International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Save Tiger

DON'T LET WILD TIGERS DISAPPEAR

Lady Rosetta

Potatoes with low sugar content and longer shelf life.

अबूझमाड़ के जंगल

जहां बाघ नही नक्सली राज करते हैं

खवासा का आदमखोर

जहां कांपती थी रूह उस नरभक्षी से

जानवर भी करते हैं योग

योगाचार्य धीरज वशिष्ठ का विशेष लेख

Feb 28, 2010

कतरनियाघाट वन्य-जीव विहार में एक तेन्दुआ मृत अवस्था में मिला!

 दुधवा लाइव डेस्क* २५/२६ फ़रवरी २०१० को दुधवा टाइगर रिजर्व के अन्तर्गत कतरनियाघाट वन्य जीव

इस्लाम में वृक्षों तथा जीवों का महत्व

 मशहूद हुसैन सिद्दीकी*  हज़रत अनस रज़ी अल्लाह अनूह से रवायत। मोहम्मद साहब से सुनी बातें जो कही

Feb 27, 2010

दुधवा में थारू समुदाय की रंग-बिरंगी होली

         
  देवेन्द्र प्रकाश मिश्र* "बदलते परिवेश का शिकार हुई थारूओं की होली"भारत-नेपाल सीमा पर दुधवा नेशनल पार्क के सघन वनक्षेत्र में महाराणा प्रताप सिंह का वंशज बताने वाले आदिवासी जनजाति थारूओं के चार दर्जन के आस-पास छोटे-बडे़ गांव आबाद हैं।

Feb 25, 2010

विश्व गौरैया दिवस

गौरैया, फ़ोटो साभार वर्ल्ड हाउस स्पैरो डे डाट आर्ग
 प्रथम विश्व गौरैया दिवस, नेचर फ़ॉर एवर सोसाइटी द्वारा, एंव बाम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी, कार्नेल

Feb 23, 2010

पानी रे पानी तेरा रंग कैसा..........!


जीनेश जैन* जल के लिए जंग, विश्व युद्ध के दौरान ईरान, इराक और इटली में सैनिक सेवाएं दे चुके नाथू बा उर्फ त्यागीजी मारवाड़ की धोरां धरती मे जल के लिए जंग लड़ रहे हैं। जोधपुर जिले की भोपालगढ़ तहसील के रतकुडिय़ा गांव के इस शख्स ने जल संरक्षण के लिए ऐसी अनूठी मिसाल पेश की है कि इनके प्रयासों के आगे सरकारी योजनाएं भी बौनी पड़ जाती हैं। नौकरी से रिटायर होने के बाद करीब ४५ वर्षों से इनके जीवन का एक ही लक्ष्य है-जल संरक्षण। इसके लिए इन्होंने अपना घर-बार तक छोड़ दिया और तालाब के किनारे ही बना ली कुटिया। यह कुटिया ही आज उनका सब कुछ है। इसलिए ही लोग उन्हें त्यागीजी के नाम से पहचानते हैं। किसी के भी शादी हो या कोई और सामाजिक समारोह अथवा गांव का मेला। हाथ में एक डायरी लिए कसाय सी काया वाला, हल्की सफेद दाढ़ी बढ़ाए कंधे पर गमछा डाले जल संरक्षण के लिए ग्रामीणों से सहयोग मांगते दिखाई देते हैं।
तीन तालाब और दर्जनों टांके
नाथू बा जब फौज की नौकरी छोड़कर आए तो रतकुडिया गांव भीषण पेयजल संकट का सामना कर रहा था। सरकारी पाइप लाइन थी नहींं। बारिश का पानी ज्यादा नही टिकता। इस पर उन्होंने गांव वालों से मिलकर कुछ करने को कहा। कुछ ने साथ दिया, कुछ ने अनसुना कर दिया। नाथू बा ने हार नहीं मानी। पहले एक टांका खुदवाया और फिर तालाब। उन्होंने रतकुडिय़ा के रेतीले धोरों के बीच तीन पक्के तालाबों और करीब दो दर्जन से अधिक टांकों का निर्माण करवाया है। यही नहीं उन्होंने इन तालाबों के तलों में सीमेंट की फर्श और चारों ओर पक्की दीवारें बनवा दी, ताकि पानी लम्बे समय तक रह सके। बरसात का पानी संग्रहीत करने के लिए उन्होंने आसपास की पहाडिय़ों से बहकर आने वाले नालों को नहरों का रूप भी दे दिया।
अकाल में भी भरपूर पानी
नाथू बाबा की मेहनत अकाल में भी रंग ला रही है। रतकूडिय़ां से करीब दो किलोमीटर दूर स्थित नाथूसागर पर आस पास की ढाणियां ही नहीं क्षेत्र के कई परिवार निर्भर है। मवेशियों के लिए भी इसमें साल भर पानी रहता है। इसके लिए तालाब के पास ही अलग हौद बना हुआ है। अकाल के वक्त आसपास के खेतों की फसलें भी नाथूसागर व अन्य तालाबों से सींच ली जाती है।
पक्षी सेवा भी
नाथू बाबा तालाब के लिए सहयोग राशि लेने पहुंचते है, लेकिन कई लोग नगदी की बजाय धान उनकी झोली में डाल देते हैं। इस धान का भण्डार पक्षी सेवा में काम आ रहा है। त्यागी बताते हैं कि रोजाना करीब एक बोरी अनाज कबूतरों व पक्षियों के लिए वे घर के पास ही बने चबूतरे पर डालते हैं। इन पर पूरे दिन लगा रहता है पक्षियों का जमघट।
गांव वालों ने किया काम का मान
नाथू बा को न तो आज तक सरकार और प्रशासन ने कोई सम्मान दिया और न ही कभी बाबा ने सम्मान की आशा की। लेकिन ग्रामीणों ने उनके प्रयासों का सम्मान करते हुए उनके द्वारा बनाए गए सबसे बड़े तालाब का नामकरण उनके नाम पर नाथूसागर कर जरूर उनके काम का मान किया।
इंजीनियर पोता-बहू अमरीका में
नाथू बा त्यागी दिखने में तो बहुत ही साधारण से नजर आते हैं, लेकिन उनके ज्येष्ठ पुत्र कंवराराम नौसेना से सेवानिवृत्त होने के बाद मुम्बई में रह रहे हैं। त्यागीजी का पोता रामकिशोर और उसकी पत्नी दोनों ही पेशे से इंजीनियर है और अभी अमेरिका में सेवारत हैं। हालांकि नाबू बा अब बीमार रहने लगे हैं और उनका मिशन भी धीमे पडऩे लगा है, लेकिन उनके होंसलों में आज भी पहले जितने ही बुलंद हैं। वे कहते हैं कि टांके और तालाब ही उनके परिवार हैं। अंतिम सांस तक वे इनकी रक्षा करते रहेंगे।
जीनेश जैन (लेखक राजस्थान पत्रिका में मुख्य उप-संपादक हैं, इससे पूर्व यू०एन०आई० में जर्नलिस्ट के तौर पर वर्षों का कार्यानुभव, पर्यावरण व जमीनी मसायल पर बेहतरीन लेखन, इनसे jinesh.jain@epatrika.com पर संपर्क कर सकते हैं।)  

Feb 21, 2010

प्रकृति के सौन्दर्य से उपजी मानव मस्तिष्क में कविता

Photo by: ©Krishna Kumar Mishra*
गौरव गिरि* प्रकृति के सौन्दर्य ने मानव मस्तिष्क में शब्दों का निर्माण करने के लिए प्रेरित किया।
जंगल में:-
इन खामोश जंगलों की
बेइंतहा खूबसूरती को
अक्सर महसूस किया है मैने,
उन राहों से गुजरते हुए
जो बनायी हैं, प्रकृति ने
अपने हसीन सहचरों के लिए
घने पेड़ों से झांकती हुई

एक और तेंदुए को ग्रामीणों ने मार गिराया

©Krishna Kumar Mishra
दुधवा लाइव डेस्क* तराई में एक और जानवर की मौत जिसे सरकारों ने वाइल्ड लाइफ़ एक्ट के तहत सरंक्षित प्रजाति के अन्तर्गत सेड्यूल वन में रखा है! कतर्नियाघाट वन्य-जीव विहार के मूर्तिहा रेन्ज में १९/२० फ़रवरी की रात को सेमरी घटही गाँव में एक तेन्दुए को ग्रामीणों ने घेर कर मार दिया, गौरतलब हो कि कतर्निया घाट वन्य-जीव विहार प्रोजेक्ट टाइगर के तहत दुधवा टाइगर रिजर्व का हिस्सा हैं, और तराई के जंगलों में तेन्दुओं का तादाद बस उंगलियों पर गिनने लायक बची है। इसके अलावा मई २००८ में इसी वन्य-जीव-विहार के निकट जिला खीरी की धौरहरा रेन्ज के एक गाँव में हज़ारों लोगों की भीड़ ने बड़ी ही दुर्दान्तता के साथ सरकारी अमले की मौजूदगी के बावजूद तेन्दुए पर ईंट और पत्थरों से हमले किए, फ़िर गोलिया चलाई, इसके बाद उसे जिन्दा ही आग में जला दिया, अभी तक जाँच चल रही हैं! इसके अलावा पिछले एक वर्ष में तीन तेन्दुओं को ग्रामीणों ने मार डाला, वाइल्ड लाइफ़ प्रोटेक्शन एक्ट  और सरकार के तमाम भागीरथी प्रयासों के बावजूद!
जंगल  तेन्दुओं का बाहर आना और ग्रामीणों के मवेशियों पर हमलें करने के पीछे क्या कारण इन पर भी तो विचार होना चाहिए! क्या जंगल में इन मांसाहारी शिकारी जानवरों का भोजन यानी शिकार तो नही कम पड़ गया, क्या इन जानवरों के शिकार को आदमी अपना शिकार तो नही बना रहा है, जैसा कि रोज खबरे मिलती हैं,
ग्रामीणों द्वारा जंगलों और गाँव की आबादी (ग्राम पंचायतों की जमीनें जो गाँव के आस-पास एक रिक्त घेरा मनाती हैं) पर अवैध कब्ज़ा। जिससे तमाम अवारा मवेशी इन जगहों मौजूद घास और खरपतवार से अपना पोषण करते थे, और जंगली जीव इन्ही तक आकर रह जाते थे। एक और बात गाँवों का बदलता परिवेश, जिसमें मवेशी या तो खुला घूमते थे या फ़िर घरों से दूर उनके आवास बनाये जाते थे, किन्तु अब प्रत्येक ग्रामीण मवेशी अपने घर पर ही बाँधता हैं, नतीजतन शिकारी व भूखे जंगली जनवरों की आवा-जाही ग्रामीणों के घरों तक हो गयी। फ़िर कोई भी जंगली जीव इरादतन किसी स्वार्थ या द्वेष के कारण किसी को नुकसान नही पहुंचाता उसे तो अपनी भूख मिटानी होती है, और हाँ इस धरती पर सभी को हक है अपनी भूख मिटाने का, केवल मनुष्य ही इस मूल-भूत अधिकार का स्वामी नही है, इस लिए जंगलों और वहां के बाशिन्दों के इलाकों में आदम जाति को घुसपैठ न करे और न ही उनके घर (जंगल) और शिकार को हानि पहुंचाये, क्यों कि यदि ये जानवर प्रकृति प्रदत्त गुणों को छोड़ दे, जैसा कि वे कभी-कभी मजबूरी में करते है, तो फ़िर क्या होगा मनुष्य का। जबकि मनुष्य बहुत पहले ही उस इंस्टिकंट को अलविदा कह चुका है, जिसे प्रकृति ने उसके जीन में कोड किया था।
लेकिन लगता है कि शायद अब आदमी को लग गया हैं, कि यह लोकतन्त्र सिर्फ़ और सिर्फ़ आदमियों के लिए है।
फ़ोटो- दो वर्ष पूर्व खीरी-बहराइच जिले में मारे गये तेन्दुयें का है,

Feb 20, 2010

दिल्ली बर्ड ग्रुप के सदस्यों ने किया हिन्दी पर भयानक हमला!

Photo by: Krishna Kumar Mishra
दिल्ली बर्ड ग्रुप के कुछ सदस्यों ने हिन्दी पर हमला बोला: ज्ञान पर किसी भाषा विशेष का अधिकार नही होता, बशर्ते हम अपनी भाषा में बेहतर चीजें लिखे और इसी का उदाहरण है दुधवा लाइव, इस आनलाइन हिन्दी पत्रिका का मकसद ही है कि अपने लोगों को अपनी भाषा में वन्य-जीवन की जानकारी उपलब्ध करायें ताकि सरंक्षण में मदद मिल सके। हमने वही किया साथ ही दुनिया की अन्य भाषाओं से ज्ञानवर्धक सामग्री का अनुवाद कर हिन्दी में प्रकाशित किया, भाषा यहां मुद्दा नही है, मुद्दा है, अपनी बात को अपनी भाषा में अपने लोगों तक पहुंचाने का, और हां यदि कोई जिज्ञासु हमारी बात को सुनना और जानना चाहता हैं तो वह हमारे सन्दर्भों को अपनी भाषा में अनुवादित कर सकता हैं, जैसा कि हम लोग हमेशा से करते आयें हैं!  हमने वह विषय चुना जिस पर किसी हिन्दी के बुर्जुआ तबके ने कभी कुछ लिखने-पढ़ने की कोशिश नही की, और अग्रेज़ी में इस विषय पर जबरदस्त काम हुआ, जैसा के इस भाषा में हमेशा होता आया है, किसी भी विषय की खिड़की खोल लीजिए "अग्रेजी के घर" में आप को अथाह भण्डार मिलेगा। लेकिन अंग्रेजी की इस संपन्नता में बहुत ही जन-बल ने काम किया और करता आ रहा है। यही कारण है कि वन और वन्य-जीवों पर भी इसी भाषा का एकाधिकार हो गया, लेकिन क्या इसका मतलब ये है कि किसी और भाषा में उस विषय पर कार्य ही नही किया जाय। यहां मैं उपरोक्त सन्दर्भ में कुछ अपने हिन्दुस्तानी महानुभाओं और विदेशियों की मनोदशा का जिक्र करने जा रहा हूं।

हिन्दी पर हमला करने वाले विदेशी,
मैटियास नारलंड, स्वीडेन 
14, फ़रवरी, 2010
lappkrabben@gmail.com

इन्होंने कुछ स्वीडिश में लिखकर भेजा, फ़िर कहा कि आप इसे नही समझ सकते। मैं आप को अंग्रेजी मे लिखने की सलाह देता हूं, यदि आप को पक्षियों की चिन्ता है। हो सकता है आप ये न जानते हो कि दिल्ली बर्ड विदेशी सदस्य भी रखता है। और उन लोगों का क्या जो भारत में रहते हैं, किन्तु हिन्दी नही जानते, पर सदस्य है दिल्ली बर्ड ग्रुप के।
इन्ही का अनुशरण करते हुए हमारे हिन्दुस्तानी भाई ने एक पत्र भेजा।
अर्जुन ए०आर०
arjunrammohan@rediffmail.com
15, फ़रवरी 2010

आप ने लिखा, प्रिय मिश्र जी, यह खुशी की बात है, कि इंटरनेट पर पक्षियों से संबधित संसाधनों की गुणवत्ता मौजूद है, जैसे आप ने अपनी सामग्री भेजी, किन्तु यह अच्छा होगा कि आप इस बात का खयाल रखे कि इस ग्रुप के सभी सदस्य हिन्दी नही समझ सकते। उदाहरण के लिए यद्यपि मैं थोड़ी हिन्दी बोल सकता हूं, किन्तु पढ़ नही सकता। और यह ग्रुप विदेशी सदस्य भी रखता है, इस लिए ऐसा प्रतीत होता है कि यह जगह उस बात के लिए ठीक नही है जिसे सब समझ नह सकते।

इन्ही का अनुशरण करते हुए एक भारतीय महिला जिनका नाम एलिज़ाबेथ थॉमस है! ने पत्र लिखा:
एलिज़ाबेथ थॉमस
lizacherian@yahoo.com
16, फ़रवरी 2010
मैं सोचती हूँ, कि यह अनुचित होगा कि यह पत्रिका अग्रेंजी कि जगह किसी और भाषा में हो, यदि कोई हिन्दी स्पीकर हिन्दी में विचारों का आदान-प्रदान करना चाहता है, तो वह नया ग्रुप शुरू कर सकता है।
मैं एक भारतीय हूं, किन्तु मैं निश्चित रूप से यह वन्य-जीवन पर आधारित पत्रिका को नही पढना चाहती।


सबसे इतर मैं उनकी बात करता हूं, जिन्होंने हिन्दी में शुरू किए गये इस न्यूज़लेटर की सराहना की।

एथनो-आर्निथोलोजी याहू ग्रुप ने  प्रकृति से संबधित इस प्रयास की सराहना की। सबसे पहले ग्लोबल आउल प्रोजेक्ट के निदेशक डेविड एच० जॉनसन ने दुधवा लाइव पर प्रकाशित लेख "जहाँ होती है, पक्षियों की पूजा" लेख को महत्व देते हुए, तमाम लोगों को सूचित किया, जिसमें बॉब गॉसफ़ोर्ड का मेल मिला.......

उन्होंने कहा कि प्रोजेक्ट आउल के निदेशक डेविड एच० जॉनसन द्वारा संज्ञान में लाया गया लेख "जहाँ होती है, पक्षियों की पूजा" जिसे वाइल्ड लाइफ़ बायोलाजिस्ट एवं नेचर फ़ोटोग्राफ़र कृष्ण कुमार मिश्र ने लिखा, के अंग्रेजी अनुवाद में हम असफ़ल रहे। इसलिए मैं दोबारा सभी को सूचित कर रहा हूं कि यदि इस महत्व-पूर्ण लेख का अनुवाद हिन्दी से अंग्रेजी में किसी व्यक्ति द्वारा किया जा सके, यह यकीनन आकर्षक जानकारी है, जिसका अंग्रेजी में अनुवाद हो सके।
दूसरा पत्र:
बॉब गॉसफ़ोर्ड
bgosford@gmail.com
17,फ़रवरी 2010
प्रिय कृष्ण
क्या कोई तरीका है, जिससे इस शानदार सामग्री का अंग्रेजी अनुवाद किया जा सके, मैं एथिनो-आर्निथोलोज़ी रिसर्च व स्टडी ग्रुप चलाता हूं, यदि आप मुझे इसे छापने की इज़ाजत दें तो, मैं चाहूंगा कि आप के लेख को हिन्दी/अंग्रेजी में हम अपने सदस्यों के लिए अपनी बेवसाइट पर प्रदर्शित करे, कई भारतीय एथनो-आर्निथोलोज़िस्ट इस वर्ष मई में, विक्टोरिया, ब्रिटिश कोलंबिया, कनाडा में एथनो-बायलोजी के सत्र में हिस्सा लेगे, मुझे भारतीय पक्षी विज्ञान और वहाँ के लोगों की पक्षियों के प्रति लगाव को जानने समझने में काफ़ी रुचि है।

बॉब गॉसफ़ोर्ड
१९ फ़रवरी २०१०
मुझे सलाह दे, कि मैं आप के लेख को एथिनो-आर्निथोलोज़ी रिसर्च व स्टडी ग्रुप पर दोबारा प्रकाशित करना चाहता हूं,
मोहम्मद दिलावर
dilawarmohammed@gmail.com
18, फ़रवरी 2010
मैं आप की बेवसाइट पर गया और मुझे यह पंसद आयी, मैं बहुत ही प्रभावित हूं, आप के इस प्रयास से, जिसमे आप ने हिन्दी को प्रथम भाषा के रूप में इस्तेमाल किया है। वन्य-जीवन के क्षेत्र में यह प्रयास यकीनन लोगों में सरंक्षण का महत्व बतलाने में मददगार होगा।
मैं इस बात से और भी प्रभावित हूं कि  आप द्वारा चुने गये विषय उच्च गुणवत्ता को समाहित किये हुए हैं। हम अपनी बेवसाइट पर एक संक्षिप्त  लेख दुधवा लाइव पर लिखकर इसका लिंक देंगे, और इसे सभी पक्षी वैज्ञानिकों के समूहों को भेजेंगे।
यदि मैं आप की कोई मदद कर सकूं, तो कृपया अवश्य सूचित करे। यह मेरी खुशनसीबी होगी।

     यहाँ एक बात तो समझ में आती है कि विदेशी यदि कहे कि आप हिन्दी के बज़ाय अग्रेंजी में लिखे तब तो किसी हद तक ठीक है, लेकिन यहाँ यह भी सवाल खड़ा होता है, हम रूसियों, और जर्मन की तरह अपनी भाषा का इस्तेमाल क्यों न करे, जिसे पढ़ना हो वह इसका अनुवाद कर ले, जैसा कि हम सदियों से करते आये हैं। लेकिन अफ़सोस तब हुआ जब हिन्दुस्तानी ही मुझे इस बात की सलाह देने लगे कि हिन्दी में मत लिखो, और तुर्रा इस बात का कि वह हिन्दी में इस जानकारी को पढ़ना भी पसन्द नही करेगें, जबकि कुछ जागरूक विदेशी इस जानकारी को लेकर इतना उत्सुक हैं, कि इस पत्रिका के लेखों का अनुवाद करा रहें हैं।
खैर मैं दिल्ली बर्ड ग्रुप पर तब तक यह जानकारी भेजता रहूंगा, जब तक इस ग्रुप के माडरेटर जो कि भारतीय ही है, मना नही करते! क्योंकि मुझे अपनी बात अपनी भाषा में कहनी हैं और उसका दस्तावेज़ भी तैयार करना है। जिस किसी को आवश्यकता हो वह अनुवाद कर सकता है। यहाँ यह भी बता देना मैं जरूरी समझता हूं, कि मै कई वर्षों से दिल्ली बर्ड ग्रुप का सदस्य हूं, और अग्रेंजी में लिखता आया हूं, इसके अलावा अन्तर-राष्ट्रीय जर्नल्स में लेखन किया हैं, और मैं ही नही भारत के सभी वो लोग जो राष्ट्र-भाषा में लेखन कर रहे उनके अग्रेजी या अन्य विदेशी भाषाओं के ज्ञान पर दिल्ली बर्ड के सदस्यों द्वारा बिना सोचे समझे कोई मन-गढ़न्त खयाल पैदा कर लेना भी हास्यापद होगा, क्योंकि भारतीयों की आंग्ल विद्या के ज्ञान से विदेशी सदैव हतप्रभ रहे हैं।

कृष्ण कुमार मिश्र
krish_stork@hotmail.com
member delhibird group (yahoo)





Feb 19, 2010

क्या खत्म हो जायेगा भारतीय बाघ

फ़ोटो साभार: सीजर सेनगुप्त*
कृष्ण कुमार मिश्र* धरती पर बाघों के उत्थान व पतन की करूण कथा: बाघ जंगल का कुशल कूटनीतिक चाणक्य होता है, किन्तु कंकरीट के जंगलों में रहने वाले चाणक्यों की कुटलनीति ने उसके अस्तित्व पर ही सवाल खड़े कर दिये है इसी कारण दुनिया भर के संरक्षणवादियों व प्रकतिप्रेमियों ने बाघ संरक्षण की मुहिम चलायी जिसे दुनिया की तमाम सरकारों ने मंजूरी दी है। इन सब इंतजामों के बावजूद बाघ का शिकार उसकी खाल व अंगों के लिए जारी है। उन्नीसवीं सदी की शुरूवात में पूरी दुनिया में बाघो की सख्या लगभग 100,000 थी अकेले भारतीय उपमहाद्वीप में 40,000 बाघ थे किन्तु अब धरती पर सिर्फ 3200 रॉयल बंगाल यानी भारतीय बाघ ही बचे है, भारत में बाघों की सरकारी सख्या 1411 बतायी जा रही है, पर हकीकत में यह संख्या इससे भी कम होगी। ऐसा भारत के तमाम बाघ संरक्षको व वैज्ञानिकों का मानना है, उत्तर प्रदेश में उत्तरांचल के सन 2000 में अलग हो जानें के बाद 2001 में कराए गयी टाइगर गणना के अनुसार 284 बाघ है। जबकि उत्तरांचल बनने से पूर्व पूरे प्रदेश में 1999 की बाघ गणना के मुताबिक 472 बाघ थे। द इण्टरनेशनल यूनियन फार कंजर्वेशन आफ नेचर एण्ड नेचुरल रिर्सोसेज ‘आई यू सी एन’ ने अपनी पुस्तक रेड डाटा बुक में संकट ग्रस्त प्रजाति के रुप में रखा है भारत में वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन एक्ट 1972 व 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुवात कर बाघ संरक्षण में महत्वपूर्ण कदम उठाये है लेकिन तमाम कानूनों व प्रयासो के बावजूद बाघ जंगलो से गायब होते जा रहे है कारण खराब तन्त्र व लोगों में वन्य जीवो के महत्व के प्रति जागरुकता का न होना जो इस बेहतरीन प्राणी की मिटती नस्ल के जिम्मेदार है। उत्तर प्रदेश की तराई जिसे विश्व प्रकति निधि ने तराई आर्क लैण्ड के रुप में चिन्हित किया है बाघों का प्रकृतिक व पौराणिक आवास है बाघों के इस इलाके में खीरी के जंगलों का विशेष महत्व है जिसकी वजह है यहां के घने शाखू के जंगल व शारदा, घाघरा व गोमती जैसी विशाल नदियां जो वन्य जीवों को उनके अनुकूल वातावरण प्रदान करती है खीरी के जंगलों में जंगली रंग बिरंगे पुष्प वाले पौधे, औषधीय वनस्पतियां व कई तरह के विशाल वृक्ष,  बाघ, गैण्डा, हाथी, भालू, हिरनों की पांच प्रजातियां, बन्दर, 350 से अधिक पंक्षियों की किस्में, तमाम किसमों की रंग बिरंगी तितलियां व अन्य बहुत से वन्य जीव व वनस्पतियां पाई जाती है यहां जो सबसे खास बात है वह है बाघ जिस कारण खीरी के जंगल पूरी दुनिया में जाने जाते रहे है इस अरण्य जनपद के सुरम्य जंगलों को मनुष्यों ने बहुत नुकसान पहुचाया बावजूद इसके अभी भी यहाँ बहुत कुछ बचा हुआ है। इस अपार प्राकृतिक संपदा के कारण सन 1977 में यहां के जंगलों के उत्तरी हिस्से को जो अन्तराष्ट्रीय भारत-नेपाल सीमा से जुड़ा हुआ है, को दुधवा नेशनल पार्क का दर्जा दिया गया। ताकि वन्य जीवन को बेहतर सुरक्षा मिल सके सन 1987 में किशनपुर वन्य जीव बिहार को मिलाकर टाइगर प्रोजेक्ट के तहत इसे दुधवा टाइगर रिजर्व बनाया गया, इस रिजर्व के तहत खीरी के जंगलो का 884 वर्ग किलो मीटर का भूभाग आता है इसके अलावा दक्षिण खीरी वन प्रभाग व उत्तर खीरी वन प्रभाग के जंगल है जहां मानव आबादी के दबाव व शिकार के कारण वन्य जन्तु तो न के बराबर ही है किन्तु फिर भी यह जंगल बहुत से जीवो के घर है। खीरी के वनों में लगभग 100 बाघ है

कुछ समय पहले, विश्व प्रकृति निधि द्वारा चिन्हित किए गयें बाघों के 76 प्राकृतिक आवासों में से जो 20 महत्वपूर्ण स्थान है, उनमें से एक खीरी के जंगल भी है जो तराई आर्क लैण्ड प्राजेक्ट का एक हिस्सा है। बाघ संरक्षण के लिए उन 13 देशों ने मिलकर बैठके की है जहां बाघ प्राकृतिक तौर पर पाए जाते है पूरी पृथ्वी पर बाघ की आठ प्रजातियां पाई जाती थी जिनमें अब जीवित बची प्रजातियां पांच है - भरतीय बाघ, इण्डो चायनीज बाघ, साइबेरियाई बाघ, साउथ चायनीज बाघ और सुमात्रन बाघ जो तीन प्रजातिया विलुप्त हो गई वह है कैस्पियन बाघ, जावन बाघ, व बाली बाघ इन नष्ट हुयी बाघ की नस्लो का मुख्य कारण था शिकार व उनके आवासो यानी जंगलो को नष्ट कर देना लेकिन अब बचे हुए बाघो पर भी विलुप्ती का संकट मड़रा रहा है और इन नस्लो में भारतीय बाघ यानी रायल बंगाल टाइगर के संरक्षित रहने की अत्यधिक संभावनाए है यदि इन बाघों के अतीत पर हम गौर करे तो आज से 6 करोड़ वर्ष पूर्व जब धरती पर डायनासोर(रेप्टाइल) का राज था तब इन बाघों के पूर्वज जिन्हे मियासिड (स्तनधारी) कहते है मौजूद थे। ये जीव आकार में छोटे शरीर लम्बा व लचीली छोटी टांगों वाले होते थे कई लाखों वर्षो बाद इन्ही मियासिड से क्रमिक विकास में कई तरह की प्रजातियां विकसित हुयी जिनमें बिल्ली, भालू, कुत्ता, और नेवले है। आज धरती पर 37 तरह की बिल्लियां पायी जाती है बाघ उनमे से एक है यहा पर एक बात महत्वपूर्ण है कि लाखो वर्षो पूर्व जो बाघ की तरह का जानवर पाया जाता था जिसके शिकारी दांत तलवार की तरह लम्बे व पैने होते थे वह बाघ का असली पूर्वज नही है बल्कि वह फेलाइन ‘बिल्ली’ परिवार की दूसरी शाखा के जीव थे जो लाखो वर्ष पूर्व विलुप्त हो गये। मौजूदा बची हुई बिल्लयों में बाघ आकार में सबसे बड़े होते हैं भारतीय नर बाघ 10 फीट तक लम्बा व 550 पांउड तक के वजन वाले हो सकते है जबकि मादा बाघ 8 1/2 फीट लम्बे व 350 पांउड तक वजन वाले हो सकते है मादा की गर्भावस्था लगभग सवा तीन महीने की होती है ये 1-5 बच्चों को जन्म देते है जबकि सामान्यतः बाघ 1-3 बच्चो को जन्म देते है और बच्चे पैदा होने के आठ सप्ताहों में ही मां से शिकार करना सीखने की चेष्टा करने लगते है छह महीनों में ये बच्चें शिकार करने की आधारभूत जानकारियां हासिल कर लेते हैं और दो वर्ष बाद बाघ के शावक शिकार में पूर्णतया पारंगत हो जाते है। शरीर मे बड़े आकार के होने के कारण इनहे शिकार भी बड़ा चाहिए होता है ये रात्रि में शिकार के लिए बहुत लम्बा रास्ता तय कर सकते है मनुष्य की बढ़ती आबादी व जंगलों के नष्ट हो जाने से इनके शिकार में कमी आती जा रही जिस कारण कभी-कभी इनके व मानव के मध्य संघर्ष छिड़ जाता है।


सदियों पहले जब भारत भूमि पर लाखों बाघ स्वछन्द विचरण करते थे और मनुष्य भी अरण्यों में इन्ही के साथ शन्ति से रहता था हमारे ऋषि, मुनि तो घने वनों मे ही साधना करते थे लेकिन क्या आप ने कभी सुना या किसी पौराणिक दस्तावेज मे पढ़ा कि किसी बाघ ने किसी ऋषि को खा गया वजह बिल्कुल साफ थी कि तब मानव इतना लालची नही था न तो वह जंगलों कोई नुकसान पहुचांता था और न ही उन जंगलों में रहने वाले पशु-पक्षियों को। हमारा पौराणिक इतिहास जानवर व मानव के मध्य अतुलनीय सामंजस्य का उदाहरण है। किन्तु विदेशी आक्रन्ताओं ने जब भारत भूमि पर कदम रखा तो हमारे जंगल के इस बादशाह पर खतरा मड़रानें लगा क्योंकि इन लोगों ने जब इस अदभुत ताकत व आकर्षक जीव को देखा जिसके ये लोग सिर्फ किस्से सुनते थे तो ठनहो ने अपनी बहादुरी की शेखी बघारने के लिए बाघ को मारना शुरु कर दिया ,और शेरखान जैसे नामों वाली उपाधियों से स्वंम को महिमामंडित करने लगे इसके बाद ब्रिटिश उपनिवेश में बाघों का शिकार जोरों से शुरु हो गया हमारे देशी कथित राजाओं व ताल्लुकेदारों ने अंग्रेजो की तर्ज पर बाघ का शिकार शुरु कर दिया और ज्यादातर ये शिकार उन अंग्रेज अफसरों को खुश करने के लिए होते थे जिनसे इनकी कोई स्वार्थ सिद्धि होती, यूरोप में उस समय महिलायों में टाइगर की खाल की पर्स व कोट पहननें का फैशन जोरो पर था। पुरुष भी बाघ की खाल को मढ़वाकर अपने ड्राइंगरुम में टांगना अपनी शान समझते थे, ज्ञात प्रमाणों में भारत में बाघ ब्रिटिश उपनिवेश के वक्त सबसे ज्यादा मारे गये। आज जब पूरी दुनिया इन वन्य जीवो के महत्व व हमारे पारिस्थितिकी तंत्र मे उनकी अहम भूमिका को समझ गयी है और वन्य जीवो व वनों को बचाने के लिए एक समुदाय ही अस्तित्व में आ गया है और सरकारी स्तर पर वन्य जीवों के संरक्षण के लिए तमाम कानून बनाए गये है और भारी धन खर्च किया जा रहा है तब भी कुछ लोग अपनी प्रकृति मां के अंगों यानी जंगलों व उनमें रहने वाले पशु पक्षियों को नष्ट करने पर तुले हुए है और कुछ सरकारी लोग तो मानवभक्षी होने का झूठा लबादा इन निरीह जानवरो पर डालकर अपने अन्दर दबी हुई शिकारी प्रवत्ति के चलते इनको मार डालते है और मानवभक्षी व खूंखार बाघ या तेन्दुआ को मारनें का तमगा व प्रसद्धि हासिल कर लेते है।
photo courtsey: tigerhomes.com

उत्तर प्रदेश के तराई के जंगल बाघों का प्राकृतिक आवास है सदियों से ये स्वर्णिम आभा लिए काली धारी वाला जीव इन जंगलों में राज करता आया है किन्तु मानव द्वारा इनके घरों में अतिक्रमण करने से अब भारत का यह राष्ट्रीय पशु अपने अस्तित्व को बचाए रख पाने के लिए संघर्षरत है।
आज १४११ का जो आँकड़ा पेश किया जा रहा है, उस पर भी यकीन कर पाना मुश्किल है, शायद यह सख्या इससे भी बहुत नीचे होगी, क्योंकि उजड़ते आवास, शिकार, और बेमानी हो चुकी सरकारी नीतियों के चलते भारतीय बाघ  इस धरती से विलुप्त हो रहा है, और उसी के साथ विलुप्त हो जायेंगे जंगल और उनमे रहने वाले तमाम जीव भी क्या ये आप ने सोचा है कभी? यदि आप सभी सरकारी योजनाओं के भागीरथी! प्रयासो पर नज़र दौड़ाये तो आप देखेंगे कि इन योजनाओं से पहले बाघों की सख्या ज्यादा थी और उन तमाम कवायदों के बाद निरन्तर घटती रही है! क्या सरकारों को अपनी इस बेनतीजा रही कोशिशों के बाद के नतीजों पर शर्म नही आती। आज सिर्फ़ बड़ी-बड़ी परियोजना, आधुनिक तरीकों से गणना, डाक्यूमेन्ट्री फ़िल्में, फ़ोटोग्राफ़ी और बड़ी-बड़ी बातों के सहारे बाघ सरंक्षण की बाते हो रही हैं, क्या इससे जंगल में वृक्ष उग आयेगे या घास के मैदान विशाल हो जायेंगे?,  बाघों और उनके शिकार (prey&predator) के मध्य संतुलन कायम कायम होगा?, ये सब वो बाते हैं जिन्हे ये कोई सरकारी योजनायें पूरा नही कर पा रही हैं, चाहे फ़िर वह जे०एफ़०एम० हो या तराई-आर्क परियोजना जिसमें जंगलों की श्रंखलायें आपस में जोड़ने का काम या चर्चा तकरीबन पिछले १० वर्षों से हो रही है।  जंगलो के विस्तार के लिए वन-भूमि व ग्राम-पंचायतों की भूमियों पर कितना वृक्षारोपड़ हुआ, और कितना सफ़ल रहा है, ये सवाल है हमारी इन्तजामियां पर?

कृष्ण कुमार मिश्र ( लेखक: वन्य-जीव सरंक्षण व अध्ययन के लिए प्रयासरत हैं, उत्तर प्रदेश के  लखीमपुर खीरी में रहते हैं, इनसे 
dudhwajungles@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं)







(फ़ोटो साभार: सीजर सेन्गुप्त, आप वन्य-जीव प्रेमी है, वन्य-जीवन की  फ़ोटोग्राफ़ी में महारत, पेशे से एक प्रतिष्ठित "थायरोकयर पैथालोज़ी" के जनरल मैनेजर हैं, आप से workcaesar@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।)

Feb 18, 2010

कुछ इस तरह नष्ट किये जा रहे हैं गिद्धों के आवास

फ़ोटो साभार: आदित्य रॉय*
आदित्य रॉय* अहमदाबाद में आखिर क्या है, गिद्धों का भविष्य: आई आई एम के नज़दीक मौजूद नीम-चमेली (Indian Cork: Millingtonia hortensis) के  वृक्ष, जो गिद्धों के आवास हैं। यहां तकरीबन १० वर्षों से यह पक्षी अपना बसेरा बनाये हुए है, पर अब लगता है कि यदि ज़ल्द ही कोई प्रयास न किए गये तो ये प्रजाति इस जगह से पूरी तरह खत्म हो जायेगी। भारतीय गिद्ध (White-rumped vulture) खतरे में पड़ी प्रजाति के अन्तर्गत सेड्यूल I  में रखा गया है,  इसके बावजूद इनके आवास उजड़ते जा रहे हैं, सरकारी अमलों के द्वारा प्रकृति सुरक्षा में बरती जा रही लापरवाहियों की ऐसी ही एक  घटना हैं, जो बयाँ करती है इन परिन्दों का दर्द जिसे शायद हम समझने की कोशिश नही करना चाहते? मसला  अहमदाबाद के आई०आई०एम० और छावनी शाही बाग का है, जहां अभी भी तकरीबन १०० गिद्ध मौजूद हैं। आई०आई०एम० इलाके में ग्रेस नाम के एक पुराने बंगले में एक नीम-चमेली (बुच) का ५० फ़ीट ऊँचा वृक्ष था ,जिस पर गिद्ध अपने घोसले बनाते थे, इसके अलावा दो अन्य वृक्ष भी थे, जो बसेरा थे इन गिद्धों के। बंगले के मालिक ने सन २००९ की शुरूवात में इसे एक विल्डर के हाथों बेंच दिया। मार्च में उस विल्डर ने इस पुरानी बिल्डिंग को को धराशाही कर दिया। इसी वक्त मुझे मेरे मित्र पर्यावरणविद्द कार्तिक शास्त्री द्वारा मालूम हुआ कि अब बंगलें में स्थित तीनों वृक्षों को भी काट दिया जायेगा। इस वक्त नीम-चमेली (बुच) के वृक्ष पर एक घोसला मौजूद था। 
इस सूचना के सन्दर्भ में मैने अहमदाबाद नगर निगम के उद्यान अधिकारी को सूचित किया, उन्होंने कर्मचारियों को भेजकर बिल्डर को नोटिस दी, कि कोई भी वृक्ष बिना नगर निगम की अनुमति के नही काटा जायेगा। उस वक्त तो इन वृक्षों की कटाई तो रूक गयी, और यह खबर एक स्थानीय अखबार में भी प्रकाशित हुई।
किन्तु उस गिद्ध ने अपने अवास के आस-पास हो रही निर्माण गतिविधियों के कारण अपने घोसले को छोड़ दिया।
कुछ दिनों बाद हमने उस गिद्ध के बच्चे (Juvenile) को रेस्क्यू कर, निर्जलन(Dehydration) होने की वजह से  वन चेतना केन्द्र (VCK) में इलाज कराया जिसका रिकार्ड वन चेतना केन्द्र के रिकार्ड में दर्ज़ हैं।  बच्चे  को खो देने के बाद अब गिद्ध ने उस घोसले को परी तरह से छोड़ दिया, और उस स्थान को भी, मेरे तीन वर्ष के सर्वेक्षण के अनुसार गिद्ध तीन वर्षों से इसी वृक्ष का इस्तेमाल घोसला बनाने के लिए करता था, इसलिए ये आशा थी, कि अगले वर्ष भी यह पक्षी अपना घोसला यही आकर बनायेगा।
दो सितम्बर २००९ की सुबह जब मैं अपनी बालकनी पर पहुंचा तो मैं अवाक सा रह गया, क्योंकि उस बंगले वाली जगह से बुच का पेड़ नदारद था। यह वृक्ष रातों-रात काट डाला गया था। मैने उस कटे हुए वृक्ष की तस्वीरें खींची। और इन तस्वीरों को उन तस्वीरों को भी शामिल किया, जिनमें वृक्ष मौजूद  हैं, और उस पर १२-१५ गिद्ध बैठे हुए है, पर्यावरण सरंक्षण में कार्य कर रही संस्थाओं को भेज दिया। 
किन्तु दूसरे दिन मैने देखा कि वे लोग दूसरे वृक्ष को भी काट रहे हैं! मैने तत्काल निदेशक उद्यान नगर निगम अहमदाबाद को सूचित किया, वे स्वंम मौके पर आये और वृक्ष की कटाई रूकवा दी। पर तीसरे दिन यह वृक्ष भी काट डाला गया। अब मैं यह नही समझ पा रहा था, कि कैसे एक सीनियर अफ़सर वृक्ष को कटने से बचाने में असफ़ल रहा। इस जगह पर एक बार फ़िर मैं और निदेशक उद्यान नगर निगम वहाँ पहुंचे, कि आखिर बिना उनकी इज़ाजत के यह पेड़ कैसे काटा गया!
यह घटना भी सात-आठ सितम्बर २००९ को एक प्रतिष्ठित अखबार में प्रकाशित हुई। आखिर अब मैनें प्रमुख वन-सरंक्षक से इस बावत बात की, ताकि वे कोई कार्यवाही करे। उन्होंने फ़ौरन अपने कनिष्ठ अफ़सरों को मौके का जायजा लेने भेज दिया......अब वन विभाग परिदृश्य में आ चुका था!
उन्होंने जाँच प्रारंभ की, जिसके तहत उस बिल्डर और मुझसे भी पूंछ-ताछ की गयी। इसी वक्त मुझे जाँच अधिकारी से ज्ञात हुआ कि बिल्डर ने इन वृक्षों को काटने के लिए चार-पाँच महीने पूर्व ही 24000 रूपये की फ़ीस के साथ आवेदन किया था। पर इस आवेदन के जवाब में अभी तक वन-विभाग मौन ही था! यानी अभी तक वन-विभाग ने न तो बिल्डर को पेड़ काटने की अनुमति दी थी, और न ही उसके निवेदन को खारिज़ किया था?
गौर तलब ये है कि, अहमदाबाद नगर निगम ने वन-विभाग को इस बावत कोई सूचना नही दी गयी जबकि मसला सरंक्षित प्रजाति के आवास (हैविटेट) का था, जो तेजी से विलुप्त हो रही है!
यदि ऐसे ही विकास के नाम पर पक्षियों के बसेरे उजाड़े जाते रहे तो एक दिन जरूर आसमान इन खूबसूरत परिन्दों से खाली हो जायेगा, यह मात्र एक उदाहण है, पर यहाँ तो पूरे मुल्क में ही सरकार व हमारे लोगो द्वारा संवेदनहीनता दिखाई जा रही है, जीवों और उनके आवासों के प्रति!

*वन-विभाग ने भी सात महीने गुजर जाने के बाद भी कोई छान-बीन नही की, जबकि यह मामला मार्च २००९ में ही अखबारों के माध्यम से प्रकाश में आ चुका था!
*पूर्व में गिद्धों व उनके इन आवासों का कोई दस्तावेज़ नही तैयार किया गया, जिससे इन्हे मानव-जनित कारणों से नष्ट किये जाने से पहले बचाया जा सके!
*गिद्धों के बसेरों को उजाड़ने के लिए उस बिल्डर को सज़ा के तौर पर प्रति वृक्ष १००० रूपया जुर्माने के तौर पर लिया गया।
*क्या यह नगर निगम अधिकारियों द्वारा बिना मुसीबत में पड़े, वृक्ष कटवाने का तरीका तो नही है?
*क्या यह अधिकारियों द्वारा जान बूझ कर किया गया? (अनुवाद: कृष्ण कुमार मिश्र)

आदित्य रॉय (लेखक मानव आनुवंशिकी के छात्र हैं, अहमदाबाद गुजरात में रहते हैं, पक्षी सरंक्षण के लिए संघर्षरत इनसे आप adi007roy@gmail पर संपर्क कर सकते हैं)

Feb 17, 2010

भारत की वन-नीति में बदलाव आवश्यक

फ़ोटो: साभार-सीज़र सेनगुप्त*
देवेन्द्र प्रकाश मिश्र* आजादी के बाद बनी भारतीय वन-नीति की समीक्षा वर्ष 1988 में की गई थी। लेकिन परिस्थितियों के अनुसार उसमें हेर-फेर किए बिना यथावत् लागू कर दिया गया, जबकि वर्ष 1975 में नेपाल राष्ट्र द्वारा अपनाई गई वन-नीति का भारतीय वनों पर प्राकृतिक एवं मानवजनित कारणों का विपरीत प्रभाव पड़ा है। किंतु पैंतिस साल व्यतीत हो जाने पर भी भारतीय वनों पर पड़ रहे कुप्रभावों को निष्प्रभावी करने के लिये भारत सरकार द्वारा अभी तक कोई ठोस वननीति नहीं तैयार की गई है। जबकि भारत-नेपाल सीमावर्ती भारतीय वनों पर बढ़ रहे नेपालियों के दबाव को रोकने, वन संपदा व जैव विविधता की सुरक्षा के लिये वर्तमान वन-नीति में बदलाव किया जाना अति-आवश्यक हो गया है।        
भारत के सभी राष्ट्रीय उद्यानों एवं वन्य-जीव बिहारों में दक्षिण भारत की अपेक्षा उत्तर भारत के हिमालय की तराई में आबाद राष्ट्रीय उद्यान एवं वनपशु बिहार सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील हैं। देश के वनों की सुरक्षा के लिये आजादी के बाद 1952 में पहली ‘वन-नीति’ बनी थी। इसके बाद बदलते परिवेश तथा समय की मांग के अनुरूप वर्ष 1978 में दूसरी वन-नीति बनी, जो अद्यतन यही लागू है। विडम्बना यह कही जाएगी कि इस वननीति में नेपाल राष्ट्र की सीमा पर स्थित महत्वपूर्ण जैव विविधता के संरक्षण एवं वनों की सुरक्षा को नजरंदाज किया गया है। जबकि मित्र राष्ट्र नेपाल से भारत की लगभग 1400 किमी लम्बी सीमा सटी हुई है। सन् 1975 से पूर्व भारत-नेपाल सीमा के दोनों ओर घने वनक्षेत्र स्थित थे, जिसमें दोनों ओर के समृद्ध वनक्षेत्र होने के कारण वन्य-पशुओं का आवागमन निर्बाध रूप से होता था। उत्तर भारत में हिमालय की तराई में फैले अधिकांश वनक्षेत्र की सीमा पूर्व में पश्चिम बंगाल, दार्जलिंग जिले से लेकर पश्चिम में उत्तरांचल में पिथौरागढ़ तक स्थित है। पिथौरागढ़ में काली नदी के दोनों तरफ नेपाल राष्ट्र का इलाका एवं भारत का धारचूला कस्बा आबाद है। आवागमन की दृष्टि से दुर्गम होने के बाद भी यह क्षेत्र तिब्बत में पाए जाने वाले ‘चीरू’ नामक हिरन के बालो से बने ‘शाहतूश शालों’ की तस्करी के लिये विश्व विख्यात है। अपनी अति विशेष खासियत के कारण उच्च वर्ग में इस शाहतूस शालों की खासी मांग बनी रहती है। यही कारण है कि अधिकांश वंयजीव तस्कर बाघ, तेदुंआ आदि के अंगों के बदले शाहतूस शाल प्राप्त करके उसकी तस्करी करते हैं।
गौरतलब है कि वर्ष 1975 में नेपाल राष्ट्र द्वारा अपनाई गई ‘सरपट वन कटान नीति’ के कारण हिमालय की तराई के वनाच्छादित भू-भाग से नेपाल के इलाकों से वनों का सफाया हो गया। नेपाल राष्ट्र की सुनियोजित नीति के तहत सरकार ने इन क्षेत्रों में सेवानिवृत्त नेपाली सैनिको को बसा दिया। जिसका प्रमुख उदेश्य भारतीय सीमा पर मजबूत नेपाली नागरिको की सामाजिक फौज की स्थापना था। खाली हुई वनभूमि पर आबाद हुए नेपाली फौजियों को नेपाल सरकार द्वारा प्राथमिकता से असलहों के लाईसेंस भी प्रदान किए गए। हालांकि कालान्तर में नेपाल की लोकतात्रिंक सरकारों की स्थिति आयाराम-गयाराम की रही इसके कारण इन क्षेत्रों में आबाद हुए गांव माओवादियों के गढ़ बन गए, जो अब भी नेपाल सरकार के लिये समस्या का प्रमुख कारण बने हुए हैं। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि विगत साल के माह दिसम्बर में नेपाल के जिला कैलाली में जंगल के बीच अतिक्रमण करके बसे तथाकथित माओवादियों एवं नेपाली नागरिकों से वन विभाग ने भूमि को मुक्त कराने का प्रयास किया तो दोनों पक्षों के बीच हिसंक और खूनी संघर्ष हो गया जिसमें तीन नागरिक एवं दो वनकर्मी मारे गए और दर्जन भर से ऊपर लोग घायल हुए थे।
यद्यपि यह मामला नेपाल की सरकार का है वह माओवादियों से कैसे निपटती है? लेकिन नेपाल की सरपट वन कटान नीति का भारतीय वनों पर अच्छा-खासा प्राकृतिक एवं मानवजनित कारणों से भारी विपरीत प्रभाव पड़ा है। नेपाल की ओर से वन के कट जाने के कारण भारतीय क्षेत्र में स्थित प्रमुख जैवविविध क्षेत्र में जलप्लावन एवं गाद (सिल्टिंग) जमा होने की समस्या बढ़ने लगी और सीमावर्ती वनक्षेत्र सूख गए साथ ही जंगल के घास मैदानों पर भी इसका दुष्प्रभाव पड़ा जबकि मानवजनित कारणों से वनों की सुरक्षा भी प्रभावित हुई। इसके अतिरिक्त पिछले तीन-चार सालों से नेपाल से सटे भारतीय क्षेत्रों में बाढ़ की विनाशलीला का कहर भी बढ़ने लगा है। यह भी सर्वविदित है कि नेपाल, चीन, कोरिया, ताईवान आदि कई देश वन्य-जीव-जंतु उत्पाद के प्रमुख व्यवसायिक केंद्र हैं। जिसमें भारी मात्रा में ऊँचे दामों पर वन्य-जीव उत्पादों की खरीद-फरोख्त होती है। जिनके लिये कच्चा माल हिमालय एवं हिमालय की तराई में बसे जैव विविधता क्षेत्रों में उलब्ध है। ये राष्ट्र वंयजीव एवं उससे निर्मित सामग्री का आयात-निर्यात करने वाले देशों की भूमिका अदा करते हैं। इन्ही क्षेत्रों में सारा सामान विश्व बाजार में प्रवेश करता है। जहां प्रतिवर्ष 2-5 बिलियन अमेरिकी डालर का व्यापार होता है। वन्य-जीवों के अंगो का यह अवैध कारोबार नारकोटिक्स के बाद दूसरे नम्बर पर आता है। इस स्थिति की गंभीरता का अनुमान नेपाल राष्ट्र ने पहले ही समझ लिया था शायद इसी का परिणाम है कि नेपाल सरकार ने अपने प्रमुख राष्ट्रीय उद्यानों के वन्य-जीवों की सुरक्षा का दायित्व नेपाल आर्मी को सौंप दिया था। इसका परिणाम यह निकला कि नेपाली सैनिको के दबाव के कारण वन्य-जीव तस्कर भारत, श्रीलंका, म्यांमार, मलेशिया जैसे देशों में सक्रिय हो गए। हाल ही में यहां पकड़े गए वन्य-जीव अंगो के तस्कर भी अपने बयानों में स्वीकार कर चुके हैं कि नेपाल राष्ट्र के प्रमुख बाजारों में निर्बाध वन्य-जीवों के उत्पादों की तस्करी जारी है, तथा नेपाल में एकत्र होने के बाद वन्य-जीवों के अंग तिब्बत, चीन, कोरिया पहुंचकर ऊँचे दामों पर बिकते हैं। इससे यह स्पष्ट हो जाता है अपनी वनसंपदा एवं वन्य-जीवों की सुरक्षा के लिये नेपाल राष्ट्र ने यथोचित प्रबंध कर रखा है लेकिन अन्तर्राष्ट्रीय तस्करी के मार्गो पर उसका कोई नियंत्रण नही है।
नेपाल राष्ट्र द्वारा ‘सरपट वन कटान नीति’ के अन्तर्गत बृहद पैमाने पर किए गए वन कटान का भारतीय क्षेत्रों पर प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से क्या प्रभाव पड़ा अभी तक इसका मूल्यांकन नहीं किया गया है। इतना ही नहीं उपरोक्त नीति के कारण भारतीय वन क्षेत्रों पर पड़ने वाले प्रतिप्रभाव को निष्प्रभावी करने के लिये भी कोई विशेष नीति भारत सरकार द्वारा नहीं अपनाई गई है। ऐसा प्रतीत होता है कि इस गंभीर स्थिति का मूल्यांकन किए बगैर इसे राज्यों के ऊपर छोड़ दिया गया है। यदि पूर्व में पश्चिम बंगाल से पश्चिम में उत्ताखंड तक फैले महानंदा वन्य-जीव बिहार, मानस वन्य-जीव बिहार, बुक्सा टाइगर रिजर्व, बाल्मीकी टाइगर रिजर्व, सोहागीबरवा वन्य-जीव प्रभाग, सुहेलदेव वन्य-जीव प्रभाग, कतर्नियाघाट वन्यजीव प्रभाग, दुधवा टाइगर रिजर्व, किशनपुर वन्य-जीव बिहार, पीलीभीत का लग्गा-भग्गा वनक्षेत्र की स्थिति को देखा जाए तो ज्ञात होता है कि भारतीय सीमा की ओर नियंत्रण एवं संरक्षण की यथोचित व्यवस्था है परंतु नेपाल राष्ट्र की तरफ इन क्षेत्रों में पड़ने वाले विपरीत प्रभावों को न्यूनतम स्तर पर ले जाने के लिये वनकर्मी अपने को असहज महसूस करते हैं। भारतीय वनों पर लगातार नेपाली नागरिको का दबाब बढ़ता जा रहा है। जिससे वन्य-जीवों का अवैध शिकार हो अथवा पेड़ों को काटना हो, इसमें नेपाल नागरिक जरा भी कोताही नहीं बरतते हैं। स्थानीय स्तर के प्रंबध को यदि नजरन्दाज कर दिया जाए तो पैंतिस वर्ष बाद भी हमारे देश की वन-नीति में उपरोक्त कुप्रभावों को निष्प्रभावी करने के लिये अभी तक न तो कोई मूल्याकंन किया गया है और न ही नई वन-नीति तैयार की गई है, तथा भविष्य में भी ऐसी कोई आशा दिखाई नही पड़ती है। परंतु बदलते परिवेश में अब यह आवश्यक हो गया है, कि हिमालय एवं हिमालय की तराई में नेपाल राष्ट्र की सीमा पर भारतीय क्षेत्र में बसे जैव विविधता क्षेत्रों की सुरक्षा हेतु एक व्यवहारिक ठोस वननीति बनाई जाए, अन्यथा की स्थिति में भारतीय वनों पर नेपाल की तरफ से पड़ रहे दुष्प्रभावों के भविष्य में और भी घातक परिणाम निकल सकते हैं, इस बात से भी कतई इंकार नही किया जा सकता है। 
देवेन्द्र प्रकाश मिश्र, (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, वन्य-जीव सरंक्षण पर लेखन, अमर उजाला में कई वर्षों तक पत्रकारिता, आप पलिया से ब्लैक टाइगर नाम का अखबार निकाल रहे हैं, इनसे dpmishra7@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं। )
फ़ोटो साभार: सीज़र सेनगुप्त, (आप वाइल्ड लाइफ़ फ़ोटोग्राफ़र हैं, पेशे से एक बड़ी व प्रतिष्ठित "थायरोकेयर लैबोरेटरी" के जनरल मैनेजर हैं। इनसे workcaesar@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।)

Feb 16, 2010

जहाँ होती है पक्षियों की पूजा

© दुधवा लाइव
कृष्ण कुमार मिश्र* ये भी करते हैं अपने दुख-सुख की अभिव्यक्ति: जरा नज़रिया बदल कर तो देखिये।
लखीमपुर-खीरी, (उत्तर प्रदेश) के एक गाँव कोठिया में गिद्धों के जोड़े की पूजा-अर्चना की जाती हैं। इसी जगह आज से ठीक ४७ वर्ष पहले एक मादा गिद्ध ने अपने नर साथी की मृत्यु से दुखी होकर अपने प्राण त्याग दिये। आज विलुप्त हो रही इस प्रजाति के जिम्मेदार तमाम वें लोग जो जहर की पैदावार करते है और वो लोग जो इसे इस्तेमाल करने की योजनायें मंजूर करते हैं। शायद ये घटनायें उन्हे कुछ सोचने पर मजबूर करें। और हमारी वसुंधरा से लुप्त होती प्रजातियां अपने अस्तित्व को कायम रख सकें!
यह केवल एक कहानी या किवदन्ती मात्र नही है ये प्रमाण है,  उस संवेदनशीलता के चरम का, जिसका मानव हमेशा दम भरता है। कुछ शब्द है, जो उन भावनाओं को अभिव्यक्त करते है, जिन्हे मनुष्य सिर्फ़ अपनी ही जाति में मौजूद होने से फ़क्र महसूस करता है, किन्तु यकीनन ऐसा नही है। दुनिया में बहुत पहले ही प्रकृति के जानकारों ने इस बात को सिद्ध कर दिया था कि करूणा, प्रेम, राग, द्वेष, सुख व दुख जन्तु ही नही पेड़-पौधे भी महसूस करते हैं।
लेकिन इस बात को ज्यादातर लोग मानने और महसूस करने के लिए तैयार नही। और यही वजह है कि लोग अपने आस-पास के सहजीवियों से संपर्क स्थापित नही कर पाते! पर ऐसे भी लोग हैं जो इन जीवों से मुखातिब होते है और इनकी भाषा भी समझते है, यहाँ पर सिर्फ़ नज़रिये का ही फ़र्क है।
फ़ोटो साभार: आदित्य रॉय*

भारत में मानव जाति के भावानात्मक चरमोत्षर्क की एक स्थित है, पति की मृत्यु हो जाने पर शोक में पत्नी द्वारा अपने प्राणों का परित्याग कर देना। जिसे बाद में लोगों ने परंपरा बना डाला! कि न चाहते हुए भी पति की मृत्यु पर पत्नी को संजा कर चिता पर बिठा देना और जलते हुए जीवित शरीर से निकलती चीखों को ढ़ोल-नगाड़ों और सती के जयकारों की गूँज में तब्दील कर देना।
पक्षियों में यह शोक की अभिव्यक्ति का एक उदाहरण नही है जब किसी पक्षी या अन्य जीव ने अपने प्राण त्याग दिये हो, भारत में ऐसे तमाम वाकयें हुए जिनका बाकायदा प्रमाण मौजूद है। 
अब आप को लिए चलते हैं खीरी जनपद के उस कोठिया गाँव में जहाँ एक खूबसूरत पक्षी मन्दिर है जिसमें संगमरमर की दो विशाल मूर्तियां स्थापित की गयी हैं। एक पुजारी प्रतिदिन उनका पूजन करता है। आस-पास के ग्रामीण यहां मन्नते माँगने आते है। यहाँ का सबसे मशहूर आयोजन है फ़रवरी के महीने में मेले का आयोजन, जिसमे दूर-दूर से लोग आते हैं, इस अदभुत मन्दिर को देखने। यह मेला वैलेन्टाइन डे के आस-पास ही शुरू होता है। प्रेम की सच्ची व महान अभिव्यक्ति का अतीत जो अब मूर्तियों के रूप में मौजूद है।

वहाँ के पुजारी के मुताबिक जो स्वंम गवाह भी हैं इस घटना के ने बताया कि ४६-४७ वर्ष पूर्व यहां एक मवेशी के मृत शरीर पर गिद्धों का एक झुण्ड  था, शाम हुई सभी गिद्ध अपने-अपने गंतव्य की तरफ़ चले गये किन्तु एक जोड़ा वही मौजूद रहा। जोड़े में एक गिद्ध बीमार सा प्रतीत हुआ, और उसी जगह बैठा रहा। कुछ दिनों में उसकी मृत्यु हो गयी। लेकिन मादा गिद्ध वही उस मृत गिद्ध के पास बैठी रही। एक-दो दिनों बाद यह कौतूहल का विषय बन गया, भीड़ जमा होने लगी। आखिरकार पुलिस भी लगा दी गयी। हज़ारों की भीड़ ने देखा कि जब भी कोई उस जीवित गिद्ध को या उसके मॄत साथी को छू लेता तो वह निकट के तालाब से पानी लाकर मृत गिद्ध पर छिड़कती।( स्टार्क पक्षी में मैने कुछ मिलता-जुलता व्यवहार देखा है प्रजनन काल के समय अपने अण्डों व बच्चों पर वह पानी लाकर छिड़कती हैं ताकि तापमान नियत रहे)
अब यह पक्षी सूखी टहनियां ला-लाकर इकठ्ठा करने लगी, ग्रामीणों की करूणा व श्रद्धा अपने चरम पर थी इस पक्षी का अपने साथी के प्रति समर्पण देखकर। ग्रामीणों ने चन्दन, घी आदि की व्यवस्था कर उन लकड़ियों पर डाला और कहते हैं कि आग स्वंम प्रज्ज्वलित हो गयी और वह मादा गिद्ध अपने साथी के साथ सती हो गयी, बिना आग की लपटों द्वारा विचलित हुए। ( हो सकता है कि अग्नि स्वंम प्रज्वलित होने वाली बात अतिशयोक्ति हो, किन्तु पक्षी ने अपने प्राण अवश्य त्याग दिए अपने साथी के शोक में)
स्वतंत्रता सेनानी, पूर्व विधायक व अवधी के महान लेखक पण्डित शुक्ल ने ऐसी ही एक घटना का जिक्र अपनी कविता "सती गीधिन" में किया है। यह घटना सन १९७१ में लखीमपुर शहर के समीप कोन नाम के गाँव में घटी, जहाँ एक गिद्ध ने अपने मृत साथी के साथ तकरीबन नौ रोज गुजारे और फ़िर उसकी वही मृत्यु हो गयी। लोगों ने बड़ी श्रद्धा से इनका दाह संस्कार किया। इसे पण्डित जी ने सन १९७२ में लिखा।
फ़ोटो साभार: आदित्य रॉय*

पं० बंशीधर की इस कविता को पढ़ने के लिये यहाँ  पर क्लिक करें।
इन पक्षियों के इन भावनात्मक व्यवहार का जिक्र इस लिए और जरूरी हो जाता है कि आज सरकार की योजनायें व हमारे लोगों को अनियोजित विकास में ठूसना, इन तमाम प्रजातियों के अस्तित्व को नष्ट करने का कारण बना हुआ है। भारतीय संस्कृति में जीवों के प्रति दया, प्रेम का भाव देने वाली शिक्षा आज भी विद्यमान है लेकिन व्यवस्था ने उसे दूषित किया है। गाँवों का बदलता परिवेश, शिक्षा-नीतियां,  मिटते चरागाह, नदियां, तालाब, हरित क्रान्ति के नाम पर धरती में बोया गया जहर, ये कई मसले हैं जो जिम्मेदार है, प्रकृति संरचनाओं के खात्में में। क्या हम विकास के नाम पर कोई कार्यक्रम चलाने से पहले उसके दूरगामी परिणाम नही सोचते?

कृष्ण कुमार मिश्र  (लेखक वन्य-जीव सरंक्षण व प्रकृति के अध्ययन में प्रयासरत हैं, उत्तर प्रदेश के  लखीमपुर-खीरी जनपद में रहते हैं। इनसे आप dudhwajungles@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।)
फ़ोटो साभार: आदित्य रॉय* (वरिष्ठ पक्षी वैज्ञानिक हैं, इन दिनों आप अहमदाबाद में रहते हैं आप से adi007roy@gmail पर संपर्क कर सकते हैं)

Feb 15, 2010

पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली

Openbilled Storks: Photo by: Krishna Kumar Mishra
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली
कृष्ण कुमार मिश्र,  लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था। एक खूबसूरत पक्षी प्रजाति को बचाने का, जो सदियों से इस गाँव में रहता आया। बताते हैं कि ग्रामीण ये लड़ाई भी जीते थे, कौर्ट मौके पर आयी और ग्रामीणों के पक्षियों पर हक जताने का सबूत मांगा, तो इन परिन्दों ने भी अपने ताल्लुक साबित करने में देर नही की, इस गाँव के बुजर्गों की जुबानी कि उनके पुरखों की एक ही आवाज पर सैकड़ों चिड़ियां उड़ कर उनके बुजर्गों के आस-पास आ गयी, मुकदमा खारिज़ कर दिया गया।
गाँव वालों के घरों के आस-पास लगे वृक्षों पर ये पक्षी रहते है और ये ग्रामीण उन्हे अपने परिवार का हिस्सा मानते है, यदि कोई इन्हे हानि पहुंचानें की कोशिश करता है तो उसका भी हाल उस बरतानियां सरकार के नुमाइन्दे की तरह हो जाता है...अदभुत और बेमिसाल संरक्षण। खासबात ये है कि हज़ारों की तादाद में ये पक्षी यहां रहते आये है और इन्हे किसी भी तरह का सरकारी सरंक्षण नही प्राप्त है और न ही कथित सरंक्षण वादियों की इन पर नज़र पड़ी है, शायद यही कारण है कि यह पक्षी बचे हुए हैं! अफ़सोस सिर्फ़ ये है ग्रामीणों के इस बेहतरीन कार्य के लिए सरकारों ने उन्हे अभी तक कोई प्रोत्साहन नही दिया, जिसके वो हकदार हैं। जिला लखीमपुर का एक गांव सरेली, जहां पक्षियों की एक प्रजाति सैंकड़ों वर्षों से अपना निवास बनाये हुये है। और यहां के ग्रामीण इस पक्षी को पीढ़ियों से संरक्षण प्रदान करते आ रहे हैं। यह गांव मोहम्मदी तहसील के मितौली ब्लाक के अन्तर्गत आता है। पक्षियों की यह प्रजाति जिसे ओपनबिलस्टार्क कहते हैं। यह पक्षी सिकोनिडी परिवार का सदस्य है। इसकी दुनियां में कुल 20 प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें से 8 प्रजातियां भारत में मौजूद हैं। ओपनबिलस्टार्क सामान्यतः भारतीय उपमहाद्वीप, थाईलैण्ड व वियतनाम, में निवास करते है तथा भारत में जम्मू कश्मीर व अन्य बर्फीले स्थानों को छोड़कर देश के लगभग सभी मैदानी क्षेत्रों में पाये जाते हैं। चिड़ियों की यह प्रजाति लगभग 200 वर्षों से लगातार हजारों की संख्याओं में प्रत्येक वर्ष यहां अपने प्रजनन काल में जून के प्रथम सप्ताह में आती है। यह अपने घोसले मुख्यतः इमली, बरगद, पीपल, बबूल, बांस व यूकेलिप्टस के पेड़ों पर बनाते हैं। स्टार्क पक्षी इस गांव में लगभग 400 के आसपास अपने घोसले बनाते हैं। एक पेड़ पर 40 से 50 घोसले तक पाये जाते हैं। प्रत्येक घोसले में 4 से 5 अण्डे होते हैं। सितम्बर के अन्त तक इनके चूजे बड़े होकर उड़ने में समर्थ हो जाते हैं और अक्टूबर में यह पक्षी यहां से चले जाते हैं। यह सिलसिला ऐसे ही वर्षों से चला आ रहा है। चूंकि यह पक्षी मानसून के साथ-साथ यहां आते हैं इसलिए ग्रामीण इसे बरसात का सूचक मानते हैं। गांव वाले इसको पहाड़ी चिड़िया के नाम से पुकारते हैं, जबकि यह चिड़िया पहाड़ों पर कभी नहीं जाती। इनके पंख सफेद व काले रंग के और पैर लाल रंग के होते हैं। इनका आकार बगुले से बड़ा और सारस से छोटा होता है। इनकी चोंच के मध्य खाली स्थान होने के कारण इन्हें ओपनबिल कहा गया। चोंच का यह आकार घोंघे को उसके कठोर आवरण से बाहर निकालने में मदद करता है। यह पक्षी पूर्णतया मांसाहारी है। जिससे गांव वालों की फसलों को कोई नुकसान नहीं पहुंचता। गांव वालों के अनुसार आज से 100 वर्ष पूर्व यहां के जमींदार श्री बल्देव प्रसाद ने इन पक्षियों को पूर्णतया संरक्षण प्रदान किया था और यह पक्षी उनकी पालतू चिड़िया के रूप में जाने जाते थे। तभी से उनके परिवार द्वारा इन्हें आज भी संरक्षण दिया जा रहा है। यह पक्षी इतना सीधा व सरल स्वभाव का है कि आकार में इतना बड़ा होने कें बावजूद यह अपने अण्डों व बच्चों का बचाव सिकरा व कौओं से भी नहीं कर पाता। यही कारण है कि यह पक्षी यहां अपने घोसले गांव में ही पाये जाने वाले पेड़ों पर बनाते हैं। जहां ग्रामीण इनके घोसले की सुरक्षा सिकरा व अन्य शिकारी चिड़ियों से करते हैं।
यहा गाँव दो स्थानीय नदियों पिरई और सराय के मध्य स्थिति है गाँव के पश्चिम नहर और पूरब सिंचाई नाला होने के कारण गाँव के तालाबों में हमेशा जल भराव रहता है। जिससे इन पक्षियों का भोजन घोंघा, मछली आदि प्रचुर मात्रा में उपलब्ध रहता है। ओपनबिलस्टार्क का मुख्य भोजन घोंघा, मछली, केंचुऐ व अन्य छोटे जलीय जन्तु हैं। इसी कारण इन पक्षियों के प्रवास से यहां के ग्रामीणों को प्लेटीहेल्मिन्थस संघ के परजीवियों से होने वाली बीमारियों पर नियन्त्रण रखता है क्योंकि सिस्टोसोमियासिस, आपिस्थोराचियासिस, सियोलोप्सियासिस व फैसियोलियासिस (लीवरफ्लूक) जैसी होने वाली बीमारियां जो मनुष्य व उनके पालतू जानवरों में बुखार, यकृत की बीमारी पित्ताशय की पथरी, स्नोफीलियां, डायरिया, डिसेन्ट्री आदि पेट से सम्बन्धित बीमारी हो जाती हैं। चूंकि इन परजीवियों का वाहक घोंघा (मोलस्क) होता है जिसके द्वारा खेतों में काम करने वाले मनुष्यों और जलाशयों व चरागाहों में चरने व पानी पीने वाले वाले पशुओं को यह परजीवी संक्रमित कर देता है।
इन पक्षियों की बहुतायत से यहां घोंघे लगभग पूर्णतया इनके द्वारा नष्ट कर दिये जाते हैं, जिससे यह परजीवी अपना जीवनचक्र पूरा नहीं कर पाते और इनसे फैलने वाला संक्रमण रूक जाता है। इन रोगों की यह एक प्रकृति प्रदत्त रोकथाम है। इतना ही नहीं इन पक्षियों के मल में फास्फोरस, नाइट्रोजन, यूरिक एसिड आदि कार्बनिक तत्व होने के कारण जिन पेड़ों पर यह आवास बनाते हैं उसके नीचे इनका मलमूत्र इकट्ठा होकर बरसात के दिनों में पानी के साथ बहकर आस पड़ोस के खेतों की उर्वरकता को कई गुना बढ़ा देता है। इतनी संख्या में ओपनबिल स्टार्क पूरे उत्तर प्रदेश में कहीं अन्यन्त्र देखने को नहीं मिलती। अतः स्थानीय लोगों को इन पक्षियों का शुक्रगुजार होना चाहिए और सहयोग देकर पक्षियों के इस स्वर्ग को नष्ट होने से बचाना चाहिए ताकि पक्षियों का यह अनूठा निवास और भारत की जैव विविधता हमेशा फलती फूलती रहे। वैसे तो आज भी प्रत्यक्ष रूप से यहाॅ इन पक्षियों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाता पर लगातार पेडों की कटाई और अवैध रूप से खेती के लिए तालाबों की कटाई जारी है जिससे इन पक्षियों के आवास और भोजन प्राप्ति के स्थानों पर खतरा मडरा रहा है जो भविष्य में इनकी संख्या को कम कर देगा। आज के इस आपाधापी के दौर में जब मनुष्य सिर्फ भौतिकता की दौड़ में शामिल है, तब भी कुछ लोग ऐसे हैंजो प्रकृति की इन खूबसूरत रचनाओं को बचाने में लगे हुये हैं। यह प्रशंसनीय है। मनुष्य लगातार विकास के नाम पर प्रकृति से दूर होता जा रहा है। प्रकृति में सारी क्रियाएं सुसंगठित व सुनिश्चित होती हैं। जब तक कि इसमें कोई छेड़छाड़न की जाय। परन्तु मानव जाति की भौतिकतावादी सोंच ने प्रकृति का दोहन करके इसे पूरी तरह से असन्तुलित कर दिया है औरयही कारण है कि हम आज प्रकृति के संरक्षण की बात कर रहे हैं ताकि वह सन्तुलन बरकरार रहे। नहीं तो अब तक पर्यावरण संरक्षण, जीव-जन्तु संरक्षण, जल संरक्षण और पर्यावरण प्रदूषण जैसे शब्द सिर्फ किताबी हुआ करते थे। यह एक हास्यास्पद बात ही है कि अब सारा विश्व पर्यावरण संरक्षण के कार्यों में बड़े जोर-शोर से लगा हुआ है। पहले तो हम किसी वस्तु को नष्ट करते हैं और जब उसके दुष्प्रभाव अपना असर दिखाने लगते हैं तब हम संरक्षण की बात करते हैं। आज पर्यावरण प्रबन्धन में बड़ी बड़ी संस्थायें व सरकारें लगी हुई हैं। एक सोचनीय प्रश्न है कि मनुष्य सिर्फ किसी निश्चित स्थान का प्रबन्धन करने में सक्षम है पर क्या उसने कभी सोचा है कि वह पूरी पृथ्वी के पारिस्थितिकी तन्त्र का प्रबन्धन कर सकता है। आज के इस वाद काल के दौर में जातिवाद, धर्मवाद, भौतिकवाद, साम्यवाद अन्य के स्थान पर अगर हम प्रकृतिवाद को महत्व दें तो हमारी सारी समस्यायें खुद-ब-खुद दूर हो जायेंगी, यह शाश्वत सत्य है। अगर हम इसे एक दार्शनिक के दृष्टिकोण से देंखें तो यह सारा संसार सारी चीजों से मिलकर बना है और वह सारी चीजें आपस में एक दूसरे को प्रभावित करती हैं, चाहें वह प्रत्यक्ष रूप में करें अथवा अप्रत्यक्ष। एक मनुष्य के पूरे शरीर की तरह यदि शरीर का एक अंग नष्ट हो जाये तो उससे सारा शरीर बिना प्रभावित हुये नहीं रह सकता। इसी प्रकार इस प्रकृति के सारे तत्व एक दूसरे से जुड़े हुये हैं और यदि कोई एक तत्व प्रभावित होता है तो इससे पूरा पारिस्थितिकी तन्त्र प्रभावित होता है। अतः आकाश की सुन्दरता को पक्षीविहीन होने से जिस प्रकार यह ग्रामीण सतत् प्रयासरत् हैं, यह अपने आप एक सराहनीय प्रयास है और इससे हमें सबक लेना चाहिये।
ये पक्षी  अपने  घोंसले इस गांव के अलावा खीरी जनपद में ऐठापुर फार्म के मालिक आलोक शुक्ल के निजी जंगल में काफी तादाद में बनाते हैं। एक खास बात यह कि दुधवा नेशनल पार्क के बाकें ताल के निकट के वृक्षों पर इन पक्षियों की प्रजनन कालोनी विख्यात थी किन्तु सन 2001 से पक्षियो का सह बसेरा उजड़ गया। यानी संरक्षित क्षेत्रो के बजाय ग्रामीण क्षेत्रो में इन चिड़ियों का जीवन चक्र अघिक सफल है। कुल मिलाकर जब आज मानव जनित कारणों से पक्षियों की कई प्रजातियां विलुप्त हो चुकी हैं और कई प्रजातियां विलुप्ति की कगार पर है ऐसे में खीरी जनपद में  पक्षियों के यह सुरम्य वास स्थल जीवों के सरक्षण की एक नई राह दिखाते है
प्रदेश में इन पक्षियों के घोसलों के बारे में यदि कोई जानकारी हो तो मुझे सूचित करे ताकि इनके व्यवहार के अघ्ययन व इनके संरक्षण के समुचित प्रयास किये जा सके। (यह लेख हिन्दी व अंग्रेजी की कई राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुका है।)

कृष्ण कुमार मिश्र 
(लेखक: वन्य-जीवों के अध्ययन व  सरंक्षण के लिए  प्रयासरत है, जनपद खीरी में रहते हैं।)
संपर्क: dudhwajungles@gmail.com

Feb 14, 2010

ग्रेट इंडियन बस्टर्ड

ग्रेट इंडियन बस्टर्ड: फ़ोटो साभार: डा० प्रमोद पाटिल
 कृष्ण कुमार मिश्र* अंग्रेजों से हमारे लोगों ने तमाम तरह की विद्यायें सीख लीं, पर उनका अमल में लाना नही सीख पायें। फ़िर चाहे शाखू के बनों का रिजनरेशन हो या  जंगलों के  संरक्षण का मसला (भले वे विदेशी इन्हे अपने आर्थिक फ़ायदे के लिए संरक्षित करते हों} जैसे इण्डोंलाजी, हिस्ट्री, .......ओर्निथोलोजी....जिसमें कुछ सीखने/करने से पहले उन महानुभावों को पढ़ा जाता है जिन्हों ने उस विषय पर कार्य किया हों, उसके उपरान्त अन्य कागजी कवायदें, फ़िर शोध आदि होकर पुस्तकालयों आदि में पहुंच जाता है, किन्तु अफ़सोस ये कि, जो शोध का आबजेक्ट होता है उसकी व्यथा-दशा में लेश-मात्र परिवर्तन नही होता है, कुछ को डिग्रियां मिलती है, कुछ को शोहरत और तमाम लोगों को अर्थ लाभ भी, पर वह जीव या वस्तु निरंतर क्षरित होती रहती है! क्या भारतीयों ने अपने पूर्व आकाओं से यही सीखा है! बिना नतीजों की कवायदें! ६० वर्षों में सिर्फ़ खालिश डाक्यूमेंटेशन !
इसकी ताज़ा उदाहरण हैं, वन्य-जीवों पर बनाये तमाम प्रोजेक्ट, जिन्होंने जानवरों की तो कोई तरक्की नही की आदमियों की जरूर हो गयी। बस्टर्ड एक उदाहरण मात्र है।........
एक खूबसूरत पक्षी ग्रेट इंडियन बस्टर्ड  (Ardeotis nigriceps) जो कभी भारतीय उप-महाद्वीप में सामान्यत: उत्तर में मध्य पंजाब से लेकर दक्षिण में मध्य कर्नाटक तक, और पश्चिम में उड़ीसा से लेकर पूर्वी पाकिस्तान तक पाया जाता था। किन्तु कथित विकास व प्राकृतिक संसाधनों के बेतहाशा विनाश से इस पक्षी के आवास नष्ट हो गये, ज्यादातर जगहे कृषि-भूमि में तब्दील कर दी गयी और धान की खेती की वजह से सूखी जमीने, नम-भूमियों में परिवर्तित हो गयी, नतीजा बस्टर्ड अपना वजूद खोता गया, और अब यह भारत के कुछ ही प्रदेशों में बचा है, यहां भी उत्तर प्रदेश (?), हरियाणा, पंजाब, उड़ीसा और तमिलनाडु में इसे लगभग विलुप्त माना जा रहा है। राजस्थान के थार, आन्ध्रप्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र, गुजरात और उत्तर प्रदेश(?)में इसकी मौजूदगी है।


ये पक्षी सूखी व मरुभूमि के घास के मैंदानों में अपने आवास बनाते है, लम्बी टांगों व गर्दन वाले भूरे व सफ़ेद रंग का पक्षी आस्ट्रिच से मिलता-जुलता है, ये जमीन पर रहने वाला पक्षी है। मादा बस्टर्ड एक वर्ष में  प्राय: एक अण्डा देती है, इन्क्यूवेशन पीरियड लगभग २७-२८ दिनों का होता है, बच्चों को पालन मे नर पक्षी कोई सहयोग नही करते। बच्चे एक वर्ष तक माँ पर ही निर्भर रहते हैं।

बस्टर्ड के अंधाधुन्द शिकार, हैविटेट का खात्मा और मानव आबादी का निरंतर इनके आवासों में दखल ने इन्हे विलुप्ति के कगार पर पहुंचा दिया, नतीजतन सन 2009 ईस्वी में बर्ड-लाइफ़ इंटरनेशनल के द्वारा किये गये सर्वेक्षण व मूंल्याकन  में ग्रेट इंडियन बस्टर्ड को आई०यू०सी०एन०(IUCN) की लाल किताब यानी रेड-डाटा बुक में खतरे में पड़ी प्रजाति के अन्तर्गत शामिल गया है।
तमाम प्रोजेक्ट और सरंक्षण रननीतियों के बावजूद नतीजे निराशाजनक हैं। प्रकृति की इस कृति को बचाने में जब तक आम आदमी आगे नही आयेगा, तब तक किसी बेहतरी की उम्मीद करना मुश्किल होगा। सरकारों को भी इन चिड़ियों के आवासों यानी ग्रासलैंड के आस-पास सड़क या किसी अन्य तरह के विकास कार्य से बचना चाहिये। मानव बस्तियों और खेती के लिए इन मैंदानों का आंवटन न किया जाय और अतिक्रमण को हटाया जाय। नही तो सिर्फ़ अध्ययन या फ़ोटोग्राफ़ी और सेमिनारों में बड़ी-बड़ी योजनायें बनाना बेमानी होगा। क्योंकि अभी तक यानी आजादी के इन ६०-६२ वर्षों में जितने भी प्रोजेक्ट बने और लागू किये गये उनके परिणाम सिफ़ड़ ही है! फ़िर किस तरह का कन्जर्वेशन ये संस्थायें व सरकारे कर रही है, जो बे-नतीजां है?
वैसे कमोंवेश धरती पर हमारे सभी सहजीवियों का यही हाल है।

कृष्ण कुमार मिश्र  (लेखक: वन्य-जीवों के अध्ययन व  सरंक्षण के लिए  प्रयासरत है, जनपद खीरी में रहते हैं।)

Feb 13, 2010

क्या वें राज धर्म से वाकिफ़ हैं!

ग्रीन बी-ईटर फ़ोटो साभार: सतपाल सिंह
 कृष्ण कुमार मिश्र भारत के कुछ पूर्व नेताओं ने मिसाले कायम की पर्यावरण व वन्य-जीव संरक्षण में, इस सन्दर्भ में पंडित जवाहर लाल नेहरू का एक कथन प्रासंगिक है "चिडियों को दूर से देख लेना और आनंद का अनुभव करना ही काफ़ी नही है। अगर हम उन्हे पहचाने, उनके नाम को जाने और उन्हे चहचहाते सुनकर पहचान सकें, तो हमारा आनंद और बढ़ जायेगा। अगर हम उनके साथ हिल-मिल जाएँ तो वे हर जगह हमारे साथी हो सकते हैं।
एक बार इन्दिरा गाँधी भरतपुर पक्षी विहार में भ्रमण करते हुए चिड़ियों की 80 प्रजातियों को पहचाना और उनके नाम बतायें, प्रकृति और जीवों के प्रति उनके इस ज्ञान से उनके सहयोगी और अधिकारी हतप्रभ थे।
क्या आप को लगता है कि आज कोई ऐसा नेता है जो भारत वर्ष की धरती पर मौजूद हमारे सहजीवियों के प्रति जागरुक है!.....यकीनन नही क्योकि उन्हे तो अपनी आदम जाति की बदहाली से ही राफ़्ता नही तो वे जानवरो की फ़िक्र क्या करेंगे। क्या उनकी बातें जनमानस को प्रभावित करती हैं?
गाँवों में कट चुके पुराने आम के बगीचों में जहाँ झाड़िया, घासें और सुन्दर लतायें, विभिन्न प्रकार के पक्षियों, कीटो, तितलियों आदि को शरण देते थे, अब वे नदारद है, साथ ही नदारद हो गयी वे प्रकृति की रंगबिरंगी सुन्दर कृतियां भी जिन्हे हमारे लोग अपनी बोलियों में विभिन्न नामों से पुकारते थे। हाँ इन वीरान जगहो पर जहर (पेस्टीसाइड व फ़र्टीलाइजर) के दम पर फ़सले अवश्य उगा रहे है, जो बचे हुए जीवों को विलुप्त करने में अपनी महती भूमिका अदा कर रही हैं। प्रकृति स्वंम में सक्षम होती है संतुलन स्थापित करने में, बशर्ते उसे छेड़ा न जाय। मैनेजमेंट के दौर में जो प्रयोग किए जा रहे है, वे सन्तुलन को ही नही बिगाड़ रहे बल्कि भविष्य में मानव जाति के लिए ही घातक होगे। आखिर हम उस अवधारणा को क्यो नही अपनाते, जो प्रकृति की नियति में है। यदि बाज़ नही होगा तो साँपों की तादाद बढ़ जायेगी, और यदि साँप नही होंगे तो चूहे बढ़ जायेंगे, यदि चूहे बढ़े तो यकीनन किसान की फ़सल नष्ट हो जायेगी......फ़सल नष्ट हुई तो.......। कुल मिलाकर प्रकृति में सभी कुछ महत्व पूर्ण है। और ये सब एक दूसरे को कही न कही प्रभावित करते है।
   अब सिर्फ़ सरकारी प्लान बनते है, और कागज़ पर पूरे हो जाते है। इस बात का ताजा उदाहरण है प्रोजेक्ट टाइगर, करोड़ों खर्च हो गये और न जाने कितना जन-बल झोक दिया गया इन प्रयासों किन्तु सब व्यर्थ......आज सिर्फ़ 1411 बाघ ही बचे है पूरे भारत में! किन्तु क्या किसी ने सोचा है कभी, कि तितलियों, पंक्षियों, घासों, अनाजों की कितनी प्रजातियां विलुप्त हो गयी है। अब सवाल ये है कि अनियोजित विकास की चौतरफ़ा दौड़ में आखिर हमें क्या हासिल हो रहा है। चरागाह, तालाब, नदियां, जंगल और उनमे रहने वाले जीवों का निरन्तर विनाश जारी है। किन्तु हम अपने प्राकृतिक खज़ाने को लूटते हुए विकास के गीत गाते जा रहे हैं।...सड़को पर बसता हिन्दुस्तान.............
इस मुल्क के लम्बरदारों को कैसे नींद आ जाती है, जहाँ करोड़ों लोग भूखे है बदहाल है, जानवर किस हाल में इसका तो जिक्र भी मुश्किल है। क्या यही राज़ धर्म है?
 दुधवा लाइव
फ़ोटो साभार: सतपाल सिंह ( आप वन्य-जीव फ़ोटोग्राफ़र है। उत्तर प्रदेश के खीरी जनपद में रहते हैं, इनसे आप 09616338183 पर संपर्क कर सकते हैं।)

Feb 11, 2010

एक विलुप्त हो रही प्रजाति को बचाने की मुहमि!

डा० प्रमोद पाटिल *
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड का आवास प्रबंधन:-
"ग्रेट इंडियन बस्टर्ड सेंक्चुरी, सोलापुर महाराष्ट्र”
महाराष्ट्र भारत के उन छह प्रदेशों में से एक है, जहां ग्रेट इंडियन बस्टर्ड यानी “हुकना” पक्षी की मौजूदगी है। अतीत में यह चिड़िया महाराष्ट्र के सूखे इलाकों में अच्छी तादाद में देखी जाती थी।

जवाहर लाल नेहरू बस्टर्ड सेंक्चुरी (८४९६.४४ वर्ग कि०मी०) महाराष्ट्र के अहमदनगर और सोलापुर जनपदों के अन्तर्गत स्थित है। इसकी स्थापना सन १९७९ ई० में हुई। जैव-भौगोलिक क्षेत्र- डेक्कन प्रायद्वीप, तापमान १३ डिग्री सेल्सियस से ४३ डिग्री सेल्सियस तक। सन २००९ की पक्षी गणना के मुताबिक कुल २१ ग्रेट इंडियन बस्टर्ड पायी गयी, जिनमें १३ मादा व ८ नर थे।
सूखा प्रवण कार्यक्रम-
सन १९७५ ई० में विश्व बैंक के सहयोग से सूखा प्रवण कार्यक्रम की शुरूवात सोलापुर जनपद में की गयी, जिसमें वन विभाग द्वारा वन्य-जीवन के पुनर्जनन के लिए जो कदम उठाये, मैदानों से झाड़ियों व पेड़ों की कटाई से चराई के मैदान व लकड़ी आदि की प्राप्ति हुई। इस इलाके के डी०पी०ए०पी० (सूखा प्रवण कार्यक्रम) के तहत तैयार किये गये ननंज भू-खण्ड में १९७८ ई० में पहली बार ग्रेट इंडियन बस्टर्ड को देखा गया।

ननंज भू-खण्ड में आवास के प्रकार-

१-        चरागाह भू-खण्ड- इस जगह पर बबूल के वृक्ष, तरवार की झाड़िया (चरभंरगा- डायविटीज में उपयोगी वनस्पति) और कई प्रकार की घासें पाई जाती है।
२-      वुक्षों वाले भू-खण्ड- यहाँ वन-विभाग द्वारा नीम, बबूल, कन्थ, शीशम आदि के कुछ वृक्ष रोपित किये गये थे इस कारन अब ये मैदान घासों के बजाए वृक्षों से आच्छादित हो गये है।
३-      चराई के मैदान
४-      पथरीलें चराई के मैदान
५-      फ़सल क्षेत्र
हुकना पक्षी ज्यादातर छोटी घासों वाले खुले मैदानों को पंसद करते है और बड़ी घासों वाले मैदानी क्षेत्र जो वृक्षों से आच्छादित हो, वहां इसे कभी नही देखा गया। यह पक्षी घोसले बनाने से लेकर, प्रजनन, भोजन आदि सभी गतिविधियों के लिए घास के खुले मैदान पंसद करते है। पूर्व के अध्ययनों में भी यह बात साबित हो चुकी है।

आवास प्रबंधन की आवश्यकता-
ननंज १० व करंबा इलाके में कुछ विदेशी प्रजातियों के वृक्ष लगाये गये, साथ ही लेन्टाना व अन्य खरपतवारों ने इन जगहों को घने जंगलों में तब्दील कर दिया। गूगल अर्थ से जब इन स्थलों की विभिन्न वर्षों की छविया देखी गयी तो पता चला के ये घास के मैदान विदेशी प्रजातियों के लगायें गये वृक्ष व झाड़ियों के कारण जंगल में परिवर्तित हो रहे है। चूंकि यह स्थल इन पक्षियों का प्राकृतिक आवास रहा, इसलिए इनके अस्तित्व को बचाने के लिए वैज्ञानिकों ने कुछ सिफ़ारिशे की, ताकि ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के हैविटेट को बचाया जा सके।

१-        किसी तरह का वुक्षा रोपण न किया जाय।
२-      घास के मैदानों का उचित प्रबंधन हो, क्योंकि बस्टर्ड ज्यादा बड़ी व घनी घास मे रहना पंसद नही करता। इसलिए घास की कटाई व छटाई समय समय पर की जाय।
गौरतलब हो कि ये सभी प्राविधान वन्य-जीव विहार के प्रंबधन योजना में शामिल है, किन्तु उनके द्वारा इस सन्दर्भ में कुछ भी ऐसा नही किया गया।
मौजूदा प्रबंधन वन-विभाग द्वारा-
सन २००६ में पुणे के वन-विभाग द्वारा महाराष्ट्र के मुख्य वन सरंक्षक को एक प्रस्ताव भेजा गया ताकि घास के मैदानों का प्रबंधन में शामिल कार्यक्रमों को लागू किया जा सके। यह प्रस्ताव ननंज व करंबा भू-खन्डों के लिए था। फ़न्ड की व्यवस्था होने पर कार्य की शुरूवात वन सरंक्षक( वन्य-जीव) डा० वाई०एल०पी० राव के दिशा-निर्देशन में मार्च २००८ में प्रारंभ हो पायी।
२५ हेक्टेयर भूमि से वृक्षों को हटाया गया जिसमें १५ हेक्टेयर भूमि करंबा भू-खण्ड की और १० हेक्टेयर भूमि, ननंज भू-खण्ड की थी। वृक्षों को जमीन से खोद-कर हटाया गया ताकि इनकी जड़ों से दोबारा वृद्धि न हो सके।

अगस्त २००९ में लेखक द्वारा इस स्थल का अवलोकन किया गया, जिसमें ननंज इलाके में एक नर ग्रेट इंडियन बस्टर्ड दिखायी दिया।
ये घास के मैदान बस्टर्ड के अलावा अन्य पक्षियों को भी आवास प्रदान करते है। इसलिए वृक्ष विहीन घास के मैदानों का संरक्षण व संवर्धन किया जाय। कई अध्ययनों से यह साबित हो चुका है कि ग्रेट इंडियन बस्टर्ड खुले घास के मैदानों को ही अपनी रिहाइशगाह बनाते है।

पृथ्वी पर कुछ ही स्थान बचे है जहां यह शानदार पक्षी अपना अस्तित्व बचाये रह सकता है। यहां केवल ननंज को इस लिए संरक्षित करने की बात नही है, कि यह विलुप्त हो रही ग्रेट इंडियन बस्टर्ड का हैविटेट है, बल्कि यह एक जीन बैंक है, तमाम तरह की घासो और झाड़ियों का, जो जरूरी है हमारे देश की पारिस्थितिकी और खाद्य सुरक्षा के लिए। जैव-विविधिता के सरंक्षण के लिए इन घास के मैदानों का उचित प्रबंधन आवश्यक हो जाता है।
वन विभाग ने मर्दी, अकोलेकटी व करंबा भू-खण्डों में ५,२४४ वृक्षों के काटने लिए प्रस्ताव किया है। यह कार्य बस्टर्ड के हैविटेट के पुनर्जनन में मदद करेगा।
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड धरती से तकरीबन ९० फ़ीसदी विलुप्त हो चुका है। बस्टर्ड प्रोजेक्ट के जरिए उम्मीद जतायी जाती है, कि इस प्रजाति के अस्तित्व को कायम रखा जा सकता है। (अनुवाद:- कृष्ण कुमार मिश्र)


डा० प्रमोद पाटि ( लेखक पक्षी वैज्ञानिक है, ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के सरंक्षण में संलग्न हैं, बस्टर्ड के हैविटेट प्रबंधन में शोध। आप कोल्हापुर महाराष्ट्र मे रहते हैं। इनसे gibpramod@gmail.com  अथवा +91-9960680000 पर संपर्क स्थापित कर सकते है।)

Feb 10, 2010

क्या हम पर्यावरण के क्षेत्र में आदर्श स्थापित करना नही जानते।

दुधवा लाइव डेस्क*
नव-वर्ष के पहले दिन बाघ संरक्षण में अग्रणी भूमिका निभाने वाले महा-पुरूष पदमभूषण बिली अर्जन सिंह का निधन हुआ। इन्हों ने अपना पूरा जीवन जंगल में अकेले रहकर बाघों और उनके आवासों की सुरक्षा में लगाया। बाघ भारत का राष्ट्रीय पशु है, बस इतना मान भर लेने से काम नही चलना, क्यों की बाघ संरक्षण का मतलब है पूरे पारिस्थितिक तंत्र का संरक्षण। बाघ खाद्य श्रंखला में सबसे ऊपर है और इसके संरक्षण में पूरे जंगल व उनके जीवों के संरक्षण का राज छिपा है। टाइगर मैन बिली अर्जन सिंह के शब्दों में कहे तो " बाघ जंगल का मसीहा है, जैसे ईसाई का गाड, मुसलमान का अल्लाह, और हिन्दू का भगवान, यदि बाघ नही होंगे तो जंगल भी नही होगें, जंगल वर्षा लाते है और हमें जीने के लिए आबों-हवा देते है,  इसलिये बाघ बचाओं नही तो हम सभी भी नही रहेंगें।"

उत्तर प्रदेश के खीरी जनपद के घने जंगलों के एक हिस्से को संरक्षित क्षेत्र का दर्जा दिलाने का कार्य अर्जन सिंह ने किया, जिसे दुधवा टाइगर रिजर्व के नाम से जाना जाता है। इन्होंने दुनिया में सबसे पहले बाघ पुनर्वासन का सफ़ल प्रयोग किया। एक बाघिन जो तारा के नाम से मशहूर हुई और तीन तेन्दुएं, हैरिएट, जूलिएट, और प्रिन्स का जंगल में सफ़ल पुनर्वासन किया।
बिली अर्जन सिंह वाइल्ड लाइफ़ बोर्ड आफ़ इडिंया के सदस्य रहे, दुधवा के अवैतनिक वार्डन, इन्हे विश्व-प्रकृति निधि द्वारा गोल्ड मैंडल,  नोबल पुरस्कार की प्रतिष्ठा रखने वाला पाल गेटी पुरस्कार, पदम श्री व पदम भूषण के साथ अन्य तमाम राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। किन्तु इन सब के बावजूद सरकारों ने जो उपेक्षा दिखाई इस महा-पुरूष के अन्तिम समय व उसके उपरान्त,यह बहस का मुद्दा है, क्या सरकारों की जिम्मेदारी  सिर्फ़ पुरस्कारों के नाम पर कागज के टुकड़े दे देना भर है । यहां विषय ये नही है कि अर्जन सिंह के निधन पर शोक सन्देश आदि व राजकीय सम्मान क्यों नही मिला, सवाल ये है मान स्थापित करने का ताकि जनमानस किसी व्यक्ति द्वारा किए गये महान कार्यों का महत्व समझें और अनुसरण करने के लिए तत्पर हो। पर अफ़सोस ऐसा नही होता, और जब जरूरत पड़ती है देश को दिशा देने की तो इतिहास के पन्नों में खगांला जाता है, कि कोई पात्र तो ऐसा मिल जाय जो इस कार्य में लोगों के लिए प्रेरणा स्रोत बन सके!
इस मुल्क में घोटाले बाजों को पदम पुरस्कार दे दिए जाते है, तो और क्या उम्मीद की जा सकती है। कायदा तो यह कहता है। कमसे कम इतना जरूर करना चाहिए उन लोगों को जो सच्चे हकदार है पुरस्कार के उन्हे ही बहिष्कार करना चाहिए इन पुरस्कारों का। और उस फ़ेहरिस्त में शामिल होने से इन्कार भी जहां अयोग्य व अपात्र लोग ये गौरव हासिल कर रहे हो।
समसामयिक मुद्दों को छोड़कर सरकारे पर्यावरण और वन्य-जीव सरंक्षण के क्षेत्र में कार्य करने वालों को महत्व नही देती है और यदि देती भी है तो तब जब उस व्यक्ति या संस्था को दुनिया के तमाम देश और अन्तर्राष्ट्रीय संस्थायें सम्मानित कर देती है। इसके पीछे भी शायद वजह है, कि जानवरों का कोई वोट बैंक नही होता!
बिली अर्जन सिंह के महान कार्यों को समाज में प्रेरणादायी बनाने के लिए सरकार को मान स्थापित करने के लिए आगे आना चाहिए और सिर्फ़ नेताओं और पूर्व शासकों के नाम के अतिरिक्त यदि जगह खाली हो तो  डाक टिकट, राज्य मार्गों के नाम, नेशनल पार्क, लाइब्रेरी आदि को बिली अर्जन सिंह के नाम पर रखना चाहिए। स्मारक बनाने चाहिए और जैसी की तराई में मांग उठाई जा रही है, दुधवा टाइगर रिजर्व का नाम बिली अर्जन सिंह टाइगर रिजर्व करना चाहिए।

Feb 3, 2010

शहर के नज़दीक पहुँचा जंगल का राजा

दुधवा लाइव डेस्क: 02/02/2010 लखीमपुर-खीरी,  जिला मुख्यालय से तकरीबन १० कि०मी० उत्तर में उल्ल नदी और कण्डवा नदी के मध्य स्थित रुद्रपुर गाँव में बाघ देखे जानें से ग्रामीणों में दहशत का महौल है। यह मामला तब प्रकाश में आया जब एक ग्रामीण गन्ने के खेत में शौच के लिए गया था अचानक उसने पीछे मुड़ कर देखा तो एक विशाल धारीदार जानवर दिखाई पड़ा। उस व्यक्ति के मुताबिक, बड़े सिर वाला जानवर उसकी किसी हरकत से पहले  एक ही छलांग में गन्ने के खेतों में गायब हो गया।

Feb 2, 2010

दुधवा पार्क की स्थापना पर विशेष


 Dudhwa Gate
*देवेन्द्र प्रकाश मिश्र,   दुधवा का स्वर्णकाल अब बनकर रह गया यादगार- दुधवा राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना दो फरवरी सन् 1977 में वन प्रबन्धन, वन्यजीवों के संरक्षण व संवर्द्धन के लिये की गई थी। इसके लिये बताए गए नियम तथा कानून यथार्थ में खरे नही उतर रहें हैं। यद्यपि सन् 2000-01 से लागू किये गये दस वर्षीय मैनेजमेंट प्लान के अनुसार चल रहे कार्यो के आशातीत सफल परिणाम नहीं निकल पाये हैं। वरन् वन्यजीवों की संख्या लगातार घटती ही जा रही है। तमाम वन्यजीवों के साथ ही आमरूप से वनराज बाघ के होने वाले दर्शन अब धीरे-धीरे दुर्लभ ही होते जा रहे हैं। जिससे लग रहा है कि वन्यजीवों तथा बाघों से भरपूर दुधवा का लगभग एक दशक पूर्व वाला स्पर्णकाल लोगों के लिये भविष्य में यादगार बनकर रह जायेगा। उधर जंगल के समीपवर्ती गांवों के नागरिक जो वन एवं वन्यजीवों के संरक्षण व सुरक्षा में आगे रहकर सहभागिता करते थे वही अब पार्क कानून की पाबंदियों से उनके दुश्मन बन गए हैं। ऐसी स्थिति में आवश्यक हो गया है कि नागरिकों के हितों को अनदेखी किए बगैर वनजीवन तथा मानव के संबंधों को नई परिभाषा दी जाए तभी सार्थक व दूरगामी परिणाम निकल सकते हैं।

खीरी में हुआ बाघ का शिकार शव बरामद

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* देवेन्द्र प्रकाश मिश्र, पलियाकलां-खीरी। नार्थ-खीरी फारेस्ट डिवीजन की पलिया रेंज के परसपुर के जंगल में 05 जनवरी, 2010 को एक और बाघ (टाइगर) अकाल मौत के आगोश में चला गया। मालूम हो कि विगत साल 2008 में भी पलिया रेंज के ग्राम परसपुर के पास प्रवाहित सुतिया नाला में एक किशोर बाघ का सड़ागला शव पाया गया था। बाघों को हो रही असयम मौतो ने वन विभाग की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिन्हृ लगा दिया है।

दुधवा टाइगर रिजर्व

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* दुधवा लाइव डेस्क
दुधवा टाइगर रिजर्व
भारत का एक राज्य जो नेपाल की सरहदों को छूता है, उन्ही सरहदों से मिला हुआ एक विशाल जंगल है जिसे दुधवा टाइगर रिजर्व के नाम से जाना जाता है। यह वन उत्तर प्रदेश के खीरी जनपद में स्थित है यहां पहुंचने के लिए लखनऊ से सीतापुर-लखीमपुर-पलिया होते हुए लगभग २५० कि०मी० की दूरी तय करनी होती है। दिल्ली से बरेली फ़िर शाहजहांपुर या पीलीभीत होते हुए इस सुन्दर उपवन तक पहुंचा जा सकता है।

कतरनियाघाट वन्य जीव विहार

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* दुधवा लाइव डेस्क: संमुद्र तल से १७०-१९० मीटर ऊंचाई पर कतरनियाघाट वन्य जीव विहार बहराइच जनपद, उत्तर प्रदेश में स्थित है, इसकी सीमायें खीरी जनपद व नेपाल राज्य से सटी हुई है। सन १९७६ ईस्वी में इसे वाइल्ड-लाइफ़ सेन्क्चुरी का दर्जा हासिल हुआ। यहां टाइगर प्रोजेक्ट की शुरूवात की गयी और यह वन्य जीव विहार अब दुधवा टाइगर रिजर्व के अन्तर्गत है। इस वन का विस्तार ४०० वर्ग किलो मीटर में है।

विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था