International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Save Tiger

DON'T LET WILD TIGERS DISAPPEAR

Lady Rosetta

Potatoes with low sugar content and longer shelf life.

अबूझमाड़ के जंगल

जहां बाघ नही नक्सली राज करते हैं

खवासा का आदमखोर

जहां कांपती थी रूह उस नरभक्षी से

जानवर भी करते हैं योग

योगाचार्य धीरज वशिष्ठ का विशेष लेख

Mar 30, 2010

गौरैया बचेगी तो हमारे घरों के आस-पास की जैव-विविधता भी बच जायेगी!

 डेस्क* गौरैया नही हम निकले है रिहाइशी इलाकों के बाघ बचाने, क्या आप हमारे साथ है, गौरैया बची रही तो हमारे ग्रामीण व शहरी परिवेश में के सभी जीव-जन्तु बचे रहेगे!- कृष्ण कुमार मिश्र

Mar 29, 2010

एक भावुक जिजीविषा का त्रासद अंत!

डा० सत्येन्द्र दुबे* "चिड़िया" शब्द बोलते ही हमारे जेहन में सबसे पहले गौरैया का ही चित्र उभरता है। इसी तरह घोसला शब्द बोलते ही मस्तिष्क में तरह-तरह की आकृति वाले गौरैया-घोसलों का चित्र उभर आता है। कारण यह है कि शिशु-मानव ने अच्छी तरह निकट से और बार-बार गौरैया को ही देखने का अवसर प्राप्त होता है। मानव बस्तियों में गौरैया के घोसले ही बहुतायात में पाये जाते रहे हैं। लोक साहित्य में पशु-पक्षियों का जितना जिक्र मिलता है, उसमें गौरैया मनुष्य के इर्द-गिर्द ही दिखाई पड़ती है, उसका स्थान गाँव में दरवाजे पर नही बल्कि आंगन में इंगित होता है-

Mar 26, 2010

दुधवा टाइगर रिजर्व में संकटग्रस्त प्रजाति की माँ ने दिया शिशु को जन्म!

©कृष्ण कुमार मिश्र
 डेस्क*  दुधवा टाइगर रिजर्व में  "गैंडा प्रोजेक्ट क्षेत्र"  दक्षिण सोनारी पुर में एक गैंडा माँ ने शिशु को जन्म दिया। इसी के साथ दुधवा नेशनल पार्क में गैंडों की संख्या ३० हो गयी। जिसमें ९ नर, १३ मादा व ८ गैंडा (Rhino Calf) शिशु हैं, गौरतलब है,  उत्तर प्रदेश की तराई में खीरी व पीलीभीत जनपदों में आखिरी गैंडा सन १८७८ में किसी अंग्रेज अफ़सर की गोली का शिकार हुआ था, और इसी के साथ यह प्रजाति  तराई से विलुप्त हो गयी।
सन १९७९ में एशियन स्पेशियालिस्ट ग्रुप ने गैंडों के पुनर्वासन पर विचार किया और इसी आधार पर आई०यू०सी०एन० राइनो स्पेशियालिस्ट ग्रुप व इंडियन बोर्ड फ़ार वाइल्ड लाइफ़ ने दुधवा नेशनल पार्क में राइनो री-इन्ट्रोडक्शन (गैंडा पुनर्वासन) के कार्यक्रम की शुरूवात की। सन १९८४ ई० में आसाम की वाइल्ड लाइफ़ सेंक्चुरी से पांच गैंडें दुधवा के जंगलों में लाये गये, यह तारीख थी ३० मार्च, सन १९८४।

सन १९८५ में गैंडा पुनर्वास के तहत द्वतीय चरण में नेपाल से चार मादा गैंडा, १६ भारतीय पालतू हाथियों के बदले मंगाए गये। ताकि गैंडा प्रजाति में जैव-विविधता बरकरार रहे। इस प्रजाति के नौ सदस्यों से की गयी पुनर्वासन की शुरूवात, अब तमाम झंझावातों के बावजूद सफ़लता की राह पर है। गैंडा प्रजाति के ३० सदस्य इस बात के सूचक है, कि  दुधवा की धरती ने इन्हे पूरी तरह से स्वीकार लिया, इनके पूर्वजों की तरह।

Mar 25, 2010

बाघों की चिंता मात्र उनका रोजगार है!

© सीजर सेनगुप्त
देवेन्द्र प्रकाश मिश्र* नामचीन बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा इन दिनों भारत में ‘सेव अवर टाइगर्स्’ अभियान इण्टरनेट सहित अन्य तमाम तरह के प्रचार माध्यमों से बड़े पैमाने पर चलाया जा रहा है। सवाल है कि क्या इससे बाघांे की लगातार घटती संख्या में कोई कमी आ पायेगी? शायद नहीं, क्योंकि बाघों को बचाने के लिए ज़मीनी स्तर पर वन क्षेत्रों में इनके नाम पर हो-हल्ला मचाने वालों के द्वारा कोई भी प्रयास नहीं किए जा रहें हैं। कम्पनी हो या फिर तथाकथित वाइल्ड लाइफर हों वे केवल बयानबाज़ी के द्वारा बाघों के सहारे स्वयं को हाईफाई साबित करके अपनी ख्याति का डंका बजवाने के लिये सिर्फ बाघों के नाम को बेचने का काम कर रहे हैं।



हम रिहाइशी इलाकों के बाघों को बचाने निकले हैं!

कृष्ण कुमार मिश्र*  गौरैया हमारे घरों में शेर की हैसियत रखती है, वह इस पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है और सूचक है, जैव-विविधिता की



Mar 23, 2010

"सफरनामा-जहाँ काले नागों का बसेरा है, वहाँ एक घोंसला चिड़िया का था"

मयंक वाजपेयी* लखीमपुर के बस अड्डे पे खड़ी बस पे मै सीतापुर आने का इंतजार कर रहा था .मेरे सेलुलर पे घंटी आयी .देखा तो एक पत्रकार मित्र का फ़ोन था .मैंने हेल्लो कहा और उसने नया संबोधन दिया -गौरैया प्रणाम .और उत्तर में मै हंस  पड़ा .हम दोनों देर तक हँसते  रहे .ये हंसी कुछ जानी पहचानी थी .कुछ ऐसे ही मै तब भी हँसा था जब १२ वी के इम्तिहान में एक बार फेल होने के बाद पास होने का रिजल्ट मिला था .ऐसी ही हँसी शायद जख्मी योगेन्द्र यादव की भी थी जब कारगिल पे वो तिरंगा लहरा रहे थे .ऐसे ही शायद वो नौजवान भी हँसा होगा ...जब लाहौर के सेशन कोर्ट में उसने इन्कलाब जिंदाबाद और साम्राज्यवाद मुर्दाबाद का नारा लगाया होगा .

Mar 22, 2010

एक ऐसी प्रजाति जिसने अपनी संततियों का सारा हिस्सा खा लिया !


डा० देवेन्द्र* आदमी का इतिहास जब कभी सही ढ़ग से लिखा जायेगा तो चाहे उसमें चक्रवर्ती सम्राटों और उनकी लड़ाइयों का जिक्र न हो, गौरैया का जिक्र जरूर होगा! बगैर गौरैया, आदमी और उसकी कलाएं, कल्पनाएं, सुख-दुख के किस्से, उसके संगीत, उसकी प्रेम कहानियों के बारे में कुछ जान पाना संभव नही होगा। गौरैया की नन्ही आँखों में एक दिन जरूर लिखा और पढ़ा जायेगा सभ्यता का क्रूर इतिहास।


Mar 21, 2010

हमारे गाँव से आयी पाती..............

  आदरणीय,  बड़े भाई श्री कृष्ण कुमार मिश्र जी।
गौरैया संरक्षण को लेकर आप के बहुतेरे एस एम एस मुझे प्राप्त हुए। एस एम एस से गौरैया को बचाने के

"गौरैया बचाओं जन-अभियान" मना रहा है, "गौरैया वर्ष"


डेस्क* दुधवा लाइव की पहल पर तराई में चलाये जा रहे "गौरैया बचाओं जन-अभियान" के तहत कन्हैया उच्चत्त्तर माध्यमिक विद्यालय बेहजम में एक विशाल सेमिनार का आयोजन किया गया, जिसमें ६०० विद्यार्थियों ने सहभागिता की। तराई में विश्व गौरैया दिवस के प्रणेता कृष्ण कुमार मिश्र विद्यालय में बच्चों को संबोधित करते हुए कहाँ, कि हम गौरैया ही नही बचा रहे, बल्कि उस परिवेश में पाई जाने वाली पूरी की पूरी जैव-विविधिता  को बचाने की शुरूवात कर रहे है, क्योंकि जो पर्यावरण गौरैया के लिए अनुकूल होगा, तो जाहिर है, उसमे तमाम पक्षियों, सुन्दर तितिलियों और कीटों की सख्या में वृद्धि होगी। गौरैया मिशन के पीछे यह बड़ा मकसद है- हमारे रिहाइशी इलाकों की जैव-विविधिता को बचाना, क्योंकि तमाम मानव-जनित कारणों से यह जीव हमारे आस-पास से विलुप्त हो रहें हैं।
कृष्ण कुमार मिश्र ने सन २०१० को "गौरैया वर्ष" घोषित किया है, और पूरे वर्ष गाँवों, और शहरों मे अभियान चलाकर लोगों को घर-द्वार में अन्न बिखराने व जल भरे बर्तन को छतों पर रखने का संदेश दिया जायेगा। साथ ही घर की दीवारों व छज्जों आदि पर लकड़ी व गत्ते के बक्शे लटकाये जायेंगे ताकि यह चिड़िया अपने घोषलें बना सके।
हम गौरैया के साथ-साथ उस संस्कृति को बचाना चाहते है, जो हमारे लोक-जीवन में विद्यमान रही है और उन शब्दों को भी जो इन पक्षियों से संबधित है। "गौरैया विलुप्ति का मुख्य कारण है, उनकी सन्तति के लिए भोजन की।

Mar 20, 2010

खीरी जनपद में धूमधाम से मनाया गया गौरैया दिवस - मितौली रहा केंद्र

"एक संदेश - माननीय श्री जितिन प्रसाद, राज्य मंत्री पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस, भारत सरकार ने खीरी वासियों को विश्व गौरैया दिवस

मेरे घर भी आए गौरैया

विवेक सेंगर*  मेरे घर भी आए गौरैया....यही मेरी ख्वाहिश....बस दुआ करना!!

Mar 19, 2010

विश्व गौरैया दिवस पर सौजन्या संस्था का सन्देश

 डा० उमा कटियार*  २० मार्च "विश्व गौरैया दिवस" के अवसर पर अपने घर आँगन में डोलती प्यारी

मनुष्य जाति की मित्र नजदीकी पक्षी गौरैया


सुमन*
विश्व गौरैया दिवस पर
 गौरैया हमारे जीवन का एक अंग है मनुष्य जहाँ भी मकान बनता है वहां गौरैया स्वतः जाकर छत में

खीरी जनपद में "विश्व गौरैया दिवस"

©सतपाल सिंह*

दुधवा लाइव डेस्क* 
 विश्व गौरैया दिवस (World House Sparrow Day: 20 March, 2010) पर उत्तर

Mar 17, 2010

गौरैया


चारू "चंचल"* 

अपने अब्बा के-
आँगन में
मैंने
देखी हैं
गौरैया


जुगनी लौट के आयेगी तो उसके पंखों को हम फिर रंगेगे .....!

रागिनी*  (मिश्र जी, दुधवा लाइव के लिए मेरी पहली कहानी है .ये कहानी

Mar 16, 2010

पर वो नही आयीं!

दुधवा लाइव डेस्क*  वो रोज आती हैं, हमारे घर, आँगन उनका पसन्दीदा शैर-ए-गाह है, इधर-उधर फ़ुदकती,

गौरैया बचाओ


ऋषभ त्यागी* गौरैया बचाओ की मुहिम का हिस्सा बनकर मुझे बेहद ख़ुशी है. मैंने भी कुछ लिखना चाहा

Mar 15, 2010

तू कब आयेगी

 रेखा सिन्हा*  कल मेरे एक परिचित का एस एम एस आया,तो मुझे उसके और उस जैसी कई और जो उसके साथ मेरे घर आती थी, उनकी याद आ गयी। बात

Mar 14, 2010

परिंदों के लिए शहरों में पानी कौन रखता है

गौरया : © अजीत कुमार शाह*
 मयंक बाजपई*
अब मेरे शहर में परिंदों को पानी कौन रखता है
मिटटी के घर में ओसरे के नीचे.

Mar 13, 2010

अरे यें तो हिस्सा थीं हमारे घर का!

गौरैया: फ़ोटो साभार: सतपाल सिंह*
 कृष्ण कुमार मिश्र*
"माँ और गौरैया"
ये चिड़िया भी मेरी बेटी से कितनी मिलती-जुलती है, कहीं भी शाख़े-गुल देखे तो झूला डाल देती है|“

Mar 12, 2010

तराई में आन्दोलन की शक्ल अख्तियार कर रहा है, विश्व गौरैया दिवस

गौरैया, फ़ोटो साभार: सतपाल सिंह
 कृष्ण कुमार मिश्र* भारत प्रकृति के प्रति जितना अनुग्रहीत रहा, उतना शायद ही विश्व में कही कोई

Mar 10, 2010

क्या तराई से गायब हो जायेगा तेन्दुआ?

फ़ोटो साभार: मुदित गुप्ता

 देवेन्द्र प्रकाश मिश्र* विलुप्त होने की कगार पर हैं दुधवा के तेदुआं, बाघों को बचाने के लिये हो-हल्ला मचाने वाले लोगों ने बाघ

Mar 7, 2010

दो कवितायें- विश्व गौरैया दिवस २० मार्च के उपलक्ष्य में

फ़ोटो साभार: सतपाल सिंह
माँ चाहती है
   रामेन्द्र जनवार

माँ चाहती है
यूं ही बना रहे

Mar 4, 2010

बाघों के अस्तित्व पर सांख्यिकी का अज़ब खेल!

 देवेन्द्र प्रकाश मिश्र* & राजकुमार वर्मा* दुधवा के बाघों पर खतरा मंडराया,

Mar 1, 2010

पड़ोसी देश भी तुला है, बाघों का वजूद मिटाने में!

महबूब आलम* "दुधवा के बाघ बन सकते हैं इतिहास" भारत ही नहीं पूरे विश्व की चिंता का विषय बने बाघ का अस्तित्व खीरी के दुधवा टाईगर रिर्जव में खतरे में प़डता जा रहा है। नेपाली शिकारी दुधवा के बाघों का बड़े पैमाने पर शिकार कर रहे हैं। अभी हाल ही में खीरी के सीमावर्ती मित्र राष्ट्र नेपाल के कस्बा धनगढ़ी में पकड़े गए शिकारियों से यह बात एक बार फिर सामने आई है। पकड़े गए शिकारियों के पास से दो बाघों की खालें बरामद की गई थीं। यह कोई पहला मामला नहीं था जो नेपालियों द्वारा बाघों के शिकार की पुष्टि कर रहा हो इससे पूर्व भी कई बार नेपाली लोगों को पकड़ा गया है, जिसमें उन्होने दुधवा से बाघों का शिकार करने का खुलाशा किया है। पकड़ के बाद सामने आए मामले तो सिर्फ बानगी हैं। हकीकत यह है कि नेपाली समय-समय पर बराबर बाघ के शिकार कर रहे हैं और उन्हें रोकने वाला वन विभाग का अमला नाकाम है। किसी शिकारी के पकड़े जाने पर दो-चार दिन तो हर स्तर पर हो-हल्ला मचता है लेकिन फिर सब शांत।
   नेपालियों द्वारा किया जाने वाला बाघ का शिकार यूं हीं जारी रहा तो वह दिन दूर नहीं जब बाघ दुधवा के म्यूजियम में ही सिमट कर क्षेत्र के लिए एक कहानी बन जाएगा। नेपालियों के बढ़ते दबाव से निपटने के लिए स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर पर आज तक जो भी कुछ किया गया उसे पूरी तरह से सफल नहीं कहा जा सकता है। परिणाम है कि ‘‘ टाईगर प्रोजेक्ट ‘‘ को भी कोई सफलता हासिल नहीं हुई है। टाईगर प्रोजेक्ट दुधवा में वर्ष 1987 में शुरू हुआ था। इसको करीब 23 वर्ष हो चुके हैं। इस 23 वर्ष में समय-समय पर विभिन्न विधियों से हुई गणना को देखा जाए तो आंकड़े सौ और एक सौ छह के फेर में ही फसें हुए हैं। किसी गणना में बाघों की गिनती सौ पहुंच जाती है तो किसी में एक सौ छह। इन आंकड़ों को दिखाकर पार्क प्रशासन अपनी पीठ ठोंक लेता है जैसे उसने बाघों की संख्या में कोई बड़ा इजाफा कर डाला हो। जब कि टाईगर प्रोजेक्ट स्थापना से पहले यहां के हालात कुछ और थे। यहां के बाघ अनगिनत संख्या में शहर की सीमा तक विचरण करते थे। बाघ देखा जाना उस समय आम बात हुआ करती थी। जानकारों की मानें तो दुधवा में करीब दो सौ बाघ हुआ करते थे। फिर 23 सालों चले टाईगर प्रोजेक्ट के बाद एक सौ और एक सौ छह की गिनती दिखाकर अपनी पीठ थपथपाना अपने मुंह मिंयां मिठठू बनने जैसा ही लगता है। पार्क की यह गिनती नेपालियों द्वारा बाघ के शिकार की घटनाओं को धड़ल्ले से अंजाम दिए जाने के बाद खुद ही सवालों के घेरे में आ गई है। खैर जो भी हो लेकिन अब असल सवाल यह है कि जो बाघ बचे रह गए हैं उन्हें बचाने के लिए गम्भीरता से कुछ किया जा रहा है? या सिर्फ कागजी  कवायद ही जारी है? इसका जवाब तलाशने पर पता चलता है कि स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर पर सब कुछ जानते हुए भी लोग मौन हैं। इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि एक ओर तो सरकार  पूरे देश में बाघों को बचाने के लिए टी0वी0. रेडियो. अखबारों में ‘‘ सेव द टाईगर ‘‘ के नारे देकर उन्हे बचाने के लिए क्रांति छेड़े हुए है, वहीं दूसरी ओर दुधवा नेशनल पार्क के बाघ आए दिन नेपालियों का शिकार बन रहे हैं। आखिर दुधवा नेशनल पार्क के बाघों को बचाने के लिए चुप्पी क्यों? इस पर वाइल्ड लाइफ विशेषज्ञों की माने तो यह एक अंतर्राष्ट्रीय विषय है, और इसमें नेपाल राष्ट्र की सरपट वन-नीति काफी हद तक जिम्मेदार है। नेपाल सरकार ने अपने वनों और नेशनल पार्को की सुरक्षा फौजों के हवाले कर दिया है। जिससे भारतीय वनों पर नेपालियों का दबाव बढ़ता ही जा रहा है। नेपाली शिकारियों से निपटने के लिए स्थानीय पार्क प्रशासन नेपाल के सीमावर्ती जिले कैलाली के अधिकारियों के साथ समय-समय पर होने वाली मैत्री बैठकों में अपनी बात रखता है और नेपाल इसमें सहयोग का आश्वासन भी देता है पर अमल नहीं करता। बाघों को बचाने के लिए जरूरत है अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यवाहारिक वन-नीति की। फिलहाल जो भी हो लेकिन लम्बे अर्से से नेपालियों का शिकार हो रहे दुधवा के बाघों की संख्या अब इतनी नहीं रह गई है, कि वो सालों किसी नीति के बनने का इन्तजार कर सकें, उन्हें जरूरत है, तत्काल किसी ठोस कार्यवाही की जिससे वह इतिहास के पन्नों में सिमटने से बच सकें।
                                                
                                                   

महबूब आलम (लेखक एक प्रतिष्ठित अखबार से जुड़े हुए हैं, वन व वन्य-जीवों के सरंक्षण के मसलों पर लेखन कर रहे हैं, ये खीरी जनपद में दुधवा नेशनल पार्क के निकट पलिया में रहते हैं, इनसे m.alamreporter@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।)
                                                                                                    


विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था