International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Save Tiger

DON'T LET WILD TIGERS DISAPPEAR

Lady Rosetta

Potatoes with low sugar content and longer shelf life.

अबूझमाड़ के जंगल

जहां बाघ नही नक्सली राज करते हैं

खवासा का आदमखोर

जहां कांपती थी रूह उस नरभक्षी से

जानवर भी करते हैं योग

योगाचार्य धीरज वशिष्ठ का विशेष लेख

Sep 30, 2010

आखिर कब तक इन्हें यूँ ही मारते रहेंगे !

देवेन्द्र प्रकाश मिश्र* सात हाथियों की मौत पर केन्द्र सरकार को गजराज की सुध आयी
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पश्चिम बंगाल में बनेरहाट स्टेशन के पास मालगाड़ी की तेज टक्कर से रेल पटरियों पर हुई सात हाथियों की मौत के बाद वन एवं पर्यावरण मंत्रालय पुनः सक्रिय हो गया है। केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने रेल मंत्रालय से इस संबध में पत्र लिखने एवं वार्ता करने की बात कही है। इससे पूर्व उत्तरांचल के जिम कार्बेट नेशनल पार्क तथा राजाजी नेशनल पार्क में जहां रेलगाड़ियों से टकराकर रेल पटरियों पर दर्जनों हाथियों की मौते हो चुकी है। वहीं उत्तर प्रदेश के एकमात्र दुधवा टाइगर रिजर्व के जंगल के बीच से निकली रेल लाइन पर ट्रेनों की टक्कर से पिछले डेढ़ दशक में आधा दर्जन हाथी, चार बाघ, भालू, मगरमच्छ, फिसिंग कैट, दर्जनों चीतल, पाढ़ा आदि प्रजाति के हिरनों के साथ दुलर्भ प्रजाति के तमाम विलुप्तप्राय वन्यजीव-जन्तु असमय काल कवलित हो चुके हैं। इसके कारण दुधवा नेशनल पार्क के जंगल से निकली रेल लाइन एक्सीडेंट जोन बनी हुई है। रेल लाइन पर वन्यजीवों की होने वाली असमायिक मौतों को रोकने के लिए दुधवा टाइगर रिजर्व तथा सूबे के वन विभाग के उच्चाधिकारियों द्वारा रेलवे विभाग को जंगल के भीतर सीमित गति से ट्रेनों का संचालन किए जाने की बावत तमाम पत्र विगत के वर्षो में भेजे गए हैं। लेकिन जंगल के बीच से निकलने वाली ट्रेनों की रफ्तार में कोई कमी नहीं आई है वह उसी गति से दौड़ रही हैं। इससे वन्यजीवों के ऊपर हरवक्त मौत का खतरा मंडराता रहता है।

उल्लेखनीय है कि दुधवा टाइगर रिजर्व क्षेत्र में सुहेली नदी के पास एक जून 2003 को रेल लाइन को पार करते समय सवारी गाड़ी की लगी तेज टक्कर से दो नर जंगली हाथियों के साथ एक बच्चे की असमय दर्दनाक मौत हुई थी तथा एक युवा नर हाथी घायल हो गया था। दुधवा टाइगर रिजर्व के उप प्रभागीय बनाधिकारी द्वारा लखनउ मण्डल के पूर्वोत्तर रेल प्रबंधक, स्टेशन मास्टर समेत रेलगाड़ी चालक के खिलाफ दुधवा रेंज कार्यालय में वन्य जीव संरक्षण अधिनियम के तहत अभियोग भी दर्ज कराया गया था। इसी दौरान जंगल के भीतर सीमित गति से रेलगाड़ियों का संचालन किए जाने के पत्र भी तत्कालीन दुधवा टाइगर रिजर्व के उपनिदेशक पीपी सिंह द्वारा रेलवे विभाग के अधिकारियों को भेजे गए। रेलवे विभाग ने भी जांच के आदेश दिए थे। किंतु समय व्यतीत होने के साथ सब कुछ इतिहास बन गया। दुधवा रेंज में दर्ज अभियोग का क्या हुआ? रेलवे विभाग ने क्या जांच की? यह आजतक कोई नहीं जान सका और न ही ट्रेनों की रफ्तार में कमी आई। धीरे-धीरे सब कुछ सामान्य गति से चलने लगा। विगत दिवस पश्चिम बंगाल के बनेरहाट स्टेशन के पास मालगाड़ी की लगी तेज टक्कर से सात हाथियों की मौत हो गई। इस पर एकबार फिर रेल लाइनों पर होने वाली हाथियों की मौत का मुद्दा राष्टीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है। दर्घटना के बाद विदेश के दौरे पर होने के वावजूद केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए रेल मंत्रालय के खराब रिकार्ड पर अप्रसन्नता भी व्यक्त की, साथ ही कहा है, कि टास्क फोर्स द्वारा हाल में पर्यावरण मंत्रालय को सौंपी गई रिपोर्ट में हाथी को राष्ट्रीय पशु धरोहर का दर्जा देने तथा राष्ट्रीय संरक्षण प्राधिकरण की स्थापना के लिए कदम उठाने तथा एक जंगल से दूसरे जंगल में उनके आने-जाने वाले रास्तों की रक्षा करने के लिए कदम उठाने की सिफारिश की गई है। इसके लिए रेलवे से वनक्षेत्रों में ट्रेनों की गति धीमी करने जैसे विशेष कदम उठाने को कहा गया है। देखना यह है कि टास्क फोर्स द्वारा की गई सिफारिशों को लागू किया जाता है? या फिर हमेशा की तरह कुछ दिनों तक मुद्दा सुर्खियों में रहने के बाद गायब होकर फिर अलमारियों की कैद में पहुंच जाएगा।

गोंड़ा से मैलानी को जाने वाली एक सौ किमी से उपर रेल लाइन यूपी के एकमात्र दुधवा टाइगर रिजर्व क्षेत्र में शामिल मैलानी के जंगल के साथ किशनपुर वन्य-जीव विहार से लेकर दुधवा नेशनल पार्क होकर बहराइच के कतरनिया घाट वन्यजीव प्रभाग के जंगल के बीच से  निकली है। जिसपर अक्सर ट्रेनों से टकराकर अथवा कटकर दुर्लभ प्रजाति के विलुप्तप्राय वन्यजीव-जन्तुओं की असमय मौते होती रहती है। दुधवा नेशनल पार्क क्षेत्र में पंद्रह जनवरी 1998 को सुहेली नदी पुल के पास  ट्रेन की टक्कर से एक नर हाथी (टस्कर) की मौत हो गई थी। जबकि 5 जून 1997 को इसी पुल के निकट रेल लाइन पार करते समय एक बाघिन की मौत भी ट्रेन से कटकर हुई थी। कतरनिया घाट वन्यजीव प्रभाग के वनक्षेत्र मे 22 मार्च 2006 को बिछिया-निशानगाड़ा स्टेशन के बीच उरई पुल के पास ट्रेन की टक्कर से एक बाघ की मारा गया था। दुधवा नेशनल पार्क में जंगल के बीचो-बीच सोनारीपुर स्टेशन के पास 29 मई 2005 को टेªन की टक्कर से घायल हुए एक बाघ शावक की भी बाद में अकाल मौत हो गई थी। जबकि दुधवा स्टेशन के पास ट्रेन की लगी टक्कर से 15 अप्रैल 2006 को एक युवा बाघिन काल के गाल में समा गई थी। इसके अतिरिक्त पिछले डेढ़ दशक में दुधवा टाइगर रिजर्व क्षेत्र के जंगल में तीन दर्जन से ऊपर चीतल, पाढ़ा प्रजाति के हिरन, भालू, मगरमच्छ, फिसिंग कैट समेत दुर्लभ प्रजाति के तमाम वन्यजीव रेलगाड़ियों की चपेट में आने से असमायिक मौत का शिकार बन चुके हैं। विडंबना यह है कि देश के किसी भी प्रदेश में रेल ट्रैक पर ट्रेन की टक्कर से जब कोई दुर्लभ प्रजाति का लुप्तप्राय वन्य-जीव मारा जाता है तो राष्ट्रीय व प्रदेश स्तर पर जोर-शोर से चर्चा होती है, और घटना की सुर्खियां भी मीडिया में तीन चार दिन जोर शोर से उछाली जाती है। इसके बाद व्यतीत होते समय के साथ सबकुछ भुला दिया जाता है।

दुधवा टाइगर रिजर्व के वनक्षेत्र में रेल की पटरियों पर दुर्लभ प्रजाति के लुप्तप्राय वन्य-जीवों की होने वाली मौतों की रोकथाम के लिए केन्द्र सरकार की पूर्व वन एवं पर्यावरण मंत्री व वन्य-जीव जंतुओं की हितैषी मेनका गांधी ने वन्य-जीवों के संरक्षण के देखते हुए दुधवा नेशनल पार्क के जंगल से रेल लाइन को हटाकर उसे बाहरी क्षेत्र में बनाए जाने की जोरदार वकालत की थी। इसपर रेल मंत्रालय ने क्षेत्र में सर्वे का थोड़ा बहुत कार्य भी किया था, लेकिन बाद में धीरे-धीरे यह कार्ययोजना ठंडे बस्ते में पहुंच गई। सन् 2003 में वन्यजीव संरक्षण में संवेदनशीलता का परिचय देते हुए प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने भी दुधवा नेशनल पार्क के मध्य से रेल लाइन को हटवाने के लिए रेल मंत्रालय भारत सरकार को पत्र भेजकर सार्थक पहल की थी। इसके बाद भी रेल मंत्रालय ने कोई भी कार्यवाही आज तक नहीं की है। दुधवा टाइगर रिजर्व क्षेत्र के जंगल के बीच से दो दर्जन से उपर सवारी, एक्सप्रेस व मालवाहक ट्रेनें तेज गति से निकलती हैं, उनके हार्न की चीखती आवाज से वन्य-जीवों के सामान्य जीवन में भारी खलल पैदा होता है। इसकी रोकथाम एवं दुर्घटनाओं को रोकने के लिए सबसे बेहतर है कि सुरक्षित वन क्षेत्र के बीच से रेल लाइन को हटा दिया जाए। इससे वन्य-जीवों पर असमायिक मौत का मंडराने वाला खतरा भी समाप्त हो जाएगा। यह मानकर दुधवा टाइगर रिजर्व प्रशासन के साथ ही प्रदेश के वनाधिकारियों द्वारा विगत के सालों में रेल लाइन को पलिया से नौंगावां, मझगईं, निघासन होकर बेलरायां या तिकुनियां तक शिफ्ट किए जाने का प्रयोजल तमाम बार केंद्रीय रेल मंत्रालय के साथ ही लखनउ मण्डल के रेल प्रबंधक को भेजे जा चुके हैं। इसके अतिरिक्त जबतक रेल लाइन नहीं हटाई जाती है तबतक वन्यजीवों की सुरक्षा को देखते हुए दुधवा टाइगर रिजर्व में जंगल के भीतर सीमित गति से ट्रेनों का संचालन किए जाने के पत्र भी लगातार वन विभाग के अधिकारी समय-समय पर रेलवे के अधिकारियों को भेजते रहे हैं। परन्तु केन्द्रीय रेल मंत्रालय अथवा लखनउ के मंडलीय रेल अफसरों ने उनपर कोई कार्यवाही करने के बजाय उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया है। सबसे बड़ी विडंबना यह भी है कि यूपी में एकमात्र दुधवा नेशनल पार्क होने के बाद भी सूबे की सरकार जंगल से रेल लाइन को शिफ्ट करवाने या ट्रेनों की गति को सीमित कराने के लिए केन्द्रीय रेल मंत्रालय पर दबाव नहीं बना रही है। परिणाम दुधवा टाइगर रिजर्व समेत देश के विभिन्न हिस्सों में रेल लाइनों पर दुर्लभ प्रजाति के विलुप्तप्राय वन्यजीव-जन्तुओं की होने वाली मौतों में इजाफा होता जा रहा है। देखना यह है कि पश्चिम बंगाल में ट्रेन से कटकर हुई सात हाथियों की मौत के बाद केन्द्र सरकार कोई सार्थक कदम उठाती है कि नहीं?   (यह लेख २८-०९-२०१० को डेली न्युज एक्टीविस्ट के संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हो चुका है)

 देवेन्द्र प्रकाश मिश्र (लेखक वाइल्ड लाइफर/पत्रकार है, दुधवा नेशनल पार्क के निकट पलिया में निवास, एक प्रतिष्ठित अखबार में पत्रकारिता, इनसे dpmishra7@gmail.com पर सम्पर्क कर सकते हैं।)



Sep 29, 2010

उसके मुंह से निवाला छीना जा रहा है!

फोटो साभार: सतपाल सिंह
दुधवालाइव डेस्क* २८ सितम्बर मोहम्मदी लखीमपुर खीरी: वन विभाग द्वारा घोषित कथित आदमखोर बाघ ने मोहम्मदी तहसील के गाँव हजरतपुर (निकट अमीननगर) के निवासी पूरन सिंह की गाय को अपना शिकार बनाने की कोशिश की, पर ग्रामीणों ने इस बाघ को इसके शिकार से दूर खदेड़ दिया। इसी रोज जैती फ़िरोजपुर गाँव के किसी व्यक्ति की गाय पर बाघ ने हमला बोला! किन्तु यहां भी यह बाघ अपनी भूख मिटाने में नाकाम रहा। अन्तत: यहाँ भी इसे शिकार से दूर भगा दिया गया। इस बाघ ने पीलीभीत के जंगलों से अपनी यात्रा शुरू की और दुधवा टाइगर रिजर्व के निकट के जंगलों तक आकर फ़िर वापसी की, पर वन विभाग और वाइल्डलाइफ़ ट्रस्ट ऑफ़ इडिंया के लोगों ने इसे घेरने की और बेहोश करने की तमाम असफ़ल कोशिशों के चलते इसे और आक्रामक बना दिया। अब यह बाघ दुधवा के विभागीय हाथियों पर भी हमला बोलने से नही चूक रहा हैं।

सूत्रों के मुताबिक यह सुन्दर व विशाल नर बाघ है, और इसने जंगल के भीतर ही इन्सान को मारा, मानव शरीर के खाने के कोई पुख्ता सबूत नही हैं। यदि इस बाघ को उसके प्राकृतिक आवास में खदेड़ दिया जाए जहां इसका प्राकृतिक भोजन मौजूद हैं, तो इस एक बाघ का जीवन सुरक्षित हो सकता है। और इसके द्वारा खीरी-पीलीभीत के जंगलों में बाघों की प्रजाति में बढ़ोत्तरी की संभावनाओं से नकारा नही जा सकता।

खीरी-पीलीभीत के मध्य मौजूद बचे हुए छोटे-छोटे जंगल शाकाहारी व मांसाहारी जीवों से विहीन हो चुके हैं नतीजतन इस बाघ को मानव आबादी के निकट मवेशियों से अपने भोजन की पूर्ति करना संभावित व जरूरी हो जाता है। फ़िर बाघ के लिए घास के मैदान व गन्ने के खेतो में कोई फ़र्क नही। 

वन्य जीव प्रेमियों, व संस्थाओं को इन इलाकों में जागरूकता अभियान चलाकर बाघ के महत्व व उसके द्वारा मारे गये मवेशियों के लिए मुवाबजे आदि के सन्दर्भ में सूचित करना चाहिए, ताकि बाघ अपने द्वारा मारे गये शिकार से भोजन प्राप्त कर सके। यदि ग्रामीण उसे बार बार उसके शिकार से खदेड़ते है तो यकीनन वह जल्द ही दूसरा शिकार करेगा! 
फ़ोटो साभार: सतपाल सिंह
मौजूदा समय में बरवर कस्बें के निकट गोमती नदी की तलहटी में बाघ की मौजूदगी बताई जा रही है, जहाँ के घास के मैदानों व झाड़ियों में इस बाघ का प्राकृतिक शिकार सुअर, हिरन आदि मौजूद होने की बात कही जा रही हैं।
इस बाघ की निगरानी व इसकी मौजूदगी वाले इलाके में लोगों को जागरूक कर इसे एक मौका दिया जा सकता है, ताकि यह जंगल में दाखिल हो सके! अन्यथा इसे पकड़ न पाने की स्थिति में और राजनैतिक दबाओं के चलते इसे शूट करने का आदेश निर्गत होने में देर नही होगी। यदि इसे पकड़ने में सफ़लता मिल भी गयी  तो ये किसी नुमाइशघर का एक आइटम बन कर रह जायेगा।








Sep 27, 2010

विश्व बाघ दिवस - बाघों की दिवंगत आत्माओं को अश्रुपूरित श्रद्धांजली

अरूणेश सी दवे* विश्व बाघ दिवस- एक और कवायद? अपने राष्ट्रीय पशु को बचाने की!



फोटो साभार: सीज़र सेनगुप्त
आज २६ दिसम्बर को विश्व बाघ दिवस के अवसर पर मैं उन सभी बाघो को और उनके वंशजो को जो कि कभी पैदा ही नही हो पाये अश्रुपूरित श्रद्धांजली अर्पित करना चाहता हूँ । १९वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में कहा जाता रहा है, कि इस देश में एक लाख बाघ थे, हालांकि यह संख्या एक अनुमान पर आधारित है, लेकिन फ़िर भी यदि इसे सत्य मान लिया जाय तो आज हम इसकी महज एक प्रतिशत आबादी को ही बचा पाये है! आइये इस हालत की कुछ विवेचना करे ।

इस देश मे अंग्रेजों के आगमन के साथ ही बाघो का अंतिम काल शुरू हो गया था । आज उपलब्ध तत्कालीन पुस्तकों पर नजर डाले तो तकरीबन  उस दौर की हर किताब मे जिनका शीर्षक अक्सर " Indian game and sports " हुआ करता था उन्होने जो सबसे बड़ा कारण या बहाना बाघों के शिकार का दिया था, वह यह था कि बाघ भारतीयो के जीवन और पशुओं के लिये गंभीर खतरा थे। उन्होंने बाघों का शिकार करके भारतीयों पर एहसान किया था ।
 मेरा ऐसा खयाल है, कि अधिकांश भारतीय तो छोड़िये अधिकांश बाघ प्रेमी भी इस बात से अंजान होंगे की उस समय बाघों के शिकार के लिये अंग्रेज सरकार पैसे भी देती थी और साइमन ने उस समय अपनी किताब "MY DAYS AS WILD SPORTS AGENT IN INDIA " मे लिखा है, कि यदि आप भारत शिकार मे आने पर हिचकिचा रहे है, तो मै आपको बता दूं कि आपके खर्चे का आधा सरकार देगी ।

इसके अलावा आप आज ये विश्वास भी नही कर सकते की इसी भारत की सरजमी पर एक " TIGER SLAYER CLUB " था और एक किताब भी छ्पी है " TOP TIGER SLAYERS OF INDIA "  और इस खिताब के विजेता थे महाराजा सरगुजा ( सरगुजा छ्त्तीसगढ़ मे है )  जिन्होंने अपने जीवन काल मे १५०० बाघो का शिकार किया था और यह संख्या प्रमाणित है क्योंकि तत्कालीन ब्रिटिश वायसराय कॊ उनकी कुछ खालें भेट की गई थी ।


इसके अलावा आजादी के बाद भी जो होता आया है वह भी आपके सामने ही है। सबसे बड़ी बात यह है ,कि बाघों को बचाने से मतलब यह नही है, कि हम एहसान कर रहे हैं, बल्कि हमारा अस्तित्व भी उनसे जुड़ा हुआ है मेरे अनेक मित्र मुझसे पूछते हैं, कि भाई हमारा और बाघ का सिवाय एक प्रतीक के क्या संबंध है, और कुछ कहते हैं, कि भाई जीवों का आना जाना तो लगा ही रहता है । बात भी ठीक है और आज हम देश की आम जनता को बाघ और वन का महत्व और पर्यावरण से उनके अस्तित्व का संबंध समझाने मे असमर्थ रहे है, और हम खुद भी उन बाघो के प्राकृतिक आवासों के नष्ट होने के बाद उनको बचाने के अजीब से आंदोलन मे जुटे हुए है । हम से मेरा तात्पर्य उन सब भाई बहनों से है, जो तन मन धन से इस कार्य मे लगे हुये है, लेकिन सिवाय कुछ छोटी लड़ाइयों के अधिकांशतः हमारी हार ही हुई  है ।
आज हमारी हालत  इस मामले में  पाकिस्तान की तरह है जहां हर एक एजेंसी काम कर रही है पर पूरा देश असफ़ल है ।

आज देश मे केवल 1400 बाघ बचे हुए हैं! और इसका एकमात्र कारण शिकार नही है, मूल कारण यह है, कि उनकी भोजन श्रंखला मे आयी भारी कमी। यह कमी इसलिये आयी कि जहां एक ओर प्राकृतिक वन को इमारती लकड़ी के वनों में बदल दिया गया वहीं दूसरी ओर वनवासियों की प्राकृतिक जीवन शैली को भी बदल दिया गया है । देखिये बाघों एवं अन्य वन्यप्राणियों का और वनवासियों और उनकी जीवन शैली तथा वनस्पतियों का विकास लाखो वर्षों के विकासक्रम मे एक साथ हुआ था। इसमें से किसी एक घटक के साथ की गयी छेड़छाड़ का नतीजा तो बाकियों पर भी पड़ना निश्चित था फ़िर हमने तो सभी घटको के साथ जो किया है, उसके कुछ परिणाम तो सामने है कुछ आने अभी बाकी है ।


आज बाघों के चंद बचे पर्यावासों पर भी लौह माफ़ियाओं की नजर गड़ी हुई है, ऐसे में सिवाय उनको श्रद्धांजली देने कोई और चारा नजर नही आता है । और ऐसे में हमारे बेहद ईमानदार और कर्मठ वनाधिकारी भी प्रतिदिन भगवान से यही दुआ मांगते हैं, कि हे प्रभु और हमारे चोर-शिकारियों को इतनी शक्ति दो, कि जल्द से जल्द बाघों की इस बची खुची आबादी को भी निपटा दें, क्योंकि जब तक एक भी बाघ जीवित रहेगा ये शेहला मसूद जैसे वन्यजीव कार्यकर्ता हमारा जीना हराम करते रहेंगे । 


अरुणेश सी दवे*  (लेखक छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में रहते है, पेशे से प्लाईवुड व्यवसायी है, प्लाई वुड टेक्नालोजी में इंडियन रिसर्च इंस्टीट्यूट से डिप्लोमा। जंगलवासियों की संस्कृति का दस्तावेज तैयार करने की अनूठी पहल, वन्य् जीवों व जंगलों से लगाव है, स्वतंत्रता सेनानी परिवार से ताल्लुक, मूलत: गाँधी और जिन्ना की सरजमीं से संबध रखते हैं। सामाजिक सरोकार के प्रति सजगता,  इनसे aruneshd3@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।) 

Sep 26, 2010

शाहजहाँपुर में बाघ ने किया हमला!

फ़ोटो साभार: सीजर सेनगुप्त
शाहजहाँपुर वन प्रभाग के खुटार रेन्ज में शनिवार को आदमखोर घोषित बाघ ने हाथी पर हमला बोला:
बाघ को ट्रैंकुलाइज़ न कर पाने की विफ़लता, व अनियोजित प्रयासों के चलते एक बाघ को विवश किया जा रहा है, आदमखोर होने के लिए! न तो उसे जंगल में घुसने दिया जा रहा है, और न ही उस पकड़ कर चिड़ियाघर भेज पा रहा हैं हमारा इन्तजामिया, नतीजा हमारे समक्ष है, देखिए आगेआगे होता है, क्या? क्या ये सुन्दर बाघ भी विभागीय असफ़लताओं के चलते आखिर में किसी सरकारी शूटर का शिकार बन दिया जायेगा!

यह घटना उस वक्त हुई जब गोमती नदी के किनारे गन्ने के खेत में बाघ को ट्रैंकुलाइज करने के लिए चारों ओर से घेरा गया था। जब काबिंग में लगे हाथी ने बाघ को पैर और सूड़ से दबा लिया बाघ ने अपने को चुगंल से छुड़ाने के लिए हाथी के कान पा पंजा मारकर जख्मी कर दिया। हाथी का दबाव कम होते ही बाघ गन्ने के खेत में जाकर छिप गया।

आपको बता दें कि तीन माह से वन विभाग के लिए सिरदर्द बनें इस बाघ को दो बार ट्रैंकुलाइज करने की असफल कोशि्श हो चुकी है, लेकिन टीम को अभी तक सफलता नही मिल पाई है। इस बाघ ने अन्तिम मानव शिकार 26 अगस्त को किया था।

उसके बाद दर्जनों गाँवों के किनारे से होता हुआ यह अपने मूल क्षेत्र दियुरियाँ जंगल में वापस जाने के लिए लगातार खुटार रेन्ज की सीमा पर भटक रहा है। लेकिन चौकसी के कारण वापस नही जा सका है।

यदि एक बार आदमखोर घोषित इस बाघ को अपने प्राकृतिकवास में जाने दिया गया तो यह इस वन्य जीव के साथ प्राकृतिक न्याय होगा।

सुनील निगम ( लेखक दैनिक जागरण में मैलानी में संवाददाता, वाइल्ड लाइफ़ जर्नलिज्म के क्षेत्र में विशेषज्ञता, इनसे suniljagaran100@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं)


बस अब बन्द करो ये तमाशा!

ऐसे ही बनते हैं आदमखोर!
यदि ये तेन्दुआ मवेशियों और इन्सानों को मारना शुरू करता है तो इसका जिम्मेदार कौन?
सुनील निगम* 31 जुलाई 2010 को दुधवा नेशनल पार्क के किशनपुर वन्यजीव विहार से निकलकर गन्ने के खेत की ओर विचरण पर जा रहा जो तेन्दुआ शिकारियों द्वारा लगाये गये खुड़के में फँसकर गंभीर रूप से घायल हो गया था, उसे बगैर पूर्ण स्वस्थ हुए बिना जंगल में ले जाकर मुक्त कर देने से वन्यजीव विहार वनक्षेत्र के  समीपवर्ती गाँवों के लिए गम्भीर खतरा बन गया है।

इसका उदाहरण उस वक्त मिला जब तीन सप्ताह पूर्व यह घायल तेन्दुआ लँगड़ाता हुआ महराजनगर गाँव के निवासी राधेश्याम के घर की दलान में आ गया। यह गनीमत रही कि ग्रामीणों द्वारा शोर मचाने पर वह अगले पैर से लँगड़ाता हुआ जंगल में वापस चला गया। अब सवाल यह है कि घायलावस्था में फन्दे से मुक्त कराये गये तेन्दुए को बगैर पूर्ण स्वस्थ हुए किया जंगल में छोड़ देना कहाँ तक उचित था ? इस बावत पार्क प्रशासन का दावा है कि जिस वक्त तेन्दुए को जंगल में मध्य रात्रि छोड़ा गया, वह स्वस्थ और पैर से ठीक चल रहा था। लेकिन यह बात समझ से परे है कि जिस तेन्दुए के पंजे को खुड़के से बमुश्किल मुक्त कराया गया और वह घाव से कराह रहा था, क्या वह मात्र 10-12 घन्टों में ही स्वस्थ हो गया होगा?

अगर यह घायल तेन्दुआ आसान वन्यजीव शिकार कर पाने में भी कभी अक्षम हुआ तो फिर कभी वह मानव को अपना निवाला बनाने की कोशिश भी कर सकता है। क्योंकि तेन्दुआ यदि जिस किसी को अपना लक्ष्य बना ले उसे हर कीमत पर निवाला बनाकर ही दम लेता है। कहने का तात्पर्य यह है कि घायल तेन्दुए को जंगल में छोड़ना एक प्रकार से आदमखोर बनने का विकल्प देने के समान है। 

(सुनील निगम दैनिक जागरण बरेली के मैलानी क्षेत्र के संवादाता हैं, लखीमपुर खीरी जनपद के मैलानी  कस्बे (निकट किशनपुर वन्य जीव विहार) में रहते है, जो चारो तरफ़ से शाखू के जंगलों से घिरा हुआ है, यह जगह ब्रिटिश इंडिया में रेलवे व टिम्बर व्यवसाय में प्रमुख स्थान रखती थी, और इस नगर से शाहंजहांपुर, पीली्भीत जनपदों की सरहदे लहराती हुई स्पर्श करती हैं। इनसे suniljagran100@gmail.com  पर संपर्क कर सकते हैं।)

Sep 25, 2010

रेडियों में "दुधवा लाइव ई-पत्रिका"

रेडियों में दुधवा लाइव ई-पत्रिका:
दुधवा लाइव ई-पत्रिका द्वारा चलाये गये जन-अभियानों, और सूचनाओं का जिक्र आकाशवाणी में किया गया, जिसके अंश हम यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं।


विविध भारती के "जिज्ञासा" कार्यक्रम में दुधवा लाइव: 


शनिवार २२ मई २०१० की शाम सात पैतालिस व रविवार २३ मई २०१० की सुबह सवा नौ बजे, भारत की सार्वजनिक क्षेत्र के रेडियो चैनल आकाशवाणी के मशहूर कार्यक्रम विविध भारती में दुधवा लाइव ई-पत्रिका के एक लेख का जिक्र किया गया। यह लेख था  "विश्व प्रवासी पक्षी दिवस- एक अदभुत यात्रा की दुखद कहानियां!"
विविध भारती के उदघोषक श्री यूनुस ने बड़े विस्तार से इस लेख को उदघोषित किया, यकीनन इस कार्यक्रम के माध्यम से दुधवा लाइव पत्रिका की पर्यावरण और वन्य-जीव सरंक्षण की मुहिम को ताकत हासिल हुई है।

आकाशवाणी समाचार में दुधवा लाइव:

दुधवा लाइव अपने गौरैया बचाओ जन-अभियान में पहली बार आकाशवाणी गोरखपुर से ब्राडकास्ट हुआ, यह तारीख थी २० मार्च २०१० और वक्त था सुबह का सात बजकर बीस मिनट।





दुधवा लाइव डेस्क

सुर्खियों में "दुधवा लाइव ई-पत्रिका"

सुर्खियों में दुधवा लाइव:





"इन्टरनेट के इतिहास में वन्य जीवन व पर्यावरण के मसलों पर आधारित हिन्दी की प्रथम ई-पत्रिका होने का गौरव प्राप्त कर चुकी दुधवा लाईव वेबसाइट के कन्टेन्ट विभिन्न प्रतिष्ठित अखबारों व पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं, जो कि हमारी बात को आम-जनमानस के मध्य प्रसारित व स्थापित करने में अपना अमूल्य योगदान दे रहे हैं। हम उन सभी अखबारों व पत्रिकाओं का आभार व्यक्त करते हुए, उनकी कतरनों को आप के सम्मुख प्रस्तुत कर रहे हैं, आशा हैं आप सब हमें अपने विचारों से अवश्य अनुग्रहीत करेंगें।"



मॉडरेटर

Tiger ! Tiger !


Dr. Caesar Sengupta* “Good night” – Amit said. I looked at my watch. It was 2 am. I set the alarm at 5 am. Was feeling thirsty… finished the water left in the bottle and I switched off the light….

Silence… ! not pindrop though – some insect was making a screeching noise somewhere. Amit must have been fast asleep. Wasn’t feeling sleepy though… closed my eyes and tried to sleep… felt irritated … what a rush !

Tried to close my eyes again but sleeping seemed to be a remote possibility. Recalled the last evening rush hour … I had probably faced traffic like this for the first time in my seven years in Mumbai. Had started off from home by 3:30 pm and it was 7:30 pm when I realized that I was still stuck in the traffic and I had missed the flight.

Tried to sleep again – Ah ! Recalled a few mails received during the day, which couldn’t be answered easily before the weekend was over! … a flow of passing thoughts … closed my eyes tight in a desperate attempt to sleep – it must be 2:30 am. Remembered Kavita was upset for no reasons when I left… Oh God ! It was really difficult to sleep. I am just left with one and half day to explore the forest of Tadoba and I wasn’t sure whether I’ll get up tomorrow morning or not.

I don’t remember when I slept - but the old habit got me awake by 5 am sharp. The jeep was ready. Manish greeted “Good morning”. I must say, the morning was refreshing enough to make me forget everything back home.

Tadoba Andhari Tiger Reserve, “the jewel of Vidharva” - is Maharashtra’s oldest Tiger reserve. Tadoba was established in 1935 and was declared a National Park in 1955. Andhari Wildlife sanctuary was notified in 1986 and the Park and the sanctuary was unified in 1995 to declare it as Tadoba Andhari Tiger Reserve (TATR). It is one of the 28 Project Tiger Reserves of the country and is one of the best of these 28.

TATR till date is less known amongst the tourist; least commercialized and thus maintains the pristine eco-system of the rich bio-diversity of the forest. Apart from Tiger, Leopard, Gaur and Sloth Bear, the forest hosts a number of other mammals which are uncommon to be seen in other forests – viz.  Rusty Spotted Cat, Ratel, Indian mouse deer, Spotted deer, Sambar, Wild Boar, Four horned antelope and Wild dogs. Not only mammals – there are 195 species of birds identified in the Park and it is a heaven for the avid bird watcher. Grey headed fishing eagle and Crested Serpent Eagle are two of the most well known raptors of the forest. Seventy four species of also make the Park rich in entomological resources. Reptilian fauna is no less. Tadoba lake harbors quite a number of crocodiles. Also found are Indian Python, common Indian monitor and the poisonous Russel’s viper.     


The Park is situated in the Moharli hills of West Chandrapur district of Maharashtra. It is 623 km² in area, the biggest amongst all Naional Parks in Maharashtra. On north and western boundaries of the forest are hills with dense forest. To the southwest is a huge lake.

It is a southern tropical dry deciduous forest with Teak as predominant species. The bamboo forest defines the typical tiger territories. This is one Tiger Reserve in the country which is open throughout the year. Summer is the best season to visit the park as the wildlife remains around the sources of water. However, Tadoba has its unique charm of Tiger in the rains !!! Immediately after the monsoon, the grass is green and sighting a tiger with a green background is a photographic delight to the wildlife photographer. The Park remains closed on every Tuesday.


The name Tadoba comes from ‘Taru’, the local God and Andhari gets its name from Andhari river which flows through it. Legends say that Taru was a village chief who was killed in a legendary battle with a tiger. A shrine dedicated to Taru still exists near the Tadoba lake. Local villagers are mainly Gond tribals – they speak Marathi and Gondi.
 
We were left with three safaris only and I had kept my fingers crossed for at least a glimpse of the tiger …

Safari 1:

We planned to explore the Moharli region for some time. The jeep kept moving back and forth round the same location. “The cubs were spotted here last evening” – our guide said. One unique thing to be noted while visiting a Tiger reserve immediately after the rains is – you don’t get to hear ‘alarm calls’. Normally in forest, when the Tiger moves, deer and monkeys start making alarm calls. That’s the most convenient way to spot a tiger. But immediately after the rains, the grasses are thick and long. The beast remains completely hidden and the slightest movements go un noticed and hence spotting a tiger cannot be done using alarm calls. When we didn’t spot one for 1 hour… we thought of moving to Tadoba gate and suddenly … Amit said –“Leopard”! Our first subject for the day – clicked a dozen photograph may be – the light condition wasn’t very favorable though… my first photo of a leopard in the wild … even Amit’s. Next few hours were uneventful. While coming back, I tried my new 400 mm f / 5.6 handheld on a Sambar around 70 feet away and I was so happy to see the results.

Safari 2:

The evening safari was again in Moharli to begin with. Saw a vehicle stopping ahead. They were pointing towards a small stream. I couldn’t see anything as we reached. Guide said – “they must be around”. Within no time – we saw the male tiger coming out of the forest to the main road – Yeda Anna !! The famous male tiger of Tadoba. Anna posed for my camera for a few moments but he was keener on showing his back to me. Soon we could spot the cubs. One – two – three – oh ! there were four of them… playing around… they crossed the road. Unbelievable … there were hardly three vehicles and four tigers. They came close, posed, played around… for more than 40 minutes. I kept changing lenses, kept doing experiments … I said – Oh God ! This is heaven !

Safari 3:
“Thoda aur wish karo” – Amit said. I was hoping – if only I could get a photograph of a tiger in water. I regret I should have wished more. All four cubs again. They were so playful – so lively. There was a small water body… all the cubs kept playing and splashing water. I had no use of my 400 mm there. Had to change to 18 – 55 mm to capture the entire action sequence… one of the memorable moments of my wildlife experience.

Tadoba gave more than I expected. Much more. I fell in love with the forest… came back with wonderful memories of the lovely, cute Moharli cubs …

Facts and figures


Langoor        2770
Spotted Deer        2039
Wild Dog        1758
Indian Bison        1052
Sambar        669
Barking Deer        512
Blue Bull        228
Wild Boar        195
Mongoose        184
Sloth Bear        165
Four-hornedAntelope    145
Jackal            79
Jungle Cat        44
Tiger            43
Porcupine        22
Leopard        15
Hyena            5
Indian Pangolin    2
Ratel            1

How to reach Tadoba

Nearest Airport – Nagpur, Maharashtra
Nearest Railway Station – Chandrapur, Maharashtra
Accommodation – MTDC resort
Contact person – Manish Varma – 08055920303

Text & Photographs:
Dr. Caesar Sengupta M.D.
General Manager,
Thyrocare Technologies Ltd
205-B, Israni Towers, Sector - 15, CBD Belapur, Navi Mumbai 400614
workcaesar@gmail.com

Sep 24, 2010

भाई हम तो द्विभाषिए हो चले!

हम द्वि-भाषिए होने की तरफ़ रूख कर रहें हैं:
क्या ये आप को पसन्द आयेगा:
 साथ में
दुधवा लाइव ई-पत्रिका का संक्षिप्त यात्रा वृतान्त

हम आप को बताना चाहते हैं, कि वन्य जीवन व पर्यावरण में हिन्दी की प्रथम ई-पत्रिका "दुधवा लाइव" (Founded January 2010) http://dudhwalive.com अब द्विभाषी होने की तरफ़ रूख कर रही है, इसके पीछे कुछ मलाल भी हैं और खुशी भी, वन्य जीवन की विधा में हिन्दी वालों की अनुपलब्धता, और अंग्रेजी का एकाधिकार! हमने तमाम प्रयासों के बावजूद अनुवाद का सहारा लेते हुए इसे प्रमुखता से पूर्ण रूप से हिन्दी को समर्पित किया है, परन्तु कन्टेन्ट की कमी, और अनुवाद का किरकिरापन हमें इसे द्विभाषी करने पर मज़बूर कर रहा है। इसका एक फ़ायदा अवश्य दिखाई दे रहा है, हम अपनी और अपने देश की बात इस वर्चुअल माध्यम से दुनिया के पटल पर जोरदार ढ़ग से रख सकेंगे। फ़िर हमारा आप सभी से अनुरोध है, कि वन्य जीवन व पर्यावरण की बात हम मुख्यत: अपनी ही भाषा में करे, इसके लिए हमें आप का सहयोग चाहिए।

हमने हिन्दुस्तान और दुनिया के तमाम प्रतिष्ठित लोगों से मशविरा किया, जिन्होंने वन्य जीव सरंक्षण में महारथ हासिल की है, इस सन्दर्भ में आई एफ़ एस और वन्य जीव फ़ोटोग्राफ़र व भारत सरकार के कई व्यक्तियों से सलाह ली कि आखिर दुधवा लाइव को हिन्दी के पथ पर ही अग्रसर करे या कोई अन्य विकल्प का सहारा लिया जाए। जो नतीजे मोबाइल मैसेज व फ़ोन द्वारा प्राप्त हुए, वो जरूर चौकाने वाले थे, किन्तु तर्क वाजिब था, कि वन्य जीवन पर हिन्दी में मटेरियल की कमी, आम आदमी का इस विधा से महरूम होना, और हिन्दी भाषी लोगों की अभी भी कम्प्यूटर व इन्टरनेट से दूरी!
उनके कान अभी भी इसी का हुक्म मानते हैं!

जो सबसे अहम बात है कि हमारे देश में जिनके हाथों में सत्ता है, जो पॉलिशियां बनाते है, उन्हे या तो हिन्दी आती नही, और आती भी है, तो वह हिन्दी पढ़ना या लिखना नही चाहते! अफ़ासोस कि इस मुल्क  का सरबरा ही हिन्दी नही जानता! अब ऐसे में अगर हमें अपनी बात उन कानों तक पहुंचानी हों जों अंग्रेजी सुनने के आदी हो चुके हैं या गुलाम! ...इस भाषा का अभी भी इस मुल्क में कॉलोनियल दौर का प्रभाव लोगों के दिमाग पर बाकी है, सो वे इसी की सुनते और मानते हैं! अब ऐसे में ये दुधवा लाइव टाइगर, और चीते की बात हिन्दी में करे तो भला कौन सुनेगा, फ़िर वो सुने भी क्यों, कि इस विधा में सरकार और कथित वन्य जीव सरंक्षक व शोधार्थियों को मिलने वाला पैसा भी उसी जमीन और उसी जबान के मालिकों द्वारा मिलता है, जो अंग्रेजी बोलते हैं! इस खैरात की खाने वाले तो अपने माथे उन्ही जबान वालों के सामने झुकायेंगे जो इन्हे पैसा देते हैं इनके तमाम किमियागिरी के उपकरण, जीप, और खाना उन्ही पैसो से पूरा पड़ता हैं।

अंग्रेजी एक महत्वपूर्ण भाषा है, कदाचित इसके गौरव को दुनिया का कोई शख्स आँख नही दिखा सकता है, क्योंकि कभी इस भाषा के लोगों ने पूरी दुनिया पर राज ही नही किया बल्कि उस भू-भाग के सारे ज्ञान को निचोड़ कर अपनी भाषा में संकलित किया, आज हमे अपना इतिहास, भूगोल, विज्ञान, साहित्य सभी कुछ उनकी लाइब्रेरियों में तलाशना पड़ता है। ये विडंबना है कि हमने अपनी जबान को ही संमृद्ध नही बनाया, नतीजे हमारे सामने है, शुक्र है गूगल या अन्य कम्पनियों का जो मुफ़्त का स्थान देकर हिन्दी के उन्न्ययन ने में अप्रत्यक्ष रूप से हमारी मदद कर रही है, आज ब्लॉग के माध्यम से हमारी भाषा का गर्त में पड़ा ज्ञान हमारे लोगों के समक्ष है!

दुधवा लाइव को इनसे मिला प्रोत्साहन

बात बढ़ रही है, इस विषय पर तस्किरा कभी और! हाँ दुधवा लाइव के इस प्रयास को वन-अधिकारियों से लेकर हिन्दी के प्रतिष्ठित साहित्यकारों ने सराहा! इस फ़ेहरिस्त में  डॉ० राजेश गोपाल (IGF) इन्स्पेक्टर जनरल ऑफ़ फ़ॉरेस्ट्स भारत सरकार, श्री क़मर क़ुरेशी वैज्ञानिक (WII) वन्य जीव संस्थान देहरादून भारत, वन्य जीव फ़ोटोग्राफ़र व सेन्ट्रल ज़ू ऍथार्टी से सम्बद्ध श्री हिमांशु जी, गोरखपुर में चीफ़ कन्जर्वेटर श्री एम०पी० सिंह जी, दुधवा के पूर्व डाइरेक्टर श्री जी०सी० मिश्र जी, वाइल्ड लाइफ़ प्रोटेक्शन सोसॉइटी की निदेशिका व बाघ सरंक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली बेलिन्डा राइट, ने दुधवा लाइव के प्रयासों की प्रशंसा की व भविष्य में आशिर्वाद व मार्गदर्शन का वायदा किया है।

 NDTV में कार्यरत एंव पत्रकारिता जगत में भारत में एक जानी मानी शख्सियत श्री रवीश कुमार जी ने दुधवा लाइव को हिन्दुस्तान में अपने गेस्ट कॉलम में जगह देकर हिन्दी भाषी क्षेत्र में चर्चित कर दिया।  , अन्तर्जाल पर स्थापित हिन्दी के पुराधाओं में छत्तीसगढ़ में रहने वाले समाजसेवी व साहित्यकार श्री शरद कोकास ब्लॉग महागुरू श्री बी० एस० पाबला जीहिन्दी मीडिया डॉट इन की निदेशिका शिवानी जी ने दुधवा लाइव के सन्दर्भ में लिखा "प्रकृति से इंसानियत को जोड़ने वाली एक शानदार साईट", छत्तीसगढ़ रायपुर से प्रकाशित हो रही पत्रिका उदन्ती की संपादिका डॉ० रत्ना वर्मा जी, मुम्बई से मैग्ना प्रकाशन द्वारा प्रकाशित डिग्निटी डॉयलाग की सहसंपादिका मीनू जैन जी का सुन्दर व सार्थक सहयोग प्राप्त हुआ।

ब्लॉग बोले:
 साइन्स ब्लागर्स एसोशिएसन के लेखक सलीम खान ने लिखा दुधवा लाइव की गौरया सरंक्षण की मुहिम पर पूरा एक लेख प्रस्तुत कर डाला।
परपंच ब्लॉग के आबिद रज़ा ने दुधवा लाइव की बातों को अपने पन्नों पर कुछ ऐसे लिखा "आओ बचाये इन नन्ही जानों को।"

गौरैया अभियान से जुड़ी कुछ प्रमुख खबरे:

दैनिक जागरण ने गौरैया बचाने के हमारी मुहिम को कुछ इस तरह प्रस्तुत किया।

उदन्ती पत्रिका ने गौरैया के लिए दुधवा लाइव के प्रयासों को अपने पन्नों पर जगह दी।
हिन्दुस्तान में संपादकीय पृष्ठ पर रवीश कुमार जी ने कहा कि "गौरैया के बिना सूना घर आंगन"

दुधवा लाइव के कलमकार व सहयोगी:
हम सब चल रहे हैं एक साथ

हमारे लेखकों में अरूणेश दवे रायपुर छत्तीसगढ़,  देवेन्द्र प्रकाश मिश्र पलिया खी्री, डॉ० प्रमोद पाटिल महाराष्ट्र, आदित्य रॉय अहमदाबाद गुजरात, सलीम गुलरिया बिजुआ खीरी, धीरज वशिष्ठ नई दिल्ली, फ़िल डेविस ग्रेट ब्रिटेन, धर्मेन्द्र खण्डाल रणथम्बौर राजस्थान, कैप्टन सुरेश सी शर्मा नई दिल्ली, सीजर सेनगुप्त मुम्बई, सुशान्त झा (जर्नलिस्ट) रिषि रंजन काला (आज तक टुडे) नई दिल्ली, डॉ मैरी मुलर (Marie Muller) सॉओ पॉलो ब्राजील, हिन्दी के कथाकार डॉ० देवेन्द्र लखीमपुर, विवेक सेंगर (ब्यूरो हिन्दुस्तान दैनिक खीरी), प्रशान्त पाण्डेय(ब्यूरो ई०टीवी० खीरी) , सुबोध पाण्डेय(हिन्दुस्तान दैनिक), गंगेश उपाध्याय(हिन्दुस्तान दैनिक), मनोज शर्मा,(लाइव इंडिया), महबूब आलम पलिया, रिषभ त्यागी  (ब्यूरो राष्ट्रीय सहारा), श्यामजी अग्निहोत्री (ब्यूरो सहारा समय), विजय मिश्रा( राष्ट्रीय सहारा), मनोज मिश्र (ब्यूरो दैनिक जागरण खीरी) पूर्णेश वर्मा (दैनिक जागरण खीरी),  ब्रजेश द्विवेदी (दैनिक जागरण शाहजहाँपुर) मयंक बाजपेयी (हिन्दुस्तान  दैनिक)  सर्वेश कटियार (हिन्दुस्तान दैनिक मितौली), राजन शुक्ला (अमर उजाला मितौली) एस पी सिंह (राष्ट्रीय सहारा मितौली) रमेश शुक्ल (दैनिक जागरण कस्ता), अमित बाजपेयी (हिन्दुस्तान दैनिक कस्ता), सतपाल सिंह वाइल्ड लाइफ़ फ़ोटोग्राफ़र मोहम्मदी खीरी, रागिनी रोजी रोटी संस्था लखीमपुर, रामेन्द्र जनवार समाज सेवी/लेखक,  आशीष त्रिपाठी (ब्यूरो हिन्दुस्तान मुरादाबाद),  चारू चंचल शोध छात्रा लखीमपुर,  रेखा सिन्हा राष्ट्रीय सहारा लखनऊ, डॉ सत्येन्द्र दुबे प्रवक्ता युवराज दत्त महाविद्यालय लखीमपुर, अमित गुप्ता मितौली समाजसेवी, उमेश श्रीवास्तव धौरहरा खीरी के अलावा हमारे स्थानीय मित्रों ने अपने विचारों को लेखों के माध्यम से हमारे साथ साझेदारी की।  पत्रकार व वन्य जीव प्रेमियों की लम्बी फ़ेहरिस्त हैं जिन्होंने दुधवा लाइव का सहयोग व पथ-प्रदर्शन कर रहे हैं, हम उनके सदैव आभारी हैं।

 सूचना प्रसार के प्रमुख माध्यमों का योगदान

हिन्दी के प्रमुख अखबारों, हिन्दुस्तान, अमर उजाला, डेली न्यूज एक्टीविस्ट, दैनिक जागरण, प्रभात खबर, जनसत्ता, राष्ट्रीय सहारा के अतिरिक्त आकाशवाणी व इलेक्ट्रानिक मीडिया चैनल्स ने दुधवा लाइव को प्रमुखता से प्रकाशित/प्रसारित कर वन्य जीवन के महत्व तक जन जन तक पहुंचानें में हमारी निरन्तर मदद कर रहे हैं। भारत में जल संपदा पर जागरूकता फ़ैलाने का भागीरथी प्रयास कर रहा  इंडिया वाटर पोर्टल ने दुधवा लाइव को अपने पृष्ठों पर विशेष स्थान दिया है। मराठी अखबार लोकप्रभा ने अपने पन्नों पर दुधवा लाइव व उसके लेखों को जगह दी, साथ ही, सीतापुर के आई टी के छात्रों ने सीतापुर येलोपेजेज डॉट कॉम के शीर्ष पर दुधवा लाइव को स्थान प्रदत्त किया। इसके अतिरिक्त कई विदेशी अंग्रेजी बेवसाइट व ग्रुप्स ने दुधवा लाइव के कन्टेन्ट्स का अनुवाद किया गया व वेबपेजेज पर उस महत्व पूर्ण जानकारी का प्रदर्शन भी किया।

रेडियो में दुधवा लाइव का प्रसारण  


आकाशवाणी गोरखपुर ने दुधवा लाइव द्वारा चलाये गये "गौरैया बचाओ जन-अभियान को प्रमुखता से अपने समाचारों में पेश किया।



विभिन्न टी वी चैनल्स ने दुधवा लाइव ई-पत्रिका द्वारा चलाई गयी मुहिमों को प्रसारित कर हमारे प्रयासों को सार्थकता प्रदान की।
दुधवा लाइव ई-पत्रिका के प्रकाशित लेख व जिक्र को आप नुकूश-ए-कतरन ब्लॉग पर देख सकते हैं!
भाषा की समृद्धता पर टिकी हैं हमारी निगाहें:

हम भाषा के आलोचक नही है, दुनिया की तमाम भाषाओं और बोलियों में ज्ञान के अथाह भण्डार है और हम जरूरत के मुताबिक उस भाषा को सीखते व समझते है, पर यदि हम अपनी ही भाषा में संसार का न सही अपना ही ज्ञान समेट ले तो आने वाली पीढ़ियों को अपने ही ज्ञान के लिए कैम्ब्रिज या आक्सफ़ोर्ड के पुस्तकालय नही खंगालने पड़ेगें! 
दुधवा लाइव अब नये रूप में आप सभी को हिन्दी के साथ अंग्रेजी लेखों का प्रकाशन करेगी, ताकि अंग्रेजी भाषी लोगों व उनके पास मौजूद जानकारियों को हम अपने डोमेन में समेट सके! यह हमारी विवशता नही, आवश्यकता है! 
हम अपनी बोली और अपनी भाषा में अपने आस-पास की जानकारियों का संकलन करने के लिए प्रतिबद्ध रहेंगे, बशर्ते आप सभी का स्नेह व सहयोग प्राप्त होता रहे।

आप सभी के विचार आमन्त्रित हैं!

धन्यवाद
सस्नेह
मॉडरेटर
दुधवा लाइव ई-पत्रिका
http://dudhwalive.com
 

Sep 22, 2010

Wild tales of Dudhwa, Bandhavgarh and Ranthambhore

 TRIP TO DUDHWA, BANDHAVGARH AND RANTHAMBHORE 2010.

We departed for India on May 20th,travelling with me on this trip was Mandy Lockwood, from Leicester also, who is keen to learn more about our work , see Tigers in the wild and see how her donation is utilised. We departed Heathrow, London at 21.45pm, landing in Delhi at 09.55 hrs (IST).We collected our luggage and cleared customs, then we changed our currency into rupees, once having done this, I called a friend of mine Amit Khandewal, he lives in Gurgaon and he was to collect us. We met outside around 12.40, spending the afternoon at his flat. The weather was very hot, with the temperature around 47 degrees. We then went for a meal around 19.00hrs before we had to be at the station for  our train that was due to depart for Shahjehanpur at 22.10.We thanked Amit for looking after us ,our train departed on time and was due to arrive in Shajehanpur at 04.00,we arrived eventually at 05.20 and was met by one of Vision India members in a taxi.
We then departed for Dudhwa  in the taxi, we had one stop on the way, the journey took us around 2.5 hours. We were to stay the first night at a hotel called TIGER DEN, a government run hotel, which had some amenities, it is basic with fans, some a/c. It is situated about 10 minutes walk from Vision Indias base area, 20 minute drive from the Dudhwa National Park itself. We met Anurag and some of his organisation there. We then after a short meet, I had a shower and changed some clothes, Mandy had a rest, I then went for a walk and met Anurag and his team at there base area. They took me for a drive round the area they are patrolling at present ,close to the railway line, there is a Tigress, with 2 cubs in this area, we met some villagers who are looking after their sugarcane fields and work with Anurag in communicating sightings, though also at this time, we noticed villagers encroaching with their cattle into the forest. We also went to Tiger Haven, this was the home of Billy Arjan Singh, who passed away in January, aged  92. He is to me and always will be the person ,that is an inspiration, his conservation work will I hope inspire others to get involved. He did not take no for an answer and the forest department would rarely support him, he did stand up for the Tiger more than anyone person I can think of .The buildings are being raised, I believe so that when monsoon comes, the floods will not cause the buildings to be  2 feet under water, as there runs a river at the back of them.
In the afternoon, we went on safari into Dudhwa, it has been 11 years since I last did this, the park is very rich in wildlife, sal trees and terai for the wildlife and Tigers.We were fortunate to sight a Tigress lying in the short grass at around 200 yds away.We also whilst in the forest observed forest guards patrolling on bicycles and camera traps for census.
Next morning we went on safari at 05.00. We had the first half by jeep and the second half by elephant, which for me is the best way to enjoy the forest and wildlife. We observed many birds, fish, rhino and other prey species. Later that day we moved upto Dudhwa forest rest house ,this is were I first stayed on my last trip here, we were to spend 2 days here .The food and accommodation was not so good ,as Mandy was suffering from a bad case of stomach pains and diarrhoea. On the afternoon safari, we observed again forest guards patrolling, one who had a SLR firearm, the other had a stick and again they were on  bicycles. We once again spotted a Tigress ,this time in  different place. We also observed that she had a cub that looked about 6-7 months old, this was back in the long grass, around 100 yards from the Tigress. We also observed more camera traps. In the evening we had our evening meal with the team from Vision India.
Next Morning, we went on safari, Mandy did not accompany us as she was not feeling well. We observed the forest guards on patrol on bicycles, also a team checking  the camera traps. We observed many prey species, including wild boar, chital , marsh deer ,  though on this occasion no Tiger. The afternoon safari , we gain observed many prey species , we also spoke to the Wildlife Trust of India team who were putting out  and checking the camera traps. They told us they had caught many animals on camera, also Tiger and sloth bear. The traps will be in place for about a month, less if the monsoon comes sooner, they had not seen Tiger themselves. We had our evening meal with Vision India members , Tiger Awareness purchased some fleeces and Mandy also purchased some t.shirts for the team to wear in the winter months, as it gets cold in November through to February.
In the morning May 25th, at 06.00 , we visited Tiger Haven again to pay my last respects, at Billy Arjan Singhs  grave. We had the opportunity to have a good look around. The buildings are in need of sorting out, you could see antlers, Billy weights that he would train with in the mornings. I believe they are going to make it into museum / learning institute, which I hope will work out, as it would be a big loss to Tiger people. We then went to Palia, a town 10 kms from the forest to confirm our booking in the forest  rest house at Sonaripur. We spent 1.5 hours waiting for the deputy director of the park to arrive, he apologised for being late and asked about our visit. It took a further  1 hour or so to sort all the paperwork , the forest department beaurocracy gone mad. I made some calls to let other know about our plans, also to confirm details for later on the trip. On the way to the rest house in Sonaripur, we visited a village called Sumar, which is situated in the middle of Dudhwa national park. The population of this village is 3000 plus people , they have in taken up alot of forest area,they have many cattle also. I believe also there has been a court ruling to move them since 2005. We had a cup of chai with the village principal, many young lads were about,  one of the ladies showed us a traditional dress. He explained the night before elephant had been there, at the waterhole they have, though no Tiger, they had been seen a couple  of kms away from the village. Though on my return to the uk ,I  watched footage on a t.v  station , were the same principal admitted to giving bribes to forest department for wood from forest. I hope they can accommodate the villagers somewhere more suitable, thus returning the forest to the wildlife .
We eventually arrived at Sonaripur at  around 16.00 hrs, tidy rest house, one of the Vision India members works there also with forest department ,he looked after  all our needs. We were about to go into the forest about 17.00 and a herd of wild elephants came very close to our camp, there were about 20 plus in the herd. We observed them for about 20 minutes. We went into the forest and observed prey species though no Tiger on this visit.



Next morning, we went into the forest, Mandy was not feeling well, she stayed behind to get some rest and hopefully get over her ailments of the stomach. We observed 2 male elephants at a waterhole close to camp. The rest of the time in the forest we observed prey species such as chital, marsh deer. The weather was still hot, after some breakfast we later in the morning went to Pail to purchase some items to help Vision India in there work. We also needed to get Mandy a new suitcase, as her one from auk, the handle was falling off. We purchased 5 cycles for Vision India to use, they were mountain bikes with off road tyres, which would be better for the terrain they work in, also some pumps and baskets for the cycles. We also purchased a solar panel, which would be erected at the office. We left to go to the office, the solar panel was erected in a temporary position, allowing them to use it, until they could get a more permanent pole for this to go on the roof. Some of the cycles were also delivered at  this time, with the rest being built up and delivered next morning. Mandy also gave a donation of 5000 Rupees to help with the teams work , Tiger Awareness also did the same. After this we went into the forest, we observed a young male elephant grazing. We then went to one of the machans , that are situated around the forest. 10 minutes passed, a couple of vehicles came and went , patience for our part paid off, as I asked all to be quiet as I observed a Tiger stalking through the long grass, though in some parts there was gaps, there was also a water pool to our front. The Tigress was very wary, which is good for there survival, there was some noise in our area, with people also going up and down the stairs, this made the Tiger go back from the direction it  had come.We waited a while  longer, though we had no further sightings of her, also it was getting dark . We had our evening meal with the Vision India team .The next morning into the forest, we went at 05.00, and we observed a male elephant at the waterhole close to camp again, though nothing else at this time. We were not in the forest long on this occasion, as we had to make our way to meet the taxi for Lucknow. This picked us up at 11.00,on the way to Lucknow, were to stop of at Anurags family house at Lakhimphur. The family made us chai and cold drinks. We also had some sweets, which were very nice ,so Anurag had a friend go out and buy me a box of them. We arrived at Lucknow train station around 16.30.We were to catch the Chitrakut Express at 17.30 ,  we departed 10 minutes late. We arrived in Katni, just over an hour late at 07.20 next morning.
We were met by a taxi as usual, to take us to Tala, Bandhavgarh. The journey is a 2 hour drive, some of the roads are rough, though for most part generally in good condition. On arrival at Wild Haven resort and  getting our accommodation sorted, I had a good talk with my friend Aqeel Farooqi  on  Dudhwa. The Dudhwa leg of the trip was very good, Anurag and his team looked after us very well, we will be supporting their work more this year and further on . They are doing valuable work in the area and looking to build their network and area covered.
After lunch, we went into Bandhavgarh National Park. This is where on May 19th, the Jhujhura Tigress had been killed  by a park vehicle illegally entering the park , she died a few hours later, leaving behind 3 young cubs On this issue, we are pressing for a CBI inquiry. The safari, we went into Magdhi zone, we observed many prey species and heard alarm calls  of chital, though no Tiger sightings .
Next morning, we went into Magdhi zone again, there were no Tiger sightings , though many prey species. After some breakfast, around 10.00  I went to meet Micheal Vickers at Jungle Lodge, 15 minute walk from Wild Haven resort, 2 minutes from Tala gate. On arrival, I met Mikes friend Vivek, who then went to let Mike know that I had arrived. We talked for a few hours on Tiger matters and then I arrived back at Wild Haven around 14.00. Shortly after Avantika Chandra and her friend arrived, we all then went into the forest at Tala zone. On this trip into the forest, we observed 5 Tigers, all at the later part of the safari, which is when it starts to cool down for the cats. We had good close up of my friend B2, he looked in good condition, it was great to see him so close , though some of the jeeps were jostling for a better  position, I asked our driver to give him some space, all could still get there photos. He then went into a nallah and we left for camp, which is were we spotted the other 4 Tigers stalking. We went to camp in high spirits, seeing the Tiger in the wild, causes excitement among people, which is so good to see. On arriving back, I checked on Mandy, as she had not come on the afternoon safari as she was still not feeling to well.

In the evening I had a meeting with some of the Save The Stripes team, Avantika was also present. We had a constructive meeting, talking about ways to go forward and help in the future in the Bandhavgarh area, one of these ways is in solar panel fencing. I said that Tiger Awareness would support them were we could. We would also talk to others that could help their work in the area.

Next morning we went into the Tala zone, Avantika and friend went into Magdhi zone, due to the restrictions of  only  20 vehicles being allowed in Tala zone. There had been 2 zones closed, due to the death of the Jhujhura Tigress, as previously mentioned. On our visit we had sighting of 2  cubs, one male and one female cub. Sorry for not mentioning areas, as I feel it might be helpful to the poaching network. Towards the end of our time, the male cub crossed the road about 30 yds from the back of our vehicle.

After having my breakfast, I was made aware of one of the guides who had come to camp with about 10 villagers that were looking for compensation for loss of cattle. On recent trips, I have compensated cases, I told them that the cases would be looked into, I did not pay for any of these cases, as when they were  looked into, the cases were already paid by forest department. On our visit to the forest in the afternoon, we first of all went to were we had observed the cubs earlier in the day. The cubs were there, though could only be partially sighted. A forest official vehicle came to join the 7 vehicles already there, a man got out the jeep with a forest guard to get a better look. He then proceeded to walk with the guard a further 200 to 300 yards into the forest to get a better look. He got so close that there was a roar, which was the Tigress warning them off, only then did they come back to the vehicle, we found out this person was the DEPUTY DIRECTOR of the park, this was a foolish act and totally unacceptable abuse of authority. After this we went into a different area, were we watched a large male Tiger lying next to the road. After safari, we went back to Jungle Lodge to make Mike Vickers and others, aware what had happened. I also just before going back to Mikes, spoke to a person who was going to report the incident to the Field Director of the park. Next morning in the park , we observed Tigress with one of her cubs by the stream. We then spent just over an hour observing a male Tiger, there was only  one other jeep with us at the time. After , we then went to the centrepoint, an area were you can get a cup of chai,coffee and other food items. It also were you can gain more information on sightings. On the way back to camp, the guide spotted a Tigress in a nallah, we observed her for about  10 minutes, then went back to Wild Haven. We also observed on this trip good prey base , including wild boar. The wind was picking up, the clouds were gathering, feeling the monsoon is not far away.This helped as the temperatures are still in the mid 40s.

The afternoon safari, Aqeel and his son accompanied us into the park, we spent alot of time waiting in an area of the park, were we had observed a male Tiger going to rest earlier in the day. He came out after about an hour or so of waiting. After getting a few photos, we departed the area, as many vehicles were acting in the wrong manner for the forest. We then left the park. At the gate there was a film crew from NDTV, who were asking peoples opinion on the way Bandhavgarh National Park is being run. I gave my opinion, also mentioning that the previous days incident with the deputy director walking into the forest. We also met Rajesh, One of the guides who had become unemployed due to this cut in vehicles into Tala zone. We mentioned to him that we would come and meet him and his family after next mornings visit to the park.

Next morning, we entered into the park, after 5 minutes of entering, there was a close up sighting of the Bamera male, he is trying to take over the Tala zone as the dominant male, this has been for the last 5 – 6 years the position of B2, who still patrols were he likes. This is my first sighting of him, he is a big Tiger weighing in around 300 kgs. He stopped for a drink of water, we also observed 2 young cubs in the area , he would be the father, they were in no danger. We then a short time after spotted a Tigress resting in the long grass. We had no further sightings on this visit. After some breakfast, I went to visit Rajesh Travedi at his house, one of his relatives told me that he had gone to meeting at the interpretation centre with Rajesh Ghopal of National Tiger Conservation Authority.

I went to the Interpretation centre, there were many people there, local villagers, drivers, guides, forest officers and media. I asked Rajesh if I could be present, he said that this would be a good . Mr Ghopal and Mr Patil, Field Director of Bandhavgarh National Park  arrived at the meeting about 15 minutes later. Mr Ghopal firstly apologised for being late, he explained the reason for the meeting. This was to learn and discuss the issues of the way that Bandhavgarh National Park is being run. Many points were raised, the death of the Jhujhura Tigress, last years death of the cub from burns under a vehicle. The restriction of the vehicles into Tala zone, the future of the Jhujhura Tigress cubs. I also mentioned about the deputy director getting out of the car and going into the forest to get a closer look at the Tigress with cubs. He made many notes, listened to all points and said that an enquiry would be taken up by the authority deemed best to get answers and transparency to all the issues. He also expressed that the 3 cubs from Jhujhura Tigress that have been left behind are of most critical importance .They don’t want Bandhavgarh to become a zoo. He also stated that forest officials should not be abusing there position of authority. After the meeting I said my good byes, though did not get a chance to do so to Mr Patil, as he was being interviewed by NDTV. I sincerely hope that a CBI inquiry will be held, to allow transparency and the issues dealt with. The park is a great park, though need stronger management in my opinion, as Mr Patils staff does not always do as he asks.

The afternoon visit to the park, we observed 2 young cubs, about 8/9 months old. We then went straight after to meet Rajesh and family. We had some chai, talked about the meeting and then went back to Wild Haven.

Next morning, was to be our last visit to the park. We had no sightings of Tiger, though we did observe a sloth bear for some time, also took some photos, as this is closest I had been to one . We also observed a couple of forest guards on patrol.   The Bandhavgarh leg of the trip we did not help with any charity funds, as it was not possible to set up the children to visit, as they were on holiday and lived a distance from Wild Haven. We were  looking to have a wildlife programme for them. It was good to see local local children being taken into the park for free. This is a programme that should be rolled out across the country. We left for Katni at 18.00m changing taxis , we arrived in Katni at 20.30, Mandy went to the cashpoint and we then departed for Sawai Madhophur at 22.00, 15 minutes late.We arrived at Sawai at 09.45, were Vipul , a friend of mine was waiting to take us the short trip to our hotel,  the Regency.
We had some breakfast, checked some emails, as I had not used the computer for 10 days or so. We then went into the Park at 15.30, we also had a couple of American people in the jeep with us, this was there first trip to Ranthambhore . At the main gate to Jogi Mahal, I went  over to a friend and person I work with Dharm Khandal, he is leading Tigerwatch, a local NGO, that rehabilitate Mogiya hunting families, they also have an anti- poaching and research team. We spoke for a couple of minutes, confirming our meeting the next day. About 30 minutes into the safari, a male Tiger was spotted, we observed the Tiger for a good one and a half hours. We then moved on and spotted a Tigress, believed to be his sister in the same area, they are about 2.5 years old, though our sighting of her was very short, as she shot out of a bush into new cover. We then went back to see if the male Tiger was there, he was, some chital came into sight, they had not spotted the male Tiger. He was very alert ,though they came close and made alarm calls , nothing further happened and we left the park. After the safari, had some food and then went to  meet Aditya Singh at his hotel, the Ranthambhore Bagh, though he was not back from Sri Lanka. I asked the staff to let him know, I had been, though he made no  contact. I went back to the Regency, let Avantika and friend know the programme for next day .

Morning visit to park, we observed a  3 year old male Tiger in water, we spent about an hour watching him. It was a great site to see Tiger cooling off in the heat of the day. After leaving the park , I had some food and was dropped off at Tigerwatchs office. I initially met Fateh Singh Rathore, as Dharm was in the village, Fateh  called him and had someone make me some chai,  we spoke for about 10-15 minutes and Dharm arrived. We talked for a short while longer, then went to his house to meet Divya his wife who, leads DONK, which is an alternative way of employment in craftwork and embroidery for Mogiya people, this is then sold at local markets, they are looking to expand on this. It is good quality workmanship, having seen it and been given articles, on more than one occasion. We then spoke for about an hour, then went onto visit mogiya villages in Balas and Sawai Mansingh sanctuary. After that we went to purchase a motorbike that I promised Tiger Awareness would give for the anti poaching and research team.We purchased a 150 Pulsar Motorbike.It will be a big help for Tigerwatchs work. We also donated some funds to help with a study of villages in Keladevi sanctuary, this will go to the government as a proposal to make Keladevi a natural corridor to Ranthambhore national Park. The study should be completed in  2 / 3 months time. The motorcycle was collected a little while later and we had some Tiger Awareness stickers put on it and we took some photographs . It was then ridden by Dharm to the Tigerwatch offices, to show other people, including Fateh Singh Rathore, who said thank you for the motorcycle.
After arriving back from the meeting, we went on safari. We observed a collared Tigress, who does not have any range area, she from information, wanders around were she pleases. We also observed the male and female Tiger, we had spotted the day before. In the evening we watched a slideshow of wildlife by Vipul.
Next morning, we observed many prey species, especially Sambar and nilgai. The visit to the park was nearly over, when the dominant Tiger of the area was spotted , resting in the thickets. He could be recognised by the fact that he has a broken right canine. We had 10 – 15 minutes observing him, then went out of the park. We also on this safari picked up alot of plastic. This I have not seen before on past trips . After some breakfast, we went to visit a village called Ranwal, I have visited here before and had promised a power convertor to help keep the 3 computers in the village running. This village is around 2-3 kms from the edge of the national park. Mandy and Avantika, gave some items to the children . I had a look around, the roof needed some repair, I have promised some funds to help with this. We then went back to the Regency, we were to give 100 mosquito nets and some footwear that Mandy and Avantika had purchased to the forest guards, though we could not do this due to Tiger  politics. The nets were  to be given by Vipul a few days later.
Ranthambhore had been a successful leg of the trip, we helped with charity funds to local NGOs, also had great Tiger sightings and met some great people.We took the train at 06.30 to Delhi, arriving at 11.00 hrs. We then took at 30 minute taxi drive to our hotel. Mandy had some rest, I  made contact with Ambar Sharma , who runs Project Era Foundation in Bandhavgarh, we agreed to meet at 16.30 hrs. We had a meet for an hour, talking about our work; also I gave him a cheque for £600, which was from a person called Andy Watts in the UK. I was to send him further funds from Andy on my arrival back in UK.
Next day June 7th, we flew back to UK, after a 16 day trip, this was very successful in supporting organisations on the ground for Tiger conservation and villagers. We had great sightings of Tiger; I do not mention Tigers names unless, they roam areas, so as not to give information to people that may harm them. Tigers are the most majestic animal on this planet, we will and must support organisations on the ground, support villagers who support Tiger conservation, also helping forest guards that work with transparency and look to encourage others to get involved.
It is also important to add that without the support and organisation of friends from Wild Haven, Vision India,Vipul Jain, Tigerwatch  this trip would be so much more difficult.




Phil Davis
Tiger Awareness.
Leicester, United Kingdom


Sep 21, 2010

एक और तेन्दुए को ओढ़ाई जा सकती है आदमखोर होने की चादर!

दुधवा का घायल  तेंदुआ  कहीं आदमखोर न बन जाए!

जुलाई में शिकारियों के फ़न्दे में फ़ंसे तेन्दुए को ग्रामीणों की मदद से वन विभाग ने बचा लिया था, किन्तु खुड़के में फ़ंसे पैर के घायल हो जाने और उसका उचित इलाज किए जाने से पहले ही उसे जंगल में रिलीज कर दिया गया, संभवानाये बरकार थी की प्राकृतिक आवास और अपनी इंस्टिंक्ट के बल बूते यह जानवर अपने को ठीक कर पायेगा, पर अधिक खराब हालात में ऐसा नही हो पाता। अभी तक जो खबरे आ रही हैं, उनके मुताबिक ये तेन्दुआ लगड़ाता हुआ देखा गया। शारीरिक अक्षमता के चलते यह निश्चित ही अपना प्राकृतिक शिकार नही पकड़ पायेगा, नतीजतन गाँवों की तरफ़ इसका रूख होगा, और फ़िर इस पर भी आदमखोर होने की तोहमत मढ़ दी जायेगी। ...मॉडरेटर 



दुधवा  पार्के के अधिकारियो  और W.T.I. की लापवाही  से एक तेदुआ आदमखोर बनाने  की ओर कदम  बढ़ा चुका है | ३१-०७-१० को  शिकारियो  के लगाये  खुटके  में फसे तेंदुवे  को शिकारियो  से तो तो बचा लिया था लेकिन पैर  से  गंभीर  रूप से  घायल  होने के बावजूद  कुल  १० घंटे में ही जंगल  में दुबारा छोड़  दिया  था सही  इलाज  न होपने  के कारण से वो जंगल में शिकार नही कर पा रहा है | अब  तन्दुवा निकल कर २ बार महराजनगर  गांव घुस  चुका है | लेकिन  लोगो  के  जाग जाने  से वो सफल न हो सका , तेदुआ की शिकार  करने  की  शैली  के कारण से  वो अधिक  देर तक असफल नहीं होगा | वन्य जीव- विशेषज्ञ तेदुआ को टाइगर से बेहतर शिकारी मानते है, क्योकि ये  घात लगा  कर , लुक  छिपकर , पेड़ो पर  चढ़ कर वार करता  है ।
दुधवा  पार्क के अधिकारियों  और  डब्ल्यू टी आई  ने  इस तेदुआ को समय रहते  न पकड़  कर इलाज किया  तो ये  आदमखोर  बन  जायगा  , फिर  उसको हाथियों की मदद से भी  पकड़ना  आसान न  होगा । इस सदी  के  प्रारम्भिक  वर्षों में कुमाऊ  में  हुई  घटना  में  १ आदमखोर  तेदुआ ने अकेले ५०० लोगो  मार कर खाया , ये सब  बद्रीनाथ -केदारनाथ  को  निकले तीर्थ यात्री  थे |दुधवा  पार्के के अधिकारियो  और  डव्लू. टी.आई . की लापवाही  से ये घटना  दुधवा  में न हो जाये ।

कब और कैसे इस खूबसूरत जानवर कोशिकारियों ने खुड़के में फ़ंसाया, और कैसे ग्रामीणों की मदद से इसे दुबारा जीवन मिला पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें! 

दूसरी खबर 
                         
  मनोज शर्मा ( लेखक लाइव इंडिया में लखीमपुर के जिला सवांददाता है, किशनपुर वन्य जीव विहार के निकट मैलानी में निवास, इनसे manojliveindia@gmail.com पर सम्पर्क कर सकते हैं।)

Sep 18, 2010

क्या उन्हे यहाँ सिर्फ़ मरने के लिए भेजा जाता है!

*चिड़ियाघरों में अशक्त, बीमार व बूढ़े हो चले जानवरों को भेजा जा रहा है, दुधवा!
* दुधवा नेशनल पार्क में नही है वन्य जीव का डॉक्टर!
*रिसर्च आफ़ीसर व वन्य जीव विशषज्ञ के पद खाली हैं या सृजित ही नही हुए!
*रेस्क्यू सेन्टर की अनुपलब्धता का खामियाजा भी भुगत रहे वन्य जीव!
(दुधवा नेशनल पार्क, खीरी) लखनऊ प्राणि उद्यान से आए गजराज सुमित की अव्यवस्थाओं और समुचित उपचार के अभाव में विगत माह जुलाई में हुई असमय लाचार्री और बेबसी वाली दर्दनाक मौत दुधवा नेशनल पार्क के इतिहास का काला अध्याय बनी ही साथ में दुधवा की व्यवस्थाओं पर प्रश्नचिन्ह भी लगाया। इसके बाद भी दुधवा नेशनल पार्क प्रशासन ने ऐसा लगता है कि कोई उससे सबक नहीं लिया है। शायद इसी का परिणाम है कि मेरठ से लाए गए बागी हाथी शेरा की जिन्दगी की जीवन की डोर भी धीरे-धीरे संकुचित होने लगी है। इसका भी मुख्य कारण है कि शेरा के शरीर पर कई गहरे जख्म हैं जिनका समुचित उपचार न होने के कारण उनसे भारी मात्रा में मवाद का रिसाव लगातार हो रहा है, जिससे उसका शरीर धीरे-धीरे कमजोरी की चादर ओढ़ने लगा है। मोहताजी और उपर से जख्मों के दर्द ने शेरा के आराम को हराम कर दिया है, नींद शेरा की आंखों से दूर भागने लगी है। वह लगातार जागते हुए इधर-उधर हिलता-डुलता रहता है। यह स्थिति शेरा के भविष्य के लिए खतरनाक बताई जाने लगी है। इसको जानते हुए भी वन विभाग के अफसर शेरा की जिन्दगी को बचाने के लिए कोई सार्थक उपाय नहीं कर रहे हैं। केवल दिखावे के तौर डव्ल्यूटीआई के पशु चिकित्सक से शेरा का उपचार कराकर अपनी नाकामियों पर पर्दा डाल रहे हैं। किसी वन्यजीव विशेषज्ञ चिकित्सक से शेरा का इलाज कराना तो दूर रहा उसका परीक्षण तक न कराया जाना ही इस बात के स्पष्ट संकेत हैं कि दुधवा के अफसर शेरा के गिरते स्वास्थ्य को लेकर कतई गंभीर नहीं हैं।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के धनकुबेरों के घरानों में होने वाली अधिकांश शादी-बारातों में शानो-शौकत का गवाह बनने वाला गजराज शेरा इसी साल तीन मई को अज्ञात कारणों से तब बागी हो गया था जब वह शान से सजासंवरा मेरठ के सांसद मुनकाद अली और कादिर राणा के बेटा-बेटी के निकाह में द्वाराचार करा रहा था। इस दौरान अचानक शेरा पर पागलपन सवार हो गया और उसने महावत को नीचे गिराकर भारी उत्पात मचाया, भगदड़ मची कई लोग घायल भी हुए, यहां तक दिल्ली-मेरठ नेशनल हाइवे भी करीब तीस घंटा तक जाम रहा था। इसकी कारस्तानी की गूंज लखनऊ तक पहुंची तब बागी शेरा को काबू में करने के लिए लखनナ प्राणि उद्यान के वरिष्ठ चिकित्सक डा. उत्कर्ष शुक्ला शासन के निर्देश पर स्पेशल फ़्लाइट से मेरठ गए और खासी मशक्कत के बाद उसे बेहोश करने में कामयाब हुए थे। तत्पश्चात वन विभाग के उच्चाधिकारियों के आदेश पर बागी हाथी शेरा को महावत नासिर दुधवा नेशनल पार्क लेकर आए थे किंतु उसे दुधवा से दस किमी दूर जंगल के अंदर सलूकापुर शिफ्ट कर दिया गया था। बागी शेरा को काबू करते समय उस पर गोलियां भी चलाई गई थीं, और भाला से भी वार किए गए थे। इससे शेरा के शरीर पर जगह-जगह गहरे जख्म हो गए थे। दुधवा नेशनल पार्क क्षेत्र के अंतरगत सलूकापुर फारेस्ट गेस्ट हाउस के हाथीखाना में रखकर शेरा के जख्मों का उपचार किसी वन्यजीव विशेषज्ञ चिकित्सक से कराने के बजाय डव्ल्यूटीआई के पशु चिकित्सक के द्वारा शेरा का इलाज किया जाता रहा। जबकि कायदे से शेरा को दुधवा में ही रखकर उपचार कराया जाना चाहिए था। लेकिन दुधवा के अफसरों ने शेरा को उसके हाल पर छोड़ दिया। इसका दुष्परिणाम यह निकला कि शेरा के शरीर के कुछ जख्म तो ठीक हो गए और कुछ नासूर बन गए हैं। इनमें शेरा के पिछले भाग में दाहिने पुट्ठा समेत घुटनों  और पीठ में बने गहरे घावों से भारी मात्रा में मवाद का रिसाव होता है, यहां तक शेरा के दातों से भी मवाद आने लगा है। जख्मों के दर्द ने शेरा का सुख-चैन छीन लिया है। शायद यही कारण है कि नींद उसकी आंखों से दूर होने लगी हैं और वह जागते हुए बैचेनी में अपनी जिंदगी गुजारने को विवश हो गया है।
      
गजराज शेरा की हुई दयनीय दशा की बावत यह बात प्रमुखता से उभर कर सामने आई है कि दुधवा नेशनल पार्क में जरूरत होने के बाद भी वन्यजीव विशेषज्ञ चिकित्सक का पद शासन से स्वीकृत नहीं है। जबकि दुधवा नेशनल पार्क को बने हुए लगभग तैंतीस साल का वक्त गुजर चुका है। और वह यूपी का एकमात्र नेशनल पार्क है। इसके बाद भी दुधवा में वन्यजीव विशेषज्ञ चिकित्सक की नियुक्ति न होना ही वन विभाग के उच्चाधिकारियों की उदासीनता को दर्शाती है कि वह दुधवा के वन्यजीवों को लेकर कतई गंभीर नहीं हैं। वन्यजीव विशेषज्ञ चिकित्सक न होने के कारण अक्सर समुचित उपचार के अभाव में घायल अथवा बीमार वन्यजीव या फिर पालतू हाथी असमय कालकवलित हो जाते हैं। पिछले दो दशक के भीतर आपसी प्रणय द्वन्द-युद्ध में घायल हुए एक नर एवं एक मादा गैंडा तथा गैंडा के एक बीमार बच्चे की असमय मौत होने के साथ दो मादा हाथियों व एक मादा बच्चा भी बीमारी के दौरान उपचार के अभाव में कालकवलित हो चुके हैं। हाल ही में विगत माह जुलाई में लखनナ प्राणि उद्यान से आए गजराज सुमित की मौत भी समुचित उपचार के अभाव में लाचारी एवं बेबसी में हो गई थी। जबकि आंखों से अंधे सुमित को स्वास्थ्य लाभ के लिए प्राकृतिक वातावरण में रखने के उद्देश्य से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था। वह दुधवा में रहकर स्वस्थ्य तो नहीं हो पाया वरन् अफसरों की उदासीनता और लापरवाही के कारण मौत उसका नसीब बन गई थी। सुमित की असमय मौत से भी दुधवा नेशनल पार्क प्रशासन अथवा वन विभाग के आलाअफसरों ने कोई सबक नहीं लिया। शायद इसी का परिणाम है कि शेरा को दुधवा में रखने के लिए लाया तो गया था परन्तु उसे दुधवा में नहीं रखा गया। अफसरों ने मनमानी करके शेरा को सलूकापुर में रखकर लगभग तीन माह तक उसका उपचार कराया। लेकिन कोई उसे कोई खास फायदा नहीं पहुंचा, जिसके कारण शेरा की दशा दिनोंदिन खराब ही होती चली गई। शेरा की दयनीय दशा के पीछे अफसरों की उदासीनता भी मुख्य कारण रही। वह भी इसलिए क्योंकि सलूकापुर तक पहुंचने के लिए कच्चा वनमार्ग है। जिस पर से वरसात में वाहन निकालना लगभग असंभव है, तो चिकित्सक वहां तक कैसे जाते होंगे? इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। जब चिकित्सक जरूरत के मुताबिक सलूकापुर प्रतिदिन नहीं पहुंच सकता था तो शेरा को सलूकापुर में क्यों रखा गया? यह प्रश्न भी स्वयं में बिचारणीय बन गया है। इन परिस्थियों में स्पष्ट हो जाता है कि शेरा का इलाज केवल खानापूर्ति के तौर ही कराया जाता रहा।  जिसका दुष्परिणाम यह निकला कि अफसरों की मनमानी के चलते नियमित इलाज न होने से शेरा की दशा बद् से बद्तर होती चली गई।
अब शेरा की स्थिति यह है कि वह ठीक से खड़ा भी नहीं हो पा रहा है। उसकी गिरती हालत को देखकर यहां के कुछ वन्यजीव प्रेमियों ने लखनऊ में बैठे वन विभाग के आला अफसरों को दी तब उनको भी शेरा का ख्याल आया। उन्होंने दुधवा के अफसरों से पूंछतांक्ष शुरू कर दी। इस चेते दुधवा के अफसर भी सक्रिय हुए और उनके निर्देश पर शेरा को किसी प्रकार 09 सितंबर को सलूकापुर से दुधवा लाया गया है। दुधवा टाइगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर शैलेष प्रसाद भी आनन-फानन में दुधवा पहुंच गए और शेरा को देखकर उसकी सेहत का जायजा लिया साथ ही उसकी उचित देखभाल करने का फरमान तो सुना दिया। लेकिन शेरा के स्वास्थ्य का परीक्षण अभी तक किसी वन्यजीव विशेषज्ञ चिकित्सक से नहीं कराया गया है। इस पर चिन्ता जाहिर करते हुए सृष्टि कंजरवेशन एंड वेलफेयर सोसाइटी उप्र की फाउंडर सदस्य विनीता सिंह ने सूबे के प्रमुख वन संरक्षक वन्यजीव को पत्र भेजकर शेरा का उपचार वन्यजीव विशेषज्ञ चिकित्सक से कराने की मांग की है, तथा शेरा के उपचार में लापरवाही बरतने की जांच कराकर दोषी के खिलाफ कार्यवाही किए जाने की भी बात कही है। उन्होंने पत्र में कहा है कि समय रहते शेरा का समुचित उपचार वन्यजीव विशेषज्ञ चिकित्सक से नहीं कराया गया तो सुमित की तरह ही शेरा का भी हश्र हो सकता है इस बात से कतई इंकार नहीं किया जा सकता है। यह भी शेरा के भाग्य की बिडंवना ही कही जाएगी कि लखनऊ में बैठे वन विभाग के उच्चाधिकारियों ने अदूरदर्शितापूर्ण तुगलकी फरमान जारी करके शेरा को मेरठ से दुधवा तो भेजवा दिया था, लेकिन उसकी सेवा के लिए अलग से न महावत की ब्यवस्था कराई और न ही उस पर होने वाले खर्च का बजट ही भेजा है। जिससे शेरा भी पूर्ववर्ती मृतक गजराज सुमित की तरह बजट की कमी और उचित देखभाल के अभाव में लाचारी और बेवशी में मोहताजी की जिन्दगी गुजारते हुए दूसरों की दया पर निर्भर होकर रह गया है। यह स्थिति उसके भविष्य को अंधकारमय बनाने के लिए काफी बताई जा रही है। इससे शेरा के जीवन पर खतरे के बादल और गहरे होकर मंडराने लगे हैं।

देवेन्द्र प्रकाश मिश्र- (लेखक वाइल्डलाइफर/पत्रकार है- दुधवा नेशनल पार्क के निकट पलिया में निवास, इनसे dpmishra7@gmail.com पर सम्पर्क कर सकते हैं।)







विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था