International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Save Tiger

DON'T LET WILD TIGERS DISAPPEAR

Lady Rosetta

Potatoes with low sugar content and longer shelf life.

अबूझमाड़ के जंगल

जहां बाघ नही नक्सली राज करते हैं

खवासा का आदमखोर

जहां कांपती थी रूह उस नरभक्षी से

जानवर भी करते हैं योग

योगाचार्य धीरज वशिष्ठ का विशेष लेख

Apr 29, 2010

ऐसे तो हमारी अमूल्य राष्ट्रीय प्राकृतिक संपदा ही नष्ट हो जायेगी!

Photo courtesy: RosenRed

देवेन्द्र प्रकाश मिश्र* ग्रीष्मकाल शुरू होते ही गावों में ही नहीं प्रदेश के जंगलों में आग लगने का दौर शुरू हो जाता है। आग द्वारा मचाई जाने वाली तबाही एवं बर्वादी से हजारों लोग बेघर होकर खुले आसमान के नीचे जीवन गुजारने को बिवश हो जाते हैं। सरकार द्वारा प्रतिवर्ष अग्निपीड़ितों को करोड़ो रुपए का मुआवजा तो दे दिया जाता है। परंतु आग रोकने या उसके त्वरित नियंत्रण की व्यवस्था करने में आजादी के बाद अब तक रहीं प्रदेश की सरकारें असफल रहीं हैं। इसी तरह जंगलों में लगने वाली आग अकूत वन संपदा को स्वाहा कर देती है और इसकी बिनाशलीला से वन्यजीवन पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है। प्रतिवर्ष आग अपना इतिहास दोहराकर नुकसान के आंकड़ों को बढ़ा देती है। प्रदेश की सरकार ज्रंगलों को भी आग से बचाने के लिए कोई सार्थक कदम नहीं उठा रही है। यूपी के एकमात्र दुधवा नेशनल पार्क के जंगलों में बार-बार होने वाली दावाग्नि को रोकने के लिए समुचित आधुनिक साधनों और संसाधनों की भारी कमी है। इससे लगातार लगने वाली आग से दुधवा के जंगल का न सिर्फ पारिस्थितिक तंत्र गड़बड़ा रहा है, बल्कि जैव-विविधता के अस्तित्व पर भी संकट खड़ा हो गया है। दुधवा नेशनल पार्क प्रशासन द्वारा जंगल में दावाग्नि नियंत्रण की तमाम ब्यवस्थाएं फायर सीजन से पूर्व की जाती हैं। अगर आग को रोकने के लिए कराए जाने वाले कार्यो को पूरी निष्ठा व ईमानदारी से कराया जाए तो आग को विकराल होने से पहले उस पर नियंत्रण हो सकता है। किंतु निज स्वार्थों में कराए गए दावाग्नि नियंत्रण के कार्य एवं सभी तैयारियां फायर सीजन यानी माह फरवरी से 15 जून के मध्य में आए दिन जंगल में लगने वाली आग का रूप जब भी बिकराल होता है तब वह मात्र कागजी साबित होती हैं।

यह बात अपनी जगह ठीक है कि जंगल में कई कारणों से आग लगती है या फिर लगााई जाती है। इसमें समयबद्ध एवं नियंत्रित आग विकास है किंतु अनियंत्रित आग विनाशकारी होती है। दुधवा के जंगल में ग्रासलैंड मैनेजमेंट एवं वन प्रवंधन के लिए नियंत्रित आग लगाई जाती है। इसके अतिरिक्त शरारती तत्वों अथवा ग्रामीणजनों द्वारा सुलगती बीड़ी को जंगल में छोड़ देना आग का कारण बन जाता है। जबकि वंयजीवों के शिकारी भी पत्तों से आवाज उत्पन्न न हो इसलिए जंगल में आग लगा देते हैं। दुधवा नेशनल पार्क के वनक्षेत्र की सीमाएं नेपाल से सटी हैं और इसके चारों तरफ मानव बस्तियां आबाद हैं। इसके चलते जंगल में अनियंत्रित आग लगने की घटनाओं में लगातार वृद्धि हो रही है। इसका भी प्रमुख कारण है कि नई  घास उगाने के लिए मवेशी पालक ग्रामीण जंगल में आग लगा देते हैं जो अपूर्ण ब्यवस्थाओं के कारण अकसर विकाराल रूप धारण करके जंगल की बहुमूल्य वन संपदा को भारी नुकसान पहुंचाती है तथा वनस्पितियों एवं जमीन पर रेंगने वाले जीव-जंतुओं को जलाकर भस्म बना देती है। विगत के दो वर्षों में कम वर्षा होने के बाद भी बाढ़ की विभीषिका के कहर का असर वनक्षेत्र पर ब्यापक रूप से पड़ा है। बाढ़ के पानी के साथ आई मिट्टी-बालू इत्यादि की हुई सिलटिंग से जंगल के अन्दर तालाबों, झीलों, भगहरों की गहराई कम हो गई है। स्थिति यह है कि जिनमें पूरे साल भरा रहने वाला पानी वंयजीवों-जंतुओ को जीवन प्रदान करता था वह प्राकृतिक जलश्रोत अभी से ही सूखने लगे हैं। इसके कारण जंगल में नमी की मात्रा कम होने से कार्बनिक पदार्थ और अधिक ज्वलनशील हो गए हैं। जिसमें आग की एक चिंगारी सैकड़ों एकड़ वनक्षेत्र का जलाकर राख कर देती है।

सन् 2001 से 2007 तक दुधवा के जंगलों में आग लगने के कारणों का अध्ययन एवं विश्लेषण दुधवा पार्क के एक उपप्रभागीय वनाधिकारी द्वारा किया गया था। जिसके अनुसार सन् 2001-02 में औसत वर्षा होने के कारण जंगल में आग लगने की घटनाएं अधिक रहीं किंतु नुकसान कम हुआ। सन् 2003-04 में अधिक वर्षा होने के कारण आग से जलने के लिए आवश्यक कार्वनिक पदार्थों में नमी की अधिकता रही जिससे आग लगने की हुई 36 घटनाओं में 16.76 हेक्टेयर वनक्षेत्र प्रभावित हुआ। जबकि सन् 2005 से 2007 के मध्य कम वर्षा के कारण कार्बनिक पदार्थों की नमी कम रही और आग लगने की होने वाली 36 घटनाओं में दावाग्नि का क्षेत्रफल एक हेक्टेयर अधिक रहा था। बल्कि सन् 2008-09 में कम वर्षा के कारण दावाग्नि की हुई घटनाओं में प्रभावित क्षेत्रफल बढ़ने से जंगल को भारी क्षति पहुंची। इस साल भी जंगल में आग लगने का सिलसिला जारी है। इससे हरे-भरे जंगल की जमीन पर दूर तक राख ही राख दिखाई देती है। लगातार लगने आग से जंगल में कई प्रजातियों के अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगा दिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अनियंत्रित आग बड़ी मात्रा में कार्बन डाईआक्साइड और ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन करके ग्लोबल वार्मिंग बढ़ा रही हैं और इससे जंगल की जैव-विविधता के अस्तित्व पर भी खतरा खड़ा हो जाता है।

886 वर्ग किलोमीटर में फैले दुधवा के जंगल में आग नियंत्रण के लिए फायर लाईन बनाई जाती हैं तथा आग लगने का तुरंत पता लग जाए इसके लिए तमाम संवेदनसील स्थानों पर वाच टावर स्थापित किए गए हैं। किंतु आग लगने पर उसके नियंत्रण हेतु तुरंत मौके पर पहुंचने के लिए रेंज कार्यालय या फारेस्ट चौकी पर वाहन नहीं हैं ऐसी स्थिति में कर्मचारी जब तक सायकिलों से या दौड़कर वहां पहुंचते हैं तब तक आग जंगल को राख में बदल चुकी होती है। जंगल के समीपवर्ती ग्रामीण भी अब आग को बुझाने में वन कर्मचारियों को इसलिए सहयोग नहीं देते हैं क्योंकि 1977 में क्षेत्र के जंगल को दुधवा नेशनल पार्क बना दिया गया। इसके बाद पार्क कानूनों के अंतर्गत आसपास के सैकड़ों गावों को पूर्व में वन उपज आदि की मिलने वाली सभी सुविधाओं पर प्रतिवंध लगा दिया गया है। जबकि इससे पहले आग लगते ही गावों के सभी लोग एकजुट होकर उसे बुझाने के लिए दौड़ पड़ते थे। इस बेगार के बदले में उनको जंगल से घर बनाने के लिए खागर, घास-फूस, नरकुल, रंगोई, बांस, बल्ली आदि के साथ खाना पकाने के लिए गिरी पड़ी अनुपयोगी सुखी जलौनी लकड़ी एवं अन्य कई प्रकार की वन उपज का लाभ मिल जाया करता था। लेकिन बदलते समय के साथ अधिकारियों का अपने अधीनस्थों के प्रति व्यवहार में बदलाव आया तो कर्मचारियो में भी परिवर्तन आता चला गया। स्थिति यह हो गई है कि कर्मचारी वन उपज की सुविधा देने के नाम पर ग्रामीणों का आर्थिक शोषण करने के साथ ही उनका उत्पीड़न करने से भी परहेज नहीं करते हैं। जिससे अब ग्रामीणों का जंगल के प्रति पूर्व में रहने वाला भावात्मक लगाव खत्म हो गया है। उधर आग लगने की सूचना पर पार्क अधिकारियों का मौके पर न पहुंचना और अधीनस्थों को निर्देश देकर कर्तव्य से इतिश्री कर लेना यह उनकी कार्यप्रणाली बन गई है। इससे हतोत्साहित कर्मचारियों में खासा असंतोष है और वे भी अब आग को बुझाने में कोई खास रूचि नहीं लेते है। जिससे जंगल को आग से बचाने का कार्य और भी दुष्कर होता जा रहा है। परिणाम दुधवा के जंगलों में लग रही अनियंत्रित आग वंयजीवों और वन संपदा को भारी क्षति पहुंचा रही है। पार्क के उच्च यह स्वीकार करते हैं कि आग लगने की बढ़ रही घटनाओं का एक प्रमुख कारण है कि स्थानीय लोगों के बीच संवाद का न होना है। वह यह भी मानते हैं कि वित्तीय संकट, कर्मचारियों की कमी, निगरानी तंत्र में आधुनिक तकनीकियों का अभाव, अग्नि नियंत्रण की पुरानी पद्धति आदि ऐसे कई कारण हैं जिनकी वजह से जंगल की आग को रोकने की दिशा में प्रभावशाली कदम नहीं उठाए जा पा रहे हैं। 
देवेन्द्र प्रकाश मिश्र (लेखक वाइल्ड लाईफर/पत्रकार है, दुधवा नेशनल पार्क के निकट पलिया में रहते हैं, इनसे dpmishra7@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।)

Apr 23, 2010

कम से कम इतना तो कर ही सकते हैं!

दुधवा लाइव डेस्क* तपती धरती, सूखते तालाब, कंकरीट के जंगल जहाँ बन्द नालियों में बहता कचड़ेदार प्रदूषित जल, दुकानों में बिकता पानी, ऐसे हालातों में ये परिन्दे जायें तो कहाँ जाए- जिन्दा रहने के लिए प्यास बुझाना है जो इन्हे-क्या हम कोई मदद कर सकते हैं- यकीनन!  एक खयाल जो "गौरैया बचाओ जन-अभियान" से प्रेरित होकर खीरी जनपद के बिजुआ गाँव के सलीम को आया, जिसे उन्होंने सफ़लता के साथ हकीकत में लागू भी किया।


आप के घर में भी ऐसा कुछ किसी कोने में पड़ा होगा

और आप के घर में पानी की टंकी भी होगी!


पानी भर जाने पर ऐसा भी होता होगा

तो क्यों न इन दोनों को मिला दें

ताकि ऐसा हो सके!



प्यासे को पानी मिले

और पानी की बर्बादी से भी बचा जा सके!




क्या आप ऐसा करेंगें-- हमें उम्मीद है!



अब्दुल सलीम खान (आइडिया एंव फोटोग्राफ़ अब्दुल सलीम खान, जो कि हिन्दुस्तान दैनिक अखबार के गुलरिया- बिजुआ लखीमपुर खीरी में रिपोर्टर हैं, इनसे salimreporter.lmp@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।)

Apr 22, 2010

रोजी-रोटी संगठन की गौरैया बचाओ जन-अभियान में सक्रिय भागीदारी।


दुधवा लाइव डेस्क* २० मार्च सन २०१० को दुधवा लाइव बेवसाइट द्वारा चलाये गये गौरैया बचाओ जन-अभियान में खीरी सहित तराई के तमाम जनपदों के संगठन व स्कूलों ने भागीदारी की, लोगों को पक्षी सरंक्षण के लिए जागरूक किया गया, किन्तु खीरी जनपद में यह गौरैया सरंक्षण के जो कार्यक्रम हुए, उनमें दुधवा लाइव द्वारा सन २०१० को गौरैया वर्ष घोषित किया गया, फ़लस्वरूप जन-मानस  इस पक्षी के प्रति संवेदशील हुआ, और इसके सरंक्षण में अपना योगदान जारी रखे हुए हैं। लखीमपुर खीरी जनपद में इस अभियान में रोजी-रोटी संगठन ने मितौली ब्लाक के विभिन्न प्राइमरी विद्यालयों में गौरैया सरंक्षण के लिए बच्चों को जागरूक करने का सफ़ल प्रयास किया, एंव घरेलु पक्षियों के आवास और भोजन के प्रति मानव समाज को उसकी जिम्मेदारी के प्रति सचेत किया।


प्राथमिक पाठशालाओं में गौरैया बचाओ जन-अभियान के अन्तर्गत रोजी-रोटी संगठन द्वारा चलाये जा रहे विविध कार्यक्रम।

Apr 17, 2010

दुधवा में गैडों का जीवन नहीं रहा सुरक्षित

 देवेन्द्र प्रकाश मिश्र*  पूर्वजों की धरती पर से एक सदी पूर्व विलुप्त हो चुके एक सींग वाले भारतीय गैंडा को 25 साल पहले तराई क्षेत्र की जन्मभूमि पर उनको बसाया गया था। किसी वन्यजीव को पुनर्वासित करने का यह गौरवशाली इतिहास विश्व में केवल दुधवा नेशनल पार्क ने बनाया है। भारत सरकार ने पहले आसाम के पावितारा वन्यजीव विहार से दो नर व तीन मादा गैंडा लाकर दुधवा में गैंडा पुनर्वास परियोजना शुरू कराई थी। इसमें से दो मादा गैडों की मौत ‘शिफ्टिंग स्टेस‘ के कारण हो गई थी तब परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए सन् 1985 में सोलह हाथियों के बदले नेपाल के चितवन नेशनल पार्क से चार मादा गैंडों को लाया गया। विश्व की यह एकमात्र ऐसी परियोजना है। जिसमें 106 साल बाद गैडों को उनके पूर्वजों की धरती पर पुनर्वासित कराया गया है। गंगा के तराई क्षेत्र में सन् 1900 में गैंडा का आखिरी शिकार इतिहास में दर्ज है, इसके बाद गंगा के मैदानों से एक सींग वाला भारतीय गैंडा विलुप्त हो गया था।

यूपी के एकमात्र दुधवा नेशनल पार्क में चल रही विश्व की अद्वितीय गैंडा पुनर्वास परियोजना अफसरों की लापरवाही एवं उदासीनता का शिकार होकर कुप्रवन्धन की पर्याय बन गयी है । अब्यवस्थाओं के कारण उर्जाबाड़ से संरक्षित वनक्षेत्र में रहने वाले तीस सदस्यीय गैंडा परिवार के पांच सदस्य करंटयुक्त फैंसिंग तोड़कर बाहर घूम रहे हैं। यह बात जानकर भी पार्क प्रशासन के अफसर गैंडों की सुरक्षा की कोई पुख्ता दीर्घकालिक व्यवस्था नहीं कर पा रहे हैं।  इससे उनके जीवन पर संकट मंडराता रहता है। इसके अतिरिक्त एक ही नर गैंडा की संतानों का परिवार होने से उनके उपर अनुवांषिक प्रदूषण यानी अन्तःप्रजनन के खतरे की तलवार भी लटक रही है।
जनपद लखीमपुर-खीरी स्थित दुधवा नेशनल पार्क की दक्षिण सोनारीपुर रेंज के 27 वर्गकिमी के जंगल को उर्जाबाड़ से घेरकर अप्रैल 1984 में गैंडा पुनर्वास परियोजना शुरू की गई थी। तमाम उतार-चढ़ाव एवं साधनों व संसाधनों की कमी के बाद भी यह परियोजना काफी हद तक सफल रही है। स्वच्छंद विचरण करने वाले तीस सदस्यीय गैंडा परिवार का जीवन हमेशा खतरों से घिरा रहता है, क्योंकि इनकी रखवाली व सुरक्षा में तैनात पार्ककर्मियों को निगरानी करना तो सिखाया जाता है किंतु बाहर भागे गैंडा को पकड़कर वापस लाने का प्रशिक्षण नहीं दिया जाता है। इन अव्यवस्थाओं के कारण विगत एक दशक से तीन नर एवं दो मादा गैंडा उर्जाबाड़ के बाहर दुधवा नेशनल पार्क क्षेत्र की गेरुई नदी के किनारे तथा गुलरा क्षेत्र के खुले जंगल समेत निकटस्थ खेतों में विचरण करके फसलों को भारी नुकसान पहुंचा रहें हैं। जबकि दुधवा रेंज कार्यालय से करीब चार किमी दूर चौखंभा वनक्षेत्र में गौरीफंटा रोड पर पहली बार एक गैंडा बिचरण करते देखा गया। अब यह गैडा सोठियाना रेंज के जंगल में असुरक्षित घूम रहा है। यह वनक्षेत्र दक्षिण सोनारीपुर के उर्जाबाड़ वाले इलाके से 15-20 किमी दूर है। गैंडा वहां तक कैसे पहुंचा? यह बात अपने आप में वन विभाग की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिन्ह है।

इस गैंडा की घर वापसी के कोई प्रयास पार्क प्रशासन द्वारा नहीं किए जा रहे हैं। दुधवा के जंगल के चारों तरफ किनारे पर तमाम गांव आबाद हैं और वनक्षेत्र से सटे खेतों में फैंस तोड़कर बाहर विचरण करने वाले गैंडा लगातार फसलों को भारी क्षति पहुंचा रहे हैं। बीते दशक में मलिनियां गांव के पास गैंडा एक किसान को मार चुका है। तथा अलग-अलग गैंडों द्वारा किए गए हमलों में पौन दर्जन लोग घायल हो चुके हैं। यूपी की सरकार ने वनपशुओं द्वारा की जाने वाली फसलक्षति व जनहानि की मुआवजा सूची में 25 साल ब्यतीत हो जाने के बाद भी गैंडा को उसमें शामिल नहीं किया है। इससे बन विभाग गैंडा द्वारा पहुंचाई जाने वाली फसल क्षति का मुआवजा नहीं देता है। फसलों का नुकसान व जनहानि होने के बाद भी उसकी भरपाई न मिलने से आक्रोषित ग्रामीण खुले जंगल और खेतों के आसपास घूमने वाले गैंडों को कभी भी क्षति पहुंचा सकते हैं। दुधवा पार्क प्रशासन द्वारा गैडों की मानीयटरिंग व उनकी सुरक्षा के लिए अलग से चार हाथी व कर्मचारियों का भारी अमला लगाया गया है। लेकिन रेंज और वन चौकियों पर मूलभूत सुविधाएं उपलव्ध न होने से कर्मचारी अपनी इस तैनाती को कालापानी वाली सजा मानते है। विषम परिस्थियों में वे ड्यूटी को पूरी क्षमता के बजाय बेगार के रूप में करते हैं। जिससे गैंडों के जीवन पर भारतीय ही नहीं वरन् नेपाली शिकारियों की कुदृष्टि का हर वक्त खतरा मंडराता रहता है। गैंडा परिक्षेत्र में बाघ के हमलों और गंभीर बीमारियों की चपेट में आने से अब तक गैंडा के आधा दर्जन बच्चे मौत की भेंट चढ़ चुके हैं। आए दिन नर गैंडो के बीच होने वाले प्रणय द्वन्द-युद्ध में गैंडों के घायल होने की घटनाएं होती रहती हैं। नर गैडों की ‘मीयटिंग फाइट’ में घायल हुई एक मादा गैंडा की उपचार के अभाव में असमय मौत हो चुकी है। जबकि दुधवा प्रोजेक्ट टाइगर क्षेत्र में होने वाली मार्ग दुर्घनाओं में अक्सर वन्यजीव घायल होते रहते हैं, इसके बाद भी शासन ने अभी तक न दुधवा नेशनल पार्क में विशेषज्ञ पशु चिकित्सक का पद स्वीकृत किया है और न ही आज तक किसी पशु चिकित्सक की नियुक्ति की गई है।

दुधवा में अपने पूर्वजों की धरती पर पुनर्वासित बांके नामक पितामह गैंडा से हुई वंशबृद्धि से यहां तीस सदस्यीय गैंडा परिवार स्वच्छंद विचरण कर रहा है। एक ही पिता से हुई संतानें चार पीढ़ी तक पहुंच गई हैं। जिनके उपर विशेषज्ञों के अनुसार अनुवांषिक प्रदूषण यानी अन्तःप्रजनन -इनब्रीडिंग- का खतरा मंडरा रहा है। उनका मानना है कि अन्तःप्रजनन की विकट समस्या से निपटने के लिए यहां बाहर से गैंडा का लाया जाना जरुरी है। गौरतलब है कि दुधवा प्रोजेक्ट टाइगर में शामिल किशनपुर वनपशु बिहार तथा नार्थ-खीरी वन प्रभाग की संपूर्णानगर बनरेंज के जंगल और उससे सटे खेतों में पिछले करीब एक साल से मादा गैंडा अपने एक बच्चे के साथ घूम रही है। बन विभाग एवं पार्क प्रशासन इसकी सुरक्षा एवं निगरानी करने के बजाय यह कहकर अपना पल्लू झटक रहा है कि यह गैंडा नेपाल की शुक्लाफांटा सेंक्चुरी का है, जो पीलीभीत के लग्गा-भग्गा जंगल से होकर आया है और घूम-फिर कर वापस चला जाएगा। पूर्व में जब यह परियोजना शुरू की गई थी तब
सोलह हाथियों के बदले चार मादागैंडा नेपाल से लाए गए थे, अब एक नेपाली मादा गैंडा अपने बच्चे के साथ घूम रही है तो फ्री में मिल रही इस मादा गैंडा को यहां के गैंडा परिवार में क्यों नहीं शामिल कराया जा रहा है? वंयजाव विशेषज्ञों का मानना है कि प्रयास करके पार्क प्रशासन अगर इस मादा गैंडा को दुधवा के गैंडा परिवार में शामिल करा ले तो यहां के गैंडों के उपर मंडरा रहा इनब्रीडिंग यानी अंतःप्रजनन का खतरा आंशिक रूप से काफी हद तक टल सकता है। लेकिन पार्क के अफसर इस दिशा में कोई भी प्रयास नहीं कर रहे हैं। इससे लगता है कि पार्क प्रशासन गैंडा पुनर्वास परियोजना के प्रति कतई गंभीर नहीं है।

गैंडा पुनर्वास परियोजना के योजनाकारों ने तय किया था कि यहां की समष्टि में तीस गैंडा को लाकर बसाया जाएगा। उसके बाद फैंस हटाकर उनको खुले जंगल में छोड़ दिया जाएगा। उनका यह सपना तो पूरा नहीं हुआ वरन् गैंडों की बढ़ती संख्या को देखकर समष्टि के बृहद फैलाव, आवागमन की सुविधा, अंतःप्रजनन रोकने एवं संक्रामक संहारक तत्वों के विरुद्ध प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने के उद्देश्य से दक्षिण सोनारीपुर में इस समष्टि के निकट नई फैंस बनाने का प्रस्ताव शासन को भेजा गया था। वहां से स्वीकृति मिलने के बाद इस पर पांच साल पहले शुरू किया गया कार्य आज भी अधूरा पड़ा बजट आने का इंतजार कर रहा है। जर्जर हो चुकी 25 साल पुरानी उर्जाबाड अनुपयोगी हो गई है, लकड़ीचोर व शिकारी फैंस के तारों को काट देते हैं इससे भी गैंडो को बाहर निकलने में आसानी रहती है। वैसे भी गैंडों की बढ़ रही संख्या के अनुपात में अब उनके रहने वाले जंगल का भी क्षेत्रफल कम हो गया है। इसका क्षेत्रफल समय रहते बढ़ाया जाना  आवश्यक हो गया है साथ ही गैंडों की मानीटरिंग के लिए अत्याधुनिक साधन व सुरक्षा के लिए संसाधन उपलब्ध कराने की बात भी पार्क अधिकारी कहते हैं। किंतु यहां की समस्याओं का समाधान करने में न केंद्र सरकार गंभीर है और न ही प्रदेश की कोई दिलचस्पी ले रही है। जिससे ब्याप्त तमाम अब्यवस्थाओं के कारण क्षेत्र में गैंडा और मानव के मध्य एक नया संघर्ष जरुर शुरू हो गया है। इसके बाद भी दुधवा पार्क प्रशासन द्वारा संरक्षित क्षेत्र के बाहर घूम रहे गैंडों की सुरक्षा एवं उनको फैंस के भीतर लाने के कतई कोई प्रयास नहीं किए जा रहें हैं। जिससे इन गैडों के जीवन पर हरवक्त खतरा मंडराता रहता है। इनके साथ कभी भी कोई अनहोनी हो सकती है, इस बात से कतई इंकार नहीं किया जा सकता है।         
देवेन्द्र प्रकाश मिश्र  (लेखक वाइल्डलाईफर एवं पत्रकार हैं। दुधवा नेशनल पार्क के निकट पलिया में रहते है, इनसे dpmishra7@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।)

Apr 16, 2010

वह करुणा जिसने महाकाव्य की रचना करवा दी!

कृष्ण कुमार मिश्र* "कथित विकास की भेट चढ़ रही है, कई पक्षी प्रजातियाँ, इन्हें अभी भी बचाया जा सकता है, बशर्ते हमें अपने खलिहान, चारागाह, तालाब, और खेती के परंपरागत तरीके दोबारा वापस लानें होंगे!"

Apr 2, 2010

खीरी जनपद में तेंदुआ की खाल एंव हड्डियां बरामद

देवेन्द्र प्रकाश मिश्र*  पलियाकला-खीरी । सम्पूर्णानगर थाना पुलिस ने गुलदार की एक खाल बरामद करके चार अभियुक्तियों को गिरफतार किया है। इस तेंदुआ का शिकार साउथ-खीरी वन प्रभाग के भीरा परिक्षेत्र के जंगल में किए जाने का अनुमान लगाया जा रहा है।

विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था