघ देखे गए हैं, लेकिन उनमें और मोहन में एक खास अंतर है। मोहन इन सफेद बाघों के समान "एलबिनो" नहीं था। एलबिनो जानवरों की आंखें गुलाबी रंग की होती हैं। वे बहुधा कमजोर एवं कद में छोटे होते हैं और अधिक समय जीवित नहीं रहते। मनुष्य समेत अनेक प्राणियों में एलबिनो पैदा होते हैं। मनुष्यों में उन्हें सूर्यमुखी मनुष्य कहा जाता है। उनके शरीर - बाल समेत - सफेद रंग का होता है क्योंकि उनमें रंजक पदार्थ नहीं होते। इसके विपरीत मोहन की आंखें नीली थीं और वह सामान्य बाघों से बड़ा और शक्तिशाली था। बंदी अवस्था में भी वह स्वस्थ रहा और उसने प्रजनन किया।

सच तो यह है कि मोहन एक "रिसेसिव म्यूटेंट" था। बाघों की चमड़ी, नाक और आंख के रंग को एक खास जीन निर्धारित करता है जिसे 'क' नाम दिया जा सकता है। इसके प्रभाव को निष्क्रिय बनानेवाला एक दूसरा जीन भी होता है, जिसे इसका रिसेसिव जीन कहा जाता है। इसे 'ख' से अभिहित किया जा सकता है। यदि किसी जीव में 'क' जीन न हो तो यह रिसेसिव जीन 'ख' सक्रिय हो उठता है और उस जीव को एलबिनो बना देता है। सामान्य रंग वाले बाघों में 'क-क' अथवा 'क-ख' का जीन-संयोजन पाया जाता है, जबकि सफेद बाघ में अनिवार्यतः 'ख-ख' का जीन-संयोजन होता है, यानी उनमें 'क' जीन का अभाव होता है। इस तरह यदि बाघ-बाघिन में से एक भी 'क-क' हो, तो सभी शावक सामान्य पैदा होंगे, परंतु यदि दोनों 'क-ख' हों तो एक-आध शावक सफेद पैदा हो सकते हैं। परंतु यदि दोनों ही 'ख-ख' हों, तो उनके सभी बच्चे सफेद पैदा होंगे। यद्यपि १९५१ से पहले भी शिकारियों द्वारा सफेद बाघ मारे गए हैं, लेकिन मोहन पहला सफेद बाघ था जिसे जिंदा पकड़ा गया और उसने बंदी अवस्था में प्रजनन भी किया। उसकी संतति के कारण सफेद बाघ विश्व-प्रसिद्ध हो गए।

उनके विलक्षण रंग और विशाल आकार के अलावा सफेद बाघों और अन्य बाघों में कोई भी अंतर नहीं होता है। दुर्भाग्य से अत्यधिक अंतरप्रजनन के कारण इस विलक्षण जीव की नस्ल बहुत क्षीण हो गई है। मोहन की वंश परंपरा में ११४ सफेद बाघ पैदा हुए, जिनमें से केवल २५ आज भारत और अन्य देशों में जीवित हैं।




मनोज शर्मा ( लेखक लाइव इंडिया में लखीमपुर के जिला सवांददाता है, किशनपुर वन्य जीव विहार के निकट मैलानी में निवास, इनसे manojliveindia@gmail.com पर सम्पर्क कर सकते हैं।)

Oct 30, 2010

ग्रामीणों ने बचाया इस अदभुत जीव को !

बहुत दिनों बाद दिखा दुर्लभ जीव सल्लू सांप

अपने अस्तिस्व के संकट से जूझ रहा ’’सल्लू सांप’’ (Pangolin) जनपद लखीमपुर-खीरी निघासन तहसील के ढखेरवा नानकार गांव में 27 अक्तूबर 2010 की रात दिखाई दिया। करीब ढाई फिट लंबा और पौन फिट ऊंचा खतरनाक सा दिखने वाला यह जीव इस गांव के दौलतराम के घर के आंगन में रात करीब दस बजे दौड़ लगा रहा था। पड़ोस के घर से करवाचौथ की पूजा करके लौटी दौलतराम की बीवी रूपरानी ने अपने आंगन में इधर से उधर दौड़ लगा रहे पूरे शरीर पर पत्थर सरीखे शल्क (Scales) जिनको ग्रामीण अपनी गंवई भाषा में ’खपटे’ कहते हैं, लपेटे इस विचित्र जीव को देखा तो इस महिला की चीख निकल गई। बीवी की चीख सुनकर दौलतराम बाहर निकल आया।

देखते-देखते वहां आसपास के लोगों की भीड़ लग गई। लोग लाठी-डंडे निकाल लाए। वे इस बेजुबान सीधे-सादे जीव को मारने जा रहे थे। भला हो गांव के उन बुजुर्गां का जिन्होंने इसकी पहचान सल्लू सांप के रूप में की और इसको बेहद सीधा जीव बताते हुए इसकी जान बचाई। तब जाकर ग्रामीणों ने इस जीव को एक नांद के नीचे ढक दिया। धन्यवाद तो हम वन्यजीव प्रेमियों को ग्राम प्रधान मनोज पाण्डेय का भी होना चाहिए जिन्होंने इसकी खबर तत्काल पुलिस और वन विभाग को दी। वन क्षेत्राधिकारी धौरहरा एन एन पाण्डेय ने अलसुबह वन दरोगा रफीक खां और वन रक्षक अरूण कुमार को गांव भेजा। एस आई तुलसीराम भी मौके पर पहुंचे।

रात में इस जीव की जान लेने को आमादा ग्रामीणों ने जब इसको किसी को कोई नुकसान न पहुंचाते देखा तो वे इसके साथ खेलने लगे। इसे जहां छोड़ा गया, इसने बहुत तेजी से जमीन खोदनी शुरू कर दी। काफी देर तो वह इसको वनकर्मियों से छिपाते घूमे। आखिर इसको वनकर्मियों ने अपनी अभिरक्षा में ले लिया। पहले तो दुर्लभ प्रजाति के इस जीव को चिड़ियाघर भेजने का प्लान बना पर बाद में वन्यजीवों से आंतरिक लगाव रखने के लिए मशहूर प्रभागीय वनाधिकारी कार्तिक कुमार सिंह के निर्देश पर इसे धौरहरा क्षेत्र के जंगल में छोड़ दिया गया।


आखिर क्या है और कहां से आया था सल्लू सांप ?
एक अरसे से लोगों की निगाहों से गायब सल्लू सांप बीते 27 अक्तूबर की रात ढखेरवा नानकार गांव में पास के एक नाले से आया बताया जाता है। वन्यजीव विशेषज्ञ और विश्व प्रकृति निधि के डॉ0 वीपी सिंह बताते हैं कि नदियों के किनारे, नम और जंगली इलाकों, घास के सूखे मैदानों में बिल बनाकर रहने वाला यह जीव चींटी आदि छोटे-छोटे कीड़े-मकोड़ों को खाता है। इसी वजह से इसको चींटीखोर (Ant-Eater) कहा जाता है। डॉ0 सिंह कहते हैं कि यह भारतीय जीव है। इसकी तकरीबन नौ प्रजातियां होती हैं। अमेरिका आदि देशों में भी इसकी कुछ प्रजातियां मिलती हैं। यह सरीसृप (Reptiles) और स्तनधारी (Mammal) जीवों के बीच का जंतु है। यह अंडे देता है लेकिन अपने बच्चों को दूध पिलाता है।


प्रभागीय वनाधिकारी उत्तर खीरी वन प्रभाग केके सिंह बताते हैं कि यह दुर्लभ जीव है। लुप्तप्राय इस जीव को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत इसी कारण श्रेणी-1 में रखा गया है। सभ्यता के विकास के साथ ही इनज जीव-जंतुओं को आवास की किल्लत तो होती ही जा रही है, इसके साथ ही लोगों की जीव-जंतुओं के साथ लगाव भी कम हो रहा है। इसके शरीर पर मौजूद शल्क इसके सुरक्षा कवच का काम करते हैं। बाघ आदि जानवर इसको बहुत पसंद करते हैं लेकिन खुद पर हमला होते ही यह खुद को गोलाकार लपेट लेता है। तब इसके शल्क इसको बचाते हैं।

लोगों का मानना है कि पिछले दिनों इलाके में आई भीषण बाढ़ के चलते खाने की किल्लत के चलते यह जीव भटककर इस गांव में आ गया होगा।


कैसे-कैसे खतरे
सीधे-सादे और दुर्लभ प्रजाति के इस जीव को सबसे ज्यादा खतरे मानव से ही हैं। घुमन्तू कुचबंधिया बिरादरी के लोग न केवल सल्लू सांप को मारकर खा जाते हैं, बल्कि इसके शरीर पर लगे शल्कों को भी उखाड़कर उनमें छेद करके रस्सी से अपने मवेशियों के गले में डाल देते हैं। उनमें यह भ्रांति है कि इससे उनके जानवर न केवल बीमारियों से बचे रहेंगे बल्कि उनके ऊपर भूत-प्रेतों का साया भी नहीं पड़ेगा। उनकी इस सोच ने गांवों में रहने वाले तमाम अशिक्षित लोगों को प्रभावित किया और इसने सल्लू सांप के जीवन को खतरे में डाल दिया।

आइए, हम पढ़े-लिखे और सभ्य कही जाने वाली मानव जाति के लोग इस दुर्लभ और धरती से विलुप्त हो रहे इस जीव की सुरक्षा के लिए काम करें और इसके लिए औरों को भी जागरूक करें। धरती का सौंदर्य महज आलीशन मकान, पार्क, शानदार गाड़ियां ही नहीं, इस पर घूमने वाले छोटे-बड़े जीव और जैव विविधता भी है। हमारी तरह इन जीवों को जो हमसे कुछ मांगने की बजाय हमेशा कुछ देते ही हैं, भी हमारी तरह अपनी जिंदगी जीने का पूरा हक है।

सुबोध पाण्डेय ( लेखक सामाजिक कार्यकर्ता एंव पत्रकार हैं, पेशे से कानून के पैरोकार हैं, जिला खीरी  की तहसील निघासन में निवास,  मौजूदा वक्त में हिन्दुस्तान दैनिक में निघासन तहसील के संवाददाता हैं। इनसे pandey.subodhlmp@gmail.com पर सम्पर्क कर सकते हैं)

Oct 29, 2010

एक जानवर की कहानी !

सुरेश बरार* स्वीटू
स्वीटू जब मेरे घर आई वह सिर्फ़ १ हफ्ते की थी बहुत ही प्यारी , फ़ूल की तरह नाजुक उसका काला और सफ़ेद रंग ऐसे लगता था मानों कुदरत ने उसे ही सबसे फुर्सत मे बनाया हैं, वो मे का महिना था बहुत ही गर्म और शरीर को जला देने वाली गर्म हवा चल रही थी ! जब मैं शाम को घर पर पहुची तो छोटा भाई मेरा इंतजार कर रहा था वो मुझे कुछ दिखाना चाहता था वो स्वीटू ही थी , वो हमारे घर की छत्त पर थी , भाई ने उसके लिए कूलर भी लगा रखा था ताकि उसे गर्मी न लगे , जब मैंने उसे पहली बार अपने हाथ मैं लिया तो मुझे बहुत डर लगा ऐसा लगा की कही मेरे कठोर हाथ उसे चुभ न जाये वो बहुत ही नाजुक थी मखमल की तरह फिर उसे कटोरे मे डालकर दूध पिलाया , फिर उसे वापस ऊपर उसकी माँ के पास रख आये , ममी को पता नही था हम लोग क्या कर रहे हैं , हर रोज हम उसके पास ऊपर जाने लगे और एक दिन ममी को पता चल गया ! डाट खानी पड़ी थी , पता लगा की स्वीटू कही और रहती थी वहा से उसे फेक दिया गया था उसके बाद उसकी माम उसे हमारी छत्त पर रहने के लिए ले छोड दिया

फिर ममी शांत हो गई थी स्वीटू सीढ़ियो से उतर नहीं सकती थी वो अभी बहुत छोटी थी उसके बाद समय बीतता चला गया , अब उसने घर मैं आना शुरु कर दिया था वो सुबह साम घर मैं खाना खाती थी दिन मैं बहार खेलती थी , उसे पता था की मैं शाम को किस समय घर पर आती हु वो दरवाजे पर बठकर मेरा इंतजार करती थी , दीदी उससे बहुत प्यार करती थी लेकिन दूर से ! सबसे जयादा वो मुझे प्यार करती थी और मैं भी उसे बहुत प्यार करती थी ! स्वीटू घर मैं किसी को बरदाश्त नहीं करती थी कोई उससे खेलने की को्शिश करता तो वो अपने पैने नाखुनो से हमला करती थी , मेरे घर पर जाने तक वो बिलकुल शांत रहती थी और मेरे जाने के बाद तो जैसे पूरे घर मैं उसका राज चलता एसे चलती जसे की जंगल मैं शेर चलता हैं  और किसी की सुन्नी नहीं , बस मस्ती करनी ।

वो ३ महीने की हो चुकी थी , बड़ी शरारती और शांत भी वो अपने पंजों को मेरे मुह पर ऐसे फेरती थी जसे माँ अपने बच्चे के सर पर हाथ फेरती हैं , वो मुझे कुछ काम नहीं करने देती थी बस वो मेरे साथ खेलना चाहती थी ! और जब मैं उसके साथ नही खेलती तो वो बहुत गुस्सा होती थी मुझ पर पर मुझे उस पर बिलकुल गुस्सा नहीं आता था बस प्यार आता था ! एक दिन उसने मेरी बहुत ही जरुरी ऑफिस की फाइल को अपने नाखुनो से फाड़ डाला था जिसकी वजह से मुझे बहुत डाट खानी पड़ी थी !

अब वो ५ महीने की हो चुकी थी पहले से थोड़ी समझदार और पहले से थोड़ी शरारती जादा , जब मैं खाना खाने के लिए अपना मुह खोलती तो वो मेरे मुह के सामने अपना मुह खोलती ताकि खाना उसके मुह मैं जाये , उसकी इस अदा पर मुझे बहुत प्यार आता था , वो अपना खाना  नही खाती थी वो मेरा खाना पसंद करती थी मेरे साथ मेरी थाली मे जिस पर ममी को बहुत गुस्सा आता था, पर मुझे नही आता था क्योकि मैं उसे प्यार करती थी , जब मैं उसे देखती तो मेरी सारी थकान दूर हो जाती , एक दिन मैं अपने गमलो मैं सफाई कर रही थी और वो मुझे परेशान कर रही थी मेरे साथ खेलना चाहती थी , मैंने उसे मना किया वो नहीं मान रही थी गमले मैं बैठ गई मैं उसे हटाना चाहा तो वो सीढ़ी से नीचे गिर गई मेरी तो साँस ही जैसे रुक गई थी , मैं दोड़ कर जसे ही नीचे जाने लगी तभी वो फाटक से उठकर मेरे पास आ गई मैंने उसे अपनी गोद मैं लिया और जोर से रोने लगी , और स्वीटू को सॉरी बोला मैंने कि दोबारा ऐसा नहीं होगा ! फिर हम दोनों खेलने लगे और काफी रात तक खेलते रहे , सुबह जब तक उसे खाना नही मिलता वो सब के पीछे -पीछे  घुमती रहती ! और मेरी थाली से तो उसे जरुर ही खाना था चाहे कुछ भी हो उसे वही खाना था जो मैं खाती थी !

 सन्डे मेरी ऑफिस की छुट्टी होती थी तो हम दोनों पूरा दिन सोते-खाते-खेलते थे वो सर्दियों के दिन थे , हम लोग छत पर धूप सेकते थे उसके नाख़ून हाफ से एक इंच लम्बे थे बहुत ही तेज थे , उसकी आंखे इतनी प्यारी थी कि मानों  पूरी दुनिया उनमे समाई हो उसे फ़ूल बहुत पसंद थे वो मेरे गमले में बैठ जाती और अपने सामने वाले हाथो से फ़ूल को पकडती , जेसे वो उसके हाथ नहीं आता तो उसे बहुत गुस्सा आता ! सब का गुस्सा मुझ पर उतारा जाता मेरे सारे पोधे खराब कर दिए जाते थे , मुझे उस पर गुस्सा आता लेकिन उसके सामने आते ही सारा गुस्सा गायब हो जाता था !

और एक दिन वो भी मुझे छोड़ कर चली गयी, क्या बिगाड़ा था उसने किसी का जो वह मर गई वो अभी ८ महीने की थी , डॉ ने बताया के उसे लीवर मैं प्रोब्लम थी जो उसे कई दिनो से थी , कई दिनों से वो ठीक से कुछ खा नही रही थी , मैंने सोचा वो बाहर कुछ गड़बड़ खाती होगी पहले भी अक्सर ऐसा कई बार हुआ जब उसने घर पर खाना नही खाया ! लेकिन इस बार उसकी तबियत ठीक नही थी ,जब मैं शाम को घर जाती तो वो मेरी गोद मैं आकर बैठ जाती ,जैसे की वो मुझसे कहना चाहती के मेरी तबियत ठीक नही हैं ! लेकिन मुझे ही समझ नही आया और मैं उसे उसकी नई शरारत समझ कर खेलती रही, जसे वो उसका बार-बार मेरा मुह ताकना और अपनी पलके झपकना , वो इतनी उदास थी उसे मेरी जरूरत थी और मैं उसकी नन्ही सी जान के साथ खेल रही थी !! मानों वो मुझसे बार-बार कह रही हो की मुझे बचा लो मैं मरना नही चाहती ! लेकिन मैं उसे समझ ना सकी मैं अपने आप को कभी माफ़ नही कर पाउगी. वो इतनी स्वीट थी कि कभी कभी तो मुझे भी डर लगता था के कही उसे कुछ.......  उसे किसी ने मिल्क मैं नशे की कोई दवाई पिला दी थी जिससे उसके लीवर में तकलीफ़ होना शुरु हो गया था ! दो दिन के बाद जब घर से मेरे पास खबर आई के स्वीटू की तबीयत बहुत खराब है और जब मैं घर पहुची तो वो अपनी आखरी सासे गिन रही थी मने उसे अपनी गोद मैं उठाया ! मैंने ५ बजे का इंतजार कर रही थी क्योकि उसे डॉ ने उसी टाइम बुलाया था और उसकी तबियत बिगडती ही जा रही थी , मेने कभी अपने आप को इतना बेबस महसूस नही किया  क्योकि आज स्वीटू को मेरी जरूरत थी और मैं उसके लिए कुछ न कर सकी , उसने एक बार मुझे अपनी प्यारी सी आवाज से पुकारा जैसे कह रही थी कि मैं अब हमेशा के लिए तुमसे दूर जा रही हूं , कभी लौटकर नही आउंगी और वो मेरी गोद में हमेशा के लिए सो गई ! कभी नही उठने के लिए . और मैं एक बार फिर जिन्दा थी क्यों? सच स्वीटू ये दुनिया इतनी गन्दी हैं कि .......? 


 सुरेश बरार (लेखिका गुड़गांव में रहती हैं, ताईकांडों सीखना व सिखाना इनका मनपंसद कार्य है, वन्य जीवों से प्रेम, अभी तक ताईकांड़ों जैसी विशेष कला में तमाम एवार्ड अर्जित कर चुकी हैं, वन्य जीवन के सरंक्षण में कार्य करने वाली कई राष्ट्रीय एंव अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं से जुड़ी हुई हैं, इनसे  brar.suresh@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।)

रेल-पथ फ़िर बना वन्य-जीवों की मौत का कारण !



कतर्नियाघाट वन्य-जीव विहार से होकर गुजरने वाली रेल-लाइन पर पँच हिरनों की मौत:
घने जंगलों के बीच से निकली रेलवे लाइन एक बार फिर वन्यजींवों के लिए कत्लगाह साबित हुई है। २४ अक्टूबर २०१० को मैलानी-गोण्डा रेलमार्ग पर संरक्षित कतर्नियाघाट वन रेन्ज के अन्तर्गत मिहीपुरवा रेलवे स्टेशन के समीप गोकुल एक्सप्रेस से कटकर पाँच हिरनों की मृत्यु हो गई।
यहाँ बता दें कि मैलानी से गोण्डा के लिए रेलमार्ग दुधवा नेशनल पार्क के बीचों-बाच से होकर गुजरा है। रेलगाड़ी की चपेट में आकर पहले भी वन्यजीव मौत का शिकार होते रहे हैं। काफी समय से इस प्रखण्ड के रेलमार्ग को जंगलों से हटाने की माँग वन्यजीव प्रेमी करते रहे हैं। लेकिन अन्य कोई विकल्प न होने के कारण रेलमार्ग को हटाया नही जा सका है।
हाँ वन्य जीवों को इस प्रकार की दुर्घटना से बचाने के लिए पूर्वोत्तर रेलवे प्रशासन और वन विभाग के अधिकारियों के मघ्य दो वर्ष पूर्व इस बात पर सहमति बनी थी कि इस रेलमार्ग पर रेलगाड़ियों की गति काफी कम रखी जायेगी। साथ ही जिन स्थानों से वन्यजीव रेलमार्ग को पार करते हैं, वहाँ पर विशेष सतर्कता बरती जायेगी। लेकिन फिर भी वन्यजीवों को कोई सुरक्षा नही मिल पाई है और रेलगाड़ियों की गति भी कम नही की गई है। क्योंकि मैलानी से बहराइच तक 195 किमी0 का रेलमार्ग जंगलों के बीच से गुजरा है।
उपरोक्त घटना के बावत वन विभाग (बहराइच) ने टेªन चालक और गार्ड के विरूद्व मुकदमा दर्ज किया हैं

सुनील निगम*

Oct 23, 2010

यह किस्सा है मेलघाट में पुनर्वास का !

शिरीष खरे * मेलघाट टाइगर रिर्जव एरिया से लौटकर

फ़ोटो साभार: पलाशविश्वासलाइव डॉट ब्लागस्पाट डॉट कॉम
1974 इस साल ज्यों ही टाइगर रिजर्व बना कोरकू जनजाति का जीवन दो टुकड़ों में बट गया. पहला विस्थापन और दूसरा पुनर्वास. ऊंट के आकार में उठ आये विस्थापन के सामने पुनर्वास जीरे से भी कम था. पुराने घाव भरने की बजाय एक के बाद एक प्रहारों ने जैसे पूरी जमात को ही काट डाला. अब इसी कड़ी में 27 गांव के 16 हजार लोगों को निकालने का फरमान जारी हुआ है. अफसर कहते हैं बेफिक्र रहिए, कागज में जैसा पुनर्वास लिखा है, ठीक वैसा मिलेगा. जबाव में लोग पुनर्वास के कागजी किस्से सुनाते हैं. और आने वाले कल की फिक्र में डूब जाते हैं.

10 तक का पहाड़ा न आने के बावजूद 1974 यहां के बड़े-बूढ़ों की जुबान पर रखा रहता है. 1974 को `वन्य जीव संरक्षण कानून´ बना और `मेलघाट टाइगर रिजर्व´ वजूद में आया. कुल भू-भाग का 73 फीसदी हिस्सा कई तरह की जंगली पहाड़ियों से भरा है. बाकी जिस 27 फीसदी जमीन पर खेती की जाती है वह भी बारिश के भरोसे है. इस तरह आजीविका का मुख्य साधन खेती नहीं बल्कि जंगल ही है. इस 1677.93 वर्ग किलोमीटर इलाके को तीन हिस्सों में बांटा गया है- (पहला) 361.28 वर्ग किलोमीटर में फैला गुगामल नेशनल पार्क, (दूसरा) 768.28 वर्ग किलोमीटर में फैला बफर एरिया और (तीसरा) 1597.23 वर्ग किलोमीटर में फैला मल्टीपल यूजेज एरिया. तब के दस्तावेजों के मुताबिक सरकार ने माना था कि इससे कुल 62 गांव प्रभावित होंगे.

विराट गांव के ठाकुजी खड़के बताते हैं ``परियोजना को लेकर हम लोगों से कभी कोई जिक्र नहीं किया गया. 1974 में तब की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और प्रदेश के वनमंत्री रामू पटेल अपने काफिले के साथ यहां आए और कोलखास रेस्टहाउस में ठहर गए. उस वक्त रामू पटेल ने आसपास के खास लोगों को बुलाकर इतना भर कहा था कि सरकार शेरों को बचाना चाहती है, इसलिए यहां शेर के चमड़ा बराबर जगह दे दो.´´ मगर यह चमड़ा चौड़ा होते-होते अब पूरे मेलघाट को ही ढ़कने लगा है. कभी संरक्षण तो कभी विकास के नाम पर यहां जनजातियों का ही विनाश जारी है. देखा जाए तो ऐसी योजना में न तो लोगों को शामिल किया जाता है और न ही खुली नीति को अपनाया जाता है. इसलिए व्यवस्था में घुल-मिल गई कई खामियां अब पकड़ से दूर होती जा रही हैं. सरकार हल ढ़ूढ़ने की बजाय हमेशा नई उलझनों में डाल देती है.

इस दिशा में पहला काम 1974 को बाघों की संख्या खोजने के लिए सर्वे से शुरू हुआ. 6 सालों तक तमाम कागजी कार्यवाहियों का दौर चलता रहा जिसमें सारी औपचारिकताएं पूरी कर ली गई. 1980 से `वन्य जीव संरक्षण कानून´ व्यवहारिक अगड़ाईयां लेने लगा. पसतलई गांव के तुकाराम सनवारे कहते हैं ``जब बाबू लोग फाइलों को लेकर इधर-उधर टहलते तब हमने नहीं जाना था कि वह एक दिन जंगलों को इस तरह बांट देंगे. वह जीपों में सवार होकर आते और हर बस्ती की हदबंधी करके चले जाते. साथ ही हमसे खेती के लिए जमीन देने की बातें कहते. हमें अचरज होता कि जो जमीन हमारी ही है उसे क्या लेना. उनकी यह कागजी लिखा-पढ़ी 6 महीने से ज्यादा नहीं चली.´´ सेतुकर डांडेकर ने बताया- इतने कम वक्त में उन्होंने कई परिवारों को खेती के लिए पट्टे बांट देने की बात कर डाली. लेकिन उस वक्त कई परिवार पंजीयन से छूट गए. ऐसा लोगों के पलायन करने और सर्वे में गड़बड़ियों के चलते हुआ. इस तरह उन्होंने हमारी बहुत सारी जमीन को अपनी बताया. हमने भी जमीनों को छोड़ दिया. वन-विभाग ने ऐसी जमीनों पर पेड़ लगाकर उन्हें अपने कब्जे में ले लिया. हमारी सुनवाई एक बार भी नहीं हुई.´´ इस तरह किसानों की एक बड़ी आबादी को मजदूरों में बदल डाला. रोजगार गांरटी योजना के तहत अब तक 45780 मजदूरों के नाम जोड़े जा चुके हैं.

1980 के खत्म होते ही जंगल और आदिवासी के आपसी रिश्तों पर होने वाला असर साफ-साफ दिखने लगा. एक-एक करके उन्हें जंगली चीजों के इस्तेमाल से पूरी तरह बेदखल कर दिया गया. उन्हें भी लगने लगा जंगल हमारा नहीं, पराया है. इस पराएपन के एहसास के बीच उन पर जंगल खाली करने का दबाव डाला गया. `मेलघाट टाइगर रिजर्व´ से सबसे पहले तीन गांव कोहा, कुण्ड और बोरी के 1200 घरों को विस्थापित होना पड़ा था. पुनर्वास के तौर पर उन्हें यहां से करीब 120 किलोमीटर दूर अकोला जिले के अकोठ तहसील भेज दिया गया. कुण्ड पुनर्वास स्थल में मानु डाण्डेकर ने बताया कि- ``सर्वे में तब जो गड़बड़ियां हुई थी उन्हें हम अब भुगत रहे हैं. जैसे 6 परिवारों को यहां आकर मालूम चला कि उन्हें खेती के लिए दी गई जमीन तो तालाब के नीचे पड़ती है. अब आप ही बताए पानी में कौन-सी फसल उगाए? जो जानवर हमारी गुजर-बसर का आसरा हुआ करते थे इधर आते ही उन्हें बेचना पड़ा. क्योंकि चराने के लिए यहां जमीन नहीं थी इसलिए सड़क के किनारे-किनारे चराते. इस पर आसपास के लोग झगड़ा करते और कहते कि हमारे जानवर कहां चरेंगे ? हम आदमी के मरने पर उसे जमीन के नीचे दफनाते हैं. लेकिन यहां कहां दफनाए ?´´

 पुनर्वास-नीति के कागजों में दर्ज हर सुंदर कल्पना यहां आकर दम तोड़ देती है. इन पुनर्वास की जगहों पर दौरा करने के बाद मूलभूत सुविधाओं का अकाल नजर आया. तीनों गांवों के बीचोबीच जो स्कूल खोला गया उसकी दूरी हर गांव से 2 किलोमीटर दूर पड़ती हैं. इस तरह गांव की बसाहट एक-दूसरे से बहुत दूर-दूर हो गई है. आंगनबाड़ी यहां से 5 किलोमीटर दूर अस्तापुर में हैं. प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र के लिए 10 किलामीटर दूर रूईखेड़ा जाना होता है. इन्हें जिन इलाकों में जगह मिली है वह आदिवासी आरक्षित क्षेत्र से बाहर है इसलिए यह सरकार की विशेष सुविधाओं से भी बाहर हो गए हैं. जैसे पहले इन्हें राशन की दुकान पर अन्तोदय योजना से 3 रूपए किलो में 15 किलो चावल और 2 रूपए किलो में 20 किलो गेहूं मिल जाता था. वह अब नहीं मिलता. और तो और यहां बीपीएल में केवल 3 परिवारों के नाम ही जुड़ सके हैं. लगता है बाकी के हजारों परिवार इस सूची से भी विस्थापित हो गए हैं. 2002 में शासन ने बिजली, पानी और निकास के इंतजाम का वादा किया गया था. बीते 6 सालों में यह वादा एक सपने में तब्दील हो गया.

यहां से 4 किलोमीटर दूर कुण्ड गांव से विस्थापित नत्थू बेलसरे की सुनिए- ``6 साल पहले खेती के लिए मिली जमीन कागज पर तो दिखती है मगर यहां ढ़ूढ़ने पर भी नहीं मिलती. इसके लिए अमरावती से लेकर नागपुर तक कई कार्यालयों के चक्कर लगाए लेकिन जमीन का कोई अता-पता नहीं. इस पर बाबू लोग हैरान और हम परेशान हैं.´´ यहां से 4 किलोमीटर दूर कोहा पुनर्वास स्थल में हरिजंड बेलसरे और हीरा मावस्कर ने खेती के लिए जमीन नहीं मिलने की बात बताई. कुण्ड पुनर्वास स्थल पर तो 11 परिवारों को घर के लिए न तो पैसा मिला और न ही जमीन. लोगों ने कहा कि वह आज भी इधर-उधर गुजर-बसर कर रहे हैं. लेकिन कहां हैं, यह कोई नहीं जानता.
बोरी पुनर्वास स्थल में सुखदेव एवले ने बताया कि- ``हमारी पुश्तैनी बस्तियों को हटाए जाने के पहले इसकी कोई कागजी खबर और तारीख देना भी मुनासिब नहीं समझा गया। अफसर आते और कह जाते बस अब इतने दिन और बचे, फिर तुम्हें जाना होगा। उनका बस्ती हटाने का तरीका भी अजीब है. जिस बस्ती के इर्द-गिर्द 8-15 दिन पहले से ट्रक के ट्रक घूमने लगे, समझो घर-गृहस्थी बांधने का समय आ गया. कर्मचारियों के झुण्ड के झुण्ड चाय-पान की दुकानों पर जमा होकर तोड़ने-फोड़ने की बातें करते हैं. कहते हैं दिल्ली से चला आर्डर तीर की तरह होता है, आज तक वापिस नहीं लौटा. अगर समय रहते हट गए तो कुछ मिल भी जाएगा. नहीं तो घर की एक लकड़ी ले जाना मुश्किल हो जाएगा. ऐसी बातों से घबराकर जब कुछ लोग अपने घर की लकड़ियां और घपड़े उतारने लगते हैं तो वह बस्ती को तुड़वाने में हमारी मदद करते हैं. हमारे लड़को को शाबाशी देते हैं. देखते ही देखते पूरी बस्ती के घर टूट जाते हैं.´´

इसी तरह वैराट, पसतलई और चुरनी जैसे गांवों के घर भी टूटने वाले हैं. पुनर्वास के लिए शासन को 1 करोड़ 9 लाख रूपए दिये गए हैं. अधिकारियों को यह रकम बहुत कम लगी इसलिए उन्होंने और 2 करोड़ रूपए की मांग की है. ऐसे अधिकारी जंगल और जमीन के बदले नकद मुआवजों पर जोर देते हैं. जानकारों की राय में नकद मुआवजा बांटने से भष्ट्राचार की आशंकाएं पनपती हैं. जैसे सरदार सरोवर डूब प्रभावितों को नकद मुआवजा बांटने की आड़ में भष्ट्राचार का बांध खड़ा हो गया. जिसमें अब कई अधिकारी और दलालों के नाम उजागर हो रहे हैं. यहां भी कोरकू जनजाति का रिश्ता जिन कुदरती चीजों से जुड़ा है उसे रूपए-पैसों में तौला जा रहा हैं. लेकिन जनजातियों को रूपए-पैसों के इस्तेमाल की आदत नहीं होती. इसके पहले भी विस्थापित हुए लोगों के पास न तो जंगल ही रहा और न ही नकद. आखिरी में उसकी पीठ पर बस मुसीबतों का पहाड़ रह जाता है. वैराट गांव की मनकी सनवारे कहती है-``यहां से गए लोगों की हालत देखकर हम अपना जंगल नहीं छोड़ना चाहते. सरकार के लोग बस निकलने की बात करते हैं लेकिन अगले ठिकानों के बारे में कोई नहीं बोलता.´´

शासन के पास दर्जनों गांवों को विस्थापित करने के बाद उन्हें एक जगह बसाने की व्यवस्था नहीं हैं. जिस अनुपात में विस्थापन हो रहा है उसी अनुपात में राहत मुहैया कराना बेहद मुश्किल होगा. पुराने तजुर्बों से भी ऐसा जाहिर होता है इसलिए अब और विस्थापन सहन नहीं होगा. उनके साथ वैराट, पसतलई और चुरनी गांवों से तुकाराम सनवारे, तेजुजी सनवारे, फकीरजी हेकड़े, किशनजी हेकड़े, शांता सनवारे, सुले खड़के, फुलाबाई खड़के और गोदाबाई सनवारे जैसी हजारो आवाजों ने विस्थापन के विरोध में एक आवाज बुलंद की है. क्या उनकी यह गूंज जंगल से बाहर भी सुनी जाएगी ?

हाल ही में इस डिवीजन के वनाधिकारी रवीन्द्र बानखेड़े ने सरकार को टाइगर रिजर्व की सीमा 444.14 वर्ग किलोमीटर बढ़ाने के लिए प्रस्ताव भेजा है. जब तक यह रिर्पोट प्रकाशित होगी तब तक हो सकता है उसे मंजूरी मिल जाए. फिलहाल एक और विस्थापन की इबारत लिखकर भेजी जा चुकी है. इसका मतलब दर्जनों गांवों के हजारों लोगों को उनकी दुनिया से बेदखल कर दिया जाएगा. इंसान और जानवर सालों से साथ रहते आये हैं इस सरकारी संरक्षण (उत्पीड़न) के बाद जानवर और इंसान सालों तक नहीं समझ पायेंगे कि उनके साथ क्या किया गया और क्यों?

शिरीष खरे (लेखक बच्चों के लिए दुनिया भर में कार्य करने वाली संस्था  CRY से जुड़े हुए हैं। स्वतन्त्र लेखन, बाल-अधिकार की लड़ाई में अहम किरदार, आनन्द स्टेट मुम्बई में निवास, लेखक के ब्लॉग पर आप भारत के विभिन्न राज्यों के समसामयिक मसलों की बेहतरीन झलकियां देख सकते हैं। इनसे shirish2410@gmail.com पर सम्पर्क कर सकते हैं। )
 

Oct 17, 2010

एक और खूबसूरत बाघ को आजीवन कारावास !

सुनील निगम (मैलानी) १५ अक्टूबर २०१०, पीलीभीत की दियूरियाँ रेन्ज से निकलकर आदमखोर बने बाघ को अन्ततः फरूखाबाद जिले की रेंज में बेहोश करके पकड़ लिया गया है। आपको  याद होगा कि कई मानव शिकार करने वाले इस बाघ को पिछले तीन माह से ट्रैंकुलाइज करने के लिये वन-विभाग व वाइल्ड लाइफ़ ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया द्वारा अभियान चलाया जा रहा था। लेकिन यह बाघ शाहजहाँपुर के अलावा खीरी, हरदोई होते हुए फरूखाबाद जिले में दो दिन पूर्व प्रवेश कर गया था।

इससे पूर्व आदमखोर घोषित इस बाघ ने एक माह पूर्व शाहजहाँपुर की खुटार रेन्ज में प्रवास के दौरान अपने मूल हैबिटेट में वापस जाने की तमाम कोशिशे  तो की लेकिन मानवीय हस्तक्षेप और बारिश के कारण अपना मार्ग भूल जाने के कारण वापस नही जा पाया था।

पकड़े जाने के बाद इस बाघ को हमेशा-हमेशा के लिए लखनऊ स्थित चिड़ियाघर में बतौर नुमाइश डाल दिया गया है।

इस आदमखोर बाघ को पकड़ने के लिए तीन माह से अभियान चला रहे शाहजहाँपुर के प्रभागीय वनाधिकारी पी.पी. सिंह समेत वाइल्ड ट्रस्ट आफ इंडिया के सदस्यों ने राहत की साँस ली है, वहीं एक तीन वर्षीय बाघ को कैदी बनाने की मजबूरी की कसक उनके दिल में हमेशा- हमेशा के लिए रहेगी।


Oct 12, 2010

क्या गौ अब भी हमारी माता है ?

अरूणेश सी दवे* "बदलते परिवेश में जंगल व पशुधन के अन्तर्सबंध में एक विमर्श:"

गायें  भारतीयों के लिये सदैव ही पूज्यनीय रही है, सदियों से हमारी संस्कृति और जीविका  को इनका ही सहारा रहा है । पुरातन गाथाओं में सदैव ये श्र्द्धेय और पूज्यनीय मानी जाती थी और हो भी क्यो ना भोजन स्त्रोत हो आवागमन का साधन या खेती एक भारतीय के लिये इनके बिना जीना असंभव था । और सबसे बड़ा कारण यह भी है कि हम गायों के दूध को मात्रत्व से जोड़कर देखते है और उन्हे माता का दर्जा देते है ।

लेकिन हाल के वर्षों में स्थिति में काफ़ी परिवर्तन आया है भारत में पशु चिकित्सा में हुई उल्लेखनीय प्रगति से हमारे देश में गायों की संख्या बेहद तेजी से बढ़ी है । एक अनुमान के मुताबिक भारत में अब करीब २० करोड़ गायें हैं , और इनकी संख्या में लगातार बढ़ोतरी  हो रही है । वही दूसरी ओर जनसंख्या में हुई बेतहाशा बढ़ोतरी के कारण चारागाहों की भूमि खेतों में बदल दी गयी है, और केवल बंजर भूमि ही चारागाहों के लिए बची है । ऐसे में अत्यधिक चराई के कारण घास की अच्छी किस्में तेजी से विलुप्त होति जा रही है, और जिन जगहों पर वनक्षेत्र बचे हुए है, उन पर चराई के अत्यधिक दबाव के कारण उनकी जैव विविधता को गंभीर संकट खड़ा हो गया है । इसके अलावा गायों का खेती और आवागमन के साधन के रूप मे  प्रयोग पहले की तुलना में अब नगण्य रह गया है इस कारण गायो की अब बड़ी आबादी अब अनुपयोगी हो गयी है ।
इसके अलावा अब आवारा पशुओ की संख्या भी तेजी से बढ़ी है हाल ही मे जब नर्मदा बांध के एवज में बनाये गये एक अभ्यारण्य से गावों को जब विस्थापित किया गया तो गावंवालो ने अपने आधे से अधिक पशुओ को वही छोड़ दिया कारण स्पष्ट था कि वे उनके लिये अनुपयोगी थे । उदन्ती सीतानदी नेशनल पार्क मे दर्जनों भैसे जिन्हे उनके मालिको ने आवारा छोड़ दिया था, अब वे जंगली भैसो से संसर्ग कर फ़ेरल भैसो में परिवर्तित हो गयी है,  और अब वे जंगल मे ही निवास कर रही है

आज भारत मे प्रति वर्ष आवारा पशुओं के कारण होने वाली दुर्घटनाओं को यदि छोड़ भी दिया जाय, तो भी यह बात सपष्ट है, कि आवारा पशुओं के कारण या अनियंत्रित पशुओं के कारण भारत की पुनःवनीकरण नीति भी इसी बात पर निर्भर है, कि कौन से पौधे गाये नही खाती है, क्योंकि नीति नियंताओ को मालूम है, कि जिन पौधों को गाये खाती है, उनका बचना असंभव है ऐसे में जो भी पौधारोपण कार्यक्रम चलाए जाते है, उनमें केवल सागौन गुलमोहर रतनजोत नीलगिरी इत्यादी पौधे लगाए जाते है, इनसे न केवल गाय बल्कि इंसानों को भी खाने के लिये कुछ नही मिलता है, अतः दैवयोग से ये बच भी जाय तो ग्रामीण इन्हे जलाऊ लकड़ी के लिये काट देते है ।

 वैसे तो भारत मे किसी भी पौधे का बचना संभव नही है, क्योकि उसके लिये इच्छाशक्ति ना नागरिकों में है, और ना  नेताओं में और आज सवाल यह नही है कि वन लगाना क्यो है और कहा है बल्कि यह है कि इस नाम से खेल कितना हो सकता है  कौन कितना पैसा बना सकता है । आज कल एक नया खेल चालू हो गया है गिनीस बुक आफ़ वर्ल्ड रिकार्ड मे नाम दर्ज कराने का एक दिन मे एक करोड़ पौधे या इससे भी अधिक । और काम भी आसान है अद्रुश्य पौधो का रोपण ऐसे पौधे जो गायो को नजर ही ना आये ये बात ठीक है कि ये पौधे आम जनता को भी नजर नही आते पर हमारे कर्मठ शासकीय अधिकारी देश हित मे ऐसे पौधो के रोपण मे महारत हासिल कर चुके है । और ये आम जनता और गायो के हितो को ध्यान मे रखते हुए कुछ दिखने वाले वाले पौधो का रोपण भी नेताओ और बड़े अधिकारियो के हाथ से करवा देते है ।

खैर बात मुख्य तो अभी यह है कि  भूमी के घास विहीन हो जाने के कारण भूक्षरण की मात्रा भी अत्यधिक बढ़ गयी है स्वच्छ जलधाराऒं का जल अब मटमैला हो गया है और बाधॊ मे तलछ्ट की मात्रा भी अब गंभीर स्तर पर पहुच चुकी है ।

 सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है, कि वनों और खासकर फ़ल और फ़ूलदार पेड़ों की स्वत: पुर्नुत्पादन प्रणाली अब ध्वस्त हो चुकी है । चूंकि इनमें से  अधिकांश के पत्ते गाय खाती है, अत: इनके नवीन पौधे पनप नही पा रहे है । वैसे भी इनके अधिकांश बीजों की जीवन लीला महानगरों के कचरा भंडार में जाकर खत्म हो जाती है । चूंकि ऐसे पेड़ों की लकड़ी का इमारती उपयोग नही होता, अत: सरकार इनका रोपण नही करती ।


इन सब बातों का सार एक ही है, कि अब हमको पालतू पशुओं की बेलगाम रूप से बढ़ती आबादी पर नियंत्रण लाना ही होगा और इस देश मे इस काम को करना तो दूर बल्कि इस पर चर्चा करना भी गुनाह है। ऐसे किसी भी प्रयास के सामने धर्म ध्वजा लहराती हुई सेनाए खड़ी हो जायेंगी कई पाठकों के मन में अहिंसा पर भी सवाल पैदा होगा पर तेजी से खत्म होते जा रहे पर्यावास के कारण जिन हजारों प्रकार के पक्षियों वन्यप्राणियों और वनस्पतियों का अस्तित्व ही गंभीर संकट मे आ गया है, क्या वे हिंसा का शिकार नही हो रहे है । क्या किसी जीव का वंश समूल नष्ट होना किसी जीव की आबादी नियंत्रित करने से बड़ी हिंसा नही है ।

सवा अरब की आबादी वाला देश क्या पर्यावरण से छेड़छाड़ की कीमत चुका सकता है ।


 अरूणेश सी दवे (लेखक छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में रहते है, पेशे से प्लाईवुड व्यवसायी है, प्लाई वुड टेक्नालोजी में इंडियन रिसर्च इंस्टीट्यूट से डिप्लोमा।वन्य् जीवों व जंगलों से लगाव है, स्वतंत्रता सेनानी परिवार से ताल्लुक, मूलत: गाँधी और जिन्ना की सरजमीं से संबध रखते हैं। सामाजिक सरोकार के प्रति सजगता,  इनसे aruneshd3@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।) 

Oct 11, 2010

बाढ़ में जानवर हुए बेहाल

देवेन्द्र प्रकाश मिश्र* बाढ़ ने चौपट किया पशुपालन कारोबार

 उत्तर प्रदेश की उफनाई नदियों ने अपनी बाढ़ के कहर का आतंक उन जिलों में फैलाया जहां के लोग पानी की विनाशलीला को टीवी पर देखते थे या फिर अखबारों में पढ़ते थे। इस साल पूरे देश में जहां जीवनदायनी कही जाने वाली नदियों के पानी ने भारी तबाही मचाकर नया इतिहास रच दिया है। वहीं यूपी में तीन दर्जन जिलों के छह हजार के उपर गांवों में निवास करने वाली लगभग चार लाख की आबादी विभिन्न नदियों की बाढ़ से बुरी तरह से प्रभावित हुई है। तथा चार सौ पचास लोगों की मौत भी हो चुकी है। जबकि अभी भी सूबे के पश्चिमी जिलों में जल ही जीवन कहे जाने वाले पानी का आतंक कायम है। इससे अन्नदाता कहे जाने वाला गांव का किसान बाढ़ की त्रासदी से बर्वादी की कगार पर पहुंच गया है।

Photo Courtesy: Louis Copt (www.kgs.ku.edu)
नदियों में उफान आने के कारण ग्रामीणांचल में रहने वाले किसानों की अर्थव्यवस्था को दुरूस्त रखने का एकमात्र साधन कृषि उपज पूरी तरह बाढ़ की भेंट तो चढ़ ही गयी है उपर से पशुपालन कारोबार भी पूरी तरह चौपट हुआ है। बाढ़ से न जाने कितने निरीह पालतू पशु असमय काल के गाल में समा गये क्योंकि मानव ने तो अपने बचाव के प्रयास कर लिये किन्तु दरवाजे पर बंधे पालतू पशुओं को कहां ले जाये। इस कारण से भीषण बाढ़ की बिनाशलीला ने कृषि के साथ ही पशुपालन के जरिए किसानों को आर्थिक सहारा प्रदान करने वाले दूध के कारोबार को भी भारी नुकसान पहुंचाया है। एकदम से नदियों की बाढ़ का पानी बढ़ने से ग्रामीण परिवार के साथ पलायन कर ऊंचे स्थान पर पहुंच गये। जहां तक सम्भव हो सका तो पालतू पशुओं की उचित व्यवस्था भी अवश्य की। किन्तु पशुपालकों के सामने सबसे कठिन समस्या आड़े आई कि पशुओं को ले कहां जाया जाए? पशुओं को न तो छत पर ही नहीं चढ़ाया जा सकता था और न ही इतना समय था कि उनको सुरक्षित जगहों तक पहुंचाया जा सके। बाढ़ की आपाधापी में पशुओं का चारा यानी भूसा आदि को सुरक्षित रखने का समय भी पशुपालकों को नहीं मिला। इस कारण से घरों और झोपड़ियों में रखा गया भूसा आदि भी बाढ़ के पानी से भीग चुका है।

उफनाई नदियों के पानी से भयभीत ग्रामीणजन अपनी जान बचाने की मुसीबत में कई-कई दिनों तक घरों की छतों पर  फंसे रहे, तो पशुओं को दाना-पानी कौन दे? इस कारण सैंकड़ों मवेशी कई दिनों तक भंूखे-प्यासे तब तक खूंटे पर बंधे रहे जब तक बाढ़ की भयावह दशा नहीं हुई। लेकिन पानी का आतंक जैसे ही बिकराल स्थिति में पहुंचा तो सैंकड़ों पालतू पशु अपनी जीवन रक्षा में खूंटे तोड़कर इधर-उधर भाग गए। जिसमें से सैकड़ों भैंसें एवं गायें जो अपने को बाढ़ से नहीं बचा पाये वह नदियों की तेज धार में बहकर न जाने कहां चले गए, और इसमें से भी तमाम पालतू पशु असमय काल के गाल में समा गए। बाढ़ के प्रकोप और भूख से लड़कर जो पालतू पशु जीत भी गये हैं, अब उनके सामने चारा की समस्या मुंह फैलाये खड़ी है। क्योंकि ग्रामीणांचल के क्षेत्रों में कहीं भी पशुओं के लिए चारा नहीं बचा है और न ही उनके चरने के लिए उचित स्थान ही रह गया है। बाढ़ की भीषण त्रासदी झेल रहे किसानों की आर्थिक स्थिति भी इतनी कमजोर हो चुकी है जिसमें उनके लिए अपना पेट भरना ही दुरूह कार्य बन गया है। ऐसे में पशुओं को बाजार से खरीदकर चारा खिला सके यह बात वह सपने में भी नहीं सोंच सकते हैं। इससे भी अलग हटकर देखा जाये तो जहां कहीं भी कुछ उंची जगहों पर घास आदि का चारा बचा भी है तो वह बाढ़ के पानी के साथ आई गंदगी, मिट्टी व अन्य विषैले पदार्थों से विषैला होकर पशुओं के खाने योग्य नहीं रह गया है।

बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों में पशुओं के चारे की विकट समस्या उत्पन्न होने से पशुपालकों के समक्ष गंभीर चुनौती उत्पन्न हो गयी है। क्योंकि भूंखे-प्यासे व्यक्ति को तो इंसानियत के नाते पास-पड़ोसी एवं भाई-बंद भी सहारा दे देते हैं, किन्तु पशुओं का पेट भरने के लिए चारा कोई नहीं देता है। इस विषम स्थिति में पशुपालकों की मजबूरी के कारण उनका पशुधन भूख से बेवश होकर बाढ़ खत्म होने के बाद भी दम तोड़ने पर मजबूर हो रहा है। दूसरी तरफ बाढ़ घटने के बाद पशुओं में प्रदूषित पानी से विषाणु जनित तमाम प्रकार की संक्रामक बीमारियां भी तेजी से पांव पसारने लगी हैं। जिनका उपचार कराना भी पशु-स्वामियों के समक्ष एक विकट चुनौती भरा कार्य बन गया है। पशुओं की दवाई तो ऐन-केन-प्रकारेण करवा ही ली जायेगी। किन्तु केवल दवा से पशुओं का पेट भरने वाला नहीं है। पशुओं का पेट भरने के लिये आवश्यक तो है चारा। जिसके अभाव में आगे भी न जाने कितने पालतू पशु अकाल मौत का शिकार बन जाएगें। जिससे सैकड़ों किसान अपने प्रमुख पशुधन से विहीन हो जाएगें। इस तरह उनके दूध का कारोबार करने वाले किसानों का एक यह भी कमाई का जरिया समाप्त हो जाएगा। किसानों की आर्थिक स्थिति को कृषि उपज व पशुपालन कारोबार मजबूती प्रदान करता है साथ ही ग्रामीणांचल के यह दोनों व्यवसाय भारतीय अर्थव्यवस्था की उन्नति में महत्वपूर्ण योगदान भी रखते हैं। लेकिन इस साल की भीषण बाढ़ द्वारा मचाई गई बर्वादी और विनाशलीला के कहर ने कृषि उपजों के साथ पशुपालन कारोबार को लगभग पूरी तरह से तबाही की कगार पर खड़ा कर दिया है। इसका निकट भविष्य में दुष्प्रभाव यह भी पड़ेगा कि पशुपालन में कमी आने के कारण दूध उत्पादन के भी प्रभावित होने की संभावनाएं बढ़ गई हैं। जिसके कारण खासकर शहरवासियों को दूध की भारी किल्लत का सामना करना पड़ेगा। जबकि दूध की कमी और उसकी बढ़ती मांग का फायदा उठाने के लिए सिनथेटिक दूध का अवैध कारोबार करने वाले लोग भी सक्रिय हो जाएगें। इनसे निपटने के लिए समय रहते शासन-प्रशासन द्वारा मुकम्मल व्यवस्थाएं न की गई तो मानव का जीवन भी खतरे में पड़ सकता है।

देवेन्द्र प्रकाश मिश्र (लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं टिप्पणीकार है, लखीमपुर खीरी जनपद के पलिया कस्बे में निवास, वन्य जीवन पर लेखन व उनके सरंक्षण में प्रयासरत हैं। इनसे dpmishra7@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता हैं।)




Oct 9, 2010

तराई की नदियों में डॉल्फ़िन

भास्कर मणि दीक्षित* Ganges River Dolphins (Platanista gangetica) (सोस/सूस)
तराई की नदियों में डॉल्फ़िन:
इस सुन्दर जीव का किया जा रहा है शिकार:
खतरे में हैं डॉल्फ़िन- नदियों में बहाया जा रहा है, खुलेआम औद्योगिक कचरा
शारदा और घाघरा नदियों में बहुतायात में हैं गैन्गेटिक डॉल्फ़िन

Photo courtesy: arkive.com © Toby Sinclair
किसी भी नदी में डॉल्फिन का होना उसकी स्वस्थ्य ईको सिस्टम को दर्शाता है। क्योकि नदी की डाल्फिन उस नदी के खाद्य श्रखंला के सबसे ऊपर की कड़ी होने के कारण बेहतर जैव-विविधता को दर्शाती है। गैन्गेटिक डाल्फ़िन उन चार फ़्रेसवाटर डाल्फ़िन में से एक है, जो पूरी दुनिया में पाई जाती है। हमारे देश में ये गंगा और ब्रह्मपुत्र और उनसे जुड़ी नदियों में पायी जाती है। सन 2000-2001 में विश्व प्रकृति निधि (WWF) के एक सर्वे के अनुसार पूरे भारत वर्ष में करीब 2000 गैन्गेटिक डॉल्फ़िन थीं, जिनमे से गंगा नदी में 35, यमुना में 47, चम्बल में 78, कोशी (नेपाल) में 87 औरैर घाघरा नदी में 295 थीं।

गैन्गेटिक डॉल्फ़िन 5 से 8 फीट तक लम्बी होती है, और उसका वजन करीब 90 से 100 किलो तक होता है। इसका मुँह लम्बा होता है, पंख(डैने) बड़े और इनका शरीर कंधे और सीने से चौड़ा होता है। इनके लम्बें और पतलें मुँह के ऊपर और नीचे दोनो जबड़ो में 28.28 तीखे और घुमावदार दाँत होते है। इन्हे हर 30 से 50 सेकेन्डस मे साँस लेने के लिये पानी में ऊपर आना पड़ता है। स्तनपाई जीव होने के कारण ये अन्डे न दे कर सीधे बच्चे ही देते है। मनुष्य की तरह ही 9 महीने पूरे होने पर ही इनके बच्चे जन्म लेते है। जन्म के समय ये बच्चे करीब 65 सेमी0 के होते है। ये अपने बच्चे को अपना ही दूध पिलाती हैं और इनका स्तन इनके मलद्वार के करीब ही होता है।

ये करीब 6 से 7 वर्ष मे व्यस्क हो जाते है और करीब 35 वर्ष की आयु तक जीवित रहते है। ये लगभग अन्धे होते है और अपनी इन्ही कमजोर आँखों की रोशनी के कारण ये समुद्री डाल्फिन की तरह से प्रशिक्षित नही किये जा सकते हैं इसलिये बहुत समय तक इन्हें किसी तालाब में नही रखा जा सकता अगर रखे गये तो ये मर जायेंगें। आखों की रोशनी न होने की वजह से इन्होने अपने सुनने की क्षमता को बहुत बढ़ा लिया है जिससे ये सुन कर शिकार करती हैं और इन्ही घ्वनि से पूरे नदी में घूमती भी है। ये 2,00,000 Hz अल्ट्रा सोनिक आवाज़ निकाल और सुन सकती है जब कि मनुष्य के सुनने की कुल क्षमता केवल 18,000 Hz ही है।

ये काफी अच्छे तैराक होने के साथ साथ काफी फुर्तीले भी होते है, जिससे अपने सुनने की क्षमता से और अपने पूँछ और डैने की मदद से मैले और धुधले पानी में आसानी से तैर लेते है। गैन्गेटिक डॉल्फ़िन पूरे भारत में सभी नदियों में पाई जाती है। इनको गहरे पानी में रहना ज्यादा पसन्द है, लेकिन बाँढ के दिनों में ये बाँढ के पानी के साथ नदी की गहराई से बाहर आ जाती हैं। इनको 8 से 33 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान वाले पानी में रहना पसन्द है।

इनका मुख्य भोजन मछलियों के साथ साथ मेंढक, कछुवें और जलीय पक्षियों के बच्चें आदि है लेकिन अपने लम्बे मुँह और डैनों की मदद से ये नदी के अन्दर की मिट्टी को खोद कर उसमें से भी अपने लिये भोजन ढूढ लेती है।

पहले तो ये काफी बड़ी समूहों मे दिखाई पड़ती थी लेकिन अब तो 1 से 3 के समूह में भी दिखती है। ये ज्यादातर दो नदियों के मिलान पर, मनुष्यों की आबादी के निकट के नदियों में या फिर नदी के शान्त और धीमी बहाव वाले स्थान में दिखती है।
इस समय Ganges River Dolphins बहुत बड़े संकट में है। इनकी संख्या में प्रति वर्ष 10% की दर से गिरावट हो रही है। माँस और तेल के लिये इनका शिकार होता है। केवल गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों में ही इनका प्रति वर्ष 100 की संख्या में शिकार हो रहा है।

इनकी संख्या में निरन्तर गिरावट का सबसे मुख्य कारण वन्य जीव संरक्षण के कार्य में लगे लोगों का इनके प्रति उदासीनता ही है। इसके अलावा नदी में जगह जगह बाँधों का बनना, इनके रहने के स्थान की कमी होना, नदियों के पास रहने वाले लोगों का इनके संरक्षण में सहयोग न देना है। आम लोगो में संरक्षण के प्रति जागरूकता की कमी के कारण ही इनको संकटग्रस्त जानवरों की श्रेणी में ला कर खड़ा कर दिया है।

IUCN  ने इनको 1996 में ही संकटग्रस्त करार किया था और भारतीय वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के अनुसार इनको सेड्यूल 1 की श्रेणी में रखा गया है। लेकिन आज भी इस प्राणी के बारे में लोगों को बहुत ही कम जानकारी है। लोगों में जानकारी का इतना अभाव है, कि वे ये भी नही जानते कि समुदुद्र के अलावा नदियों में  भी डाल्फिन होती हैं। ऐसे हालात में सबसे पहले लोगगों तक इस जीव के बारे में सही जानकारी पहुंचाना यानी कि लोगों  को जागरूक करना जरूरी है।


भास्कर मणि दीक्षित (लेखक वन्य जीव सरंक्षण व उनके अध्ययन में  "तराई एन्वाइरनमेन्टल फ़ाउन्डेशन गोन्डा" द्वारा बेहतर सामूहिक प्रयास कर रहे हैं। गोण्डा जनपद में निवास, इनसे   bdixit63@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं)

Oct 8, 2010

क्या सिर्फ़ इन्सान ही जज्बाती होते हैं !

 क्या प्यार पर सिर्फ़ इन्सानी कौम का एकाधिकार है? क्या प्रेम, दया, करूणा, और परोपकार जैसे भाव सिर्फ़ इन्सानी फ़ितरत में पाये जाते हैं, या कथित मानवता के ये शब्द व छणिक भाव हैं, कुछ ऐसी ही बातों पर सवाल खड़े कर रही है, सुरेश बरार की ये कहानी!



एक बार की बात हैं, एक लड़की थी बहुत ही चुलबुली शरारती वो सब से प्यार करती थी। लेकिन उसे कोई प्यार नही करता था, उसे कभी कोई फर्क भी नही पड़ता था, वो अपने दादा जी के साथ बहुत खुश थी, वो उस समय कक्षा ७ में थी। अपनी छोटी सी दुनिया में बहुत खुश थी। उसके दादा जी उसे बहुत प्यार करते थे। और वो भी उन्हें बहुत प्यार करती थी अपने दादाजी से, सुबह की शुरुवात कुछ ऐसे होती कि वो सोती रहती और दादाजी उसे जोरों से आवाज़ें लागाते रहते 'क्योकि दादाजी को खाना जो खाना था ! जब तक दादाजी की थाली से एक टुकड़ा नही उठता था तबतक दादाजी अपने मुह के अंदर खाना नही डालते थे , लड़की बोलती दादाजी भूख नही हैं, फिर भी उसे खाना पड़ता था ,क्योकि अगर वो नही खाती तो दादाजी नही खाते ! फिर वो स्कूल जाती जब तक वो स्कूल से वापस नही आती, दादाजी खाना नही खाते थे। वो खेत पर रहते थे। स्कूल से आने के बाद वो दादाजी का काम करती थी और उनको बहुत तंग भी करती थी। दादाजी उसे हमेशा लडकों की तरह रखते थे . और वो किसी से डरती भी नही थी , वो अब कक्षा ८ में आ चुकी थी, जब वो कक्षा ८ में अच्छे नंबर से पास हुई तो दादाजी ने पूरे गांव में मिठाईं बांटी और एक दिन वो बीमार हो गए बुखार हो गया ,फिर क्या था कुछ भी ठीक नही हो रहा था लड़की को कुछ समझ नही आ रहा था, कि क्या हो रहा हैं, एक दिन वो दुनिया को छोड़ कर  चले गये, तब भी उसे कुछ समझ नही आ रहा था कि ये सब क्या हो रहा हैं, कई दिन बीत गए दादाजी दिखाई नही दे रहे थे। लड़की चुप थी, कुछ टाइम बाद उसे पता चला दादाजी भगवान के पास गए हैं, और कभी नही आयेगे, वो उनकी आंटी के पास रहते थे, लड़की उन पर चिल्लाई के उन्होंने दादाजी को क्यों मारा, घर वाले समझ नही पा रहे थे, कि उसे १० दिन के बाद क्या हो गया हैं, क्या उसे अब समझ आया, कि उसके दादाजी अब नही रहे ? वो हैरान थे, उसके इस बर्ताव पर उसे कोई समझा नही पा रहा था, बस एक ही रट दादाजी दादाजी ........... पता नही उसके दादाजी उसे छोड़ कर कहां चले  गए थे ? शायद उस जगह जहां से कोई लौटकर वापस नही आता, लेकिन लड़की मानने को तैयार नही, कि उसके दादाजी अब कभी लौटकर वापस नही आयेगे । उसका असर उसके दिमाग पर हुआ और वो बीमार हो गई, उसे सिर्फ़ दादाजी चाहिये वो बड़ी तो थी, लेकिन समझ नही थी उसकी दुनिया सिर्फ़ उसके दादाजी थे और कोई नही।

अब वो दीदी के साथ कक्षा १० में पढ़ती थी, ठीक तो हो गई थी लेकिन बहुत शांत हो गई थी , फिर वो कक्षा १० से पास होकर ११ में गई तब उसकी जिंदगी में २ नये दोस्त  आ गये, वो दीदी के दोस्त थे वो दोनों सी आर पी एफ़ फ़ोर्स में थे, वो उन्हें सर बोलती थी, दोनों बहुत प्यार करते थे उससे क्योकि वो उन चारों में सबसे छोटी थी चारों अपनी प्रोब्लम एक दूसरे के साथ बांटते थे, लड़की फ़िर से हंसने लगी थी। ऐसे भले शरारती थी। चारों बहुत अच्छे दोस्त थे, वो मिलते नही थे, कभी कभी मिलते थे लेकिन दोस्ती दिल से थी चारों एक दूसरे की ख़ुशी के बारे में सोचते थे ! लड़की फिर से किसी पर विश्वास करने लगी थी ५ साल तक वो बहुत अच्छे दोस्त रहे उसे अपने दोस्तों पर बड़ा गुरुर था, कि उसकी दोस्ती दुनिया की सबसे बढ़िया दोस्ती हैं, घर वाले भी खुश थे की उनकी बेटी किसी पर भरोसा करने लगी हैं, दादाजी के जाने के बाद वो भगवान से भी नाराज हो गई थी, कि उसने उनके दादाजी को अपने पास बुला लिया था, अब उसके लिए दोस्ती ही सब कुछ थी

एक दिन उसके एक दोस्त ने दोस्ती तोड़ ली, पता नही क्यों ५ साल के बाद फिर से वो लड़की टूट गई थी, फिर एक दिन क्या था, कि दूसरे दोस्त ने उसे कहा कि उसने हम से दोस्ती सिर्फ़ दूसरे दोस्त के कहने पर की थी और उन्होंने उस दोस्ती को निभाया भी, दोस्ती का मतलब उस लड़की के लिए भगवान था, जो फिर से रूठ गया था उसे फिर से कुछ समझ नही आ रहा था, कि ये सब उसके साथ क्यों हो रहा था। वो बिलकुल थम सी गई थी दिल जो टूटा वो फिर नही जुड़ने वाला था ! वो उसे बोलता गया और वो सिर्फ़ सुनती रही कुछ नही बोला, बस यही सोच रही थी के ५ साल तक दोस्ती एक धोका थी और कुछ नही उसे समझ आ गया की लोगो से दूर रहना हैं उसने उनसे सिर्फ़ इतना बोला की आपने धोका दिया क्यों? वो गलती मानने को तैयार नही था बोला मैं अपनी दोस्ती का हर  फ़र्ज़ पूरा किया हैं तुम्हे कोई शिकायत नही होनी चाहिये ? लड़की ने कहा आपने सही बोला आपने दोस्ती का हर फ़र्ज़ पूरा किया लेकिन क्या उसमें आपके दिल की ख़ुशी थी आपने वो किया जो आप नही करना पसंद करते थे, मुझे झूठी दोस्ती नही चाहिये थी, क्यों किया आपने ऐसा ? उसने बोला ठीक हैं आपकी दोस्ती झूठ थी मेरी नहीं, जाओ मेरी जिन्दगी से दूर हमारी दोस्ती आपके लायक नही थी, और न हम आपकी दोस्ती के लायक हैं, जहां जाओ खुश रहो ? बस एक एहसान करना कभी किसी से झूठ मत बोलना, क्योकि जब किसी का विश्वास टूटता हैं, तो वो किसी पर भरोसा नही कर सकता ? खुश रहो हमेशा।  सब ख़त्म हो चुका था।


इस बार तो वो असे टूटी के इंसानियत पर से भरोसा टूट गया , वो फिर से इमोशनली हार्ट हुई थी। साँस जिसे वो लेना ही नही चाहती थी ! एक बार वो फिर से सब से दूर हो गई और इस बार वो हमेशा के लिए सब से दूर थी। वो जीना नही चाहती थी। बस सोचती कि क्या वो सच में किसी की दोस्ती के काबिल नही हैं ? क्या यही दुनिया हैं ? क्या लोग ऐसे ही होते हैं ? वो ५ साल तक हमारे साथ था फिर भी हम नही समझ पाए ? वो समझ चुकी थी के लोगो को समझा नही जा सकता ? अब वो दुनिया से नाराज थी जीना नही चाहती थी? वो एक बार फिर से अकेले हो गई ! एक बार वो अकेले एक पार्क मैं बठी रो रही थी तो वहाँ कुछ अलग नजारा देखा,  उसने देखा कि इन्सान सिर्फ़ इन्सान का ही नही जानवरों का भी दुश्मन हैं! दुसरे दिन लड़की फिर उसी पार्क में बैठी थी, वो कुछ देख रही थी, कि एक कुत्ता सब लोगो के पास बारी बारी से जा रहा था और लोग उसे मार रहे थे ! वो फिर भी उनके पास जा रहा था ! अगले दिन फिर वही सब हुआ वो कुत्ता बहुत ही बड़ा और बहुत मोटा था,  एक मोटी औरत ने उसे चप्पल से मारा फिर उसने सुना के लोग कह रहे थे की कुत्ता पागल हैं, और खतरनाक भी लड़की उसे देख रही थी पर उसे वो पागल नहीं लग रहा था फिर उसका ध्यान उस कुत्ते के पाओ पर गया तो वो लगड़ा रहा था, फिर उसे समझ आया कि उसे मदद चाहिये, वो लड़की भी उससे डर रही थी,  और लोग उसे बराबर मारे जा रहे थे ! तभी कुत्ता दौड़ कर उस लड़की के पास गया उसकी आँखों में बहुत दर्द था, जो वो बर्दास्त नहीं कर पा रहा था, और कुत्ते ने लड़की की तरफ अपना पैर उठाया तो लड़की ने देखा की उसके पावं में कील लगी हुई थी, जो ४/५ दिन पुरानी थी, वो जैसे बोल रहा था, प्लीज हेल्प......

देखने में वो बहुत बड़ा था पर बहुत मासूम लग रहा था।  तभी लोगो ने शोर किया की ये कुत्ता पागल हैं, वहाँ से हट जाओ,  लड़की ने कहा ये पागल नहीं हैं, ये मेरा हैं  वो लड़की डरी हुई थी। कुत्ता उसके पैरों में बैठ गया। लड़की ने कुछ हिम्मत की और उसके पैर को ऊपर उठाया जैसे वो कील निकालने लगी, तो कुत्ता जोर से चिल्लाया उसे बहुत दर्द हुआ ! लोग तो उसे जान से मारने का प्लान बना रहे थे , तभी लड़की ने जोर से कील को खींचा, तो कुत्ते ने उसका हाथ अपने मुंह में ले लिया तभी लोगो को लगा की कुत्ते ने लड़की को काट लिया हैं, लोगो ने कुत्ते पर  किसी पैनी चीज से मारा तो उस लड़की ने अपना हाथ उसके ऊपर अड़ा दिया लड़की को बहुत जयादा चोट लगी कुत्ते के पावं से कील निकल गई थी और वो डर कर वहां से भाग गया ! लड़की ने लोगों को बताया कि वो पागल नहीं हैं। उसके पाओ  में कील लगी थी। इसलिए वो आप सब से मदद मांग रहा था, लोग वहाँ से चले गए, कुत्ता वही छुपकर देख रहा था सब के जाने के बाद वो बहार आया उस लड़की के पास ! लड़की ने सोचा अब क्या चाहिये उसे कील तो निकल चुकी हैं, वो आकर लड़की का हाथ चाटने लगा जहां लोगों ने उसे मारा था। एक बार वो अपना पाओ चाटता और एक बार लड़की का,  वो लड़की को प्यार कर रहा था फिर वो भी उसे प्यार करने लगी !

अब तो वो रोज मिलते थे, कुत्ता लड़की का शुक्रिया अदा करना नही भूला था। उसे पता था की लड़की को नुकसान उसकी वजह से हुआ हैं। वो उसका हाथ रोज चाटता था। और अपना भी लड़की को भी बहुत अच्छा लगता था ! कुछ महीने बाद दोनों का जख्म ठीक हो चूका था वो उसके लिए खाना लेकर जाती थी। लड़की इस वक्त २० साल की थी ! जहाँ वो लड़की लोगो को देखकर मुंह फेर लेती थी। वही दूसरी तरफ वो कुत्ते से बहुत प्यार करने लगी थी। वो अपना खाना उसी के साथ बांटती थी, कई बार कुत्ता भी अपना खाना लड़की के लिए बचा कर रखता था। लड़की उससे अपने दिल की सारी बातें करती थी और वो उसे सुनता था, मानों उसे सब समझ आता था और वो रोने लगता था, दोनों एक दूसरे के गले से लगकर बहुत रोते थे। वो लड़की के आसुओं को अपनी जीभ से चाटता था, फिर दोनों ने एक दुसरे से वादा किया की वो दोनों अब कभी नही रोएगे ! एक दिन लड़की बीमार थी तो वो उससे मिलने नहीं जा पाई जब वो दूसरे दिन उसके पास गई तो कुत्ता उसके सीने से लग कर रोने लगा जैसे वो बोल रहा था, कि तुम मुझे क्यों छोड़ कर गई उसने खाना भी नहीं खाया था। खाना छुपा कर रखा हुआ था। फिर वो निकाल कर लाया, खाने से बदबू आ रही थी !


कुछ दिनों बाद जब लड़की उससे मिलने गई तो वो वहा नही था उसको लगा वो आ जायेगा लेकिन ऐसा नहीं था शाम हो चुकी थी। उसका कोई पता नहीं था, वो कभी नहीं लेट होता था, लड़की को लगा कहीं उसे कुछ हो तो नहीं गया, वो बहुत डर गई थी। उसने शोर मचाना शुरु किया, तो एक गडडे से उसकी थोड़ी सी आवाज़ सुनाई दी, वो दौड़ कर नीचे गई, तो उसने देखा कि वो अपनी आखरी साँसे गिन रहा है! वो फिर नहीं समझ पा रही थी, कि ये सब कैसे हो गया। वो तो बिलकुल ठीक था ? उसके पेट से खून निकल रहा था। उसने लड़की को चाटा और मर गया।  लड़की को शॉक लगा, वो वही पर पड़ी रही जब वो उठी तो उसका दोस्त दुनिया और उससे दूर जा चुका था। वो रोती रही रातभर सुबह जब देखा तो उसे मारा गया था, उसके पेट से खून निकला था, और उसके मुंह में था। क्या कोई यकींन कर सकता हैं, कि पाओ का एक पैकेट उस दिन लड़की का जन्मदिन था। वो उसके लिए तोफा लाया था। किसी की दुकान से पर पता नहीं कि उसे कैसे पता था। कि आज उसकी दोस्त का जन्मदिन हैं ? उसे अपने जन्मदिन पर तोफे में अपने दोस्त की लाश मिली फिर क्या था ! इंसानों से नफरत और बढ़ गई ! क्या उसका इतना कसूर था, कि वो इन्सान से ज्यादा वफादार था? उनसे ज्यादा प्यार करने वाला ? लड़की ने तो सिर्फ़ उसकी छोटी सी मदद की थी ! थोडा सा प्यार ! और उसने उस प्यार के बदले अपनी जान तोफे में दे दी ? आज वो लोगों से दिल से इतनी दूर हैं, जितना की धरती से आसमान! क्या उसे जीने का कोई हक़ नही था ? जो उसे इतनी बड़ी सजा दी गई ? सजा तो दोनों को मिली बस फर्क सिर्फ़ इतना की लड़की जिन्दा थी ?


 सुरेश बरार (लेखिका गुड़गांव में रहती हैं, ताईकांडों सीखना व सिखाना इनका मनपंसद कार्य है, वन्य जीवों से प्रेम, अभी तक ताईकांड़ों जैसी विशेष कला में तमाम एवार्ड अर्जित कर चुकी हैं, वन्य जीवन के सरंक्षण में कार्य करने वाली कई राष्ट्रीय एंव अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं से जुड़ी हुई हैं, इनसे  brar.suresh@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।)




Water lily (गुजरी) की तस्वीरें साभार: सतपाल सिंह

कछुओं से गुम हुए जीवन का पता पूछते हैं !

रद कोकास*
एक प्राचीन जीव के महत्व को दर्शाती कवि कोकास की कविता:
photo credit: newswise.com
कछुआ एक सामान्य सा दिखाई देने वाला असामान्य जीव है । यह मनुष्य से भी अधिक पुराना है और इसे उम्र भी मनुष्य से ज़्यादा मिली हुई है । पुरातत्ववेत्ताओं और जीव वैज्ञानिकों ने यह खोज की है और कछुए को एक महत्वपूर्ण जीव बताया है । 
पुरातत्व की एक शाखा मैरीन आर्कियालॉजी के अंतर्गत पुरातत्ववेता जब समुद्र के भीतर डूबी हुए बस्तियों और जहाज़ों की तलाश करते हैं तब उस स्थान पर पाये जाने वाले कछुए और मछलियाँ उनकी खोज में उनकी सहायक होती है। उत्खनन स्थल पर प्राप्त इन जीवों की हड्डियों का कार्बन 14 पद्धति से परीक्षण करने के पश्चात उस स्थान की प्राचीनता ज्ञात की जा सकती है। पुरातत्ववेत्ताओं को विभिन्न गुफाओं के शैलचित्रों में भी कछुए के चित्र मिले हैं जो कछुए के उनके जीवन में उपस्थिति को दर्शाते हैं ।
हमारे पौराणिक ग्रंथों मे " कूर्म वाहिनी यमुना " अर्थात यमुना के वाहन के रूप में कछुए का उल्लेख तो है ही लेकिन विश्व के अन्य भागों के साहित्य में भी इसका उल्लेख प्राप्त होता है। इस तरह यह जीव अपने जीते जी तो मनुष्य के काम आते ही हैं लेकिन उनकी मृत्यु के पश्चात  उनके अवशेष भी मनुष्य की और सभ्यताओं की प्राचीनता सिद्ध करने के काम आते हैं । कछुओं की विशेष प्रजाति से यह भी ज्ञात होता है कि उस स्थान पर कितने हज़ार वर्ष पूर्व धरती रही होगी । इस कविता में कछुए की लम्बी उम्र के बिम्ब  इस्तेमाल एक बिम्ब के रूप में किया गया है । इसलिये कि कछुए उस गुम हो चुकी सभ्यता के मूक गवाह हो सकते हैं ।  
( शरद कोकास की लम्बी कविता " पुरातत्ववेत्ता " से एक अंश )

Photo credit: Childzy (wikipedia.com)
सिर्फ़ रेत और हवा के बीच नहीं उपस्थित होता समय
समुद्र तल में जहाँ रेत की परत के नीचे
कल्पना तक असंभव जीवन की
शैवाल चट्टान सीप घोंघों और मछलियों के बीच
चमकता है अचानक एक विलुप्त सभ्यता का मोती
पीठ पर ऑक्सीजन सिलेण्डर और देह पर अजीब
गोताखोरी की पोशाक पहने पुरातत्ववेत्ता
कछुओं से गुम हुए जीवन का पता पूछते हैं

मछलियों की आँख से आँख मिलाती है
उनके कैमरे की आँख
उसमें एक जाल की दहशत आती है नज़र
सपनों का महल झिलमिलाता है नारियल के कोटर में
झोपड़ी की बगल में खुशियों की राह मचलती है
शायद यही है वह रास्ता कि जिस पर चलकर
हज़ारों- हज़ार साल पहले
अफ्रीका से आई थी हमारी आदिमाता
और चट्टानों के करवट बदलने से जो रास्ता
अपना रास्ता बदलकर समुद्र में चला गया था
यहीं कहीं था जीवन की भाफ से भरा वह द्वीप
जो समुद्र की सलामती के लिए
प्रार्थनायें करते हुए
खुद डूब गया था अपने अभिशाप में॥


शरद कोकास  (लेखक साहित्यकार हैं, कविता संग्रह, कहानियां, एंव ब्लॉग लेखन में हिन्दी जगत में विशिष्ठ स्थान। इनकी चर्चित  कृतियों में कविता संग्रह "गुनगुनी धूप के सायें में" कहानी पुस्तिकाओं में "प्रेतनी की बेटी,  राधा की सूझ, पसीने की कमाई, एंव चिठ्ठियों पर किताब "कोकास परिवार की चिठ्ठियां" हैं, प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में लेखन। छत्तीसगढ़ दुर्ग में निवास, इनसे sharadkokas.60@gmail.com पर कर सकते हैं। इनका इतिहास बोध पर आधारित ब्लॉग "पुरातत्ववेत्ता" इतिहास ज्ञान का बेहतरीन स्रोत हैं। )

Oct 6, 2010

मानव व वन्य जीवों के मध्य चल रहे घमासान की एक कहानी !

 कतरनियाघाट वन्य जीव विहार, बहराइच, उत्तर प्रदेश, भारत:
संघर्षगाथा:
मानव व वन्य जीवों के मध्य संघर्ष पर एक विमर्श:

"विश्व प्रकृति निधि के परियोजना अधिकारी दबीर हसन से दुधवा लाइव की बातचीत के ये अंश कतरनियाघाट वाइल्ड लाइफ़ सेन्क्चुरी व इसके आस-पास हो रही घटनाओं पर आधारित है, कि आखिर क्यों रफ़्तार पकड़ रहा है वन्य जीवों और मानव के मध्य संघर्ष और इसके पीछे वो कौन सी वजहें हैं जो इस संघर्ष को बढ़ावा दे रही हैं, जो नतीजे सामने आयेंगे उनसे यकीनन आप सभी स्तब्ध रह जायेगें!"
 
फ़ोटो साभार: सीजर सेनगुप्त
कतरनियाघाट में लगातार बढ़ रही बाघों व मनुष्यों के मध्य लड़ाई अब चरम पर है, अभी  ३ अक्टूबर को कैलाशपुरी रोड पर स्थित गाँव नई बस्ती (वन-ग्राम) के १७-१८ वर्ष के लड़के जगमोहन पुत्र सुरेन्द्र को बाघ ने मार दिया, वह शाम के वक्त जंगल गया था। इससे पूर्व सितम्बर २०१० में विष्णु टांडा (जंगल के निकट रेवन्यू विलेज) गाँव के एक आदमी को बाघ ने मारा, और फ़रवरी २०१० में  एक लड़की बाघ का शिकार बनी।  ये तीनों घटनायें जंगल के भीतर हुई। आप को बताता चलूं कि कतरनियाघाट वाइल्डलाइफ़ सेन्क्चुरी के अन्तर्गत पाँच ग्राम-सभाये है, और इन ग्राम सभाओं में तीन हैमलेट्स (पुरवे) हैं, यानी कुल आठ गाँव हैं, और यहाँ के लोग जंगल की जमीन पर कब्जा रहने के लिए आमादा हैं!


इस वन्य जीव विहार की स्थापना १९७६ में किया गया, किन्तु बाद में इसे डिनोटीफ़ाई कर दिया गया, बहराइच जनपद के घने जंगलों का यह हिस्सा जहाँ वन्य जीवन की प्रचुरता है, डिनोटीफ़िकेशन के कारण फ़िर एक बार यह शिकारियों, लकड़कट्टों व अन्य अवैध व अनुचित गतिविधियों में लिप्त लोगों का अड्डा बन गया। 
१९८८ में यह क्षेत्र एक बार फ़िर उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा वन्य जीव विहार के रूप में प्रस्तावित किया गया। १९९० में भारत सरकार द्वारा भी इसे मन्जूरी व सहयोग प्राप्त हुआ, यही वह वक्त था जब इस प्राकृतिक स्वर्ग से तमाम नर्कीय कारकों का बोरिया-बिस्तर गोल होने वाला था! यानी गैर-वानिकी कार्य जैसे गिरवा नदी से पत्थरों का खदान आदि, साथ ही आजादी से पेड़ काटने वाले, जंगल की जमीन पर कब्जा करने वाले व शिकारियों के लिए यह अन्तिम वक्त आ गया था। पर साथ ही दूसरी तरफ़ एक आग लगने जा रही थी, जो आज भी धू-धू कर जल रही हैं, यह आग थी तमाम उन ग्रामीणों के सीने में जिन्हे जंगल से जलौनी लकड़ी, मवेशियों की गौड़िया, पौध-रोपड़ विधा के द्रोणाचार्यों यानी टाँगिया समुदाय, व जंगल में बसे गाँव के ग्रामीणों में जो तमाम जंगली स्रोतो पर वैध व अवैध तरीके से निर्भर थे। उन्हे ये लगने लगा कि अब उनकी बुनियादी जरूरतों पर प्रतिबन्ध लगाया जा रहा हैं!
आप को बताता चलूं की गिरवा व घाघरा नदियों के मध्य स्थित यह वन श्रंखला जो वन्य जीवों का स्वर्ग हैं, जैव-विवधिता के मामले में दुनिया के बेहतरीन स्थलों में से एक हैं, किन्तु भारत-नेपाल सीमा पर स्थिति यह जंगल भारत के मुख्य शहरों से दूर व सुगम मार्ग न होने की वजह से दुनिया  के लोगों के लिए अन्जाना रहा, और कमोवेश यह स्थिति अभी भी बरकार है। सबसे अहम बात ये है, कि यह वन्य क्षेत्र नेपाल के बरदिया नेशनल पार्क से खाता कॉरीडोर के माध्यम से जुड़ा हुआ हैं, इस कारण नेपाल के जंगलों व भारतीय जंगलों के वन्य-जीवों का आवागमन निर्बाध रूप से जारी है, जो हमारी जेनेटिक-विविधता को कायम रखने में मददगार है। यहाँ एक और खूबसूरत कहानी हैं, कि खाता कॉ्रीडोर के जंगल "कम्युनिटी फ़ॉरेस्ट" हैं जिन्हे वहाँ के सथानीय नागरिकों ने तैयार किया हैं, ये सुन्दर सबक हमारे भारतीय पॉलिशी मेकर्स को भी लेना चाहिए। 

कतरनियाघाट के जंगल शामिल हुए "टाइगर प्रोजेक्ट" में:

इस वन्य क्षेत्र के लिए सबसे सुनहरा मौका था, १९९७ में इसका भारत सरकार द्वारा चलाये जा रहे "टाइगर प्रोजेक्ट" में शामिल किए जाना,  विश्व प्रकृति निधि ने भी १९९८ से इस वन्य जीव विहार को सहायता देना प्रारम्भ कर दिया। इस वक्त यह लखीमपुर स्थिति दुधवा टाइगर रिजर्व के कार्यालय से गवर्न होना शुरू हुआ, इस समय दुधवा के निदेशक वरिष्ठ आई एफ़ एस रूपक डे थे, कतरनियाघाट अब इनके प्रशासकीय कार्यों का एक अहम हिस्सा बन चुका था। इसी दौरान कतरनियाघाट जंगलों में स्थित "सेन्ट्रल स्टेट फ़ार्म" जिसे भारत की तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी द्वारा स्थापित कराया गया था, वह दिन हम भारतीयों के दुर्भक्षिता के दिन थे और सरकारे तमाम वनों को काटकर या वनों के मध्य इस तरह के कृषि फ़ार्म स्थापित करने मे जुटी थी ताकि हिन्दुस्तानियों का पेट भरा जा सके, इन कृषि फ़ार्मों से कितने भारतवासी लाभान्वित हुए यह एक अलग मुद्दा है? या अफ़सर और शासन में बैठे लोगों के ही पेट भरते आये!...इस बात पर कभी और चर्चा......। इस फ़ार्म में जहाँ तमाम फ़सले उगाई जाती थी, एक ग्रासलैंड की शक्ल ले चुका था, आस-पास वन और मध्य में वन्य जीवों के लिए यह घास का मैदान एक उपयुक्त स्थल बन गया, शाकाहारी जीवों को स्वादिष्ट फ़सलों का भोजन, और शाकाहारी जीवों की उप्लब्धता के चलते बाघ व तेन्दुओं का इस जगह के प्रति आकर्षण बढ़ता चला गया। वन्य जीवन से होने वाले नुकसान से फ़ार्म के अधिकारी व कर्मचारी वन्य जीवों के शिकार की गतिविधियों में परोक्ष या अपरोक्ष तौर पर शामिल हो गये! दुधवा के निदेशक रूपक डे के कार्यकाल में ही यहाँ एक पोचिंग का मामला उजागर हुआ, और इस तेज-तर्रार अधिकारी ने "सेन्ट्रल स्टेट फ़ार्म" के कर्मियों व अधिकारियों पर मुकदमा दर्ज करवाते हुए इसे सीज कर दिया। इसकी एक वजह और थी, श्रीमती गाँधी के कार्यकाल में आनन-फ़ानन में यह कृषि फ़ार्म उनके मौखिक आदेश पर स्थापित किया गया था! और इस फ़ार्म में कतरनियाघाट वन-प्रभाग का भी कुछ हिस्सा मौजूद था, लगभग ३५०० हेक्टेयर वन-भूमि  एक अतिक्रमण के तौर पर हैं।

 एक बार फ़िर बदहाली की राह पर:

सन २००० में कतरनियाघाट वन्य जीव विहार एक बार फ़िर बदहाली के रास्ते पर ला दिया गया, जब इसे दुधवा टाइगर रिजर्व से हटाकर "गोण्डा-ईस्ट वृत्त" (कतरनियाघाट, सुहेलवा, व सोहागीबरूवा वन्य जीवविहार) से जोड़ दिया गया। टाइगर रिजर्व से अलाहिदा होते ह भारत सरकार से इसे वो अनुदान व सहूलियते मिलना बन्द हो गयी, जिनके चलते यहाँ वन्य जीवन को सुरक्षा व सवर्धन प्राप्त हुआ था। सन २००३ में इसे दुधवा टाइगर रिजर्व का दोबारा हिस्सा बना दिया गया। किन्तु इन तीन वर्षॊं में इस सुन्दर वन की जितनी दुर्दर्शा हो सकती थी हुई।    
सन २००१ से २००४ तक इस वन्य जीव विहार में वन-संपदा छिन्न भिन्न की जाती रही। सन २००५ में आई एफ़ एस रमेश पाण्डेय की तैनाती के बाद इस जंगल में वन्य जीवन को सरंक्षण, वन-कर्मियों एंव ग्रामणों को वन्य जीवन का महत्व समझ आने लगा। आई एफ़ एस रमेश पाण्डेय द्वारा आधुनिक शैली में वन कर्मियों को  प्रशिक्षण व ग्रामीणों में जैव-विवधिता के महत्व प्रति जागरूकता अभियान चलाये गये, जिसमें कतरनियाघाट वेलफ़ेयर सोसाईटी का बेहतर सहयोग मिलता रहा।  

शिकारियों का पर्दाफ़ास:

२००१ व २००५ तक कतरनिया घाट के वनों व आस-पास के क्षेत्रों में मानव-वन्यजीव संघर्ष प्रकाश में नही आया, सन २००१ में एक व्यक्ति को जंगल के भीतर बाघ ने मारा, २००४ में कोई घटना नही हुई। किन्तु २००५ से यह ग्राफ़ बढ़ने लगा, नतीजा साफ़ था, कि इस वन क्षेत्र में बाघों व तेन्दुओं को उचित सरक्षण प्राप्त हो रहा था, और उनकी सख्या में वृद्धि भी, साथ ही वन के अन्दर मनुष्य की अविध गतिविधि पर भी पूर्ण प्रतिबन्ध लग चुका था, लिहाजा झुझलाये ग्रामीण आये दिन वन-विभाग से टकराव की स्थिति उत्पन्न कर रहे थे।
२००५ में प्रभागीय वनाधिकारी रमेश पाण्डेय द्वारा बाघ की पोचिंग का एक महत्व पूर्ण मामला प्रकाश में लाया गया, इस गिरोह में स्थानीय व बाहरी लोग शामिल थे, जिन्होंने यह कबूला, कि वह कई वर्षों से यहाँ बाघों व तेन्दुओं का शिकार करते आये हैं, जिनमें जंगल में मौजूद गौड़िया( पालतू मवेशियों का स्थान जहाँ तालाब या नदी के किनारे कुछ पेह्सेवर मवेशी पालक अपना अड्डा बना कर झोपड़ी आदि में रहते हैं) और इन गौड़ियों के मालिक भी शामिल थे, क्योंकि बाघ व तेन्दुओं से इनके मवेशियों को खतरा बना रहता था एंव आये दिन इनके मवेशियों को बाघ मार दिया करते थे, नतीजतन ये बाघों के शत्रु बन चुके थे! 

घुमन्तू जातिया भी शामिल हैं बाघ के शिकार में:
इस घटना में कतरनियाघाट वन्य क्षेत्र में जगह-जगह कैम्प कर रहे कंजड़ भी शामिल थे, जो दिन में रस्सी, फ़ूलमाला,भैसें, मुर्गा  बेचते, रात में बाघों का शिकार करते, इनके घर की महिलाए गाँवों में नाचगाना जैसे मनोरंजक कार्य भी करती थी। इनके पास से आइरन ट्रैप (खुड़के) आदि बरामद हुए।


सन २००५ से २००८-९ तक कतरनियाघाट में अवैध कटान, शिकार, व अतिक्रमण का ग्राफ़ एकदम नीचे आ गया था। किन्तु बाघ व मनुष्य के बीच संघर्ष में इजाफ़ा हो गया, अब आप स्वयं अन्दाजा लगा सकते हैं कि इस संघर्ष के मु्ख्य कारण क्या हैं! 

विस्थापन का खौफ़ और राजनीति:

कतर्नियाघाट अब क्रिटिकल टाइगर हैविटेट के तौर पर जाना जा रहा है, इस वजह से यहाँ मौजूद वन-ग्रामों में प्रत्येक परिवार को दस लाख रूपये मुवाबजा देकर पुनर्स्थापित करने की योजना बनाई जा रही हैं, और यह खबर जंगल में आग की तरह फ़ैली! लोग इसे राजनैतिक रूप देने की कोशिश में भी लगे हुए हैं, और ग्रामीणों को भड़काया जा रहा हैं।
गिरवा नदी के पार स्थित भरतपुर गाँव मे २०-२५ हाथियों के झुण्ड जो नेपाल से आते है, उनके कारण भी ग्रामीणों में आक्रोश व्याप्त हैं.......

दैवीय आपदा बनाम आदमखोरी:

दैवी आपदा में दी जाने वाली छति पूर्ति के मुकाबले बाघ द्वारा मारे गये व्यक्तियों को दिया जाने वाला मुवाबज़ा बहुत कम है, यह भी एक अहम मुद्दा है, जिस कारण जंगल के आस-पास रहने वाले लोग वन-विभाग के खिलाफ़ खड़े हो जाते हैं, वन-विभाग के वाहनों को छति पहुंचाना, कुल्हाड़ी, कांता-बल्लम, और बन्दूकों के साथ वन विभाग से मोर्चा लेने की भी कोशिशे होती है, राजनीति से प्रेरित धरना-प्रदर्शन आदि भी अंजाम दिए जाते हैं।
किसी दैवीय आपदा, जैसे आगजनी, बाढ़, आकाशीय विद्युत, आदि से मृत व्यक्ति को सरकार तीन दिन के भीतर उप-जिलाधिकारी द्वारा तुरन्त १०,०००० रुपये मृत व्यक्ति के घर वालों को दे दिए जाते है, बाकी औपचारिकता बाद में पूरी की जाती हैं।
वही यदि किसी व्यक्ति की जान बाघ द्वारा ली जाती है, तो ५०,००० रुपये का प्राविधान है, जो तमाम औपचारिकताओं के बाद छ: महीने बाद दिया जाता है। बाघ द्वारा प्रभावित ग्रामीणों की माँग है, कि बाघ हमारा राष्ट्रीय पशु है, और सरकार करोड़ों रूपये उसके सरंक्षण पर दे रही है, तो मानव-वन्य-जीव संघर्ष को रोकने के लिए यह क्षतिपूर्ति पाँच लाख रूपये होनी चाहिए।
कतरनियाघाट में विश्व प्रकृति निधि भारत के परियोजना अधिकारी दबीर हसन कहते हैं कि आये दिन बाघ-तेन्दुआ द्वारा वन-ग्रामों व जंगल के आस-पास स्थिति गाँवों से गाय, बकरी, भैंस व बैल मार दिए जाते हैं। वन-विभाग बकरी के बाघ या तेन्दुआ द्वारा मारने पर १९० रूपये मुवाबजा देता है, जबकि बाजार में एक बकरी की मौजूदा कीमत २००० से ३००० रूपये है। और हाँ ये मुवाबजा इतनी अधिक औपचारिकता के बाद चेक व ड्राफ़्ट के रूप में दिया जाता है, कि बकरी पालक गरीब ग्रामीण उन ड्राफ़्टव  चेक को झुझलाहट व बेबसी के चलते फ़ाड़ कर फ़ेक देता हैं, क्योंकि उस चेक को रेन्ज अधिकारी द्वारा चिन्हित करवा कर बैंक में खाता खुलवाना पड़ता है, जिसके लिए पूरे पाँच सौ रुपयों की आवशयकता होती है, जिसका इन्तजाम करना उस ग्रामीण के लिए कठिन होता हैं।
मुवाबजे में तब्दीली:

अभी तक बाघ या तेन्दुए द्वारा मारे गये व्यक्ति कों मुवाबजे के तौर पर विश्व प्रकृति निधि तत्काल ५००० रूपये व घायल वय्क्ति को २०००-३००० रूपये क व्यवस्था करती थी। किन्तु अब यह व्यवस्था "टाइगर कन्जर्वेशन सोसाइटी" द्वारा की जा रही है, और क्षति्पूर्ति की धनराशि मारे गये व्यक्ति के परिवार को ५००० से बढ़ाकर १००००  रूपये कर दी गयी है, और घायल व्यक्ति को ५००० रूपये।

वाइल्ड-लाइफ़ ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया:

मानव व वन्य-जीवों के मध्य संघर्ष रोकने के लिए यह संस्था पाँच वर्षीय कार्यक्रम के साथ कथित तौर पर यहँ काम कर रही है, अभी तक उनके द्वारा कौन से कार्य किए गये हैं, जो इस भयावहता को रोक पाये या कम कर सके यह किसी को मालूम नही। बताया जा रहा है, कि संस्था ट्रंकुलाइजेन, कैमरा ट्रैपिंग, आदि-आदि की ट्रेनिंग, देंगी, चलो यदि हमारे इस जंगल के सभी बाघ और तेन्दुओं को सुलाने व फ़ूटू खींचने  से यह संघर्ष खत्म हो जाता है तो वही सही। 

वन्य जीवन व मानव के बीच टकराव के सामन्य व पूर्व-विदित कारण:

१- जंगल में बाघ व तेन्दुओं के भोजन(शिकार) की कमी।
२- हैविटेट का लगातार दोहन व विनाश।
३- मनुष्य की आबादी की जंगलों पर निर्भरता।
३-सरंक्षित क्षेत्रों में मनुष्य की घुसपैठ।
४-वन्य जीवन के प्रति जागरूकता का अभाव।
५- वन-विभाग में अभी भी वन्य जीवन के प्रति समुचित अध्ययन व संसाधनों का अभाव।
६- शाकाहारी जीवों का शिकार जो बाघ, तेन्दुआ या अन्य माँसाहारी जानवरों का भोजन हैं।
७- ब्रिटिश ईंडिया एंव स्वतन्त्र भारत में वास्तविक वनों को नष्ट कर, उनकी जगह पर शाखू या सागौन के वृक्षों का रोपण, जिससे जंगल में विविधता समाप्त हो गयी।
८- ग्रास-लैंड पर कृषि-कार्यों के लिए अतिक्रमण या सरकारों द्वारा लोगों को जमीन का आंवटन।

ऐसे तमाम कारण है जो इन जीवों का रूख मानव आबादी की तरफ़ करते हैं।

पर हमारी चर्चा में जो मसले हमारे सामने आये वो चौकाने वाले हैं कतरनियाघाट में बाघ और तेन्दुओं द्वारा की जा रही गतिविधियों में मनुष्य की एक बड़ी चाल है, और उसकी करतूतों की विफ़लता, और इसी कारण आज यहाँ का माहौल आक्रोशपूर्ण है, किसी खिसियायी बिल्ली की तरह!
आज यहाँ बाघ और तेन्दुओं का शिकार न कर पाने, जंगल की जमीन पर अतिक्रमण न कर पाने, व जंगली संशाधनों का दोहन न कर पाने क वजह से लोगों मे वन-विभाग के प्रति आक्रोश व्याप्त है, अब अपने इन शैतानी गतिविधियों की तबाही को ये लोग सीधे जाहिर नही कर सकते, नतीजतन, ये राजनीति का सहारा लेकर वन-विभाग के विरोध में खड़े होते हैं, ग्रामीणों को भड़काते है, और अफ़सरों के वाहनों को क्षति पहुंचाई जा रही हैं, इस संघर्ष के पीछे वही चेहरे छुपे हुए हैं जो अपनी गलत गतिविधियों को अन्जाम नही दे पा रहें।
आज कतरनियाघाट में सरंक्षण को महत्व मिलने से बाघ व तेन्दुओं की तादाद बढ़ी है, और जंगल में उन्हे भोजन न मिल पाने की कारण वह गाँवों के आस-पास आ जाते हैं। जहाँ हर वक्त मनुष्य जंगलों के भीतर अपनी घुसपैठ जारी किए हुए है, अन्तत: संघर्ष स्वभाविक हो जाता हैं।
कतरनियाघाट वन्य जीव विहार के अन्दर ही विछिया रेलवे स्टेशन, बसड्डा, बाजार व अवैध रिहाईशी अतिक्रमण मौजूद है, इस वजह से हजारों लोगों की अवाजाही निरन्तर इस वन-क्षेत्र की भीतर होती रहती है, यह एक बड़ा कारण हैं, वन्य जीवों की असुरक्षा का।

इस सुरम्य वन के प्रति सरकारी अमले का पूर्ण समर्पण, पुख्ता योजनायें, और आम-जनमानस का सहयोग, जब तक प्राप्त नही होगा तब तक हमारे वनों के प्राणी चैन से नही रह पायेंगें।



दबीर हसन विश्व प्रकृति निधि के कतरनियाघाट वन्य जीव विहार में परियोजना अधिकारी के तौर पर विगत दस वर्षों से कार्यरत हैं, पूर्व में कतरनियाघाट वेलफ़ेयर सोसाइटी  से जुड़े रहे  यह संस्था यहाँ के वन्य जीवन के सरंक्षण व संवर्धन में अपनी विशेष भूमिका रखती हैं। साथ ही सामाजिक कार्यों में अभिरूचि। इनसे dabeer_hasan001@yahoo.in या 09450257709 पर संपर्क कर सकते हैं।

Oct 5, 2010

एक कछुआ जो कह रहा है अपनी कहानी !

एक कछुवें की कहानी कछुवें की जुबानी
क्षितिरतिविपुलुलतरे तव तिष्ठति पृष्ठे। धरणिधरणकिणचक्रगरिष्ठे।। केशव धृतृतकच्छपरूप। जय जगदीश हरे॥
अर्थात
(हे केशव ! पृथ्वी के धारण करने के चिन्ह से कठोर और अत्यन्त विशाल तुम्हारी पीठ पर पृथ्वी स्थित है, ऐसे कच्छपरूपधारी जगत्पति आप हरि की जय हो) (श्रीदशावतारस्तोत्रम)

आइये आज मैं पहली बार आपको अपने बारे में कुछ बताना चाहता हूँ। हमारे बारे में आप लोग शायद ही कुछ जानते होंगें। क्या आप जानते हैं कि आप मनुष्य, सिर्फ कुछ हजार वर्षो से ही अस्तित्व में आये है और आप शायद ये जान कर और भी आश्चर्य करेंगे कि हम लोग इस धरती पर लगभग 63 करोड़ वर्षो से रहते आ रहें हैं। और हमने सदा ही समय तथा परिस्थिति के हिसाब से अपने को परिवर्तित भी किया है इसी कारण से हम इस पृथ्वी पर अपने अस्तित्व इतने युगों से बचा पाये हैं। हमारे अतिरिक्त सिर्फ घड़ियाल और मगरमच्छ ही इतने युगों से इस पृथ्वी पर अपने को बचा पाये है यानि कि हम आपके अस्तित्व में आने के करोड़ो साल पहले से ही इस पृथ्वी तथा पर्यावरण के लिये अपना सम्पूर्ण जीवन ही लगाते आये है, और आप इन्सान इस बात को माने या न माने कि हमारे अस्तित्व का आज करोड़ो सालों के बाद भी होना इस बात का संकेत करता है कि हम आज
भी इस धरती और पर्यावरण के लिये कितने महत्वपूर्ण हैं।

आज पृथ्वी में हमारी लगभग 230 प्रकार की प्रजातियाँ पायी जाती है जिसमें से भारत में सिर्फ 28 प्रजातियाँ ही पायी जाती हैं। उत्तर प्रदेश में तो केवल 15 प्रजातियाँ ही मौजूद हैं।
आइए मै आप को अपने प्रजाति के बारे में भी कुछ बताता हुआ चलू।
प्रजातियों के हिसाब से हम कछुवें तीन हिस्सों में बटें हैं:-
1. थलचर यानि जमीन मे रहने वाले यानि हमारा सारा समय पानी के बाहर बीतता है और हम जमीन की
    वनस्पति आदि खा कर जीवित रहते हैं।
2. मुलायम कवच वाले अथवा माँसाँहारी जलचर यानी हम रहते तो पानी में ही है और नदी या तालाब से  मरे हुये जानवर का माँस और मछली का शिकार कर के खाते हैं तथा जल को प्रदूषण से बचाते है।
3. कठोर कवच वाले अथवा शाकाहारी जलचर यानी हम भी रहते तो पानी में ही है लेकिन नदी या तालाब से   वनस्पति खा कर जीवित रहते हैं और जलीय पर्यावरण के संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
हमेशा ही हम पृथ्वी के पर्यावरण को साफ करने में अपना योगदान देते आ रहे है। जरा सोचिये! करोड़ो वर्षो से हम अपनी पूरी जाति के साथ इस पृथ्वी के जल तथा थल (धरती) की सफाई में लगें हैं किन्तु आप इन्सानों में हमारे प्रति उदासीनता के चलते ही हमें संकटग्रस्त जानवर की श्रेणी में ला कर रख दिया है। भारत में  हमारी 11 प्रजातियाँ विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी हैं, और इन 11 प्रजातियों  में  से उत्तर प्रदेश में ही हमारी 5 प्रजातियाँ विलुप्त होने के कगार पर हैं। चीन देश में तो हमारा अस्तित्व ही समाप्त हो चुका है! और धीरे धीरे पूरे विश्व से हमारी कई प्रजातियाँ विलुप्त होती चली जा रही है।
हिन्दू धर्म के अनुसार देवताओं तथा दैत्यों के बीच हुये समुद्र मंथन में इस सृष्टि को चलाने वाले भगवान विष्णु ने कच्छप यानि कछुवें का अवतार लिया था और उसी कछुवें की पीठ पर विशाल पर्वत को रख कर समुद्र को मथा गया था। उन्ही के वंशज होने के कारण आज हमारी पूजा भी होती है। गंगा माँ (नदी) हमारे ही भाई घड़ियाल पर तथा यमुना माँ (नदी) हमारे ऊपर ही सवारी करतीं हैं।

"मुस्लिम धर्म के अनुसार अल्लामा कमालुद्दीन दुमैरी द्वारा लिखित "हैयातुल हैवान" के भाग 2 के पृष्ठ संख्या 467 में इमाम राफई ने हमें मारना और खाना दोनों ही हराम कहा है। हैयातुल हैवान के भाग 3 के पृष्ठ संख्या 361 में अल्लामा बगवी ने और अल्लामा नव्वी ने शरहै मोहज्ज़ब में हमारे शिकार और हमारे माँस को खाने को नाज़ायज़ होने का फ़तवा दिया है।"

आज से सिर्फ 20 से 25 वर्ष पहले तक हम अपने सभी प्रजातियों के साथ लाखों की संख्या में मौजूद थें लेकिन आज हम अपने अस्तित्व की रक्षा के लिये लड़ रहें है और दुर्भाग्य की बात तो ये है कि इस सृष्टि का सबसे बुद्धिमान जीव यानी कि आप इन्सान ही हमारे अस्तित्व को मिटाने में लगें हुए हैं। आज आप इन्सान सिर्फ यही सोचतें हैं कि इस पृथ्वी पर रहने का हक सिर्फ उसका ही है किन्तु आप ये कैसे भूल सकतें हैं कि इस पृथ्वी में अगर आपका अस्तित्व है तो हम और हमारे जैसे लाखों करोड़ो जीव-जन्तु और पेड़-पौधे की वजह से और अगर हम लोग ही नही होंगे तो आपका भी अस्तित्व समाप्त हो जायेगा।


लगभग पूरे विश्व में हमारा शिकार गैरकानूनी है। भारत मे वन्य जीव अधिनियम 1972 के  लागू होने सें अन्य जीव जन्तुओं के साथ साथ हमारा शिकार भी गैरैरकानूनी हो गया है। वन्य जीव  सरंक्षण अधिनियम के अनुसार आप हमारी कुछ प्रजातियों  की तुलना शेर या बाघ से कर सकते हैं । यानि कि जो सजा बाघ के शिकार करने वाले को मिलती है, वही सजा हमारे शिकार करने पर भी मिले। लेकिन फिर भी हम अपने माँस से हजारों गरीब लोगों  की भूख मिटाते आ रहें  है।
हमारा शिकार तो हर युग में होता आया है। पहले कुछ ही जाति के लोग अपनी भूख मिटाने के लिये हमारा शिकार करते थे उस समय हमें अपने ऊपर कभी खतरे का आभाष नही हुआ था, किन्तु अब स्थितियाँ बदल रही हैं, बढ़ती जनसंख्या, गरीबी और भोजन की कमी की वजह से अब हमारा शिकार भी अन्धाधुन्ध हो रहा है। इन परिस्थितियों से तो हम ,खुद ही निपट सकते है किन्तु कुछ लोग लालचवश हमारा अवैध शिकार तथा व्यापार कर रहे है जिसके कारण हमें अपने अस्तित्व के खतरे का सामना करना पड़ रहा है। हमे प्रतिदिन लगभग 20,000 से 25,000 की संख्या में सिर्फ भारत में मारा जा रहा है और भारत में हमारे कुल शिकार का सिर्फ 15 फीसदी (%) ही शिकार होता है अब आप इस बात का ,खुद ही हिसाब कर सकते हैं कि पूरे विश्व में हमारा कितना शिकार हो रहा है।
अब आप ही सोंचियें कि हम किस जबरदस्त तरीके से अपने को बचाने का प्रयास कर रहे है। हम अपने को बचाने के लिये आप ही से प्रार्थना कर सकते हैं क्योंकि आप ही हमारे रक्षक भी हैं और आप ही हमारे भक्षक भी हैं। हमारी रक्षा करना आपका दायित्व बनता है। क्या आप ये चाहते हैं कि हमारा नाम इतिहास के पन्नों में ही सिमट जाये और आने वाले युग कें बच्चें हमें सिर्फ तस्वीरों में ही देखे ? हम आपकी और इस पर्यावरण की महत्वपूर्ण जरुरत हैं  इस लिये हमें बचाने में अपना सहयोग करे और हमें  मारने वालों  का साथ न दें।

हे मनुष्य ! क्या तुम इस कलंक के साथ इस पृथ्वी पर रह सकते हो कि तुम्हारे ही लालच के कारण ये पृथ्वी अपने विनाश की ओर अग्रसर हो रही है।।
धन्यवाद
आपका अपना एक पर्यावर्णीय मित्र
एक कच्छप
परिकल्पना
भास्कर एम० दीक्षित, शैलेन्द्र सिंह एंव प्रदीप सक्सेना
तराई एन्वायरनमेन्टल फ़ॉउन्डेशन एंव टर्टल सर्वाइवल एलाइन्स (TEF and TSA)
संपर्क: taraee@rediffmail.com

विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था